श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 521–530

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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दशवां अध्याय ।.३८१

निषादो मार्गवं सूतें दासं नौकर्मजीविनम् ।

कैवर्त्तकमिति यं प्राहुर्यावर्त्तनिवासिनः ॥ ३४ ॥

मृतवस्त्रभृत्सु नारीषु गर्हितान्नाशनासु च ।. भवन्त्यायोगवत्रेते जातिहीनाः पृथक् त्रयः ॥ ३५ ॥

कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते ।

वैदेहिकादन्ध्रमेदौ बहिर्ग्रामप्रतिश्रयौ ॥ ३६ ॥

चण्डालात्पाण्डुसोपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।

प्राहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥ ३७ ॥

चण्डालेन तु सोपाको मूलव्यसनवृत्तिमान् ।

पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥ ३८ ॥

निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् ।

श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ ३६ ॥

दस्यु से श्रायोगवी में ' सैरिन्ध्र ' जाति का पुत्र होता है । वह दाल न होकर भी केश सँभालना -हाथ-पैर दाबना वगैरह कामस्त्री करे और जाल से मृग आदि को पकड़े । वैदेह से प्रयोगवी ' मैत्रेय ' जाति का पुत्र होता है । वह मधुरभाषी, सूर्योदयकी- सप्र... मय में घंटा आदि का शब्द करके राजा आदि भद्र पुरुषों का पुत्र शंसा का काम करे । निषाद, आयोगवी में भार्गवसे जातिजीविका करता पैदा करता है वह दास भी कहाताउसकोहै, नौका,' कैवर्त्त ' कहते, हैप्रकारऔर मृत विदेशमनुष्य निवासीवस्त्र पहननेवाली सेकरस्वभावश्रधम जातीयजूंठनेसंरिन्ध्र। खानेइसी वाली आयोग में अपने पिता के भेद पैदा होते हैं । निषाद से मैत्रेय और मार्गवजाति के तीन पुत्र होता है, वह मोची का वैदेहीकन्या में कारावर जाति का पुत्रऔर मेदजाति के पुत्र होते काम करे । वैदेहिक से वैदेही में अंध

पृष्ठ 522

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३८२ मनुस्मृति । हैं वे गांव से बाहर रहें । चाण्डाल से वैदेही में पाण्डुसेोपाक पैदा होता है, वह वृक्षों की छाल से पंखा, सुप, आदि से जीविका करे । निषाद से वैदेही में श्रहिण्डक, चाण्डाल से पुकली में, सो- पाक और चांडाल से निषादस्त्री में अन्त्यावसायी जाति के पुत्र होते हैं । ये जल्लादी का काम करें, मरघटमें रहें । ये.सब महादूषित होते हैं ॥ ३२-३६ ॥

संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः ।

प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः॥४०॥

सजातिजानन्तरजाः षट् सुता द्विजधर्मिणः ।

शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाः स्मृताः ४१ ॥

तपो वीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे । उत्कर्ष चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥ ४२ ॥ '

शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।

वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ ४३ ॥

पौण्ड्रकाश्चोडूद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः ।

पारदापह्नवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ४४ ॥

मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो वहिः ।

म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ४५ ॥

ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः ।

ते निन्दितैर्वर्त्तयेयुर्द्विजानामेव कर्मभिः ॥ ४६ ॥

सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्टानां चिकित्सनम् ।

वैदेहकानां स्वीकार्य मागधानां वणिक्पथः ॥ ४७ ॥

. इस प्रकार वर्णसंकरों की जातियां उनके माता-पिता के साथ

पृष्ठ 523

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दशवां अध्याय । ३८३ कही गई हैं । इन में छिपी या प्रकट जातियों को उनके कर्मों से जानना चाहिए । अपनी जाति और पिछली जाति की स्त्री में द्विज के पैदाकिए छः पुत्र उपनयन संस्कार के योग्य होते हैं । और प्रति-लोभ से उत्पन्न हुए सब शूद्र के समान माने जाते हैं । तप के प्रभाव से ( विश्वामित्र ) और चीज के प्रभाव से ( ऋष्यशृङ्ग ) सब युगों मैं मनुष्यजन्म की उचाई और निचाई को प्राप्त होते हैं । पुंड्र, उड्र, द्रविड, कम्बोज, यवन, शक, पारद, अपह्नव, चीन, किरात, दरद और रूसदेश के क्षत्रियगण धीरे धीरे धर्मक्रियाओं को छोड़ देने सेऔर धर्मोपदेशक ब्राह्मणों का संग न करने से वृषल-म्लेच्छ- पने को प्राप्त होगये । इस जगत् में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-जाति के पुरुष जो क्रिया के लोप से पतित जाति के होगए हों, वे श्रार्यभाषा बोलें या म्लेच्छभापा, पर उन को ' दस्यु ' चोर सम-झना चाहिए । द्विजों में जिनको अपसद वा वर्णसंकर कहा है वे द्विजों के ही दूषित कामों से जीविका करें । सूतों का काम, घोड़े का सारथि होना, श्रम्बष्ठों का चिकित्सा, वैदहों का अन्तःपुर का काम और मागधों का व्यापार कर्म है ॥ ४०-४७ ॥

मत्स्यात निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च ।

मेदान्ब्रचुञ्बुमद्गूनामारण्यपशुहिंसनम् ॥ ४८ ॥

क्षत्रुग्रपुकसानां तु विलौको बधबन्धनम् ।

धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ॥ ४६ ॥

चैत्यमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च । निवास नहीं करते वे देश 'फोकट' * ' इसीलिए जिन देशों में ब्राह्मणादि जैसाश्रार्यजन किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः ।... यदि निंद्य शब्दों से बंद में लिखे हैं है-। कोकटी नाम देशोऽनार्यनिवासः । यास्क मुनि ने निरुक्त में व्याख्या की शब्द हमारी श्रार्यभाषा से बहुत मिलते हैं । शक, यवन यादि म्लेच्छों के भाषाकुटुम्ब एक ही था । देश और कर्म त्याग से इससे अनुमान होता है सबका मूल ना होगये हैं ।

पृष्ठ 524

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मनुस्मृति ।३८४

वसेयुरेते विज्ञाना वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥ ५० ॥

चण्डालश्वपचानां तु वहिर्ग्रामात्प्रतिश्रयः ।

अपपात्राश्च कर्त्तव्या धनमेवां श्वगर्दभम् ॥ ५१ ॥

वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम् ।

काय समलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥ ५२ ॥

न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् । -- व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ॥ ५३ ॥

अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने ।

रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥ ५४ ॥

दिवाचरेयुः कार्यार्थ चिह्निता राजशासनैः । ' अबान्धवं चैव शवं निर्हरेयुरिति स्थितिः ॥ ५.५ ॥ - निपादों का काम मछली मारना,आयोगव का लकड़ी काटना, . मेद, यंत्र, चंचु और मंद्गुका बनपशुओंको मारना, क्षत्ता, उग्र और पुक्कस का विलों में रहनेवाले साँप, नौला को मारना वा पकड़ना । farai का मोची का काम और वेणों का वाजा बनाने का काम है । क्षत्ता आदि जातिवाले गाँव के पास प्रसिद्ध वृक्ष के नीचे, श्मशान में, पर्वत पर, बगीचे में रहकर अपनी अपनी जीविका को करें । चाण्डाल और श्वपच गाँव के बाहर रहें, इनके पात्रों को काम में न लाना । कुत्ता, गधा श्रादि इनके धन हैं । ये मुरदा के कफ़न धारण करें, फूटे पात्रों में भोजन करें, लोह के गहने पहनें और रोज़ गावों में घूमा करें. 1 पुरुष को धर्माचरण के समय इन चाण्डालों का दर्शन भी न करना चाहिए, इनका व्यवहार और विवाह समानजातिवालों में होना चाहिए । इनका भोजन परा- 'वीन होवे, फूटे पात्रों में खाने को अन्न देवे और ये लोग रात में गाँव या नगर में न फिरें । राजा की आज्ञा से चपड़ास पाए हुए

