श्रीगणेशाय नमः।
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 41–50
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 41–50
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: तृतीयोपदेश ३१ महामुद्राफलम्
क्षयकासं गुदावर्त्तं प्लीहाजीर्णज्वरं तथा ।
नाशयेत्सर्वरोगांश्च महामुद्रा च साधनात् ॥ ८ ॥
( महामुद्रा का फल बताते हैं - ) इस महामुद्रा के अत्यधिक सेवन से क्षयज खाँसी, गुदावर्त ( गुदा के फोड़े ) तापतिल्ली, जीर्णज्वर, तथा अन्य सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ८ ॥
नभोमुद्रा यत्र यत्र स्थितो योगी सर्वकार्येषु सर्वदा । ऊर्ध्वजिह्वः स्थिरो भूत्वा धारयेत् पवनं सदा ॥। ९ ॥ नभोमुद्रा भवेदेषा योगिनां रोगनाशिनी ( अब नभोमुद्रा की विधि बताते हैं — ) जहाँ- जहाँ भी योगी किसी कार्य में स्थित हो, तब तब सदैव ऊपर की ओर जिह्वा से स्थित होकर वायु को धारण करे । योगियों के रोगों का नाश करने वाली यह नभोमुद्रा होती है ॥ ९ ॥
उड्डीयानवन्धः उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत् ।
उड्डानं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः ।
उड्डीयानं त्वसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ १० ॥
(अब उड्डीयान बंध की विधि बताते हैं— ) उदर में नाभि के ऊर्ध्वभाग को पश्चिम तान ( द्वार ) को समान रूप से सिकोड़ना चाहिये । अर्थात् मध्यस्थ नाड़ीचक्र को सिकोड़कर उठाये । इसी को उड्डीयान बन्ध कहते हैं, गजरुप मृत्यु के लिये साक्षात् सिहँ यही उड्डीयान बंध होता है ॥ १० ॥
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३२ घेरण्डसंहिता उड्डीयानबन्धफलम्
समग्राद्बन्धनादेतदुड्डीयानं विशिष्यते ।
उड्डीयाने समभ्यस्ते मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत् ॥ ११ ॥
समस्त मुद्राबंधो में उड्डीयान बंध विशिष्ट माना जाता है । इस उड्डीयान बंध के साधन से स्वयं ही मुक्ति होती है ॥ ११ ॥
जालन्धरबन्धः कण्ठसङ्कोचनं कृत्वा चिबुकं हृदयेन्यसेत् ।
जालन्धर कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम् ।
जालन्धरमहामुद्रा मृत्योश्च क्षयकारिणी ॥ १२ ॥
( अब जालंधर बंध का लक्षण करते हैं - ) कण्ठ का संकोचन करके ठोड़ी को हृदय पर रखना चाहिये । इसी जालंधर बंध के करने से सोलह प्रकार का आधार बंध होता है । जालंधर महामुद्रा मृत्यु का भी क्षय करने वाली है ॥ १२ ॥
जालन्धरबन्धफलम्
सिद्धं जालन्धरं बन्धं योगिनां सिद्धिदायकम् ।
षण्मासमभ्यसेद्यो हि स सिद्धो नात्र संशयः ॥ १३ ॥
(जालन्धरबन्ध का फल बताते हैं - ) सिद्ध हुआ जालंधर बंध योगियों को सिद्धिदायक है । छह मास तक जो अभ्यास करता है, वह सिद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १३ ॥
मूलबन्धविधिः
पाणिना वामपादस्य योनिमाकुञ्चयेत्ततः ।
नाभिग्रन्थि मेरुदण्डे सम्पीड्य यत्नतः सुधीः ॥ १४ ॥
( मूलबंध की विधि बताते हैं— ) वाम पैर की एड़ी से गुह्यस्थान
