श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 511–520
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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अ ० ४२ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४ ९९
देवदेव महादेव कृपां कुरु नमोऽस्तु ते ।
अपराधं क्षमस्वाद्य मम शंभो कृपानिधे ॥ ३४
अनुग्रहः कृतस्ते हि दंडव्याजेन शंकर ।
खलोऽहं मूढधीर्देव ज्ञातं तत्त्वं मया न ते ॥ ३५
अद्य ज्ञातं मया तत्त्वं सर्वोपरि भवान्मतः ।
विष्णुब्रह्मादिभिः सेव्यो वेदवेद्यो महेश्वरः ॥ ३६
साधूनां कल्पवृक्षस्त्वं दुष्टानां दंडधृक् सदा ।
स्वतन्त्रः परमात्मा हि भक्ताभीष्टवरप्रदः ॥ ३७
विद्यातपोव्रतधरानसृजः प्रथमं द्विजान् ।
आत्मतत्त्वं समावेत्तुं मुखतः परमेश्वरः ॥ ३८
सर्वापद्भ्यः पालयिता गोपतिस्तु पशूनिव ।
गृहीतदंडो दुष्टांस्तान् मर्यादापरिपालकः ॥ ३ ९
मया दुरुक्तविशिखैः प्रविद्धः परमेश्वरः ।
अमरानतिदीनाशान् मदनुग्रहकारकः ॥ ४०
स भवान् भगवान् शंभो दीनबंधो परात्परः ।
स्वकृतेन महार्हेण संतुष्टो भक्तवत्सल ॥ ४१
ब्रह्मोवाच
इति स्तुत्वा महेशानं शंकरं लोकशंकरम् ।
प्रजापतिर्विनीतात्मा विरराम महाप्रभुम् ॥ ४२
अथ विष्णुः प्रसन्नात्मा तुष्टाव वृषभध्वजम् ।
बाष्पगद्गदया वाण्या सुप्रणम्य कृताञ्जलिः ॥ ४३
विष्णुरुवाच
महादेव महेशान लोकानुग्रहकारक ।
परब्रह्म परात्मा त्वं दीनबंधो दयानिधे ॥ ४४
सर्वव्यापी स्वैरवर्ती वेदवेद्ययशाः प्रभो ।
अनुग्रहः कृतस्तेन कृताश्चासुकृता वयम् ॥ 11 ४५
दक्षोऽयं मम भक्तस्त्वां यन्निनिंद खलः पुरा ।
तत् क्षन्तव्यं महेशाद्य निर्विकारो यतो भवान् ॥ ४६
हे देवदेव! हे महादेव! आपको नमस्कार है, मुझपर कृपा कीजिये । हे कृपानिधे! हे शम्भो! आज मेरे अपराधको क्षमा कीजिये । हे शंकर! आपने दण्डके बहाने ही मुझपर अनुग्रह किया है । मैं खल और मूर्ख हूँ; हे देव! मुझे आपके तत्त्वका ज्ञान नहीं था ॥ ३४-३५ ॥ हे प्रभो! आप विष्णु एवं ब्रह्मादि देवोंके भी सेव्य, वेदोंसे जाननेयोग्य तथा महेश्वर हैं । आज मुझे आपके तात्त्विक स्वरूपका ज्ञान हुआ है, आप सभी लोगोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं । आप सत्पुरुषोंके लिये कल्पवृक्ष हैं और दुष्टोंको सदा दण्ड प्रदान करनेवाले हैं । आप सर्वथा स्वतन्त्र परमात्मा हैं एवं भक्तोंको अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले हैं ॥ ३६-३७ ॥ आप परमेश्वरने ही अपने मुखसे विद्या, तप तथा व्रत धारण करनेवाले इन ब्राह्मणोंको तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये उत्पन्न किया है ॥ ३८ ॥
समस्त गोरूप पशुओंकी रक्षा जिस प्रकार गोपतिद्वारा की जाती है, उसी प्रकार आप सभी विपत्तियोंसे रक्षा करते हैं । आप मर्यादाके परिपालक तथा दुर्जनोंके लिये दण्ड धारण करते हैं । हे भगवन्! मैंने अनेक प्रकारके कटु वचनरूपी बाणोंसे आप परमेश्वरको बींध डाला था, फिर भी अत्यन्त क्षीण आशावाले इन देवताओं-सहित मुझपर आपने दया ही की है ॥ ३ ९ -४० ॥ इसलिये हे शम्भो! हे दीनबन्धो! हे भक्तवत्सल! आप परात्पर भगवान् मेरे द्वारा की गयी पूजासे सन्तुष्ट हो जाइये ॥४१ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार लोकका कल्याण करनेवाले महाप्रभु महेश्वरकी विनम्रतापूर्वक स्तुतिकर प्रजापति मौन हो गये । उसके बाद भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त होकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके गद्गद वाणीसे वृषभध्वज शिवकी स्तुति करने लगे— ॥ ४२-४३ ॥ विष्णु बोले - हे महादेव! हे महेशान! लोकपर अनुग्रह करनेवाले हे दीनबन्धो! हे दयानिधे! आप परब्रह्म परमात्मा हैं । हे प्रभो! आप सर्वव्यापी स्वतन्त्र हैं, आपका यश वेदोंसे ही जाना जा सकता है । आपने हमलोगोंपर कृपा की है, उससे हमलोग कृतकृत्य हो गये ॥ ४४-४५ ॥ हे महेश्वर! इस मेरे भक्त दुष्ट दक्षने पूर्वमें | आपकी जो निन्दा की है, उसे आप आज क्षमा कीजिये;
