श्रीगणेशाय नमः।
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 21–30
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमोपदेशः ११ अथ ह्न्द्धौतिकर्म हृद्धौतिं त्रिविधां कुर्याद्दण्डवमनवाससा ॥ ३६ ॥
( अब हृद्धौति का वर्णन करते हैं - )हृद्धौति को तीन प्रकार से करना चाहिये । ये तीन प्रकार हैं- दंड, वमन, और वास ॥ ३६ ॥
दण्डधौतिः
रम्भादण्डं हरिद्दण्डं वेत्रदण्डं तथैव च ।
हन्मध्ये चालयित्वा तु पुनः प्रत्याहरेच्छनैः ॥ ३७ ॥
केला के दण्ड को, हल्दी के या वेत्रदण्ड को हृदय के मध्य में शनै-शनै: चलाकर ( प्रवेश करके ) पुनः धीरे- धीरे बाहर निकाले ॥ ३७ ॥
दण्डधौतिफलम्
कफपित्तं तथा क्लेदं रेचयेदूर्ध्ववर्त्मना ।
दण्डधौतिविधानेन हृद्रोगं नाशयेद् ध्रुवम् ॥ ३८ ॥
अब दण्डधौति का अर्थ करते हैं— ) कफ, पित्त और क्लेद ( घबराहट ) को मुखमार्ग से (इस दण्डधौति क्रिया से ) रेचन करते हैं ( बाहर निकाल देते हैं ) यह हृदयरोग दण्डधौति के विधान से निश्चय नष्ट हो जाता है ॥ ३८ ॥
वमनधौतिः भोजनान्ते पिबेद्वारि चाकण्ठपूरितं सुधीः ॥ ३ ९ ॥
उर्ध्वां दृष्टिं क्षणं कृत्वा तज्जलं वमयेत्पुनः ।
नित्यमभ्यासयोगेन कफपित्तं निवारयेत् ॥ ४० ॥
( वमन धौति क्या है? यह बताते हैं ) भोजन के बाद में सुधीजन कंठ तक जल को पी लें, पुन: क्षणपर्यन्त उर्ध्वदृष्टि करके उस जल का वमन कर दे । इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यासयोग से कफ और पित्त का निवारण करना चाहिये ॥ ३ ९ -४० ॥
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२ घेरण्डसंहिता वासधौतिः
चतुरङ्गुलविस्तारं सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्ग्रसेत् ।
पुनः प्रत्याहरेदेतत्प्रोच्यते धौतिकर्मकम् ॥ ४१ ॥
( वासधौति क्या है? इसे कहते हैं - ) चार अङ्गुल के विस्तार वाला ( चौड़ा) महीन ( पतला ) वस्त्र धीरे - धीरे निगलना चाहिये तथा पुन: इसे शनै: -शनैः निकालना चाहिये । इस क्रिया को वासधौति कहते हैं । वासधौतिफलम्
गुल्मज्वरप्लीहकुष्ठं कफपित्तं विनश्यति ।
आरोग्यं बलपुष्टिश्च भवेत्तस्य दिने दिने ॥ ४२ ॥
( वासधौति को करने से ) गुल्म, ज्वर, प्लीहा, कुष्ठ, कफ और पित्त रोगों का विनाश होता है । तथा दिन -प्रतिदिन आरोग्य, बल एवं पुष्टि ( की वृद्धि) होती है ॥ ४२ ॥
मूलशोधनकर्म
अपानक्रूरता तावद्यावन्मूलं न शोधयेत् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मूलशोधनमाचरेत् ॥ ४३ ॥
( मूलशोधन का लक्षण करते हैं - ) जब तक मूल शोधन नहीं होता ( उदर शौच साफ नहीं होता) तब तक अपानवायु की क्रूरता रहती है अर्थात् अपानवायु कष्टकारक बनी रहती है । अतः प्रयत्न पूर्वकमूल का शोधन करना चाहिये ॥ ४३ ॥
पीतमूलस्य दण्डेन मध्यमाङ्गुलिनापि वा ।
यत्नेन क्षालयेद् गुह्यं वारिणा च पुनः पुनः ॥ ४४ ॥
पीतमूल ( हल्दी ) के दण्ड से या मध्यमा अङ्गुलि से यत्नपूर्वक जल से पुनः - पुनः गुह्यस्थान ( मलद्वार) को धोना ( साफ करना चाहिये ॥ ४४ ॥
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमोपदेशः १३
वारयेत्कोष्ठकाठिन्यमामाजीर्णं निवारयेत् ।
कारणं कान्तिपुष्ट्योश्च वह्निमण्डल दीपनम् ॥ ४५ ॥
(इस शोधन क्रिया से ) उदर की काठिन्यता का और अजीर्ण का निवारण करना चाहिये । यह कान्ति और पुष्टि की कारक तथा जठराग्नि की प्रदीप्त करने वाली है ॥ ४५ ॥
द्वितीयं बस्तिकर्मप्रकरणम्
जलबस्तिः शुष्कबस्तिर्बस्तिः स्याद्विविधा स्मृता ।