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: तृतीयोपदेश ३३ ( योनिस्थान ) का आकुंचन करे, पुनः नाभिग्रन्थी को मेरुदण्ड से यत्नपूर्वक दबाये ॥ १४ ॥
मेढ्रं दक्षिणगुल्फे तु दृढबन्धं समाचरेत् ।
जराविनाशिनी मुद्रा मूलबन्धो निगद्यते ॥ १५ ॥
पुनः लिङ्ग को दायीं एड़ी से दृढ़ता से दबाये, यह जरा की विनाशक मुद्रा मूलबंध कही जाती है ॥ १५ ॥
मूलबन्धफलम्
संसारसमुद्रं तर्त्तुमभिलषति यः पुमान् ।
विरलेसुगुप्तो भूत्वा मुद्रामेनां समभ्यसेत् ॥ १६ ॥
( अब मूलबन्ध का फल बताते हैं - ) संसार सागर से पार होने की जो जन इच्छा करता है, वह एकांत स्थान में इस मुद्रा में स्थितमन होकर अभ्यास करें ॥ १६ ॥
अभ्यासाद्बन्धनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।
साधयेद् यत्नतो तर्हि मौनी तु विजितालसः ॥ १७ ॥
इस बंध के अभ्यास से अवश्य ही वायु की सिद्धि होती है । अत: निरालस्य होकर यत्नपूर्वक इसकी साधना करनी चाहिये ॥ १७ ॥
महाबन्धविधिः
वामपादस्य गुल्फेन पायुमूलं निरोधयेत् ।
दक्षपादेन तद्गुल्फं संपीड्य यत्नतः सुधीः ॥ १८ ॥
बायें पैर की एड़ी से पायुमूल का निरोध करना चाहिये तथा योगीजन को दायें पैर से बायीं एड़ी को प्रयत्नपूर्वक दबाना चाहिये ॥ १८ ॥
शनैः शनैश्चालयेत् पार्ष्णिं योनिमाकुञ्चयेच्छनः ।
जालन्धरे धारयेत् प्राणं महाबन्धो निगद्यते ॥ १ ९ ॥
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३४ घेरण्डसंहिता इसके बाद शनैः - शनैः गुह्यस्थान का चाल न करें — चलायें और आकुञ्चन या सिकोड़ने की क्रिया करें । तथा प्राणवायु जालन्धर में धारण करें । यही महाबन्ध कहलाता है ॥ १ ९ ॥ महाबन्धस्यफलम्
महाबन्धः परो बन्धो जरामरणनाशनः ।
प्रसादादस्य बन्धस्य साधयेत् सर्ववाञ्छितम् ॥ २० ॥
( अब महाबंध का फल बताते हैं - ) जरा और मरण को दूर करने वाली महाबंध नामक यह मुद्रा सबसे श्रेष्ठ बंध है । इसके प्रसाद से सब इच्छाओं को साधना चाहिये ॥ २० ॥
महावेधविधिः
रूपयौवनलावण्यं नारीणां पुरुषं विना ।
मूलबन्धमहाबन्धौ महावेधं विना तथा ॥ २१ ॥
( महावेध की विधि बताते हैं — ) जिस प्रकार पुरुष के बिना नारी का रूप, यौवन और सुन्दरता ( निरर्थक है ), उसी प्रकार महावेध मुद्रा के बिना मूलबन्ध और महाबंध होते हैं ॥ २१ ॥
महाबन्धं समासाद्य उड्डानकुम्भकं चरेत् ।
महावेधः समाख्यातो योगिनां सिद्धिदायकः ॥ २२ ॥
प्रथम महाबंध मुद्रा को करे, पुनः उड्डीयान बंध मुद्रा द्वारा कुंभक प्राणायाम को करना चाहिये । इस प्रकार यही महाबंध मुद्रा कही जाती है, जो योगियों को सिद्धिदायक है ॥ २२ ॥
महावेधफलम्
महाबन्धमूलबन्धौ महावेध समन्वितौ ।
प्रत्यहं कुरुते यस्तु स योगी योगवित्तमः ॥ २३ ॥
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तृतीयोपदेशः ३५ ( अब इसका फल बताते हैं — ) महाबंध और मूलबंध के सहित महावेध मुद्रा को योग को जो प्रतिदिन करता है, वह योगी योगज्ञानी है ॥ २३ ॥
न मृत्युतो भयं तस्य न जरा तस्य विद्यते ।