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५०० कृतो मयापराधोऽपि तव शंकर मौढ्यतः त्वद्गणेन कृतं युद्धं वीरभद्रेण पक्षतः त्वं मे स्वामी परब्रह्म दासोऽहं ते सदाशिव पोष्यश्चापि सदा ते हि सर्वेषां त्वं पिता यतः ब्रह्मोवाच देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो स्वतन्त्रः परमात्मा त्वं परमेशोऽद्वयोऽव्ययः मम पुत्रोपरि कृतो देवानुग्रह ईश्वर स्वापमानमगणयन् दक्षयज्ञं समुद्धर ॥
प्रसन्नो भव देवेश सर्वशापान्निराकुरु ।
सबोधः प्रेरकस्त्वं मे त्वमेव विनिवारकः ॥
इति स्तुत्वा महेशानं परमं च महामुने ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनम्रीकृतमस्तकः ॥
अथ शक्रादयो देवा लोकपालाः सुचेतसः । तुष्टुवुः शंकरं देवं प्रसन्नमुखपंकजम् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३ । । क्योंकि आप निर्विकार हैं । हे शंकर! मैंने भी मूर्खतावश ॥ ४७ आपका अपराध किया है, जो दक्षके पक्षसे आपके गण वीरभद्रके साथ युद्ध किया ॥ ४६-४७ ॥ । हे सदाशिव! आप मेरे स्वामी हैं, आप परब्रह्म ॥ ४८ हैं, मैं आपका दास हूँ, आप सभीके पिता हैं । इसलिये आपको हम सबका पालन करना चाहिये ॥ ४८ ॥
ब्रह्माजी बोले — हे देवदेव! हे महादेव! हे । करुणासागर! हे प्रभो! आप स्वतन्त्र, परमात्मा, ॥ ४ ९ परमेश्वर, अद्वय तथा अविनाशी हैं ॥ ४ ९ ॥ । हे ईश्वर! हे देव! आपने मेरे इस पुत्रपर अनुग्रह ५० किया है, अब आप अपना अपमान भूलकर दक्षके यज्ञका उद्धार कीजिये । हे देवेश! अब आप प्रसन्न हो जाइये और अपने सभी प्रकारके शापोंसे इसका ५१ उद्धार कीजिये; आप ज्ञानवान् ही मुझे प्रेरणा देनेवाले हैं और आप ही निवारण करनेवाले हैं ॥ ५०-५१ ॥ हे महामुने! इस प्रकार परमात्मा महेश्वरकी ५२ स्तुति करके दोनों हाथ जोड़कर मैंने अपने मस्तकको झुकाकर उन्हें प्रणाम किया । तदनन्तर इन्द्र आदि देवतागण एवं लोकपाल सावधान होकर प्रसन्न मुख-॥५३ कमलवाले शंकरजीकी स्तुति करने लगे॥५२-५३ ॥ ततः प्रसन्नमनसः सर्वे देवास्तथा परे । उसके बाद अन्य सभी देवता, सिद्ध, ऋषि एवं सिद्धर्षयः प्रजेशाश्च तुष्टुवुः शंकरं मुदा ॥ ५४ प्रजापतिगण भी प्रसन्नताके साथ शिवजीकी स्तुति करने लगे । तत्पश्चात् उपदेवता, नाग, सदस्य तथा तथोपदेवनागाश्च सदस्या ब्राह्मणास्तथा । ब्राह्मणलोग भी सद्भक्तिसे प्रणामकर अलग - अलग
प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टुवुश्च पृथक् पृथक् ॥ ५५ । स्तुति करने लगे ॥ ५४-५५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दक्षदुःखनिराकरणवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षके दुःखनिराकरणका वर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवोंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, देवताओंका अपने - अपने लोकोंको प्रस्थान तथा सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- हे नारद! इस प्रकार - रमापति इति स्तुतो रमेशेन मया चैव सुरर्षिभिः । | विष्णु, मेरे, देवताओं, ऋषियों तथा अन्य लोगोंके द्वारा तथान्यैश्च महादेवः प्रसन्नः संबभूव ह ॥ १ स्तुति करनेपर महादेवजी बड़े प्रसन्न हो गये ॥१ ॥
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता (
अथ शंभुः कृपादृष्ट्या सर्वान् ऋषिसुरादिकान् ।
ब्रह्मविष्णू समाधाय दक्षमेतदुवाच ह ॥ २
महादेव उवाच
शृणु दक्ष प्रवक्ष्यामि प्रसन्नोऽस्मि प्रजापते ।
भक्ताधीनः सदाहं वै स्वतन्त्रोऽप्यखिलेश्वरः ॥ ३
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनः सदा ।
उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठास्तेषां दक्ष प्रजापते ॥ ४
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चैव चतुर्थकः ।
पूर्वे त्रयश्च सामान्याश्चतुर्थो हि विशिष्यते ॥ ५
तत्र ज्ञानी प्रियतरो मम रूपं च स स्मृतः ।
तस्मात्प्रियतरो नान्यः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ६
ज्ञानगम्योऽहमात्मज्ञो वेदान्तश्रुतिपारगैः ।
विना ज्ञानेन मां प्राप्तुं यतन्ते चाल्पबुद्धयः ॥ ७
न वेदैश्च न यज्ञैश्च न दानैस्तपसा क्वचित् ।
न शक्नुवन्ति मां प्राप्तुं मूढाः कर्मवशा नराः ॥ ८
केवलं कर्मणा त्वं स्म संसारं तर्तुमिच्छसि ।
अत एवाभवं रुष्टो यज्ञविध्वंसकारकः ॥ ९
इतः प्रभृति भो दक्ष मत्वा मां परमेश्वरम् ।
