श्रीगणेशाय नमः।
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 31–40
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 31–40
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द्वितीयोपदेशः २१ में ) करके गुदा के पार्श्व ( दोनों ओर ) दोनों पैरों को रखना, यह वज्रासन योगियों को सिद्धि देने वाला है ॥ १२ ॥
स्वस्तिकासनम्
जानूर्वोरन्तरे कृत्वा योगी पादतले उभे ।
ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥। १३ ॥
(स्वस्तिकासन की विधि बताते हैं - ) दोनों पादतलों ( पैरों ) और जानुओं ( पिंडलियों ) को जाँघों के मध्य में करके ऋजुकाय रूप (त्रिकोणाकाररूप ) में बैठे, इसे स्वस्तिकासन कहा जाता है ॥ १३ ॥
सिहासनम्
गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेणोर्ध्वतां गतौ ।
चितिमूलौ भूमिसंस्थौ कृत्वा च जानुनोपरि ॥ १४ ॥
व्यक्तवक्त्रो जलंध्रञ्च नासाग्रमवलोकयेत् ।
सिंहासनं भवेदेतत् सर्वव्याधिविनाशकम् ॥ १५ ॥
(सिंहासन की विधि — ) दोनों एड़ियों को अडकोशों के नीचे उलटकर ऊपर को करके रखे । दोनों जानुओं को भूमि पर संस्थित करके और उनके ऊपर मुख को खोलकर जालंधर को और नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये । इस प्रकार यह सिंहासन सब व्याधियों का विनाश करने वाला होता है ॥ १४-१५ ॥ गोमुखासनम्
पादौ च भूमौ संस्थाप्य पृष्ठपार्श्वे निवेशयेत् ।
स्थिरकायं समासाद्य गोमुखं गोमुखाकृतिः ॥ १६ ॥
(गोमुखासन क्या है- दोनों पैरों को भूमि पर स्थापित करके पीठ के पार्श्वभागों में लगाना चाहिये, शरीर को स्थिर करके आकृति गोमुख के समान हो जाती है, यही गोमुखासन है ॥ १६ ॥
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२२ घेरण्डसंहिता वीरासनम्
एकपादमथैकस्मिन्विन्यसेदूरुसंस्थितम् ।
इतरस्मिंस्तथा पञ्चाद्वीरासनमितीरितम् ॥ १७ ॥
( वीरासन विधि बताते हैं - ) एक पैर को ही एक जंघा के ऊपर रखे तथा दूसरा पैर पीछे की ओर रखे, इस प्रकार यह वीरासन कहा गया है ॥ १७ ॥
धनुरासनम्
प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपौ करौ च पृष्ठे धृतपादयुग्मम् ।
कृत्वा धनुस्तुल्यपरिवर्त्तिताङ्गं निधाय योगी धनुरासनं तत् ॥ १८ ॥
( धनुरासन की विधि बताते हैं — ) दोनों पैरों को भूमि पर दण्ड रूप में फैलाकर, हाथों को पीछे करके दोनों पैरों को पकड़े, इसके बाद शरीर को धनुष के समान करके अङ्गों को परिवर्तित करे, इधर- उधर पलटे ॥ १८ ॥
मृतासनम्
उत्तान शववद्भूमौ शयानन्तु शवासनम् ।
शवासनं श्रमहरं चित्तविश्रान्तिकारणम् ॥ १ ९ ॥
(फिर मृतासन विधि देखें - ) शव के समान भूमि में सीधा शयन करना शवासन कहलाता है । यह शवासन श्रम को हरने वाला और चित्त को विश्राम दिलाने का कारण होता है ॥ १ ९ ॥ गुप्तासनम्
जानूर्वोरन्तरे पादौ कृत्वा पादौ च गोपयेत् ।
पादोपरि च संस्थाप्य गुदं गुप्तासनं विदुः ॥ २० ॥
