श्रीगणेशाय नमः।
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 51–60
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयोपदेशः ४१
यावत् सा निद्रिता देहे तावज्जीवः पशुर्यथा ।
ज्ञानं न जायते तावत् कोटियोगं समभ्यसेत् ॥ ५० ॥
जब तक यह कुंडली शयनावस्था में है, तब तक जीव पशु के समान रहता है, तब तक ज्ञान भी नहीं होता है, ( भले ही ) कोटि उपाय किये जायें ॥ ५० ॥
उद्घाटयेत् कपाटञ्च यथा कुञ्चिकया हठात् ।
कुण्डलिन्याः प्रबोधेन ब्रह्मद्वारं प्रभेदयेत् ॥ ५१ ॥
जिस प्रकार कुंचिका से बंद द्वार को हठात् खोला जाता है, उसी प्रकार कुंडलिनी के जागने पर ब्रह्मद्वार को ( भेदकर ) जानना चाहिये ॥ ५१ ॥
नाभिं संवेष्ट्य वस्त्रेण न च नग्नो बहिस्थितः ।
गोपनीयगृहे स्थित्वा शक्तिचालनमभ्यसेत् ॥ ५२ ॥
नाभिस्थान को वस्त्र से लपेट कर किन्तु नग्न होकर बाहर ( सार्वजनिक रूप से ) नहीं, अपितु गोपनीय गृह में स्थित होकर शक्तिचालन का अभ्यास करना चाहिये ॥ ५२ ॥
वितस्तिप्रमितं दीर्घं विस्तारे चतुरङ्गुलम् ।
मृदुलं धवलं सूक्ष्मं वेष्टनाम्बरलक्षणम् ।
एवमम्बरयुक्तञ्च कटिसूत्रेण योजयेत् ॥ ५३ ॥
एक हाथ लम्बा तथा चार अंगुल चौड़ा कोमल, श्वेत और सूक्ष्म ( बारीक ) वस्त्र नाभि से लपेटे । इस प्रकार वस्त्र को पुनः कटिभाग में बाँधना चाहिये ॥ ५३ ॥
भस्मना गात्रं संलिप्य सिद्धासनं समाचरेत् ।
नासाभ्यां प्राणमाकृष्य अपाने योजयेद् बलात् ॥ ५४ ॥
भस्म से शरीर को लिप्त करके पुनः सिद्धासन लगाना चाहिये ।
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२ घेरण्डसंहिता पुनः नासाछिद्रों ( दोनों) से वायु खींचकर अपानवायु के साथ मिलाना चाहिये ॥ ५४ ॥
तावदाकुञ्चयेद्गुह्यं शनैरश्विनिमुद्रया । यावद्गच्छेत् सुषुम्णायां वायुः प्राकाशयेद्धठात् ॥ ५५ ॥
जब तक वायु सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर जाकर प्रकाशित हो, तब तक गुह्यस्थान ( मलद्वार ) का अश्विनी मुद्रा से धीरे - धीरे संकोचन करना चाहिये ॥ ५५ ॥
तदा वायुप्रबन्धेन कुम्भिका च भुजङ्गिनी ।
बद्धश्वासस्ततो भूत्वा ऊर्ध्वमार्गं प्रपद्यते ॥ ५६ ॥
तब श्वास वायु को रोककर कुंभक श्वास को धारण करे तो कुंडलिनी उर्ध्वमार्ग की ओर प्राप्त होती है-उठती है ॥ ५६ ॥
विना शक्तिंचालनेन योनिमुद्रा न सिद्ध्यति ।
आदौ चालनमभ्यस्य योनिमुद्रां समभ्यसेत् ॥ ५७ ॥
विना शक्तिचालनी के योनिमुद्रा सिद्ध नहीं होती, शक्तिचालनी के अभ्यास को पहले करें, पुनः योनिमुद्रा का अभ्यास करें ॥ ५७ ॥
इति ते कथितं चण्डकापाले शक्तिचालनम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन दिने दिने समभ्यसेत् ॥ ५८ ॥
( घेरण्ड ऋषि कहते हैं— ) हे चण्डकापालि! इस प्रकार शक्तिचालन मुद्रा मैंने तुम्हें बतायी । यह गोपनीय है, दिन-दिन इसका अभ्यास करना चाहिये ॥ ५८ ॥
मुद्रेयं परमा शक्तिचालनीमुद्राफलम्गोप्या जरामरणनाशिनी ।
तस्मादभ्यसनंकार्यं योगिभिः सिद्धिकाङ्क्षिभिः ॥ ५ ९ ॥
यह मुद्रा परं गोपनीया है और जरामरण का नाश करती है । अत: सिद्धि चाहने वाले योगियों को इसका अभ्यास करना चाहिये ॥ ५ ९ ॥
