श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 521–530

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५० ९

तदैव सनकाद्यास्तु सिद्धा ब्रह्मसुता मुने ।

गतास्तत्र हरिं नत्वा स्तुत्वा तस्थुस्तदाज्ञया ॥

सनकाद्यान्मुनीन् दृष्ट्वोत्तस्थुस्ते सकला द्रुतम् ।

तत्रस्थान्संस्थितान्नत्वा देवाद्याँल्लोकवन्दितान् ॥

तिस्त्रो भगिन्यस्तास्तत्र नोत्तस्थुर्मोहिता मुने ।

मायया दैवविवशाः शङ्करस्य परात्मनः ॥

मोहिनी सर्वलोकानां शिवमाया गरीयसी ।

तदधीनं जगत्सर्वं शिवेच्छा सा प्रकीर्त्यते ॥

प्रारब्धं प्रोच्यते सैव तन्नामानि ह्यनेकशः ।

शिवेच्छया भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥

भूत्वा तद्वशगास्ता वै न चक्रुरपि तन्नतिम् ।

विस्मिताः सम्प्रदृश्यैव संस्थितास्तत्र केवलम् ॥

तादृशीं तद्गतिं दृष्ट्वा सनकाद्या मुनीश्वराः ।

ज्ञानिनोऽपि परं चक्रुः क्रोधं दुर्विषहं च ते ॥

शिवेच्छामोहितस्तत्र सक्रोधस्ता उवाच ह ।

सनत्कुमारो योगीशः शापं दण्डकरं ददत् ॥

सनत्कुमार उवाच

यूयं तिस्रो भगिन्यश्च मूढाः सद्वयुनोज्झिताः ।

अज्ञातश्रुतितत्त्वा हि पितृकन्या अपि ध्रुवम् ॥

अभ्युत्थानं कृतं नो यो नमस्कारोऽपि गर्विताः ।

मोहिता नरभावत्वात्स्वर्गाद् दूरा भवन्तु हि ॥

नरस्त्रियः सम्भवन्तु तिस्त्रोऽप्यज्ञानमोहिताः ।

स्वकर्मणः प्रभावेण लभध्वं फलमीदृशम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य च साध्व्यस्तास्तिस्रोऽपि चकिता भृशम् ।

पतित्वा पादयोस्तस्य समूचुर्नतमस्तकाः ॥

पितृतनया ऊचुः

मुनिवर्य दयासिन्धो प्रसन्नो भव चाधुना ।

त्वत्प्रणामं वयं मूढाः कुर्महे स्म न भावतः ॥

हे मुने! उसी अवसरपर [ मुझ ] ब्रह्माके पुत्र १२ सनकादि सिद्धगण भी वहाँ गये और श्रीहरिको प्रणामकर वहीं उनकी आज्ञासे बैठ गये । तब सभी लोग सनकादि १३ मुनियोंको देखकर वहाँ बैठे हुए लोकवन्दित देवता आदिको प्रणाम करके शीघ्र उठ खड़े हुए ॥ १२-१३ ॥ किंतु हे मुने! वे तीनों बहनें परात्पर शंकरकी १४ मायासे मोहित होनेके कारण प्रारब्धसे विवश हो नहीं उठीं ॥१४ ॥

शिवजीकी माया अत्यन्त प्रबल है, जो सब १५ लोकोंको मोहित करनेवाली है । समस्त संसार उसीके अधीन है, वह शिवकी इच्छा कही जाती है ॥ १५ ॥

उसीको प्रारब्ध भी कहा जाता है, उसके अनेक १६ नाम हैं । वह शिवकी इच्छासे ही प्रवृत्त होती है, इसमें सन्देह नहीं है । उसी [ शिवमाया ] -के अधीन होकर उन कन्याओंने सनक आदिको प्रणाम नहीं किया । वे केवल १७ उन्हें देखकर विस्मित हो बैठी रह गयीं॥१६-१७ ॥ ज्ञानी होते हुए भी सनकादि मुनीश्वरोंने उनके १८ उस प्रकारके व्यवहारको देखकर अत्यधिक असह्य क्रोध किया । तब शिवजीकी इच्छासे मोहित हुए योगीश्वर सनत्कुमार क्रोधित होकर दण्डित करनेवाला १ ९ शाप देते हुए उनसे कहने लगे —– ॥ १८-१९ ॥ सनत्कुमार बोले- तुम तीनों बहनें पितरोंकी कन्या हो, तथापि मूर्ख, सद्ज्ञानसे रहित और वेदतत्त्वके २० ज्ञानसे शून्य हो ॥ २० ॥

अभिमानमें भरी हुई तुमलोगोंने न तो हमारा २१ अभ्युत्थान किया और न ही अभिवादन किया, तुमलोग नरभावसे मोहित हो गयी हो, अत: इस स्वर्गसे दूर चली जाओ और अज्ञानसे मोहित होनेके कारण तुम तीनों ही मनुष्योंकी स्त्रियाँ बनो । इस २२ प्रकार तुमलोग अपने कर्मके प्रभावसे इस प्रकारका फल प्राप्त करो॥२१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले- यह सुनकर वे साध्वी कन्याएँ आश्चर्यचकित हो गयीं और उनके चरणोंमें गिरकर २३ विनम्रतासे सिर झुकाकर कहने लगीं ॥ २३ ॥

पितृकन्याएँ बोलीं – हे मुनिवर्य! हे दयासागर! अब हमलोगोंपर प्रसन्न हो जाइये, हमलोगोंने मूढ़ २४ । होनेके कारण आपको श्रद्धासे प्रणाम नहीं किया ॥ २४ ॥

पृष्ठ 522

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५१० प्राप्तं च तत्फलं विप्र न ते दोषो महामुने अनुग्रह कुरुष्वात्र लभेम स्वर्गतिं पुनः ब्रह्मोवाच श्रुत्वा तद्वचनं तात प्रोवाच स मुनिस्तदा शापोद्धारं प्रसन्नात्मा प्रेरितः शिवमायया सनत्कुमार उवाच पितॄणां तनयास्तिस्रः शृणुत प्रीतमानसाः वचनं मम शोकघ्नं सुखदं सर्वदैव वः विष्णोरंशस्य शैलस्य हिमाधारस्य कामिनी ज्येष्ठा भवतु तत्कन्या भविष्यत्येव पार्वती धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य च तस्याः कन्या महालक्ष्मीर्नाम्ना सीता भविष्यति वृषभानस्य वैश्यस्य कनिष्ठा च कलावती । भविष्यति प्रिया राधा तत्सुता द्वापरान्ततः