( गुप्तासन विधि का वर्णन करते हैं— ) दोनों जानुओं के मध्य में पैरो को करके गोपन भाव से रखना चाहिये । तथा पैरों पर गुदा को रखे, इसे गुप्तासन कहा जाता है ॥ २० ॥
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द्वितीयोपदेशः २३
मुक्तपद्मासनं कृत्वा मत्स्यासनम्उत्तानशयनञ्चरेत् ।
कूर्पराभ्यां शिरो वेष्ट्य मत्स्यासनन्तु रोगहा ॥ २१ ॥
( मत्स्यासन विधि— ) मुक्तपद्मासन लगाकर घुटनों में सिर का वेष्टन करके सीधे होकर ( चित्तहोकर ) शयन करें, इस प्रकार यह मत्स्यासन सब रोगों का नाशक होता है ॥ २१ ॥
पश्चिमोत्तानासनम्
प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपौ संन्यस्तभालं चितियुग्ममध्ये ।
यत्नेन पादौ च धृतौ कराभ्यां योगीन्द्रपीठं पश्चिमोत्तानमाहुः ॥ २२ ॥
( पुनः पश्चिमोत्तानासन विधि कहते हैं— ) दोनों पैरों को भूमि पर दण्ड रूप में फैला कर और सिर को जंघाओं के मध्य रखकर और दोनों हाथों से पैरों को पकड़े, इसे पश्चिमोत्तासन कहते हैं ॥ २२ ॥
मत्स्येन्द्रासनम्
उदरं पश्चिमाभासं कृत्वा तिष्ठति यत्नतः ।
नम्राङ्गं वामपादं हि दक्षजानूपरि न्यसेत् ॥ २३ ॥
(मस्त्येन्द्रासन विधि- ) उदर को पीठ जैसा करके पेट को और वाम पैर को नवाकर दायें पैर की जंघा पर रखे ॥ २३ ॥
तत्र याम्यं कूपरञ्च याम्यं करे च वक्त्रकम् ।
भ्रुवोर्मध्ये गतां दृष्टिं पीठं मात्स्येन्द्रमुच्यते ॥ २४ ॥
पुन: वामपैर पर दायें पैर की एड़ी को रखे तथा दायें हाथ पर मुख को रखे, और भ्रुवों के मध्य में दृष्टि को करे, यह मत्स्येन्द्रासन होता है ॥ २४ ॥
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२४ घेरण्डसंहिता
जानूर्वोरन्तरे पादौ गोरक्षासनम्उत्तानौव्यक्तसंस्थितौ ।
गुल्फौ चाच्छाद्य हस्ताभ्यामुत्तानाभ्यां प्रयत्नतः ॥ २५ ॥
( गोरक्षासन विधि— ) दोनों पैरों को उरुओं और जंघाओं के बीच में चित्त रखकर अव्यक्त ( गोपनीय ) भाव से रखे, फिर दोनों हाथों से एड़ियों को पकड़ ले ॥ २५ ॥
कण्ठसङ्कोचनं कृत्वा नासाग्रमवलोकयेत् ।
गोरक्षासनमित्याह योगिनां सिद्धिकारणम् ॥ २६ ॥
पुनः कण्ठ को सिकोड़कर नासाग्र को देखना चाहिये । योगियों के सिद्धि देने वाले इसी आसन को गोरक्षासन कहा है ॥ २६ ॥
उत्कटासनम्
अङ्गुष्ठाभ्यामवष्टभ्य धरां गुल्फौ च खे गतौ ।
तत्रोपरि गुदं न्यस्य विज्ञेयमुत्कटासनम् ॥ २७ ॥
( उत्कटासन विधि— ) भूमि पर पैरों के अंगूठों को बलपूर्वक रखकर दोनों एड़ियों को ऊपर उठाकर उनके ऊपर गुदा को रखकर उत्कटासन जाना जाता है ॥ २७ ॥
सङ्कटासनम् वामपादं चितेर्मूलं संन्यस्य धरणीतले ।
पाददण्डेन याम्येन वेष्टयेद्वामपादकम् ।
जानुयुग्मे करयुग्ममेतत्सङ्कटमासनम् ॥ २८ ॥
( संकटासन विधि बताते हैं— ) पृथ्वी पर वाम पैर और अंगुष्ठ को लगाकर, दायें पैर से वाम पैर को वेष्टित करे ( लपेटे ), पुनः दोनों जंघाओं पर हाथों को रखे, यह संकटासन होता है ॥ २८ ॥
