श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 411–420
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
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अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३ ९९ ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचो मे हि स्वात्मसर्वसुखावहम् ।
तथास्त्विति शिवः प्राह सुप्रसन्नेन चेतसा ॥
शिव उवाच
हिताय सर्वलोकस्य वेद्यां तस्यां व्यवस्थितः ।
स्थास्यामि सहितः पत्न्या सत्या त्वद्वचनाद्विधे ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा भगवांस्तत्र सभार्यो वृषभध्वजः ।
उवाच वेदिमध्यस्थो मूर्तिं कृत्वांशरूपिणीम् ॥
ततो दक्षं समामंत्र्य शंकरः परमेश्वरः ।
पल्या सत्या गन्तुमना अभूत्स्वजनवत्सलः ॥
एतस्मिन्नन्तरे दक्षो विनयावनतः सुधीः ।
साञ्जलिर्नतकः प्रीत्या तुष्टाव वृषभध्वजम् ॥
विष्ण्वादयः सुराः सर्वे मुनयश्च गणास्तदा ।
नत्वा संस्तूय विविधं चक्रुर्जयरवं मुदा ॥
आरोप्य वृषभे शंभुः सतीं दक्षाज्ञया मुदा ।
जगाम हिमवत्प्रस्थं वृषभस्थः स्वयं प्रभुः ॥
अथ सा शंकराभ्याशे सुदती चारुहासिनी ।
विरेजे वृषभस्था वै चन्द्रान्ते कालिका यथा ॥
विष्ण्वादयः सुराः सर्वे मरीच्याद्यास्तथर्षयः ।
दक्षोऽपि मोहितश्चासीत्तथान्ये निश्चला जनाः ॥
केचिद्वाद्यान्वादयन्तो गायन्तः सुस्वरं परे ।
शिवं शिवयशः शुद्धमनुजग्मुः शिवं मुदा ॥
मध्यमार्गाद्विसृष्टो हि दक्षः प्रीत्याथ शम्भुना । स्वधाम प्राप सगणः शम्भुः प्रेमसमाकुलः ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार अपने तथा सम्पूर्ण लोगोंको सुख देनेवाले मुझ ब्रह्माका वचन सुनकर ४१ प्रसन्न मनसे भगवान् शंकरने ' तथास्तु ' कहा ॥ ४१ ॥
शिवजी बोले- हे ब्रह्मन्! आपके कथनानुसार मैं सारे संसारके हितके लिये अपनी पत्नीसहित इस ४२ वेदीपर सुस्थिरभावसे स्थित रहूँगा ॥४२ ॥
ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर पत्नीसहित भगवान् शिवजी अपनी अंशरूपिणी मूर्तिको प्रकटकर वेदीके मध्यभागमें विराजमान हो गये । तत्पश्चात् ४३ स्वजनोंपर स्नेह रखनेवाले भगवान् सदाशिव दक्षसे विदा ले अपनी पत्नी सतीके साथ [ कैलास ] जानेको ४४ उद्यत हुए ॥ ४३-४४ ॥ उस समय उत्तम बुद्धिवाले दक्षने विनयभावसे ४५ मस्तक झुकाकर हाथ जोड़ भगवान् वृषभध्वजकी प्रेम - पूर्वक स्तुति की । तत्पश्चात् विष्णु आदि समस्त देवताओं, मुनियों तथा गणोंने स्तुति और ४६ नमस्कारकर प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारसे जय-जयकार किया ॥ ४५-४६ ॥ उसके बाद दक्षकी आज्ञा प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक ४७ सदाशिवने अपनी पत्नी सतीको वृषभपर बिठाकर और स्वयं भी वृषभपर आरूढ़ हो हिमालयके शिखरकी ओर गमन किया ॥ ४७ ॥
मन्द - मन्द मधुर मुसकानवाली तथा सुन्दर ४८ दाँतोंवाली सती शंकरजीके साथ वृषभपर बैठी हुई चन्द्रमामें विद्यमान श्यामकान्तिकी तरह शोभायमान हो रही थीं ॥ ४८ ॥
उस समय विष्णु आदि सम्पूर्ण देवता, मरीचि ४ ९ | आदि समस्त ऋषि एवं दक्ष प्रजापति भी मोहित हो | गये तथा अन्य सभी लोग चित्रलिखित - से प्रतीत हो रहे थे ॥४ ९ ॥ कुछ लोग बाजे बजाते हुए तथा कुछ लोग ५० सुन्दर स्वरमें शुद्ध तथा कल्याणकारी शिवयशका गान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक शिवजीका अनुगमन करने लगे ॥५० ॥
[ कुछ दूर चले जानेके पश्चात् ] शिवजीने आधे मार्गसे दक्षको प्रेमपूर्वक लौटा दिया, फिर सदाशिव गणों-॥ ५१ सहित प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले आये ॥ ५१
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४०० विसृष्टा अपि विष्ण्वाद्याः शम्भुना पुनरेव ते अनुजग्मुः शिवं भक्त्या सुराः परमया मुदा तैः सर्वैः सगणैः शंभुः सत्या च स्वस्त्रिया युतः प्राप स्वं धाम संहृष्टो हिमवद् गिरिशोभितम्
तत्र गत्वाखिलान्देवान्मुनीनपि परांस्तथा ।
मुदा विसर्जयामास बहु सम्मान्य सादरम् ॥
शंभुमाभाष्य ते सर्वे विष्ण्वाद्या मुदिताननाः ।
