श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 461–470

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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| नवां अध्याय ३२१ त्रियां रक्षित होनेपर भी अपने पति से विमन रहती हैं । ब्रह्मा के रचे योग करे, ऐसे| सोनास्त्रियों, बैठेके रहनास्वभाव, गहनेपरजानकरप्रेमउनकी, कामरक्षा, क्रोधका, खूबतपनाउ-, दूसरों से द्रोह र दुराचार ये स्त्रियों में स्वभाव से पैदा-ऐसा मनु ने कहाहै । स्त्रियों के जातकर्मादि संस्कार मन्त्रों से नहीं होते इसलिए वे धर्मरहित होती हैं । असत्य के समान हैं -यह धर्म-शास्त्र की मर्यादा है ॥ १५-१८ ॥

तथाच श्रुतयो व निगीता निगमेष्वपि ।

स्वालक्षण्यपरीक्षार्थं तास शृणुत निष्कृतीः ॥ १६ ॥

यन्मे माता लुलु विचरन्त्यपतिव्रता ।

तन्मे रेतः पिता वृङ्क्रामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २० ॥

ध्यायत्यनिष्टं यत्किञ्चित्पाणिग्राहस्य चेतसा ।

तस्यैष व्यभिचारस्य निह्नवः सम्यगुच्यते ॥ २१ ॥

यादृग्गुणेन भर्त्रास्त्री संयुज्येत यथाविधि ।

तादृग्गुणा सा भवति समुद्रेणेव निम्नगा ॥ २२ ॥

व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वभाव की परीक्षार्थ वेदों में बहुत श्रतियां पठित हैं । उनमें जो व्यभिचार के प्रायश्चित्तभूत हैं उन को सुनो । कोई पुत्र माता का मानस व्यभिचार जानकर कहताहै-जो मेरी माता अपतिव्रता हुई परपुरुष को चाहनेवाली थी, उसहै । दुष्टता का मेरा पिता शुद्ध वीर्यसे शोधन करे यह एक नमूना( मान- श्री अपने मनमें पतिके लिए जो श्रशुभ चिन्तन करती है करने सिh व्यभिचार ) उसका प्रायश्चित्तरूप मन्त्र पुत्रकोसाथ स्त्रीशुद्ध विवाह वालाहै, माता को नहीं ।"जिस गुणवाले पति के करके रहे वैसेही गुणवाली वह होजाती है, जैसे समुद्र के साथ नदी खारी होजाती है ॥ १६-२२ ॥ अक्षमाला वशिष्ठेन संयुक्ताऽधमयोनिजा । ४१

पृष्ठ 462

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३२२ •मनुस्मृति ।

शारङ्गी मन्दपालेन जगामाभ्यर्हणीयताम् ॥ २३ ॥

एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।

उत्कर्षं योषितः प्राताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥ २४ ॥

एषोदिता लोकयात्रा नित्यं श्रीपुंसयोः शुभा ।

प्रेत्येह च सुखोदर्कान् प्रजाधर्मान्निबोधत ॥ २५ ॥

अक्षमाला -श्रधम जाति की स्त्री वशिष्ठ को विवाहित होने से पूज्य हुई । शारंगी पक्षीजाति की मन्दपाल को विवाहित होने से पूज्य हुई । ये और दूसरी भी स्त्रियां इस लोक में अपने पतियों के गुणों के कारण उन्नति को पहुँची हैं । इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का उत्तम लौकिक त्राचार कहा गया है । छाव लोक, परलोक में सुख देनेवाले सन्तानधर्म को सुनों ॥ २३-२५ ॥

प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः ।

स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोस्ति कश्चन ॥ २६ ॥

उत्पादनमयत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।

प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ २७ ॥

श्रापस्य धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।

दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितृणामात्मनश्च ह ॥ २८ ॥

पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।

'सा भर्तृलोकानाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥ २६ ॥

व्यभिचारातु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।

शृगालयोनिं वाशोति पापरोगैश्च पीडयते ॥ ३० ॥

ये स्त्रियां पुत्र उत्पन्न करने के लिए बड़ी भाग्यवंती, और घर की शोभा हैं । स्त्रियों में और लक्ष्मी में कोईसत्कारभेद

