श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 571–580
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५५ ९
यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम ।
देयं वरद्वयं मह्यं कृपां कृत्वा ममोपरि ॥
त्वया च निर्मिते लोके सकलेऽस्मिन्महाप्रभो ।
मत्तुल्यो बलवान्नूनं न भवेत्कोऽपि वै पुमान् ॥
शिववीर्यसमुत्पन्नः पुत्रः सेनापतिर्यदा ।
भूत्वा शस्त्रं क्षिपेन्मह्यं तदा मे मरणं भवेत् ॥
इत्युक्तोऽथ तदा तेन दैत्येनाहं मुनीश्वर ।
वरं च तादृशं दत्त्वा स्वलोकमगमं द्रुतम् ॥
दैत्योऽपि स वरं लब्ध्वा मनसेप्सितमुत्तमम् ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा शोणिताख्यपुरं गतः ॥
अभिषिक्तस्तदा राज्ये त्रैलोक्यस्यासुरैः सह ।
शुक्रेण दैत्यगुरुणाज्ञया मे स महासुरः ॥
ततस्तु स महादैत्योऽभवत् त्रैलोक्यनायकः ।
स्वाज्ञां प्रवर्तयामास पीडयन्सचराचरम् ॥
राज्यं चकार विधिवत्त्रिलोकस्य स तारकः ।
प्रजाश्च पालयामास पीडयन्निर्जरादिकान् ॥
ततः स तारको दैत्यस्तेषां रत्नान्युपाददे ।
इन्द्रादिलोकपालानां स्वतो दत्तानि तद्भयात् ॥
इन्द्रेणैरावतस्तस्य भयात्तस्मै समर्पितः ।
कुबेरेण तदा दत्ता निधयो नवसंख्यकाः ॥
वरुणेन हयाः शुभ्रा ऋषिभिः कामकृत्तथा ।
इन्द्रेणोच्चैःश्रवा दिव्यो भयात्तस्मै समर्पितः ॥
यत्र यत्र शुभं वस्तु दृष्टं तेनासुरेण हि ।
तत्तद् गृहीतं तरसा निस्सारस्त्रिभवोऽभवत् ॥
समुद्राश्च तथा रत्नान्यदुस्तस्मै भयान्मुने ।
अकृष्टपच्यासीत्पृथ्वी प्रजाः कामदुघाखिलाः ॥
सूर्यश्च तपते तद्वत्तद् दुःखं न यथा भवेत् ।
चंद्रस्तु प्रभया दृश्यो वायुः सर्वानुकूल्यवान् ॥
हे देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि ३ ९ मुझे वर देना चाहते हैं, तो मेरे ऊपर कृपा करके मुझे | दो वर दीजिये ॥ ३ ९ ॥ हे महाप्रभो! आपके बनाये हुए इस समस्त ४० लोकमें कोई भी पुरुष मेरे समान बलवान् न हो और शिवजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र देवताओंका ४१ सेनापति बनकर जब मेरे ऊपर शस्त्र प्रहार करे, तब मेरी मृत्यु हो॥४०-४१ ॥ हे मुनीश्वर! जब उस दैत्यने मुझसे इस प्रकार ४२ कहा, तब मैं उसे उसी प्रकारका वर देकर शीघ्रतापूर्वक अपने स्थानको चला गया ॥४२ ॥
वह दैत्य भी मनोवांछित उत्तम वर प्राप्तकर अत्यन्त ४३ प्रसन्न होकर शोणित नामक पुरको चला गया ॥ ४३ ॥
उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्यने मेरी आज्ञासे असुरोंके ४४ साथ जाकर त्रिलोकीके राज्यपर उस महान् असुरका अभिषेक किया । तब वह महादैत्य त्रैलोक्याधिपति हो गया और चराचरको पीड़ित करता हुआ अपनी आज्ञा ४५ चलाने लगा । इस प्रकार वह तारक विधिपूर्वक त्रैलोक्यका | राज्य करने लगा और देवता आदिको पीड़ा पहुँचाता ४६ हुआ प्रजापालन करने लगा॥४४–४६ ॥ तदनन्तर उस तारकासुरने इन्द्र आदि लोकपालोंके ४७ रत्नोंको ग्रहण कर लिया, उन्होंने उसके भयसे [ रत्न ] स्वयं प्रदान किये ॥४७ ॥
इन्द्रने उसके भयसे उसे ऐरावत हाथी समर्पित ४८ कर दिया और कुबेरने नौ निधियाँ दे दीं । वरुणने श्वेतवर्णके घोड़े, ऋषियोंने कामधेनु और इन्द्रने उच्चैःश्रवा नामक दिव्य घोड़ा भयके कारण उसे ४ ९ समर्पित कर दिया ॥ ४८-४९ ॥ उस असुरने जहाँ - जहाँ अच्छी वस्तुएँ देखीं, ५० उन्हें बलपूर्वक हरण कर लिया । इस प्रकार त्रिलोकी सर्वथा निःसार हो गयी ॥५० ॥
हे मुने! समुद्रोंने भी भयसे उसे समस्त रत्न प्रदान ५१ कर दिये, बिना जोते - बोये ही पृथिवी अन्न प्रदान करने लगी और सभी प्रजाओंके मनोरथ पूर्ण हो गये ॥५१ ॥
सूर्य उतना ही तपते थे, जिससे किसीको कष्ट न हो, चन्द्रमा उजाला करते रहते और वायु सबके ५२ अनुकूल ही चलता था ॥५२ ॥
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५६० देवानां चैव यद् द्रव्यं पितॄणां च परस्य च तत्सर्वं समुपादत्तमसुरेण दुरात्मना वशीकृत्य स लोकांस्त्रीन्स्वयमिन्द्रो बभूव ह अद्वितीयः प्रभुश्चासीद्राज्यं चक्रेऽद्भुतं वशी निस्सार्य सकलान्देवान्दैत्यानस्थापयत्ततः स्वयं नियोजयामास देवयोनीन् स्वकर्मणि अथ तद्बाधिता देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः मुने मां शरणं जग्मुरनाथा अतिविह्वलाः श्रीशिवमहापुरा [ अ ० १६ । उस दुरात्मा असुरने देवताओं, पितरों तथा अन्यका ॥ ५३ । जो भी द्रव्य था, वह सब हरण कर लिया ॥ ५३ इस प्रकार वह तीनों लोकोंको अपने अधीनकर ॥ । । स्वयं इन्द्र बन बैठा । वह इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला ॥ ५४ अद्वितीय राजा हुआ और अद्भुत प्रकारसे राज्य करने लगा ॥५४ ॥