मेनका योगिनी पत्या पार्वत्याश्च वरेण च ।

तेन देहेन कैलासं गमिष्यति परं पदम् ॥

धन्या च सीतया सीरध्वजो जनकवंशजः ।

जीवन्मुक्तो महायोगी वैकुण्ठं च गमिष्यति ॥

कलावती वृषभानस्य कौतुकात्कन्यया सह । जीवन्मुक्ता च गोलोकं गमिष्यति न संशयः

विना विपत्तिं महिमा केषां कुत्र भविष्यति ।

सुकर्मिणां गते दुःखे प्रभवेद् दुर्लभं सुखम् ॥

पितॄणां तनयाः यूयं सर्वाः स्वर्गविलासिकाः ।

कर्मक्षयश्च युष्माकमभवद्विष्णुदर्शनात् ॥

इत्युक्त्वा पुनरप्याह गतक्रोधो मुनीश्वरः ।

शिवं संस्मृत्य मनसा ज्ञानदं भुक्तिमुक्तिदम् ॥

अपरं शृणुत प्रीत्या मद्वचः सुखदं सदा ।

धन्या यूयं शिवप्रीता मान्या पूज्या ह्यभीक्ष्णशः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । हे विप्र! अतः हमलोगोंने उसका फल पाया ॥ २५ हे महामुने! इसमें आपका दोष नहीं है ॥ हमलोगोंपर दया कीजिये, जिससे हमलोगोंको आप स्वर्गलोककी प्राप्ति हो ॥ २५ ॥ पुनः

ब्रह्माजी बोले- हे तात! तब उनकी यह बात । सुनकर प्रसन्नचित्त वे मुनि शिवजीकी मायासे प्रेरित ॥ २६ हो शापसे उद्धारका उपाय कहने लगे ॥ २६ ॥

सनत्कुमार बोले — हे पितरोंकी तीनों कन्याओ! । तुमलोग प्रसन्नचित्त होकर मेरी बात सुनो, यह तुम्हारे ॥ २७ शोकका नाश करनेवाली और सदा ही तुम्हें सुख प्रदान करनेवाली है ॥ २७ ॥

। तुममेंसे जो ज्येष्ठ है, वह विष्णुके अंशभूत हिमालय-॥ २८ गिरिकी पत्नी होगी और पार्वती उसकी पुत्री होंगी ॥ २८ ॥

। योगिनीस्वरूपा धन्या नामक दूसरी कन्या राजा ॥ २ ९ जनककी पत्नी होगी, उसकी कन्या महालक्ष्मी होंगी, जिनका नाम सीता होगा । सबसे छोटी कन्या कलावती वैश्य वृषभानकी पत्नी होगी, जिसकी पुत्रीके रूपमें ॥ ३० द्वापरके अन्तमें राधाजी प्रकट होंगी ॥ २ ९ -३० ॥ योगिनी मेनका पार्वतीके वरदानसे अपने पतिके ३१ साथ उसी शरीरसे परम पद कैलासको जायगी तथा यह धन्या जनकवंशमें उत्पन्न जीवन्मुक्त तथा महायोगी सीरध्वजको पतिरूपमें प्राप्तकर सीताको जन्म देगी ३२ तथा वैकुण्ठधामको जायगी॥३१-३२ ॥ वृषभानके साथ विवाह होनेके कारण जीवन्मुक्त ॥ ३३ कलावती भी अपनी कन्याके साथ गोलोक जायगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ३३ ॥

[ इस संसारमें ] बिना विपत्तिके किसको कहाँ ३४ महत्त्व प्राप्त होगा । उत्तम कर्म करनेवालोंके दुःख दूर हो जानेपर उन्हें दुर्लभ सुख प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥

तुमलोग पितरोंकी कन्याएँ हो और स्वर्गमें ३५ । विलास करनेवाली हो । अब विष्णुका दर्शन हो जानेसे तुमलोगोंके कर्मका क्षय हो गया है ॥ ३५ ॥

यह कहकर क्रोधरहित हुए मुनीश्वरने ज्ञान, भोग ३६ तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले शिवजीका स्मरण करके | पुन: कहा - [ हे पितृकन्याओ! ] तुमलोग प्रीतिपूर्वक । मेरी दूसरी बात भी सुनो, जो अत्यन्त सुखदायक है । | शिवजीमें भक्ति रखनेवाली तुमलोग सदा धन्य, मान्य ३७ । और बार - बार पूजनीय हो ॥ ३६-३७ ॥

पृष्ठ 523

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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५११

मेनायास्तनया देवी पार्वती जगदम्बिका ।

भविष्यति प्रिया शम्भोस्तपः कृत्वा सुदुस्सहम् ॥

धन्यासुता स्मृता सीता रामपत्नी भविष्यति । लौकिकाचारमाश्रित्य रामेण विहरिष्यति कलावतीसुता राधा साक्षाद् गोलोकवासिनी । गुप्तस्नेहनिबद्धा सा कृष्णपत्नी भविष्यति ब्रह्मोवाच इत्थमाभाष्य स मुनिर्भ्रातृभिः सह संस्तुतः सनत्कुमारो भगवाँस्तत्रैवान्तर्हितोऽभवत् तिस्त्रो भगिन्यस्तास्तात पितॄणां मानसी: सुताः गतपापाः सुखं प्राप्य स्वधाम प्रययुर्द्रुतम् ॥ मेनाकी कन्या जगदम्बिका पार्वती देवी परम कठोर ३८ तपकर शिवजीकी पत्नी होंगी, धन्याकी पुत्री कही गयी सीता [ भगवान् ] रामकी पत्नी होंगी, जो लौकिक ॥ ३ ९ आचारका आश्रय लेकर उनके साथ विहार करेंगी और साक्षात् गोलोकवासिनी कलावतीपुत्री राधा अपने गुप्त ॥४० स्नेहसे बँधी हुई श्रीकृष्णकी पत्नी होंगी ॥ ३८–४० ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर सबके । द्वारा स्तुत वे भगवान् सनत्कुमार मुनि अपने भाइयोंसहित वहीं अन्तर्हित हो गये ॥४१ ॥