पृष्ठ 525

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दश अध्याय । ३८५

काम के लिए दिन में धूमै और वे वारिश मुरदों को ले जावें ।

यह मर्यादा है ॥ ४८-५५ ॥

वर्ध्याश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया ।

वध्यवार्सासि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥ ५६ ॥

वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम् ।

आर्यरूपमिवानार्यं कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥ ५७ ॥

अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता ।

पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥ ५८ ॥

पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।

न कथंचन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥ ५६ ॥

कुले मुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसंकरः ।

संश्रयत्वेव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥ ६० ॥

यत्र त्वेते परिध्वंसाज्जायन्ते वर्णदूषकाः ।

राष्ट्रिकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ६१ ॥

ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽनुपस्कृतः ।

स्त्रीवालाभ्युपपत्तौ च वाह्यानां सिद्धिकारणम् ॥ ६२ ॥

जिनको राजाशा से फाँसी का दण्ड हुआ हो उनको शास्त्रानु सार मारे और उनके वस्त्र, शय्या, आभूषणों को लेवे । जातिभ्रष्ट, वर्णसङ्कर, अपरिचित और श्रार्य मालूम होनेवाला ऐसे नायकोअना-उनके कर्मों से पहचाने । असभ्यता, कठोरपन, करता और चार से लोक में पुरुष की वर्णसङ्करता प्रकट होती है । पातावर्णसङ्करहै । अपने पिताका या माता का अथवा दोनों का स्वभावसकता । वर्ण-वह अपने स्वभाव-शील को किसी भांति छिपाउत्पादकनहीं के स्वभाव सङ्कर उत्तम कुल में पैदा होने पर भी अपने T

पृष्ठ 526

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३८६ मनुस्मृति । को कुछ न कुछ पाताही है । जिस देश में ये वदूषक सन्तान होते. हैं वह देश प्रजा के साथ जल्द ही बिगड़ जाता है । ब्राह्मण, गौ, स्त्री र बालरक्षा के लिए निष्कामभाव से प्राण छोड़ने से प्रति- लोमों को उत्तम जाति में जन्म मिलता है ॥ ५६-६२ ॥

प्रहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।

एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वण्येऽब्रवीन्मनुः ॥ ६३ ॥

यारों वर्णों के धर्म-कर्म-जीविका आदि । अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, पवित्रता और इन्द्रिय -निग्रह 'यह चारों वर्णों का संक्षिप्त-धर्म मनुजी ने कहा है ॥ ६३ ॥

शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातः श्रेयसा चेत्प्रजायते ।

अश्रेयान् श्रेयसीं जातिं गच्छत्यासप्तमाद्युगात् ॥ ६४ ॥

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ६५ ॥

अनार्यायां समुत्पन्नो ब्राह्मणान्तु यदृच्छया ।

- ब्राह्मण्यामप्यनार्याञ्च श्रेयस्त्वं वेति चेद्भवेत् ॥ ६६ ॥

जातो नार्यामनार्यायामार्यादार्यो भवेद्गुणैः ।

.जातोऽप्यनार्यादार्यायामनार्य इति निश्चयः ॥ ६७ ॥

तावुभावप्यसंस्कार्याविति धर्मो व्यवस्थितः ।

वैगुण्याज्जन्मनः पूर्व उत्तरः प्रतिलोमतः ॥ ६८ ॥

ब्राह्मण से शूद्रा में कन्या हो, वह कन्या ब्राह्मण को विवाहित हो, उसके भी कन्या हो और वह भी ब्राह्मण को दी जाय, यो सा: - तव पुस्त में जो पुरुष उत्पन्न होगा, उसका पूर्वज पारशव होने पर भी वह पुरुष ब्राह्मण माना जाता है । शुद्र जैसे ब्राह्मणता को पाता

