श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 451–460
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 451–460
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आठवां अध्याय । ३११
सहस्रं ब्राह्मणो दण्डं दाप्यो गुप्ते तु ते ब्रजन् ।
शूद्रायां क्षत्रियविशोः साहस्रो वै भवेद्दमः ॥ ३८३ ॥
क्षत्रियायामगुप्ताय वैश्ये पञ्चशतं दमः ।
मूत्रेण मौण्ड्यमिच्छेत्तु क्षत्रियो दण्डमेव वा ॥ ३८४ ॥
ते क्षत्रिया वैश्ये शूद्रां वा ब्राह्मणो व्रजन् ।
शतानि पञ्च दण्ड्यःस्यात्सहस्रं त्वन्त्यजस्त्रियम्॥ ३८५॥
यदि ब्राह्मण रक्षित क्षत्रिया वा वैश्या से गमन करे तो उस पर हज़ार पण दण्ड करे और रक्षित शूद्रा में गमन करनेवाले क्षत्रिय और वैश्य पर भी हज़ार पण दण्ड करे । अरक्षित क्षत्रिया में ग-मन करने से वैश्य पर पाँच सौ परा और क्षत्रिय का मूत्र से मूड मुड़ाकर, पाँच सी पण दण्ड करे । यदि ब्राह्मण, अरक्षित क्षत्रिया, श्य और शूद्रा से व्यभिचार करे तो पाँच सौ पण दण्ड करे । और चाण्डालो भोगनसे गमन करने पर हज़ार पण दण्ड करे॥ ३८३-३८५॥
यस्य स्तनः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् ।
न साहसिकदण्डनौ स राजा शक्रलोकभाक् ॥ ३८६ ॥
एतेर्पा निग्रहो राज्ञः पञ्चानां विषये स्वके ।
साम्राज्यकृत्सजात्येषु लोके चैव यशस्करः ॥ ३८७ ॥
ऋत्विजं यस्त्यजेद्याज्यो याज्यं चत्विक् त्यजेद्यदि ।
शक्रं कर्मण्यदुष्टं च तयोर्दण्डः शतं शतम् ॥ ३८८ ॥
न माता न पिता न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति ।
त्यजन्नपतितानेतान् राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥ ३८६ ॥
श्रमेषु द्विजातीन कार्ये विवदर्ता मिथः ।
न वित्र्यान्नृपो धर्मं चिकीर्षन् हितमात्मनः ॥ ३६० ॥
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३१२ मनुस्मृति | "जिस राजा के नगर में न चोर हैं, न व्यभिचारी हैं, न कुवाच्य कहनेवाले हैं, न लुटेरे हैं, और न मार-पीट करनेवाले हैं वह राजा इन्द्रलोक को पाता है । इन पाँचों का अपने राज्य में निग्रह करने से राजा का राज्य और यश फैलता है । जो यजमान अपने कर्म करानेवाले निर्दोष ऋत्विज को त्याग दे या जो ऋत्विज योग्य. यजमान को छोड़ दे उनं दोनों पर राजा सौ सौ पण दण्ड करे! माता, पिता, स्त्री और पुत्र त्याग के योग्य नहीं होते । इनको पतित न हों तो त्यागनेवाले पर राजा छः सौ पण दण्ड करे । श्राश्रम- धर्म के लिए झगड़ने वाले द्वियों का राजा कोई फैसला न करे । वे खुद कर लेंगे ॥ ३८६-३६० ॥
यथार्हमेतानभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ३६१ ॥
प्रातिवेश्यानुवेश्य च कल्याणे विंशतिद्विजे ।
भोजयन् विप्रो दण्डमर्हति भाषकम् ॥ ३६२ ॥
श्रोत्रियः श्रोत्रियं साधुं भूतिकृत्ये ष्वभोजयन् ।
तदन्नं द्विगुणं दाप्यो हिरण्यं चैव माषकम् ॥ ३६३ ॥
अन्धो जडः पीठसप सप्तत्या स्थविरश्व यः ।
श्रोत्रियेषूपकुर्वंश्च न दाप्याः केनचित्करम् ॥ ३६४ ॥
श्रोत्रियं व्याधितार्तौ च बालवृद्धावकिञ्चनम् ।
महाकुलीनमार्यं च राजा संपूजयेत् सदा ॥ ३६५ ॥
किन्तु अपने सभासदों के साथ इनकी यथोचित पूजा करके प्रथम समभावे फिर स्वधर्म का आदेश करे । यदि कोई उत्सव हों और वीस ब्राह्मणों के भोजन का प्रवन्धं हो तब पढ़ोसी और आने जानेवाले हिती को न जिमावे तो उस पुरुष पर एक मापक दण्ड करे । किसी मङ्गलकार्य में वेदज्ञ ब्राह्मण, साधु आदि को भोजन न देने से उसको दूना अन्न और सोना का एक सापक देना होगा ।
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आठवां अध्याय । ३१३ अन्धा, बहिरा, लूला, सत्तर वर्ष का बूढ़ा और श्रोत्रिय से राजा कोई कर न लेवे । श्रोत्रिय, रोगी, दुःखी, वालक, बूढा, निर्धन, महाकुलीन,. और महात्मा पुरुष की तरफ़ राजा सदा श्रादर- दृष्टि रक्खे ॥ ३६१-३६५ ॥
शाल्मलीफलके श्लक्ष्णे नेनिज्यान्नेजकः शनैः ।
न च वासांसि वासोभिर्निहरेन व वासयेत् ॥ ३६६ ॥
