श्रीगणेशाय नमः।
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 61–70
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 61–70
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299/202 ब्रह्म पुस्तकालयविभाग शान्ति कुंज,हरिद्वार : तृतीयोपदेश ५१ वह योगी जहाँ - जहाँ स्थित होगा, वहाँ- वहाँ अत्यंत सुख को ग्रहण करता है । अत: सब प्रयत्नों से इसे साधना चाहिये ॥ ९ १ ॥ भुजङ्गिनीमुद्रा
वक्त्रं किञ्चित् सुप्रसार्य चानिलं गलया पिबेत् ।
सा भवेद् भुजगी मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥ ९ २ ॥
( भुजंगिनी मुद्रा — ) मुख को कुछ फैलाकर कण्ठ से वायु को पीना चाहिये । वह जरामृत्यु विनाशक भुजंगिनी मुद्रा होती है ॥ ९ २ ॥ भुजङ्गिनीमुद्राफलम्
यावच्च उदरे रोगा अजीर्णादि विशेषतः ।
तत् सर्वं नाशयेदाशु यत्र मुद्रा भुजङ्गिनी ॥ ९ ३ ॥
उदर में जो अजीर्णादि विशिष्ट रोग हैं, उन सबको, जहाँ भुजंगिनी मुद्रा होती है, शीघ्र ही समाप्त करती है ॥ ९ ३ ॥ मुद्राणांफलम्
इदं तु मुद्रापटलं कथितं चण्ड ते शुभम् ।
वल्लभं सर्वसिद्धानां जरामरणनाशनम् ॥ ९ ४ ॥
( घेरण्ड ऋषि बोले — हे चंडकापालि! यह मुद्राविवरण मैंने तुमसे कहा है । यह सब सिद्धजनों का प्रिय और जरामृत्यु का विनाशक होता है ॥ ९ ४ ॥
शठाय भक्तिहीनाय न देयं यस्य कस्यचित् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन दुर्लभं मरुतामपि ॥ ९ ५ ॥
शठ या भक्तिहीन जिस किसी को भी यह नहीं देना चाहिये ।
देवताओं को भी यह दुर्लभ और प्रयत्नसहित गोपनीय है ॥ ९ ५ ॥
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५२ घेरण्डसंहिता
ऋजवे शान्तचित्ताय गुरुभक्तिपराय च ।
कुलीनाय प्रदातव्यं भोगमुक्तिप्रदायकम् ॥ ९ ६ ॥
जो कोमल मन वाला हो, शांतचित्त हो, गुरुभक्ति परायण हो, कुलीन हो, उसी को यह मुद्राविधि देनी चाहिये, जो भोग मुक्ति की दात्री हैं ॥ ९ ६ ॥
मुद्राणां पटलं ह्येतत् सर्वव्याधिविनाशकम् ।
नित्यमभ्यासशीलस्य जठराग्निविवर्धनम् ॥ ९ ७ ॥
मुद्राओं का यह विवरण सर्वव्याधि विनाशक है और अभ्यासशील की जठराग्नि को बढ़ाने वाला है ॥ ९ ७ ॥
न तस्य जायते मृत्युर्नास्य जरादिकं तथा ।
नाग्निजलभयं तस्य वायोरपि कुतो भयम् ॥ ९ ८ ॥
उसकी न मृत्यु और जरादिक होता है । न अग्निजल का भय होता है, वायु का भय भी उसे कहीं नहीं होता ॥ ९ ८ ॥
कास: श्वासः प्लीहकुष्ठं श्लेष्मरोगाश्च विंशतिः ।
मुद्राणां साधनाच्चैव विनश्यन्ति न संशयः ॥ ९९ ॥
कास, श्वास, प्लीहा, कुष्ठ, श्लेष्मा आदि बीस प्रकार के रोग मुद्राओं के साधने से नष्ट होते हैं ॥ ९९ ॥
बहुना किमिहोक्तेन सारं वच्मि च चण्ड ते ।. नास्ति मुद्रासमं किञ्चित् सिद्धिदं क्षितिमण्डले ॥ १०० ॥
अधिक क्या कहूँ? चे चंडकापालि! तुझे सार बताता हूँ कि ( मुद्रा के योगियों को) सिद्धिदायक पृथ्वीतल पर अन्य कुछ नहीं है ॥ १०० ॥
॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीये भाष्ये मुद्राप्रयोगोनाम तृतीयोपदेशः ॥
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अथ चतुर्थोपदेशः अथ प्रत्याहारप्रकरणम् घेरण्ड उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्रत्याहारकमुत्तमम् ।
यस्य विज्ञानमात्रेण कामादिरिपुनाशनम् ॥ १ ॥
इसके बाद मैं उत्तम प्रत्याहार विषय को कहता हूँ । जिसके विशिष्ट ज्ञान से कामादि शत्रुओं का नाश होता है ॥ १ ॥
यतो यतो मनश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २ ॥
जहाँ-जहाँ मन जाता है, मन (वहाँ- वहाँ उतना ही ) चञ्चल और अस्थिर होता है । अत: मन की चंचलता को (इस प्रत्याहार से ) रोककर अपने वश में लाना चाहिये ॥ २ ॥
पुरस्कारं तिरस्कारं सुश्राव्यं भावमायकम् ।
मनस्तस्मान्नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ३ ॥
पुरस्कार हो, तिरस्कार हो, कान के लिये अच्छा हो या बुरा हो, उस सबसे मन को रोककर अपने वश में ही लाना चाहिये ॥ ३ ॥
सुगन्धो वापि दुर्गन्धो घ्राणेषु जायते मनः ।
तस्मात् प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ४ ॥।
सुगंध हो या दुर्गन्ध हो, सूँघने में जो भी आये, मन उसमें चला जाता है, अत: मन को उससे लौटाये और अपने वश में लाना चाहिये ॥ ४ ॥
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५४ घेरण्डसंहिता
मधुराम्लकतिक्तादिरसं गतं यदा मनः ।
तस्मात् प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ५ ॥
मीठा, खट्टा, तीखा आदि रसों में मन जब जाता है तो उर को लौटाये और अपने वश में लाये ॥ ५ ॥
॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीये भाष्ये प्रत्याहारप्रयोगों नाम चतुर्थोपदेशः
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अथ पञ्चमोपदेशः अथ प्राणायामप्रकरणम् प्रणायामप्रयोगः
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य यद्विधिम् ।
यस्य साधनमात्रेण देवतुल्यो भवेन्नरः ॥ १ ॥
इसके बाद प्राणायाम की जो विधि है, उसे मैं कहता हूँ I। जिसके साधन मात्र से मनुष्य देवतुल्य हो जाता है ॥ १ ॥
आदौ स्थानं तथा कालं मिताहारं तथापरम् ।
नाडीशुद्धिं ततः पश्चात् प्राणायामं च साधयेत् ॥ २ ॥
पहले स्थान, तब काल, फिर मिताहार, फिर नाड़ीशुद्धि (इन सब क्रियाओं को साध लेने ) के बाद प्राणायाम को साधना चाहिये ॥ २ ॥
स्थाननिर्णयः । दूरदेशे तथारण्ये राजधान्यां जनान्तिके योगारम्भं न कुर्वीत कृतश्चेत् सिद्धि न भवेत् ॥ ३ ॥
दूर देश में, अरण्य में, राजधानी में, जनों के बीच में योग का आरम्भ न करे, इससे सिद्धि नहीं होती ॥ ३ ॥
। अविश्वासं दूरदेशे अरण्ये रक्षिवर्जितम् लोकारण्ये प्रकाशश्च तस्मात् त्रीणि विवर्जयेत् ॥ ४ ॥
