श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 171–180
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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अ ० ३४ ] शतरुद्रसंहिता १५ ९
शैलो ददर्श तं तत्र विष्णुरूपधरं द्रुतम् ।
ततो ब्रह्मस्वरूपं च सूर्यरूपं ततः क्षणात् ॥
ततो ददर्श तं तात रुद्ररूपं महाद्भुतम् ।
पार्वतीसहितं रम्यं विहसन्तं सुतेजसम् ॥
एवं सुबहुरूपाणि तस्य तत्र ददर्श सः ।
सुविस्मितो बभूवाशु परमानन्दसंप्लुतः ॥
अथासौ भिक्षुवर्यो हि तस्मात्तस्याश्च सूतिकृत् ।
भिक्षां ययाचे दुर्गां तां नान्यज्जग्राह किञ्चन ॥
ततश्चान्तर्दधे भिक्षुस्वरूपः परमेश्वरः ।
स्वालयं स जगामाशु दुर्गावाक्यप्रणोदितः ॥
तदा बभूव सुज्ञानं मेनाशैलेशयोरपि ।
आवां शिवो वञ्चयित्वा गतवान्स्वालयं विभुः ॥
अस्मै देया स्वकन्येयं पार्वती सुतपस्विनी ।
एवं विचार्य च तयोः शिवे भक्तिरभूत्परा ॥
अतो रुद्रो महोतीश्च कृत्वा भक्तमुदावहम् ।
विवाहं कृतवान्प्रीत्या पार्वत्या स विधानतः ॥
इति प्रोक्तस्तु ते तात सुनर्तकनटाह्वयः ।
शिवावतारो हि मया शिवावाक्यप्रपूरकः ॥
इदमाख्यानमनघं परमं व्याहृतं मया ।
य एतच्छृणुयात्प्रीत्या स सुखी गतिमाप्नुयात् ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां हिमालयने शीघ्रतासे उसे विष्णुरूपधारी, फिर ३० ब्रह्मारूप और थोड़ी देरमें सूर्यरूप धारण किये हुए देखा । हे तात! इसके थोड़ी ही देर बाद उसको अत्यन्त अद्भुत एवं परम तेजस्वी रुद्ररूप धारणकर पार्वतीके साथ मनोहर ३१ हास करते हुए देखा ॥ ३०-३१ ॥ इस प्रकार उन्होंने वहाँ उसके अनेक सुन्दर ३२ रूपोंको देखा और वे आनन्दसे विभोर हो विस्मित हो उठे ॥३२ ॥
इसके बाद सुन्दर लीला करनेवाले उस भिक्षुने ३३ शैल एवं मेनासे केवल पार्वतीको ही भिक्षारूपमें माँगा और अन्य कुछ भी ग्रहण नहीं किया ॥३३ ॥
पार्वतीके वाक्योंसे प्रेरित होकर भिक्षुरूप धारण ३४ करनेवाले परमेश्वर इसके बाद अन्तर्धान हो गये और शीघ्र ही अपने स्थानको चले गये ॥ ३४ ॥
तब मेना एवं हिमालयको उत्तम ज्ञान हुआ कि ३५ सर्वव्यापी शिव हम दोनोंको ठगकर अपने स्थानको चले गये ॥३५ ॥
हमें अपनी इस तपस्विनी कन्या पार्वतीको उन्हें ३६ प्रदान कर देना चाहिये था - ऐसा विचार करके शिवजीमें उन दोनोंकी उत्कट भक्ति हो गयी ॥३६ ॥
इस प्रकारकी महालीलाएँ करके शिवजीने पार्वतीसे ३७ भक्तोंको आनन्द देनेवाला विवाह प्रेमपूर्वक विधि-विधानके साथ किया ॥ ३७ ॥
हे तात! इस प्रकार मैंने पार्वतीके अनुरोधको ३८ पूर्ण करनेवाला शिवका सुनर्तक नट नामक अवतार आपसे कहा - ॥ ३८ ॥
[ हे सनत्कुमार! ] मेरे द्वारा कहा गया यह आख्यान अत्यन्त श्रेष्ठ तथा पवित्र है, जो भी इसे प्रेमपूर्वक सुनता है, वह सुखी होकर सद्गति प्राप्त ३ ९ | कर लेता है ॥ ३ ९ ॥ शतरुद्रसंहितायां सुनर्तकनटाह्वशिवावतारवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें सुनर्तकनटाह्वशिवावतारवर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
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१६० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः परमात्मा शिवके नन्दीश्वर उवाच
सनत्कुमार सर्वज्ञ शिवस्य परमात्मनः ।
अवतारं शृणु विभोः साधुवेषद्विजाह्वयम् ॥ १
मेनाहिमालयोर्भक्तिं शिवे ज्ञात्वा महोत्तमाम् ।
चिन्तामापुः सुराः सर्वे मन्त्रयामासुरादरात् ॥ २
एकान्तभक्त्या शैलश्चेत्कन्यां दास्यति शम्भवे ।
ध्रुवं निर्वाणतां सद्यः सम्प्राप्स्यति शिवस्य वै ॥ ३
अनन्तरत्नाधारोऽसौ चेत्प्रयास्यति मोक्षताम् ।
रत्नगर्भाभिधा भूमिर्मिथ्यैव भविता ध्रुवम् ॥ ४
स्थावरत्वं परित्यज्य दिव्यरूपं विधाय सः ।
कन्यां शूलभृते दत्त्वा शिवलोकं गमिष्यति ॥ ५
महादेवस्य सारूप्यं प्राप्य शम्भोरनुग्रहात् ।
तत्र भुक्त्वा महाभोगांस्ततो मोक्षमवाप्स्यति ॥ ६
इत्यालोच्य सुराः सर्वे जग्मुर्गुरुगृहं मुने ।
चक्रुर्निवेदनं गत्वा गुरवे स्वार्थसाधकाः ॥ ७
देवा ऊचुः
गुरो हिमालयगृहं गच्छास्मत्कार्यसिद्धये ।
कृत्वा निन्दां महेशस्य गिरिभक्तिं निवारय ॥ ८
स्वश्रद्धया सुतां दत्त्वा शिवाय स गिरिर्गुरो ।
