श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 361–370
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370
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अ ० १० ] रुद्रसंहिता (
जडतां त्यज मन्दात्मन् कुरु त्वं नेदृशीं मतिम् ।
किं ब्रुवन्त्यखिला वेदाः स्तुत्या तत्स्मर सद्धिया ॥ ३१
रुद्रं जानासि दुर्बुद्धे स्वसुतं परमेश्वरम् ।
वेदवक्तापि विज्ञानं विस्मृतं तेऽखिलं विधे ॥ ३२
शंकरं सुरसामान्यं मत्वा द्रोहं करोषि हि ।
सुबुद्धिर्विगता तेऽद्याविर्भूता कुमतिस्तथा ॥ ३३
तत्त्वसिद्धान्तमाख्यातं शृणु सद्बुद्धिमावह ।
यथार्थं निगमाख्यातं निर्णीय भवकारकम् ॥ ३४
शिवः सर्वस्वकर्ता हि भर्ता हर्ता परात्परः ।
परब्रह्म परेशश्च निर्गुणो नित्य एव च ॥ ३५
अनिर्देश्यो निर्विकारः परमात्माद्वयोऽच्युतः ।
अनन्तोऽन्तकरः स्वामी व्यापकः परमेश्वरः ॥ ३६
सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता त्रिगुणभाग्विभुः ।
ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यो रजः सत्त्वतमः परः ॥ ३७
मायाभिन्नो निरीहश्च मायो मायाविशारदः ।
सगुणोऽपि स्वतंत्रश्च निजानंदोऽविकल्पकः ॥ ३८
आत्मारामो हि निर्द्वन्द्वो भक्ताधीनः सुविग्रहः ।
योगी योगरतो नित्यं योगमार्गप्रदर्शकः ॥ ३ ९
गर्वापहारी लोकेशः सर्वदा दीनवत्सलः ।
एतादृशो हि यः स्वामी स्वपुत्रं मन्यसे हि तम् ॥ ४०
ईदृशं त्यज कुज्ञानं शरणं व्रज तस्य वै ।
भज सर्वात्मना शम्भुं सन्तुष्टः शं विधास्यति ॥ ४१
गृह्णीयाच्छङ्करः पत्नीं विचारो हृदि चेत्तव ।
शिवामुद्दिश्य सुतपः कुरु ब्रह्मन् शिवं स्मरन् ॥ ४२
कुरु ध्यानं शिवायास्त्वं काममुद्दिश्य तं हृदि ।
सा चेत्प्रसन्ना देवेशी सर्वं कार्यं विधास्यति ॥ ४३
सतीखण्ड ) ३४ ९ हे मन्दात्मन्! आप अपनी जड़ताका त्याग करें और इस प्रकारकी बुद्धि न करें । सम्पूर्ण वेद स्तुतिद्वारा क्या कहते हैं, अच्छी बुद्धिसे उसका स्मरण करें ॥ ३१ ॥
हे दुर्बुद्धे! आप उन परेश, रुद्रको अपना पुत्र समझते हैं । हे विधे! आप वेदके वक्ता हैं, फिर भी आपका समस्त ज्ञान विस्मृत हो गया है ॥ ३२ ॥
[ ऐसा ज्ञात होता है कि ] इस समय आपकी सुबुद्धि नष्ट हो गयी है और आपमें कुमति उत्पन्न हो गयी है, जो आप शंकरको सामान्य देवता समझकर उनसे द्रोह कर रहे हैं ॥ ३३ ॥
हे ब्रह्मन्! निर्णय करके वेदोंमें वर्णित किया गया जो कल्याणकारक तत्त्वसिद्धान्त कहा गया है, उसे आप सुनिये और सद्बुद्धि रखिये ॥३४ ॥
शिवजी ही समस्त सृष्टिके कर्ता, भर्ता, हर्ता परात्पर, परब्रह्म, परेश, निर्गुण, नित्य, अनिर्देश्य, निर्विकार, परमात्मा, अद्वैत, अच्युत, अनन्त, सबका अन्त करनेवाले, स्वामी, व्यापक, परमेश्वर, सृष्टि - पालन-संहारको करनेवाले, सत्त्व- रज - तम- इन तीन गुणोंसे युक्त, सर्वव्यापी, रज - सत्त्व - तमरूपसे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर नाम धारण करनेवाले, मायासे भिन्न, इच्छारहित, मायास्वरूप, माया रचनेमें प्रवीण, सगुण, स्वतन्त्र, अपनेमें आनन्दित रहनेवाले, निर्विकल्पक, अपनेमें ही रमण करनेवाले, द्वन्द्वसे रहित, भक्तोंके अधीन रहनेवाले, उत्तम शरीरवाले, योगी, सदा योगमें निरत रहनेवाले, योगमार्ग दिखानेवाले, लोकेश्वर, गर्वको दूर करनेवाले तथा सदैव दीनोंपर दया करनेवाले हैं । जो ऐसे स्वामी हैं, उन्हें आप अपना पुत्र मानते हैं! ॥ ३५-४० ॥ हे ब्रह्मन्! [ शिव हमारे पुत्र हैं— ] इस प्रकारका अज्ञान छोड़ दीजिये । उन्हींकी शरणमें जाइये और सब प्रकारसे शिवजीका भजन कीजिये, वे प्रसन्न होकर आपका कल्याण करेंगे ॥४१ ॥
यदि आपका यह विचार है कि शिवजी अवश्य दारपरिग्रह करें, तो शिवजीका स्मरण करते हुए आप शिवाको उद्देश्य करके कठोर तप कीजिये ॥ ४२ ॥
आप अपनी इच्छाको हृदयमें धारणकर [ भगवती ] शिवाका ध्यान कीजिये । यदि वे देवेश्वरी प्रसन्न हो गयीं, तो आपका समस्त कार्य पूर्ण करेंगी ॥ ४३ ॥
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३५० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० कृत्वावतारं सगुणा यदि स्यान्मानुषी शिवा । यदि वे शिवा सगुणरूपसे अवतार लेकर किसी कस्यचित्तनया लोके सा तत्पत्नी भवेद् ध्रुवम् ॥ ४४ मनुष्यकी कन्या बनें, तो निश्चय ही वे उन ( शिव ). दक्षमाज्ञापय ब्रह्मन् तपः कुर्यात्प्रयत्नतः तामुत्पादयितुं पत्नीं शिवार्थं भक्तितः स्वतः भक्ताधीनौ च तौ तात सुविज्ञेयौ शिवाशिवौ स्वेच्छया सगुणौ जातौ परब्रह्मस्वरूपिणौ ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा तत्क्षणं मेशः शिवं सस्मार स्वप्रभुम् कृपया तस्य संप्राप्य ज्ञानमूचे च मां ततः ॥ विष्णुरुवाच