॥ ४१ हे तात! पितरोंकी मानसी कन्याएँ वे तीनों बहनें । पापरहित हो सुख पाकर तुरंत अपने धामको चली ४२ | गयीं ॥ ४२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पूर्वगतिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पूर्वगतिवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥२ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः विष्णु आदि देवताओंका हिमालयके पास जाना, उन्हें उमाराधनकी विधि बता स्वयं भी देवी जगदम्बाकी स्तुति करना नारद उवाच

विधे प्राज्ञ महाधीमन्वद मे वदतां वर ।

ततः परं किमभवच्चरितं विष्णुसद्गुरोः ॥

अद्भुतेयं कथा प्रोक्ता मेनापूर्वगतिः शुभा । विवाहश्च श्रुतः सम्यक् परमं चरितं वद मेनां विवाह्य स गिरिः कृतवान् किं ततः परम् पार्वती कथमुत्पन्ना तस्यां वै जगदम्बिका तपः सुदुस्सहं कृत्वा कथं प्राप पतिं हरम् एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तराच्छाङ्करं यशः ॥ ब्रह्मोवाच मुने त्वं शृणु सुप्रीत्या शांकरं सुयशः शुभम् यच्छ्रुत्वा ब्रह्मा शुद्धयेत्सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ यदा मेनाविवाहं तु कृत्वागच्छद्रिरिर्गृहम् तदा समुत्सवो जातस्त्रिषु लोकेषु नारद नारदजी बोले – हे विधे! हे प्राज्ञ! हे महाबुद्धिमान्! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! इसके बाद विष्णुके सद्गुरु शिवका १ क्या चरित्र हुआ, उसको आप मुझसे कहिये ॥१ ॥

आपने मेनाके पूर्वजन्मकी शुभ एवं अद्भुत कथा कही । उनके विवाहप्रसंगको भी मैंने भलीभाँति सुन ॥ २ लिया, अब उनके उत्तम चरित्रको कहिये ॥२ ॥

। हिमालयने मेनाके साथ विवाह करनेके बाद क्या ॥ ३ किया? जगदम्बा पार्वतीने उनसे किस प्रकार जन्म लिया और कठोर तपकर किस प्रकार शिवजीको पतिरूपमें । प्राप्त किया? यह सब बताइये और हे ब्रह्मन्! शंकरके ४ यशका विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ३-४ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! आप शंकरके कल्याणकारी उत्तम यशको सुनिये, जिसे सुनकर । ५ ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है और सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥

हे नारद! जब मेनाके साथ विवाह करके । हिमवान् घर गये, तब तीनों लोकोंमें बड़ा भारी उत्सव ॥ ६ हुआ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 524

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५१२ हिमाचलोऽपि सुप्रीतश्चकार परमोत्सवम् भूसुरान् बंधुवर्गांश्च परानानर्च सद्धिया सर्वे द्विजाश्च सन्तुष्टा दत्त्वाशीर्वचनं वरम् ययुस्तस्मै स्वस्वधाम बंधुवर्गास्तथापरे ॥ हिमाचलोऽपि सुप्रीतो मेनया सुखदे गृहे । रेमेऽन्यत्र च सुस्थाने नन्दनादिवनेष्वपि तस्मिन्नवसरे देवा मुने विष्ण्वादयोऽखिलाः । मुनयश्च महात्मानः प्रजग्मुर्भूधरान्तिके

दृष्ट्वा तानागतान्देवान्प्रणनाम मुदा गिरिः ।

सम्मानं कृतवान् भक्त्या प्रशंसन् स्वविधिं महान् ॥

साञ्जलिर्नतशीर्षो हि स तुष्टाव सुभक्तितः ।

रोमोद्गमो महानासीद्गिरेः प्रेमाश्रवोऽपतन् ॥

ततः प्रणम्य सुप्रीतो हिमशैलः प्रसन्नधीः ।

उवाच प्रणतो भूत्वा मुने विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥

हिमाचल उवाच

अद्य मे सफलं जन्म सफलं सुमहत्तपः ।

अद्य मे सफलं ज्ञानमद्य मे सफलाः क्रियाः ॥

धन्योऽहमद्य संजातो धन्या मे सकला क्षितिः ।

धन्यं कुलं तथा दाराः सर्वं धन्यं न संशयः ॥

यतः समागता यूयं मिलित्वा सर्व एकदा ।

मां निदेशयत प्रीत्योचितं मत्वा स्वसेवकम् ॥

ब्रह्मोवाच

इति श्रुत्वा महीध्रस्य वचनं ते सुरास्तदा ।

ऊचुर्हर्यादयः प्रीताः सिद्धिं मत्वा स्वकार्यतः ॥

देवा ऊचुः

हिमाचल महाप्राज्ञ शृण्वस्मद्वचनं हितम् ।

यदर्थमागताः सर्वे तद् ब्रूमः प्रीतितो वयम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ । हिमालयने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर परमोत्सव ॥ ७ । मनाया और सद्बुद्धिसे ब्राह्मणों, बन्धुजनों एवं श्रेष्ठ लोगोंका अर्चन किया ॥ ७ ॥ अन्य

। तत्पश्चात् सभा सन्तुष्ट ब्राह्मण, बन्धुजन तथा ८ अन्यलोग उन्हें उत्तम आशीर्वाद देकर अपने - अपने निवासस्थानको चले गये । हिमालय भी अत्यन्त | प्रसन्न होकर अपने सुखदायक घरमे, अन्य रम्य ॥ ९ स्थानमें तथा नन्दन आदि वनोंमें भी मेनाके साथ रमण करने लगे ॥८ - ९ ॥ हे मुने! उसी समय विष्णु आदि समस्त देवता ॥ १० और महात्मा मुनि गिरिराजके पास गये ॥ १० ॥

गिरिराजने उन देवताओंको आया हुआ देखकर ११ प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अपने भाग्यकी सराहना करते हुए भक्तिभावसे उनका सत्कार किया ॥ ११ ॥

हाथ जोड़कर मस्तक झुकाये हुए उन्होंने उत्तम १२ भक्तिसे स्तुति की । हिमालयके शरीरमें महान् रोमांच हो आया और उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहने लगे ॥ १२ ॥