स्वं स्वं धाम ययुर्नत्वा स्तुत्वा च मुनयः सुराः ॥
शिवोऽपि मुदितोऽत्यर्थं स्वपल्या दक्षकन्यया ।
हिमवत्प्रस्थसंस्थो हि विजहार भवानुगः ॥
ततः स शंकरः सत्या सगणः सूतिकृन्मुने ।
प्राप स्वं धाम संहृष्टः कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥
एतद् वः सर्वमाख्यातं यथा तस्य पुराभवत् ।
विवाहो वृषयानस्य मनुस्वायंभुवान्तरे ॥
विवाहसमये यज्ञे प्रारंभे वा शृणोति यः ।
एतदाख्यानमव्यग्रः संपूज्य वृषभध्वजम् ॥
तस्याविघ्नं भवेत्सर्वं कर्म वैवाहिकं च यत् ।
शुभाख्यमपरं कर्म निर्विघ्नं सर्वदा भवेत् ॥
कन्या च सुखसौभाग्यशीलाचारगुणान्विता ।
साध्वी स्यात्पुत्रिणी प्रीत्या श्रुत्वाख्यानमिदं शुभम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० । शिवजीने विष्णु आदि सभी देवताओंको विदा ॥ ५२ भी कर दिया, फिर भी वे लोग परम भक्ति एवं प्रेमके वशीभूत हो शिवजीके साथ - साथ कैलासपर पहुँच गये ॥५२ ॥
। उन सभी देवताओं, गणों तथा अपनी स्त्री ॥ ५३ सतीके साथ भगवान् शम्भु प्रसन्न होकर हिमालय पर्वतपर सुशोभित अपने धाममें पहुँच गये ॥ ५३ ॥
वहाँ जाकर सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों तथा ५४ अन्य लोगोंका आदरपूर्वक बहुत सम्मान करके प्रसन्नतापूर्वक शिवजीने उन्हें विदा किया ॥५४ ॥
तदनन्तर शम्भुकी आज्ञासे विष्णु आदि सब ५५ देवता तथा मुनिगण नमस्कार और स्तुति करके प्रसन्नमुख होकर अपने - अपने धामको चले गये ॥५५ ॥
लोकरीतिका अनुगमन करनेवाले शिवजी भी ५६ अत्यन्त आनन्दित हो हिमालयके शिखरपर अपनी पत्नी दक्षकन्याके साथ विहार करने लगे ॥ ५६ ॥
हे मुने! इस प्रकार सृष्टि करनेवाले वे शंकर ५७ सती तथा अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक पर्वतोंमें उत्तम अपने स्थान कैलासपर चले गये ॥५७ ॥
हे मुने! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान् ५८ शिवजीका विवाह जिस प्रकार हुआ, उसका वर्णन मैंने आपलोगोंसे किया ॥ ५८ ॥
हे मुने! जो विवाहकालमें, यज्ञमें अथवा किसी ५ ९ भी शुभकार्यके आरम्भमें भगवान् शंकरकी पूजा करके शान्तचित्त होकर इस कथाको सुनता है, उसका सारा वैवाहिक कर्म बिना किसी विघ्न - बाधाके ६० पूर्ण हो जाता है तथा दूसरे शुभ कर्म भी सदा निर्विघ्न पूर्ण होते हैं ॥५ ९ -६० ॥ इस उत्तम कथाको प्रेमपूर्वक सुनकर कन्या सुख, सौभाग्य, सुशीलता, आचार तथा गुणोंसे युक्त ६१ । हो पतिव्रता तथा पुत्रवती होती है ॥ ६१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीविवाहवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीविवाहवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
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अ ० २१ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४०१ अथैकविंशोऽध्यायः कैलास पर्वतपर भगवान् नारद उवाच
समीचीनं वचस्तात सर्वज्ञस्य तवानघ ।
महाद्भुतं श्रुतं नो वै चरितं शिवयोः शुभम् ॥
विवाहश्च श्रुतः सम्यक् सर्वमोहापहारकः ।
परमज्ञानसंपन्नो मङ्गलालय उत्तमः ॥
भूय एव विवित्सा मे चरितं शिवयोः शुभम् ।
तद्वर्णय महाप्राज्ञ कृपां कृत्वातुलामरम् ॥
ब्रह्मोवाच
सम्यक्कारुणिकस्यैव मुने ते विचिकित्सितम् ।
यदहं नोदितः सौम्य शिवलीलानुवर्णने ॥
विवाह्य दक्षजां देवीं सतीं त्रैलोक्यमातरम् । गत्वा स्वधाम सुप्रीत्या यदकार्षीन्निबोध मे ।
ततो हरः स सगणः स्वस्थानं प्राप्य मोदनम् ।
देवर्षे तत्र वृषभादवातरदतिप्रियात् ॥
यथायोग्यं निजस्थानं प्रविश्य स सतीसखः ।
मुमुदेऽतीव देवर्षे भवाचारकरः शिवः ॥
ततो विरूपाक्ष इमां प्राप्य दाक्षायणीं गणान् ।
स्वीयान्निर्यापयामास नंद्यादीन् गिरिकंदरात् ॥
उवाच चैतांस्तान् सर्वान्नंद्यादीनतिसूनृतम् ।
लौकिकीं रीतिमाश्रित्य करुणासागरः प्रभुः ॥
महेश उवाच
यदाहं च स्मराम्यत्र स्मरणादरमानसाः ।
समागमिष्यथ तदा मत्पार्श्वं मे गणा द्रुतम् ॥
शिव एवं सतीकी मधुर लीलाएँ नारदजी बोले - हे तात! हे अनघ! आप सर्वज्ञकी बात ठीक है । आपके द्वारा मैंने शिवाशिवके १ अत्यन्त अद्भुत एवं कल्याणकारी चरित्रको सुना ॥ १ ॥