पृष्ठ 463

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नवां अध्याय । ३२३ नहीं है । दोनों समान हैं । सन्तान पैदा करना, उनका पालन श्रतिथि, मित्र श्रादि का लौकिक श्रादर-भोजन का निर्वाह श्री से ही हो सकता है यह प्रत्यक्ष है । सन्तान, धर्मकार्य, अतिथिः सेवा, अच्छा काम सुख, अपने और पितरों को स्वर्ग प्राप्ति स्त्री के अधीन है । जो स्त्री मन, वाणी और शरीर को वश में रखकर पति के अनुकूल रहती है वह पतिलोक पाती है और जगत् में साध्वी कही जाती है । और पति के विरुद्ध करने से लोक में निन्दा पाती है । सियार की योनि में जन्म लेती है और दुरे रोगों से दुःखी होती है ॥ २६-३० ॥

पुत्रं प्रत्युदितं सद्भिः पूर्वजैश्च महर्षिभिः ।

विश्वजन्यमिमं पुण्यसुपन्यासं निबोधत ॥ ३१ ॥

भर्तुः पुत्रं विजानन्ति श्रुतिद्वैधं तु भर्तरि ।

आहुरुत्पादकं केचिदपरे क्षेत्रिणं विदुः ॥ ३२ ॥

क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् ।

क्षेत्रवीजसमायोगात् संभवः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३ ॥

विशिष्टं कुत्रचिद्बीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव कुत्रचित् ।

उभयं तु समं यत्र सा प्रसूतिः प्रशस्यते ॥ ३४ ॥

वीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ।

सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीजलक्षणलक्षिता ॥ ३५ ॥

यादृशं तूप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते ।

तादृग्रहति तत्तस्मिन् बीजं स्वैव्र्यञ्जितं गुणैः। ॥ ३६ ॥

इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुध्यते ॥न च योनिगुणान्कश्चिद्बीजं पुष्यति पुष्टिषु। ॥ ३७ भूमावयेककेदारे कालोतानि कृषीवलैः

पृष्ठ 464

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३२४ मनुस्मृति ।

नानारूपाणिजायन्ते बीजानीह स्वभावतः ॥ ३८ ॥

प्राचीनकाल के महात्मा- महर्षियों ने जो पुत्र को कहा था, उस विश्वहितकारी, पवित्र विचार को सुनो- क्षेत्र - बीजनिर्णय । मुनिगण उत्पन्न पुत्र को भर्ता का मानते हैं । परन्तु भर्ता के विषय में दो प्रकार की श्रुति हैं- पहला मत है -पुत्र जिसके वीर्य से हुआ हो उसका माना जाता है । दूसरा मत है-जिसकी स्त्री में पैदा हो उसका होता है । स्त्री क्षेत्ररूप और पुरुष बीजरूप कहा है, इस क्षेत्र और बीज के संयोग से सब प्राणियों की उत्पत्ति, है । कहीं बीज और कहीं क्षेत्र श्रेष्ठ माना जाता है । पर जिसमें दोनों समान हों वह सन्तान श्रेष्ठ है । बीज और क्षेत्र में वीज उत्तम गिना जाता है, क्योंकि सब प्राणियों की उत्पत्ति में बीज के रूप, रंग देखने में आते हैं । समय पर जैसा वीज खेत में बोया जाता है, उसी भांति का गुण पैदा हुए में जाता है । यह भूमि प्राणियों की सनातन-योनि कही जाती है । परन्तु वीज अपने खेत के गुणों को धारण नहीं करता । किसान लोग एक ही भांति के खेत में समय पर अलग अलग बीज बोते हैं और वे अपने स्वभाव से भांति भांति के उत्पन्न होते हैं अर्थात् एक ही भूमि होने से एकसे नहीं होते ॥ ३१-३८ ॥

व्रीहयः शालयो मुद्रास्तिला माषास्तथा यवाः ।

यथाबीजं प्ररोहन्ति लशुनानीक्षवस्तथा ॥ ३६ ॥

अन्यदुतं जातमन्यदित्येतन्नोपपद्यते ।

उप्यते यद्धि यबीजं तत्तदेव प्ररोहति ॥ ४० ॥

तत्प्राज्ञेन विनीतेन ज्ञानविज्ञानवेदिना ।

आयुष्कामेन वतव्यं न जातु परयोषिति ॥ ४१ ॥

अत्र गाथा वायुगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।

पृष्ठ 465

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नव अध्याय |.३२५ यथा बीजं न वप्तव्यं पुंसा परपरिग्रहे ॥ ४२ ॥