बुद्ध्या ज्ञानपरो भूत्वा कुरु कर्म समाहितः ॥ १०
अन्यच्च शृणु सद्बुद्ध्या वचनं मे प्रजापते ।
वच्मि गुह्यं धर्महेतोः सगुणत्वेऽप्यहं तव ॥ ११
अहं ब्रह्मा च विष्णुश्च जगतः कारणं परम् ।
आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वयंदृगविशेषणः ॥ १२
आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं मुने ।
सृजन् रक्षन्हरन्विश्वं दधे संज्ञाः क्रियोचिताः ॥ १३
सतीखण्ड ) ५०१ तब वे शम्भु कृपादृष्टिसे सभी ऋषियों एवं देवताओंको देखकर तथा मुझ ब्रह्मा और श्रीविष्णुका समाधान करके दक्षसे इस प्रकार कहने लगे— ॥२ ॥
महादेव बोले- हे प्रजापते! हे दक्ष! मैं [ जो कुछ ] कह रहा हूँ, सुनिये, मैं प्रसन्न हूँ ॥ यद्यपि मैं सबका ईश्वर हूँ और स्वतन्त्र हूँ, फिर भी सदा भक्तोंके अधीन रहता हूँ ॥३ ॥
चार प्रकारके पुण्यात्मा मेरा भजन करते हैं । हे दक्ष! हे प्रजापते! उनमें पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं ॥४ ॥
उनमें आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और चौथा ज्ञानी है । पहलेके तीन तो सामान्य [ भक्त ] हैं और चौथा विशिष्ट महत्त्वका है ॥५ ॥
उनमें चौथा ज्ञानी ही मुझे अधिक प्रिय है और वह मेरा रूप माना गया है । उससे बढ़कर दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है, मैं सत्य - सत्य कह रहा हूँ ॥ ६ ॥
वेद - वेदान्तके पारगामी विद्वान् ही मुझ आत्मज्ञानीको ज्ञानके द्वारा जान सकते हैं, अल्प बुद्धिवाले ही ज्ञानके बिना मुझे प्राप्त करनेका प्रयत्न करते हैं ॥ ७ ॥
कर्मके वशीभूत मूढ़ मानव न वेदोंसे, न यज्ञोंसे, न दानोंसे और न तपस्यासे ही मुझे पा सकते हैं ॥ ८ ॥
आप केवल कर्मके द्वारा ही इस संसारको पार करना चाहते थे, इसीलिये रुष्ट होकर मैंने इस यज्ञका विनाश किया है । अतः हे दक्ष! आजसे आप बुद्धिके द्वारा मुझे परमेश्वर मानकर ज्ञानका आश्रय लेते हुए सावधान होकर कर्म कीजिये ॥ ९ -१० ॥ प्रजापते! आप उत्तम बुद्धिके द्वारा मेरी दूसरी बात भी सुनिये, मैं अपने सगुण स्वरूपके विषयमें भी धर्मकी दृष्टिसे गोपनीय बात आपसे कहता हूँ ॥ ११ ॥
जगत्का परम कारणरूप मैं ही ब्रह्मा और विष्णु हूँ । मैं सबका आत्मा, ईश्वर, साक्षी, स्वयंप्रकाश तथा निर्विशेष हूँ ॥१२ ॥
हे मुने! अपनी [ त्रिगुणात्मिका ] मायामें प्रवेश करके मैं ही जगत्का सृजन, पालन और संहार करता हुआ क्रियाओंके अनुरूप [ ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र ] नामोंको धारण करता हूँ ॥१३ ॥
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५०२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३
अद्वितीये परे तस्मिन् ब्रह्मण्यात्मनि केवले ।
अज्ञः पश्यति भेदेन भूतानि ब्रह्म चेश्वरम् ॥
शिरः करादिस्वाङ्गेषु कुरुते न यथा पुमान् ।
पारक्यशेमुषीं क्वापि भूतेष्वेवं हि मत्परः ॥
सर्वभूतात्मनामेकभावानां यो न पश्यति ।
त्रिसुराणां भिदां दक्ष स शांतिमधिगच्छति ॥
यः करोति त्रिदेवेषु भेदबुद्धिं नराधमः ।
नरके स वसेन्नूनं यावदाचन्द्रतारकम् ॥
मत्परः पूजयेद्देवान् सर्वानपि विचक्षणः ।
स ज्ञानं लभते येन मुक्तिर्भवति शाश्वती ॥
विधिभक्तिं विना नैव भक्तिर्भवति वैष्णवी ।
विष्णुभक्तिं विना मे न भक्तिः क्वापि प्रजायते ॥
इत्युक्त्वा शंकरः स्वामी सर्वेषां परमेश्वरः ।
सर्वेषां शृण्वतां तत्रोवाच वाणीं कृपाकरः ॥
हरिभक्तो हि मां निन्देत्तथा शैवो भवेद्यदि ।
तयोः शापा भवेयुस्ते तत्त्वप्राप्तिर्भवेन्न हि ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य महेशस्य वचनं सुखकारकम् ।
जहर्षुः सकलास्तत्र सुरमुन्यादयो मुने ॥
दक्षोऽभवन्महाप्रीत्या शिवभक्तिरतस्तदा ।
सकुटुम्बः सुराद्यास्ते शिवं मत्वाखिलेश्वरम् ॥
यथा येन कृता शंभो: संस्तुतिः परमात्मनः ।
तथा तस्मै वरो दत्तः शंभुना तुष्टचेतसा ॥
उस अद्वितीय ( भेदरहित ), केवल ( विशुद्ध ) १४ परब्रह्म परमात्मामें अज्ञानी पुरुष ही ब्रह्म, ईश्वर मुझ अन्य समस्त जीवोंको भिन्न रूपसे देखता है ॥ तथा जैसे मनुष्य अपने सिर, हाथ आदि अंगोंमें १४ [ ॥ ये १५ मुझसे भिन्न हैं, ऐसी ] परकीय बुद्धि कभी नहीं | करता, उसी तरह मेरा भक्त सभी प्राणियोंमें भेदबुद्धि नहीं रखता ॥ १५ ॥