विधे स्मर पुरोक्तं यद्वचनं शंकरेण च ।
प्रार्थितेन यदावाभ्यामुत्पन्नाभ्यां तदिच्छया ॥
विस्मृतं तव तत्सर्वं धन्या या शांभवी परा ।
तया संमोहितं सर्वं दुर्विज्ञेया शिवं विना ॥
यदा हि सगुणो जातः स्वेच्छया निर्गुणः शिवः ।
मामुत्पाद्य ततस्त्वां च स्वशक्त्या सुविहारकृत् ॥
उपादिदेश त्वां शम्भुः सृष्टिकार्यं तदा प्रभुः ।
तत्पालनं च मां ब्रह्मन् सोमः सूतिकरोऽव्ययः ॥
तदा वां वेश्म संप्राप्तौ साञ्जली नतमस्तकौ ।
भव त्वमसि सर्वेशोऽवतारी गुणरूपधृक् ॥
इत्युक्तः प्राह स स्वामी विहस्य करुणान्वितः ।
दिवमुद्वीक्ष्य सुप्रीत्या नानालीलाविशारदः ॥
मद्रूपं परमं विष्णो ईदृशं ह्यङ्गतो विधेः ।
प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्रः प्रकीर्तितः ॥
पूर्णरूपः स मे पूज्यः सदा वां सर्वकामकृत् ।
लयकर्ता गुणाध्यक्षो निर्विशेषः सुयोगकृत् ॥
की पत्नी बन सकती हैं ॥ ४४ ॥
। हे ब्रह्मन्! आप [ इस कार्यके लिये ] दक्षको आज्ञा ॥ ४५ दीजिये कि वे स्वयं भक्तितत्पर होकर उन शिवपत्नीको उत्पन्न करनेके लिये प्रयत्नपूर्वक तप करें ॥ ४५ ॥
। हे तात! आप इसे भली प्रकार समझ लें कि वे ॥ ४६ शिवा और शिव भक्तोंके अधीन हैं, परब्रह्मस्वरूप ये दोनों स्वेच्छासे सगुणभाव धारण कर लेते हैं ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले- लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने । इस प्रकार कहकर तत्क्षण अपने प्रभु शिवजीका ४७ स्मरण किया और उसके बाद उनकी कृपासे ज्ञान प्राप्तकर वे मुझसे कहने लगे -॥४७ ॥
विष्णुजी बोले- हे ब्रह्मन्! पूर्वकालमें शिवजीकी इच्छासे उत्पन्न हुए हम दोनोंके द्वारा ४८ प्रार्थना करनेपर उन्होंने जो - जो वचन कहा था, उसका स्मरण कीजिये ॥ ४८ ॥
आप वह सब भूल गये हैं । शिवजीकी जो ४ ९ पराशक्ति है, वह धन्य है, उसीने इस समस्त जगत्को मोहित कर रखा है । शिवके अतिरिक्त उसे कोई नहीं जान सकता ॥ ४ ९ ॥ हे ब्रह्मन्! जब निर्गुण शिवजीने अपनी इच्छासे ५० सगुणरूप धारण किया था, उस समय मुझे तथा आपको उत्पन्न करके अपनी शक्तिके साथ उत्तम विहार करनेवाले, सृष्टिकर्ता, अविनाशी, परमेश्वर उन ५१ शम्भुने आपको सृष्टिकार्यके लिये तथा मुझे उसके पालनके लिये आदेश दिया ॥ ५०-५१ ॥ उसके बाद हम दोनोंने हाथ जोड़कर विनम्र ५२ होकर निवेदन किया कि आप सर्वेश्वर होकर भी । सगुणरूप धारणकर अवतार लीजिये । ऐसा कहनेपर करुणामय तथा अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेमें ५३ प्रवीण उन स्वामी शिवजीने आकाशकी ओर देखकर हँसते हुए प्रेमपूर्वक कहा— ॥ ५२-५३ ॥ हे विष्णो! मेरा ऐसा ही परम रूप ब्रह्माजीके अंगसे ५४ प्रकट होगा, जो लोकमें रुद्र नामसे प्रसिद्ध होगा । वह मेरा पूजनीय पूर्णरूप आप दोनोंके समस्त कार्यको पूरा | करनेवाला, जगत्का लयकर्ता, सभी गुणोंका अधिष्ठाता, ५५ । निर्विशेष तथा उत्तम योग करनेवाला होगा ॥ ५४-५५ ॥
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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता (
त्रिदेवा अपि मे रूपं हरः पूर्णो विशेषतः ।
उमाया अपि रूपाणि भविष्यंति त्रिधा सुतौ ॥ ५६
लक्ष्मीर्नाम हरेः पत्नी ब्रह्मपत्नी सरस्वती ।
पूर्णरूपा सती नाम रुद्रपत्नी भविष्यति ॥ ५७
विष्णुरुवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितो जातः कृपां कृत्वा महेश्वरः ।
अभूतां सुखिनावावां स्वस्वकार्यपरायणौ ॥ ५८
समयं प्राप्य सस्त्रीकावावां ब्रह्मन्न शंकरः ।
अवतीर्णः स्वयं रुद्रनामा कैलाससंश्रयः ॥ ५ ९
अवतीर्णा शिवाभूत्सा सती नाम प्रजेश्वर ।
तदुत्पादनहेतोर्हि यत्नोऽतः कार्य एव वै ॥ ६०
इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः कृत्वा स करुणां पराम् ।
प्राप्नुवं प्रमुदं चाथ ह्यधिकं गतमत्सरः ॥ ६१
सतीखण्ड ) ३५१ यद्यपि त्रिदेव मेरे स्वरूप हैं, किंतु ' हर ' मेरे पूर्णरूप होंगे । [ इसी प्रकार ] हे पुत्रो! उमाके भी तीन प्रकारके रूप होंगे । लक्ष्मी विष्णुकी पत्नी, सरस्वती ब्रह्माकी पत्नी और पूर्णरूपा सती रुद्रकी पत्नी होंगी ॥ ५६-५७ ॥ विष्णुजी बोले - [ हे ब्रह्मन्! ] भगवान् महेश्वर ऐसा कहकर हमदोनोंपर कृपा करके अन्तर्धान हो गये, उसके बाद हम दोनों सुखी होकर अपने - अपने कार्यों में लग गये ॥ ५८ ॥