जलबस्तित जले कुर्याच्छुष्कबस्ति सदा क्षितौ ॥ ४६ ॥
( अब बस्ति प्रकार बताते हैं - ) जलबस्ति और शुष्कबस्ति, इस प्रकार बस्ति दो प्रकार की कही गयी है । जलबस्ति को जल में तथा शुष्कबस्ति को भूमि में करना चाहिये ॥ ४६ ॥
जलबस्तिकर्म
नाभिमग्नजले पायुं न्यस्तवानुत्कटासनम् ।
आकुञ्चनं प्रसारञ्च जलबस्ति समाचरेत् ॥ ४७ ॥
नाभिपर्यन्त जल में उत्कट आसन लगाये । तब मलदार का आकुञ्चन और प्रसारण (सिकोड़ना तथा फैलाना ) करे, यह क्रिया जलबस्ति कही जाती है ॥ ४७ ॥
जलबस्तिफलम्
प्रमेहञ्च उदावर्त्तं क्रूरवायुं निवारयेत् ।
भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कामदेवसमो भवेत् ॥ ४८ ॥
(इससे ) प्रमेह, उदावर्त, और कुपित वायु का निवारण करना चाहिये । इससे देह स्वच्छन्द होता है तथा व्यक्ति कामदेव के समान रूपवान् हो जाता है ॥ ४८ ॥
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४ घेरण्डसंहिता स्थलबस्तिविधिः
बस्ति पश्चिमोत्तानेन चालयित्वा शनैरधः ।
अश्विनीमुद्रया पायुमाकुञ्चयेत् प्रसारयेत् ॥ ४ ९ ॥
भूमि पर पश्चिमोत्तान होकर (पीठ को और ऊपर उठाकर ) गुदाद्वार को चलाकर धीरे - धीरे अश्विनी मुद्रा से आकुञ्चन और प्रसारण ( सिकोड़ना और फैलाना ) की क्रिया करे ॥ ४ ९ ॥ स्थलबस्तिफलम्
एवमभ्यासयोगेन कोष्ठदोषो न विद्यते ।
विवर्द्धयेज्जठराग्निमामवातं विनाशयेत् ॥ ५० ॥
(स्थलबस्ति के करने से ) इस अभ्यासयोग से कोष्ठदोष नहीं होता है । जठराग्नि की वृद्धि होती है तथा आमवात का नाश होता है ॥ ५० ॥
तृतीयनेतिकर्मविधिः
वितस्तिमानं सूक्ष्मसूत्रं नासानाले प्रवेशयेत् ।
मुखान्निर्गमयेत्पश्चात् प्रोच्यते नेतिकर्मकम् ॥ ५१ ॥
( अब नेतिविधि क्या है, यह बताते हैं - ) वितस्तिमाप का सूक्ष्मधागा नासिका छिद्र में प्रवेश करना चाहिये । पुनः उसे मुख से निकालना चाहिये, यह नेति कर्म कहा जाता है ॥ ५१ ॥
नेतिफलम्
साधनान्नेतियोगस्य खेचरीसिद्धिमाप्नुयात् ।
कफदोषा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ५२ ॥
नेतिकर्मों को साधने से खेचरी मुद्रा की सिद्धि प्राप्त होती है । इससे समस्त कफ दोष विनष्ट होते हैं तथा दिव्यदृष्टि उत्पन्न हो जाती है ॥ ५२ ॥
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमोपदेशः १५ चतुर्थंलौलिकीकर्म
अमन्दवेगेतुन्दं च भ्रामयेदुभपार्श्वयोः ।
सर्वरोगान्निहन्तीह देहानलविवर्द्धनम् ॥ ५३ ॥
( लौलिकी विधि बताते हैं - ) तीव्रवेग से उदर को दोनों पार्श्व भागों में घुमाये । यह सब प्रकार के रोगों को नष्ट करता है तथा जठराग्नि को बढ़ाता है ॥ ५३ ॥
पञ्चमंत्राटककर्म
निमेषोन्मेषकं त्यक्त्वा सूक्ष्मलक्ष्यं निरीक्षयेत् ।
पतन्ति यावदश्रूणि त्राटकं प्रोच्यते बुधैः ॥ ५४ ॥
(त्राटक विधि क्या है — ) निमेषोन्मेष ( पलक का खोलना-बन्द करना ) छोड़कर एकटक से सूक्ष्म लक्ष्य को देखना चाहिये, जब तक कि
अश्रु नहीं गिरते हैं । इसे विद्वानजन त्राटक कहते हैं ॥ ५४ ॥
त्राटकफलम्
एवमभ्यासयोगेन शाम्भवी जायते ध्रुवम् ।
नेत्ररोगा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ५५ ॥
इस (त्राटक विधि के ) अभ्यासयोग से निश्चित ही शाम्भवी मुद्रा की सिद्धि हो जाती है । नेत्र के सब रोग विनष्ट होते हैं तथा दृष्टि दिव्य हो जाती है ॥ ५५ ॥
कपालभातिकर्म
वातक्रमेणव्युत्क्रमेण शीत्क्रमेण विशेषतः ।
भालभातिं त्रिधा कुर्यात्कफदोषं निवारयेत् ॥ ५६ ॥