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द्वितीयोपदेशः २५ मयूरासनम्
धरामवष्टभ्य करयोस्तलाभ्यां तत्कूर्परे स्थापितनाभिपार्श्वम् ।
उच्चासनो दण्डवदुत्थितः खे मायूरमेतत्प्रवदन्ति पीठम् ॥ २ ९ ॥
(मयूरासन विधि— ) दोनों हाथों के तलों से बल से भूमि पर स्थिर होकर उनके कर्पूर ( हाथ के मणिबन्ध के समीप के भागों ) को नाभि के पार्श्व भागों पर रखकर ऊपर दण्डवत् आसन में होना मयूरासन होता है ॥ २ ९ ॥
पद्मासनं समासाद्य कुक्कुटासनम्जानूर्वोन्तरे करौ ।
कूर्पराभ्यां समासीन उच्चस्थः कुक्कुटासनम् ॥ ३० ॥
( कुक्कुटासन की विधि बताते हैं — ) पद्यासन लगाकर जानु और उरुओं के मध्य में हाथों को घुसाकर कर्पूर भागों ( हथेली के पिछले भागों ) पर मञ्चस्थ समासीन हो, यही कुक्कुटासन है ॥ ३० ॥
कूर्मासनम् ऋजुकायशिरोग्रीवंगुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेणकूर्मासनमितीरितम्समाहितौ ॥। ३१ ॥ ( कूर्मासन बताते है — ) अण्डकोश के नीचे दोनों एड़ियों को रखकर व्युत्क्रम से (विपरीत रूप से ) रखे । सिर, गर्दन को और शरीर को ऋजुवत् ( सीधे ) रखे, यह कूर्मासन कहा गया है ॥ ३१ ॥
उत्तानकूर्मसनम् कुक्कुटासनबन्धस्थं कराभ्यां धृतकन्धरम् । पीठं कूर्मवदुत्तानमेतदुत्तानकूर्मकम् ॥ ३२ ॥ ( उत्तान कूर्मासन विधि — ) प्रथम तो कुक्कुटासन बाँधे, पुनः हाथों
से कन्धा पकड़कर पुनः कछुवे के समान चित्त हो जाये, यह उत्तानकूर्मासन होता है ॥ ३२ ॥
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२६ घेरण्डसंहिता उत्तानमण्डूकासनम्
मण्डूकासनमध्यस्थं कूर्पराभ्यां धृतं शिरः ।
एतत् भेकवदुत्तानमेतदुत्तानमण्डुकम् ॥ ३३ ॥
( उत्तान कूर्मासनविधि— ) मण्डूकासन में बैठकर हाथों के पिछले भागों से ( कर्पूरों ) से मस्तक को धारण कर उत्तान हो जाये । यह उत्तान मण्डूकासन होता है ॥ ३३ ॥
वृक्षासनम्
वामोरुमूलदेशे च याम्यं पादं निधाय तु ।
तिष्ठेत्तु वृक्षवद्भूमौ वृक्षासनमिदं विदुः ॥ ३४ ॥
( वृक्षासन की विधि कहते हैं - ) वाम जंघा की जड़ में दायें पैर को रखकर पुन: वृक्ष के समान भूमि पर खड़ा हो, यही वृक्षासन है ॥ ३४ ॥
मण्डूकासनविधिः
पृष्ठदेशे पादतलौ अङ्गुष्ठे द्वे च संस्पृशेत् ।
जानुयुग्मं पुरस्कृत्य साधयेन्मण्डुकासनम् ॥ ३५ ॥
( मण्डूकासन विधि— ) पीछे के भाग में दोनों पैरो को करके और अंगुष्ठों को परस्पर स्पर्श करे तथा दोनों जानुओं को सामने रखे, यह मण्डूकासन होता है ॥ ३५ ॥
गरुडासनम्
जङ्घोरुभ्यां धरां पीड्य स्थिरकायो द्विजानुनी ।
जानूर करयुग्मं गरुडासनमुच्यते ॥ ३६ ॥
( गरुडासन की विधि कहते हैं— ) जंघा और उरुओं ( पिंडलियों ) से भूमि को दबाकर शरीरस्थ होकर जानुओं पर दोनों हाथों को रखे, यह गरुड़ासन कहा जाता है ॥ ३६ ॥
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द्वितीयोपदेशः २७ वृषासनम्