हे दक्ष! सभी भूतोंके आत्मास्वरूप तथा एक ही १६ भाववाले [ ब्रह्मा, विष्णु और मुझ शिव ] —इन तीनों देवताओंमें जो भेद नहीं देखता, वही शान्ति प्राप्त करता है ॥१६ ॥
जो नराधम तीनों देवताओंमें भेदबुद्धि रखता है, १७ वह निश्चय ही जबतक चन्द्रमा और तारे रहते हैं, तबतक नरकमें निवास करता है ॥ १७ ॥
मुझमें परायण होकर जो बुद्धिमान् मनुष्य सभी १८ देवताओंकी पूजा करता है, उसे इस प्रकारका ज्ञान हो जाता है, जिससे उसकी शाश्वती मुक्ति हो जाती है ॥ १८ ॥
विधाताकी भक्तिके बिना विष्णुकी भक्ति नहीं १ ९ हो सकती और विष्णुकी भक्तिके बिना मेरी भक्ति कभी नहीं हो सकती है ॥१ ९ ॥ ऐसा कहकर कृपालु, सबके स्वामी परमेश्वर २० शिव सबको सुनाते हुए फिर यह वचन बोले— ॥२० ॥
यदि कोई विष्णुभक्त मेरी निन्दा करेगा और मेरा २१ भक्त विष्णुकी निन्दा करेगा, तो आपको दिये हुए समस्त शाप उन्हीं दोनोंको प्राप्त होंगे और निश्चय ही उन्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ २१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! भगवान् महेश्वरके इस सुखकर वचनको सुनकर वहाँ [ उपस्थित ] सभी २२ देवता, मुनि आदि अत्यन्त हर्षित हुए ॥ २२ ॥
शिवको अखिलेश्वर मानकर दक्ष कुटुम्बसहित २३ प्रसन्नतापूर्वक शिवभक्तिमें तत्पर हो गये और वे देवता आदि भी शिवभक्तिपरायण हो गये ॥ २३ ॥
जिसने जिस प्रकारसे परमात्मा शम्भुकी स्तुति | की थी, उसे उसी प्रकार सन्तुष्टचित्त हुए शम्भुने वर २४ | दिया ॥ २४ ॥
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता (
ज्ञप्तः शिवेनाशु दक्षः शिवभक्तः प्रसन्नधीः ।
यज्ञं चकार संपूर्णं शिवानुग्रहतो मुने ॥ २५
ददौ भागान्सुरेभ्यो हि पूर्णभागं शिवाय सः ।
दानं ददौ द्विजेभ्यश्च प्राप्तः शंभोरनुग्रहः ॥ २६
अथ देवस्य सुमहत्तत्कर्म विधिपूर्वकम् ।
दक्षः समाप्य विधिवत्सहर्त्विग्भिः प्रजापतिः ॥ २७
एवं दक्षमखः पूर्णोऽभवत्तत्र मुनीश्वर ।
शंकरस्य प्रसादेन परब्रह्मस्वरूपिणः ॥ २८
अथ देवर्षयः सर्वे शंसन्तः शांकरं यशः ।
ययुस्तुष्टाः परेऽपि सुखतस्तदा ॥ २ ९
अहं विष्णुश्च सुप्रीतावपि स्वं स्वं परं मुदा ।
गायन्तौ सुयशः शंभोः सर्वमङ्गलदं सदा ॥ ३०
दक्षसम्मानितः प्रीत्या महादेवोऽपि सद्गतिः ।
कैलासं स ययौ शैलं सुप्रीतः सगणो निजम् ॥ ३१
आगत्य स्वगिरिं शंभुः सस्मार स्वप्रियां सतीम् ।
गणेभ्यः कथयामास प्रधानेभ्यश्च तत्कथाम् ॥ ३२
कालं निनाय विज्ञानी बहु तच्चरितं वदन् ।
लौकिकीं गतिमाश्रित्य दर्शयन् कामितां प्रभुः ॥ ३३
नानीतिकारकः स्वामी परब्रह्म सतां गतिः ।
तस्य मोहः क्व वा शोकः क्व विकारः परो मुने ॥ ३४
अहं विष्णुश्च जानीवस्तद्भेदं न कदाचन ।
के परे मुनयो देवा मानुषाद्याश्च योगिनः ॥ ३५
महिमा शांकरोऽनन्तो दुर्विज्ञेयो मनीषिभिः ।
भक्तज्ञातश्च सद्भक्त्या तत्प्रसादाद्विना श्रमम् ॥ ३६
सतीखण्ड ) ५०३ हे मुने! उसके बाद भगवान् शिवकी आज्ञा पाकर प्रसन्नचित्त हुए शिवभक्त दक्षने शिवजीकी कृपासे यज्ञ पूरा किया ॥ २५ ॥
उन्होंने देवताओंको यज्ञभाग दिया और शिवजीको पूर्ण भाग दिया । साथ ही उन्होंने ब्राह्मणोंको दान भी दिया । इस तरह उन्हें शम्भुका अनुग्रह प्राप्त हुआ ॥ २६ ॥
इस प्रकार महादेवजीके उस महान् कर्मका विधि-पूर्वक वर्णन किया गया । प्रजापति दक्षने ऋत्विजोंके सहयोगसे उस यज्ञकर्मको विधिवत् समाप्त किया ॥ २७ ॥
हे मुनीश्वर! इस प्रकार परब्रह्मस्वरूप शंकरकी कृपासे दक्षका यज्ञ पूरा हुआ ॥२८ ॥
तदनन्तर सब देवता और ऋषि सन्तुष्ट होकर | भगवान् शिवके यशका वर्णन करते हुए अपने - अपने स्थानको चले गये । दूसरे लोग भी उस समय वहाँसे सुखपूर्वक चले गये ॥ २ ९ ॥ मैं और भगवान् विष्णु भी अत्यन्त प्रसन्न हो भगवान् शिवके सदा सर्वमंगलदायक सुयशका निरन्तर गान करते हुए अपने - अपने स्थानको सानन्द चल दिये ॥ ३० ॥
सत्पुरुषोंको आश्रय देनेवाले महादेवजी भी दक्षसे प्रीतिपूर्वक सम्मानित हो प्रसन्नताके साथ गणोंसहित अपने निवासस्थान कैलास पर्वतपर चले गये ॥ ३१ ॥
अपने पर्वतपर आकर शम्भुने अपनी प्रिया सतीका स्मरण किया और प्रधान गणोंसे वह कथा कही ॥ ३२ ॥