हे मुने! तब हिमालय प्रसन्न मनसे अत्यन्त १३ प्रेमपूर्वक प्रणाम करके और विनीतभावसे खड़े हो विष्णु आदि देवताओंसे कहने लगे -॥१३ ॥

हिमाचल बोले- आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरी महान् तपस्या सफल हुई, आज १४ मेरा ज्ञान सफल हुआ और आज मेरी क्रियाएँ सफल हो गयीं ॥१४ ॥

आज मैं धन्य हो गया, मेरी समस्त भूमि धन्य हो १५ गयी, मेरा कुल धन्य हो गया, मेरी स्त्री तथा मेरा सब कुछ धन्य हो गया, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि आप | सभी लोग एक साथ मिलकर एक ही समय यहाँ. १६ पधारे हैं । मुझे अपना सेवक समझकर आपलोग प्रसन्नतापूर्वक उचित कार्यके लिये आज्ञा दें ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब हिमालयके इस वचनको सुनकर विष्णु आदि वे देवता अपने कार्यकी सिद्धिको १७ मानकर प्रसन्न होकर कहने लगे- ॥ १७ ॥

देवता बोले- हे महाप्राज्ञ हिमालय! हमारा | हितकारक वचन सुनिये, हम सब लोग जिस कामके १८ लिये यहाँ आये हैं, उसे प्रसन्नतापूर्वक बता रहे हैं ॥ १८ ॥

पृष्ठ 525

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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५१३

या पुरा जगदम्बोमा दक्षकन्याभवगिरे ।

रुद्रपत्नी हि सा भूत्वा चिक्रीडे सुचिरं भुवि ॥ १ ९

पितृतोऽनादरं प्राप्य संस्मृत्य स्वपणं सती ।

जगाम स्वपदं त्यक्त्वा तच्छरीरं तदाम्बिका ॥ २०

सा कथा विदिता लोके तवापि हिमभूधर ।

एवं सति महालाभो भवेद्देवगणस्य हि ॥ २१

सर्वस्य भवतश्चापि स्युः सर्वे ते वशाः सुराः ॥ २२

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तेषां हर्यादीनां गिरीश्वरः ।

तथास्त्विति प्रसन्नात्मा प्रोवाच न च आदरात् ॥ २३

अथ ते च समादिश्य तद्विधिं परमादरात् ।

स्वयं जग्मुश्च शरणमुमायाः शंकरस्त्रियः ॥ २४

सुस्थले मनसा स्थित्वा सस्मरुर्जगदम्बिकाम् ।

प्रणम्य बहुशस्तत्र तुष्टुवुः श्रद्धया सुराः ॥ २५

देवा ऊचुः

देव्युमे जगतामम्ब शिवलोकनिवासिनि ।

सदाशिवप्रिये दुर्गे त्वां नमामो महेश्वरि ॥ २६

श्रीशक्तिं पावनां शान्तां पुष्टिं परमपावनीम् ।

वयं नमामहे भक्त्या महदव्यक्तरूपिणीम् ॥ २७

शिवां शिवकरां शुद्धां स्थूलां सूक्ष्मां परायणाम् ।

अन्तर्विद्यासुविद्याभ्यां सुप्रीतां त्वां नमामहे ॥ २८

त्वं श्रद्धा त्वं धृतिस्त्वं श्रीस्त्वमेव सर्वगोचरा ।

त्वं दीधितिस्सूर्यगता स्वप्रपञ्चप्रकाशिनी ॥ २ ९

या च ब्रह्माण्डसंस्थाने जगज्जीवेषु या जगत् ।

आप्याययति ब्रह्मादितृणान्तं तां नमामहे ॥ ३०

2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_18_1_Front हे गिरे! पहले जो जगदम्बा उमा दक्षकन्या सतीके रूपमें उत्पन्न हुई थीं और रुद्रपत्नी होकर चिरकालतक इस भूतलपर क्रीड़ा करती रहीं, वे ही जगदम्बा अपने पितासे अनादर पाकर अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके [ यज्ञमें ] शरीरका त्यागकर अपने परम धामको चली गयीं ॥ १ ९ -२० ॥ हे हिमगिरे! यह कथा लोकमें विख्यात है और आपको भी विदित है । अब ऐसा होनेपर ( आपके यहाँ उनके उत्पन्न होनेपर ) सभी देवगणोंका तथा आपका भी बहुत लाभ होगा और वे सभी देवतागण भी आपके वशमें हो जायँगे ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले- उन विष्णु आदि देवताओंकी यह बात सुनकर गिरिराजने उनको आदर देनेके लिये नहीं, अपितु स्वयं प्रसन्नचित्त होकर ' तथास्तु'– ऐसा कहा ॥२३ ॥

तत्पश्चात् वे देवता [ उमाको प्रसन्न करनेकी ] उस विधिको हिमालयसे आदरपूर्वक कहकर स्वयं शंकरप्रिया उमाकी शरणमें गये ॥ २४ ॥

वे देवता उत्तम स्थानपर स्थित होकर मनसे जगदम्बाका स्मरण करने लगे और अनेक बार उन्हें प्रणामकर श्रद्धाके साथ उनकी स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥

देवता बोले- हे देवि! हे उमे! हे जगन्मातः! शिवलोकमें निवास करनेवाली हे सदाशिवप्रिये! हे दुर्गे! हे महेश्वरि! हम आपको प्रणाम करते हैं ॥ २६ ॥

हमलोग श्रीशक्ति, पावन, शान्त, पुष्टिरूपिणी, परम तथा महत् और अव्यक्तरूपिणी [ आपको ] भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं ॥ २७ ॥

कल्याणरूपिणी, कल्याण करनेवाली, शुद्ध, स्थूल, सूक्ष्म, सबका परम आश्रय और अन्तर्विद्या तथा सुविद्यासे प्रसन्न होनेवाली आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ २८ ॥

आप ही श्रद्धा हैं, आप ही धृति हैं, आप ही श्री हैं, आप ही सर्वगोचरा हैं, सूर्यमें रहनेवाली प्रकाशरूपा आप ही हैं तथा आप अपने प्रपंचको प्रकाशित करनेवाली हैं ॥ २ ९ ॥ जो ब्रह्माण्डमें तथा समस्त जीवोंमें रहनेवाली हैं और जो ब्रह्मासे लेकर समस्त तृणपर्यन्त संसारको । तृप्त करती हैं, उन्हें हम प्रणाम करते हैं ॥ ३० ॥

