श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 581–590
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५६ ९
मदनः प्रकटस्तत्र न्यवसच्चित्तगो बहिः ।
न दृष्टवांस्तदा शंभोश्छिद्रं येन प्रविश्यते ॥
यदा चाप्राप्तविवरस्तस्मिन्योगिवरे स्मरः ।
महादेवे तदा सोऽभून्महाभयविमोहितः ॥
ज्वलज्ज्वालाग्निसंकाशभालनेत्रसमन्वितम् ।
ध्यानस्थं शंकरं को वा समासादयितुं क्षमः ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सखीभ्यां संयुता शिवा ।
जगाम शिवपूजार्थं नीत्वा पुष्पाण्यनेकशः ॥
पृथिव्यां यादृशं लोकैः सौन्दर्यं वर्ण्यते महत् ।
तत्सर्वमधिकं तस्यां पार्वत्यामस्ति निश्चितम् ॥
आर्तवाणि सुपुष्पाणि धृतानि च तया यदा ।
तत्सौन्दर्यं कथं वर्ण्यमपि वर्षशतैरपि ॥
यदा शिवसमीपे तु गता सा पर्वतात्मजा ।
तदैव शंकरो ध्यानं त्यक्त्वा क्षणमवस्थितः ॥
तच्छिद्रं प्राप्य मदनः प्रथमं हर्षणेन तु ।
बाणेन हर्षयामास पार्श्वस्थं चन्द्रशेखरम् ॥
शृङ्गारैश्च तदा भावैः सहिता पार्वती हरम् ।
जगाम कामसाहाय्ये मुने सुरभिणा सह ॥
तदैवाकृष्य तच्चापं रुच्यर्थं शूलधारिणः ।
द्रुतं पुष्पशरं तस्मै स्मरोऽमुञ्चत्सुसंयतः ॥
यथा निरंतरं नित्यमागच्छति तथा शिवम् ।
तं । नमस्कृत्य तत्पूजां कृत्वा तत्पुरतः स्थिता ॥
सा दृष्टा पार्वती तत्र प्रभुणा गिरिशेन हि ।
विवृण्वती तदाङ्गानि स्त्रीस्वभावात्सुलज्जया ॥
सुसंस्मृत्य वरं तस्या विधिदत्तं पुरा प्रभुः ।
शिवोऽपि वर्णयामास तदङ्गानि मुदा मुने ॥
चित्तमें निवास करनेवाला कामदेव वहाँ बाहर १८ प्रकट हो गया, उस समय वह शंकरमें कोई छिद्र नहीं देख पाया, जिससे वह प्रवेश कर सके ॥ १८ ॥
जब कामदेवने उन योगि श्रेष्ठ महादेवमें छिद्र नहीं १ ९ पाया, तब वह महान् भयसे विमोहित हो गया ॥ १ ९ ॥ धधकती हुई ज्वालावाली अग्निके समान २० भालनेत्रसे युक्त ध्यानस्थ शंकरके पास जानेमें कौन समर्थ है? ॥२० ॥
इसी समय पार्वती भी दो सखियोंके साथ अनेक २१ प्रकारके पुष्प लेकर शिवकी पूजा करनेके लिये वहाँ पहुँच गयीं । लोग पृथिवीपर जिस - जिस प्रकारके २२ महान् सौन्दर्यका वर्णन करते हैं, वह सब तथा उससे भी अधिक सौन्दर्य उन पार्वतीजीमें है ॥ २१-२२ ॥ उन्होंने ऋतुकालीन सुन्दर पुष्पोंको धारण किया २३ था, उनकी सुन्दरताका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी कैसे किया जा सकता है! जिस समय वे पार्वती शिवजीके समीप पहुँचीं, उस समय शिवजी क्षणभरके लिये २४ ध्यान २५ हर्षण दिया २६ युक्त त्यागकर अवस्थित हो गये ॥ २३-२४ ॥ उस छिद्रको पाकर कामने पहले [ अपने ] नामक बाणसे समीपस्थ शंकरको हर्षित कर ॥ २५ ॥
हे मुने! उस समय पार्वती भी शृंगार एवं भावोंसे होकर मलयानिलके साथ [ मानो ] कामकी सहायता करनेके लिये शिवके सन्निकट गयी हुई थीं ॥ २६ ॥
उसी समय कामदेवने शूलधारी शिवको [ पार्वतीमें ] २७ रुचि उत्पन्न करनेके लिये अपना धनुष खींचकर शीघ्र ही बड़ी सावधानीसे उनपर पुष्प - बाण छोड़ा ॥२७ ॥
जिस प्रकार पार्वती नित्य निरन्तर शिवजीके २८ पास आती थीं, उसी प्रकार आकर उन्हें प्रणाम करके उनकी पूजाकर वे उनके सामने खड़ी हो गयीं ॥ २८ ॥
उस समय प्रभु शंकरने स्त्रीस्वभाववश २ ९ लज्जाके कारण अपने अंगोंको ढकती हुई उन पार्वतीको वहाँ देखा ॥ २ ९ ॥ हे मुने! पूर्व समयमें पार्वतीको ब्रह्माके द्वारा दिये गये वरदानका भलीभाँति स्मरण करके प्रभु शिव भी ३० । प्रसन्नतापूर्वक उनके अंगोंका वर्णन करने लगे ॥ ३० ॥
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५७० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १८ शिव उवाच
किं मुखं किं शशांकश्च किं नेत्रे चोत्पले च किम् ।
भ्रुकुट्यौ धनुषी चैते कंदर्पस्य महात्मनः ॥
अधरः किं च बिंबं किं किं नासा शुकचंचुका ।
किं स्वरः कोकिलालापः किं मध्यं चाथ वेदिका ॥
किं गतिर्वर्ण्यते ह्यस्याः किं रूपं वर्ण्यते मुहुः ।
पुष्पाणि किं च वर्ण्यन्ते वस्त्राणि च तथा पुनः ॥
लालित्यं चारु यत्सृष्टौ तदेकत्र विनिर्मितम् ।
सर्वथा रमणीयानि सर्वाङ्गानि न संशयः ॥
अहो धन्यतरा चेयं पार्वत्यद्भुतरूपिणी ।
एतत्समा न त्रैलोक्ये नारी कापि सुरूपिणी ॥
सुलावण्यनिधिश्चेयमद्भुताङ्गानि बिभ्रती ।