गोपनीयः प्रयत्नेन वेधोयं योगिपुङ्गवैः ॥ २४ ॥
वह न मृत्यु से भय करता है और न उसे जरा आती है । अत: योगी विशिष्टों द्वारा यह महावेधमुद्रा गोपनीय मानी गयी है ॥ २४ ॥
खेचरीमुद्रा
जिह्वाधो नाडीं सञ्छिन्नां रसनां चालयेत् सदा ।
दोहयेन्नवनीतेन लौहयन्त्रेण कर्षयेत् ॥ २५ ॥
( अब खेचरी मुद्रा की विधि बताते हैं - ) जिह्वा के नीचे की नाड़ी को छिन्न करके रसना को सदैव चलाना चाहिये । जिह्वा को मक्खन से दुहा करना चाहिये और लौहयन्त्र से खींचना चाहिये ॥ २५ ॥
एवं नित्यं समभ्यासाल्लम्बिका दीर्घतां व्रजेत् ।
यावद्गच्छेद् भ्रुवोर्मध्ये तदागच्छति खेचरी ॥ २६ ॥
इस प्रकार नित्य अभ्यास से जिह्वा लम्बी हो जाती है । जब वह भ्रुवों के मध्य में पहुँच जाये तो खेचरी की ओर ले जाती है ॥ २६ ॥
रसनां तालुमध्ये तु शनैः शनैः प्रवेशयेत् ।
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ।
भ्रुवोर्मध्ये गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥ २७ ॥
पुनः जिह्वा को तालु के मध्य में शनै: शनै: प्रवेश कराना चाहिये । जिह्वा को कपाल गुहर ( तालु के मध्यस्थ गड्ढे ) में उल्टी करके प्रविष्ट करके भ्रुवों के मध्य में दृष्टि को स्थित करे, यही खेचरी मुद्रा होती है ॥ २७ ॥
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३६ घेरण्डसंहिता खेचरीमुद्राफलम्
न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैवालस्यं प्रजायते ।
न च रोगो जरा मृत्युर्देवदेहः स जायते ॥ २८ ॥
खेचरी मुद्रा का फल बताते हैं - इस मुद्रा से न तो मूर्च्छा, न क्षुक्षा, न तृष्णा, न आलस्य ही उत्पन्न होता है I। और न रोग, न जरा, न मृत्यु ही होती है । अपितु शरीर देवता जैसा हो जाता है ॥ २८ ॥
नाग्निना दह्यते गात्रं न शोषयति मारुतः ।
न देहं क्लेदयन्त्यापो दंशयेन्न भुजङ्गमः ॥ २ ९ ॥
शरीर को न अग्नि जला पाती है, न पवन सुखा पाती है, न जल गला पाता है और न सर्प डस सकता है ॥ २ ९ ॥
लावण्यं च भवेद् गात्रे समाधिर्जायते ध्रुवम् ।
कपालवक्त्र संयोगे रसना रसमाप्नुयात् ॥ ३० ॥
शरीर में सुन्दरता आ जाती है, और निश्चय ही समाधि सिद्ध होती है । कपाल और मुख के संयोग होने पर रसना के रसों की प्राप्ति हो जाती है ॥ ३० ॥
नाना रस समुद्भूतमानन्दं च दिने दिने ।
आदौ लवणक्षारं च ततस्तिक्तं कषायकम् ॥ ३१ ॥
अनेक प्रकार के रसों का दिन-दिन अद्भुत आनंद प्राप्त होता है । प्रांरभ में लवण, क्षार का और तिक्त ( तीखे ) और कषाय का रसानुभव होता है ॥ ३१ ॥
नवनीतं घृतं क्षीरं दधितक्रमधूनि च ।
द्राक्षारसं च पीयूषं जायते रसनोदकम् ॥ ३२ ॥
तदुपरान्त नवनीत ( मक्खन ), घृत, दुग्ध, दही, मधु, द्राक्षा, और अमृत जैसे रसों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ३२ ॥
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: तृतीयोपदेश ३७ विपरीतकरणीमुद्रा
नाभिमूलेवसेत्सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमाः ।