हे ब्रह्मन्! समय पाकर हमदोनोंने स्त्री ग्रहण कर ली, किंतु शंकरजीने नहीं । वे रुद्र नामसे अवतीर्ण हुए हैं और कैलास पर्वतपर रहते हैं ॥ ५ ९ ॥ हे प्रजेश्वर! वे शिवा सती नामसे अवतीर्ण होंगी । अतः उन्हें उत्पन्न होनेके लिये हमदोनोंको यत्न करना चाहिये ॥ ६० ॥
परम कृपा करके वे विष्णु ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये । तब मैं [ शिवजीके प्रति ] ईर्ष्यारहित । होकर अत्यधिक प्रसन्न हो गया ॥६१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे ब्रह्मविष्णुसंवादो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें ब्रह्मा और विष्णुका संवाद नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः ब्रह्माद्वारा जगदम्बिका शिवाकी स्तुति तथा वरकी प्राप्ति नारद उवाच
ब्रह्मन् तात महाप्राज्ञ वद नो वदतां वर ।
गते विष्णौ किमभवदकार्षीत्किं विधे ' भवान् ॥ १
ब्रह्मोवाच
विप्रनन्दनवर्य त्वं सावधानतया शृणु ।
विष्णौ गते भगवति यदकार्षमहं खलु ॥ २
विद्याविद्यात्मिकां शुद्धां परब्रह्मस्वरूपिणीम् ।
स्तौमि देवीं जगद्धात्रीं दुर्गां शम्भुप्रियां सदा ॥ ३
सर्वत्र व्यापिनीं नित्यां निरालंबां निराकुलाम् ।
त्रिदेवजननीं वंदे स्थूलस्थूलामरूपिणीम् ॥ ४
त्वं चितिः परमानंदा परमात्मस्वरूपिणी । नारदजी बोले - हे ब्रह्मन्! हे महाप्राज्ञ! हे तात! [ आपसे ] इस प्रकार कहकर विष्णुके अन्तर्धान हो जानेपर क्या हुआ? हे विधे! आपने क्या किया? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे श्रेष्ठ विप्रनन्दन! भगवान् विष्णुके चले जानेपर मैंने जो कार्य किया, आप उसे सावधानीपूर्वक सुनिये ॥२ ॥
तब मैं विद्या - अविद्यास्वरूपा, शुद्ध, परब्रह्म-स्वरूपिणी तथा जगत्को धारण करनेवाली शम्भुप्रिया देवी दुर्गाकी स्तुति करने लगा ॥३ ॥
सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली, नित्य, निराश्रय, निराकुल, त्रिदेवोंको उत्पन्न करनेवाली, स्थूलसे भी स्थूल रूप धारण करनेवाली तथा निराकार दुर्गाकी मैं वन्दना करता हूँ । आप चित्स्वरूपा, परमानन्दस्वरूपिणी
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३५२ प्रसन्ना भव देवेशि मत्कार्यं कुरु ते नमः एवं संस्तूयमाना सा योगनिद्रा मया मुने आविर्बभूव प्रत्यक्षं देवर्षे चंडिका मम ॥ स्निग्धाञ्जनद्युतिश्चारुरूपा दिव्यचतुर्भुजा सिंहस्था वरहस्ता च मुक्तामणिकचोत्कटा शरदिंद्वानना शुभ्रचन्द्रभाला त्रिलोचना । सर्वावयवरम्या च कमलाङ्घ्रिनखद्युतिः
समक्षं तामुमां वीक्ष्य मुने शक्तिं शिवस्य हि ।
भक्त्या विनततुङ्गांशः प्रास्तवं सुप्रणम्य वै ॥
ब्रह्मोवाच नमो नमस्ते जगतः प्रवृत्ति-निवृत्तिरूपे स्थितिसर्गरूपे । चराचराणां भवती सुशक्तिः सनातनी सर्वविमोहनीति ॥ या श्रीः सदा केशवमूर्तिमाला विश्वंभरा या सकलं बिभर्ति । या त्वं पुरा सृष्टिकरी महेशी हर्त्री त्रिलोकस्य परा गुणेभ्यः ॥ या योगिनां वै महिता मनोज्ञा सा त्वं नमस्ते परमाणुसारे । यमादिपूते हृदि योगिनां या या योगिनां ध्यानपथे प्रतीता ॥ प्रकाशशुद्ध्यादियुता विरागा सा त्वं हि विद्या विविधावलंबा । कूटस्थमव्यक्तमनंतरूपं त्वं बिभ्रती कालमयी जगति ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ ॥ ५ तथा परमात्म - स्वरूपिणी हैं । हे देवेशि! मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों और मेरा कार्य करें । आपको नमस्कार है ॥ ४-५ ॥ । हे मुने! हे देवर्षे! मेरे द्वारा इस प्रकार स्तुति ६ करनेपर वे योगनिद्रा भगवती चण्डिका मेरे सामने प्रकट हो गयीं ॥ ६ ॥
। वे भगवती दुर्गा चिकने अंजनके समान शरीरकी ॥ ७ कान्तिसे युक्त थीं, वे सुन्दर रूपसे सम्पन्न थीं, उनकी दिव्य चार भुजाएँ थीं, वे सिंहपर सवार थीं, वे हाथमें वरमुद्रा धारण किये हुए थीं, उनके केशोंमें मोती तथा मणियाँ ग्रथित थीं, वे अत्यन्त उत्कट थीं, उनका मुख शरत्कालीन पूर्णिमाके समान था, उनके मस्तकपर ॥ ८ शुभ चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, वे तीन नेत्रोंसे युक्त थीं, उनके समस्त शरीरके अवयव परम मनोहर थे तथा वे चरणकमलके नखकी कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं॥७-८ ॥ इस प्रकार अपने सामने शिवकी शक्ति उन भगवती ९ उमाको उपस्थित देखकर भक्तिसे सिर झुकाकर मैं उन्हें प्रणाम करके [ इस प्रकार ] स्तुति करने लगा — ॥९ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे जगत्की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति-स्वरूपे! हे सर्गस्थितिरूपे! आपको नमस्कार है । आप समस्त चराचरकी शक्ति, सनातनी तथा सबको मोहित १० करनेवाली हैं ॥१० ॥