विज्ञानमय भगवान् शंकरने लौकिक गतिका अवलम्बनकर अपने सकामभावको प्रकट करते हुए तथा सतीचरित्र वर्णन करते हुए बहुत समय व्यतीत किया ॥ ३३ ॥
हे मुने! वे सज्जनोंके शरणदाता, सबके स्वामी, अनीति न करनेवाले तथा परब्रह्म हैं, उन्हें मोह, शोक अथवा अन्य विकार कहाँसे हो सकता है! ॥ ३४ ॥
जब मैं और विष्णु भी उनके भेदको कभी नहीं जान पाये, तो अन्य देवता, मुनि, मनुष्य आदि तथा योगिजनकी बात ही क्या है! ॥ ३५ ॥
भगवान् शंकरकी महिमा अनन्त है, जिसे बड़े-बड़े विद्वान् भी जाननेमें असमर्थ हैं, किंतु भक्तलोग उनकी कृपासे बिना श्रमके ही उत्तम भक्तिके द्वारा उसे | जान लेते हैं ॥ ३६ ॥
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५०४ एकोऽपि न विकारो हि शिवस्य परमात्मनः संदर्शयति लोकेभ्यः कृत्वा तां तादृशीं गतिम् ॥ यत्पठित्वा च संश्रुत्य सर्वलोकसुधीर्मुने लभते सद्गतिं दिव्यामिहापि सुखमुत्तमम् ॥ इत्थं दाक्षायणी हित्वा निजदेहं सती पुन: । जज्ञे हिमवतः पल्यां मेनायामिति विश्रुतम् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३ । परमात्मा शिवमें एक भी विकार नहीं है किंतु ३७ लोकपरायण वे सगुणरूप धारणकर अपना, चरि । लोगोंको दिखाते हैं । हे मुने! जिसे पढ़कर और । सुनकर सभी लोगोंमें बुद्धिमान् वह व्यक्ति इस लोक में ३८ उत्तम सुख एवं [ अन्तमें ] दिव्य सद्गति प्राप्त कर लेता है॥३७-३८ ॥ इस प्रकार दक्षकन्या सती [ यज्ञमें ] अपने शरीरको त्यागकर फिर हिमालयकी पत्नी मेनाके ॥ ३ ९ गर्भसे उत्पन्न हुईं, यह बात प्रसिद्ध ही है ॥ ३ ९ ॥ पुनः कृत्वा तपस्तत्र शिवं वव्रे पतिं च सा । गौरी भूत्वार्धवामाङ्गी लीलाश्चक्रेऽद्भुताः शिवा
इत्थं सतीचरित्रं ते वर्णितं परमाद्भुतम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं सर्वकामप्रदायकम् ॥
इदमाख्यानमनघं पवित्रं परपावनम् ।
स्वर्ग्य यशस्यमायुष्यं पुत्रपौत्रफलप्रदम् ॥
य इदं शृणुयाद् भक्त्या श्रावयेद्भक्तिमान्नरान् ।
सर्वकर्मा लभेत्तात परत्र परमां गतिम् ॥
यः पठेत्पाठयेद्वापि समाख्यानमिदं शुभम् ।
सोऽपि भुक्त्वाखिलान् भोगानन्ते मोक्षमवाप्नुयात् ॥
तत्पश्चात् वहाँ तपस्या करके गौरी शिवाने ॥ ४० भगवान् शिवका पतिरूपमें वरण किया । वे उनकी वाम - अर्धांगिनी होकर अद्भुत लीलाएँ करने लगीं ॥ ४० ॥
[ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने आपसे सतीके परम ४१ अद्भुत चरित्रका वर्णन किया, जो भोग - मोक्षको देनेवाला, दिव्य तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ४१ ॥
यह आख्यान कालुष्यरहित, पवित्र, दूसरोंको ४२ पवित्र करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला और पुत्र - पौत्ररूप फल प्रदान करनेवाला है ॥४२ ॥
हे तात! जो भक्तिमान् पुरुष भक्तिभावसे इसे ४३ सुनता है और अन्य मनुष्योंको सुनाता है । वह [ इस लोकमें ] सम्पूर्ण कर्मोंका फल पाकर परलोकमें परमगति प्राप्त करता है ॥४३ ॥
जो इस शुभ आख्यानको पढ़ता है अथवा पढ़ाता है, वह भी समस्त सुखोंका उपभोग करके ४४ । अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है ॥४४ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दक्षयज्ञानुसंधानवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षयज्ञके अनुसन्धानका वर्णन नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्रसंहितायां द्वितीयः सतीखण्डः समाप्तः ॥
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीयः पार्वतीखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः पितरोंकी कन्या मेनाके साथ नारद उवाच
दाक्षायणी सती देवी त्यक्तदेहा पितुर्मखे ।
कथं गिरिसुता ब्रह्मन् बभूव जगदम्बिका ॥ १
कथं कृत्वा तपोऽत्युग्रं पतिमाप शिवं च सा ।
एतन्मे पृच्छते सम्यक् कथय त्वं विशेषतः ॥ २
ब्रह्मोवाच
शृणु त्वं मुनिशार्दूल शिवाचरितमुत्तमम् ।
पावनं परमं दिव्यं सर्वपापहरं शुभम् ॥ ३
यदा दाक्षायणी देवी हरेण सहिता मुदा ।
हिमाचले सुचिक्रीडे लीलया परमेश्वरी ॥ ४
मत्सुतेयमिति ज्ञात्वा सिषेवे मातृवर्चसा ।
हिमाचलप्रिया मेना सर्वर्द्धिभिरनिर्भरा ॥ ५