लभेत मुक्तिमत्रैव धरण्यां स हि तिष्ठतु ॥ ९
इति देववचः श्रुत्वा प्रोवाच च विचार्य तान् ॥ १०
गुरुरुवाच
कश्चिन्मध्ये च युष्माकं गच्छेच्छैलान्तिकं सुराः ।
सम्पादयेत्स्वाभिमतमहं तत्कर्तुमक्षमः ॥ ११
अथवा गच्छत सुरा ब्रह्मलोकं सवासवाः ।
तस्मै वृत्तं कथय स्वं स वः कार्यं करिष्यति ॥ १२
द्विजावतारका वर्णन नन्दीश्वर बोले - हे सर्वज्ञ! सनत्कुमार! | साधुवेष धारण करनेवाले ब्राह्मणके रूपमें परमात्मा अब । शिवका जिस प्रकार अवतार हुआ, उसे आप सुनें ॥ १ ॥
मेना और हिमालयकी शिवमें उत्कट भक्ति | देख देवताओंको बड़ी चिन्ता हुई और उन लोगोंने आदरपूर्वक परस्पर मन्त्रणा की ॥२ ॥
यदि शिवमें अनन्य भक्ति रखकर हिमालय उन्हें कन्या देंगे, तो निश्चित रूपसे ये शिवका निर्वाणपद । प्राप्त कर लेंगे । अनन्त रत्नोंके आधारभूत ये हिमालय यदि मुक्त हो जायँगे तो निश्चय ही पृथ्वीका रत्नगर्भा — यह नाम व्यर्थ हो जायगा ॥ ३-४ ॥ शिवजीको अपनी कन्याके दानके पुण्यसे वे अपने स्थावररूपको त्यागकर दिव्य शरीर धारण करके शिवलोकको प्राप्त करेंगे, फिर शिवजीके अनुग्रहसे शिवसारूप्य प्राप्त करके वहाँ सभी प्रकारके भोगोंको भोगकर बादमें मोक्ष प्राप्त कर लेंगे ॥ ५-६ ॥ हे मुने! इस प्रकार विचारकर अपने स्वार्थसाधनमें कुशल उन सभी देवताओंने गुरु बृहस्पतिके घरके लिये प्रस्थान किया । वहाँ जाकर उन लो लोगोंने गुरुसे निवेदन किया ॥७ ॥
देवता बोले- हे गुरो! आप हमलोगोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हिमालयके घर जाइये और शिवजीकी निन्दाकर हिमालयके चित्तसे शिवके प्रति आस्था दूर कीजिये । हे गुरो! वे हिमालय श्रद्धासे अपनी कन्या शिवको देकर मुक्ति प्राप्त कर लेंगे [ किंतु हमलोग ऐसा नहीं चाहते, हमारी इच्छा है कि ] वे यहीं पृथ्वीपर रहें ॥ ८ - ९ ॥ देवताओंका यह वचन सुनकर बृहस्पतिने विचार करके उनसे कहा —॥१० ॥
बृहस्पतिजी बोले — हे देवताओ! आपलोगोंके मध्यसे ही कोई एक पर्वतराजके पास जाय और अपना | अभीष्ट सिद्ध करे, मैं इसे करनेमें [ सर्वथा ] असमर्थ हूँ | अथवा हे देवताओ! आपलोग इन्द्रको साथ लेकर | ब्रह्मलोकको जाइये और उन ब्रह्मासे अपना सारा वृत्तान्त कहिये, वे आपलोगोंका कार्य करेंगे ॥ ११-१२ ॥
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अ ० ३५ ] शतरुद्रसंहिता १६१ नन्दीश्वर उवाच
तच्छ्रुत्वा ते समालोच्य जग्मुर्विधिसभां सुराः ।
सर्वं निवेदयामासुस्तद्वृत्तं पुरतो विधेः ॥ १३
अवोचत्तान्विधिः श्रुत्वा तद्वचः सुविचिन्त्य वै ।
नाहं करिष्ये तन्निन्दां दुःखदां कहरां सदा ॥ १४
सुरा गच्छत कैलासं संतोषयत शङ्करम् ।
प्रस्थापयत तं देवं हिमालयगृहं प्रति ॥ १५
स गच्छेदथ शैलेशमात्मनिन्दां करोतु वै ।
परनिन्दा विनाशाय स्वनिन्दा यशसे मता ॥ १६
नन्दीश्वर उवाच
ततस्ते प्रययुः शीघ्रं कैलासं निखिलाः सुराः ।
सुप्रणम्य शिवं भक्त्या तद्वृत्तं निखिला जगुः ॥ १७
तच्छ्रुत्वा देववचनं स्वीचकार महेश्वरः ।
देवान्सुयापयामास तानाश्वास्य विहस्य सः ॥ १८
ततः स भगवाञ्छम्भुर्महेशो भक्तवत्सलः ।
गन्तुमैच्छच्छैलमूलं मायेशो न विकारवान् ॥ १ ९
दण्डी छत्री दिव्यवासा बिभ्रत्तिलकमुज्ज्वलम् ।
करे स्फटिकमालां च शालग्रामं गले दधत् ॥ २०
जपन्नाम हरेर्भक्त्या साधुवेशधरो द्विजः ।
हिमाचलं जगामाशु बन्धुवर्गैः समन्वितम् ॥ २१
तं च दृष्ट्वा समुत्तस्थौ सगणोऽपि हिमालयः ।
ननाम दण्डवद्भूमौ साष्टाङ्गं विधिपूर्वकम् ॥ २२
द्विजं को भवानिति । नन्दीश्वर बोले - [ हे सनत्कुमार! ] यह सुनकर विचार करके वे देवता ब्रह्माकी सभामें गये और उन लोगोंने ब्रह्माके आगे सारा वृत्तान्त निवेदन किया ॥ १३ ॥
उनका वचन सुनकर ब्रह्मदेवने भलीभाँति विचारकर उनसे कहा- मैं तो दुःख देनेवाली तथा सर्वदा सुखापहारिणी शिवनिन्दा नहीं कर सकता । अतः हे देवताओ! आपलोग कैलासको जाइये, शिवको सन्तुष्ट कीजिये और उन्हीं प्रभुको हिमालयके घर भेजिये । वे [ शिव ] ही पर्वतराज हिमालयके पास जायँ और अपनी निन्दा करें; क्योंकि दूसरेकी निन्दा विनाशके लिये और अपनी निन्दा यशके लिये मानी गयी है ॥ १४–१६ ॥ नन्दीश्वर बोले – उसके बाद वे सभी देवगण कैलासपर्वतपर गये और शिवजीको भक्तिपूर्वक प्रणामकर उन लोगोंने सारा वृत्तान्त निवेदन किया ॥ १७ ॥