जो महालक्ष्मी भगवान् विष्णुको मालाकी भाँति हृदयमें धारण करनेवाली, विश्वका भरण करनेवाली तथा सभीका पोषण करनेवाली हैं, जो महेश्वरी पूर्वमें त्रिलोकीका सृजन करनेवाली हैं, उसका संहार करनेवाली ११ हैं तथा गुणोंसे सर्वथा परे हैं ॥ ११ ॥
जो योगियोंके लिये पूज्य हैं, मनोहर हैं- वे आप ही हैं । हे परमाणुओंकी सारस्वरूपे! आपको । नमस्कार है । जो यम - नियमोंसे पवित्र हुए योगियोंके १२ हृदयमें निवास करनेवाली तथा योगियोंके द्वारा ध्यानगम्य | हैं, वे प्रकाश एवं शुद्धि आदिसे युक्त, मोहसे रहित | एवं [ इस जगत्को ] अनेक प्रकारसे अवलम्ब देनेवाली विद्यास्वरूपा आप ही हैं । आप कूटस्थ, अव्यक्त एवं । अनन्तरूपा हैं । [ हे भगवति! ] आप कालरूपसे इस १३ । जगत्को धारण करती हैं ॥ १२-१३ ॥
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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता ( विकारबीजं प्रकरोषि नित्यं सर्वजनेषु नूनम् । त्वं वै गुणानां च शिवे त्रयाणां निदानभूता च ततः परासि ॥ १४ सत्त्वं रजस्तामस इत्यमीषां विकारहीना सभुवस्तुरीया । सा त्वं गुणानां जगदेकहेतुं ब्रह्मांतरारंभसि चात्सि पासि ॥ १५
अशेषजगतां बीजे ज्ञेयज्ञानस्वरूपिणि ।
जगद्धिताय सततं शिवपत्नि नमोऽस्तु ते ॥ १६
इत्याकर्ण्य वचः सा मे काली लोकविभाविनी ।
प्रीत्या मां जगतामूचे स्स्रष्टारं जनशब्दवत् ॥ १७
देव्युवाच
ब्रह्मन् किमर्थं भवता स्तुताहमवधारय ।
उच्यतां यदि धृष्योऽसि तच्छीघ्रं पुरतो मम ॥ १८
प्रत्यक्षमपि जातायां सिद्धिः कार्यस्य निश्चिता ।
तस्मात्त्वं वांछितं ब्रूहि या करिष्यामि भाविता ॥ १ ९
ब्रह्मोवाच
शृणु देवि महेशानि कृपां कृत्वा ममोपरि ।
मनोरथस्थं सर्वज्ञे प्रवदामि त्वदाज्ञया ॥ २०
यः पतिस्तव देवेशि ललाटान्मेऽभवत्पुरा ।
शिवो रुद्राख्यया योगी स वै कैलासमास्थितः ॥ २१
तपश्चरति भूतेश एक एवाविकल्पकः ।
अपत्नीको निर्विकारो न द्वितीयां समीहते ॥ २२
तं मोहय यथा चान्यां द्वितीयां सति वीक्षते ।
त्वदृते तस्य नो काचिद्भविष्यति मनोहरा ॥ २३
तस्मात्त्वमेव रूपेण भवस्य हरमोहिनी ।
सुता भूत्वा च दक्षस्य रुद्रपत्नी शिवे भव ॥ २४
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_13_1_Front सतीखण्ड ) ३५३ आप गुणोंसे युक्त होकर सभी प्राणियोंमें नित्य विकाररूप बीज उत्पन्न करती हैं । हे शिवे! आप तीनों गुणोंकी कारणरूपा हैं तथा इससे परे भी हैं ॥ १४ ॥
[ हे देवि! ] आप सत्त्व, रज तथा तम - इन तीनों गुणोंके साथ ही पार्थिव विकारोंसे रहित तुरीय रूप हैं । आप इस जगत्की तथा गुणोंकी हेतुभूता हैं । आप ही ब्रह्माण्डमें स्थित रहकर इस जगत्की सृष्टि, प्रलय तथा पालन करती हैं ॥ १५ ॥
हे सम्पूर्ण जगत्की बीजस्वरूपे! हे ज्ञान तथा ज्ञेयस्वरूपिणि! आप सर्वदा जगत्के हितसाधनमें तत्पर रहनेवाली हैं । अतः हे शिवपत्नि! आपको सदा नमस्कार है ॥१६ ॥
[ ब्रह्माजी बोले- ] मेरी स्तुतिको सुनकर लोकका कल्याण करनेवाली वे महाकाली, सामान्य मनुष्यकी भाँति मुझ जगत्स्रष्टासे प्रेमपूर्वक कहने लगीं ॥ १७ ॥
देवी बोलीं- हे ब्रह्मन्! आपने मेरी स्तुति किसलिये की है, इसे आप ठीकसे समझ लें । आप मेरे भक्त हैं, तो उसे शीघ्र ही मेरे सामने निवेदन करें ॥ १८ ॥
मेरे प्रत्यक्ष रूपसे प्रकट हो जानेपर कार्य-सिद्धि निश्चित है । अत: आप अपनी मनोभिलषित बात कहें, मैं प्रसन्न होकर उसे निश्चित रूपसे करूँगी ॥ १ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे देवि! हे महेश्वरि! मेरे ऊपर कृपाकर मेरी बात सुनें । हे सर्वज्ञे! आपकी आज्ञासे मैं अपने मनोरथकी बात कह रहा हूँ ॥ २० ॥
हे देवेशि! पूर्वकालमें मेरे ललाट - प्रदेशसे उत्पन्न हुए आपके पति जो रुद्रनामसे प्रसिद्ध हैं, वे इस समय योगी होकर कैलासपर्वतपर निवास कर रहे हैं ॥ २१ ॥
वे भूतोंके स्वामी इस समय अकेले निर्विकल्पक समाधिमें लीन होकर तप कर रहे हैं । वे निर्विकार होनेके कारण पत्नीसे रहित हैं और [ आत्मामें रमण करनेके कारण ] दूसरी पत्नीकी अपेक्षा नहीं करते ॥ २२ ॥