समस्त मोहोंको दूर करनेवाले, परम ज्ञानसम्पन्न, मंगलायन तथा उत्तम विवाहकर्मका वर्णन भी अच्छी २ प्रकारसे सुना ॥२ ॥
हे महाप्राज्ञ! फिर भी शिवजी एवं सतीके ३ अत्यन्त मनोहर एवं उत्तम चरित्रको सुननेकी प्रबल इच्छा है । अतः आप मुझपर दया करके पुनः उसका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! आपकी इच्छा परम दयावान् शिवजीकी लीला सुननेमें लगी हुई है । यह ४ तो परम सौभाग्यकी बात है, हे सौम्य! जो आपने मुझे शिवजीकी लीलाका वर्णन करनेके लिये बार - बार प्रेरित किया है ॥४ ॥
हे नारद! शिवजीने दक्ष प्रजापतिकी कन्या एवं ५ जगज्जननी देवी सतीके साथ विवाहकर उन्हें अपने स्थानपर ले जाकर जो कुछ भी किया, उसे अब सुनें ॥ ५ ॥
हे देवर्षे! दक्षसे विदा होनेके बाद महादेवजी ६ गणोंसहित अपने आनन्ददायक स्थानपर जाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने परमप्रिय वाहन नन्दीश्वरसे उतरे ॥ ६ ॥
हे देवर्षे! इस प्रकार सांसारिक लीला करनेमें ७ प्रवीण सतीपति सदाशिव यथायोग्य अपने स्थानमें प्रवेशकर अत्यन्त हर्षित हुए ॥७ ॥
इन महादेवजीने सतीको प्राप्त कर लेनेके ८ उपरान्त अपने नन्दी आदि समस्त गणोंको पर्वतकी कन्दरासे बाहर भेज दिया ॥ ८ ॥
विदा करते हुए उन नन्दीश्वर आदि समस्त ९ गणोंसे करुणासागर शिवजी लौकिक रीतिका अनुसरण करते हुए मधुर वचनोंसे कहने लगे — ॥९ ॥
महेश बोले- हे गणो! जिस समय मैं आपलोगोंका स्मरण करूँ, तब आपलोग मेरे स्मरणका १० आदर करते हुए शीघ्र मेरे पास चले आइये ॥१० ॥
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४०२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१ इत्युक्ते वामदेवेन नंद्याद्याः स्वगणाश्च ते । शिवजीके ऐसा कहनेपर महावेगवान् महावीर महावेगा महावीरा नानास्थानेषु संययुः ॥ ११ नन्दी आदि वे सभी गण अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ११ ॥
ईश्वरोऽपि तया सार्धं तेषु यातेषु विभ्रमी । उन गणोंके चले जानेके अनन्तर परम कौतुकी दाक्षायण्या समं रेमे रहस्ये मुदितो भृशम् ॥ १२ शिवजी बड़ी प्रसन्नतापूर्वक एकान्तमें सतीके साथ
कदाचिद्वन्यपुष्पाणि समाहृत्य मनोहराम् ।
मालां विधाय सत्यास्तु हारस्थाने स योजयत् ॥
कदाचिद्दर्पणे चैव वीक्षन्तीमात्मनः सतीम् ।
अनुगम्य हरो वक्त्रं स्वीयमप्यवलोकयत् ॥
कदाचित्कुंडलं तस्या उल्लास्योल्लास्य सङ्गतः ।
बध्नाति मोचयत्येव सा स्वयं मार्जयत्यपि ॥
सरागौ चरणावस्याः यावकेनोज्ज्वलेन च ।
निसर्गरक्तौ कुरुते पूर्णरागौ वृषध्वजः ॥
उच्चैरपि यदाख्येयमन्येषां पुरतो बहु ।
तत् कर्णे कथयत्यस्या हरो द्रष्टुं तदाननम् ॥
न दूरमपि गन्तासौ समागत्य प्रयत्नतः ।
अनुबध्नाति नामाक्षी पृष्ठदेशेऽन्यमानसाम् ॥
अन्तर्हितस्तु तत्रैव मायया वृषभध्वजः ।
तामालिलिङ्ग भीत्या स्वं चकिता व्याकुलाभवत् ॥
सौवर्णपद्मकलिकातुल्ये तस्याः कुचद्वये ।
चकार भ्रमराकारं मृगनाभिविशेषकम् ॥
हारमस्याः कुचयुगाद्वियोज्य सहसा हरः ।
न्ययोजयच्च तत्रैव स्वकरस्पर्शनं मुहुः ॥
अङ्गदान्वलयानूर्मान्विश्लेष्य च पुनः पुनः ।
तत्स्थानात्पुनरेवासौ तत्स्थाने प्रत्ययोजयत् ॥
विहार करने लगे ॥१२ ॥
शिवजी कभी वनोंसे तोड़कर लाये हुए पुष्पोंकी १३ मनोहर माला बनाकर सतीके हार - स्थान अर्थात् हृदयमें पहनाते थे ॥१३ ॥
कभी - कभी जब देवी सती अपना मुख दर्पणमें १४ | देख रही होती थीं, उस समय शिवजी भी सतीके पीछे जाकर अपना मुख देखने लगते थे ॥१४ ॥
वे कभी सतीके कुण्डलोंको बार - बार पकड़कर १५ हिलाने लगते थे, उन्हें सतीके कानोंमें पहनाते और फिर निकालने लगते थे ॥ १५ ॥
कभी वे भगवान् शंकर स्वभावतः लालवर्णवाले १६ सतीके चरणोंको देदीप्यमान लाक्षारससे रँगकर अत्यधिक रागयुक्त कर देते थे ॥१६ ॥
सतीका मुखावलोकन करनेके उद्देश्यसे जो बात १७ दूसरोंके समक्ष भी कही जा सकती थी, उसे सतीके कानोंमें कहते थे ॥१७ ॥