। उसने समस्त देवताओंको हटाकर उनकी जगह ॥ ५५ दैत्योंको नियुक्त कर दिया और देवताओंको अपने कर्ममें नियुक्त किया । हे मुने! तदनन्तर उससे पीड़ित । हुए इन्द्र आदि समस्त देवगण अनाथ तथा अत्यन्त ॥ ५६ । व्याकुल होकर मेरी शरणमें आये ॥ ५५-५६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे तारकासुरतपोराज्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें तारकासुरकी तपस्या एवं उसके राज्यका वर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः तारकासुरसे उत्पीड़ित देवताओंको ब्रह्मोवाच
अथ ते निर्जराः सर्वे सुप्रणम्य प्रजेश्वरम् ।
तुष्टुवुः परया भक्त्या तारकेण प्रपीडिताः ॥ १
अहं श्रुत्वामरनुतिं यथार्थां हृदयङ्गमाम् ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा प्रत्यवोचं दिवौकसः ॥ २
स्वागतं स्वाधिकारा वै निर्विघ्नाः सन्ति वः सुराः ।
किमर्थमागता यूयमत्र सर्वे वदन्तु मे ॥ ३
इति श्रुत्वा वचो मे ते नत्वा सर्वे दिवौकसः । | मामूचुर्नतका दीनास्तारकेण प्रपीडिताः ॥ ४ देवा ऊचुः
लोकेश तारको दैत्यो वरेण तव दर्पितः ।
निरस्यास्मान्हठात्स्थानान्यग्रहीन्नो बलात् स्वयम् ॥ ५
| भवतः किमु न ज्ञातं दुःखं यन्न उपस्थितम् । | तद्दुःख नाशय क्षिप्रं वयं ते शरणं गताः ॥ ६
अहर्निशं बाधतेऽस्मान् यत्र तत्रास्थितान्स वै । ।
पलायमानाः पश्यामो यत्र तत्रापि तारकम् ॥ ७
ब्रह्माजीद्वारा सान्त्वना प्रदान करना ब्रह्माजी बोले — उसके बाद तारकासुरसे पीड़ित वे समस्त देवता मुझ प्रजापतिको भलीभाँति प्रणामकर परम भक्तिसे स्तुति करने लगे ॥१ ॥
देवताओंकी यथार्थ एवं हृदयग्राही सरस स्तुति सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर मैंने उन देवताओंसे कहा— ॥२ ॥
हे देवताओ! आपलोगोंका स्वागत है । आपलोगोंके अधिकार निर्विघ्न तो हैं? आप सब यहाँ किस निमित्त आये हैं, मुझसे कहिये । मेरी यह बात सुनकर तारकासुरसे पीड़ित वे सभी देवता मुझे प्रणाम करके विनयी हो दीनतापूर्वक मुझसे कहने लगे- ॥ ३-४ ॥ देवता बोले- हे लोकेश! आपके वरदान | अभिमानमें भरे हुए तारक असुरने हठपूर्वक हमलोगों | अपने स्थानोंसे वंचितकर उन्हें बलपूर्वक स्वयं ग्रहण कर लिया है । हमलोगोंके समक्ष जो दुःख उपस्थित हआ है, क्या आप उसे नहीं जानते हैं? हमलोग आपकी शरण में आये हैं, उस दुःखका शीघ्र निवारण कीजिये ॥ ५-६ ॥ हमलोग जहाँ कहीं भी जाते हैं, वह असुर रात-दिन हमलोगोंको पीड़ित करता है । हम जहाँ भी भागकर जाते हैं, वहाँ तारकको ही देखते हैं ॥ ७ ॥
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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५६१
तारकान्नश्च यद्दुःखं संभूतं सकलेश्वर ।
तेन सर्वे वयं तात पीडिता विकला अति ॥
अग्निर्यमोऽथ वरुणो निरृतिर्वायुरेव च ।
अन्ये दिक्पतयश्चापि सर्वे तद्वशगामिनः ॥
सर्वे मनुष्यधर्माणः सर्वैः परिकरैर्युताः ।
सेवन्ते तं महादैत्यं न स्वतंत्राः कदाचन ॥
एवं तेनार्दिता देवा वशगास्तस्य सर्वदा ।
तदिच्छाकार्यनिरताः सर्वे तस्यानुजीविनः ॥
यावत्यो वनिताः सर्वा ये चाप्यप्सरसां गणाः ।
सर्वांस्तानग्रहीद्दैत्यस्तारको सौ महाबली ॥
न यज्ञाः संप्रवर्तन्ते न तपस्यन्ति तापसाः ।
दानधर्मादिकं किंचिन्न लोकेषु प्रवर्तते ॥
तस्य सेनापतिः क्रौंचो महापाप्यस्ति दानवः ।
स पातालतलं गत्वा बाधते त्वनिशं प्रजाः ॥
तेन नस्तारकेणेदं सकलं भुवनत्रयम् ।
हृतं हठाज्जगद्धातः पापेनाकरुणात्मना ॥
वयं च तत्र यास्यामो यत्स्थानं त्वं विनिर्दिशेः ।
स्वस्थास्तद्वारितास्तेन लोकनाथ सुरारिणा ॥
त्वं नो गतिश्च शास्ता च धाता त्राता त्वमेव हि ।
वयं सर्वे तारकाख्यवह्नौ दग्धाः सुविह्वलाः ॥
क्रूरा उपाया नः सर्वे हतबलाः कृताः ।
विकारे सांनिपाते वा वीर्यवन्त्यौषधानि च ॥
यत्रास्माकं जयाशा हि हरिचक्रे सुदर्शने ।
तत्कुंठितमभूत्तस्य कंठे पुष्पमिवार्पितम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा निर्जराणामहं मुने ।
प्रत्यवोचं सुरान्सर्वांस्तत्कालसदृशं वचः ॥