हे सति! आप उन्हींको मोहित करें, जिससे वे [ आत्माभिरमणसे उपरत होकर ] दूसरी स्त्री [ आप ] -को देखें । आपके अतिरिक्त कोई अन्य स्त्री उनके मनको मोहित करनेवाली नहीं होगी । इसलिये आप ही दक्षकी कन्या बनकर अपने रूपसे शिवजीको मोहित करनेवाली हों । हे शिवे! आप शिवपत्नी बनें ॥ २३-२४ ॥
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३५४ यथा धृतशरीरा त्वं लक्ष्मीरूपेण केशवम् आमोदयसि विश्वस्य हितायैतं तथा कुरु कांताभिलाषमात्रं मे दृष्ट्वानिंदद् वृषध्वजः स कथं वनितां देवि स्वेच्छया सङ्ग्रहीष्यति
हरे गृहीतकांते तु कथं सृष्टिः शुभावहा ।
आद्यंतमध्ये चैतस्य हेतौ तस्मिन्विरागिणि ॥
इति चिंतापरो नाहं त्वदन्यं शरणं हितम् ।
कृच्छ्रवांस्तेन विश्वस्य हितायैतत्कुरुष्व मे ॥
न विष्णुस्तस्य मोहाय न लक्ष्मीर्न मनोभवः ।
न चाप्यहं जगन्मातर्नान्यस्त्वां कोऽपि वै विना ॥
तस्मात्त्वं दक्षजा भूत्वा दिव्यरूपा महेश्वरी ।
तत्पत्नी भव मद्भक्त्या योगिनं मोहयेश्वरम् ॥
दक्षस्तपति देवेशि क्षीरोदोत्तरतीरगः ।
त्वामुद्दिश्य समाधाय मनस्त्वयि दृढव्रतः ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचः सा मे चिंतामाप शिवा तदा ।
उवाच च स्वमनसि विस्मिता जगदम्बिका ॥
देव्युवाच
अहो सुमहदाश्चर्यं वेदवक्ताऽपि विश्वकृत् ।
महाज्ञानपरो भूत्वा विधाता किं वदत्ययम् ॥
विधेश्चेतसि सञ्जातो महामोहोऽसुखावहः ।
यद्वरं निर्विकारं तं संमोहयितुमिच्छति ॥
हरमोहवरं मत्तः समिच्छति विधिस्त्वयम् ।
को लाभोऽस्यात्र स विभुर्निर्मोहो निर्विकल्पकः ॥
परब्रह्माख्यो यः शंभुर्निर्गुणो निर्विकारवान् ।
तस्याहं सर्वदा दासी तदाज्ञावशगा सदा ॥
स एव पूर्णरूपेण रुद्रनामाभवच्छिवः ।
भक्तोद्धारणहेतोर्हि स्वतंत्रः परमेश्वरः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ । जिस प्रकार आप लक्ष्मीका रूप धारणकर ॥ २५ विष्णुको प्रसन्न करती हैं, उसी प्रकार संसारके हितके लिये आप इस कार्यको भी वैसे ही करें ॥ २५ ॥
। हे देवि! जब उन शिवने स्त्रीविषयक अभिलाषा-॥ २६ मात्रसे मेरी निन्दा की, तो भला वे स्वेच्छासे किस प्रकार स्त्री ग्रहण कर सकते हैं? ॥ २६ ॥
यदि वे स्त्री ग्रहण कर भी लें, तो भी वे तो २७ सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें सदैव विरक्त रहते हैं, अतः उनसे उत्तम सृष्टि किस प्रकार होगी? ॥ २७ ॥
हे देवि! इस प्रकार चिन्तापरायण हुए मेरे लिये २८ आपके अतिरिक्त और कोई शरणप्रद नहीं है, इसलिये विश्वकल्याणके निमित्त आप मेरे इस कार्यको करें ॥ २८ ॥
शिवजीको मोहित करनेमें न विष्णु, न लक्ष्मी, न २ ९ काम और न तो मैं ही समर्थ हूँ । हे जगन्माता! आपके बिना कोई भी उन्हें मोहित करनेमें समर्थ नहीं है ॥ २ ९ ॥ अतः आप दिव्यरूपा दक्षपुत्रीके रूपमें जन्म ३० लेकर मेरी भक्तिके आग्रहसे महायोगी शिवको मोहित करें और उनकी पत्नी महेश्वरी बनें ॥ ३० ॥
हे देवेशि! इस समय दक्षप्रजापति क्षीरसमुद्रके ३१ उत्तर तटपर आपको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे मनमें आपका ध्यान करते हुए दृढ़व्रती होकर तपस्या कर रहे हैं ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजी बोले — मेरे इस वचनको सुनकर वे जगदम्बिका शिवा चिन्तित हो उठीं और विस्मित ३२ होकर अपने मनमें कहने लगीं— ॥३२ ॥
देवी बोलीं – वेदवक्ता और जगत्कर्ता ये विधाता महान् अज्ञानसे युक्त होकर कैसी बात कर रहे हैं-३३ अहो! यह महान् आश्चर्य है! ॥३३ ॥
ब्रह्माके चित्तमें ऐसा यह दुःखदायी महान् मोह
३४ कैसे उत्पन्न हो गया कि वे निर्विकार परमात्माको भी ।
मोहित करना चाहते हैं! ॥ ३४ ॥
ये ब्रह्मा मुझसे शिवजीके मोहका वर चाहते हैं, ३५ इनका कौन - सा लाभ है? वे प्रभु तो निर्विकल्प, निर्मोह हैं ॥ ३५ ॥
वे शम्भु निर्विकार, निर्गुण तथा परब्रह्म हैं और ३६ मैं तो सदा उनकी आज्ञामें रहनेवाली दासी हूँ ॥ ३६ ॥
वे स्वतन्त्र परमेश्वर शिवभक्तोंके उद्धारहेतु ३७ । अपने पूर्ण रूपसे रुद्र नामसे अवतीर्ण हुए हैं ॥ ३७ ॥
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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता (
हरेर्विधेश्च स स्वामी शिवायूनो न कर्हिचित् ।
योगादरो ह्यमायस्थो मायेशः परतः परः ॥ ३८
मत्वा तमात्मजं ब्रह्मा सामान्यसुरसंनिभम् ।
इच्छत्ययं मोहयितुमतोऽज्ञानविमोहितः ॥ ३ ९
न दद्याच्चेद्वरं वेदनीतिभ्रंष्टा भवेदिति ।