धान, साठा, मूंग, तिल, उड़द, जव, लसुन और ईख बोने पर अपने बीज के अनुसार ही उगते हैं । वीज दूसरा, वृक्ष दूसरा उगे यह नहीं होता । जो वीज होता है, उसीका वृक्ष पैदा होता है । इसलिए बुद्धिमान्, विनीत, ज्ञान -विज्ञान-विशारद को परस्त्री में बीज न बोना चाहिए । प्राचीन इतिहास के ज्ञाता ऋषि इस विषय में वायु की गाई गाथा गाते हैं-परस्त्री में पुरुष को बीज न वोना चाहिए ॥ ३६-४२ ॥

नश्यतीषुर्यथा विद्धः खे विद्धमनुविध्यतः ।

तथा नश्यतिवै क्षिप्रं बीजं परपरिग्रहे ॥ ४३ ॥

पृथोरपीमां पृथिवीं भार्यां पूर्वविदो विदुः ।

स्थाणुच्छेदस्य केदारमाहुः शल्यवतो मृगम् ॥ ४४ ॥

एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह ।

विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सा स्मृताङ्गना ॥ ४५ ॥

न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्यां विमुच्यते ।

एवं धर्मं विजानीमः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥ ४६ ॥

1. जैसे दूसरे के बेधे मृग को फिर मारने से वाणहै निष्फल। इस पृथिवीहोता है, ऐसे परस्त्री में चोया बीज शीघ्र निष्फलभीहोतालोग पृथुकी भार्या को जो पहले राजा पृथुकी भार्या थी, अबकरता है उसका खेत और ही जानते हैं । जो वृक्ष काटकर साफ़मृग कहलाताहै । स्त्री श्राप और जिसका पहले बारा लगे उसका वहपुरुष कहलाता है । वेदज्ञ ब्राह्मण भीसन्तानकहतेयेहैंतीनोंकि जोमिलकरभर्ता है वहींएक भार्या है । बैंचने वा छोड़ने से एव श्रात्मनस्तस्माद्यञ्जायां न विन्दते * शतपथब्राहाण में श्रुति है— अर्धी। श्रथहवायदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि नैतावत्प्रजायते, सर्वो हि तावद्भवति सर्वो भवति' ।

पृष्ठ 466

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३२६ मनुस्मृति । भार्या अपने पति से नहीं छूटती । ऐसी धर्ममर्यादा, प्रजापति कोरची हम जानते हैं ॥ ४३-४६ ॥

सकृदंश निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते ।

सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ ४७ ॥

यथा गोऽश्वोदासीषु महिष्यजाविकासु च ।

नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ ४८ ॥

क्षेत्रिण बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः । तेवै शस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ ४६ ॥,

यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छ्रतम् ।

गोसिनामेव ते वत्सा मोघं स्कन्दितमार्षभम् ॥ ५० ॥

तथैवाक्षेत्रियो वीजं परक्षेत्रवापिणः ।

- कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजी लभते फलम् ॥ ५१ ॥

भाइयों का बँटवारा एक बार ही होता है । कन्यादान एक वार होता है और दान भी एकही बार कहने से होजाता है -सत्पु रूप इन तीन बातों को एकवार ही करते हैं । जैसे गौ, घोड़ी, ऊंटनी, दासी, भैंस, बकरी और भेंड़ आदि में सन्तान पैदा करने चाला उस सन्तान का स्वामी नहीं माना जाता, ऐसेही परस्त्री में. सन्तान का भागी नहीं होता । जो क्षेत्र स्वामी न होकर, वीज वोनेवाले हों, वे उस खेत के अन्नादि फल को नहीं पासकते हैं । एक बैल दूसरे की गायों में सैकड़ों बछड़े पैदा करता है, वे गौ बालों के होते हैं और वैल का वीर्य निष्फल जाता है, वैसे ही परक्षेत्र में बोनेवाले खेतवाले का काम करते हैं, बीजवाला फल नहीं पाता ॥ ४७-५१ ॥ फलं त्वनभिसंधाय क्षेत्रिणां वीजिनां तथा ।.