वे कभी घरसे दूर नहीं जाते थे, यदि दूर जाते १८ भी तो शीघ्रतासे वापस आ जाते थे और किसी बातको सोचती हुई सतीके नेत्रोंको पीछेसे आकर अपने हाथोंसे बन्द कर लेते थे ॥ १८ ॥
कभी वे अपनी मायासे छिपकर वहीं जाकर १ ९ सतीका आलिंगन करते तो वे भयभीत होकर अत्यन्त चकित होते हुए व्याकुल हो जाती थीं ॥१ ९ ॥ वे कभी सुवर्णकमलकी कलीके समान २० उनके वक्षःस्थलपर कस्तूरीसे भ्रमरके आकारकी चित्रकारी करते थे और कभी उनका हार उतार लेते २१ थे और फिर उसे वहीं स्थापित भी कर देते थे । कभी सतीके अंगसे बाजूबंद, कंकण तथा अँगूठी बार - बार | निकालकर उसे पुन: उसी स्थानपर पहना दिया करते २२ | थे ॥ २०–२२ ॥
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अ ० २१ ] रुद्रसंहिता (
कालिकेति समायाति सवर्णा ते सखी त्विमाम् ।
यास्यत्वस्यास्तथेक्षन्त्याः प्रोत्तुङ्गौ साहसं कुचौ ॥ २३
कदाचिन्मदनोन्मादचेतनः प्रमथाधिपः ।
चकार नर्म शर्माणि तथाकृत्प्रियया मुदा ॥ २४
आहृत्य पद्मपुष्पाणि रम्यपुष्पाणि शंकरः ।
सर्वाङ्गेषु करोति स्म पुष्पाभरणमादरात् ॥ २५
गिरिकुंजेषु रम्येषु सत्या सह महेश्वरः ।
विजहार समस्तेषु प्रियया भक्तवत्सलः ॥ २६
तया विना स्म नो याति नास्थितो न स्म चेष्टते ।
तया विना क्षणमपि शर्म लेभे न शंकरः ॥ २७
विहृत्य सुचिरं कालं कैलासगिरिकुंजरे ।
अगमद्धिमवत्प्रस्थं सस्मार स्वेच्छया स्मरम् ॥ २८
तस्मिन्प्रविष्टे कामे तु वसंतः शंकरांतिके ।
वितस्तार निजं भावं हार्दं विज्ञाय यत्प्रभोः ॥ २ ९
सर्वे च पुष्पिता वृक्षा लताश्चान्याश्च पुष्पिताः ।
अंभांसि फुल्लपद्मानि पद्माः सभ्रमरास्तथा ॥ ३०
प्रविष्टे सदृतौ तत्र ववौ स मलयो मरुत् ।
सुगंधिगंधपुष्पेण मोदकश्च सुगंधियुक् ॥ ३१
संध्यार्धचन्द्रसंकाशाः पलाशाश्च विरेजिरे ।
कामास्त्रवत्सुमनसः प्रमोदात्पादपाधरः ॥ ३२
बभुः पंकजपुष्पाणि सरस्सु सकलाञ्जनान् ।
संमोहयितुमुद्युक्ता सुमुखी वायुदेवता ॥ ३३
सतीखण्ड ) ४०३ यह तुम्हारे ही समान स्वरूपवाली तुम्हारी कालिका नामकी सखी आ रही है — शिवजीद्वारा इस प्रकारके वचनोंको सुनकर जब सती उस सखीको देखनेके लिये चलतीं, तो शिवजी उनका स्पर्श करने लगते ॥ २३ ॥
कभी प्रमथाधिपति शिव कामके उन्मादसे व्यग्र होकर अपनी प्रियाके साथ कामकेलि - परिहास करने लगते थे ॥२४ ॥
कभी शंकरजी कमलपुष्पों तथा अन्य मनोहर पुष्पोंको लाकर बड़े प्रेमसे उनका आभूषण बनाकर सतीके अंगोंमें पहनाते थे ॥ २५ ॥
इस प्रकार भक्तवत्सल महेश्वर समस्त रमणीय वनकुंजोंमें सतीके साथ विहार करने लगे ॥ २६ ॥
देवी सतीके बिना शिवजी कहीं भी नहीं जाते थे, न बैठते थे और न ही किसी प्रकारकी चेष्टा ही करते थे । सतीके बिना उन्हें क्षणमात्र भी चैन नहीं पड़ता था ॥२७ ॥
इस प्रकार कैलासपर्वतके प्रत्येक वनकुंजमें बहुत समयतक विहार करनेके पश्चात् वे पुनः हिमालयके शिखरपर गये और उन्होंने अपनी इच्छासे कामदेवका स्मरण किया ॥ २८ ॥
जिस समय काम उनके आश्रममें प्रविष्ट हुआ, उसके साथ ही वसन्तने भी शिवजीके अभिप्रायको जानकर अपना प्रभाव प्रकट किया ॥ २ ९ ॥ उस पर्वतके सभी वृक्ष तथा लताएँ पुष्पसे आच्छादित हो उठीं और जल खिले कमलोंसे तथा कमल भ्रमरोंसे युक्त हो गये ॥३० ॥
उस समय उत्तम ऋतु वसन्तके प्रविष्ट होते ही सुगन्धित पुष्पोंकी गन्धसे समन्वित आनन्ददायक तथा सुगन्धिसे युक्त मलय पवन बहने लगा ॥३१ ॥
सन्ध्याकालीन अरुण चन्द्रमाके सदृश पलाश शोभायमान होने लगे । सभी वृक्ष कामके अस्त्रके समान सुन्दर पुष्पोंसे अलंकृत हो गये ॥३२ ॥
तड़ागोंमें कमलपुष्प खिल उठे । अनुकूल वायु संसारके मनुष्योंको मोहित करनेहेतु उद्यत दिखायी पड़ने लगी ॥ ३३ ॥
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४०४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१
नागकेशरवृक्षाश्च स्वर्णवर्णैः प्रसूनकैः ।
बभुर्मदनकेत्वाभा मनोज्ञाः शंकरान्तिके ॥ ३४
लवङ्गवल्ली सुरभिगंधेनोद्वास्य मारुतम् ।
मोहयामास चेतांसि भृशं कामिजने पुरा ॥ ३५
चारुचर्चितभृङ्गौघाः सुस्वराश्चूतशालिनः ।
बभुर्मदनबाणौघपर्यंकमदनावृताः ॥ ३६
अंभांसि मलहीनानि रेजुः फुल्लकुशाशयाः ।