देवताओंका वचन सुनकर शिवजीने हँसकर उसे स्वीकार कर लिया तथा उन देवताओंको आश्वस्तकर विदा किया ॥ १८ ॥
उसके बाद भक्तवत्सल मायापति तथा अविकारी महेश्वर भगवान् शम्भुने हिमालयके समीप जानेका विचार किया ॥ १ ९ ॥ दण्ड, छत्र, दिव्य वस्त्र तथा उज्ज्वल तिलकसे विभूषित हो, कण्ठमें शालग्रामशिला तथा हाथमें स्फटिकमाला धारणकर साधुवेषधारी ब्राह्मणके वेषमें भक्तिभावसे वे श्रीविष्णुके नामका जप करते हुए बन्धु - बान्धवोंसे युक्त हिमालयके यहाँ शीघ्र गये ॥ २०-२१ ॥ उन्हें देखते ही हिमालय सपरिवार उठ खड़े हुए । उन्होंने विधिपूर्वक भूमिमें साष्टांग दण्डवत्कर उन्हें प्रणाम किया ॥ २२ ॥
उसके अनन्तर शैलराजने उन ब्राह्मणसे पूछा कि ततः पप्रच्छ शैलेशस्तं महादरात् ॥ २३ आप कौन हैं? तब उन योगी विप्रेन्द्रने बड़े आदरके उवाच शीघ्रं विप्रेन्द्रः स योग्यद्रिं साथ शीघ्र हिमालयसे कहा- ॥ २३ ॥
साधुद्विज बोले — हे शैलराज! मेरा नाम साधु साधुद्विज उवाच द्विज है । मैं मोक्षकी कामनासे युक्त परोपकारी वैष्णव शैलाहं वैष्णवः परमार्थदृक् । हूँ और अपने गुरुके प्रसादसे सर्वज्ञ तथा सर्वत्र गमन
साधुद्विजाह्वः सर्वज्ञः सर्वगामी गुरोर्बलात् ॥ २४ । करनेवाला हूँ ॥ २४ ॥
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१६२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ मया ज्ञातं स्वविज्ञानात्स्वस्थाने शैलसत्तम । हे शैलसत्तम! मैंने विज्ञानके बलसे अपने तच्छृणु प्रीतितो वच्मि हित्वा दम्भं तवान्तिकम् ॥ २५ स्थानपर ही जो ज्ञात किया है, उसे प्रीतिपूर्वक आपसे शङ्कराय सुतां दातुं त्वमिच्छसि निजोद्भवाम् इमां पद्मासमां रम्यामज्ञातकुलशीलिने
इयं मतिस्ते शैलेन्द्र न युक्ता मङ्गलप्रदा ।
निबोध ज्ञानिनां श्रेष्ठ नारायणकुलोद्भव ॥
पश्य शैलाधिपत्वं च न तस्यैकोऽस्ति बान्धवः ।
बान्धवान्स्वान्प्रयत्नेन पृच्छ मेनां च स्वप्रियाम् ॥
सर्वान्संपृच्छ यत्नेन मेनादीन्पार्वतीं विना ।
रोगिणे नौषधं शैल कुपथ्यं रोचते सदा ॥
न ते पात्रानुरूपश्च पार्वतीदानकर्मणि ।
महाजनः स्मेरमुखः श्रुतिमात्राद्भविष्यति ॥
निराश्रयः सदासङ्गो विरूपो निर्गुणोऽव्ययः ।
श्मशानवासी विकटो व्यालग्राही दिगम्बरः ॥
विभूतिभूषणो व्यालवरावेष्टितमस्तकः । सर्वाश्रमपरिभ्रष्टस्त्वविज्ञातगतिः सदा ॥ ब्रह्मोवाच इत्याद्युक्त्वा वचस्तथ्यं शिवनिन्दापरं स हि । जगाम स्वालयं शीघ्रं नानालीलाकरः कह रहा हूँ, आप पाखण्ड त्यागकर उसे सुनें ॥ २५ ॥
। आप इस लक्ष्मीके समान परम सुन्दरी अपनी ॥ २६ कन्याको अज्ञात कुल तथा शीलवाले शंकरको प्रदान करना चाहते हैं ॥ २६ ॥
हे शैलेन्द्र! आपकी यह बुद्धि कल्याणकारिणी २७ नहीं है । ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ! हे नारायणकुलोद्भव! इसपर विचार कीजिये ॥ २७ ॥
हे शैलराज! आप ही विचार कीजिये, उनका २८ कोई एक भी बन्धु - बान्धव नहीं है, आप इस विषयमें अपने बान्धवों तथा अपनी पत्नी मेनासे पूछिये । आप पार्वतीको छोड़कर यत्नपूर्वक मेना आदि २ ९ सबसे पूछिये; क्योंकि हे शैल! रोगीको औषधि अच्छी नहीं लगती, उसे तो सदैव कुपथ्य ही अच्छा लगता है॥२८-२९ ॥ मेरे विचारसे पार्वतीको देनेके लिये शंकर योग्य ३० पात्र नहीं है । इसे सुननेमात्रसे बड़े लोग आपका उपहास ही करेंगे ॥ ३० ॥
वे शिव तो निराश्रय, संगरहित, कुरूप, गुणरहित, ३१ अव्यय, श्मशानवासी, भयंकर आकारवाले, साँपोंको धारण करनेवाले, दिगम्बर, भस्म धारण करनेवाले, मस्तकपर सर्पमाला लपेटे हुए, सभी आश्रमोंसे परिभ्रष्ट ३२ । तथा सदा अज्ञात गतिवाले हैं ॥ ३१-३२ ॥ ब्रह्माजी बोले — अनेक लीलाएँ करनेमें कुशल शिवजी इस प्रकार शिवनिन्दायुक्त सत्य- सत्य वचन शिवः ॥ ३३ कहकर शीघ्र ही अपने स्थानको चले गये ॥३३ ॥
तच्छ्रुत्वा विप्रवचनमभूतां च तनू तयोः । ब्राह्मणके कहे गये अप्रिय वचनको सुनकर विपरीतानर्थपरे किं करिष्यावहे ध्रुवम् ॥ ३४ दोनोंका स्वरूप विरुद्ध भावोंवाला एवं अनर्थसे परिपूर्ण हो गया और वे विचार करने लगे कि अब ततो रुद्रो हमें क्या करना चाहिये ॥ ३४ ॥