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
: तृतीयोपदेश ४३
नित्यं योऽभ्यसते योगी सिद्धिस्तस्य करे स्थिता ।
तस्य विग्रहसिद्धिः स्याद्रोगाणां सङ्क्षयो भवेत् ॥ ६० ॥
जो योगी नित्य इसका अभ्यास करता है, उसके हाथ में सिद्धि आ जाती है । उसे विग्रह सिद्धि हो जाती है और उसके रोगों का क्षय हो जाता है ॥ ६० ॥
ताडागीमुद्रा
उदरं पश्चिमोत्तानं कृत्वा च तडागाकृतिम् ।
ताडागी सा परामुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥ ६१ ॥
पश्चिमोत्तान करके उदर को तालाब की आकृति के समान बनाये, यह ताडागी मुद्रा जरामृत्यु विनाशिनी है ॥ ६१ ॥
माण्डूकीमुद्रा
मुखं समुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत् ।
शनैर्ग्रसेदमृतं तन्माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ॥ ६२ ॥
( अब मांडूकी मुद्रा को कहते हैं - ) मुख को बंद करके जिह्वामूल का चालन करे, पुन: धीरे - धीरे अमृत का पान करे ( सहस्रारचक्र के परमानंद का ध्यान करे ) इसे विद्वानों ने मांडूकी मुद्रा कहा है ॥ ६२ ॥
माण्डूकीमुद्राफलम्
वलितं पलितं नैव जायते नित्ययौवनम् ।
न केशे जायते पाको यः कुर्यान्नित्यमाण्डुकीम् ॥ ६३ ॥
(इसका फल बताते हैं— ) जो भी मांडूकी मुद्रा को करता है— वलित और पलित ( त्वचा का सिकुड़ना तथा बालों का श्वेतहोना ) इससे नहीं होता, तथा नित्य यौवन बना रहता है और केश पकते नहीं है ॥ ६३ ॥
शाम्भवीमुद्रा
नेत्राञ्जनं समालोक्य आत्मारामं निरीक्षयेत् ।
सा भवेच्छाम्भवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ६४ ॥
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४ घेरण्डसंहिता ( शांभवी मुद्रा की विधि कहते हैं— ) भोंहों के मध्य में दृष्टि डालते हुए सर्वदा मन को आत्मा में रमण करते हुए निरीक्षण करना चाहिये । यह सब विधानों में गोपनीया शांभवी मुद्रा है ॥ ६४ ॥
शाम्भवीमुद्राफलम्
वेदशास्त्रपुराणानि सामान्यगणिका इव ।
इयं तु शाम्भवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ॥ ६५ ॥
( इसका फल कहते हैं— ) वेद, शास्त्र और पुराण इस मुद्रा के समक्ष सामान्य गणिका जैसे हैं ( गौण हैं ) जबकि यह शांभवी मुद्रा कुलवधु के समान गोपनीय है ॥ ६५ ॥
स एव आदिनाथश्च स च नारायणः स्वयम् ।
स च ब्रह्मा सृष्टिकारी यो मुद्रां वेत्ति शाम्भवीम् ॥ ६६ ॥
जो जन शांभवी मुद्रा को जानता है, वह आदिनाथ है, वही स्वयं नारायण स्वरूप है, और वही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं ॥ ६६ ॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यमुक्तं महेश्वर ।
शाम्भवीं यो विजानीयात् स च ब्रह्म न चान्यथा ॥ ६७ ॥
शांभवी मुद्रा को ( तत्वतः ) जो जानता है, वह साक्षात् ब्रह्म स्वरूप है । यह पूर्ण सत्य है, अन्यथा की संभावना नही है ॥ ६७ ॥
( समीक्षा — भावार्थ यह है कि शांभवी मुद्रा तन, मन, हृदय को परंशान्ति प्रदान करने वाली है । सब संतापों - तनावों को शांत करने वाली है । और जब मनुष्य के सब तनाव- घोर अंशाति शांत हो जायेगी तो ब्रह्मशक्ति ( प्रजनन शक्ति) विष्णुशक्ति ( परिवार समाज आदि की पालनाशक्ति ) आदि विलक्षण और सुदृढ़ शक्तियाँ मनुष्य प्राप्त करता हैं । )