मुनीनामिव चेतांसि प्रव्यक्तज्योतिरुद्गमम् ॥ ३७
तुषाराः सूर्यरश्मीनां सङ्गमादगमन् बहिः ।
प्रमत्वानीक्ष्यतेक्षाश्च सलिलीहृदयास्तदा ॥ ३८
प्रसन्नाः सह चन्द्रेण निर्नीशारास्तदाऽभवन् ।
विभावर्यः प्रियेणैवं कामिन्यः सुमनोहराः ॥ ३ ९
तस्मिन्काले महादेवः सह सत्या धरोत्तमे ।
रेमे स सुचिरं छन्दं निकुंजेषु नदीषु च ॥ ४०
तथा तेन समं रेजे तदा दाक्षायणी मुने ।
यथा हरः क्षणमपि शांतिमाप तया विना ॥ ४१
संभोगविषये देवी सती तस्य मनःप्रिया ।
विशतीव हरस्याङ्गे पाययन्निव तद्रसम् ॥४२
तस्याः कुसुममालाभिर्भूषयन्सकलां तनुम् ।
स्वहस्तरचिताभिस्तु नवशर्माकरोच्च सः ॥ ४३
आलापैर्वीक्षितैर्हास्यैस्तथा संभाषणैर्हरः ।
तस्यादिदेश गिरिजां शंसतीवात्मसंविदम् ॥ ४४
तद्वक्त्रचंद्रपीयूषपानस्थिरतनुर्हरः नानावैशेषिकीं तन्वीमवस्थां स कदाचन ॥ ४५ |
तद्वक्त्राम्बुजवासेन तत्सौन्दय्यैश्च नर्मभिः । ।
गुणैरिव महादन्ती बद्धो नान्यविचेष्टितः ॥ ४६
भगवान् शंकरके समीप नागकेसरके वृक्ष अपने सुवर्णके समान पुष्पोंसे कामदेवकी ध्वजाके सम मनोहर प्रतीत होने लगे ॥३४ ॥
लवंगकी लता अपनी सुरभित गन्धसे वायुको सुवासित करके कामीजनोंके चित्तको मोहित करने लगी ॥ ३५ ॥
मँडरानेवाले तथा आम्रमंजरियोंमें गुंजार करनेवाले भौंरोंके सुन्दर समूह कामदेवके बाणोंके समान तथा कामसे व्याप्त मदनके पर्यंक जैसे प्रतीत हो रहे थे ॥ ३६ ॥
ज्ञानरूपी प्रकाशको प्राप्तकर जिस प्रकार मुनियोंका मन प्रफुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार खिले हुए कमलपुष्पोंसे युक्त निर्मल जल शोभा पा रहे थे ॥ ३७ ॥
सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कके कारण बर्फ पिघलकर बहने लगी । जल ही जिनका हृदय है, ऐसे कमल जलके बीच स्पष्टरूपसे दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३८ ॥
रात्रिवेलामें तुषाररहित रात्रियाँ चन्द्रमासे युक्त होनेके कारण प्रियतमके साथ सुशोभित होनेवाली स्त्रियों - जैसी प्रतीत हो रही थीं ॥ ३ ९ ॥ ऐसे मनोहारी वसन्तकालमें महादेवजी सतीके साथ पर्वतकुंजों एवं नदियोंमें बहुत कालतक स्वच्छन्दतासे रमण करने लगे और हे मुने! उस समय दक्षकन्या देवी सती भी महादेवजीके साथ शोभाको प्राप्त हुईं । शिवजीको सतीके बिना क्षणमात्र भी शान्ति नहीं मिलती थी । शिवजीकी प्रिया सती भी उन्हें रसका पान कराती हुई प्रतीत हो रही थीं ॥ ४०-४२ ॥ शंकरजी खिले हुए नवीन पुष्पोंकी अपने हाथसे माला बनाकर सतीके अंगोंको सुशोभित करते हुए नये - नये मंगल कर रहे थे ॥४३ ॥
आलाप, अवलोकन, हास्य और परस्पर सम्भाषण आदिके द्वारा वे शम्भु कभी उन गिरिजाको स्वयं सौतके रूपमें भी दिखा देते थे ॥४४ ॥
उन सतीके चन्द्रमुखका अमृतपान करनेमें सन्नद्ध शरीरवाले शिव अपने शरीरकी अनेक अवस्थाएँ कभी - कभी दिखाने लगते थे ॥ ४५ ॥
वे शिवजी सतीके मुखकमलकी सुगन्धि, उनक मनोहारी सुन्दरता तथा प्रीतिपूर्ण चेष्टाओंमें इस प्रकार बँध गये थे, जैसे कोई बँधा हुआ हाथी किसी भी प्रकारकी चेष्टा करनेमें अपनेको असमर्थ पाता है ॥ ४६ ॥
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अ ० २२ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४०५ इति हिमगिरिकुंजप्रस्थभागे दरीषु इस प्रकार वे महेश्वर हिमालयपर्वतके प्रतिदिनमभिरेमे दक्षपुत्र्या महेशः । कुंजों, शिखरोंपर और गुफाओंमें सतीके साथ प्रतिदिन क्रतुभुजपरिमाणैः क्रीडतस्तस्य जाता रमण करने लगे । हे सुरर्षे! इस प्रकार उनके विहार करते हुए देवताओंके वर्षके अनुसार पचीस वर्ष दश दश च सुरर्षे वत्सराः पञ्च चान्ये ॥ ४७ व्यतीत हो गये ॥४७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीशिवक्रीडावर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीशिवक्रीड़ावर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः सती और ब्रह्मोवाच कदाचिदथ दक्षस्य तनया जलदागमे कैलासक्ष्माभृतः प्राह प्रस्थस्थं वृषभध्वजम् ॥ सत्युवाच देवदेव महादेव शंभो मत्प्राणवल्लभ शृणु मे वचनं नाथ श्रुत्वा तत्कुरु मानद घनागमोऽयं संप्राप्तः कालः परमदुःसहः अनेकवर्णमेघौघाः सङ्गीतांबरदिक्चयाः विवान्ति वाता हृदयं हारयंतीति वेगिनः कदंबरजसा धौताः पाथोबिन्दुविकर्षणाः मेघानां गर्जितैरुच्चैर्धारासारं विमुञ्चताम् विद्युत्पताकिनां तीव्रैः क्षुब्धं स्यात्कस्य नो मनः न सूर्यो दृश्यते नापि मेघच्छन्नो निशापतिः दिवापि रात्रिवद्भाति विरहिव्यसनाकरः मेघा नैकत्र तिष्ठन्तो ध्वनन्तः पवनेरिताः पतन्त इव लोकानां दृश्यन्ते मूर्धिन शंकर शिवका विहार - वर्णन ब्रह्माजी बोले- किसी समय वर्षाऋतुमें जब । श्रीमहादेवजी कैलासपर्वतके शिखरपर विराजमान थे, १ उस समय सती शिवजीसे कहने लगीं —॥१ ॥
सती बोलीं- हे देवदेव! हे महादेव! हे । शम्भो! हे मेरे प्राणवल्लभ! हे नाथ! मेरे वचनको ॥ २ सुनिये और हे मानद! सुन करके उसे कीजिये ॥२ ॥
हे नाथ! यह परम कष्टदायक वर्षाकाल आ । गया है तथा अनेक वर्णके मेघोंके गर्जनसे आकाश ॥ ३ तथा दिशाएँ व्याप्त हो गयी हैं ॥३ ॥
। कदम्बके परागसे समन्वित, जलबिन्दुओंको ॥ ४ लेकर बहनेवाली मनोहारिणी तथा तीव्रगतिवाली वायु प्रवाहित हो रही है ॥४ ॥
। इस वर्षाकालमें जलसमूहकी धाराओंसे वृष्टि ॥ ५ करते हुए तथा चमकती हुई बिजलीकी पताकावाले इन मेघोंकी गर्जनाके कारण किसका मन विक्षुब्ध नहीं हो जाता ॥ ५ ॥
। विरहीजनोंको दुःखदायी कर देनेवाला यह ॥ ६ वर्षाकाल महाभयानक है । इस समय आकाशके मेघाच्छन्न होनेके कारण दिनमें न तो सूर्यका दर्शन हो पा रहा है और न तो रात्रिमें चन्द्रमा ही दिखायी पड़ता है । [ इस कालमें ] दिन भी रात्रिके समान ही प्रतीत हो रहा है ॥ ६ ॥
प्रचण्ड वायुके झोंकोंके कारण मेघ शब्द करते हुए आकाशमें कहीं भी स्थिर नहीं हो पा रहे हैं । हे । शंकर! ये मेघ ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, जैसे स अ अभी ॥ ७ लोगोंके सिरपर गिर जायँगे ॥ ७ ॥
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४०६ वाताहता महावृक्षा नर्तन्त इव चांबरे दृश्यन्ते हर भीरूणां त्रासदाः कामुकेप्सिताः स्निग्धनीलाञ्जनस्याशु सदिवौघस्य पृष्ठतः बलाकराजीवात्युच्चैर्यमुनापृष्ठफेनवत् क्षपायामीश वलयो दृश्यन्ते करभाश्रिताः अंबुधाविव संदीप्तपावको वडवामुखः प्रारोहंतीह सस्यानि मन्दरे प्राङ्गणेष्वपि किमन्यत्र विरूपाक्ष सस्योद्भूतिं वदाम्यहम् श्यामलै राजतै रक्तैर्विशदोऽयं हिमाचलः मंदराश्रयमेघौघः पत्रैर्दुग्धाम्बुधिर्यथा असमश्रीश्च कुटिलं भेजे यस्याथ किंशुकान् उच्चावचान् कलौ लक्ष्मीर्गन्ता संत्यज्य सज्जनान्
मंदराचलमेघानां शब्देन हृषिता मुहुः ।
केकायंते प्रतिवने सततं पृष्ठसूचकम् ॥
मेघोत्सुकानां मधुरश्चातकानां मनोहरः ।
धारासारशरैस्तापं पेतुः प्रतिपथोद्गतम् ॥
मेघानां पश्य मद्देहे दुर्नयं करकोत्करैः ।
ये छादयन्त्यनुगते मयूरांश्चातकांस्तथा ॥
शिखिसारंगयोर्दृष्ट्वा मित्रादपि पराभवम् ।
हर्षं गच्छन्ति गिरिश विदूरमपि मानसम् ॥
एतस्मिन्विषमे काले नीडं काकाश्चकोरकाः ।
कुर्वन्ति त्वां विना गेहान् कथं शांतिमवाप्स्यसि ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ | हे शंकर! हवाके वेगसे ये बड़े - बड़े ॥ ८ आकाशमें नाचते हुए - से प्रतीत हो रहे हैं । वृक्ष | कामीजनोंके लिये सुख देनेवाले तथा भीरुजनोंको भयभीत करनेवाले हैं ॥ ८ ॥
। काले तथा चिकने बादलोंवाले आकाशके ऊपर ॥ ९ उड़ती हुई बकपंक्ति यमुनानदीके ऊपर बहते हुए फेन - जैसी प्रतीत हो रही है॥९॥
। ईश! काली रात्रिमें बादलोंमें छिपा हुआ यह ॥ १० चन्द्रमण्डल समुद्रमें प्रदीप्त हुई वडवाग्निके समान प्रतीत हो रहा है ॥ १० ॥
। हे विरूपाक्ष! इस मन्दराचल पर्वतशिखरके ॥ ११ प्रांगणमें भी वर्षाकालीन घासें उग आयी हैं, फिर अन्य स्थानोंकी चर्चा ही क्या करूँ? ॥ ११ ॥
। मन्दराचलपर आश्रय ग्रहण करनेवाले इन ॥१२ काले, श्वेत तथा रक्तवर्णके मेघोंसे यह विशाल हिमालय इस प्रकार प्रतीत हो रहा है, जैसे पत्तोंसे पूर्ण दुग्धका समुद्र हो ॥१२ ॥