पृष्ठ 526

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५१४ गायत्री त्वं वेदमाता त्वं सावित्री सरस्वती त्वं वार्ता सर्वजगतां त्वं त्रयी धर्मरूपिणी

निद्रा त्वं सर्वभूतेषु क्षुधा तृप्तिस्त्वमेव हि ।

तृष्णा कान्तिश्छविस्तुष्टिः सर्वानन्दकरी सदा ॥

त्वं लक्ष्मीः पुण्यकर्तॄणां त्वं ज्येष्ठा पापिनां सदा ।

त्वं शान्तिः सर्वजगतां त्वं धात्री प्राणपोषिणी ॥

त्त्वं तत्त्वरूपा भूतानां पञ्चानामपि सारकृत् ।

त्वं हि नीतिभृतां नीतिर्व्यवसायस्वरूपिणी ॥

गीतिस्त्वं सामवेदस्य ग्रन्थिस्त्वं यजुषां हुति: । ऋग्वेदस्य तथा मात्राथर्वणस्य परा गतिः । समस्तगीर्वाणगणस्य शक्ति-स्तमोमयी धातृगुणैकदृश्या । रजःप्रपञ्चात्तु भवैकरूपा या नः श्रुता भव्यकरी स्तुतेह ॥ संसारसागरकरालभवाङ्गदुःख-निस्तारकारितरणिं च निवीतहीनाम् । अष्टाङ्गयोगपरिपालनकेलिदक्षां विन्ध्यागवासनिरतां प्रणमाम तां वै ॥ नासाक्षिवक्त्रभुजवक्षसि मानसे च धृत्या सुखानि वितनोति सदैव जन्तोः । निद्रेति याति सुभगा जगती भवानां सा नः प्रसीदतु भवस्थितिपालनाय ॥ ब्रह्मोवाच

इति स्तुत्वा महेशानीं जगदम्बामुमां सतीम् ।

सुप्रेममनसः सर्वे तस्थुस्ते दर्शनेप्सवः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ । आप ही गायत्री हैं, आप ही वेदमाता सावित्री ॥ ३१ एवं सरस्वती हैं, आप ही समस्त जगत्‌की वार्ता है, आप ही वेदत्रयी एवं धर्मस्वरूपा हैं ॥ ३१ ॥

आप ही समस्त प्राणियोंमें निद्रा, क्षुधा तृप्ति ३२ तृष्णा, कान्ति, छवि तथा तुष्टिरूपसे विराजमान , हैं ।, आप सदा सबको आनन्द देनेवाली हैं ॥३२ ॥

पुण्यकर्ताओंमें आप लक्ष्मीरूपा हैं, पापियोंको दण्ड ३३ देनेके लिये आप ज्येष्ठा ( अलक्ष्मी ) हैं । आप सम्पूर्ण जगत्की शान्ति, धात्री तथा प्राणपोषिणी माता हैं ॥ ३३ ॥

आप पाँचों भूतोंके सारतत्त्वको प्रकट करनेवाली ३४ तत्त्वस्वरूपा हैं । आप ही नीतिज्ञोंकी नीति तथा व्यवसायरूपिणी हैं ॥ ३४ ॥

आप ही सामवेदकी गीतिस्वरूपा हैं, आप ही ३५ यजुर्वेदकी ग्रन्थि हैं, आप ही ऋग्वेदकी ऋचारूप स्तुति तथा अथर्ववेदकी मात्रा हैं और आप ही मोक्षस्वरूपा हैं ॥ ३५ ॥

जो सभी देवगणोंकी शक्ति हैं, तमोमयी हैं, एकमात्र धारण - पोषण गुणोंसे देखनेमें आती हैं, रजोगुणके प्रपंचसे केवल सृष्टिरूपा हैं तथा जिन्हें हमने कल्याणकारिणी ३६ सुना है, उनकी हम स्तुति करते हैं ॥ ३६ ॥

कराल संसारसागरके महान् दुःखोंसे पार करानेवाली पालरहित नौकारूपिणी, अष्टांगयोगके पालनरूपी क्रीडामें दक्ष और विन्ध्यपर्वतपर निवास ३७ करनेवाली उन भगवतीको हम प्रणाम करते हैं ॥ ३७ ॥

जो प्राणियोंके नासिका, नेत्र, मुख, भुजा, वक्षःस्थल एवं मनमें प्रतिष्ठित होकर सदा धैर्यपूर्वक सुख प्रदान करती हैं, जो संसारके कल्याणके लिये ३८ सुखकारी निद्रारूपमें प्रवृत्त होती हैं, वे संसारकी स्थिति तथा पालनके लिये हमारे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ३८ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार जगदम्बा | महेश्वरी उमा सतीकी स्तुति करके [ अपने ] हृदयमें | विशुद्ध प्रेमलिये वे सब देवता उनके दर्शनकी इच्छासे ३ ९ । वहाँ खड़े रहे ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे देवस्तुतिर्नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें देवस्तुतिवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

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पृष्ठ 527

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५१५ अथ चतुर्थोऽध्यायः उमादेवीका दिव्यरूपमें देवताओंको दर्शन देना ब्रह्मोवाच