यदा दाक्षायणी रुष्टा नादृता स्वतनुं जहौ ।
पित्रा दक्षेण तद्यज्ञे सङ्गता परमेश्वरी ॥ ६
तदैव मेनका तां सा हिमाचलप्रिया मुने ।
शिवलोकस्थितां देवीमारिराधयिषुस्तदा ॥ ७
तस्यामहं सुता स्यामित्यवधार्य सती हृदा ।
त्यक्तदेहा मनो दधे भवितुं हिमवत्सुता ॥ ८
समयं प्राप्य सा देवी सर्वदेवस्तुता पुनः ।
सती त्यक्ततनुः प्रीत्या मेनकातनयाभवत् ॥ ९
नाम्ना सा पार्वती देवी तपः कृत्वा सुदुस्सहम् ।
नारदस्योपदेशाद्वै पतिं प्राप शिवं पुनः ॥ १०
हिमालयके विवाहका वर्णन नारदजी बोले - – हे ब्रह्मन्! अपने पिताके यज्ञमें शरीरका त्यागकर दक्षकन्या सती देवी जगदम्बा किस प्रकार हिमालयकी पुत्री बनीं और किस तरह अत्यन्त उग्र तपस्या करके उन्होंने शिवजीको पतिरूपमें प्राप्त किया? मैं यह आपसे पूछ रहा हूँ, आप विशेष रूपसे बताइये॥१-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! आप शिवाके परम पावन, दिव्य, सभी पापोंको दूर करनेवाले, कल्याणकारी तथा उत्तम चरित्रको सुनिये ॥ ३ ॥
दक्षकन्या सती देवी जब प्रसन्नचित्त होकर शिवजीके साथ हिमालय पर्वतपर लीलापूर्वक क्रीड़ा करती थीं, उस समय मातृप्रेमसे भरी हुई हिमालयकी प्रिया मेना ‘ सम्पूर्ण सिद्धियोंसे युक्त यह मेरी पुत्री है'-ऐसा समझकर उनकी सेवामें संलग्न रहती थीं ॥ ४-५ ॥ हे मुने! दक्षकन्या सती देवीने जब पिता दक्षके द्वारा अपमानित होकर क्रोधित हो यज्ञमें अपना शरीर त्याग दिया, उस समय हिमालयप्रिया मेना शिवलोकमें स्थित उन भगवती सतीकी आराधना करना चाह रही थीं ॥६-७ ॥ उन्हींके गर्भसे मैं पुत्रीके रूपमें उत्पन्न होऊँ- ऐसा हृदयमें विचार करके शरीरका त्याग करनेवाली सतीने हिमालयकी पुत्री होनेके लिये मनमें निश्चय किया ॥ ८ ॥
देहत्यागके अनन्तर समय आनेपर सभी देवताओंके द्वारा स्तुत वे भगवती सती प्रसन्नतापूर्वक मेनका ( मेना ) - की पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं॥९॥
उन देवीका नाम पार्वती हुआ । उन्होंने नारदके उपदेशसे अत्यन्त कठोर तपस्याकर पुन: शिवजीको पतिरूपमें प्राप्त किया ॥ १० ॥
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५०६ नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाप्राज्ञ वद मे वदतां वर ।
मेनकायाः समुत्पत्तिं विवाहचरितं तथा ॥
धन्या हि मेनका देवी यस्यां जाता सुता सती ।
अतो मान्या च धन्या च सर्वेषां सा पतिव्रता ॥
ब्रह्मोवाच
शृणु त्वं नारद मुने पार्वतीमातुरुद्भवम् ।
विवाहं चरितं चैव पावनं भक्तिवर्धनम् ॥
अस्त्युत्तरस्यां दिशि वै गिरीशो हिमवान्महान् ।
पर्वतो हि मुनिश्रेष्ठ महातेजाः समृद्धिभाक् ॥
द्वैरूप्यं तस्य विख्यातं जङ्गमस्थिरभेदतः ।
वर्णयामि समासेन तस्य सूक्ष्मस्वरूपकम् ॥
पूर्वापरौ तोयनिधी सुविगाह्य स्थितो हि यः ।
नानारत्नाकरो रम्यो मानदण्ड इव क्षितेः ॥
नानावृक्षसमाकीर्णो नानाशृङ्गसुचित्रितः ।
सिंहव्याघ्रादिपशुभिः सेवितः सुखिभिः सदा ॥
तुषारनिधिरत्युग्रो नानाश्चर्यविचित्रितः ।
देवर्षिसिद्धमुनिभिः संश्रितः शिवसंप्रियः ॥
तपःस्थानोऽतिपूतात्मा पावनश्च महात्मनाम् ।
तपस्सिद्धिप्रदोऽत्यन्तं नानाधात्वाकरः शुभः ॥
स एव दिव्यरूपो हि रम्यः सर्वाङ्गसुन्दरः ।
विष्ण्वंशोऽविकृतः शैलराजराजः सतां प्रियः ॥
कुलस्थित्यै च स गिरिर्धर्मवर्धनहेतवे ।
स्वविवाहं कर्तुमैच्छत्पितृदेवहितेच्छया ॥
तस्मिन्नवसरे देवा: स्वार्थमाचिन्त्य कृत्स्नशः ।
ऊचुः पितॄन्समागत्य दिव्यान्प्रीत्या मुनीश्वर ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ नारदजी बोले - हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाप्राज्ञ | हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आप मुझसे मेनकाकी उत्पत्ति! ११ उनके विवाह तथा चरित्रका वर्णन कीजिये ॥ ११ ॥,