। श्री ( शोभा ) सभी वृक्षोंको त्यागकर केवल ॥ १३ विषमतासे किंशुक वृक्षोंको शोभित कर रही है, जिस प्रकार महालक्ष्मी कलियुगमें सज्जनोंको त्यागकर सभी ऊँचे - नीचे पुरुषोंको प्राप्त होती हैं ॥१३ ॥
मन्दराचल पर्वतके शिखरपर वास करनेवाले १४ बादलोंके शब्दसे हर्षित होकर मोर वनमें अपनी पीठ दिखाकर नृत्य कर रहे हैं ॥१४ ॥
मेघोंके लिये उत्सुक इन चातकोंकी मधुर ध्वनि १५ इस वर्षाकालमें सुनायी पड़ रही है और पथिकगण तीव्र जल - वर्षाके कारण रास्तेमें होनेवाली थकानको दूर कर रहे हैं । हे शंकर! मेरी देहपर मेघोंद्वारा ओले गिराये १६ जानेसे उत्पन्न हुई इस दुर्नीतिको देखिये, जो अपने अनुगामी मोर तथा चातकोंपर भी उपलकी वर्षाकर उन्हें ओलोंसे आच्छादित कर रहे हैं । १५-१६ ॥ हे गिरिश! मोर तथा सारंग भी अपने मित्र १७ ( बादल ) -से पराभवको प्राप्तकर दूर होनेपर भी हर्षपूर्वक मानसरोवरको चले जा रहे हैं ॥ १७ ॥
[ हे सदाशिव! ] इस विषम परिस्थितिमें [ केवल ] | आपको छोड़कर कौआ और चकोर पक्षी भी अपना घोंसला बना रहे हैं । अब आप ही बताइये, घरके १८ बिना आप किस प्रकार शान्ति प्राप्त करेंगे? ॥ १८ ॥
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अ ० २२ ] रुद्रसंहिता (
महतीवाद्य नो भीतिर्मां मेघोत्था पिनाकधृक् ।
यतस्व यस्माद्वासाय माचिरं वचनान्मम ॥ १ ९
कैलासे वा हिमाद्रौ वा महाकोश्यामथ क्षितौ ।
तत्रोपयोग्यं संवासं कुरु त्वं वृषभध्वज ॥ २०
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तस्तया शंभुर्दाक्षायण्या तथासकृत् ।
सञ्जहास च शीर्षस्थचन्द्ररश्मिस्मितालयम् ॥ २१
अथोवाच सतीं देवीं स्मिताभिन्नौष्ठसंपुटः ।
महात्मा सर्वतत्त्वज्ञस्तोषयन्परमेश्वरः ॥ २२
ईश्वर उवाच
यत्र प्रीत्यै मया कार्यो वासस्तव मनोहरे ।
मेघास्तत्र न गन्तारः कदाचिदपि मत्प्रिये ॥ २३
मेघा नितंबपर्यन्तं सञ्चरन्ति महीभृतः ।
सदा प्रालेयसानोस्तु वर्षास्वपि मनोहरे ॥ २४
कैलासस्य तथा देवि पादगाः प्रायशो घनाः ।
सञ्चरन्ति न गच्छन्ति तत ऊर्ध्वं कदाचन ॥ २५
सुमेरोर्वा गिरेरूर्ध्वं न गच्छन्ति बलाहकाः ।
जम्बूमूलं समासाद्य पुष्करावर्तकादयः ॥ २६
इत्युक्तेषु गिरीन्द्रेषु यस्योपरि भवेद्धि ते ।
मनोरुचिर्निवासाय तमाचक्ष्व द्रुतं हि मे ॥ २७
स्वेच्छाविहारैस्तव कौतुकानि सुवर्णपक्षानिलवृन्दवृन्दैः शब्दोत्तरंगैर्मधुरस्वनैस्तै-र्मुदोपगेयानि गिरौ हिमोत्थे ॥ २८ सिद्धाङ्गनास्ते रचितासना भुवं काङ्क्षन्ति चैवोपहृतं सकौतुकम् । स्वेच्छाविहारे मणिकुट्टिमे गिरौ कुर्वन्ति चेष्यन्ति फलादिदानकैः ॥ २ ९ सतीखण्ड ) ४०७ हे पिनाकधारिन्! मुझे इन मेघोंसे बहुत बड़ा भय उत्पन्न हो गया है, इसलिये मेरे कहनेसे निवासके लिये शीघ्र ही घर बनानेका प्रयत्न कीजिये ॥ १ ९ ॥ हे वृषभध्वज! आप कैलासपर्वतपर, हिमालयपर अथवा महाकोशीपर या पृथ्वीपर अपने योग्य निवासस्थान बनाइये ॥२० ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] इस प्रकार दक्षकन्या सतीके द्वारा बार - बार कहे जानेपर शिवजी अपने सिरपर स्थित चन्द्रमाके प्रकाशपुंजके समान उज्ज्वल मुखसे हँसने लगे ॥ २१ ॥
तदनन्तर मुसकराहटके कारण खुले ओठोंवाले वे सर्वतत्त्वज्ञाता महात्मा परमेश्वर महादेवजी सतीको प्रसन्न करते हुए कहने लगे —॥२२ ॥
ईश्वर बोले- हे मनोहरे! हे मेरी प्रिये! तुम्हारी प्रीतिके लिये मैं तुम्हारे रहनेके योग्य निवासस्थान उस जगहपर बना दूँगा, जहाँ मेघ कभी भी नहीं जा सकेंगे ॥ २३ ॥
हे मनोहरे! वर्षाकालमें भी ये मेघ हिमालय पर्वत ( मध्य भाग ) के नीचे ही नीचे घूमते रहते हैं ॥ २४ ॥
उसी प्रकार हे देवि! ये मेघ इस कैलासपर्वतके भी नीचे - ही - नीचे घूमते हैं, कैलास पर्वतके ऊपर नहीं जाते हैं ॥ २५ ॥
पुष्कर, आवर्तक आदि मेघ भी जम्बूके मूलभागतक ही रह जाते हैं । ये जम्बूके ऊपर रहनेवाले सुमेरु पर्वतके शिखरपर नहीं जाते हैं ॥ २६ ॥
हे प्रिये! इन वर्णित पर्वतोंमें जिस पर्वतपर तुम्हारी निवास करनेकी इच्छा हो, उस पर्वतको शीघ्र ही बताओ ॥२७ ॥
इस हिमालय पर्वतपर निवास करनेसे स्वच्छन्द विहार करनेवाले सुवर्णके सदृश पंखवाले ये अनिल नामक पक्षिसमूह ऊँचे - ऊँचे मधुर शब्दोंसे तुम्हारे कौतुक ( केलिक्रीडा ) का गान करेंगे ॥२८ ॥