किं कुर्यां येन न विभुः क्रुद्धः स्यान्मे महेश्वरः ॥ ४०
ब्रह्मोवाच
विचार्येत्थं महेशं तं सस्मार मनसा शिवा ।
प्राप्यानुज्ञां शिवस्याथोवाच दुर्गा च मां तदा ॥ ४१
दुर्गोवाच
यदुक्तं भवता ब्रह्मन् समस्तं सत्यमेव तत् ।
मदृते मोहयित्रीह शंकरस्य न विद्यते ॥ ४२
हरेऽगृहीतदारे तु सृष्टिनैषा सनातनी ।
भविष्यतीति तत्सत्यं भवता प्रतिपादितम् ॥ ४३
ममापि मोहने यन्नो विद्यतेऽस्य महाप्रभोः ।
त्वद्वाक्याद् द्विगुणो मेऽद्य प्रयत्नोऽभूत्स निर्भरः ॥ ४४
अहं तथा यतिष्यामि यथा दारपरिग्रहम् ।
हरः करिष्यति विधे स्वयमेव विमोहितः ॥ ४५
सतीमूर्तिमहं धृत्वा तस्यैव वशवर्तिनी ।
भविष्यामि महाभागा लक्ष्मीर्विष्णोर्यथा प्रिया ॥ ४६
यथा सोऽपि मयैवेह वशवर्ती सदा भवेत् ।
तथा यत्नं करिष्यामि तस्यैव कृपया विधे ॥ ४७
उत्पन्ना दक्षजायायां सतीरूपेण शंकरम् ।
अहं सभाजयिष्यामि लीलया तं पितामह ॥ ४८
यथान्यजंतुरवनौ वर्तते वनितावशे ।
मद्भक्त्या स हरो वामावशवर्ती भविष्यति ॥ ४ ९
ब्रह्मोवाच
मह्यमित्थं समाभाष्य शिवा सा जगदम्बिका ।
वीक्ष्यमाणा मया तात तत्रैवांतर्दधे ततः ॥ ५०
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_13_2_Front सतीखण्ड ) ३५५ वे रुद्र ब्रह्मा तथा विष्णुके भी स्वामी हैं और किसी भी प्रकार शिवसे कम नहीं हैं । वे योगका आदर करनेवाले, मायासे रहित, मायापति तथा परसे भी परे हैं ॥ ३८ ॥
अज्ञानसे मोहित ये ब्रह्मा उन्हें अपना आत्मज तथा सामान्य देवता समझकर मोहित करना चाहते हैं ॥ ३ ९ ॥ यदि इन ब्रह्माको वरदान न दूँ, तो वेदकी नीति भ्रष्ट होती है । अब मैं क्या करूँ, जिससे प्रभु महेश्वर मेरे ऊपर क्रोधित न हों ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले- शिवाने इस प्रकार विचारकर मनसे महादेवजीका स्मरण किया । तत्पश्चात् शिवकी आज्ञा पाकर वे दुर्गा मुझसे कहने लगीं —॥४१ ॥
दुर्गा बोलीं- हे ब्रह्मन्! आपने जो भी कहा है, वह सब सत्य है, मुझे छोड़कर शंकरजीको मोहित करनेवाली कोई दूसरी स्त्री संसारमें नहीं है ॥ ४२ ॥
आपने जो कहा कि जबतक शंकरजी दारपरिग्रह नहीं करेंगे, तबतक सनातनी सृष्टि नहीं होगी, यह बात भी सत्य है ॥ ४३ ॥
मुझमें भी महाप्रभुको मोहित करनेकी सामर्थ्य नहीं है, किंतु अब आपके कहनेसे दुगुने उत्साहसे युक्त होकर मैं पूर्ण प्रयत्न करूँगी ॥४४ ॥
हे विधे! अब मैं वैसा उपाय करूँगी, जिससे शंकरजी मोहित होकर स्वयं स्त्री ग्रहण करेंगे ॥ ४५ ॥
जिस प्रकार महाभागा लक्ष्मीजी विष्णुप्रिया हैं, उसी प्रकार मैं भी सतीरूप धारणकर उनकी वशवर्तिनी [ प्रिया पत्नी ] बनूँगी ॥ ४६ ॥
वे भी जिस प्रकारसे मेरे वशवर्ती बने रहें, मैं भी उन्हींकी कृपासे वैसा ही यत्न करूँगी ॥४७ ॥
हे पितामह! मैं दक्षकी पत्नीके गर्भसे सतीरूपसे जन्म लेकर अपनी लीलाके द्वारा शिवजीको प्राप्त करूँगी ॥ ४८ ॥
जिस प्रकार संसारमें अन्य प्राणी स्त्रीके वशमें होते हैं, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे वे महादेवजी भी स्त्रीके वशवर्ती बने रहेंगे ॥ ४ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे तात! मुझसे इस प्रकार कहकर वे जगदम्बा शिवा मेरे देखते - देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥५० ॥
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३५६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ तस्यामन्तर्हितायां तु सोऽहं लोकपितामहः । उनके अन्तर्धान हो जानेपर मैं लोकपितामह ब्रह्मा वहाँ गया, जहाँ मेरे पुत्र थे और मैंने उनसे अगमं यत्र स्वसुतास्तेभ्यः सर्वमवर्णयम् ॥ ५१ कुछ वर्णन किया ॥ ५१ ॥ सब
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दुर्गास्तुतिब्रह्मवरप्राप्तिवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दुर्गास्तुति - ब्रह्मवरप्राप्तिवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः दक्षप्रजापतिका तपस्याके प्रभावसे शक्तिका नारद उवाच
ब्रह्मन् शंभुवर प्राज्ञ सम्यगुक्तं त्वयानघ ।
शिवाशिवचरित्रं च पावितं जन्म मे हितम् ॥ १
इदानीं वद दक्षस्तु तपः कृत्वा दृढव्रतः ।
कं वरं प्राप देव्यास्तु कथं सा दक्षजाभवत् ॥ २
ब्रह्मोवाच शृणु नारद धन्यस्त्वं मुनिभिर्भक्तितोऽखिलैः I यथा तेपे तपो दक्षो वरं प्राप च सुव्रतः ॥ ३
मदाज्ञप्तः सुधीर्दक्षः समाधाय महाधिपः ।
अयाद्यष्टुं च तां देवीं तत्कामो जगदंबिकाम् ॥ ४
