श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 511–520
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 511–520
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नवां अध्याय । ३७१ समुद्र को न पीने योग्य और चन्द्रमा को क्षयरोगी करके पीछे पूर्ण किया उन ब्राह्मणों को कुपित करके कौन नष्ट न होजायगा? जो ब्राह्मण रुट होकर दूसरे लोक और लोकपाल को रच सकते हैं और देवताओं को शाप देकर नीचयोनि में डाल सकते हैं, उन को दुःख देकर कौन चढ़ सकता है? ॥ ३१३-३१५ ॥
यानुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोका देवाश्च सर्वदा ।
ब्रह्म चैत्र धनं येषां को हिंस्यात्तान् जिजीविषुः ॥ ३१६ ॥
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् ।
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्देवतं महत्॥ ३१७ ॥
श्मशानेस्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते ॥ ३१८ ॥
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु ।
सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ॥ ३१६ ॥
स्वर्गादि लोक श्री देवता, जिनके श्राश्रय से टिके रहते हैं? और वेदही जिन का धन है उन ब्राह्मणों को कौन मारना चाहेगा जैसे अग्नि वेदमन्त्रों से, या दूसरे प्रकार से प्रकटदेवताहो परहै महान्। ते- देवता है, वैसे ब्राह्मण विद्वान् या सूखे हो महान्किंतु यज्ञ में हर्वन जस्वी अग्नि शमशान में भी दूषित नहीं हैहोता। इसी प्रकार ब्राह्मण, कियाfiferहुआ फिरकर्मोवृद्धिके कोकरनेप्राप्तपरहोताभी सर्वथा पूज्य हैं महान् देवता है ॥ ३१६-३१६ ॥ क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान् प्रतिसर्वशः ॥। ३२० ॥ ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम् ।.. योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहसुत्थितम् ॥ तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ ३२ ९
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३७२ मनुस्मृति ।
नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्म वर्धते ।
ब्रह्मक्षत्रं च संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ ३२२ ॥
दत्त्वा धनं तु विप्रेभ्पः सर्वदण्डसमुत्थितम् ।
राज्यं समासृज्य कुर्वीत प्रायणं रणे ॥ ३२३ ॥
. क्षत्रिय यदि ब्राह्मण को दुःख दें तो ब्राह्मण ही उनको fear उपाय से अपने वश में रक्खें । क्योंकि ब्राह्मणों से ही क्षत्रिय उत्पन्न हैं । जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय, पत्थर से लोहा पैदा हुआ है । इनको पैदा करनेवाला व्यापक तेज अपने कारण शान्त होजाता है । ब्राह्मण की सहायता विना क्षत्रिय नहीं बढ़ता । और क्षत्रिय की सहायता विना ब्राह्मण की उन्नति नहीं होती इस लिये दोनों मिलकर रहें तभी लोक -परलोक में वृद्धि पाते हैं । राजा दण्ड का सम्पूर्ण धन ब्राह्मणों को देकर और पुत्र को राज्य - समर्पण करके रण में प्राणत्याग करे || ३२०-३२३ ॥
एवं चरन्सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः ।
हितेषु चैव लोकस्य सर्वान् भृत्यान्नियोजयेत्॥३२४ ॥
एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः । इमं कर्मविधिं विद्यात्क्रमशो वैश्यशूद्रयोः ॥ ३२५ ॥.
इसप्रकार राजा सदा श्राचरण करके राजधर्मों का पालन करे और लोकहित के कामों में सव कर्मचारियों को नियुक्त करे । ये सव राजा का सनातन-कर्तव्य कहा गया है अव वैश्य और शूद के . कर्तव्यों को क्रम से सुनो ॥ ३२४--३२५ ॥ वैश्यस्तु कृतसंस्कारः कृत्वा दारपरिग्रहम् । वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात्पशूनां चैव रक्षणे ॥ ३२६ ॥ः
प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।
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नवां अध्याय । ३७३ ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ ३२७ ॥ ',
न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ।
वैश्ये चेच्छति नाऽन्येन रक्षितव्याः कथंचन ॥ ३२८ ॥
मणिमुकाप्रवालानां लोहानां तान्तवस्य च ।
गन्धानां च रसानां च विद्यादर्घबलाबलम् ॥ ३२६ ॥
वीजानामुतिविच्च स्यात्क्षेत्रदोषगुणस्य च ।
मानयोगं च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ॥ ३३० ॥
वैश्य - शूद्रकर्त्तव्य ।. वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार के बाद विवाह करके नित्य व्यापार श्री पशुरक्षा में तत्पर रहे । प्रजापति ने पशुओं की सृष्टि करके रक्षार्थ वैश्यों को सौंपा और ब्राह्मण, क्षत्रिय को प्रजा को सौंपा । इसलिए पशुपालन न करने की इच्छा वैश्य न करे, जबतक वैश्य पालन करे, दूसरे वर्ण को कभी न चाहिए । मणि, मोती, मूंगा, लोहा, सूत की वस्तु, कपूर और मीठा, घी आदि रसपदार्थों का भाव वैश्य सदा विचार में रक्खे । सब बीजों के बोने की विधि, खेतों के गुण-दोष और सब तरह की नाप-तौल को जाना करे ॥ ३२६-३३० ॥
सारासारं च भाण्डानां देशानां च गुणागुणान् ।
लाभालाभं च पण्यानां पशूनां परिवर्धनम् ॥ ३-३१ ॥
भृत्यानां च भृतिं विद्याद्भाषाश्च विविधा नृणाम् ।
द्रव्यार्णा स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥ ३३२ ॥
धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।
दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ॥ ३३३ ॥
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३७४ मनुस्मृति ।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् ।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥
शुचिरुकृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुष्टां जातिमक्षुते ॥ ३३५ ॥
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः । आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥.