सिद्धोंकी कमनीय स्त्रियाँ मणियोंके द्वारा कूटकर बनायी गयी इस हिमालयकी भूमिपर स्वेच्छा-विहारकालमें कौतुकसे तुम्हारे बैठनेके लिये आसनका निर्माणकर स्वच्छ पृथिवीको तुम्हारे लिये अर्पण करेंगी और अनेक प्रकारके फल - मूल आदि लाकर । देनेकी इच्छा करेंगी ॥ २ ९ ॥
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४०८ फणीन्द्रकन्या गिरिकन्यकाश्च या नागकन्याश्च तुरंगमुख्याः सर्वास्तु तास्ते सततं सहायतां समाचरिष्यन्त्यनुमोदविभ्रमैः रूपं तदेवमतुलं वदनं सुचारु दृष्ट्वाङ्गना निजवपुर्निजकांतिसह्यम् हेला निजे वपुषि रूपगणेषु नित्यं कर्तार इत्यनिमिषेक्षणचारुरूपाः या मेनका पर्वतराज जाया रूपैर्गुणैः ख्यातवती त्रिलोके सा चापि ते तत्र मनोऽनुमोदं नित्यं करिष्यत्यनुनाथनाद्यैः पुरस्थवर्गैर्गिरिराजवंद्यैः प्रीतिं विचिन्वद्भिरुदाररूपाम् शिक्षा सदा ते खलु शोचितापि कार्यान्वहं प्रीतियुता गुणाद्यैः ॥
विचित्रैः कोकिलालापमोदैः कुंजगणावृतम् ।
सदा वसंतप्रभवं गंतुमिच्छसि किं प्रिये ॥
नानाबहुजलापूर्णसरः शीतसमावृतम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ नागकन्याएँ, पर्वतकन्याएँ एवं तुरंगमुखी । | किन्नरियाँ - ये सभी मनको मोहनेवाले अपने हाव-भावसे सदैव तुम्हारी सहायता करेंगी ॥ ३० ॥
॥३० तुम्हारे इस अतुलनीय रूप तथा मनोहारी मुख देखकर वहाँकी स्त्रियाँ अपने पतिके लिये मनोहर । लगनेवाले शरीर, अपने रूप तथा गुणोंको धिक्कार करेंगी तथा तुम्हारी ओर निरन्तर देखती रहेंगी ॥ ३१ ॥
॥ ३१ पर्वतराज हिमालयकी पत्नी मेनका, जो अपने रूप तथा गुणसे त्रिलोकमें विख्यात हैं, वे भी तुम्हारे । मनोऽनुकूल ऐश्वर्य, आशीर्वाद तथा प्रार्थनासे तुम्हें प्रसन्न करना चाहेंगी ॥ ३२ ॥
॥ ३२ गिरिराजसे वन्दनाके योग्य समस्त पुरजन तुम्हें । प्रसन्न करनेका सदा प्रयत्न करेंगे और यदि अत्यन्त उदाररूपा तुमको कभी शोक हुआ तो वे लोग तुम्हें ३३ शिक्षा देंगे तथा अपने गुणोंसे प्रसन्न रखेंगे ॥३३ ॥
हे प्रिये! कोकिलोंके विचित्र मधुर आलापोंसे परिपूर्ण कुंजसमूहोंसे आवृत स्थानमें जहाँ वसन्तकी उत्पत्तिका ३४ स्थान है, क्या तुम उस स्थानमें जाना चाहती हो? ॥ ३४ ॥
जहाँ विविध प्रकारके अनेक तालाब सैकड़ों पद्मिनीशतशोयुक्तमचलेन्द्रं हिमालयम् ॥ ३५ कमलिनियोंसे समन्वित शीतल जलसे परिपूर्ण हैं, जहाँ
सर्वकामप्रदैर्वृक्षैः शाद्वलैः कल्पसंज्ञकैः ।
सक्षणं पश्य कुसुमान्यथाश्वकरिगोव्रजम् ॥
प्रशांतश्वापदगणं मुनिभिर्यतिभिर्वृतम् ।
देवालये महामाये नानामृगगणैर्युतम् ॥
स्फाटिकैः स्वर्णवप्राद्यै राजतैश्च विराजितम् ।
मानसादिसरोरंगैरभितः परिशोभितम् ॥
हिरण्मयै रत्ननालैः पंकजैर्मुकुलैर्वृतम् ।
शिशुमारैस्तथासंख्यैः कच्छपैर्मकरैः करैः ॥
निषेवितं मञ्जुलैश्च तथा नीलोत्पलादिभिः ।
देवेशि तस्मान्मुक्तैश्च सर्वगंधैश्च कुंकुमैः ॥
लसद्गन्धजलैः शुभ्रैरापूर्णैः स्वच्छकांतिभिः । अश्व, हाथी तथा गौओंका निवास है, हे देवि! वहाँ सभी प्रकारकी कामनाओंको प्रदान करनेवाले ३६ कल्पसंज्ञक वृक्षोंसे घिरे हुए सुन्दर मनोहारी पुष्पोंको तथा हरे - भरे नवीन घासके मैदानोंको प्रफुल्लित नेत्रोंसे देखना । हे महामाये! इस प्रकारके उस हिमालयपर हिंसक ३७ जन्तुगण भी शान्तिपूर्वक निवास करते हैं, वह अनेक प्रकारके मृगगणोंसे युक्त है, वहाँपर स्थित देवालयोंमें मुनियों तथा यतियोंका निवास है ॥ ३५-३७ ॥ उस पर्वतके शिखर स्फटिक, सुवर्ण एवं चाँदीसे ३८ व्याप्त हैं, वह मानसादि सरोवरोंसे चारों ओरसे सुशोभित । है । वह सुवर्णसे बने हुए, रत्नोंके दण्डवाले अधखिले ३ ९ कमलोंसे व्याप्त है । शिशुमार एवं असंख्य कच्छप एवं मकरोंसे वह मानसरोवर परिव्याप्त है ॥ ३८-३९ ॥ वह मनोहर नीलकमलों और उत्पलकमलोंसे ४० शोभित है । हे देवेशि! वह [ कमलपुष्पोंसे ] गिरते हुए । सुगन्धित कुंकुमोंसे व्याप्त है । गन्धोंसे समन्वित स्वच्छ । जलोंसे वह मानसरोवर पूर्ण है । मानसरोवरका तट