तन्तुवायो दशफलं दद्यादेकपलाधिकम् ।
तोsन्यथा वर्तमान दाप्यो द्वादशकं दमम् ॥ ३६७॥
शुल्कस्थानेषु कुशलाः सर्वपण्यविचक्षणाः ।
कुर्युरधं यथापण्यं ततो विंशं नृपो हरेत् ॥ ३६८ ॥
धोबी सेमर के चिकने पाट पर धीरे धीरे कपड़े धोवे, कपड़ों को बदले नहीं और न बहुत दिनों तक पड़ा रक्खे । जुलाहा यदिदश, पल सुन लेकर मांड़ी के संवच से ग्यारह पल कपड़ा देवे । खिलाफ़ करे तो उस पर राजा वारह पण दण्ड दिलावे । जोमेंपुरुषप्र- चुंगी वग़ैरह के कामों में चतुर और हर प्रकार केभागव्यापारोंराजा ग्रहण 'वीरा हो, उन सौदागरों के लाभ का बीसवाँ करे ॥ ३६६-३६८ ॥ च । 'राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिषिद्धानि यानि तानि निर्हरतो लोभात्सर्वहारं हरेन्नृपः ॥ ३६६ ॥
। - शुल्कस्थानंमिथ्यावादी चपरिहरन्नकालेसंख्याने दाप्योक्रयविक्रयीऽष्टगुणमत्ययम्। ॥ ४०० ॥
श्रागमं निर्गमं स्थानं तथा वृद्धिक्षणावुभौ॥ ४०१ ॥
विचार्य सर्वपण्यानां कारयेत्क्रयविक्रयौ पञ्चरात्रे पञ्चरात्रे पक्षे पक्षेऽथवा गते । ४०
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II I मनुस्मृति ।
कुर्वीत चैषां प्रत्यक्षमर्घसंस्थापनं नृपः ॥ ४०२ ॥
तुलामानं प्रतीमानं सर्वं च स्यात्सुलक्षितम् ।
षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ॥ ४०३ ॥
राजा अपने देश के जिन प्रसिद्ध वस्तुनों को परदेश में व्यापारार्थ जाने से रोके उनको लोभवश कोई लेजाय तो राजा उसका सर्वस्व छीन लेय । चुंगीघर से छिपानेवाला, श्रसमय में खरीद-बेंच करनेवाला, गिनती-तोल में झूठ बोलनेवाला वस्तु के मूल्य सेआठ गुणा दण्ड के योग्य होता है । माल कहां से आया है, कहां जाता है, कितने दिन पड़ा रहा है, उसमें हानि वा लाभ क्या होगा, यह सव विचार कर खरीद-बेंच का भाव ते करे । पाँच पाँच दिन अथवा पाँच पाँच पक्ष बीतने पर राजा माल का भाव व्यापारियों के सामने नियत करे । तराजू के बांद और गज़ वगैरह पर अपनी मोहर लगाकर ठोक रक्खे और छठे महीना उनकी जांच किया करे || ३६६-४०३ ॥
पण यानं तरेदाप्यं पौरुषोऽर्धपणं तरे ।
पादं पशुश्च योषिच्च पादार्धं रिक्तकः पुमान् ॥ ४०४ ॥
भाण्डपूर्णानि यानानि तार्यं दाप्यानि सारतः ।
रिक्तभाण्डानि यत्किञ्चित्पुमांसश्चापरिच्छदाः॥४०५॥
दीर्घाध्वनि यथादेशं यथाकालं तरो भवेत् ।
नदीतीरेषु तद्विद्यात्समुद्रे नास्ति लक्षणम् ॥ ४०६ ॥
पुल, नदी का महसूल । नदी पार करने में खाली गाड़ी का एक पण, भार संहित मनुष्यों का श्रापण, पशु और स्त्री का चौथाई पर और खाली मनुष्य से पणका आठवाँ भाग महसूल लेय । मालभरी गाड़ी पार उतरने का महसूल चोका के अनुसार लेय और खाती सवारी
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आठवां अध्याय । ३१५ और गरीबों से थोड़ा सा लेय । लम्बी उतराई का महसूलदेश- काल के अनुसार होगा । यह नदीतट का नियम है । समुद्र के लिए कोई निश्चय नहीं हो सकता ॥ ४०४-४०६ ॥
गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः ।
ब्राह्मणा लिङ्गिनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥ ४०७ ॥
यन्नाविकिञ्चिदासानां विशीर्येतापराधतः ।
तदासैरेव दातव्यं समागम्य स्वतोंऽशतः ॥ ४०८ ॥
एष नौयायिनामुक्तो व्यवहारस्य निर्णयः ।
दाशापराधतस्तोये दैविके नास्ति निग्रहः ॥ ४०६ ॥
दो महीना से अधिक की गर्भिणी, वानप्रस्थ, संन्यासी और ब्राह्मण, ब्रह्मचारी नदी पार जाने की उतराई न दें । नाव में मल्लाहों 7 के दोप से जो कुछ हानि हो, वह मल्लाह लोग इकट्ठा होकर अपने भाग में से देवें । यह नौका से नदी पार होने का निर्णय और जल मल्लाहों के व्यवहार का निर्णय कहा है । यदि कोई देवी वि पत्ति पड़े तो उस में कोई दण्डविधान नहीं है ॥ ४०७-४०६ ॥
वाणिज्यं कारयेद् वैश्यं कुसीदं कृषिमेव च ।
पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् ॥ ४१० ॥
क्षत्रियं चैव वैश्यं च ब्राह्मणो वृत्तिकर्शितौ ।
विभृयादानृशंस्येन स्वानि कर्माणि कारयन्॥ ४११ ॥