विमोहिनी मुनीनां च महासुखविवर्धिनी ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वर्णयित्वा तु तदङ्गानि मुहुर्मुहुः ।
विधिदत्तवराध्यासाद्धरस्तु विरराम ह ॥
हस्तं वस्त्रांतरे यावदचालयत शंकरः ।
स्त्रीस्वभावाच्च सा तत्र लज्जिता दूरतो गता ॥
विवृण्वती निजाङ्गानि पश्यंती च मुहुर्मुहुः ।
सुवीक्षणैर्महामोदात्सुस्मिताभूच्छिवा मुने ॥
एवं चेष्टां तदा दृष्ट्वा शंभुर्मोहमुपागतः ।
उवाच वचनं चैवं महालीलो महेश्वरः ॥
अस्या दर्शनमात्रेण महानंदो भवत्यलम् ।
यदालिङ्गनमेतस्याः कुर्यां किन्तु ततः सुखम् ॥
क्षणमात्रं विचार्येत्थं संपूज्य गिरिजां ततः ।
प्रबुद्धः स महायोगी सुविरक्तो जगाविति ॥
किं जातं चरितं चित्रं किमहं मोहमागतः ।
कामेन विकृतश्चाद्य भूत्वापि प्रभुरीश्वरः ॥
ईश्वरोऽहं यदीच्छेयं पराङ्गस्पर्शनं खलु ।
तर्हि कोऽन्योऽक्षमः क्षुद्रः किं किं नैव करिष्यति ॥
शिवजी बोले- यह मुख है या चन्द्रमा | नेत्र हैं अथवा दो कमल और ये दोनों भृकुटी, ये हैं य ३१ महात्मा कामदेवके धनुष, यह अधर है अथवा बिम्बफल | यह नासिका कोकिलकी ३२ [ कमर ] है इसकी ३३ रूपका क्या वस्त्रोंका भी सृष्टिमें है या तोतेकी चोंच है, यह स्वर है र मनोहर कूक है और यह मध्यभाग या वेदी है ॥ ३१-३२ ॥ चालका क्या वर्णन किया जाय, इसके वर्णन किया जाय और इसके पुष्पों तथा क्या वर्णन किया जाय! ॥ ३३ ॥
जितनी उत्तम सुन्दरता है, वह एकत्रितकर ३४ इसमें रच दी गयी है । इसके सभी अंग सब प्रकारसे रमणीय हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥३४ ॥
अहो! अद्भुत रूपवाली यह पार्वती धन्य है, ३५ तीनों लोकोंमें इसके समान सुन्दर रूपवाली कोई भी स्त्री नहीं है । अद्भुत अंगोंको धारण करनेवाली यह लावण्यकी निधि है । यह मुनियोंको भी मोहनेवाली ३६ और महासुखको बढ़ानेवाली है ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार बार - बार उनके अंगोंका वर्णन करके शिवजी ब्रह्माको दिये गये वरदानका ३७ । स्मरणकर मौन हो गये । उस समय ज्यों ही शंकरजीने उनके वस्त्रोंका स्पर्श किया, वे पार्वती स्त्रीस्वभावके ३८ कारण लज्जित होकर कुछ दूर चली गयीं ॥ ३७-३८ ॥ हे मुने! अपने अंगोंको छिपाती हुई तथा तीक्ष्ण ३ ९ कटाक्षोंसे बार - बार [ शिवजीकी ओर ] देखती हुई वे शिवा महामोदके कारण मुसकराने लगीं ॥ ३ ९ ॥ उनकी इस चेष्टाको देखकर शंकरजी मोहमें ४० पड़ गये और तब महान् लीला करनेवाले महेश्वरने | यह वचन कहा- जब इसके दर्शनमात्रसे इतना अधिक ४१ | आनन्द प्राप्त हो रहा है, तब यदि मैं इसका सामीप्य प्राप्त करूँ तो कितना सुख प्राप्त होगा । इस प्रकार | क्षणभर विचारकर गिरिजाकी प्रशंसा करके वे महायोगी ४२ बोधयुक्त हुए और विरक्त हो बोले - ॥ ४०-४२ ॥ यह कैसा विचित्र चरित्र हो गया? क्या मैं मोहको ४३ प्राप्त हो गया । प्रभु तथा ईश्वर होकर भी कामके कारण । मैं विकारयुक्त हो गया । मैं ईश्वर हूँ और यदि दूसरेके । | अंगस्पर्शकी मेरी यह इच्छा है, तो अन्य अक्षम तथा ४४ । क्षुद्र पुरुष क्या - क्या [ अनर्थ ] नहीं करेगा ॥ ४३-४४ ॥
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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५७१ एवं वैराग्यमासाद्य पर्यङ्कासादनं च तत् । इस प्रकार वैराग्यभावको प्राप्तकर उन सर्वात्माने पर्यंक एवं आसनका परित्याग कर दिया; क्योंकि क्या वारयामास सर्वात्मा परेशः किं पतेदिह ॥ ४५ परमेश्वर पतित हो सकता है!॥ ४५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे कामकृतविकारवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें कामकृतविकारवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः भगवान् शिवकी नेत्रज्वालासे कामदेवका भस्म होना और रतिका विलाप, देवताओं द्वारा रतिको सान्त्वना प्रदान करना और भगवान् शिवसे कामको जीवित नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग किं जातं तदनन्तरम् ।
कथय त्वं प्रसादेन तां कथां पापनाशिनीम् ॥ १
ब्रह्मोवाच
श्रूयतां सा कथा तात यज्जातं तदनन्तरम् ।
तव स्नेहात्प्रवक्ष्यामि शिवलीलां मुदावहाम् ॥ २
धैर्यस्य व्यसनं दृष्ट्वा महायोगी महेश्वरः ।
विचिचिन्त मनस्येवं विस्मितोऽति ततः परम् ॥ ३
शिव उवाच
किमु विघ्नाः समुत्पन्नाः कुर्वतस्तप उत्तमम् ।