जिनसे भगवती सतीने पुत्रीके रूपमें जन्म लिया वे मेनका देवी धन्य हैं । इसीलिये वे पतिव्रता मेना, १२ सभी लोगोंकी मान्य और धन्य हैं ॥१२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! हे मुने! आप पार्वतीकी माताके जन्म, विवाह एवं अन्य भक्तिवर्धक १३ पावन चरित्रको सुनिये । हे मुनिश्रेष्ठ! उत्तर दिशामें पर्वतोंका राजा हिमालय नामक महान् पर्वत है । जो १४ महातेजस्वी और समृद्धिशाली है॥१३-१४ ॥ जंगम तथा स्थावरभेदसे उसके दो रूप प्रसिद्ध १५ हैं, मैं उसके सूक्ष्म स्वरूपका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ । वह पर्वत रमणीय एवं अनेक प्रकारके रत्नोंका आकर ( खान ) है, जो पूर्व तथा पश्चिम समुद्रके १६ भीतर प्रवेश करके पृथ्वीके मानदण्डकी भाँति स्थित है ॥ १५-१६ ॥ वह नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त है, अनेक शिखरोंके १७ कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न है और सुखी सिंह, व्याघ्र आदि पशुओंसे सदा सेवित रहता है ॥ १७ ॥
वह हिमका भण्डार है, अत्यन्त उग्र है, अनेक १८ | आश्चर्यजनक दृश्योंके कारण विचित्र है; देवता, ऋषि, सिद्ध और मुनि उसपर रहते हैं तथा वह भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय है ॥१८ ॥
वह तप करनेका स्थान है, अत्यन्त पावन है, १ ९ महात्माओंको भी पवित्र करनेवाला है, तपस्यामें अत्यन्त शीघ्र सिद्धि प्रदान करता है, अनेक प्रकारकी धातुओंकी खान है और शुभ है । वह दिव्य रूपवाला २० है, सर्वांगसुन्दर है, रमणीय है, शैलराजोंका भी राजा | है, विष्णुका अंश है, विकाररहित एवं सज्जन पुरुषोंका प्रिय है ॥ १ ९ -२० ॥ उस पर्वतने अपनी कुलपरम्पराकी स्थिति । २१ लिये, धर्मकी अभिवृद्धि के लिये और देवताओं तथा । पितरोंका हित करनेकी अभिलाषासे अपना विवाह । । करनेकी इच्छा की । हे मुनीश्वर! उसी समय देवतागण | अपने पूर्ण स्वार्थका विचार करके दिव्य पितरोंके पास २२ आकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे- ॥ २१-२२ ॥
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अ ० १ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५०७ देवा ऊचुः
सर्वे शृणुत नो वाक्यं पितरः प्रीतमानसाः ।
कर्तव्यं तत्तथैवाशु देवकार्येप्सवो यदि ॥
मेना नाम सुता या वो ज्येष्ठा मङ्गलरूपिणी ।
तां विवाह्य च सुप्रीत्या हिमाख्येन महीभृता ॥
एवं सर्वमहालाभः सर्वेषां च भविष्यति ।
युष्माकममराणां च दुःखहानि: पदे पदे ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यमरवचः पितरस्ते विमृश्य च ।
स्मृत्वा शापं सुतानां च प्रोचुरोमिति तद्वचः ॥
ददुर्मेनां सुविधिना हिमागाय निजात्मजाम् ।
समुत्सवो महानासीत्तद्विवाहे सुमङ्गले ॥
हर्यादयोऽपि ते देवा मुनयश्चापरेऽखिलाः । आजग्मुस्तत्र संस्मृत्य वामदेवं भवं धिया
उत्सवं कारयामासुर्दत्त्वा दानान्यनेकशः ।
सुप्रशस्य पितॄन्दिव्यान्प्रशशंसुर्हिमाचलम् ॥
महामोदान्विता देवास्ते सर्वे समुनीश्वराः । संजग्मुः स्वस्वधामानि संस्मरन्तः शिवाशिवौ
यौतुकं बहु सम्प्राप्य सुविवाह्य प्रियां च ताम् ।
आजगाम स्वभवनं मुदमाप गिरीश्वरः ॥
ब्रह्मोवाच
मेनया हि हिमागस्य सुविवाहो मुनीश्वर ।
प्रोक्तो मे सुखदः प्रीत्या किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
देवता बोले- हे पितरो! आप सभी प्रसन्नचित्त होकर हमारी बात सुनें और यदि आपलोगोंको २३ देवताओंका कार्य करना अभीष्ट हो, तो शीघ्र वैसा ही करें ॥ २३ ॥
आपलोगोंकी मेना नामक जो ज्येष्ठ पुत्री प्रसिद्ध २४ है, वह मंगलरूपिणी है, उसका विवाह आपलोग अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हिमालय नामक पर्वतसे कर दीजिये । ऐसा करनेपर सभी लोगोंका महान् लाभ २५ होगा और आपलोगोंके तथा देवताओंके दुःखोंका निवारण भी पग - पगपर होता रहेगा ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले- देवताओंकी यह बात सुनकर पितरोंने परस्पर विचार करके कन्याओंके शापका २६ स्मरण करके इस बातको स्वीकार कर लिया ॥ २६ ॥
उन लोगोंने अपनी कन्या मेनाका विवाह २७ विधिपूर्वक हिमालयके साथ कर दिया; उस मंगलमय विवाहमें महान् उत्सव हुआ ॥ २७ ॥
वामदेव शंकरका स्मरणकर विष्णु आदि देवता ॥ २८ तथा समस्त मुनिगण उस विवाहमें आये ॥२८ ॥
उन लोगोंने अनेक प्रकारके दान देकर उत्सव २ ९ करवाया, तदनन्तर वे दिव्य पितरोंकी प्रशंसा करके हिमालयकी प्रशंसा करने लगे ॥ २ ९ ॥ इसके बाद परम आनन्दसे युक्त वे सभी देवता ॥ ३० तथा मुनीश्वर शिवा एवं शिवका स्मरण करते हुए अपने - अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३० ॥