पृष्ठ 467

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नवां अध्याय | ३२७ प्रत्यक्षं क्षेत्रिणामर्थो वीजाद्योनिर्गरीयसी ॥ ५२ ॥

क्रियाभ्युपगमात्वेतद्बीजार्थं यत्हादीयते ।

तस्येह भागिनौ दृष्टौ बीजी क्षेत्रिक एव च ॥ ५३ ॥

वाताहतं वीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोहति ।

क्षेत्रिकस्यैव तद्वीजं न वप्ता लभते फलम् ॥ ५४ ॥

खेत और वीजवालों में कोई ठहराव न हो तब तक सन्तान खेतवाले की प्रत्यक्ष मानीजाती है । क्योंकि - चीज से खेत ही प्रधानहै । क्षेत्र मेंजो सन्तान होगी, वह हम दोनोंकी होगी-ऐसा ठहराव हुआ हो तो सन्तान क्षेत्र और बीज दोनों की होगी । जो बीज जल के वेग वा वायु से गिरकर दूसरे के खेत मैं पैदा हो, उसके फल का भागी खेतवाला होता है वोनेवाला नहीं ॥ ५२-५४ ॥

एव धर्मो गवाश्वस्य दास्युष्ट्राजाविकस्य च ।

विहंगमहिषीणां च विज्ञेयः प्रसवं प्रति ॥ ५५ ॥

एतद्वः सारफल्गुत्वं वीजयोन्योः प्रकीर्तितम् ।

प्रतः परं प्रवक्ष्यामि योषितां धर्ममापदि ॥ ५६ ॥

भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भार्या या गुरुपत्न्यनुजस्य सा ।

यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्टस्य सा स्मृता॥ ५७॥

ज्येष्ट यवीयसो भार्या यवीयान् वाग्रजस्त्रियम् ।

पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥ ५८ ॥

देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यनियुक्तया ।

प्रजेसिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥ ५६ ॥

विधवा नियुक्तस्तु घृताको वाग्यतो निशि ।

पृष्ठ 468

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३२८ मनुस्मृति ।

एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ ६० ॥

द्वितीयमेके प्रजनं मन्यन्ते स्त्रीषु तद्विदः ।

अनिर्वृतं नियोगार्थं पश्यन्तो धर्मतस्तयोः ॥ ६१ ॥

विधवायां नियोगार्थे निर्वृते तु यथाविधि ।

गुरुवच्च स्नुपावच्च वर्तेयातां परस्परम् ॥ ६२ ॥

1 यह व्यवस्था गौ, घोड़ी, दासी, ऊंटनी, चकरी, भेड़, पक्षी और भैंस की संतति में जाननी चाहिए । इस प्रकार वीज और योनि की प्रधानता और प्रधानता का विषय कहा गया श्रव स्त्रियों का आपद्धर्म कहा जाता है । स्त्रियों का आपद्धर्म, नियोग । बड़े भाई की स्त्री छोटे भाई को गुरुपत्ती के समान और छोटे भाई की स्त्री बड़े भाई को पुत्रवधू के समान कही है । श्रापचिकाल, न हो अर्थात् पुत्र हो तो बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोगविधि से गमन करे तो दोनों पतित होते हैं । सन्तान न हो तो नियोग की हुई स्त्री देवर या सपिण्डपुरुप से अभीष्ट सन्तान प्राप्त करे । विधवा स्त्री के साथ नियोग करनेवाला शरीर में घी लगाकर मौन होकर रात्रि में भोग करे और इस भांति एक ही पुत्र पैदा करे, दूसरा कभी न करे । नियोगविधि के ज्ञाता कोई ऋषि एक पुत्र से नियोग का प्रयोजन सिद्ध न होते देखकर दूसरा पुत्र पैदा करना भी धर्म मानते हैं । शास्त्र की रीति से विधवा स्त्री में नियोग का प्रयोजन हो जाने पर छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री से माता और बड़ा भाई छोटे की स्त्री से पुत्रवधू के समान बर्ताव करे ॥ ५५-६२ ॥

नियुक्तौ यो विधिं हित्वा वर्तेयातां तु कामतः ।

तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 469

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नवां अध्याय | ३२६

नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।

अन्यस्मिन् हि नियुआना धर्मं हन्युः सनातनम् ॥ ६४॥

नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।

न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥ ६५ ॥

अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः । मनुष्याणामपि प्रोक्को वने राज्यं प्रशासति ॥ ६६ ॥.