अमृतं ग्रसते सूर्यस्ततो मृत्युवशो नरः ॥ ३३ ॥
( अब विपरीतकरी मुद्रा विधि बताते हैं- ) नाभि के मूल में सूर्य बसते हैं और तालु के मूल में चन्द्रमा । जब सूर्य अमृत को ग्रस लेता है, तब नर मृत्यु के वश होता है ॥ ३३ ॥
( समीक्षा— ( सूर्य नाभि में स्थित है तथा अमृत सहस्रारचक्र में (ब्रह्मरंध्र में ) है । सूर्य द्वारा अमृतपान करने से मनुष्य की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है । )
ऊर्ध्वं च योजयेत् सूर्यञ्चन्द्रञ्च अध आनयेत् ।
विपरीतकरी मुद्रासर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ३४ ॥
सूर्य को ऊपर की ओर उठाना चाहिये तथा चन्द्रमा को नीचे की ओर ले आना चाहिये । इसी का नाम विपरीतकरी मुद्रा है, जो सब तंत्रों में गोपनीया कही गयी है ॥ ३४ ॥
भूमौ शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मं समाहितः ।
ऊर्ध्वपादः स्थिरो भूत्वा विपरीतकरी मता ॥ ३५ ॥
( विपरीतकरी मुद्रा की विधि बताते हैं - ) भूमि पर सिर रखकर हाथों को नीचे रखकर पैरों को ऊर्ध्वं करके विपरीतकरी मुद्रा मानी गयी है ॥ ३५ ॥
विपरीतकरणीमुद्राफलम्
मुद्रां च साधयेन्नित्यं जरां मृत्युञ्च नाशयेत् ।
स सिद्धः सर्वलोकेषु प्रलयेऽपि न सीदति ॥ ३६ ॥
( विपरीतकरी मुद्रा का फल बताते हैं - ) यह मुद्रा नित्य साधनी
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३८ घेरण्डसंहिता चाहिये और जरामत्यु को नष्ट करना चाहिये । वह सब लोकों में सिद्ध होता है और प्रलय में भी दुःखी नहीं होता ॥ ३६ ॥
योनिमुद्रा
सिद्धासनं समासाद्य कर्णचक्षुर्नसोमुखम् ।
अङ्गुष्ठतर्जनीमध्यानामादिभिश्च साधयेत् ॥ ३७ ॥
( अब योनिमुद्रा की विधि बताते हैं — ) पहले सिद्धासन लगाकर कान, नेत्र, नासिका, मुख को अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिकाओं से साधना ( ढ़कना ) चाहिये ॥ ३७ ॥
काकोभिः प्राणंसङ्कृष्य अपाने योजयेत्ततः ।
षट्चक्राणि क्रमाद्ध्यात्वा हुं हंसमनुना सुधीः ॥ ३८ ॥
चैतन्यमानयेद्देवीं निद्रिता या भुजङ्गिनी ।
जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ॥ ३ ९ ॥
पुनः काकी मुद्रा से प्राणवायु को खींचकर अपान वायु में योजित करे । फिर सुधीजन षट् चक्रों का ध्यान करे और 'हुं' और ' हंस ' इन दो मंत्रों से जो साक्षात् भुजंगिनी है, उस देवी ( कुंडलिनी ) को जगाये तथा जीव के सहित इस शक्ति ( कुंडलिनी ) को उठाकर सहस्रकमल (सहस्रारचक्र ) में ले जाये ॥ ३८-३९ ॥
शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परं शिवेन सङ्गमम् ।
नानासुखं विहारञ्च चिन्तयेत् परमं सुखम् ॥ ४० ॥
इससे स्वयं शक्तिवान् होकर परं कल्याण का संयोग पाकर अनेक प्रकार के सुख, विहार और परं आनंद का चिन्तन करता है ॥ ४० ॥
शिवशक्तिसमायोगादेकान्ते भुवि भावयेत् ।
आनन्दमानसो भूत्वा अहं ब्रह्मेति सम्भवेत् ॥ ४१ ॥