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयोपदेशः ४५ पञ्चधारणामुद्रा
कथिता शाम्भवी मुद्रा शृणुष्व पञ्चधारणाम् ।
धारणानि समासाद्य किं न सिद्ध्यति भूतले ॥ ६८ ॥
( पंचधारणा मुद्रा बताते हैं - ) इस प्रकार शांभवी मुद्रा कही गयी, अब पंचधारण मुद्रा को सुनो । पंचधारणाओं को प्राप्त करके मनुष्य इस भूतल पर क्या नहीं प्राप्त कर सकता? ॥ ६८ ॥
अनेन नरदेहेन स्वर्गेषु गमनागमम् ।
मनोगतिर्भवेत्तस्य खेचरत्वं न चान्यथा ॥ ६ ९ ॥
इससे नरदेंह का स्वर्गों में गमनागमन होता है । उसकी मनोगामी गति
हो जाती है और खेचरत्व सिद्धि प्राप्त हो जाती है । यह सत्य है ॥ ६ ९ ॥
यत्तत्त्वंहरितालदेशरचितंपार्थिवीधारणामुद्राभौमं लकारान्वितं वेदास्तं कमलासनेन सहितं कृत्वा हृदि स्थायिनम् । प्राणांस्तत्र विलीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारये- देषास्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्यादधोधारणा ॥ ७० ॥
( अब पार्थिवधारणा की विधि बताते हैं — ) भूमि का जो तत्व हरिताल ( हल्दी ) जैसा पीला है, लकार से युक्त है, आकार चौकोर है, ऐसे उन ( वेदात्रं ) कमलासन ब्रह्मा के सहित हृदय में ध्यान करे । तब प्राणवायु को खींचकर पाँच घटी ( दो घण्टा) तक उसे धारण करे । यह स्तंभकरी
अधोधारणा भी कही जाती है । इससे धरती पर विजय हो जाती है ॥ ७० ॥
पार्थिवीधारणामुद्राफलम्
पार्थिवी धारणामुद्रां यः करोति च नित्यशः ।
मृत्युञ्जयः स्वयं सोऽपि स सिद्धो विचरेद् भुवि ॥ ७१ ॥
( इसका फल कहते हैं - ) प्रतिदिन जो जन पार्थिवीधारण को करता है, वह मृत्युञ्जय हो जाता है, वह सिद्ध हो भूमि पर विचरता है ॥ ७१ ॥
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६ घेरण्डसंहिता आम्भसीधारणामुद्रा शङ्खेन्दुप्रतिमञ्च कुन्दधवलं तत्त्वं किलालं शुभम् तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् एषादुःसहतापपापहरिणी स्यादाम्भसी धारणा ॥ ७२ ॥
इसका वर्ण शंख और चन्दमा जैसा सुन्दर, कुन्दपुष्प जैसा धवल है I। शोभायमान वकार बीज से युक्त अमृत की संज्ञा वाला है, जो सदा ही विष्णु शक्ति से युक्त है या विष्णु इसके देवता हैं । ( इस स्वरूप का ध्यान जल तत्व में करते हुए ) प्राण को खींचकर पाँच घटी ( २ घण्टे ) तक कुंभक में स्थिर हो, यही दुःसह तापों को नष्ट करने वाली आंभसी धारणा होती है ॥ ७२ ॥
आम्भसीधारणामुद्राफलम्
आम्भसीं परमां मुद्रां यो जानाति स योगवित् ।
जले च गम्भीरे घोरे मरणं तस्य नो भवेत् ॥ ७३ ॥
इस श्रेष्ठ आम्भसी मुद्रा को जो जानता है, वह योगज्ञानी है । गम्भीर जल में उसका कभी मरण संभव नहीं होता ॥ ७३ ॥
इयं तु परमा मुद्रा गोपनीया प्रयत्नतः ।
प्रकाशात् सिद्धिहानिः स्यात् सत्यं वच्मि च तत्त्वत्तः ॥ ७४ ॥