महोतिं च कृत्वा भक्तमुदावहाम् । इस प्रकार उन रुद्रने भक्तोंको प्रसन्न करनेवाली विवाहयित्वा गिरिजां देवकार्यं चकार सः ॥ ३५ महान् लीलाएँ कीं और पार्वतीके साथ विवाहकर देवकार्य सम्पन्न किया ॥ ३५ ॥
इति प्रोक्तस्तु ते तात साधुवेषो हे तात! हे प्रभो! इस प्रकार मैंने देवगणोंका शिवावतारो द्विजाह्वयः । हित करनेवाले साधुवेषधारी द्विज नामक शिवावतारका
हि मया देवकार्यकरः प्रभो ॥ ३६ । वर्णन आपसे किया ॥३६ ॥
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अ ० ३६ ] शतरुद्रसंहिता १६३ इदमाख्यानमनघं स्वर्ग्यमायुष्यमुत्तमम् । यह आख्यान पवित्र, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, आयुकी वृद्धि करनेवाला तथा उत्कृष्ट है । जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह सुखी रहकर उत्तम यः पठेच्छृणुयाद्वापि स सुखी गतिमाप्नुयात् ॥ ३७ गतिको प्राप्त करता है ॥३७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां साधुद्विजशिवावतारवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें साधुद्विजशिवावतारवर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः अश्वत्थामाके रूपमें नन्दीश्वर उवाच
सनत्कुमार सर्वज्ञ शिवस्य परमात्मनः ।
अवतारं शृणु विभोरश्वत्थामाह्वयं परम् ॥
बृहस्पतेर्महाबुद्धेर्देवर्षेरंशतो मुने ।
भरद्वाजात्समुत्पन्नो द्रोणोऽयोनिज आत्मवान् ॥
धनुर्भृतां वरः शूरो विप्रर्षिः सर्वशास्त्रवित् ।
बृहत्कीर्तिर्महातेजा यः सर्वास्त्रविदुत्तमः ॥
धनुर्वेदे च वेदे च निष्णातं यं विदुर्बुधाः ।
वरिष्ठं चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ॥
कौरवाणां स आचार्य आसीत्स्वबलतो द्विज ।
महारथिषु विख्यातः षट्सु कौरवमध्यतः ॥
साहाय्यार्थं कौरवाणां तेपे विपुलं तपः ।
शिवमुद्दिश्य पुत्रार्थं द्रोणाचार्यो द्विजोत्तमः ॥
ततः प्रसन्नो भगवाञ्छंकरो भक्तवत्सलः ।
आविर्बभूव पुरतो द्रोणस्य मुनिसत्तम ॥
तं दृष्ट्वा स द्विजो द्रोणस्तुष्टावाशु प्रणम्य तम् ।
महाप्रसन्नहृदयो नतकः सुकृताञ्जलिः ॥
तस्य स्तुत्या च तपसा सन्तुष्टः शंकरः प्रभुः ।
वरं ब्रूहीति चोवाच द्रोणं तं भक्तवत्सलः ॥
तच्छ्रुत्वा शम्भुवचनं द्रोणः प्राहाथ सन्नतः ।
स्वांशजं तनयं देहि सर्वाजेयं महाबलम् ॥
शिवके अवतारका वर्णन नन्दीश्वर बोले - हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! अब आप सर्वव्यापी परमात्मा शिवके अश्वत्थामा १ नामक श्रेष्ठ अवतारको सुनें ॥१ ॥
हे मुने! महाबुद्धिमान् देवर्षि बृहस्पतिके अंशसे महर्षि भरद्वाजसे अयोनिज पुत्रके रूपमें आत्मवेत्ता २ द्रोण उत्पन्न हुए, जो धनुषधारियोंमें श्रेष्ठ, पराक्रमी, विप्रोंमें श्रेष्ठ, सम्पूर्ण शास्त्रोंके जाननेवाले, विशाल ३ कीर्तिवाले, महातेजस्वी एवं सभी अस्त्रोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे, जिन द्रोणको विद्वान् लोग धनुर्विद्यामें तथा वेदमें पारंगत, वरिष्ठ, आश्चर्यजनक कार्य करनेवाला ४ और अपने कुलको बढ़ानेवाला कहते हैं ॥२-४ ॥ हे द्विज! वे अपने पराक्रमके प्रभावसे कौरवोंके ५ आचार्य थे एवं उन कौरवोंके छः महारथियोंमें प्रसिद्ध थे ॥५ ॥
उन द्विजोत्तम द्रोणाचार्यने कौरवोंकी सहायताके ६ लिये पुत्रकी इच्छासे शिवजीको लक्ष्य करके बहुत बड़ा तप किया । उसके बाद हे मुनिसत्तम! [ उनके तपसे ] प्रसन्न होकर भक्तवत्सल शिवजी द्रोणाचार्य ७ समक्ष प्रकट हुए॥६-७ ॥ उन्हें देखकर उन ब्राह्मण द्रोणने उन्हें शीघ्रतासे ८ प्रणाम करके हाथ जोड़कर विनम्र हो अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर उनकी स्तुति की ॥८ ॥
उनकी स्तुति तथा तपस्यासे सन्तुष्ट हुए भक्तवत्सल ९ प्रभु शंकरने द्रोणाचार्यसे ' वर माँगो ’ – ऐसा कहा ॥ ९ ॥
शिवजीके इस वचनको सुनकर अति विनम्र द्रोणाचार्यने कहा कि मुझे महाबली, सबसे अजेय तथा १० अपने अंशसे उत्पन्न एक पुत्र दीजिये ॥१० ॥
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१६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ तच्छ्रुत्वा द्रोणवचनं शम्भुः प्रोचे तथास्त्विति । हे तात! हे मुने! द्रोणाचार्यका वचन अभूदन्तर्हितस्तात कौतुकी सुखकृन्मुने द्रोणोऽपगच्छत्स्वं धाम महाहृष्टो गतभ्रमः स्वपत्न्यै कथयामास तद्वृत्तं सकलं मुदा अथावसरमासाद्य रुद्रः सर्वान्तकः प्रभुः स्वांशेन तनयो जज्ञे द्रोणस्य स महाबलः