क्षीरोदोत्तरतीरस्थां तां कृत्वा हृदयस्थिताम् ।
तपस्तप्तुं समारेभे द्रष्टुं प्रत्यक्षतोऽम्बिकाम् ॥ ५
दिव्यवर्षेण दक्षस्तु सहस्राणां त्रयं समाः ।
तपश्चचार नियतः संयतात्मा दृढव्रतः ॥ ६
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मारुताशी निराहारो जलाहारी च पर्णभुक् ।
एवं निनाय तं कालं चिन्तयन्तां जगन्मयीम् ॥ ७
दर्शन और उनसे रुद्रमोहनकी प्रार्थना करना नारदजी बोले - हे ब्रह्मन्! हे शिवभक्त! हे प्राज्ञ! हे निष्पाप! आपने शिवा तथा शिवके कल्याणकारी चरित्रका भलीभाँति वर्णन किया और मेरे जन्मको पवित्र कर दिया ॥१ ॥
अब आप यह बताइये कि व्रतमें दृढ़ता रखनेवाले दक्षने तप करके देवीसे कौन- -सा वर प्राप्त किया तथा वे शिवा किस प्रकार दक्षकन्याके रूपमें उत्पन्न हुईं? ॥२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! तुम इन मुनियोंके साथ शिवमें भक्ति रखनेके कारण अत्यन्त धन्य हो । उत्तम व्रतवाले दक्षने जिस प्रकार तपस्या की तथा वर प्राप्त किया, उसे सुनो ॥ ३ ॥
मेरी आज्ञा पाकर वे बुद्धिमान् महाराज दक्षप्रजापति उस कार्यकी सिद्धिकी इच्छासे चित्तको समाहितकर देवी जगदम्बाकी उपासनाके लिये गये और क्षीरसागरके उत्तरतटपर रहनेवाली उन जगदम्बिकाको हृदयमें धारण करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेहेतु तपस्या करने लगे ॥४-५ ॥ इन्द्रियोंको अपने वशमें करके दृढ़व्रती उन
दक्षने देवताओंके तीन हजार वर्षपर्यन्त नियमपूर्वक ।
तप किया ॥ ६ ॥
उन जगन्मयी शिवाका ध्यान करते हुए दक्ष कुछ दिन पत्ते खाकर, कुछ दिन जल पीकर, कुछ दिन निराहार रहकर तथा कुछ दिन वायु पीकर उस समयको व्यतीत किया ॥७ ॥
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अ ० १२ ] रुद्रसंहिता (
दुर्गाध्यानसमासक्तश्चिरं कालं तपोरतः ।
नियमैर्बहुभिर्देवीमाराधयति सुव्रतः ॥ ८
ततो यमादियुक्तस्य दक्षस्य मुनिसत्तम ।
जगदम्बां पूजयतः प्रत्यक्षमभवच्छिवा ॥ ९
ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा जगदम्बां जगन्मयीम् ।
कृतकृत्यमथात्मानं मेने दक्षः प्रजापतिः ॥ १०
सिंहस्थां कालिकां कृष्णां चारुवक्त्रां चतुर्भुजाम् ।
वरदाभयनीलाब्जखड्गहस्तां मनोहराम् ॥ ११
आरक्तनयनां चारुमुक्तकेशीं जगत्प्रसूम् ।
तुष्टाव वाग्भिश्चित्राभिः सुप्रणम्याथ सुप्रभाम् ॥ १२
दक्ष उवाच
जगदंब महामाये जगदीशे महेश्वरि ।
कृपां कृत्वा नमस्तेऽस्तु दर्शितं स्ववपुर्मम ॥ १३
प्रसीद भगवत्याद्ये प्रसीद शिवरूपिणि ।
प्रसीद भक्तवरदे जगन्माये नमोऽस्तु ते ॥ १४
ब्रह्मोवाच
इति स्तुता महेशानी दक्षेण प्रयतात्मना ।
उवाच दक्षं ज्ञात्वापि स्वयं तस्येप्सितं मुने ॥ १५
देव्युवाच
तुष्टाहं दक्ष भवतः सद्भक्त्या ह्यनया भृशम् ।
वरं वृष्णीष्व स्वाभीष्टं नादेयं विद्यते तव ॥ १६
ब्रह्मोवाच
जगदम्बावचः श्रुत्वा ततो दक्षः प्रजापतिः ।
सुप्रहृष्टतरः प्राह नामं नामं च तां शिवाम् ॥ १७
दक्ष उवाच
जगदम्ब महामाये यदि त्वं वरदा मम ।
मद्वचः शृणु सुप्रीत्या मम कामं प्रपूरय ॥ १८
मम स्वामी शिवो यो हि स जातो ब्रह्मणः सुतः ।
रुद्रनामा पूर्णरूपावतारः परमात्मनः ॥ १ ९
तवावतारो नो जातः का तत्पत्नी भवेदतः ।
तं मोहय महेशानमवतीर्य क्षितौ शिवे ॥ २०
सतीखण्ड ) ३५७ इस प्रकार वे सुव्रत दुर्गाके ध्यानमें संलग्न होकर बहुत समयतक तपस्या करते रहे और अनेक नियमोंसे देवीकी आराधना करते रहे । तब हे मुनिश्रेष्ठ! अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि यमोंसे युक्त होकर जगदम्बाकी पूजा करते हुए उन दक्षके सामने जगदम्बा शिवा प्रत्यक्ष हुईं ॥ ८ - ९ ॥ तब दक्ष प्रजापतिने उन जगन्मयी जगदम्बाको अपने सामने प्रत्यक्ष देखकर अपनेको कृत्यकृत्य समझा ॥ १० ॥
सिंहपर सवार, कृष्णवर्णवाली, सुन्दर मुखवाली, चार भुजाओंवाली, हाथोंमें वर - अभय - नीलकमल तथा खड्ग धारण की हुई, मनोहर, लाल नेत्रवाली, बिखरे हुए सुन्दर बालोंसे युक्त, जगत्की जन्मदात्री तथा सुन्दर कान्तिवाली उन कालिकाको प्रणामकर दक्ष प्रजापतिने [ अपनी ] विचित्र वाणीसे उनकी स्तुति की ॥ ११-१२ ॥ दक्ष बोले- हे जगदम्बे! हे महामाये! हे जगदीश्वरि! हे महेश्वरि! आपने कृपा करके मुझे अपने रूपका दर्शन दिया है, आपको मेरा नमस्कार है ॥ १३ ॥