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: तृतीयोपदेश ३ ९ शिव ( कल्याणमय ) शक्ति के संयोग से भूमि पर एकान्त की भावनां करनी चाहिये । स्वयं परमानंद स्वरूप होकर ' अहं तत्व ही ब्रह्म है' यह भाव तब संभव होता है ॥ ४१ ॥
योनिमुद्रा परा गोप्या देवानामपि दुर्लभा ।
सकृत्तु लाभसंसिद्धिः समाधिस्थः स एव हि ॥ ४२ ॥
योनिमुद्रा परं गोपनीय है । यह देवताओं को भी दुर्लभ है । सब प्रकार के लाभों की सिद्धि इससे संभव होती है और वही जन वस्तुत: समाधिस्थ होता है ॥ ४२ ॥
योनिमुद्राफलम्
ब्रह्महा भ्रूणहाचैव सुरापी गुरुतल्पगः ।
एतैः पापैर्न लिप्येत योनिमुद्रानिबन्धनात् ॥ ४३ ॥
(योनिमुद्रा फल बताते हैं — ) ब्रह्मघाती, भ्रूणहत्यारा, मद्यपायी, गुरुपत्नी सेवी जैसे ( पामरजन भी ) योनिमुद्रा के पालन से इन पापों से लिप्त नहीं होते हैं अर्थात् इन पापों के दुष्प्रभाव से बहुत हद तक दूर हो जाते हैं ॥ ४३ ॥
यानि पापानि घोराणि उपपापानि यानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति योनिमुद्रानिबन्धनात् ।
तस्मादभ्यासनं कुर्याद्यदि मुक्तिं समिच्छति ॥ ४४ ॥
जो भी घोर पाप और उपपाप हैं, वे सब योनिमुद्रा के ( विधिवत ) पालन से नष्ट हो जाते हैं । अतः यदि मुक्ति की इच्छा करनी है तो इसुद्रा का अभ्यास करना चाहिये ॥ ४४ ॥
वज्रोणीमुद्रा
धरामवष्टभ्य करयोस्तलाभ्यामूर्ध्वं क्षिपेत्पादयुगं शिरः खे ।
शक्तिप्रबोधाय चिरजीवनाय वज्रोणिमुद्रां मुनयो वदन्ति ॥ ४५ ॥
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४० घेरण्डसंहिता ( वज्रोणिमुद्रा क्या है यह कहते हैं ) कि करतलों को धरा पर रख करके दोनों पैरों और सिर को ऊपर उठाये! शक्ति के जागरण के लिये तथा चिरजीवन ( दीर्घजीवन ) पाने के लिये मुनिजन वज्रोणिमुद्रा को कहते हैं ॥ ४५ ॥
वज्रोणीमुद्राफलम्
अयं योगो योगश्रेष्ठो योगिनां मुक्तिकारकम् ।
अयं हितप्रदो योगो योगिनां सिद्धिदायकः ॥ ४६ ॥
( अब वज्रोणिमुद्रा का फल बताते हैं- ) योगशास्त्र में यह योगियों की मुक्तिकारक वज्रोणि मुद्रा है । यह योगों में परं हितकारी और योगियों को सिद्धि देने वाली है ॥ ४६ ॥
एतद्योगप्रसादेन बिन्दुसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।
सिद्धे बिन्दौ महायत्ले किं न सिद्ध्यतिभूतले ॥ ४७ ॥
इस योग की कृपा से निश्चय ही बिन्दु सिद्धि ( वीर्यसिद्धि ) होती है और इस महायत्न बिन्दुसिद्धि के हो जाने पर भूतल पर कौन सा कार्य है जो सिद्ध नहीं होता ॥ ४७ ॥
भोगेन महता युक्तो यदि मुद्रां समाचरेत् ।
तथापि सकला सिद्धिस्तस्य भवति निश्चितम् ॥ ४८ ॥
भोगों से युक्त पुरुष भी यदि इस मुद्रा का आचरण करता है, तो निश्चय ही सकल सिद्धि वह प्राप्त करता है ॥ ४८ ॥
शक्तिचालनीमुद्रा
मूलाधारे आत्मशक्तिः कुण्डली परदेवता ।
शयिता भुजगाकारा सार्द्धत्रिवलयान्विता ॥ ४ ९ ॥
( अब शक्तिचालनी मुद्रा की विधि कहते हैं— ) आत्मशक्ति मूलाधार में ( शरीर में) सबसे बड़ा देवता - कुंडली शयन स्थिति में सर्पाकार साढ़े तीन वलयों ( गोलाकारों ) से युक्त है ॥ ४ ९ ॥