उधर, पर्वतराज हिमालय भी अनेक प्रकारके ३१ ॥ उपहार प्राप्तकर उस प्रिया मेनाके साथ विवाह करके अपने घर आये और परम प्रसन्न हुए ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! मैंने मेनाके साथ
हिमालयके सुखद पवित्र विवाहका वर्णन कर दिया ।
३२॥ । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ३२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे हिमाचलविवाहवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें हिमाचलविवाह - वर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
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५०८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ अथ द्वितीयोऽध्यायः पितरोंकी तीन मानसी कन्याओं – मेना, धन्या और कलावतीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा सनकादिद्वारा प्राप्त शाप एवं वरदानका वर्णन नारद उवाच विधे प्राज्ञ वदेदानीं मेनोत्पत्तिं समादरात् अपि शापं समाचक्ष्व कुरु सन्देहभञ्जनम् ॥ ब्रह्मोवाच
शृणु नारद सुप्रीत्या मेनोत्पत्तिं विवेकतः ।
मुनिभिः सह वक्ष्येऽहं सुतवर्य महाबुध ॥
दक्षनामा मम सुतो यः पुरा कथितो मुने । नारदजी बोले – हे महाप्राज्ञ! हे विधे! अब । आदर - पूर्वक मेनाकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये और १ शापके भी विषयमें बताइये, इस प्रकार मेरे सन्देहको दूर कीजिये ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले – हे नारद! हे सुतवर्य! हे महाबुध! आप इन मुनिगणोंके साथ विवेकपूर्वक मेनाकी उत्पत्तिके वृत्तान्तको अत्यन्त प्रेमपूर्वक सुनिये, २ मैं कह रहा हूँ ॥ २ ॥
हे मुने! मैंने अपने दक्ष नामक जिन पुत्रकी चर्चा तस्य जाताः सुताः षष्टिप्रमिताः सृष्टिकारणाः ॥ ३ पहले की थी; उनके यहाँ सृष्टिकी कारणभूता साठ
तासां विवाहमकरोत्स वरैः कश्यपादिभिः ।
विदितं ते समस्तं तत्प्रस्तुतं शृणु नारद ॥
तासां मध्ये स्वधानाम्नीं पितृभ्यो दत्तवान्सुताम् ।
तिस्रोऽभवन्सुतास्तस्याः सुभगा धर्ममूर्तयः ॥
तासां नामानि शृणु मे पावनानि मुनीश्वर ।
सदा विघ्नहराण्येव महामङ्गलदानि च ॥
मेनानाम्नी सुता ज्येष्ठा मध्या धन्या कलावती ।
अन्त्या एताः सुताः सर्वाः पितॄणां मानसोद्भवाः ॥
अयोनिजाः स्वधायाश्च लोकतस्तत्सुता मताः ।
आसां प्रोच्य सुनामानि सर्वान्कामान् जनो लभेत् ॥
जगद्वन्द्याः सदा लोकमातरः परमोददाः ।
योगिन्यः परमा ज्ञाननिधानास्तास्त्रिलोकगाः ॥
एकस्मिन्समये तिस्रो भगिन्यस्ता मुनीश्वर ।
श्वेतद्वीपं विष्णुलोकं जग्मुर्दर्शनहेतवे ॥
कृत्वा प्रणामं विष्णोश्च संस्तुतिं भक्तिसंयुताः ।
तस्थुस्तदाज्ञया तत्र सुसमाजा महानभूत् ॥
कन्याएँ उत्पन्न हुईं ॥ ३ ॥
उन्होंने उन कन्याओंका विवाह श्रेष्ठ कश्यप आदिके ४ साथ किया । हे नारद! यह सारा वृत्तान्त आपको विदित ही है, अब प्रस्तुत कथाका श्रवण कीजिये ॥४ ॥
उन्होंने उनमेंसे स्वधा नामकी कन्या पितरोंको ५ दी । उस स्वधासे धर्ममूर्तिरूपा सौभाग्यवती तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं।हे मुनीश्वर! उन कन्याओंके पवित्र, सदा विघ्नोंका हरण करनेवाले तथा महामंगल ६ प्रदान करनेवाले नामोंको मुझसे सुनिये ॥ ५-६ ॥ सबसे बड़ी कन्याका नाम मेना, मझली कन्याका ७ नाम धन्या तथा अन्तिम कन्याका नाम कलावती था— ये सभी कन्याएँ पितरोंके मनसे प्रादुर्भूत हुई थीं ॥ ७ ॥
ये अयोनिजा कन्याएँ लोकाचारके अनुसार ८ स्वधाकी पुत्रियाँ कही गयी हैं । इनके पवित्र नामोंका उच्चारण करके मनुष्य समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥८ ॥
वे जगत्की वन्दनीया, लोकमाता, परमानन्दको ९ देनेवाली, योगिनीस्वरूपा, उत्कृष्ट, ज्ञानकी निधि तथा तीनों लोकोंमें विचरण करनेवाली हुईं ॥ ९ ॥
हे मुनीश्वर! एक समयकी बात है - वे तीनों बहनें १० भगवान् विष्णुके निवासस्थान श्वेतद्वीपमें उनके दर्शनके लिये गयीं । भक्तिपूर्वक विष्णुको प्रणाम तथा उनकी स्तुति करके वे उनकी आज्ञासे वहीं रुक गयीं । वहाँ ११ । उस समय बहुत बड़ा समाज एकत्रित था ॥ १०-११ ॥