याम्यगुल्फे पायुमूलं वामभागे पदेतरम् ।
विपरीतं स्पृशेद्भूमिं वृषासनमिदं भवेत् ॥ ३७ ॥
( वृषासन बताते हैं— ) दायीं एड़ी के ऊपर मलद्वार को तथा वामभाग में इतर पैर को विपरीत करके रखे, भूमि को स्पर्श करे, यही वृषासन होता है ॥ ३७ ॥
शलभासनविधिः
अधास्य शेते करयुग्मं वक्षे- भूमिमवष्टभ्य करयोस्तलाभ्याम् ।
पादौ च शून्ये च वितस्ति चोर्ध्वं- 1 वदन्ति पीठं शलभं मुनीन्द्राः ॥ ३८ ॥
( शलभासन की विधि कहते हैं - ) पहले नीचे मुख करके लेट जाये, दोनों हाथों को छाती में रख, करतलों से भूमि को पकड़ पुनः पैरों को शून्य में ऊपर की ओर फैलाये, इसे मुनिजन शलभासन कहते हैं ॥ ३८ ॥
मकरासनविधिः
अधास्य शेते हृदयं निधाय भूमौ च पादौ च प्रसार्यमाणौ ।
शिरे च धृत्वा करदण्डयुग्मे देहाग्निकारं मकरासनं तत् ॥३९ ॥
( मकरासन क्या है? ) नीचे मुख करके लेटे, पुनः भूमि पर हृदय रखकर पैरों को फैलाकर पुन: हाथों से सिर को धारण करे, जठराग्नि बढ़ाने वाला यह मकरासन होता है ॥ ३ ९ ॥ उष्ट्रासनम्
अधास्य शेते पदयुग्मव्यस्तं पृष्ठे निधायापि धृतं कराभ्याम् ।
आकुञ्चयेत्सम्यगुदरास्यगाढमौष्ट्रञ्च पीठं योगिनो वदन्ति ॥ ४० ॥
नीचे मुख करके शयन करे, पुनः दोनों पैरों को पीछे से लाकर दोनों
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२८ घेरण्डसंहिता हाथों से धारण करे, तथा उदर और मुख को दृढ़ता से आकुंचन ( सिकोड़ ) ले, इसे योगीजन उष्ट्रासन कहते हैं ॥ ४० ॥
भुजङ्गासनविधिः
अङ्गुष्ठनाभिपर्यन्तमधोभूमौ विनिन्यसेत् ।
करतलाभ्यां धरां धृत्वा ऊर्ध्वशीर्षः फणीव हि ॥ ४१ ॥
अंगुष्ठ से लेकर नाभि पर्यन्त नीचे भूमि पर रखकर, करतलों से धरा को अवलम्बित करके सिर को सर्प के फन के समान ऊपर करे, यही भुजंगासन है ॥ ४१ ॥
देहाग्निर्वर्द्धते नित्यं सर्वरोगविनाशनम् ।
जागर्ति भुजगी देवी भुजगासनसाधनात् ॥ ४२ ॥
( भुजंगासन का फल बताते हैं — ) भुजंगासन से नित्य ही जठराग्नि बढ़ती है, सब रोगों का विनाश होता है, भुजंगासन की साधना से भुजगी देवी जागती है अर्थात् इस आसन को करने से कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है ॥ ४२ ॥
योगासनविधिः
उत्तानौ चरणौ कृत्वा संस्थाप्य जानुनोपरि ।
आसनोपरि संस्थाप्य उत्तानं करयुग्मकम् ॥ ४३ ॥
पैरों को उत्तान ( चित्त ) करके और जंघाओं पर स्थापित करके पुनः आसन पर स्थित करके हाथों को उत्तान भाव से रखे ॥ ४३ ॥
पूरकैर्वायुमाकृष्य नासाग्रमवलोकयेत् ।
योगासनं भवेदेतद्योगिनां योगसाधने ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् पूरक वायु को खींचकर अर्थात् कुंभक करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये । योगियों के योगसाधन में यही योगासन होता है ॥ ४४ ॥
॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीये भाष्ये आसनप्रयोगोनाम द्वितीयोपदेशः ॥