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
गले के अच्छे- बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण श्रदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा श्रादि और पशुओं के बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण; अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेचने का ढंग जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों को अन्न देय यह सब " वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्, गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शुद का परम सुखदायी धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक, मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के श्राश्रय में रहता है, वह 1 . कम से,उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में चारों वर्णों की बर्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६॥ नवां अध्याय पूरा हुआ । '
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अथ दशमोऽध्यायः ।
अधीयीत्रयोवर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।
प्रवया ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ १ ॥
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान् यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् ॥ २ ॥
वैशेष्यात्प्रकृतिभैन्य्यान्नियमस्य च धारणात् ।
संस्कारस्य विशेषाच्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ३ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ ४ ॥
दशवां अध्याय । संकीर्ण-जातिभेद | अपने अपने धर्म कर्मों के अनुसार रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वेदों को पढ़ें । इन में ब्राह्मण सब को पढावें और क्ष त्रिय, वैश्य पढ़ें, पढ़ायें नहीं, यह निर्णय है । ब्राह्मण सब वर्णों को उनकी जीविका के उपायों को बतलावे और खुद भी अपने कर्त्तव्यों को जाने । जाति की विशेषता परमात्मा के मुखसे उत्पत्ति नियमों का धारण र जातकर्मादि संस्कारों की विशेषता से ब्राह्मण ६ वर्णों का स्वामी है । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विजाति * * मामण आदि जातिवाचक शब्द ऋग्वेद में भी हैं, जैसा ब्राह्मणस्त्वा शतत उद्वंशमिव येमिरे । पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' इति । यहां पञ्चजन शब्द चारों वर्ण के लिए है, ऐसा निरुक्त में यास्कमुनि ने लिखा है । जातिभेद वैदिक युग काहै, नवनि नहीं है ।
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IIII मनुस्मृति । कहलाते हैं और चौथा शुद्ध एकजाति कहलाता है । पाँचवां वर्ष. कोई नहीं है ॥ १-२ ॥
सर्ववर्णेषु तुल्या पत्नीस्वक्षतयोनिषु ।
श्रानुलोम्येन संभूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ॥ ५ ॥
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।
सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ॥ ६ ॥
अनन्तरासु जातानां विधिरेष सनातनः ।
कान्तरासु जातानां धर्म्यं विद्यादिमं विधिम् ॥७॥
" ब्राह्मणादि वर्णों की अक्षतयोनिस्त्रियों में क्रम से जो पुत्र पैदा हो, उनको उसी जाति का जानना चाहिए । ब्राह्मणादि के अपने से एक श्रेणी नीचे जाति की स्त्री में पैदा हुए पुत्र पिता के समान जाति के गिने जाते हैं क्योंकि वे माता के दोष से निन्दित हैं । • अपने से एक एक श्रेणी नीचे की जाति में उत्पन्न पुत्रों की यह सनातन विधि है और अपने से दो दो जाति नीचे की स्त्रियों में पैदा पुत्रों की विधि इसप्रकार है: -॥ ५-७ ॥
ब्राह्मणाद्वैश्यकन्यायामन्वष्टो नाम जायते ।
निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥ ८ ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां क्रूराचारविहारवान् ।
क्षत्रशूद्रवपुर्जन्तुरुप्रो नाम प्रजायते ॥ ६ ॥
विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु नृपतेर्वर्णयोर्द्वयोः ।
वैश्यस्य वर्णे चैकस्मिन् षडेतेऽपसदाः स्मृताः॥ १० ॥
क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः ।
वैश्यान्मागधवैदेही राजविप्राङ्गासुतौ ॥ ११ ॥
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दश अध्याय । ३७७
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम् ।
वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसंकराः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण से वैश्यकन्या में श्रम्बष्ट जाति का पुत्र होता है और शुकन्या में निषाद * ओर पारसव कहा जाता है । क्षत्रिय से शुद्रकन्या में क्रूर आचारवाला पुत्र उग्रजाति का कहलाता है, क्योंकि उसका शरीर क्षत्रिय और शूद्रा से हुआ है । ब्राह्मण के क्षत्रिय -वैश्य -शह जाति की कन्या से क्षत्रिय के वैश्य-शूद्र- कन्या से और वैश्य के शुद्ध जाति को कम्या से उत्पन्न हुए पुत्र पद - नच कहलाते हैं । क्षत्रिय से ब्राह्मणकन्या में पैदा हुआ पुत्र जाति से सून होता है । वैश्य से ब्राह्मणी में वैदेह जाति का और वैश्य से क्षत्रिया में मागध जाति का होता है । शूद्र से 'वैश्या, क्षत्रिया चोर ब्राह्मणो में क्रम से प्रयोगव, क्षत्ता और चा डाल जाति के पुत्र होते हैं और वे मनुष्यों में अधम - वर्णसङ्कर कहलाते हैं ॥ ८-१२ ॥
एकान्तरे त्वानुलोम्यादम्बष्टोयौ यथा स्मृतौ ।
क्षतृवैदेहको तद्वत्प्रातिलोम्येऽपि जन्मनि ॥ १३ ॥
पुत्रा येऽनन्तरस्त्रीजाः क्रमेणोक्का द्विजन्मनाम् ।
ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते ॥ १४ ॥
ब्राह्मणादुग्रकन्यायामावृतो नाम जायते ।
आभीरोऽस्वष्टकन्यायामायोगव्यां तु धिग्वणः ॥ १५ ॥
से एकउत्पन्नएक पुत्रजातिजैसेके अन्तरसेश्रम्बष्ठ अर्थात्और उग्रब्राह्मणकहे सेहैं वैसेवैश्याप्रतिलोममें अनुलोमकहलातेसे अर्थात् शूद्र से क्षत्रिया में उत्पन्न पुत्र क्षत्ता और वैदेह ' लेख है । यहां * निषाद संकर जाति का बोधक है । निरुक्त में ' निषादः परमः च पर जो वैश्य और शूद्रकन्याओं का ग्रहण है उसको विवाहिता। 'समझना क्योंकि याज्ञवल्क्य का वचन है:- 'विन्नास्वेष विधिः स्मृतः ४८
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३७८ मनुस्मृति| हैं । द्विजों के नीचे जाति की स्त्री में माता के दोष से उत्पन्न पुत्र ' अनन्तर ' कहलाते हैं । ब्राह्मण से उम्र की कन्या में श्रावृत जाति काष्टकन्या में श्राभीर जाति का और प्रयोगवी में धिग्वण जाति का पुत्र कहलाता है ॥ १३-१५ ॥
आयोगवश्च क्षत्ता च चाण्डालश्चाधमो नृणाम् ।
प्रातिलोम्येन जायन्ते शूद्रादपसदास्त्रयः ॥ १६ ॥
वैश्यान्मागधवैदेहौ क्षत्रियात्सूत एव तु ।
प्रतीपमेते जायन्ते परेऽप्यपसदास्त्रयः ॥ १७ ॥
जातो निषादाच्छूद्रायां जात्या भवति पुक्कसः ।
शूद्राज्जातो निषाद्यां तु सवै कुक्कुटकः स्मृतः ॥ १८ ॥
क्षत्रुजीतस्तथोप्रायां श्वपाक इति कीर्त्यते ।
वैदेहकेन स्वस्वष्ट्यासुत्पन्नो वेण उच्यते ॥ १६ ॥
द्विजातयः सवर्णासु जनयत्स्यव्रतांस्तु यान् ।
तान् सावित्री परिभ्रष्टान् त्रात्यानिति विनिर्दिशेत्॥ २० ॥
ब्रात्यात्तु जायते विद्यात्पापात्मा भूर्जकण्टकः ।
आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च ॥ २१ ॥
झल्लो सल्लश्च राजन्याद्रात्यानिच्छिविरेव च ।
नटश्च करणश्चैव खतो द्रविड एव च ॥ २२ ॥
वैश्यात्तु जायते व्रात्यात्सुधन्वाचार्य एव च । कारुषश्च विजन्मा च मैत्रः सात्त्वत एव च ॥ २३॥..