हे सर्वेश्वर! हमलोगोंके समक्ष तारकासुरसे जैसा ८ भय उपस्थित हो गया है, वह दुःख सहा नहीं जा रहा है । हमलोग उसी पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल हैं ॥ ८ ॥
अग्नि, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु एवं अन्य ९ समस्त दिक्पाल उसके वशमें हो गये हैं । सभी देवता अपने समस्त परिकरोंसहित मनुष्यधर्मा हो गये हैं और उसकी सेवा करते हैं । वे किसी प्रकार भी स्वतन्त्र १० नहीं हैं॥९ -१० ॥ इस प्रकार उससे पीड़ित होकर सभी देवता सदा ११ उसके वशवर्ती हो गये हैं और उसकी इच्छाके अनुसार कार्य करते हैं तथा उसके अनुजीवी हो गये हैं ॥ ११ ॥
उस महाबली तारकने जितनी भी सुन्दर स्त्रियाँ १२ हैं तथा अप्सराएँ हैं, उन सबको ग्रहण कर लिया है ॥१२ ॥
अब यज्ञ - याग सम्पन्न नहीं होते, तपस्वी लोग १३ तपस्या भी नहीं कर पाते । लोकोंमें दान, धर्म आदि कुछ भी नहीं हो रहा है । उसका सेनापति दानव क्रौंच अत्यन्त पापी है । वह पाताललोकमें जाकर प्रजाओंको १४ निरन्तर पीड़ित करता है । हे जगद्धाता! उस निष्करुण तथा पापी तारकने हमारे सम्पूर्ण त्रिलोकको बलपूर्वक १५ अपने वशमें कर लिया है । अब आप ही जो स्थान बतायें, वहाँ हमलोग जायँ । हे लोकनाथ! उस देवशत्रुने हमलोगोंको अपने - अपने स्थानोंसे हटा दिया १६ है । अब आप ही हमलोगोंके शरणदाता हैं । आप ही हमारे शासक, रक्षक तथा पोषक हैं । हम सभी लोग १७ तारक नामक अग्निमें दग्ध होकर बहुत व्याकुल हो रहे हैं ॥ १३–१७ ॥ जिस प्रकार सन्निपात नामक विकारमें बलवान् १८ औषधियाँ भी निष्फल हो जाती हैं, उसी प्रकार उसने हमारे सभी कठोर उपायोंको निष्फल कर दिया है ॥ १८ ॥
भगवान् विष्णुके जिस सुदर्शन नामक चक्रसे १ ९ हमलोगोंको विजयकी आशा थी, वह उसके कण्ठमें पुष्पके समान लगकर कुण्ठित हो गया है ॥१ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! देवताओंके इस वचनको सुनकर मैं सभी देवताओंसे समयोचित बात २० | कहने लगा- ॥ २० ॥
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५६२ ब्रह्मोवाच ममैव वचसा दैत्यस्तारकाख्यः समेधितः न मत्तस्तस्य हननं युज्यते हि दिवौकसः
ततो नैव वधो योग्यो यतो वृद्धिमुपागतः ।
विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसांप्रतम् ॥
युष्माकं चाखिलं कार्यं कर्तुं योग्यो हि शंकरः ।
किन्तु स्वयं न शक्तो हि प्रतिकर्तुं प्रचोदितः ॥
तारकाख्यस्तु पापेन स्वयमेष्यति संक्षयम् ।
यथा यूयं संविदध्वमुपदेशकरस्त्वहम् ॥
न मया तारको वध्यो हरिणापि हरेण च ।
नान्येनापि सुरैर्वापि मद्वरात्सत्यमुच्यते ॥
शिववीर्यसमुत्पन्नो यदि स्यात्तनयः सुराः ।
स एव तारकाख्यस्य हन्ता दैत्यस्य नापरः ॥
यमुपायमहं वच्मि तं कुरुध्वं सुरोत्तमाः ।
महादेवप्रसादेन सिद्धिमेष्यति स ध्रुवम् ॥
सती दाक्षायणी पूर्वं त्यक्तदेहा तु याभवत् ।
सोत्पन्ना मेनकागर्भात्सा कथा विदिता हि वः ॥
तस्या अवश्यं गिरिशः करिष्यति करग्रहम् ।
तत्कुरुध्वमुपायं च तथापि त्रिदिवौकसः ॥
तथा विदध्वं सुतरां तस्यां तु परियत्नतः ।
पार्वत्यां मेनकाजायां रेतः प्रतिनिपातने ॥
तमूर्ध्वरेतसं शंभुं सैव प्रच्युतरेतसम् ।
कर्तुं समर्था नान्यास्ति तथा काप्यबला बलात् ॥
सा सुता गिरिराजस्य सांप्रतं प्रौढयौवना ।
तपस्यन्तं हिमगिरौ नित्यं संसेवते हरम् ॥
वाक्याद्धिमवतः काली स्वपितुर्हठतश्शिवा ।
सखीभ्यां सेवते सार्धं ध्यानस्थं परमेश्वरम् ॥
तामग्रतोऽर्चमानां वै त्रैलोक्ये वरवर्णिनीम् ।
ध्यानासक्तो महेशो हि मनसापि न हीयते ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ०१६ ब्रह्माजी बोले- हे देवगणो! मेरे वरदानके । कारण ही वह तारक नामक दैत्य बलवान् ॥ २१ अतः मेरे द्वारा उसका वध उचित नहीं है हुआ । जिसके है । द्वारा वह वृद्धिको प्राप्त हुआ है, उसीसे उसका वध उचित नहीं है । विषवृक्षको भी बढ़ाकर उसे स्वयं २२ काटना अनुचित है ॥ २१-२२ ॥ शिवजी ही आपलोगोंका सारा कार्य कर २३ सकनेयोग्य हैं, किंतु वे स्वयं कुछ नहीं करेंगे, प्रेरणा करनेपर वे इसका प्रतीकार करनेमें समर्थ हैं ॥ २३ ॥
तारकासुर स्वयं अपने पापसे नष्ट होगा । मैं २४ जैसा उपदेश करता हूँ, वैसा आपलोग करें ॥ २४ ॥