केन मे विकृतं चित्तं कृतमत्र कुकर्मिणा ॥ ४
कुवर्णनं मया प्रीत्या परस्त्र्युपरि वै कृतम् ।
जातो धर्मविरोधोऽत्र श्रुतिसीमा विलंघिता ॥ ५
ब्रह्मोवाच
विचिंत्येत्थं महायोगी परमेशः सतां गतिः ।
दिशो विलोकयामास परितः शंकितस्तदा ॥ ६
वामभागे स्थितं कामं ददर्शाकृष्टबाणकम् ।
स्वशरं क्षेप्तुकामं हि गर्वितं मूढचेतसम् ॥ ७
तं
दृष्ट्वा तादृशं कामं गिरीशस्य परात्मनः ।
संजातः क्रोधसंमर्दस्तत्क्षणादपि नारद ॥ ८
करनेकी प्रार्थना करना नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग! इसके अनन्तर फिर क्या हुआ? आप मुझपर दयाकर इस पापको विनष्ट करनेवाली कथाका पुनः वर्णन कीजिये ॥१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे तात! इसके अनन्तर जो हुआ, उसे आप सुनें । मैं आपके स्नेहवश आनन्ददायक शिवलीलाका वर्णन करूँगा । [ हे नारद! ] उसके बाद महायोगी महेश्वर [ अपने ] धैर्यके नाशको देखकर अत्यन्त विस्मित हो मनमें इस प्रकार विचार करने लगे ॥ २-३ ॥ शिवजी बोले- मैं तो उत्तम तपस्या कर रहा था, उसमें विघ्न कैसे आ गया! किस कुकर्मीने यहाँ मेरे चित्तमें विकार पैदा कर दिया है! मैंने दूसरेकी स्त्रीके विषयमें प्रेमपूर्वक निन्दित वर्णन किया । यह तो धर्मका विरोध हो गया और शास्त्रमर्यादाका उल्लंघन हुआ ॥ ४-५ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब सज्जनोंके एकमात्र रक्षक महायोगी परमेश्वर शिव इस प्रकार विचारकर शंकित हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे । इसी समय वामभागमें बाण खींचे खड़े हुए कामपर उनकी दृष्टि पड़ी । वह मूढचित्त मदन अपनी शक्तिके गर्वसे चूर होकर पुनः अपना बाण छोड़ना ही चाह रहा था ॥ ६-७ ॥ हे नारद! उस अवस्थामें कामपर दृष्टि पड़ते ही परमात्मा गिरीशको तत्काल क्रोध उत्पन्न हो गया ॥ ८ ॥
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५७२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १ ९ कामः स्थितोऽन्तरिक्षे स धृत्वा तत्सशरं धनुः । मुने! इधर, आकाशमें बाणसहित धनुष लेकर चिक्षेपास्त्रं दुर्निवारममोघं शंकरे मुने ॥ ९ खड़े हुए कामने भगवान् शंकरपर अपना दुर्निवार अमोघ अस्त्र छोड़ दिया । परमात्मा शिवपर तथा वह बभूवामोघमस्त्रं तु मोघं तत्परमात्मनि । अमोघ अस्त्र व्यर्थ हो गया । कुपित हुए परमेश्वरके समशाम्यत्ततस्तस्मिन्संक्रुद्धे परमेश्वरे ॥१० पास जाते ही वह शान्त हो गया॥९ -१० ॥
मोघीभूते शिवे स्वेऽस्त्रे भयमापाशु मन्मथः ।
चकम्पे च पुरः स्थित्वा दृष्ट्वा मृत्युंजय प्रभुम् ॥
सस्मार त्रिदशान्सर्वान्शक्रादीन्भयविह्वलः ।
स स्मरो मुनिशार्दूल स्वप्रयासे निरर्थके ॥
कामेन सुस्मृता देवाः शक्राद्यास्ते मुनीश्वर ।
आययुः सकलास्ते हि शंभुं नत्वा च तुष्टुवुः ॥
स्तुतिं कुर्वत्सु देवेषु क्रुद्धस्याति हरस्य हि ।
तृतीयात्तस्य नेत्राद्वै निस्ससार ततो महान् ॥
ललाटमध्यगात्तस्मात्सवह्निर्द्रुतसम्भवः I जज्वालोर्ध्वशिखो दीप्तः प्रलयाग्निसमप्रभः ॥
उत्पत्य गगने तूर्णं निपत्य धरणीतले ।
भ्रामं भ्रामं स्वपरितः पपात मेदिनीं परि ॥
भस्मसात्कृतवान्साधो मदनं तावदेव हि ।
यावच्च मरुतां वाचः क्षम्यतां क्षम्यतामिति ॥
हते तस्मिन्स्मरे वीरे देवा दुःखमुपागताः ।
• रुरुदुर्विह्वलाश्चातिक्रोशंतः किमभूदिति ॥
श्वेताङ्गा विकृतात्मा च गिरिराजसुता तदा ।
जगाम मंदिरं स्वं च समादाय सखीजनम् ॥
क्षणमात्रं रतिस्तत्र विसंज्ञा साभवत्तदा ।
भर्तृमृत्युजदुःखेन पतिता सा मृता इव ॥
जातायां चैव संज्ञायां रतिरत्यंतविह्वला ।
विललाप तदा तत्रोच्चरन्ती विविधं वचः ॥
तदनन्तर भगवान् शिवपर अपने अस्त्रके व्यर्थ ११ हो जानेपर मन्मथको बड़ा भय हुआ । भगवान् मृत्युंजयको देखकर उनके सामने खड़ा होकर वह काँप उठा । हे मुनिश्रेष्ठ! वह कामदेव अपने प्रयासके १२ निष्फल हो जानेपर भयसे व्याकुल होकर इन्द्र आदि सभी देवताओंका स्मरण करने लगा ॥ ११-१२ ॥ हे मुनीश्वर! कामदेवके स्मरण करनेपर वे इन्द्र १३ आदि सब देवता आ गये और शम्भुको प्रणामकर उनकी स्तुति करने लगे ॥१३ ॥