पृष्ठ 527

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दश अध्याय । ३८७ है वैसेही प्राण शूद्रता को पाता है । ऐसेही उत्पन्न पुत्र छठी पीढ़ी में शूद्र होता है धौर वैश्यक्षत्रियसे शूद्रासे शुद्रा में में उ- न पांचवीं पीढ़ी में शुद्ध होता है । ब्राह्मण से से ग्राह्मणी में दैवेच्छा से पुत्र पैदा हो, उनमें श्रेष्ठताशूद्रा में और शूद्र ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र यज्ञादि कर्म करताहो इसतो प्रकार'श्रार्यहै-' कहलाता है । और शुद्र से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ, ' अनार्य ' कह - लाताहै । पहला नीच जाति में होने से और दूसरा प्रतिलोम होने

से दोनों संस्कार के अयोग्य हैं । यह धर्म की मर्यादा है ॥ ६४-६८॥

सुवीजं चव सुक्षेत्रे जातं संपद्यते यथा ।

तथाऽऽजातश्रार्यायां सर्वं संस्कारमर्हति ॥ ६६ ॥

arth प्रशंसन्ति क्षेत्रमन्ये मनीषिणः ।

क्षेत्रे तथैवान्ये तत्रेयं तु व्यवस्थितिः ॥ ७० ॥

क्षेत्रे वीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति ।

वीजकमपि क्षेत्रं केवलं स्थण्डिलं भवेत् ॥ ७१ ॥

अच्छा बीज अच्छे खेतमें वोनेसे जैसे अच्छा होताहै, वैसे श्रार्य सेर्या में पैदाहुआ पुत्र सब संस्कार के योग्य होताहै । कोई वि द्वान चीज की प्रशंसा करते हैं, कोई क्षेत्र की प्रशंसा करते हैं, कोई afa और क्षेत्र दोनों की प्रशंसा करते हैं, उसमें व्यवस्था यो है- ऊसर में बोया बीज बीचही में नर होजाताहै और विना बीज के खेत कोरा-सपाट पड़ा रहताहै ॥ ६६-७१ ॥

यस्माद्द्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन् ।

-पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्द्रबीजं प्रशस्यते ॥ ७२ ॥

अनार्यमार्यकर्माणमा चानार्यकर्मिणम् ।

'संप्रधार्याता न समौ नासमाविति ॥ ७३ ॥

पृष्ठ 528

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३८८ मनुस्मृति ।

ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ये स्वकर्मण्यवस्थिताः ।

ते सम्यगुपजीवेयुः षट् कर्माणि यथाक्रमम् ॥ ७४ ॥

अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।

दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मनः ॥ ७५ ॥

षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका ।

याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥ ७६ ॥

यो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात्क्षत्रियं प्रति ।

अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ॥ ७७ ॥

वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः ।

तौ प्रति हि तान् धर्मान् मनुराह प्रजापतिः ॥ ७८ ॥

शस्त्रास्त्रभृत्वं क्षत्रस्य वणिक्पशुकृषिर्विशः ।

श्राजीवनार्थ धर्मस्तु दानमध्ययनं यजिः ॥ ७६ ॥

क्योंकि वीज केही प्रभाव से हरिणी आदि में ऋप्यन्टङ्ग उत्पन्न हुए और माननीय - पूज्य हुए इसलिए बीज उत्तम माना जाता है । शुद्र द्विज का कर्म और द्विज शुद्र का कर्म करता हो तो दोनों की • तुलना करके ब्रह्माने कहाहै-शुद्ध द्विजकर्म में अनधिकारी होनेसे और ब्राह्मण निषिद्ध श्राचरण करने से समान नहीं है । क्योंकि गुण- स्वभाव के बिना केवल कर्म से श्रनार्य, आर्य नहीं होसकते । जो ब्रह्मयोनिज ब्राह्मण हैं, वे अच्छे प्रकार इन छः कर्मों का अनुष्ठान करें पढ़ना, पढ़ाना, यक्ष करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान लेना । ब्राह्मण के ये छः कर्म हैं । इनमें यज्ञ कराना, पढ़ाना और शुद्धदान लेना ये तीन कर्म जीविका हैं । ब्राह्मण के धर्मो से क्षत्रिय के तीन धर्म छूटे हैं पढ़ाना, यक्ष कराना और दान लेना । श्रर्थात् इन कामों को क्षत्रिय न करें । और वैश्य भी न करें, यही शास्त्रमर्यादा है । क्योंकि प्रजापति ने क्षत्रिय, वैश्य के लिए ये धर्म नहीं कहे हैं ।