इत्थं देवैः स्तुता देवी दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ।

आविर्बभूव देवानां पुरतो जगदम्बिका ॥ १

रथे रत्नमये दिव्ये संस्थिता परमाद्भुते ।

किंकिणीजालसंयुक्ते मृदुसंस्तरणे वरे ॥ २

कोटिसूर्याधिकाभासरम्यावयवभासिनी ।

स्वतेजोराशिमध्यस्था वररूपासमच्छविः ॥ ३

अनूपमा महामाया सदाशिवविलासिनी ।

त्रिगुणा निर्गुणा नित्या शिवलोकनिवासिनी ॥ ४

त्रिदेवजननी चण्डी शिवा सर्वार्तिनाशिनी ।

सर्वमाता महानिद्रा सर्वस्वजनतारिणी ॥ ५

तेजोराशेः प्रभावात्तु सा तु दृष्टा सुरैश्शिवा ।

तुष्टुवुस्तां पुनस्ते वै सुरा दर्शनकांक्षिणः ॥ ६

अथ देवगणाः सर्वे विष्ण्वाद्या दर्शनेप्सवः ।

ददृशुर्जगदम्बां तां तत्कृपां प्राप्य तत्र हि ॥ ७

बभूवानन्दसन्दोहः सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् ।

पुनः पुनः प्रणेमुस्तां तुष्टुवुश्च विशेषतः ॥ ८

देवा ऊचुः

शिवे शर्वाणि कल्याणि जगदम्ब महेश्वरि ।

त्वां नताः सर्वथा देवा वयं सर्वार्तिनाशिनीम् ॥ ९

न हि जानन्ति देवेशि वेदाः शास्त्राणि कृत्स्नशः ।

अतीतो महिमा ध्यानं तव वाङ्मनसोः शिवे ॥ १०

अतद्व्यावृत्तितस्त्वां वै चकितं चकितं सदा ।

अभिधत्ते श्रुतिरपि परेषां का कथा मता ॥ ११

जानन्ति बहवो भक्तास्त्वत्कृपां प्राप्य भक्तितः ।

शरणागतभक्तानां न कुत्रापि भयादिकम् ॥ १२

2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_18_2_Front और अवतार ग्रहण करनेका आश्वासन देना ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] इस प्रकार देवताओंके द्वारा स्तुति किये जानेपर दुर्ग नामक राक्षसके द्वारा उत्पन्न संकटका नाश करनेवाली जगन्माता देवी दुर्गा देवताओंके समक्ष प्रकट हुईं ॥ १ ॥

वे रत्नोंसे जटित, दिव्य, परम अद्भुत, किंकिणीजालसे युक्त, कोमल बिछौनेवाले तथा श्रेष्ठ रथपर विराजमान थीं ॥२ ॥

करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रभायुक्त, रम्य अंगोंसे भासित, अपनी तेजोराशिके बीच विराजमान, सुन्दर रूपवाली, अनुपम छविसे सम्पन्न, अतुलनीय, महामाया, सदाशिवके साथ विलास करनेवाली, त्रिगुणात्मिका, गुणोंसे रहित, नित्या, शिवलोकमें निवास करनेवाली, त्रिदेवजननी, चण्डी, शिवा, सभी कष्टोंका नाश करनेवाली, सबकी माता, महानिद्रा, सभी स्वजनों ( भक्तों ) -को मोक्ष प्रदान करनेवाली उन भगवती शिवाको तेजोराशिकी प्रभाके रूपमें देवताओंने देखा, किंतु उनके प्रत्यक्ष दर्शनकी अभिलाषा - वाले देवताओंने पुनः उनकी स्तुति की॥३–६ ॥ इसके बाद [ भगवतीके ] दर्शनके अभिलाषी देवगण उन जगदम्बाकी कृपा प्राप्त करके ही उनका प्रत्यक्ष दर्शन कर सके । [ देवीके दर्शनसे ] सभी देवगणोंको महान् आनन्द प्राप्त हुआ । उन्होंने बार-बार उनको प्रणाम किया और वे विशेष रूपसे उनकी स्तुति करने लगे - ॥ ७-८ ॥ देवता बोले- हे शिवे! हे शर्वाणि! हे कल्याणि! हे जगदम्ब! हे महेश्वरि! हम सभी देवता सबके दुःखोंका नाश करनेवाली आपको सदा प्रणाम करते हैं ॥९ ॥

हे देवेशि! वेद एवं शास्त्र भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते हैं । हे शिवे! आपका ध्यान एवं महिमा वाणी एवं मनसे अगोचर है । श्रुति भी चकित होकर सदा अतद्-व्यावृत्तिसे ( नेति - नेति कहते हुए ) आपका वर्णन करती है, तो फिर दूसरोंकी बात ही क्या है!॥ १०-११ ॥ [ हे शिवे! ] भक्तिसे आपकी कृपा प्राप्त करके बहुत - से भक्त आपकी महिमाको जानते हैं । आपके । शरणागत भक्तोंको कहीं भी भय आदि नहीं होता ॥ १२ ॥

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५१६ विज्ञप्तिं शृणु सुप्रीता यस्या दासाः सदाम्बिके तव देवि महादेवि हीनतो वर्णयामहे पुरा दक्षसुता भूत्वा संजाता हरवल्लभा श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । हे अम्बिके! हम सब आपके दास हैं , अतः ॥ १३ अब आप प्रेमयुक्त होकर हमारी प्रार्थना सुनें । हैं | देवि! हमलोग आपकी महिमाका थोड़ा - सा वर्णन करते हैं ॥१३ ॥

। आप पहले दक्षकी पुत्री होकर शिवजीकी प्रिया ब्रह्मणश्च परेषां वानाशयत्त्वमकं महत् ॥ १४ बनी थीं, आपने [ उस समय ] ब्रह्मा तथा अन्य पितृतोऽनादरं प्राप्यात्यजः पणवशात्तनुम् स्वलोकमगमस्त्वं वालभद्दुखं हरोऽपि हि न हि जातं प्रपूर्णं तद्देवकार्यं महेश्वरि व्याकुला मुनयो देवाः शरणं त्वां गता वयम्

पूर्णं कुरु महेशानि निर्जराणां मनोरथम् ।

सनत्कुमारवचनं सफलं स्याद्यथा शिवे ॥

अवतीर्य क्षितौ देवि रुद्रपत्नी पुनर्भव ।

लीलां कुरु यथायोग्यं प्राप्नुयुर्निर्जराः सुखम् ॥

सुखी स्याद्देवि रुद्रोऽपि कैलासाचलसंस्थितः ।

सर्वे भवन्तु सुखिनो दुःखं नश्यतु कृत्स्नशः ॥

ब्रह्मोवाच

इति प्रोच्यामराः सर्वे विष्ण्वाद्याः प्रेमसंकुलाः ।

मौनमास्थाय संतस्थुर्भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥

शिवापि सुप्रसन्नाभूदाकर्ण्यामरसंस्तुतिम् ।

आकलय्याथ तद्धेतुं संस्मृत्य स्वप्रभुं शिवम् ॥

उवाचोमा तदा देवी सम्बोध्य विबुधांश्च तान् । विहस्य मापतिमुखान् सदया भक्तवत्सला ॥ उमोवाच