देवता स्तुति कर ही रहे थे कि कुपित हुए १४ भगवान् शिवके ललाटके मध्यभागमें स्थित तृतीय नेत्रसे बड़ी भारी आगकी ज्वाला तत्काल प्रकट होकर निकली । वे ज्वालाएँ ऊपरकी ओर उठ रही थीं । वह १५ आग धू - धू करके जलने लगी । उसकी ज्योति प्रलयाग्निके समान मालूम पड़ती थी ॥ १४-१५ ॥ वह ज्वाला तत्काल ही आकाशमें उछलकर पृथ्वीपर १६ गिरकर फिर अपने चारों ओर चक्कर काटती हुई कामदेवपर जा गिरी । हे साधो! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये, यह १७ बात जबतक देवताओंने कही, तबतक उस आगने कामदेवको जलाकर राख कर दिया ॥ १६-१७ ॥ उस वीर कामदेवके मारे जानेपर देवताओंको १८ बड़ा दुःख हुआ । वे व्याकुल होकर, यह क्या हुआ, इस प्रकार कहकर जोर - जोर से चीत्कार करते हुए रोने - बिलखने लगे । उस समय घबरायी हुई पार्वतीका १ ९ समस्त शरीर सफेद पड़ गया और वे सखियोंको साथ । लेकर अपने भवनको चली गयीं । [ कामदेव । जानेपर ] रति वहाँ क्षणभरके लिये अचेत हो गयी । २० पतिके मृत्युजनित दुःखसे वह मरी हुईकी भाँति पड़ी रही ॥ १८-२० ॥ [ थोड़ी देरमें ] चेतना आनेपर अत्यन्त व्याकुल | होकर वह रति उस समय तरह - तरहकी बातें कहती २१ । हुई विलाप करने लगी ॥२१ ॥
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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५७३ रतिरुवाच
किं करोमि क्व गच्छामि किं कृतं दैवतैरिह ।
मत्स्वामिनं समाहूय नाशयामासुरुद्धतम् ॥
हा हा नाथ स्मर स्वामिन्प्राणप्रिय सुखप्रद ।
इदं तु किमभूदत्र हा हा प्रिय प्रियेति च ॥
ब्रह्मोवाच
इत्थं विलपती सा तु वदन्ती बहुधा वचः ।
हस्तौ पादौ तदास्फाल्य केशानत्रोटयत्तदा ॥
तद्विलापं तदा श्रुत्वा तत्र सर्वे वनेचराः ।
अभवन्दुःखिताः सर्वे स्थावरा अपि नारद ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवाः शक्रादयोऽखिलाः ।
रतिमूचुः समाश्वास्य संस्मरन्तो महेश्वरम् ॥
देवा ऊचुः
किंचिद्भस्म गृहीत्वा तु रक्ष यत्नाद्भयं त्यज ।
जीवयिष्यति स स्वामी लप्स्यसे त्वं पुनः प्रियम् ॥
सुखदाता न कोऽप्यस्ति दुःखदाता न कश्चन ।
सर्वोऽपि स्वकृतं भुंक्ते देवान् शोचसि वै वृथा ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याश्वास्य रतिं देवाः सर्वे शिवमुपागताः ।
सुप्रसाद्य शिवं भक्त्या वचनं चेदमब्रुवन् ॥
देवा ऊचुः
भगवन् श्रूयतामेतद्वचनं नः शुभं प्रभो ।
कृपां कृत्वा महेशान शरणागतवत्सल ॥
सुविचारय सुप्रीत्या कृतिं कामस्य शंकर ।
कामेनैतत्कृतं यत्र न स्वार्थं तन्महेश्वर ॥
दुष्टेन पीडितैर्देवैस्तारकेणाखिलैर्विभो ।
कर्म तत्कारितं नाथ नान्यथा विद्धि शंकर ॥
रतिरेकाकिनीदेव विलापं दुःखिता सती ।
करोति गिरिश त्वं च तामाश्वासय सर्वद ॥
रति बोली- मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? देवताओंने यह क्या किया, मेरे उद्धत स्वामीको बुलाकर उन्होंने २२ नष्ट करा दिया | हाय! हाय! हे नाथ! हे स्मर! हे स्वामिन्! हे प्राणप्रिय! हे सुखप्रद! हे प्रिय! हे प्रिय! २३ यह यहाँ क्या हो गया? ॥२२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार रोती - बिलखती और अनेक प्रकारकी बातें कहती हुई वह हाथ - पैर २४ पटककर सिरके बालोंको नोंचने लगी ॥२४ ॥
हे नारद! उस समय उसका विलाप सुनकर वहाँ २५ रहनेवाले समस्त वनवासी तथा सभी स्थावर प्राणी भी दुखी हो गये । इसी बीच इन्द्र आदि समस्त देवता महेश्वरका स्मरण करते हुए रतिको आश्वस्त करके २६ उससे कहने लगे— ॥ २५-२६ ॥ देवता बोले — थोड़ा - सा भस्म लेकर उसे यत्नपूर्वक रखो और भय छोड़ दो । वे स्वामी २७ महादेवजी [ कामदेवको ] जीवित कर देंगे और तुम पतिको पुनः प्राप्त कर लोगी ॥ २७ ॥
कोई न सुख देनेवाला है और न कोई दुःख ही २८ देनेवाला है । सब लोग अपनी करनीका फल भोगते हैं । तुम देवताओंको दोष देकर व्यर्थ ही शोक करती हो ॥ २८ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार रतिको समझा-बुझाकर सब देवता भगवान् शिवके समीप आये और उन्हें २ ९ भक्तिसे प्रसन्न करके यह वचन कहने लगे— ॥ २ ९ ॥ देवता बोले- हे भगवन्! हे प्रभो! हे महेशान! हे शरणागतवत्सल! आप कृपा करके हमारे इस शुभ ३० वचनको सुनिये ॥३० ॥
हे शंकर! आप कामदेवके कृत्यपर भलीभाँति अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक विचार कीजिये । हे महेश्वर! ३१ कामने जो यह कार्य किया है, इसमें उसका कोई स्वार्थ नहीं था ॥ ३१ ॥