पृष्ठ 529

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दश अध्याय | ३८६ शस्त्र, अस्त्र धारण करना क्षत्रिय की खेती वैश्य की जीविका के लिए हैं औरऔर व्यापार, पशुपालन, यज्ञकरना, इन दोनों का धर्म है ॥ ७२-७६ ॥ दान देना, वेद पढ़ना, वेदाभ्यास ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम् वार्ता कर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्त्रकर्मसु ॥ ८०। ॥

अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा ।

क्षत्रियधर्मेण सह्यस्य प्रत्यनन्तरः ॥ ८१ ॥

उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।

गोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ॥ ८२ ॥

वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा ।

हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ८३ ॥

कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा वृत्तिः सद्विगर्हिता ।

भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठमयोमुखम्॥ ८४ ॥

इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम् ।

विट्पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम् ॥ ८५ ॥

सर्वान्रसानपोहेत कृतानं च तिलैः सह ।

मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः ॥ ८६ ॥

सर्व च तान्तवं रक्रं शाक्षौमाविकानि च ।

पिचेत्ररक्तानि फलमूचे तथैौषधीः ॥ ८७ ॥

ब्राह्मण का वेदाभ्यास करना, क्षत्रिय का रक्षा करना औरवैश्य का व्यापार करना ये अपने अपने कर्मों में विशेष कर्म हैं । ब्राह्मण यदि वेद पढ़ाकर अपनी जीविका न करसके तो क्षत्रिय जीविका'नके कर्म से जीविका करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय दोनों के कर्मों से

पृष्ठ 530

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३६० मनुस्मृति । करसके तो खेती, गोरक्षा आदि वैश्यजीविका से निर्वाह करे । ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य जीविका से निर्वाह करता हुआ भी खेती को कभी न करे । कोई खेती को अच्छी मानते हैं, पर यह सत्पुरुषों में निन्दित है । क्योंकि इसमें हलसे जीवहिंसा, श्रवर्षा-सुखा आदि का डर है, पराधीन कर्म है । ब्राह्मण और क्षत्रिय की जाने कर्मों से न चले तो निन्दित कर्मों को छोड़कर, वे वैश्य वृत्ति, व्यापार का आश्रय लेवें । ब्राह्मण सब भांति के रस, सव अन्न, तिल, पत्थर, निमक, पशुत्रों को न बैंचे । सब प्रकार के लाल वस्त्र, सन-अलसी -ऊन के विनारंगे वस्त्र, फल, कंद, औषध को न वेंचे ॥ ८०-८७ ॥

अपःशस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः ।

क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ ८८ ॥

प्रारयश्च पशून् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च ।

मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ॥८६॥

कार्ममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः ।

विक्रीणीत तिलाञ्कुद्धान् धर्मार्थमचिरस्थितान् ॥६०॥

भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः ।

कृमिभूतःश्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ६१ ॥

सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च ।

त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ ६२ ॥

इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः ।

ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ॥ ६३ ॥

जल, हथियार, विष, मांस, सोमरस, सब तरहकी सुगन्धि, दूध, शहद, दही, घी, तेल, मद्य, गुड़, कुश, जंगली पशु, दाढ़वाले पशु, पक्षी, भांग, गांजा, नील, लाख और एक खुरके पशु, इन सबका