हे हरे हे विधे देवा मुनयश्च गतव्यथाः ।

सर्वे शृणुत मद्वाक्यं प्रसन्नाहं न संशयः ॥

चरितं मम सर्वत्र त्रैलोक्यस्य सुखावहम् । मयैव लोगोंके महान् दुःखको दूर किया था ॥ १४ ॥

। आपने अपने पितासे अनादर प्राप्तकर अपनी ॥ १५ प्रतिज्ञाके अनुसार अपने शरीरका त्याग किया और आप अपने धामको चली गयी थीं, जिसके कारण । महादेवजीने दुःख पाया था । किंतु हे महेश्वरि! ॥ १६ देवताओंका वह कार्य पूरा नहीं हुआ । इसीलिये हम समस्त देवता एवं मुनिगण आपकी शरणमें आये हुए हैं ॥ १५-१६ ॥ हे महेशानि! आप देवताओंके मनोरथको पूर्ण १७ कीजिये, जिससे हे शिवे! सनत्कुमारका [ कहा हुआ ] वचन सफल हो ॥ १७ ॥

हे देवि! आप पृथ्वीपर अवतरित होकर १८ पुनः शिवजीकी पत्नी बनें और यथायोग्य लीला करें, जिससे देवगण सुखी हो जायँ, हे देवि! कैलासपर्वतपर स्थित भगवान् शिवजी भी सुखी हो जायँ, सभी लोग १ ९ सुखी हो जायँ और पूर्णरूपसे दुःखका विनाश हो जाय ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] विष्णु आदि सब देवता यह कहकर प्रेमसे मग्न हो गये और वे भक्तिपूर्वक २० विनम्रतासे सिर झुकाये मौन खड़े हो गये ॥ २० ॥

शिवा भी देवताओंकी स्तुति सुनकर प्रसन्न हो २१ गयीं । अपनी स्तुतिके कारणका विचारकर तथा | प्रभु शिवजीका स्मरणकर भक्तवत्सला तथा दयामयी | उमादेवी विष्णु आदि उन देवताओंको सम्बोधित २२ करके हँसकर कहने लगीं— ॥ २१-२२ ॥ उमा बोलीं- हे हरे! हे विधे! हे देवताओ! हे | मुनिगण! अब आप सभी लोग दुःखरहित हो जाइये २३ और मेरी बात सुनिये । मैं [ आपलोगोंपर ] प्रसन्न हूँ, इसमें सन्देह नहीं है । मेरा चरित्र त्रैलोक्यको सर्वत्र सुख प्रदान करनेवाला है । दक्ष आदिको जो मोह उत्पन्न कृतं सकलं दक्षमोहादिकं च तत् ॥ २४ | हुआ, वह सब मेरे द्वारा ही किया गया था ॥ २३-२४ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_18_2_Back

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५१७

अवतारं करिष्यामि क्षितौ पूर्णं न संशयः ।

बहवो हेतवोऽप्यत्र तद्वदामि महादरात् ॥

पुरा हिमाचलो देवा मेना चातिसुभक्तितः ।

सैवां मे चक्रतुस्तातजननीवत्सतीतनोः ॥

इदानीं कुरुतः सेवां सुभक्त्या मम नित्यशः ।

मेना विशेषतस्तत्र सुतात्वे नात्र संशयः ॥

रुद्रो गच्छतु यूयं चावतारं हिमवद्गृहे ।

अतश्चावतरिष्यामि दुःखनाशो भविष्यति ॥

सर्वे गच्छत धाम स्वं स्वं सुखं लभतां चिरम् ।

अवतीर्य सुता भूत्वा मेनाया दास्य उत्सुखम् ॥

हरपत्नी भविष्यामि सुगुप्तं मतमात्मनः ।

अद्भुता शिवलीला हि ज्ञानिनामपि मोहिनी ॥

यावत्प्रभृति मे त्यक्ता स्वतनुर्दक्षजा सुराः ।

पितृतोऽनादरं दृष्ट्वा स्वामिनस्तत्क्रतौ गता ॥

तदाप्रभृति स स्वामी रुद्रः कालाग्निसंज्ञकः ।

दिगम्बरो बभूवाशु मच्चिन्तनपरायणः ॥

मम रोषं क्रतौ दृष्ट्वा पितुस्तत्र गता सती ।

अत्यजत्स्वतनुं प्रीत्या धर्मज्ञेति विचारतः ॥

योग्यभूत्सदनं त्यक्त्वा कृत्वा वेषमलौकिकम् ।

न सेहे विरहं सत्या मद्रूपाया महेश्वरः ॥

मम हेतोर्महादुःखी स बभूव कुवेषभृत् अत्यजत्स तदारभ्य कामजं सुखमुत्तमम् ॥ अन्यच्छृणुत हे विष्णो हे विधे मुनयः सुराः महाप्रभोर्महेशस्य लीलां भुवनपालिनीम् ॥ विधाय मालां सुप्रीत्या ममास्थ्नां विरहाकुलः न शान्तिं प्राप कुत्रापि प्रबुद्धोऽप्येक एव सः मैं पृथिवीपर पूर्ण अवतार ग्रहण करूँगी, इसमें २५ सन्देह नहीं है । इसमें बहुत - से हेतु हैं, उन्हें मैं आदरपूर्वक कह रही हूँ । हे देवताओ! पूर्व समयमें हिमाचल और २६ मेनाने बड़े भक्तिभावसे मुझ सतीशरीरधारिणीकी माता - पिताके समान सेवा की थी । २५-२६ ॥ इस समय भी वे नित्यप्रति मेरी भक्तिपूर्वक सेवा २७ कर रहे हैं और मेना विशेषकर अपनी पुत्रीरूपमें सेवा करती हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २७ ॥

अतः रुद्र तथा आपलोग [ अपने - अपने धामको ] २८ जायँ, मैं हिमालयके घर अवतार लूँगी, इससे सभी लोगोंका दुःख दूर हो जायगा ॥२८ ॥

आप सब लोग अपने - अपने घर जायँ और २ ९ चिरकालतक सुखी रहें । मैं मेनाकी पुत्रीके रूपमें अवतार लेकर सभीको सुख प्रदान करूँगी ॥ २ ९ ॥ यह मेरा अत्यन्त गुप्त मत है कि मैं शिवजीकी ३० पत्नी बनूँगी । भगवान् शिवकी लीला अद्भुत है, वह ज्ञानियोंको भी मोहमें डालनेवाली है ॥ ३० ॥