आयोगव, क्षता और चाण्डाल ये शूद्र से प्रतिलोमभाव से पैदा तीन मनुष्यों में श्रधम श्रपल हैं । वैश्य से मागध और वैदेह और क्षत्रिय से सूत, ये तीन भी प्रतिलोमभाव से पैदा होते हैं ।
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दश अध्याय | ३७६ असद हैं । निपाद से शदा में उत्पन्न पुत्र शूद्र से निवादकन्या में कुक्कुट जाति का पुत्र' पुक्कस ' जाति का और क्षत्ता से उनकन्या में ' श्वपाक ' और वैदेह सेहोताअम्बष्ठीहै । इसीप्रकार ' ' स्कारकहलाताजोहैन ।करेंद्विजातितो वे अपनीगायत्रीभ्रष्टसवर्णा' नात्यस्त्री में' उत्पन्नकहलातेपुत्रोंमें कावेणसं ब्राह्मण से पापी-भूर्जकंटक उत्पन्न होते हैं, उन की हैं । म्रात्य धान, पुष्पध और शैखसंज्ञा होती है । वात्य- क्षत्रियश्रावन्त्यसे,उत्पन्नवाट पुत्र भल मल, निच्छिवि, नट, करण, खस और द्रविड़ कहलाते हैं । वात्य -वैश्य से उत्पन्न पुत्र सुधन्वाचार्य, कारुष, विजन्मा, और सात्वत कहलाते हैं ॥ १६-२३ ॥ मैत्र
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च ।
स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसंकराः ॥ २४ ॥
संकीर्णयोनय ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान् प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २५ ॥
तो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः ।
मागधः क्षतजातिश्च तथाऽयोगव एव च ॥ २६ ॥
एते षट् सदृशान्वर्णाञ्जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजायां प्रसूयन्ते प्रवरासु च योनिषु ॥ २७ ॥
. तथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।
श्रानन्तर्यात्स्वयन्यां तु तथा बांधेष्वपि क्रमात् ॥२८॥
ruit an a श्रपस के व्यभिचार से, अपने सगोत्रा के साथ विवाह न करने से और अपने वर्णाश्रम धर्मों को छोड़ने से वर्णसङ्कर उत्पन्न होते हैं । जो सङ्कीर्णयोनि, प्रतिलोम और अनु-लोम के परस्पर सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं उनको विशेषरीति से कहते हैं: -सुत, वैदेह, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता और प्रायोगवये छः पुरुष अपनी माता की जाति में और अपने से ऊंची जाति में जो
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३५० मनुस्मृति । सन्तान पैदा करें वे अपनी जाति की होती हैं । और जैसे ब्राह्मण का तीनों वर्णों में से क्षत्रिय और वैश्यकन्या में और अपनी जाति की कन्या में पैदा पुत्र द्विज कहाजाता है, वैसे क्षत्रिय से ब्राह्मणी, वैश्य से क्षत्रिया और ब्राह्मणीकन्या में उत्पन्न पुत्र उत्तम गिने जाते हैं ॥ २४-२८ ॥
ते चापि बाह्यान्सुवहू॑स्ततोऽप्यधिकदूषितान् ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥ २६ ॥
यथैव शूद्रो ब्राह्मण्यां वाह्यं जन्तुं प्रसूयते ।
तथा वाह्यतरं बाह्यश्चातुर्वर्ये प्रसूयते ॥ ३० ॥
प्रतिकूलं वर्तमाना वाद्यावाह्यतरान् पुनः ।
हीना हीनान् प्रसूयन्ते वर्णान् पञ्चदशैव तु ॥ ३१ ॥
प्रयोगव आदि छः प्रतिलोम पुत्र परस्पर में अपने से अधम जाति के पुत्रों को पैदा करते हैं । जैसे शुद्ध ब्राह्मण की कन्या में वर्णसंकर चाण्डाल पुत्र पैदा करता है वैसे चाण्डाल चारॉवर्स की कन्याओं में अपने से भी नीच जाति के पुत्रों को उत्पन्न करता है । चाण्डाल वग़ैरह अपनी दूसरी पाँच प्रतिलोम जातियों में अति अधम पुत्रों को उत्पन्न करते हैं और प्रतिलोम जाति के वर्ण- संकर अपने से उत्तम जाति की कन्या में हीन जाति के पन्द्रह पुत्रों को उत्पन्न करता है । अर्थात् चारोंव की स्त्रियों में तीन धनों के तीन तीन पुत्र बारह हुए और उनके पिता तीन अधम मिलकर १५ हुए ॥ २६-३१ ॥
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।
सैरधं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ॥ ३२ ॥
मैत्रेयकं तु वैदेहो माधूकं संप्रसूयते ।
नृन्प्रशंसत्यजलं यो घटाताडोऽरुणोदये ॥ ३३ ॥