मेरे वरके प्रभावसे न मैं, न विष्णु, न शंकर, न २५ दूसरा कोई और न सभी देवता ही तारकका वध कर सकते हैं, यह मैं सत्य कह रहा हूँ । हे देवताओ! यदि शिवजीके वीर्यसे कोई पुत्र उत्पन्न हो, तो वही तारक २६ दैत्यका वध कर सकता है, दूसरा नहीं॥२५-२६ ॥ हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं जो उपाय बता रहा हूँ, २७ उसे आपलोग कीजिये, वह उपाय महादेवजीकी कृपासे अवश्य सिद्ध होगा । पूर्वकालमें जिन दक्षकन्या सतीने [ दक्षके यज्ञमें ] अपने शरीरका त्याग किया २८ था, वे ही [ इस समय ] मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई हैं, यह बात आपलोगोंको ज्ञात ही है ॥। २७-२८ ॥ हे देवगणो! महादेवजी उनका पाणिग्रहण अवश्य २ ९ करेंगे, तथापि आपलोग भी उसका उपाय करें ॥ २ ९ ॥ आपलोग यत्नपूर्वक ऐसा उपाय कीजिये कि ३० मेनाकी पुत्री पार्वतीमें शिवजीके वीर्यका आधान हो ॥३० ॥
ऊर्ध्वरेता शंकरको च्युतवीर्य करनेमें वे ही समर्थ ३१ हैं, कोई अन्य स्त्री समर्थ नहीं है ॥ ३१ ॥
पूर्ण यौवनवाली वे गिरिराजपुत्री इस समय ३२ हिमालयपर तपस्या करते हुए शंकरकी नित्य सेवा करती हैं ॥३२ ॥
अपने पिता हिमवान्के कहनेसे वे काली शिवा ३३ अपनी दो सखियोंके साथ ध्यानपरायण परमेश्वर । शिवकी हठपूर्वक सेवा कर रही हैं । सेवामें तत्पर उन | त्रैलोक्य - सुन्दरीको सामने देखकर ध्यानमग्न महेश्वर ३४ । मनसे भी विचलित नहीं होते ॥ ३३-३४ ॥
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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५६३
भार्यां समीहेत यथा स कालीं चन्द्रशेखरः ।
तथा विधध्वं त्रिदशा न चिरादेव यत्नतः ॥
स्थानं गत्वाथ दैत्यस्य तमहं तारकं ततः ।
निवारयिष्ये कुहठात्स्वस्थानं गच्छतामराः ॥
इत्युक्त्वाहं सुरान् शीघ्रं तारकाख्यासुरस्य वै ।
उपसङ्गम्य सुप्रीत्या समाभाष्येदमब्रवम् ॥
ब्रह्मोवाच
तेजः सारमिमं स्वर्गं राज्यं त्वं परिपासि नः ।
यदर्थं सुतपस्तप्तं वाञ्छसि त्वं ततोऽधिकम् ॥
वरश्चाप्यवरो दत्तो न मया स्वर्गराज्यता ।
तस्मात्स्वर्गं परित्यज्य क्षितौ राज्यं समाचर ॥
देवयोग्यानि तत्रैव कार्याणि निखिलान्यपि ।
भविष्यन्त्यसुरश्रेष्ठ नात्र कार्या विचारणा ॥
इत्युक्त्वाहं च संबोध्यासुरं तं सकलेश्वरः ।
स्मृत्वा शिवां च सशिवं तत्रान्तर्धानमागतः ॥
तारकोऽपि परित्यज्य स्वर्गं क्षितिमथाभ्यगात् ।
शोणिताख्यपुरे स्थित्वा सर्वराज्यं चकार सः ॥
देवाः सर्वेऽपि तच्छ्रुत्वा मद्वाक्यं सुप्रणम्य माम् ।
शक्रस्थानं ययुः प्रीत्या शक्रेण सुसमाहिताः ॥
तत्र गत्वा मिलित्वा च विचार्य च परस्परम् ।
ते सर्वे मरुतः प्रीत्या मघवन्तं वचोऽब्रुवन् ॥
देवा ऊचुः
शम्भोर्यथा शिवायां वै रुचिर्जायेत कामतः ।
मघवंस्ते प्रकर्तव्यं ब्रह्मोक्तं सर्वमेव तत् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येवं सर्ववृत्तान्तं विनिवेद्य सुरेश्वरम् ।
जग्मुस्ते सर्वतो देवाः स्वं स्वं स्थानं मुदान्विताः ॥
हे देवताओ! वे चन्द्रशेखर जिस प्रकार कालीको ३५ भार्यारूपमें स्वीकार करें, आपलोग शीघ्र ही वैसा प्रयत्न करें । मैं भी उस दैत्यके स्थानपर जाकर उस ३६ तारकको दुराग्रहसे रोकूँगा । हे देवताओ! अब आपलोग अपने स्थानको जाइये । देवताओंसे इस प्रकार कहकर मैं शीघ्र ही तारक नामक असुरके पास जाकर उसे ३७ प्रेमपूर्वक बुलाकर कहने लगा- ॥ ३५-३७ ॥ ब्रह्माजी बोले – [ हे तारक! ] तुम तेजोंके सारस्वरूप इस स्वर्गका राज्य कर रहे हो । जिसके ३८ लिये तुमने उत्तम तपस्या की थी, उससे भी अधिककी इच्छा रखते हो ॥३८ ॥
मैंने [ तुम्हें ] इससे छोटा ही वर दिया था, मैंने ३ ९ तुम्हें स्वर्गका राज्य नहीं दिया था, इसलिये तुम स्वर्गका राज्य छोड़कर पृथिवीपर राज्य करो ॥३ ९ ॥ हे असुरश्रेष्ठ! इसमें तुम किसी प्रकार विचार मत ४० करो, वहाँ भी बहुत - से देवताओंके योग्य कार्य हैं ॥ ४० ॥
सभीका ईश्वर मैं इस प्रकार उस असुरसे ४१ कहकर और उसे समझाकर शिवासहित शिवका ध्यान करके वहीं अन्तर्धान हो गया । उसके बाद तारक भी स्वर्गको छोड़कर पृथिवीपर आ गया और ४२ वह शोणित नामक नगरमें रहकर राज्य करने लगा । सभी देवगण भी मेरा वचन सुनकर मुझे सादर प्रणाम करके समाहितचित्त हो इन्द्रके साथ इन्द्रपुरीको ४३ गये ॥ ४१–४३ ॥ वहाँ जाकर मिल करके आपसमें विचार करके ४४ उन सब देवताओंने इन्द्रसे प्रेमपूर्वक कहा —॥४४ ॥