हे विभो! दुष्ट तारकासुरसे पीड़ित हुए सब ३२ देवताओंने मिलकर उससे यह कार्य कराया है । हे नाथ! हे शंकर! इसे आप अन्यथा न समझें ॥ ३२ ॥
सब कुछ प्रदान करनेवाले हे देव! हे गिरिश! साध्वी रति अकेली अति दुखी होकर विलाप कर रही ३३ है, आप उसे सान्त्वना प्रदान कीजिये ॥ ३३ ॥
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५७४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ संहारं कर्तुकामोऽसि क्रोधेनानेन शंकर । हे शंकर! यदि इस क्रोधके द्वारा आपने दैवतैः सह सर्वेषां हतवांस्तं यदि स्मरम् ॥ ३४ कामदेवको मार डाला, तो हम यही समझेंगे कि दुःखं तस्या रतेर्दृष्ट्वा नष्टप्रायाश्च देवताः तस्मात्त्वया च कर्तव्यं रत्याश्शोकापनोदनम् ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तेषां प्रसन्नो भगवान् शिवः देवानां सकलानां च वचनं चेदमब्रवीत् ॥ शिव उवाच देवाश्च ऋषयः सर्वे मद्वचः शृणुतादरात् । मत्कोपेन च यज्जातं तत्तथा नान्यथा भवेत् अनङ्गस्तावदेव स्यात्कामो रतिपतिः प्रभुः । यावच्चावतरेत्कृष्णो धरण्यां रुक्मिणीपतिः
द्वारकायां यदा स्थित्वा पुत्रानुत्पादयिष्यति ।
तदा कृष्णस्तु रुक्मिण्यां काममुत्पादयिष्यति ॥
प्रद्युम्नं नाम तस्यैव भविष्यति न संशयः । जातमात्रं तु तं पुत्रं शंबरः संहरिष्यति
हृत्वा प्रास्य समुद्रं तं शंबरो दानवोत्तमः ।
मृतं ज्ञात्वा वृथा मूढो नगरं स्वं गमिष्यति ॥
तावच्च नगरं तस्य रते स्थेयं यथासुखम् ।
तत्रैव स्वपतेः प्राप्तिः प्रद्युम्नस्य भविष्यति ॥
तत्र कामो मिलित्वा तं हत्वा शम्बरमाहवे ।
भविष्यति सुखी देवाः प्रद्युम्नाख्यः स्वकामिनीम् ॥
तदीयं चैव यद् द्रव्यं नीत्वा स नगरं पुनः ।
गमिष्यति तया सार्धं देवाः सत्यं वचो मम ॥
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचः शंभोर्देवा ऊचुः प्रणम्य तम् ।
किंचिदुच्छ्वसिताश्चित्ते करौ बद्ध्वा नताङ्गकाः ॥
| देवताओं सहित समस्त प्राणियोंका अभी संहार आप डालना चाहते हैं ॥ ३४ ॥ कर
। उस रतिका दुःख देखकर देवता नष्टप्राय हो ॥ ३५ गये हैं । इसलिये आपको रतिका शोक दूर कर देना चाहिये ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] उन सम्पूर्ण । देवताओंका यह वचन सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न ३६ हो गये और यह वचन कहने लगे - ॥ ३६ ॥
शिवजी बोले- हे देवताओ और ऋषियो! आप सब आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये । मेरे क्रोधसे ॥ ३७ जो कुछ हो गया है, वह तो अन्यथा नहीं हो सकता, तथापि रतिका शक्तिशाली पति कामदेव तभीतक अनंग रहेगा, जबतक रुक्मिणीपति श्रीकृष्णका धरतीपर ॥ ३८ अवतार नहीं हो जाता ॥ ३७-३८ ॥ जब श्रीकृष्ण द्वारकामें रहकर पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे, ३ ९ तब ये रुक्मिणीके गर्भसे कामको भी जन्म देंगे ॥३ ९ ॥ उस कामका ही नाम [ उस समय ] प्रद्युम्न ॥ ४० होगा, इसमें संशय नहीं है । उस पुत्रके जन्म लेते ही शम्बरासुर उसे हर लेगा । हरण करके दानवश्रेष्ठ मूर्ख शम्बर उसे समुद्रमें फेंककर और उसे मरा हुआ ४१ जानकर वृथा ही अपने नगरको लौट जायगा । हे रते! तुम्हें उस समयतक शम्बरासुरके नगरमें सुखपूर्वक निवास करना चाहिये, वहींपर तुम्हें अपने पति ४२ प्रद्युम्नकी प्राप्ति होगी ॥ ४०–४२ ॥ हे देवताओ! वहाँ युद्धमें उस शम्बरासुरका वध ४३ करके कामदेव अपनी पत्नीको प्राप्त करके सुखी होगा ॥ ४३ ॥
हे देवताओ! प्रद्युम्न नामधारी वह काम ४४ शम्बरासुरका जो भी धन होगा, उसे लेकर उस रतिके | साथ [ अपने ] नगरमें जायगा, मेरा यह कथन सर्वथा सत्य होगा ॥४४ ॥
ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] शिवजीकी यह | बात सुनकर देवताओंके चित्तमें कुछ उल्लास हुआ और वे सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ ४५ जोड़कर उनसे कहने लगे - ॥ ४५ ॥
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अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५७५ देवा ऊचुः
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो ।
शीघ्रं जीवय कामं त्वं रक्ष प्राणान् रतेर्हर ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यमरवचः प्रसन्नः परमेश्वरः ।
पुनर्बभाषे करुणासागरः सकलेश्वरः ॥