( अब कपालभाति क्या है, यह बताते हैं - ) वातक्रम, व्युत्क्रम और शीतक्रम ये तीन भालभाति ( कपालभाति ) क्रियायें हैं 1। ये कफ दोष का निवारण करती है ॥ ५६ ॥
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६ घेरण्डसंहिता वातक्रमकपालभातिकर्म
इडया पूरयेद्वायुं रेचयेत्पिङ्गलापुनः ।
पिङ्गलया पूरयित्वा पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ ५७ ॥
( वातक्रम कपालभाति क्या है, अब यह कहते हैं— ) इडा से वायु को खींचे तथा पिङ्गला से पुनः रेचन करना चाहिये अर्थात् वामनासिका छिद्र से श्वाँस लेकर दायें से निकालना चाहिये । तत्पश्चात् पिङ्गला से श्वाँस लेकर इडा से रेचन करना चाहिये ॥ ५७ ॥
पूरकं रेचकं कृत्वा वेगेन न तु चालयेत् ।
एवमभ्यासयोगेन कफदोषं निवारयेत् ॥ ५८ ॥
पूरक और रेचक का यह क्रम वेग से नहीं ( अर्थात् धीरे - धीरे ) चलाना या करना चाहिये । इस प्रकार अभ्यास से कफदोष का निवारण होता है ॥ ५८ ॥
व्युत्क्रमकपालभातिकर्म
नासाभ्यां जलमाकृष्य पुनर्वक्त्रेण रेचयेत् ।
पायं पायं व्युत्क्रमेण श्लेष्मदोषं निवारयेत् ॥ ५ ९ ॥
( व्युत्क्रमकपालभाति क्या है— ) दोनों नासिका छिद्रों से जल को खींचकर पुनः मुख से उसे रेचन करना— निकालना चाहिये । पुनः व्युत्क्रम या उल्टे क्रम से मुख से पी- पी कर नाक से जल को गिराये । इस प्रकार श्लेष्मदोष का निवारण करना चाहिये ॥ ५ ९ ॥ शीत्क्रमकपालभातिकर्म
शीत्कृत्य पीत्वा वक्त्रेण नासानालैर्विरेचयेत् ।
एवमभ्यासयोगेन कामदेवसमो भवेत् ॥ ६० ॥
( शीत्क्रम कपाल भाति का अर्थ करते हैं - ) शीत्कार करते हुए
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
: प्रथमोपदेश १७ मुख से जल पीकर पुनः नासिका छिद्रों से विरेचन करे । इस प्रकार के अभ्यास योग से व्यक्ति कामदेव के समान हो जाता है ॥ ६० ॥
न जायते वार्द्धकं च ज्वरा नैव प्रजायते ।
भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कफदोषं निवारयेत् ॥ ६१ ॥
(इस अभ्यास योग से ) वार्द्धक्य उत्पन्न नहीं होता है, न ही जरा या जीर्णता आती है । शरीर स्वच्छन्द या सुदृढ़ रहता है ( इस प्रकार ) कफदोष का निवारण करना चाहिये ॥ ६१ ॥
॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीये भाष्ये षट्कर्मसाधनं नाम प्रथमोपदेशः ॥
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
qe अथ द्वितीयोपदेशः अथ योगासनप्रकरणम् घेरण्ड उवाच
आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तवः ।
चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि च ॥ १ ॥
( अब आसन विधि बताते हैं— ) समस्त आसन उतने ही हैं, जितने संसार में जीवजन्तु हैं । प्राचीन समय में शिवजी ने उनकी चौरासी लाख संख्या कही है ॥ १ ॥
तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनं शतं कृतम् ।
तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम् ॥ २ ॥
उनके भी मध्य में चौरासी सौ आसन विशेष कहे हैं और मनुष्य लोक में उनमें भी विशेषत: बत्तीस आसन ही शुभ हैं ॥ २ ॥
सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रञ्च स्वस्तिकम् ।
सिंहञ्च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च ॥ ३ ॥
मृतं गुप्तं तथा मत्स्यं मत्स्येन्द्रासनमेव च ।
गोरक्षं पश्चिमोत्तानं उत्कटं सङ्कटं तथा ॥ ४ ॥
मयूरं कुक्कुटं कूर्मं तथाचोत्तानकूर्मकम् ।
उत्तानमण्डूकं वृक्षं मण्डूकं गरुडं वृषम् ॥ ५ ॥
शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गञ्चयोगासनम् ।