यह श्रेष्ठ मुद्रा प्रयत्नपूर्वक गोपनीय है । इसके प्रकाश से सिद्धि की हानि होती है, यह मैं सत्य कहता हूँ || ७४!! आग्नेयीधारणामुद्रा यन्नाभिस्थितमिन्द्रगोपसदृशं बीजं त्रिकोणान्वितं तत्त्वं तेजमयं प्रदीप्तमरुणं रुद्रेण यत् सिद्धिदम् । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा कालगभीरभीतिहरणी वैश्वानरी धारणा ॥ ७५ ॥
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
: तृतीयोपदेश ४७ ( अब आग्नेयी मुद्रा की विधि बताते हैं - ) ( यह मुद्रा अग्नितत्व में स्थित है ) इसका स्थान नाभि और इन्द्रगोप ( भगवान की गाय - बरसाती लालरंग का एक गोल कीड़ा ) जैसा इसका तीन कोण वाला वर्ण है, तेजयुक्त दीप्त अरुण जैसी आभा है और रुद्र इसके देवता है । (इस स्वरूप का प्राणों को रोककर कुंभक में पाँच घटी ( २ घण्टा) तक चित्त में ध्यान करे | इससे संसार का भय दूर होता है, यह वैश्वानरी ( आग्नेयी) धारणा है ॥ ७५ ॥
आग्नेयीधारणामुद्राफलम्
प्रदीप्ते ज्वलिते वह्नौ यदि पतति साधकः ।
एतन्मुद्राप्रसादेन स जीवति न मृत्युभाक् ॥ ७६ ।
प्रदीप्त और जलती हुई अग्नि में यदि साधक गिर जाये तो इस मुद्रा के प्रसाद से वह जीवन धारण करता है, न कि मृत्यु ॥ ७६ ॥
वायवीधारणामुद्रा यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं धूम्रावभासं परं तत्त्वं सत्त्वमयं यकारसहितं यत्रेश्वरो देवता । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेद्- ऐषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायवी धारणा ॥ ७७ ॥
( अब वायवी धारणा की विधि कहते हैं— ) इसका वर्ण भिन्न अंजन पुंज के समान, धुएँ के समान है, सत्व इसका गुण और यकार बीज है । स्वयं ईश्वर इसके देवता हैं I। इसी स्वरूप का प्राणों को रोककर पाँचघटी ( २ घण्टा ) तक चित्त में ध्यान करे । आकाश में गमन इसी वायवी धारणा से होता है ॥ ७७ ॥
वायवीधारणामुद्राफलम्
इयं तु परमा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ।
वायुना म्रियते नापि खे च गतिप्रदायिनी ॥ ७८ ॥
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४८ घेरण्डसंहिता ( फल बताते हैं— ) यह श्रेष्ठ वायवी मुद्रा जरामृत्यु विनाशिनी है, इसके कारण वायुकोष से मृत्यु नहीं होती तथा यह आकाशगमन को देने वाली होती है ॥ ७८ ॥
शठाय भक्तिहीनाय न देया यस्य कस्यचित् ।
दत्ते च सिद्धिहानिः स्यात् सत्यं वच्मि च चण्ड ते ॥ ७ ९ ॥
जिस किसी भी शठ या भक्तिहीन को इसे नहीं देना चाहिये ।
अन्यथा देने पर सिद्धि की हानि हो जाती है - यह सत्य कहता हूँ ॥ ७९ ॥
आकाशीधारणामुद्रा यत् सिन्धौ वरशुद्धवारिसदृशं व्योमं परं भासितं तत्त्वं देवसदाशिवेन सहितं बीजं हकारान्वितम् । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् एषा मोक्षकपाटभेदनकरी कुर्यान्न भोधारणा ॥ ८० ॥
( आकाशीधारणाविधि— ) इसका वर्ण सिन्धु के जल के समान परं विस्तीर्ण भासित है । शिवदेवता सहित हकार इसका बीज है । प्राणों का पाँच घटी तक कुंभक में संयोजन करके इस स्वरूप का ध्यान करे तो यह आकाशी मुद्रा मोक्षद्वार का भेदन करने वाली होती है ॥ ८० ॥
आकाशीधारणामुद्राफलम्
आकाशीधारणां मुद्रां यो वेत्ति सैव योगवित् ।
न मृत्युर्जायते तस्य प्रलये नावसीदति ॥ ८१ ॥