शिव उवाच
हे देवाः सुप्रसन्नोऽस्मि जीवयिष्यामि चान्तरे ।
कामः स मद्गणो भूत्वा विहरिष्यति नित्यशः ॥
नाख्येयमिदमाख्यानं कस्यचित्पुरतः सुराः ।
गच्छत स्वस्थलं दुखं नाशयिष्यामि सर्वतः ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्रो देवानां स्तुवतां तदा ।
सर्वे देवाः सुप्रसन्ना बभूवुर्गतविस्मयाः ॥
ततस्तां च समाश्वास्य रुद्रस्य वचने स्थिताः ।
उक्त्वा वचस्तदीयं च स्वं स्वं धाम ययुर्मुने ॥
कामपत्नी समादिष्टं नगरं सा गता तदा ।
प्रतीक्षमाणा तं कालं रुद्रादिष्टं मुनीश्वर ॥
देवता बोले — हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणा-सागर! हे प्रभो! हे हर! आप कामदेवको शीघ्र जीवित ४६ कर दीजिये तथा रतिके प्राणोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले- देवताओंकी यह बात सुनकर सबके स्वामी करुणासागर परमेश्वर शिव प्रसन्न ४७ होकर पुनः कहने लगे - ॥४७ ॥
शिवजी बोले- हे देवताओ! मैं बहुत प्रसन्न हूँ, मैं कामको सबके हृदयमें जीवित कर दूँगा और ४८ वह सदा मेरा गण होकर विहार करेगा ॥ ४८ ॥
हे देवताओ! आपलोग इस आख्यानको किसीके ४ ९ सामने मत कहियेगा, आपलोग अपने स्थानको जाइये, मैं सब प्रकारसे [ आपलोगोंके ] दुःखका नाश करूँगा ॥ ४ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर रुद्रदेव देवताओंके स्तुति करते - करते ही अन्तर्धान हो गये । तब ५० सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न तथा सन्देहरहित हो गये ॥ ५० ॥
हे मुने! तदनन्तर रुद्रकी बातपर भरोसा करके ५१ वे देवता रतिको आश्वासन देकर तथा उससे उनका वचन कहकर अपने - अपने धामको चले गये । हे मुनीश्वर! तब वह कामपत्नी शिवके बताये हुए नगरको चली गयी तथा रुद्रके बताये गये समयकी ५२ । प्रतीक्षा करने लगी ॥ ५१-५२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे कामनाशवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें कामनाशवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः शिवकी क्रोधाग्निका वडवारूप- धारण और ब्रह्माद्वारा उसे समुद्रको समर्पित करना नारद उवाच
विधे नेत्रसमुद्भूतवह्निज्वाला हरस्य सा ।
गता कुत्र वद त्वं तच्चरितं शशिमौलिनः ॥
ब्रह्मोवाच
यदा भस्म चकाराशु तृतीयनयनानलः ।
शम्भोः कामं प्रजज्वाल सर्वतो विफलस्तदा ॥
हाहाकारोमहानासीत् त्रैलोक्ये सचराचरे ।
सर्वे देवर्षयस्तात शरणं मां ययुर्द्रुतम् ॥
नारदजी बोले – हे विधे! भगवान् हरके [ तृतीय ] नेत्रसे निकली हुई वह अग्निकी ज्वाला कहाँ गयी? आप चन्द्रशेखरके उस चरित्रको कहिये ॥ १ ॥
१ ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] जब भगवान् रुद्रके तीसरे नेत्रसे प्रकट हुई अग्निने कामदेवको शीघ्र ही जलाकर राख कर दिया, उसके अनन्तर वह बिना २ किसी प्रयोजनके ही सब ओर फैलने लगी ॥ २ ॥
चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें महान् हाहाकार मच गया । हे तात! तब सम्पूर्ण देवता और ३ ऋषि शीघ्र ही मेरी शरणमें आये ॥ ३ ॥
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५७६ सर्वे निवेदयामासुस्तद्दुःखं मह्यमाकुलाः सुप्रणम्य सुसंस्तूय करौ बद्ध्वा नताननाः तच्छ्रुत्वाहं शिवं स्मृत्वा तद्धेतुं सुविमृश्य च गतस्तत्र विनीतात्मा त्रिलोकावनहेतवे संदग्धुकामः स शुचिर्चालामालातिदीपितः स्तंभितोऽरं मया शंभुप्रसादाप्तसुतेजसा अथ क्रोधमयं वह्निं दग्धुकामं जगत्त्रयम् वाडवं तमकार्षं च सौम्यज्वालामुखं मुने तं वाडवतनुमहं समादाय शिवेच्छया सागरं समगां लोकहिताय जगतां पतिः आगतं मां समालोक्य सागरस्सांजलिर्मुने धृत्वा च पौरुषं रूपमागतः संनिधिं मम सुप्रणम्याथ मां सिंधुः संस्तूय च यथाविधि स मामुवाच सुप्रीत्या सर्वलोकपितामहम् सागर उवाच किमर्थमागतोऽसि त्वं ब्रह्मन्नत्राखिलाधिप तन्निदेशय सुप्रीत्या मत्वा मां च स्वसेवकम् अथाहं सागरवचः श्रुत्वा प्रीतिपुरस्सरम् प्रावोचं शंकरं स्मृत्वा लौकिकं हितमावहन् ब्रह्मोवाच शृणु तात महाधीमन्सर्वलोकहितावह वयहं प्रीतितः सिंधो शिवेच्छाप्रेरितो हृदा अयं क्रोधो महेशस्य वाडवात्मा महाप्रभुः दग्ध्वा कामं द्रुतं सर्वं दग्धुकामोऽभवत्ततः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० । उन सबने व्याकुल होकर मस्तक झुकाकर दोनों ॥ ४ हाथ जोड़कर मुझे प्रणामकर विधिवत् मेरी स्तुति करके अपना दुःख निवेदन किया ॥४ ॥