देवता बोले - हे इन्द्र! जिस प्रकार भगवान् शंकर सकाम होकर शिवाकी अभिलाषा करें, ब्रह्माजीके ४५ द्वारा बताया हुआ वह सारा प्रयत्न आपको करना चाहिये ॥ ४५ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार इन्द्रसे सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित करके वे देवता प्रसन्नतापूर्वक सब ४६ ओर अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ४६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे देवसांत्वनवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें देवसान्त्वनवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
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५६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ अथ सप्तदशोऽध्यायः इन्द्रके स्मरण करनेपर कामदेवका उपस्थित होना, शिवको तपसे विचलित करनेके लिये इन्द्रद्वारा कामदेवको भेजना ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु देवेषु शक्रः सस्मार वै स्मरम् ।
पीडितस्तारकेनाति दैत्येन च दुरात्मना ॥
आगतस्तत्क्षणात्कामः सवसन्तो रतिप्रियः ।
सावलेपो युतो रत्या त्रैलोक्यविजयी प्रभुः ॥
प्रणामं च ततः कृत्वा स्थित्वा तत्पुरतः स्मरः ।
महोन्नतमनास्तात साञ्जलिः शक्रमब्रवीत् ॥
काम उवाच किं कार्यं ते समुत्पन्नं स्मृतोऽहं केन हेतुना । ब्रह्माजी बोले- उन देवताओंके चले जानेपर दुरात्मा तारकासुरसे अत्यन्त पीड़ित हुए इन्द्रने कामका १ स्मरण किया । उसी समय वसन्तको साथ लेकर रतिपति त्रैलोक्यविजयी समर्थ कामदेव रतिके साथ साभिमान वहाँ उपस्थित हुआ ॥ १-२ ॥ हे तात! प्रणाम करके उनके समक्ष खड़ा ३ होकर हाथ जोड़कर वह महामनस्वी काम इन्द्रसे कहने लगा -॥३ ॥
काम बोला— हे देवेश! आपको कौन - सा कार्य आ पड़ा है, आपने किस कारणसे मेरा स्मरण तत् त्वं कथय देवेश तत्कर्तुं समुपागतः ॥ ४ किया है, उसे शीघ्र ही कहिये, मैं उसे करनेके लिये ब्रह्मोवाच
तत्छ्रुत्वा वचनं तस्य कंदर्पस्य सुरेश्वरः ।
उवाच वचनं प्रीत्या युक्तं युक्तमिति स्तुवन् ॥
शक्र उवाच
तव साधु समारम्भो यन्मे कार्यमुपस्थितम् ।
तत्कर्तुमुद्यतोऽसि त्वं धन्योऽसि मकरध्वज ॥
प्रस्तुतं शृणु मद्वाक्यं कथयामि तवाग्रतः ।
मदीयं चैव यत्कार्यं त्वदीयं तन्न चान्यथा ॥
मित्राणि मम सन्त्येव बहूनि सुमहान्ति च ।
परं तु स्मर सन्मित्रं त्वत्तुल्यं न हि कुत्रचित् ॥
जयार्थं मे द्वयं तात निर्मितं वज्रमुत्तमम् ।
वज्रं च निष्फलं स्याद्वै त्वं तु नैव कदाचन ॥
यतो हितं प्रजायेत ततः को नु प्रियः परः ।
तस्मान्मित्रवरस्त्वं हि मत्कार्यं कर्तुमर्हसि ॥
मम दुःखं समुत्पन्नमसाध्यं चापि कालजम् ।
केनापि नैव तच्छक्यं दूरीकर्तुं त्वया विना ॥
ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ ॥४ ॥
ब्रह्माजी बोले- उस कामके इस वचनको सुनकर बहुत अच्छा, बहुत अच्छा - यह कहकर ५ देवराज प्रेमपूर्वक यह वचन कहने लगे —॥५ ॥
इन्द्र बोले- मेरा जिस प्रकारका कार्य उपस्थित हुआ है, उसको करनेमें तुम्हीं समर्थ हो, हे मकरध्वज! ६ तुम धन्य हो, जो उसे करनेके लिये उद्यत हो ॥६ ॥
मेरे प्रस्तुत वाक्यको सुनो, मैं तुम्हारे सामने ७ कह रहा हूँ, मेरा जो कार्य है, वह तुम्हारा ही है, इसमें सन्देह नहीं है । मेरे बहुत - से महान् मित्र हैं, ८ किंतु हे काम! तुम्हारे समान उत्तम मित्र कहीं भी नहीं है ॥ ७-८ ॥ हे तात! विजय प्राप्त करनेके लिये मेरे पास दो ९ ही उपाय हैं, एक वज्र और दूसरे तुम, जिसमें वज्र | तो [ कदाचित् ] निष्फल भी हो जाता है, किंतु तुम कभी निष्फल होनेवाले नहीं हो ॥ ९ ॥
जिससे अपना हित हो, उससे प्रिय और कौन हो १० सकता है? इसलिये तुम मेरे सर्वश्रेष्ठ मित्र हो, तुम अवश्य ही मेरा कार्य सम्पन्न कर सकते हो ॥१० ॥
समयानुसार मेरे सामने असाध्य दुःख उत्पन्न हो गया है, तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी उसे दूर करने में ११ । समर्थ नहीं है ॥ ११ ॥
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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५६५
दातुः परीक्षा दुर्भिक्षे रणे शूरस्य जायते ।
आपत्काले तु मित्रस्याशक्तौ स्त्रीणां कुलस्य हि ॥
विनये संकटे प्राप्तेऽवितथस्य परोक्षतः ।
सुस्नेहस्य तथा तात नान्यथा सत्यमीरितम् ॥
प्राप्तायां वै ममापत्ताववार्यायां परेण हि ।
परीक्षा च त्वदीयाद्य मित्रवर्य भविष्यति ॥
न केवलं मदीयं च कार्यमस्ति सुखावहम् ।
किं तु सर्वसुरादीनां कार्यमेतन्न संशयः ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येतन्मघवद्वाक्यं श्रुत्वा तु मकरध्वजः ।