जो साधक आकाशीमुद्रा की पूरी जानकारी से परिपूर्ण रहता है, वही सही रूप में योग को पहचानने वाला है, उसकी काल आने पर भी मृत्यु नही होती और प्रलय होने पर भी वह डगमगाता नहीं है ज्यों का त्यों स्थिर रहता है ॥ ८१ ॥
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयोपदेश: ४ ९ अश्विनीमुद्रा
आकुञ्चयेद् गुदाद्वारं प्रकाशयेत् पुनः पुनः ।
सा भवेदश्विनी मुद्रा शक्तिप्रबोधकारिणी ॥। ८२ ॥
गुदाद्वार का संकोचन (सिकोड़ना ) तथा फैलाना बार - बार करे । यही अश्विनी मुद्रा है, जो शक्ति देने वाली है ॥ ८२ ॥
अश्विनीमुद्राफलम्
अश्विनी परमा मुद्रा गुह्यरोगविनाशिनी ।
बलपुष्टिकरी चैव अकालमरणं हरेत् ॥ ८३ ॥
अश्विनी मुद्रा गुदारोगों को नष्ट करने वाली है । बल और पुष्टि करने वाली तथा अकालमृत्यु को हरने वाली है ॥ ८३ ॥
पाशिनीमुद्रा
कण्ठपृष्ठे क्षिपेत्पादौ पाशवद् दृढबन्धनम् ।
सा एव पाशिनी मुद्रा शक्ति प्रबोधकारिणी ॥ ८४ ॥
पाशिनी मुद्रा- कण्ठ और पीठ में दोनों पैरों को डाले और दृढ़ता से इस आसन को बाँधे, यही पाशिनि मुद्रा है, जो कुंडलिनी शक्ति को जगाने वाली है ॥ ८४ ॥
पाशिनीमुद्राफलम्
पाशिनी महती मुद्रा बलपुष्टिविधायिनी ।
साधनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धिकाङ्क्षिभिः ॥ ८५ ॥
पाशिनी मुद्रा अत्यधिक बल और पुष्टि देने वाली है । सिद्धि चाहने वाले साधकों द्वारा इसे प्रयत्नपूर्वक साधना चाहिये ॥ ८५ ॥
काकीमुद्रा
काकचञ्चुवदास्येन पिबेद्वायुं शनैः शनैः ।
काकीमुद्रा भवेदेषा सर्वरोगविनाशिनी ॥ ८६ ॥
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५० घेरण्डसंहिता ( काकीमुद्रा विधि— ) काकचंचु (कौवे जैसी चौंच ) के मुख को करके धीरे - धीरे वायु को पान करे । यह सब रोग विनाशिनी काकी मुद्रा होती है ॥ ८६ ॥
काकीमुद्राफलम्
काकीमुद्रा परा मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ।
अस्याः प्रसादमात्रेण न रोगी काकवद् भवेत् ॥ ८७ ॥
काकीमुद्रा सब तन्त्रों में गोपनीय है । इसके प्रसाद से काकवत् नीरोग हो जाता है ॥ ८७ ॥
मातङ्गिनीमुद्रा
कण्ठमग्ने जले स्थित्वा नासाभ्यां जलमाहरेत् ।
मुखान्निर्गमयेत् पश्चात् पुनर्वक्त्रेण चाहरेत् ॥ ८८ ॥
कण्ठ तक मग्न जल में स्थित होकर नासिकाछिद्रों से जल ग्रहण करे, पुनः मुख से निकाल दे तथा पुनः मुख से ग्रहण करना चाहिये ॥ ८८ ॥
नासाभ्यां रेचयेत् पश्चात् कुर्यादेवं पुनः पुनः ।
मातङ्गिनी परा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥ ८ ९ ॥
पुन: उसका नासाछिद्रों से रेचन करे । यदि पुनः पुनः ऐसा करे तो मातंगिनी मुद्रा जरामृत्यु का नाश करती है ॥ ८ ९ ॥ मातङ्गिनीमुद्राफलम्
विरले निर्जने देशे स्थित्वा चैकाग्रमानसः ।
कुर्यान्मातङ्गिनीं मुद्रां मातङ्ग इव जायते ॥ ९ ० ॥
विरल निर्जन देश में एकाग्रमन से स्थित होकर मातंगिनी मुद्रा को करे तो हाथी के समान बली होता है ॥ ९ ० ॥
यत्र यत्र स्थितोयोगी सुखमत्यन्तमश्नुते ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन साधयेन्मुद्रिकां पराम् ॥ ९ १ ॥