अश्वत्थामेति विख्यातः स बभूव क्षितौ मुने ।
प्रवीरः कञ्जपत्राक्षः शत्रुपक्षक्षयङ्करः ॥
यो भारते रणे ख्यातः पितुराज्ञामवाप्य च ।
सहायकृद् बभूवाथ कौरवाणां महाबलः ॥
यमाश्रित्य महावीरं कौरवाः सुमहाबलाः ।
भीष्मादयो बभूवुस्तेऽजेया अपि दिवौकसाम् ॥
यद्भयात्पाण्डवाः सर्वे कौरवाञ्जेतुमक्षमाः ।
आसन्नष्टा महावीरा अपि सर्वे च कोविदाः ॥
कृष्णोपदेशतः शम्भोस्तपः कृत्वातिदारुणम् ।
प्राप्य चास्त्रं शम्भुवराज्जिग्ये तानर्जुनस्ततः ॥
अश्वत्थामा महावीरो महादेवांशजो मुने ।
तथापि तद्भक्तिवशः स्वप्रतापमदर्शयत् ॥
विनाश्य पाण्डवसुतान् शिक्षितानपि यत्नतः ।
कृष्णादिभिर्महावीरैरनिवार्यबलः परैः ॥
पुत्रशोकेन विकलमापतन्तं तमर्जुनम् । ॥ ११ कौतुक करनेवाले परम सुखकारी शिवजीने ' ऐसा सुनकर | होगा ' - यह कहा और वे अन्तर्धान हो गये ही । द्रोणाचार्य भी निःशंक हो प्रसन्नतापूर्वक ॥११ ॥
अपने ॥ १२ घर लौट गये और उन्होंने वह सारा वृत्तान्त अपनी स्त्रीसे प्रेमपूर्वक कहा । इसके बाद अवसर पाकर वे । सर्वान्तक प्रभु रुद्र अपने अंशसे द्रोणके महाबलवान् ॥ १३ पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए॥१२-१३ ॥ हे मुने! वे पृथ्वीपर अश्वत्थामा नामसे विख्यात १४ हुए, वे महान् वीर थे, उनकी आँखें कमलपत्रके समान थीं और वे शत्रुपक्षका विनाश करनेवाले थे ॥ १४ ॥
ये महाबली अश्वत्थामा महाभारतके संग्राममें १५ पिताकी आज्ञासे कौरवोंके सहायकके रूपमें प्रसिद्ध हुए । उन महाबली अश्वत्थामाका आश्रय लेनेके १६ कारण ही महाबलवान् भीष्म आदि कौरवगण देवताओंके लिये भी अजेय हो गये॥१५-१६ ॥ उन्हींसे भयभीत होनेके कारण पाण्डवलोग १७ कौरवोंको जीतनेमें अपनेको असमर्थ पा रहे थे और परम बुद्धिमान् तथा महान् वीर होकर भी अश्वत्थामाके भयसे असमर्थ हो गये । तब श्रीकृष्णके उपदेशसे महाबली १८ अर्जुनने शिवकी कठोर तपस्याकर उनसे अस्त्र प्राप्त करके उन कौरवोंपर विजय प्राप्त की ॥ १७-१८ ॥ हे मुने! उस समय महादेवके अंशसे उत्पन्न हुए १ ९ उन अश्वत्थामाने कौरवोंकी भक्तिसे प्रसन्न होकर उनके वशीभूत होकर युद्धमें यत्नपूर्वक शिक्षित पाण्डवपुत्रोंका विनाश करके अपना प्रताप दिखाया, २० श्रीकृष्ण आदि महावीर बलवान् शत्रु भी उनके बलको रोक नहीं सके ॥ १ ९ -२० ॥ पुत्रके शोकसे सन्तप्त अर्जुनको श्रीकृष्णके रथेनाच्युतवन्तं हि दृष्ट्वा स च पराद्रवत् ॥ २१ साथ रथसे अपनी ओर आता हुआ देखकर वे भाग खड़े हुए ॥२१ ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम तदुपर्यसृजत्स हि । अश्वत्थामाने अर्जुनपर ब्रह्मशिर नामक अस्त्रका ततः प्रादुरभूत्तेजः प्रचण्डं सर्वतो दिशम् ॥ २२ प्रहार किया, उससे सभी दिशाओंमें प्रचण्ड तेज उत्पन्न हो गया । अपने प्राणोंपर आयी हुई आपत्तिको प्राणापदमभिप्रेक्ष्य देखकर अर्जुन दुखी हुए और उनका तेज नष्ट हो उवाच सोऽर्जुनः क्लेशसंयुतः । गया, तब उन्होंने क्लेशक्रान्त तथा भयभीत होकर कृष्णं विक्लान्तो नष्टतेजा महाभयः ॥ २३ । श्रीकृष्णसे कहा- ॥ २२-२३ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_7_2_Back
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अ ० ३६ ] शतरुद्रसंहिता १६५ अर्जुन उवाच
किमिदं स्वित्कुतो वेति कृष्ण कृष्ण न वेद्भ्यहम् ।
सर्वतोमुखमायाति तेजश्चेदं सुदुस्सहम् ॥
नन्दीश्वर उवाच श्रुत्वार्जुनवचश्चेदं स कृष्णः शैवसत्तमः दध्यौ शिवं सदारं च प्रत्याहार्जुनमादरात् ॥ श्रीकृष्ण उवाच
वेत्थेदं द्रोणपुत्रस्य ब्राह्ममस्त्रं महोल्बणम् ।
न ह्यस्यान्यतमं किञ्चिदस्त्रं प्रत्यवकर्शनम् ॥
शिवं स्मर द्रुतं शम्भुं स्वप्रभुं भक्तरक्षकम् ।
येन दत्तं हि ते स्वास्त्रं सर्वकार्यकरं परम् ॥
जह्यस्त्रतेज उन्नद्धं त्वं तच्छैवास्त्रतेजसा ।
इत्युक्त्वा च स्वयं कृष्णः शिवं दध्यौ तदर्थकः ॥
तच्छ्रुत्वा कृष्णवचनं पार्थः स्मृत्वा शिवं हृदि ।
स्पृष्ट्वापस्तं प्रणम्याशु चिक्षेपास्त्रं ततो मुने ॥
यद्यप्यस्त्रं ब्रह्मशिरस्त्वमोघं चाप्रतिक्रियम् ।
शैवास्त्रतेजसा सद्यः समशाम्यन्महामुने ॥