हे देवगणो! जबसे मैंने दक्षके यज्ञमें जाकर ३१ पिताद्वारा अपने स्वामीका अनादर देखकर दक्षोत्पन्न अपने शरीरको त्याग दिया है, उसी समयसे वे कालाग्निसंज्ञक स्वामी रुद्रदेव दिगम्बर होकर मेरी ३२ चिन्तामें संलग्न हैं ॥ ३१-३२ ॥ मेरे रोषको देखकर अपने पिताके यज्ञमें गयी ३३ हुई धर्मज्ञ सतीने [ मेरी ] प्रीतिके कारण अपना शरीर त्याग दिया । यही सोच करके वे घर छोड़कर अलौकिक वेष धारणकर योगी हो भटक गये । वे ३४ महेश्वर मेरे सतीरूपका वियोग सहन नहीं कर पा रहे हैं ॥ ३३-३४ ॥ उन्होंने उसी समयसे कामजन्य उत्तम सुखका । ३५ परित्याग कर दिया है और मेरे निमित्त कुवेष धारणकर वे अत्यन्त दुखी हो गये हैं ॥ ३५ ॥

। हे विष्णो! हे विधे! हे देवगणो! हे मुनिगणो! ३६ आपलोग महाप्रभु महेश्वरकी भुवनपालिनी अन्य लीला भी सुनें । ज्ञानी होते हुए भी विरहमें व्याकुल वे मेरी अस्थियोंकी माला बनाकर धारण किये रहते । हैं, फिर भी उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिलती ॥ ३७ | है ॥ ३६-३७ ॥

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५१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०४ इतस्ततो रुरोदोच्चैरनीश इव स प्रभुः । वे प्रभु अनाथके समान इधर - उधर घूमते योग्यायोग्यं न बुबुधे भ्रमन्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३८ ऊँचे स्वरमें रोते रहते हैं, उन्हें उचित तथा अनुचितका हुए । ज्ञान भी नहीं है । इस प्रकार वे प्रभु सदाशिव इत्थं लीलां हरोऽकार्षीद्दर्शयन्कामिनां प्रभुः । कामियोंकी गति दिखाते हुए लीला करते फिरते हैं ऊचे कामुकवद्वाणीं विरहव्याकुलामिव ॥३ ९ । और कामुककी भाँति विरहाकुल वाणी बोलते

वस्तुतोऽविकृतोऽदीनोऽस्त्यजितः परमेश्वरः ।

परिपूर्णः शिवः स्वामी मायाधीशोऽखिलेश्वरः ॥ ४०

अन्यथा मोहतस्तस्य किं कामाच्च प्रयोजनम् ।

विकारेणापि केनाशु मायालिप्तो न स प्रभुः ॥ ४१

रुद्रोऽतीवेच्छति विभुः स मे कर्तुं करग्रहम् ।

अवतारं क्षितौ मेनाहिमाचलगृहे सुराः ॥ ४२

अतश्चावतरिष्यामि रुद्रसन्तोषहेतवे ।

हिमागपत्न्यां मेनायां लौकिकीं गतिमाश्रिता ॥ ४३

भक्ता रुद्रप्रिया भूत्वा तपः कृत्वा सुदुस्सहम् ।

देवकार्यं करिष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ४४

गच्छत स्वगृहं सर्वे भवं भजत नित्यशः ।

तत्कृपातोऽखिलं दुःखं विनश्यति न संशयः ॥ ४५

भविष्यति कृपालोस्तु कृपया मङ्गलं सदा ।

वन्द्या पूज्या त्रिलोकेऽहं तज्जायेति च हेतुतः ॥ ४६

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा जगदम्बा सा देवानां पश्यतां तदा ।

अन्तर्दधे शिवा तात स्वं लोकं प्राप वै द्रुतम् ॥ ४७

विष्ण्वादयः सुराः सर्वे मुनयश्च मुदान्विताः ।

कृत्वा तद्दिशि सन्नामं स्वस्वधामानि संययुः ॥ ४८

इत्थं दुर्गासुचरितं वर्णितं ते मुनीश्वर ।

सर्वदा सुखदं नृणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ ४ ९।

रहते

हैं ॥। ३८-३९ ॥

वे शिव वस्तुतः निर्विकार तथा दीनतासे रहित अजित, परमेश्वर, परिपूर्ण, स्वामी, मायाधीश तथा, सबके अधिपति हैं ॥ ४० ॥

वे तो लोकानुसरणकर ही लीला करते हैं; अन्यथा उन्हें मोह तथा कामसे प्रयोजन ही क्या है, वे प्रभु न तो किसी विकारसे अथवा मायासे ही लिप्त रहनेवाले हैं ॥ ४१ ॥

वे सर्वव्यापी रुद्र मेरे साथ विवाह करनेकी प्रबल इच्छा रखते हैं । अतः हे देवगणो! मैं पृथ्वीपर मेना - हिमाचलके घरमें अवतार ग्रहण करूँगी ॥ ४२ ॥

मैं रुद्रके सन्तोषके लिये लौकिक गतिका आश्रय लेकर हिमालयपत्नी मेनामें अवतार ग्रहण करूँगी ॥ ४३ ॥

कठोर तपस्या करके रुद्रकी भक्त तथा प्रिया होकर मैं देवताओंका कार्य करूँगी, यह सत्य है, सत्य है — इसमें सन्देह नहीं है । आप सभी लोग अपने घर जाइये और रुद्रका भजन कीजिये, उन्हींकी कृपासे समस्त दुःख दूर हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ उन कृपालुकी कृपासे सर्वदा मंगल ही होगा और मैं उनकी प्रिया होनेके कारण त्रिलोकमें वन्दनीय तथा पूजनीय हो जाऊँगी ॥ ४६ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे तात! इस प्रकार कहकर | वे जगदम्बा देवताओंके देखते - देखते अन्तर्धान हो गयीं और शीघ्रतासे अपने लोकको चली गयीं ॥ ४७ ॥

[ तदनन्तर ] विष्णु आदि समस्त देवता और मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर उस दिशामें प्रणामकर अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ४८ ॥

हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने दुर्गाके उत्तम चरित्रका आपसे वर्णन किया, जो सर्वदा मनुष्योंको सुख, भोग तथा मोक्ष देनेवाला है ।