हे भगवति! हे आद्ये! मुझपर प्रसन्न हों, हे शिवरूपिणि! प्रसन्न हों, हे भक्तवरदे! प्रसन्न हों, हे जगन्माये! आपको नमस्कार है ॥१४ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! संयत चित्तवाले दक्षने इस प्रकार महेश्वरीकी स्तुति की, तब उनके मनोरथको जानती हुई भी वे दक्षसे कहने लगीं —॥१५ ॥
देवी बोलीं- हे दक्ष! मैं आपकी इस भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है, अतः अपना अभीष्ट वर माँगिये ॥१६ ॥
ब्रह्माजी बोले – जगन्माताके इस वचनको सुनकर दक्ष प्रजापति अत्यन्त प्रसन्न होकर शिवाको बारंबार प्रणाम करते हुए कहने लगे -॥१७ ॥
दक्ष बोले — हे जगदम्ब! हे महामाये! यदि आप मुझे वर देना चाहती हैं, तो मेरे वचनोंको सुनिये और प्रसन्नतासे मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये ॥१८ ॥
जो मेरे स्वामी शिव हैं, वे रुद्रनामसे ब्रह्माके पुत्ररूपमें अवतरित हुए हैं, वे परमात्माके पूर्णावतार हैं, परंतु अभीतक आपका अवतार नहीं हुआ है, [ आपके अतिरिक्त ] उनकी पत्नी कौन हो सकती है? अतः हे शिवे! आप पृथ्वीपर अवतरित होकर उन्हें मोहित करें ॥ १ ९ -२० ॥
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३५८ त्वदृते तस्य मोहाय न शक्तान्या कदाचन तस्मान्मम सुता भूत्वा हरजाया भवाधुना इत्थं कृत्वा सुलीलां च भव त्वं हरमोहिनी ममैवैष वरो देवि सत्यमुक्तं तवाग्रतः
स्वार्थं न केवलं मेऽस्ति सर्वेषां जगतामपि ।
ब्रह्मविष्णुशिवानां च ब्रह्मणा प्रेरितो ह्यहम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य प्रजेशस्य वचनं जगदम्बिका ।
प्रत्युवाच विहस्येति स्मृत्वा तं मनसा शिवम् ॥
देव्युवाच
तात प्रजापते दक्ष शृणु मे परमं वचः ।
सत्यं ब्रवीमि त्वद्भक्त्या सुप्रसन्नाखिलप्रदा ॥
अहं तव सुता दक्ष त्वज्जायायां महेश्वरी ।
भविष्यामि न संदेहस्त्वद्भक्तिवशवर्तिनी ॥
तथा यत्नं करिष्यामि तपः कृत्वा सुदुःसहम् ।
हरजाया भविष्यामि तद्वरं प्राप्य चानघ ॥
नान्यथा कार्यसिद्धिर्हि निर्विकारी च स प्रभुः ।
विधेर्विष्णोश्च संसेव्यः पूर्ण एव सदाशिवः ॥
अहं तस्य सदा दासी प्रिया जन्मनि जन्मनि ।
मम स्वामी स वै शंभुर्नानारूपधरोऽपि ह ॥
वरप्रभावाद् भ्रुकुटेरवतीर्णो विधेः स च ।
अहं तद्वरतोऽपीहावतरिष्ये तदाज्ञया ॥
गच्छ स्वभवनं तात मया ज्ञाता तु दूतिका ।
हरजाया भविष्यामि भूत्वा ते तनयाचिरात् ॥
इत्युक्त्वा सद्वचो दक्षं शिवाज्ञां प्राप्य चेतसि ।
पुनः प्रोवाच सा देवी स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ । [ हे देवि! ] आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी ॥ २१ उन्हें मोहित नहीं कर सकती, इसलिये आप इस समय । मेरी कन्याके रूपमें जन्म लेकर शिवपत्नी बनें ॥ २१ ॥ । इस प्रकार उत्तम लीला करके आप शिवजीको ॥ २२ । मोहमें डालें, हे देवि! मेरा यही वर है, आपके सामने मैंने सत्य कह दिया ॥ २२ ॥
इसमें केवल मेरा ही स्वार्थ नहीं है, अपितु । २३ सम्पूर्ण लोकोंका और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवजीका भी स्वार्थ है । इसीलिये ऐसा करनेके लिये ब्रह्माजीने मुझे प्रेरित किया है ॥ २३ ॥
ब्रह्माजी बोले- दक्षके इस वचनको सुनकर जगदम्बा मनमें उन शिवजीका स्मरण करके हँसकर २४ कहने लगीं— ॥२४ ॥
देवी बोलीं- हे तात! हे प्रजापते! हे दक्ष! मेरी सत्य बात सुनिये । मैं आपकी भक्तिसे अत्यन्त २५ प्रसन्न होकर सब कुछ प्रदान करनेवाली हूँ । हे दक्ष!
मैं महेश्वरी आपकी पुत्री बनूँगी, इसमें सन्देह नहीं ।
२६ मैं आपकी भक्तिके वशमें हो गयी हूँ ॥ २५-२६ ॥
हे अनघ! मैं अत्यन्त कठोर तप करके ऐसा २७ प्रयत्न करूँगी, जिससे शिवजीसे वरको प्राप्तकर उनकी पत्नी बन जाऊँ ॥ २७ ॥
वे प्रभु सदाशिव ब्रह्मा तथा विष्णुके सेव्य, २८ विकाररहित तथा पूर्ण हैं । अतः बिना तपके इस प्रकारकी कार्यसिद्धि नहीं हो सकती है ॥ २८ ॥
मैं तो प्रत्येक जन्ममें उनकी प्रिय दासी हूँ और २ ९ अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले वे सदाशिव मेरे स्वामी हैं ॥२ ९ ॥ वे वरके प्रभावसे ब्रह्माजीकी भृकुटिसे अवतीर्ण ३० हुए हैं और मैं भी उन्हींकी आज्ञासे ब्रह्माजीके वरदानसे इस लोकमें अवतार लूँगी ॥३० ॥
हे तात! अब आप अपने घर जाइये 1 । मैंने अपनी ३१ दूतीको सारी बात बता दी है । मैं [ कुछ ही दिनोंमें ] | आपकी कन्या बनकर शीघ्र ही शिवकी पत्नी बनूँगी ॥ ३१ ॥
और इस प्रकार दक्षप्रजापतिसे श्रेष्ठ वचन कहकर | मनमें शिवकी आज्ञा पाकर वे शिवजीके चरणकमलोंका ३२ । ध्यान करके पुनः कहने लगीं— ॥ ३२ ॥