मा संस्था ह्येतदाश्चर्यं सर्वचित्रमये शिवे । यः स्वशक्त्याखिलं विश्वं सृजत्यवति हन्त्यजः अश्वत्थामा ततो ज्ञात्वा वृत्तमेतच्छिवांशजः शैवं न विव्यथे किञ्चिच्छिवेच्छातुष्टधीर्मुने अथ द्रौणिरिदं विश्वं कृत्स्नं कर्तुमपाण्डवम् उत्तरागर्भगं बालं नाशितुं मन आदधे अर्जुन बोले- हे कृष्ण! हे कृष्ण! यह क्या है, यह दु: सह तेज चारों ओरसे घेरे हुए कहाँसे आ २४ रहा है, मैं इसे नहीं जान पा रहा हूँ ॥२४ ॥
नन्दीश्वर बोले- अर्जुनका यह वचन सुनकर महाशैव उन श्रीकृष्णने पार्वतीसहित शिवका ध्यान २५ करते हुए आदरपूर्वक अर्जुनसे कहा— ॥ २५ ॥
श्रीकृष्ण बोले — यह द्रोणाचार्यके पुत्रका महातेजस्वी ब्रह्मास्त्र है, इसके समान शत्रुओंका २६ घातक कोई दूसरा अस्त्र नहीं है, ऐसा जानना चाहिये । आप शीघ्र ही भक्तोंकी रक्षा करनेवाले अपने प्रभु शंकरका ध्यान कीजिये, जिन्होंने आपका सारा २७ कार्य सम्पादन करनेवाला अपना सर्वोत्कृष्ट अस्त्र आपको प्रदान किया है । आप इस अस्त्रके परमतेजको अपने शैवास्त्रके तेजसे नष्ट कीजिये, इतना कहकर २८ स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुनकी रक्षाके लिये शिवका ध्यान करने लगे ॥ २६–२८ ॥ हे मुने! श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने अपने २ ९ मनमें शिवजीका ध्यान किया और इसके बाद जलसे आचमनकर शिवको प्रणाम करके उस अस्त्रको शीघ्र ही [ अश्वत्थामापर ] छोड़ा ॥२ ९ ॥ हे महामुने! यद्यपि वह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र ३० अमोघ है तथा इसकी प्रतिक्रिया करनेवाला कोई अन्य अस्त्र नहीं है, फिर भी वह शिवजीके अस्त्रके तेजसे उसी क्षण शान्त हो गया ॥ ३० ॥
अद्भुत चरित्रवाले उन शिवके सम्बन्धमें इसे ॥ ३१ आश्चर्य मत समझिये, जो अजन्मा शिव अपनी शक्तिसे सारे संसारको उत्पन्न करते हैं, उसका पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥३१ ॥
। हे मुने! इसके बाद शिवके अंशसे उत्पन्न ॥ ३२ हुए तथा शिवजीकी इच्छासे तुष्ट बुद्धिवाले अश्वत्थामा इस शैववृत्तान्तको जानकर कुछ भी व्यथित नहीं हुए ॥३२ ॥
इसके बाद अश्वत्थामाने इस सम्पूर्ण संसारको । पाण्डवोंसे रहित करनेके लिये उत्तराके गर्भमें स्थित ॥ ३३ बालकको विनष्ट करनेका निश्चय किया ॥३३ ॥
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१६६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ ब्रह्मास्त्रमनिवार्यं तदन्यैरस्त्रैर्महाप्रभम् । तब उस महाप्रभावशालीने महातेजस्वी उत्तरागर्भमुद्दिश्य चिक्षेप स महाप्रभुः ॥ ३४ | अन्य अस्त्रोंद्वारा रोके न जा सकनेवाले ब्रह्मास्त्रको तथा । उत्तराके गर्भपर चलाया । तब उस अस्त्रसे जलती ततश्च सोत्तरा जिष्णुवधूर्विकलमानसा । | अर्जुनकी पुत्रवधू उत्तरा व्याकुलचित्त होकर लक्ष्मीपति हुई कृष्णं तुष्टाव लक्ष्मीशं दह्यमाना तदस्त्रतः ॥ ३५ श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगी ॥ ३४-३५ ॥ ततः कृष्णः शिवं ध्यात्वा हृदा नुत्वा प्रणम्य च । इसके बाद श्रीकृष्णने हृदयसे सदाशिवका अपाण्डवमिदं कर्तुं द्रौणेरस्त्रमबुध्यत स्वरक्षार्थेन्द्रदत्तेन तदस्त्रेण सुवर्चसा सुदर्शनेन तस्याश्च व्यधाद्रक्षां शिवाज्ञया
स्वरूपं शंकरादेशात्कृतं शैववरेण ह ।
कृष्णेन चरितं ज्ञात्वा विमनस्कः शनैरभूत् ॥
ततः स कृष्णः प्रीतात्मा पाण्डवान्सकलानपि ।
अपातयत्तदङ्घ्रयोस्तु तुष्टये तस्य शैवराट् ॥
अथ द्रौणिः प्रसन्नात्मा पाण्डवान्कृष्णमेव च ।
नानावरान्ददौ प्रीत्या सोऽश्वत्थामानुगृह्य च ॥
इत्थं महेश्वरस्तात चक्रे लीलां परां प्रभुः अवतीर्य क्षितौ द्रौणिरूपेण मुनिसत्तम ॥
शिवावतारोऽश्वत्थामा महाबलपराक्रमः ।
त्रैलोक्यसुखदोऽद्यापि वर्तते जाह्नवीतटे ॥
अश्वत्थामावतारस्ते वर्णितः शङ्करप्रभोः ।
सर्वसिद्धिकरश्चापि भक्ताभीष्टफलप्रदः ॥
य इदं शृणुयाद्भक्त्या कीर्तयेद्वा समाहितः । ॥ ३६ ध्यानकर उनकी स्तुति की तथा उन्हें प्रणामकर जान लिया कि पाण्डवोंके विनाशके लिये यह अश्वत्थामाका । । अस्त्र है । उन्होंने शिवजीकी आज्ञासे अपनी रक्षाके ॥ ३७ लिये इन्द्रद्वारा प्रदत्त अपने महातेजस्वी सुदर्शन चक्रसे उसकी रक्षा की ॥ ३६-३७ ॥ शंकरकी आज्ञासे उन महाशैव श्रीकृष्णने गर्भमें ३८ अपना स्वरूप भी धारण किया, यह चरित्र जानकर अश्वत्थामा उदास हो गये ॥३८ ॥