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अथ तृतीयोपदेशः अथ मुदाप्रकरणम्
महामुद्रा नभोमुद्रा उड्डीयानं जलन्धरम् ।
मूलबन्धं महाबन्धं महावेधश्च खेचरी ॥ १ ॥
मुद्राओं के प्रकार बताते हैं – महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयान मुद्रा, जलंधर, मूलबन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेंचरी ( ये सब आठ मुद्रायें हैं ) ॥ १ ॥
विपरीतकरी योनिर्वज्रोली शक्तिचालनी ।
ताडागी माण्डुकी मुद्रा शाम्भवी पंचधारणा ॥ २ ॥
विपरीतकरी, योनि, वज्राणी, शक्तिधारिणी, तड़ागी, मांडवी, शांभवी, धारणा' ( यहाँ तक सोलह मुद्रायें हुई ) ॥ २ ॥
अश्विनी पाशिनी काकी मातङ्गी च भुजङ्गिनी ।
पञ्चविंशति मुद्राणि सिद्धदानीह योगिनाम् ॥ ३ ॥
( पुनः सोलह के बाद ) अश्विनी, पाशिनी, काकी, मातंगी, भुजंगिनी, ये कुल २५ मुद्रा कही जाती हैं, ये योगियों के लिये सिद्धिदात्री हैं ॥ ३ ॥
मुद्राणां फलम्
मुद्राणां पटलं देवि कथितं तव सन्निधौ ।
येन विज्ञातमात्रेण सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥ ४ ॥
( भगवान शिव पार्वती से कहते हैं— ) हे देवी! मैंने तुम्हारे सम्मुख मुद्राओं का यह वृत्त कहा है, जिसके जानने से सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं ॥ ४ ॥
१. धारणा मुद्रा पाँच प्रकार की है जैसे- पार्थिवी, आरम्भसी, वैश्वानरी, वायवी, नभा |
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३० घेरण्डसंहिता
गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्य कस्यचित् ।
प्रीतिदं योगिनाञ्चैव दुर्लभं मरुतामपि ॥ ५ ॥
मुद्रायें गोपनीय हैं, जिस किसी योग्य- अयोग्य को ये देय नहीं हैं । योगियों के लिये प्रातिदायक तथा देवताओं के लिये भी ये दुर्लभ हैं ॥ ५ ॥
( समीक्षा गोपनीय, अदेय, दुर्लभ आदि कहने के पीछे विशेष बात यह है कि हर कोई इन्हें कर ही नहीं सकता है । यदि सीख भी ले तो वह बिना नियम और व्यवस्था के और इन्हें या अज्ञानवश पवित्रता और समयादि के बिना करके इनसे लाभ की बजाय हानि ही उठायेंगे । अतएव अपात्र को ये मुद्रायें अदेय हैं । अनेक मुद्राओं की साधना भी कठिन है, जिन्हें देवसदृश जन भी करने में नियम का ध्यान नहीं रख पाते हैं । अत: मात्र योगीजन ही इन्हें कर पाते हैं, यह भाव है ) महामुद्राविधिः
पायुमूलं वामगुल्फे सम्पीड्य दृढयत्नतः ।
याम्यपादं प्रसार्याथ करे धृतपदाङ्गुलः ॥ ६ ॥
( अब सर्वप्रथम महामुद्रा की विधि बताते हैं - ) मलद्वार को वाम एड़ी पर दृढ़ता के साथ दबाकर दायें पैर को फैलाकर हाथ से पैर की अंगुली को धारण करें ॥ ६ ॥
कण्ठसङ्कोचनं कृत्वा भ्रुवोर्मध्ये निरीक्षयेत् ।
महामुद्राभिधा मुद्रा कथ्यते चैव सूरिभिः ॥ ७ ॥
तत्पश्चात् कण्ठ का संकोचन (सिकोड़ ) करके भ्रुवों के मध्य में देखना चाहिये । यह विद्वानों के द्वारा महामुद्रा के नाम से अभिहित की जाती है ॥ ७ ॥