दास्यं तु कारयंल्लोभाद्द् ब्राह्मणः संस्कृतान् द्विजान् ।
अनिच्छतःप्राभवत्याद्राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥ ४१२॥
शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा ।
दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा॥ ४१३ ॥
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३१.६: मनुस्मृति ।
न स्वामिना निस्सृष्टथेपि शूद्रो दास्याद्विमुच्यते ।
निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तदपोहति ॥ ४१४ ॥
राजा वैश्यों से व्यापार, व्याज, खेती और पशुरक्षा का उद्यम करावे । और शूद्रों से द्विजोंकी सेवा करावे । जीविका से रहित वैसे ब्राह्मण अपना कर्म करावे और उनका पा लन करे । यदि धनी ब्राह्मण लोभवश उत्तम द्विजों से सेवाकर्म करावे तो उसपर राजा छ सौ पण दण्ड करे | खरीदे वा. विना खरीदे शूद्रों से सेवाही करावे क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्रों को दासकर्म के लिएही पैदा किया है । स्वामी से छुड़ाया हुआ भी शूद्र दास- कर्म को नहीं छोड़ सकता क्योंकि वह उसका स्वाभाविक धर्म है ॥ ४१०-४१४ ॥
ध्वजाहृतो भक्तदासो गृहजः क्रीतदत्रिमौ ।
.पैत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः ॥ ४१५ ॥
भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधमाः स्मृताः ।. ' येते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ४१६ ॥
विखन्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादानमाचरेत् ।
नहि तस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तृहार्यधनो हि सः ॥ ४१७॥
युद्ध में जीतकर लाया हुआ, भक्त दाल, दासीपुत्र खरीषा हुआ,, किसी का दिया हुआ, परंपरा से प्राप्त और दराड -शुद्धि के लिए जिसने दासपना किया हो; ये सात प्रकार के दास होते हैं । भार्या, पुत्र और दाल इन तीनों को मंतुने निर्धन कहा है, ये जो धन पाते हैं, वह उसका है जिसके ये होते हैं । ब्राह्मण को अपने दास शुद्ध से विना विचार धन ले लेना चाहिए उसका धन कुछ नहीं है क्योंकि दास के धन का मालिक उसका मालिक ही है ॥ ४१५-४१७ ॥ वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् ।
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आठवां अध्याय । ३१७
तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत्॥११८॥
अहन्यहन्यवेक्षेत कर्मान् तान् वाहनानि च ।
आयव्ययौ च नियतावाकरान् कोशमेव च ॥ ४१६ ॥
एवं सर्वानिमान् राजा व्यवहारान् समापयन् ।
व्यपोद्य किल्विषं सर्वं प्राप्नोति परमां गतिम्॥ ४२० ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोकार्या संहिताया- मष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
राजा यत्नपूर्वक वैश्य और शूद्रसे उनके कर्मों को करावे क्योंकि वे अपने कर्म से हटकर संसार को उपद्रवों से दुखी करेंगे । राजा प्रतिदिन श्रारम्भ किये कार्यों का, सवारियों का, नियत आय-व्यय, खान और धन भण्डार का अवलोकन करे । इसप्रकार राजा इन सव व्यवहारों का निर्णय करताहुआ सब पापों का
नाश करके परम गति को पाता है । ४१८-४२० ॥
आठवां अध्याय पूरा हुआ ।
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अथ नवमोऽध्यायः ।
पुरुषस्य स्त्रियाश्चैव धर्ये वर्त्मनि तिष्ठतोः ।
संयोगे विप्रयोगे च धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ १ ॥
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम् ।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाया श्रात्मनो वशे ॥ २ ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३ ॥
काले दाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पतिः ।
मृते भर्तरि पुत्रस्तु वाच्यो मातुररक्षिता ॥ ४ ॥
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसङ्गेभ्यः स्त्रियो रक्ष्या विशेषतः ।
द्वयोर्हि कुलयोः शोकसावहेयुररक्षिताः ॥ ५ ॥