दूरदेश में विश्वास नहीं होता, अरण्य में रक्षा का अभाव होता है, नगर में करने से सार्वजनिक होता है, अत: इन तीनों स्थानों का निषेध करना चाहिये ॥ ४ ॥
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५६ घेरण्डसंहिता
सुदेशे धार्मिके राज्ये सुभिक्षे निरुपद्रवे ।
कृत्वा कुटीरं तत्रैकं प्राचीरैः परिवेष्टितम् ॥ ५ ॥
अच्छे स्थान में, धार्मिक राज्य में, अच्छे भोज्यादि के स्थान में, उपद्रवरहित ( शान्त ) स्थान में वहाँ एक कुटी चहारदीवारी से घिरी हुई हो ॥ ५ ॥
वापीकूपतडागं च प्राचीरंमध्यवर्ति च ।
नात्युच्चं नातिनिम्नं च कुटीरं कीटवर्जितम् ॥ ६ ॥
प्राचीर के अन्दर वापी, कूप, तालाब हो, न अधिक ऊँचा हो, न अधिक नीचा हो तथा कुटीर कीटादि से वर्जित हो ॥ ६ ॥
सम्यग्गोमयलिप्तं च कुटीरं तत्रनिर्मितम् ।
एवं स्थानेषु गुप्तेषु प्राणायामं समभ्यसेत् ॥ ७ ॥
तथा वहाँ कुटीर अच्छी प्रकार गोमय ( गोबर ) से लिप्त हो, इस प्रकार के गुप्त स्थानों में प्राणायाम अभ्यास करना चाहिये ॥ ७ ॥
कालनिर्णयः
हेमन्ते शिशिरे ग्रीष्मे वर्षायां च ऋतौ तथा ।
योगारम्भं न कुर्वीत कृते योगो हि रोगदः ॥ ८ ॥
( काल निषेध बताते हैं— ) हेमंत, शिशिर, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में योगारंभ नहीं करना चाहिये क्योंकि यह रोगदायक समय होता है ॥ ८ ॥
वसन्ते शरदि प्रोक्तं योगारम्भं समाचरेत् ।
तथायोगी भवेत् सिद्धो रोगान्मुक्तो भवेद् ध्रुवम् ॥ ९ ॥
( योग का समय कौन सा है? ) वसन्त और शरद ऋतु में योग का आरंभ करना चाहिये । इससे योगी सिद्ध होता है तथा निश्चय ही रोगमुक्त होता है ॥ ९ ॥
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पञ्चमोपदेशः ५७
चैत्रादिफाल्गुनान्ते च माघादिफाल्गुनान्तिके ।
द्वौ द्वौ मासौ ऋतुभागौ अनुभावश्चतुश्चतुः ॥ १० ॥
चैत्र से फाल्गुन के अन्त तक दो- दो महीनों में ऋतुएँ होती हैं ।
किन्तु एक- एक ऋतु का अनुभव चार- चार माहों में होता है ॥ १० ॥
वसन्तश्चैत्र वैशाखौ ज्येष्ठाषाढ़ौ च ग्रीष्मकौ ।
वर्षा श्रावण भाद्राभ्यां शरदाश्विनकार्तिकौ ।
मार्गपौषौ च हेमन्तः शिशिरो माघफाल्गुनौ ॥। ११ ॥
वसंत चैत्र और वैशाख में ग्रीष्म ऋतु ज्येष्ठ - आषाढ़ में, वर्षा ऋतु श्रावण भाद्रपद में, शरदऋतु आश्विन, कार्तिक में, मार्गशीर्ष और पौष में हेमन्तऋतु तथा माघ, फाल्गुन में शिशिर ऋतु में होती है ॥ ११ ॥
अनुभावं प्रवक्ष्यामि ऋतूनां च यथोदितम् ।
माघादिमाधवान्तेषु वसन्तानुभवश्चतुः ॥ १२ ॥
अब मैं ऋतुओं का यथाप्रकार अनुभव बताता हूँ । माघमास से वैशाख तक वसंत का अनुभव होता है ॥ १२ ॥
चैत्रादि चाषाढान्तं च निदाघानुभवश्चतुः ।
आषाढादि चाश्विनान्तं प्रावृषानुभवश्चतुः ॥ १३ ॥
( इसी प्रकार ) चैत्र से आषाढ़ तक ग्रीष्म का अनुभव होता है तथा आषाढ़ से आश्विन तक वषाऋतु का चार मास तक अनुभव होता है ॥ १३ ॥
भाद्रादिमार्गशीर्षान्तं शरदाऽनुभवश्चतुः ।
कार्तिकादिमाघमासान्तं हेमन्तानुभवश्चतुः ।