उवाच प्रेमगंभीरं वाक्यं सुस्मितपूर्वकम् ॥
काम उवाच
किमर्थमित्थं वदसि नोत्तरं वच्म्यहं तव ।
उपकृत्कृत्रिमं लोके दृश्यते कथ्यते न च ॥
सङ्कटे बहु यो ब्रूते स किं कार्यं करिष्यति ।
तथापि च महाराज कथयामि शृणु प्रभो ॥
पदं ते कर्षितुं यो वै तपस्तपति दारुणम् ।
पातयिष्याम्यहं तं च शत्रुं ते मित्र सर्वथा ॥
क्षणेन भ्रंशयिष्यामि कटाक्षेण वरस्त्रियाः ।
देवर्षिदानवादींश्च नराणां गणना न मे ॥
वज्रं तिष्ठतु दूरे वै शस्त्राण्यन्यान्यनेकशः ।
किं ते कार्यं करिष्यन्ति मयि मित्र उपस्थिते ॥
ब्रह्माणं वा हरिं वापि भ्रष्टं कुर्यां न संशयः ।
अन्येषां गणना नास्ति पातयेयं हरं त्वपि ॥
पञ्चैव मृदवो बाणास्ते च पुष्पमया मम ।
चापस्त्रिधा पुष्पमयश्शिञ्जिनी भ्रमरार्जिता ॥
बलं सुदयिता मे हि वसंतः सचिवः स्मृतः ।
अहं पञ्चबलो देव मित्रं मम सुधानिधिः ॥
दुर्भिक्ष पड़नेपर दानीकी, युद्धस्थलमें १२ शूरवीरकी, आपत्तिकालमें मित्रकी, असमर्थ होनेपर स्त्रियोंकी तथा कुलकी, नम्रतामें तथा संकटके उपस्थित होनेपर सत्यकी और उत्तम स्नेहकी परीक्षा १३ परोक्षकालमें होती है, यह अन्यथा नहीं है, यह सत्य कहा गया है॥१२-१३ ॥ हे मित्रवर्य! दूसरेके द्वारा दूर न की जा १४ सकनेवाली मेरी इस विपत्तिके आ पड़नेपर आज तुम्हारी परीक्षा होगी ॥ १४ ॥
सुखकी प्राप्ति करानेवाला यह कार्य केवल मेरा १५ ही नहीं है, अपितु यह सभी देवता आदिका कार्य है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १५ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार इन्द्रके इस वचनको सुनकर कामदेव मुसकराते हुए प्रेमयुक्त वचन कहने १६ | लगा— ॥ १६ ॥
काम बोला — हे देवराज! आप इस प्रकारकी बातें क्यों कर रहे हैं? मैं आपको उत्तर नहीं दे सकता । १७ बनावटी मित्र ही लोकमें देखे जाते हैं, वास्तविक उपकारीके विषयमें कुछ कहा नहीं जाता है ॥ १७ ॥
जो [ मित्र ] संकटमें बहुत बातें करता है, वह १८ क्या कार्य करेगा, फिर भी हे महाराज! हे प्रभो! मैं कुछ कह रहा हूँ, उसे आप सुनें ॥१८ ॥
हे मित्र! जो आपका पद छीननेके लिये कठोर १ ९ तपस्या कर रहा है, मैं आपके उस शत्रुको तपसे सर्वथा च्युत कर दूँगा । चाहे वह देवता, ऋषि एवं दानव आदि कोई हो, उसे क्षणभरमें सुन्दर स्त्रीके २० कटाक्षसे भ्रष्ट कर दूँगा, फिर मनुष्योंकी तो मेरे सामने कोई गणना ही नहीं है ॥ १ ९ -२० ॥ आपके वज्र और अन्य बहुत - से शस्त्र दूर ही रहें । २१ मेरे - जैसे मित्रके रहते वे आपका क्या कार्य कर सकते हैं । मैं ब्रह्मा तथा विष्णुको भी विचलित कर सकता हूँ । [ अधिक क्या कहूँ ] मैं शंकरको भी भ्रष्ट कर सकता २२ हूँ, औरोंकी तो गणना ही नहीं है ॥ २१-२२ ॥ मेरे पास पाँच ही कोमल बाण हैं और वे भी २३ पुष्पनिर्मित हैं, तीन प्रकारवाला मेरा धनुष भी पुष्पमय है, उसकी डोरी भ्रमरोंसे युक्त है । मेरा बल २४ सुन्दर स्त्री है तथा वसन्त मेरा सचिव कहा गया है ।
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५६६ सेनाधिपश्च शृङ्गारो हावभावाश्च सैनिकाः सर्वे मे मृदवः शक्र अहं चापि तथाविधः यद्येन पूर्यते कार्यं धीमांस्तत्तेन योजयेत् मम योग्यं तु यत्कार्यं सर्वं तन्मे नियोजय ब्रह्मोवाच इत्येवं तु वचस्तस्य श्रुत्वा शक्रः सुहर्षितः उवाच प्रणमन्वाचा कामं कांतासुखावहम् शक्र उवाच यत्कार्यं मनसोद्दिष्टं मया तात मनोभव कर्त्तुं तत् त्वं समर्थोऽसि नान्यस्मात्तस्य सम्भवः शृणु काम प्रवक्ष्यामि यथार्थं मित्रसत्तम । यदर्थे च स्पृहा जाता तव चाद्य मनोभव तारकाख्यो महादैत्यो ब्रह्मणो वरमद्भुतम् । अभूतजेयः संप्राप्य सर्वेषामपि दुःखदः
तेन संपीड्यते लोको नष्टा धर्मा ह्यनेकशः ।
दुःखिता निर्जराः सर्वे ऋषयश्च तथाखिलाः ॥
देवैश्च सकलैस्तेन कृतं युद्धं यथाबलम् ।
सर्वेषां चायुधान्यत्र विफलान्यभवन्पुरा ॥
भग्नः पाशो जलेशस्य हरिचक्रं सुदर्शनम् ।
तत्कुण्ठितमभूत्तस्य कण्ठे क्षिप्तं च विष्णुना ॥
एतस्य मरणं प्रोक्तं प्रजेशेन दुरात्मनः ।
शम्भोर्वीयोद्भवाद्बालान्महायोगीश्वरस्य हि ॥
एतत्कार्यं त्वया साधु कर्तव्यं सुप्रयत्नतः ।
ततः स्यान्मित्रवर्याति देवानां नः परं सुखम् ॥
ममापि विहितं तस्मात्सर्वलोकसुखावहम् ।
मित्रधर्मं हृदि स्मृत्वा कर्तुमर्हसि सांप्रतम् ॥
शंभुः स गिरिराजे हि तपः परममास्थितः ।