। उसको सुनकर शिवका स्मरणकर और उसके ॥ ५ हेतुका भलीभाँति विचारकर तीनों लोकोंकी रक्षा करनेके लिये मैं विनीत भावसे वहाँ पहुँचा ॥५ ॥
। वह अग्नि ज्वालामालासे अत्यन्त उद्दीप्त ॥ ६ हो जगत्को जला देनेके लिये उद्यत थी, परंतु भगवान् शिवकी कृपासे प्राप्त हुए उत्तम तेजके द्वारा मैंने उसे तत्काल स्तम्भित कर दिया ॥ ६ ॥
। हे मुने! मैंने त्रिलोकीको दग्ध करनेकी इच्छा ॥ ७ रखनेवाली उस क्रोधमय अग्निको सौम्य ज्वालामुखवाले घोड़ेके रूपमें परिवर्तित कर दिया ॥ ७ ॥
। भगवान् शिवकी इच्छासे उस वाडव - शरीरवाली ॥ ८ अग्निको लेकर जगत्पति मैं लोकहितके लिये समुद्रके पास गया ॥ ८ ॥
। हे मुने! मुझे आया हुआ देखकर समुद्र एक ॥ ९ दिव्य पुरुषका रूप धारण करके हाथ जोड़कर मेरे पास आया ॥ ९ ॥
। मुझ सम्पूर्ण लोकोंके पितामहकी भलीभाँति ॥ १० स्तुति करके वह सिन्धु मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगा —॥१० ॥
सागर बोला — हे ब्रह्मन्! हे सर्वेश्वर! आप । | यहाँ किसलिये आये हैं? मुझे अपना सेवक समझकर ॥ ११ आप प्रीतिपूर्वक उसे कहिये ॥११ ॥
। सागरकी बात सुनकर शंकरका स्मरण करके ॥ १२ । लोकहितका ध्यान रखते हुए मैं उससे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगा -॥१२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे तात! हे महाबुद्धिमान्! ॥ | सम्पूर्ण लोकोंके हितकारी! हे सिन्धो! मैं शिवकी ।
॥ १३ इच्छासे प्रेरित हो हृदयसे प्रीतिपूर्वक तुमसे कह रहा ।
हूँ, सुनो ॥१३ ॥
यह महेश्वरका क्रोध है, जो महान् शक्तिशाली । अश्वके रूपमें यहाँ उपस्थित है । यह कामदेवको । दग्ध करके शीघ्र सम्पूर्ण जगत्को जला डालने के ॥ १४ लिये उद्यत हो गया था ॥१४ ॥
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अ ० २१ ] रुद्रसंहिता (
प्रार्थितोऽहं सुरैः शीघ्रं पीडितैः शंकरेच्छया ।
तत्रागत्य द्रुतं तं वै तात स्तंभितवान् शुचिम् ॥ १५
वाडवं रूपमाधत्त तमादायागतोऽत्र ह ।
निर्दिशामि जलाधार त्वामहं करुणाकरः ॥ १६
अयं क्रोधो महेशस्य वाडवं रूपमाश्रितः ।
ज्वालामुखस्त्वया धार्यो यावदाभूतसम्प्लवम् ॥ १७
यदात्राहं समागम्य वत्स्यामि सरितां पते ।
तदा त्वया परित्याज्यः क्रोधोऽयं शाङ्करोऽद्भुतः ॥ १८
भोजनं तोयमेतस्य तव नित्यं भविष्यति ।
यत्नादेवावधार्योऽयं यथा नोपैति चांतरम् ॥ १ ९
इत्युक्तो हि मया सिंधुरंगीचक्रे तदा ध्रुवम् ।
ग्रहीतुं वाडवं वह्निं रौद्रं चाशक्यमन्यतः ॥ २०
ततः प्रविष्टो जलधौ स वाडवतनुः शुचिः ।
वार्यौघान्सुदहंस्तस्य ज्वालामालाभिदीपितः ॥ २१
ततः संतुष्टचेतस्कः स्वं धामाहं गतो मुने ।
अन्तर्धानमगात्सिंधुर्दिव्यरूपः प्रणम्य माम् ॥ २२
स्वास्थ्यं प्राप जगत्सर्वं निर्मुक्तं तद्भवाद्भयात् ।
देवा बभूवुः सुखिनो मुनयश्च महामुने ॥ २३
पार्वतीखण्ड ) ५७७ हे तात! तब पीड़ित हुए देवताओंने शंकरकी इच्छासे मेरी प्रार्थना की और मैंने शीघ्र वहाँ आकर अग्निको स्तम्भित किया । फिर इसने घोड़ेका रूप धारण किया और इसे लेकर मैं यहाँ आया । हे जलाधार! [ जगत्पर ] दया करनेवाला मैं तुम्हें यह आदेश दे रहा हूँ ॥ १५-१६ ॥ महेश्वरके इस क्रोधको, जो घोड़ेका रूप धारण करके मुखसे ज्वाला प्रकट करता हुआ खड़ा है, तुम प्रलयकालपर्यन्त धारण किये रहो ॥ १७ ॥
हे सरित्पते! जब मैं यहाँ आकर निवास करूँगा, तब तुम शंकरके इस अद्भुत क्रोधको छोड़ देना ॥ १८ ॥
तुम्हारा जल ही इसका प्रतिदिनका भोजन होगा । तुम यत्नपूर्वक इसे धारण किये रहना, जिससे यह अन्यत्र न जा सके ॥ १ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] इस प्रकार मेरे कहनेपर समुद्रने [ रुद्रके क्रोधाग्निरूप ] वडवानलको धारण करना स्वीकार किया, जो दूसरेके लिये असम्भव था ॥ २० ॥
उसके अनन्तर वाडव शरीरवाली वह अग्नि समुद्रमें प्रविष्ट हुई और ज्वालामालाओंसे प्रदीप्त हो उस सागरकी जलराशिका दहन करने लगी ॥२१ ॥