उसके बाद प्रसन्नचित्त महाशैव श्रीकृष्णने ३ ९ अश्वत्थामाको प्रसन्न करनेके लिये सभी पाण्डवोंको उनके चरणोंमें गिराया ॥ ३ ९ ॥ तदनन्तर प्रसन्नचित्त द्रोणाचार्य पुत्र अश्वत्थामाने ४० श्रीकृष्ण एवं समस्त पाण्डवोंपर अनुग्रह करके प्रेमपूर्वक उन्हें अनेक प्रकारके वर दिये ॥ ४० ॥
हे तात! हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अश्वत्थामाके ४१ रूपमें पृथ्वीपर अवतार लेकर प्रभु शिवजीने अत्यन्त उत्तम लीला की ॥ ४१ ॥
त्रैलोक्यको सुख देनेवाले महापराक्रमशाली, ४२ शिवावतार अश्वत्थामा आज भी गंगातटपर विद्यमान हैं ॥ ४२ ॥
हे मुने! इस प्रकार मैंने आपसे अश्वत्थामाके ४३ रूपमें प्रभु शिवजीके अवतारका वर्णन किया, जो सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला तथा भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है ॥४३ ॥
जो [ मनुष्य ] भक्तिपूर्वक इस चरित्रको सुनता है अथवा सावधान होकर इसका कीर्तन करता है, वह अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है और अन्तमें शिवलोकको स सिद्धिं प्राप्नुयादिष्टामन्ते शिवपुरं व्रजेत् ॥ ४४ । जाता है ॥ ४४ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायामश्वत्थामशिवावतारवर्णनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें अश्वत्थामाशिवावतारवर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
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अ ० ३७ ] शतरुद्रसंहिता १६७ अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः व्यासजीका पाण्डवोंको सान्त्वना देकर अर्जुनको इन्द्रकील पर्वतपर तपस्या करने भेजना नन्दीश्वर उवाच
शृणु प्राज्ञ किराताख्यमवतारं पिनाकिनः ।
मूकं च हतवान्प्रीतो योऽर्जुनाय वरं ददौ ॥
सुयोधनजितास्ते वै पाण्डवाः प्रवराश्च ते ।
द्रौपद्या च तया साध्व्या द्वैताख्यं वनमाययुः ॥
तत्रैव सूर्यदत्तां वै स्थालीं चाश्रित्य ते तदा ।
कालं च वाहयामासुः सुखेन किल पाण्डवाः ॥
छलार्थं प्रेरितस्तेन दुर्वासा मुनिपुङ्गवः ।
सुयोधनेन विप्रेन्द्र पाण्डवान्तिकमादरात् ॥
छात्रैः स्वैर्वायुतैः सार्धं ययाचे तत्र तान्मुदा ।
भोज्यं चित्तेप्सितं वै स तेभ्यश्चैव समागतः ॥
स्वीकृत्य पाण्डवैस्तैस्तैः स्नानार्थं प्रेषितास्तदा ।
दुर्वास: प्रमुखाश्चैव मुनयश्च तपस्विनः ॥
अथ ते पाण्डवाः सर्वे अन्नाभावान्मुनीश्वर ।
दुःखिताश्च तदा प्राणांस्त्यक्तुं चित्ते समादधुः ॥
द्रौपद्या च स्मृतः कृष्ण आगतस्तत्क्षणादपि ।
शाकं च भक्षयित्वा तु तेषां तृप्तिं समादधत् ॥
दुर्वासाश्च तदा शिष्यांस्तृप्तान् ज्ञात्वा ययौ पुनः ।
पाण्डवाः कृच्छ्रनिर्मुक्ताः कृष्णस्य कृपया तदा ॥
अथ ते पाण्डवाः कृष्णं पप्रच्छुः किं भविष्यति ।
बलवान् शत्रुरुत्पन्नः किं कार्यं तद्वद प्रभो ॥
नन्दीश्वर उवाच
इति पृष्टस्तदा तैस्तु श्रीकृष्णः पाण्डवैर्मुने ।
स्मृत्वा शिवपदाम्भोजौ पाण्डवानिदमब्रवीत् ॥
नन्दीश्वर बोले - हे प्राज्ञ! अब आप शिवजीका किरातावतार सुनिये, [ जिसमें ] उन्होंने प्रसन्न होकर १ मूक दानवका वध किया एवं अर्जुनको वर प्रदान किया ॥१ ॥
[ द्यूतक्रीड़ामें ] जब श्रेष्ठ पाण्डवोंको दुर्योधनने २ जीत लिया, तब वे परम पतिव्रता द्रौपदीको अपने साथ लेकर द्वैतवन चले गये । उस समय वे पाण्डव वहाँपर सूर्यके द्वारा दी गयी स्थाली ( बटलोई ) का आश्रय ३ लेकर सुखपूर्वक अपना समय बिताने लगे ॥ २-३ ॥ हे विप्रेन्द्र! तब दुर्योधनने महामुनि दुर्वासाको ४ छल करनेके लिये आदरपूर्वक प्रेरित किया, तदनन्तर महामुनि दुर्वासा पाण्डवोंके निकट गये ॥४ ॥
वहाँ जाकर अपने दस हजार शिष्योंके साथ ५ दुर्वासाने मनोनुकूल भोजन उन पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक माँगा ॥५ ॥
पाण्डवोंने उनकी बात स्वीकार कर ली और ६ उस समय दुर्वासा आदि प्रमुख तपस्वी मुनियोंको स्नान करनेहेतु भेज दिया ॥६ ॥