द्वात्रिंशदासनानि तु मर्त्यलोके हि सिद्धिदम् ॥ ६ ॥
सिद्धासन, पदमासन, भद्रासन, मुक्तासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन,
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयोपदेशः १ ९ सिहाँसन, गोमुखासन, वीरासन, धनुरासान, मृतासन, गुप्तासन, मत्स्यासन, मत्स्येन्द्रासन, गोरक्षासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्कटासन, संकटासन, मयूररासन, कुक्कुटासन, कूर्मासन, उत्तानकूर्मासन, उत्तानमण्डूकासन, वृक्षासन, मण्डूकासन, गरुड़ासन, वृषभासन, शलभासन, मकरासन, उष्ट्रासन, भुजङ्गासन, योगासन, ( ये सब ) कुल बत्तीस आसन मनुष्यलोक में सिद्धियाँ देने वाले हैं ॥ ३-६ ॥ अथ आसनानां प्रयोगाः सिद्धासनम् योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं संपीड्य गुल्फेतरम् मेढ्रे सम्प्रणिधाय तं तु चिबुकं कृत्वा हृदि स्थापितम् । स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तर- मेवंमोक्षविधायतेफलकरं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥ ७ ॥
(सिद्धासन की विधि बताते हैं - ) पैर की एड़ी को योनिस्थान के नीचे लगाये, पुन: इतर गुल्फ ( दूसरे पैर की एड़ी ) को मेढ़ या लिङ्गमूल में रखे । पुनः चिबुक ( ठोड़ी ) को हृदय में लगाकर समस्त इन्द्रियों को संयम करके अचल दृष्टि से भ्रुवों के मध्य में देखते हुए ( दृष्टि को स्थिर करे, इस प्रकार ) मोक्ष की सिद्धि की जाती है । इस प्रकार करने से सिद्धासन फलदायी कहा जाता है ॥ ७ ॥
पद्मासनम् वामोरुपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना कृत्वा कराभ्यां दृढम् । अङ्गुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेद् एतद्व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनं प्रोच्यते ॥ ८ ॥
( इसके पश्चात पद्मासन की विधि बताते हैं - ) वाम जंघा के ऊपर दक्षिण जंघा को रखकर तथा दक्षिण जंघा पर वामचरण को स्थापित करके
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२० घेरण्डसंहिता तथा पीछे से दोनों हाथों से पैरों के अगुष्ठों को दृढ़ता से पकड़कर तथा चिबुक (ठोड़ी ) को हृदय पर निधान करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये । यह आसन सब व्याधियों को नष्ट करता है ॥ ८ ॥
भद्रासनम्
गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेण समाहितः ।
पादाङ्गुष्ठौ कराभ्याञ्च धृत्वा च पृष्ठदेशतः ॥ ९ ॥
( भ्रदासन की विधि बताते हैं - ) अंडकोश के नीचे दोनों एड़ी व्युत्क्रम ( उल्टा करके ) रखे, फिर दोनों हाथों से पीछे से पैरों के अंगुष्ठों को पकड़े ॥ ९ ॥
जालन्धरं समासाद्य नासाग्रमवलोकयेत् ।
भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविनाशकम् ॥ १० ॥
फिर जालन्धर करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये । इस प्रकार सब व्याधियों का विनाश करने वाला यह भ्रदासन होता है ॥ १० ॥
मुक्तासनम्
पायुमूले वामगुल्फं दक्षगुल्फं तथोपरि ।
समकायशिरोग्रीवं मुक्तासनन्तु सिद्धिदम् ॥ ११ ॥
(मुक्तासन को बताते है— ) वाम एड़ी को पायमूल ( गुदा स्थान ) में और दक्षिण एड़ी को उसके ऊपर रखकर सिर, गर्दन, को समान भाव से ( स्थिरभाव ) से रखना चाहिये । (इस प्रकार ) यह मुक्तासन सिद्धिदायक होता है ॥ ११ ॥
वज्रासनम्
जङ्घाभ्यां वज्रवत्कृत्वा गुदपार्श्वे पदावुभौ ।
वज्रासनं भवेदेतद्योगिनां सिद्धिदायकम् ॥ १२ ॥
( व्रजासन क्या है— ) दोनों जंघाओं को वज्रवत् ( समानसुदृढ़ भाव