हे मुने! तदनन्तर सन्तुष्टचित्त होकर मैं अपने धामको चला आया और दिव्य रूपधारी वह समुद्र मुझे प्रणाम करके अन्तर्धान हो गया । महामुने! रुद्रकी उस क्रोधाग्निके भयसे छूटकर सम्पूर्ण जगत् स्वस्थताका अनुभव करने लगा और देवता तथा मुनिगण सुखी हो गये ॥ २२-२३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे वडवानलचरितवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें वडवानलचरितवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः कामदेवके भस्म हो जानेपर पार्वतीका अपने घर आगमन, हिमवान् तथा मेनाद्वारा उन्हें धैर्य प्रदान करना, नारदद्वारा पार्वतीको पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश नारदजी बोले – हे विधे! हे तात! हे विधे तात नारद उवाच । महाप्राज्ञ! हे विष्णुशिष्य! हे त्रिलोककर्ता! आपने अद्भुतेयं महाप्राज्ञ विष्णुशिष्य त्रिलोककृत् ॥ १ महात्मा शंकरकी यह विलक्षण कथा सुनायी । कथा प्रोक्ता शंकरस्य महात्मनः 2223 Shivmahapuranam Part I Section 20_1_Front_
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५७८ भस्मीभूते स्मरे शंभुतृतीयनयनाग्निना । तस्मिन्प्रविष्टे जलधौ वद त्वं किमभूत्ततः
किं चकार ततो देवी पार्वती कुधरात्मजा ।
गता कुत्र सखीभ्यां सा तद्वदाद्य दयानिधे ॥
ब्रह्मोवाच
शृणु तात महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः ।
महोतिकारकस्यैव स्वामिनो मम चादरात् ॥
यदादहच्छंभुनेत्रोद्भवो हि मदनं शुचिः ।
महाशब्दोऽद्भुतोऽभूद्वै येनाकाशः प्रपूरितः ॥
तेन शब्देन महता कामं दग्धं समीक्ष्य च ।
सखीभ्यां सह भीता सा ययौ स्वगृहमाकुला ॥
तेन शब्देन हिमवान्परिवारसमन्वितः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१ | शिवके तृतीय नेत्रकी अग्निसे कामदेवके भस्म हो । ॥ २ जानेपर और [ पुनः ] उस अग्निके समुद्रमें प्रवेश जानेपर फिर क्या हुआ? ॥ १-२ ॥ कर तदनन्तर हिमालयपुत्री पार्वतीदेवीने क्या किया । ३ और वे अपनी दोनों सखियोंके साथ कहाँ गयीं? हे दयानिधे! अब आप इसे बताइये ॥ ३ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे तात! हे महाप्राज्ञ! अब आप महान् लीला करनेवाले मेरे स्वामी चन्द्रशेखरके ४ चरित्रको आदरपूर्वक सुनिये । भगवान् शंकरके नेत्रसे उत्पन्न हुई अग्निने जब कामदेवको जला दिया, तब महान् अद्भुत महाशब्द प्रकट हुआ, जिससे आकाश ५ पूर्णरूपसे गूँज उठा ॥ ४-५ ॥ उस महान् शब्दके साथ ही कामदेवको दग्ध ६ हुआ देखकर भयभीत और व्याकुल हुई पार्वती अपनी दोनों सखियोंके साथ अपने घर चली गयीं ॥६ ॥
उस शब्दसे परिवारसहित हिमवान् भी बड़े विस्मितोऽभूदतिक्लिष्टः सुतां स्मृत्वा गतां ततः ॥ ७ आश्चर्यमें पड़ गये और वहाँ गयी हुई अपनी पुत्रीका
जगाम शोकं शैलेशो सुतां दृष्ट्वातिविह्वलाम् ।
रुदन्तीं शंभुविरहादाससादाचलेश्वरः ॥
आसाद्य पाणिना तस्या मार्जयन्नयनद्वयम् ।
मा बिभीहि शिवेऽरोदीरित्युक्त्वा तां तदाग्रहीत् ॥
क्रोडे कृत्वा सुतां शीघ्रं हिमवानचलेश्वरः ।
स्वमालयमथानिन्ये सांत्वयन्नतिविह्वलाम् ॥
अंतर्हिते स्मरं दग्ध्वा हरे तद्विरहाच्छिवा ।
विकलाभूद् भृशं सा वै लेभे शर्म न कुत्रचित् ॥
पितुर्गृहं तदा गत्वा मिलित्वा मातरं शिवा ।
पुनर्जातं तदा मेने स्वात्मानं सा धरात्मजा ॥
निनिंद च स्वरूपं सा हा हतास्मीत्यथाब्रवीत् ।
सखीभिर्बोधिता चापि न बुबोध गिरीन्द्रजा ॥
स्मरण करके उन्हें बड़ा क्लेश हुआ । [ इतनेमें ही पार्वती भी आ गयीं ] । वे शम्भुके विरहसे रो रही थीं । ८ अपनी पुत्रीको अत्यन्त विह्वल देखकर शैलराज हिमवान्को बड़ा शोक हुआ और वे शीघ्र ही उनके पास पहुँचे । वे हाथसे उनकी दोनों आँखोंको पोंछकर ९ बोले- हे शिवे! डरो मत, रोओ मत - ऐसा कहकर उन्हें पकड़ लिया । इसके बाद पर्वतराज हिमवान्ने अत्यन्त विह्वल हुई पुत्री पार्वतीको शीघ्र ही गोदमें १० उठा लिया और वे उन्हें सान्त्वना देते हुए अपने घर ले आये॥७–१० ॥ कामदेवका दाह करके महादेवजीके अन्तर्धान ११ हो जानेपर उनके विरहसे पार्वती अत्यन्त व्याकुल हो ।
। गयीं और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल रही ।
थी ॥ ११ ॥
पिताके घर जाकर जब वे अपनी मातासे १२ मिलीं, उस समय पार्वतीने अपना नया जन्म हुआ माना ॥ १२ ॥ ।
वे अपने रूपकी निन्दा करने लगीं और कहने भी
। लगीं । हाय! मैं मारी गयी । सखियोंके समझानेपर ॥
१३ वे गिरिराजकुमारी समझ नहीं पाती थीं ॥ १३
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