स प्रभुर्नापि कामेन स्वतंत्रः परमेश्वरः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १७ । । हे देव! इस प्रकार मैं पंचबल [ पाँच बलोंवाला ॥ २५ चन्द्रमा मेरा मित्र है, शृंगार मेरा सेनापति है और ] हूँ । भाव मेरे सैनिक हैं । हे इन्द्र! ये सभी मेरे उपकरण हाव-। मृदु हैं और मैं भी उसी प्रकारका हॅू ॥ २३–२५ 1 ॥ जिससे जो कार्य पूर्ण हो, बुद्धिमान् व्यक्तिको ॥ ॥ २६ चाहिये कि उसको उसी कार्यमें नियुक्त करे । अतः [ हे इन्द्र! ] मेरे योग्य जो भी कार्य हो, उसमें आप मुझे नियुक्त करें ॥ २६ ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] इस प्रकार उसके । वचनको सुनकर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और ॥ २७ वाणीसे सत्कार करते हु वे स्त्रियोंको सुख देनेवाले । कामसे कहने लगे - ॥२७ ॥
शक्र बोले- हे तात! हे कामदेव! मैंने जो कार्य । [ अपने ] मनमें सोचा है, उसे करनेमें केवल तुम ही ॥ २८ समर्थ हो, वह कार्य दूसरेसे होनेवाला नहीं है ॥२८ ॥
हे काम! हे मित्रवर्य! हे मनोभव! जिस कार्यके ॥ २ ९ लिये आज तुम्हारी आवश्यकता हुई है, उसे मैं यथार्थ रूपसे कह रहा हूँ, तुम उसे सुनो । इस समय तारक नामक महादैत्य ब्रह्मासे अद्भुत वरदान पाकर अजेय हो ॥ ३० गया है और सभीको पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ २ ९ -३० ॥ वह सारे संसारको पीड़ा दे रहा है, [ उसके ३१ कारण ] सभी धर्म भी नष्ट हो गये हैं, सभी देवता तथा ऋषिगण दुःखित हैं ॥३१ ॥
देवताओंने अपने बलके अनुसार उससे युद्ध भी किया, ३२ किंतु सभीके शस्त्र उसके सामने व्यर्थ हो गये ॥ ३२ ॥
वरुणका पाश टूट गया और विष्णुके द्वारा ३३ उसके कण्ठपर प्रहार किया गया, किंतु उनका वह । सुदर्शन चक्र भी कुण्ठित हो गया । ब्रह्माजीने दुरात्मा | दैत्यकी मृत्युका निर्धारण महायोगीश्वर शिवके वीर्यसे ३४ उत्पन्न हुए पुत्रके द्वारा किया है । अब तुम्हें प्रयत्नपूर्वक । इस कार्यको अच्छी तरह करना चाहिये । हे मित्र! इस ३५ कार्यसे देवताओंको महान् सुख होगा ॥ ३३-३५ ॥ अतः तुम हृदयमें मित्रधर्मका स्मरण करके मेरे ३६ लिये भी हितकर तथा सभी लोकोंको सुख देनेवाले इस कार्यको इसी समय सम्पन्न करो ॥ ३६ ॥
वे परमेश्वर प्रभु कामनासे परे हैं । वे शम्भु इस ३७ समय हिमालयपर्वतपर परम तप कर रहे हैं ॥ ३७ ॥
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता (
तत्समीपे च देवार्थं पार्वती स्वसखीयुता ।
सेवमाना तिष्ठतीति पित्राज्ञप्ता मया श्रुतम् ॥ ३८
यथा तस्यां रुचिस्तस्य शिवस्य नियतात्मनः ।
जायेत नितरां मार तथा कार्यं त्वया ध्रुवम् ॥ ३ ९
इति कृत्वा कृती स्यास्त्वं सर्वं दुःखं विनङ्क्ष्यति ।
लोके स्थायी प्रतापस्ते भविष्यति न चान्यथा ॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तः स तु कामो हि प्रफुल्लमुखपंकजः ।
प्रेम्णोवाचेति देवेशं करिष्यामि न संशयः ॥ ४१
इत्युक्त्वा वचनं तस्मै तथेत्योमिति तद्वचः ।
अग्रहीत्तरसा कामः शिवमायाविमोहितः ॥ ४२
यत्र योगीश्वरः साक्षात्तप्यते परमं तपः ।
जगाम तत्र सुप्रीतः सदारः सवसन्तकः ॥ ४३
पार्वतीखण्ड ) ५६७ मैंने ऐसा सुना है कि उनके समीप ही पार्वती अपने पितासे आज्ञा लेकर अपनी सखियोंके साथ उन्हें प्रसन्नकर अपना पति बनानेके उद्देश्यसे सेवापरायण रहती हैं ॥३८ ॥
हे काम! इस प्रकारका उपाय करना चाहिये, जिससे कि चित्तको वशमें रखनेवाले शिवजीकी अभिरुचि पार्वतीमें हो जाय । ऐसा करके तुम कृतकृत्य हो जाओगे और सारा दुःख नष्ट हो जायगा । तुम्हारी कीर्ति भी संसारमें चिरस्थायी हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥३ ९ -४० ॥ ब्रह्माजी बोले- इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर कामदेवका मुखकमल खिल उठा और उसने प्रेमपूर्वक इन्द्रसे कहा- मैं [ आपका यह कार्य ] निःसन्देह करूँगा ॥ ४१ ॥
शिवकी मायासे मोहित कामदेवने उनके वचनको ' ओम् ' ऐसा कहकर शीघ्रतापूर्वक स्वीकार कर लिया । तत्पश्चात् जहाँ साक्षात् योगीश्वर शंकर कठोर तप कर रहे थे, वहाँ प्रसन्नचित्त होकर अपनी पत्नी तथा । वसन्तको साथ लेकर कामदेव पहुँच गया ॥ ४२-४३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शक्रकामसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें इन्द्रकामदेवसंवादवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः कामदेवद्वारा असमयमें वसन्त ऋतुका प्रभाव प्रकट करना, कुछ क्षणके लिये शिवका मोहित होना, ब्रह्मोवाच