हे मुनीश्वर! उस समय अन्नके अभावसे दुखी ७ होकर उन सभी पाण्डवोंने प्राण त्यागनेका मनमें निश्चय किया । तब द्रौपदीने शीघ्र ही श्रीकृष्णका स्मरण किया, वे उसी समय पधारे और शाकका भोग ८ लगाकर उन सभीको तृप्त किया॥७-८ ॥ तब शिष्योंको तृप्त जानकर दुर्वासा वहाँसे चले ९ गये । इस प्रकार श्रीकृष्णजीकी कृपासे पाण्डव उस समय दुःखसे निवृत्त हो गये॥९॥
इसके बाद उन पाण्डवोंने श्रीकृष्णसे पूछा— १० हे प्रभो! [ आगे ] क्या होगा? यह [ दुर्योधन ] महान् वैरी उत्पन्न हुआ है, अब आप बताइये कि क्या करना चाहिये? ॥१० ॥
नन्दीश्वर बोले – हे मुने! उन पाण्डवोंके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर श्रीकृष्णजीने शिवजीके चरण-११ कमलोंका स्मरण करके पाण्डवोंसे यह कहा— ॥ ११ ॥
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१६८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ श्रीकृष्ण उवाच श्रीकृष्णजी बोले – हे श्रेष्ठ पाण्डवो श्रूयतां पाण्डवाः श्रेष्ठाः श्रुत्वा कर्तव्यमेव हि । शिवोपासनासे युक्त मेरे वृत्तान्तको सुनिये और सुनकर! मवृत्तान्तं विशेषेण शिवसेवासमन्वितम् ॥ १२ विशेषरूपसे [ शिवोपासनारूप ] कर्तव्यका अनुपालन कीजिये ॥ १२ ॥
द्वारकां च मया गत्वा शत्रूणां विजिगीषया । पूर्वमें मैंने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेकी विचार्य चोपदेशांश्च ह्युपमन्योर्महात्मनः ॥ १३ इच्छासे द्वारकामें जाकर महात्मा उपमन्युके उपदेशोंका
मया ह्याराधितः शम्भुः प्रसन्नः परमेश्वरः ।
बटुके पर्वतश्रेष्ठे सप्तमासं सुसेवितः ॥ १४
इष्टान्कामानदान्मह्यं विश्वेशश्च स्वयं स्थितः ।
तत्प्रभावान्मया सर्वसामर्थ्यं लब्धमुत्तमम् ॥ १५
इदानीं सेव्यते देवो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ।
यूयं सेवत तं शम्भुमपि सर्वसुखावहम् ॥ १६
नन्दीश्वर उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे कृष्ण आश्वास्याथ च पाण्डवान् ।
द्वारकामगमच्छीघ्रं स्मरन् शिवपदाम्बुजम् ॥ १७
पाण्डवा अथ भिल्लं च प्रेषयामासुरोजसा ।
गुणानां च परीक्षार्थं तस्य दुर्योधनस्य च ॥ १८
सोऽपि सर्वं च तत्रत्यं दुर्योधनगुणोदयम् ।
समीचीनं च तज्ज्ञात्वा पुनः प्राप प्रभून्प्रति ॥ १ ९
तदुक्तं ते निशम्यैवं दुःखं प्रापुर्मुनीश्वर ।
परस्परं समूचुस्ते पाण्डवा अतिदुःखिताः ॥ २०
किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यमस्माभिरधुना युधि ।
समर्था अपि वै सर्वे सत्यपाशेन यन्त्रिताः ॥ २१
नन्दीश्वर उवाच एतस्मिन्समये व्यासो भस्मभूषितमस्तकः । रुद्राक्षाभरणश्चायाज्जटाजूटविभूषितः ॥ २२
पञ्चाक्षरं जपन्मन्त्रं शिवप्रेमसमाकुलः ।
तेजसां च स्वयंराशिः साक्षाद्धर्म इवापरः ॥ २३ ।
| विचार करके बटुक नामक श्रेष्ठ पर्वतपर सात मासपर्यन्त शिवजीकी आराधना की, तब भलीभाँति सेवाके किये जानेसे परमेश्वर शिवजी मुझपर प्रसन्न हो गये॥१३-१४ ॥ विश्वेश्वरने साक्षात् प्रकट होकर मुझे अभीष्ट वरदान दिया । उन्हींकी कृपासे मैंने सभी प्रकारका उत्तम सामर्थ्य प्राप्त कर लिया ॥ १५ ॥
[ हे पाण्डवो! ] मैं इस समय भी भोग एवं मोक्ष देनेवाले शिवजीकी सेवा करता हूँ, इसलिये आपलोग भी सब प्रकारका सुख देनेवाले उन शिवजीकी सेवा कीजिये ॥ १६ ॥
नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर पाण्डवोंको आश्वासन देकर श्रीकृष्णजी अन्तर्धान हो गये और शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए शीघ्र ही द्वारका चले गये ॥१७ ॥
इधर, उत्साहयुक्त पाण्डवोंने उस दुर्योधनके गुणोंकी परीक्षाके लिये एक भीलको भेजा । वह भी दुर्योधनके सभी गुणों और पराक्रमका भलीभाँति पता लगाकर अपने प्रभु पाण्डवोंके समीप लौट आया ॥ १८-१९ ॥ हे मुनीश्वर! उसकी बात सुनकर पाण्डव अत्यन्त दुखी हुए और अतीव दुःखित उन पाण्डवोंने आपसमें कहा — अब हमलोगोंको क्या करना चाहिये और कहाँ जाना चाहिये? यद्यपि हमलोग इस समय युद्ध करनेमें समर्थ हैं, किंतु सत्यपाशसे बँधे हुए हैं ॥ २०-२१ ॥ नन्दीश्वर बोले- इसी समय मस्तकमें भस्म लगाये, रुद्राक्षकी माला धारण किये, सिरपर जटाजूटसे सुशोभित तथा शिवप्रेममें निमग्न, तेजोराशि, साक्षात् दूसरे धर्मके समान श्रीव्यासजी पंचाक्षर मन्त्रका जप करते हुए वहाँ आये ॥ २२-२३ ॥