इमं हि सर्वं वर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम् ।
यतन्ते रक्षितुं भार्यां भर्तारो दुर्बला अपि ॥ ६ ॥
नवां अध्याय । स्त्रीरक्षा- | अपने सनातन धर्म में स्थित पुरुष और स्त्रियों के संयोग और • वियोग समय के धर्म कहे जाते हैं:- पुरुष को अपनी स्त्रियों को कभी स्वतन्त्र न होने देना चाहिए । नाच गान मेंश्रासक्त स्त्रियों को अपने वशमें रखनाचाहिए । वा • लकपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापा में पुत्र रक्षा करें,
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नवां अध्याय । ३१६ स्त्री स्वतन्त्र होने योग्य नहीं है । समय पर कन्यादान पिता, ऋतुकाल में सहवास न करने से पति और पितान करनेके से माता की रक्षा न करने से पुत्र निन्दा का पात्र होताहै । साधारणबाद कुसंगों से भी स्त्रियों को बचावे क्योंकि श्ररक्षित स्त्रियां दोनों कुलों को दुःख देती हैं । इसप्रकार संपूर्ण वर्णों का धर्म है । दुर्बल पति भी अपनी स्त्रियों की रक्षा का उपाय करते हैं ॥ १-६ ॥
स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च ।
स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ ७ ॥
पतिर्भार्यां संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥ ८ ॥
यादृशं भजते हि स्त्री सुतं सूते तथाविधम् ।
तस्मात्प्रजाविशुध्यर्थं स्त्रियं रक्षेत् प्रयत्नतः ॥ ६ ॥
न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसद्य परिरक्षितुम् ।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ १० ॥
स्त्रियों की रक्षा करने से पुरुष अपनी संतान को वर्णसङ्कर होने से बचाता है, अपने चरित्र को निर्दोष रखताहै, अपने कुल की मर्यादा बढ़ाता है, अपनी और अपने धर्म की रक्षा करता है । पति स्त्री में वीर्यरूप से प्रवेश करके जगत् में पुत्ररूप से जन्म लेताहै । अपनीस्त्री में फिर जन्मता है इसीसे स्त्री जाया कह लाती है । जैसे पुरुष को खी सेवन करती है उसी भांति का पुत्र पैदा करती है । इसलिए प्रजा की पवित्रता के लिए स्त्री की रक्षा प्रयत्नपूर्वक करे । कोई बलात्कार से स्त्रियों की रक्षा नहीं कर स- कता, किन्तु इन उपायों से उनकी रक्षा कर सकता है ॥ ७-१० ॥
अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।
शौचे धर्मेऽन्नपकर्त्यां च पारिणाह्यस्य वैक्षणे ॥ ११ ॥
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मनुस्मृति 1.३२० अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः 1: आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ॥ १२ ॥
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट् ॥ १३ ॥
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयासे संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १४ ॥
धन -संग्रह, खर्च, सफाई, पतिसेवा, धर्म, रसोई और घरके सँभाल में स्त्री को लगावे । विश्वास पात्र मनुष्यों से घरमें रखवाली. कराने से रक्षित नहीं होती किन्तु जो अपनी रक्षा श्रापहीवियोगकरे, वेही सुरक्षित होसकती हैं । मद्यपान, दुर्जनसँग, पति से में दूषण घूमना, सोना, दूसरे के घर रहना ये छः भांति के स्त्रियोंनहीं देखती; 'होतेकेवलहैंपुरुष। व्यभिचारिणीदेखकर हीस्त्रियांमोहितरूपहोजातीऔर अवस्थाहैं, वहको कुरूप हो या सुरूप ॥ ११-१४ ॥
पौश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यवतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ॥ १५ ॥
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ १६ ॥
श्य्यासनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभाव कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत्॥ १७ ॥
नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मो व्यवस्थितः ।
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमितिस्थितिः ॥१८॥
व्यभिचारिणी होनेसे, चित्तकी चञ्चलतासे, स्वभाव से रुखापनसे,