तत्र गत्वा स्मरो गर्वी शिवमायाविमोहितः ।
मोहकः स मधोश्चादौ धर्मं विस्तारयन्स्थितः ॥
वसंतस्य च यो धर्मः प्रससार स सर्वतः ।
तपःस्थाने महेशस्यौषधिप्रस्थे मुनीश्वर ॥
वनानि च प्रफुल्लानि पादपानां महामुने ।
आसन्विशेषतस्तत्र तत्प्रभावान्मुनीश्वर ॥
पुनः वैराग्य - भाव धारण करना ब्रह्माजी बोले- शिवजीकी मायासे मोहित होकर वह महाभिमानी तथा मोह उत्पन्न करनेवाला १ काम शिवजीके समीप जाकर वसन्त ऋतुके गुण-धर्मको फैलाता हुआ वहाँ स्थित हो गया ॥ १ ॥
हे मुनीश्वर! वसन्तका जो प्रभाव है, वह २ महेशके तपःस्थान औषधिशिखरपर सभी ओर फैल गया ॥२ ॥
हे महामुने! हे मुनीश्वर! वहाँ उसके प्रभावसे ३ । पादपोंके वन विशेषरूपसे पुष्पित हो उठे ॥३ ॥
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५६८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८
पुष्पाणि सहकाराणामशोकवनिकासु वै ।
विरेजुस्सुस्मरोद्दीपकराणि सुरभीण्यपि ॥
कैरवाणि च पुष्पाणि भ्रमराकलितानि च ।
बभूवुर्मदनावेशकराणि च विशेषतः ॥
सुकामोद्दीपनकरं कोकिलाकलकूजितम् ।
आसीदति सुरम्यं हि मनोहरमतिप्रियम् ॥
भ्रमराणां तथा शब्दा विविधा अभवन्मुने ।
मनोहराश्च सर्वेषां कामोद्दीपकरा अपि ॥
चंद्रस्य विशदा कांतिर्विकीर्णा हि समन्ततः ।
कामिनां कामिनीनां च दूतिका इव साभवत् ॥
मानिनां प्रेरणायासीत्तत्काले कालदीपिका ।
मारुतश्च सुखः साधो ववौ विरहिणोऽप्रियः ॥
एवं वसंतविस्तारो मदनावेशकारकः ।
वनौकसां तदा तत्र मुनीनां दुस्सहोऽत्यभूत् ॥
अचेतसामपि तदा कामासक्तिरभून्मुने ।
सुचेतसां हि जीवानां सेति किं वर्ण्यते कथा ॥
एवं चकार स मधुः स्वप्रभावं सुदुस्सहम् ।
सर्वेषां चैव जीवानां कामोद्दीपनकारकः ॥
अकालनिर्मितं तात मधोर्वीक्ष्य हरस्तदा ।
आश्चर्यं परमं मेने स्वलीलात्ततनुः प्रभुः ॥
अथ लीलाकरस्तत्र तपः परमदुष्करम् ।
तताप स वशीशो हि हरो दुःखहरः प्रभुः ॥
वसंते प्रसृते तत्र कामो रतिसमन्वितः ।
चूतं बाणं समाकृष्य स्थितस्तद्वामपार्श्वतः ॥
स्वप्रभावं वितस्तार मोहयन्सकलान् जनान् ।
रत्या युक्तं तदा कामं दृष्ट्वा को वा न मोहितः ॥
एवं प्रवृत्तसुरतौ शृङ्गारोऽपि गणैः सह ।
हावभावयुतस्तत्र प्रविवेश हरान्तिकम् ॥
अशोककी वाटिकाओंमें सहकारोंके कामोद्दीपक ४ तथा सुगन्धित पुष्प विराजने लगे I । भौंरोंसे घिरे | कुमुदके पुष्प विशेषरूपसे कामावेशको बढ़ानेवाले हुए ५ हो गये॥४-५ ॥ [ उस समय ] कोयलोंका कलरव कामको ६ अत्यधिक उद्दीप्त करनेवाला, सुरम्य, मनोहर और अतिप्रिय हो गया ॥६ ॥
हे मुने! भौंरोंके अनेक प्रकारके शब्द होने लगे, ७ जो सबके मनको हर लेनेवाले तथा काम - वासनाको उत्तेजित करनेवाले थे । चन्द्रमाकी मनोहर ज्योत्स्ना चारों ओर फैल गयी, वह कामियों तथा कामिनियोंकी ८ दूतीके समान हो गयी । वह [ ज्योत्स्ना ] मानीजनोंको रति आदिके लिये प्रेरित तथा रतिकालको और भी उद्दीप्त ९ करनेवाली थी । हे साधो! [ उस समय ] विरहीजनके लिये अप्रिय सुखकारी वायु बहने लगी ॥ ७ – ९ ॥ इस प्रकार कामावेशको बढ़ानेवाला वह वसन्तका १० विस्तार वहाँ वनमें रहनेवाले मुनियोंके लिये भी अत्यन्त असह्य हो गया ॥ १० ॥
हे मुने! उस समय जड़ पदार्थोंमें भी जब कामका ११ संचार होने लगा, तब सचेतन प्राणियोंकी कथाका किस प्रकार वर्णन किया जाय । इस प्रकार सभी प्राणियोंके लिये कामको उद्दीप्त करनेवाले उस वसन्तने अपना १२ अत्यन्त दुस्सह प्रभाव उत्पन्न किया ॥ ११-१२ ॥ हे तात! तब अपनी लीलाके लिये शरीर धारण १३ करनेवाले प्रभु शंकरने असमयमें उस वसन्तके प्रभावको देखकर इसे महान् आश्चर्य समझा ॥१३ ॥
इसके बाद लीला करनेवाले तथा दुःखहरण १४ | करनेवाले परम संयमी प्रभु शिव परम दुष्कर तपस्या करने लगे ॥ १४ ॥
तदनन्तर वहाँ वसन्तके फैल जानेपर रतिसहित १५ वह काम आम्रमंजरीका बाण चढ़ाकर उनके बाँयीं ओर खड़ा हो गया और प्राणियोंको मोहित करता हुआ अपना १६ । प्रभाव फैलाने लगा । उस समय रतिसहित कामको देखकर भला कौन [ प्राणी ] मोहित नहीं हुआ ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार उनके कामक्रीडामें प्रवृत्त हो जानेपर शृंगार भी हाव - भावसे युक्त होकर अपने गणोंके साथ १७ शिवजीके समीप पहुँचा ॥१७ ॥