स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा ।

वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः ॥ ६७ ॥

ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ।

नियोजयत्यपत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः ॥ ६८

यस्यायेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।

तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ ६६ ॥

यदि नियोग करनेवाले दोनों शास्त्रविधि को छोड़कर मन-माना व्यवहार करें तो पतित होते हैं । और पुत्रवधूगुरुपत्नी के साथ गमन करनेवाले माने जाते हैं । द्विजातियों को विधवा स्त्री का नियोग दूसरे वर्णवाले से न करना चाहिए । शुन्य जाति से नि योग की हुई स्त्रियाँ धर्म का नाश कर डालती हैं । विवाहसम्बन्धी मन्त्रों में कहीं नियोग नहीं कहा है और विधवा का पुनर्विवाह भी कहीं नहीं कहा है । यह नियोगविधि * राजा वेन के राज्य में * नियोग और विधवा-विवाह वेद -स्मृति से विरुद्ध है । इसी लिए वेन के समय में प्रचलित नियोग का मनुने खण्डन किया है । दूसरी स्मृतियों से दश -पांच

श्लोक विधवाविवाह के विषय में नवीन मतवाले प्रमाण देते हैं और ऋग्वेद

वा अथर्व के दो चार मन्त्र भी प्रमाण में उपस्थित करते हैं । पर वे सब दूसरे

अभिप्राय के हैं, कोई भी विधवाविवाह वा नियोग को सिद्ध नहीं करते । ' उदीनार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि । हस्तग्रामस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्ज-नित्वमभि संबभूथ । ' ऋग्वेद, १०।१८१८]. 'उतयत्पतयो दशखियाः पूर्वे चत्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा । ' अथर्व० ५।४।१७ इत्यादि मन्त्रों से सब कुछ सिद्ध करते हैं । परन्तु इनका प्रसङ्ग, सम्बन्ध, अर्थ दूसरा ही है । श्रीमनकृत ' विधवा-विवाहमीमांसा ' में विस्तार से लिखा गया है । ४२

पृष्ठ 470

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३३० 'मनुस्मृति । प्रचलित हुई थी । परन्तु विद्वान् द्विजों ने इस पशु की निंदा की है । राजर्पि वेन जब सारी पृथ्वी पर राज्य करता था, उस समय कामवासना से नष्टबुद्धि होकर वर्णसङ्करता फैलाई थी । तब से जो पुरुष विधवा स्त्री का संतान के लिए नियोग करता है उसकी साधु पुरुष निंदा करते हैं । जिस कन्या का पति वाग्दान करने बाद मर जाय तो उसको उस का देवर इस भांति स्वीकार करे ॥ ६३-६६ ॥

यथाविध्यधिगस्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचित्रताम् ।

मिथो भजेताप्रसवात्सकृत्सकृद्दतादृतौ ॥ ७० ॥

न दत्त्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः ।

दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषानृतम् ॥ ७१ ॥

विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम्।

व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मना चोपपादिताम् ॥ ७२ ॥

यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोपपादयेत् ।

तस्य तद्वितथं कुर्यात् कन्यादातुर्दुरात्मनः ॥ ७३

विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत् कार्यवान्नरः ।

वृत्तिकर्षिता हि स्त्री प्रदुष्येत् स्थितिमत्यपि ॥ ७८४ ॥

विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता ।

'प्रोषिते त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः ॥ ७५ ॥

प्रोषितो धर्मकामार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः ।

विद्यार्थी ष्ट यशोऽर्थंवा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान्॥७

संवत्सरं प्रतीक्षेत द्विषन्तीं योषितं पतिः ।

ऊर्ध्वं संवत्सरात्वेन दायं हृत्वा न संवसेत् ॥ ७७ ॥।