मार्गादिचतुरो मासान् शिशिरानुभवश्चतुः ॥ १४ ॥
भाद्रपद से मार्गशीर्ष तक शरदऋतु का अनुभव भी चार मास तक होता है, कार्तिक से माघ तक चार मास हेमंत का अनुभव, मार्गशीर्ष से फाल्गुन तक शिशिर का अनुभव विद्वानों ने कहा है ॥ १४ ॥
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५८ घेरण्डसंहिता
वसन्ते वापि शरदि योगारम्भं समाचरेत् ।
तदा योगो भवेत् सिद्धो विनायासेन कथ्यते ॥ १५ ॥
वसंत या शरद में योगारम्भ का आचरण करे । इसमें अनायास ही योग सिद्ध होता है, ऐसा कहा जाता है ॥ १५ ॥
मिताहारः
मिताहारं विना यस्तु योगारम्भं तु कारयेत् ।
नानारोगो भवेत्तस्य किञ्चिद्योगो न सिद्ध्यति ॥ १६ ॥
( आहार विषय बताते हैं— ) जो मिताहार के बिना ही योगारंभ का आचरण करता है, वह अनेक रोगों वाला होता है, और कोई भी योग सिद्ध नहीं होता ॥ १६ ॥
ग्राह्याहारः
शाल्यन्नं यवपिण्डं वा गोधूमपिण्डकं तथा ।
मुद्गं माषचणकादि शुभ्रं च तुषवर्जितम् ॥ १७ ॥
( योगारंभ के समय ) शाली चावल, जौ का अन्न, गेहूँ अन्न, मूँग, उड़द या चना, स्वच्छ और भूसी रहित भोजन करे ॥ १७ ॥
पटोलं पनसं मानं कक्कोलं च शुकाशकम् ।
द्राढ़िकां कर्कटीं रम्भां डुम्बरीं कण्टकण्टकम् ॥ १८ ॥
परवल, कटहल, कंकोल, करेला, अरबी, ककड़ी, केला, गूलर, चौलाई आदि ( का सेवन करे) ॥ १८ ॥
आमरम्भां बालरम्भां रम्भादण्डं च मूलकम् ।
वार्ताकी मूलकं ऋद्धिं योगी भक्षणमाचरेत् ॥ १ ९ ॥
आमरंभ, कच्ची गहर, केला का दण्ड और जड़, बैगन, मूली आदि औषधि योगी को खानी चाहिये ॥ १ ९ ॥
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: पञ्चमोपदेश ५ ९
बालशाकं कालशाकं तथा पटोलपत्रकम् ।
पञ्चशाकं प्रशंसीयाद्वास्तूकं हिलमोचिकाम् ॥ २० ॥
कच्चा शाक, मौसमानुसार शाक, परवल का शाक ( पत्ते ), बथुआ, हिलमोचिका ये पाँच तरह के शाक प्रशंसनीय है ॥ २० ॥
शुद्धं सुमधुरं स्निग्धं उदरार्द्धविवर्जितम् ।
भुज्यते सुरसं प्रीत्या मिताहारमिमं विदुः ॥ २१ ।
शुद्ध, मधुर, स्निग्धभोजन, आधे उदर ही प्रेमपूर्वक योगारंभ समय संयमित आहार ( मिताहार ) किया जाता है, ऐसा विद्वानों ने कहा है ॥ २१ ॥
अन्नेन पूरयेदर्थं तोयेन तु तृतीयकम् ।
उदरस्य तुरीयांशं संरक्षेद्वायुचारणे ॥ २२ ॥
अन्न मात्र आधा उदर ही खाये, तृतीय भाग अर्थात् उदर के एक चौथाई भाग में जल पीये, तथा चौथाई भाग वायु संचरण के लिये छोड़ देना चाहिये ॥ २२ ॥
अग्राह्याहारः
कट्वम्लं लवणं तिक्तं भृष्टं च दधि तक्रकम् ।
शाकोत्कटं तथा मद्यं तालं च पनसं तथा ॥ २३ ॥
कटु, खट्टा, नमक, तीखा, भुने हुए, दधि, मट्ठा, बुरे शाक, मदिरा, छुहारा, कटहल ( इनका योगारंभ के समय त्याग रखें) ॥ २३ ॥
कुलत्थं मसूरं पाण्डुं कूष्माण्डं शाकदण्डकम् ।
तुम्बीकोलकपित्थं च कण्टबिल्वं पलाशकम् ॥ २४ ॥
कुलथी, मसूर, पाण्डु का शाक, पेठा, शाक दण्ड, घीया, वैर, कैथ, कांटे वाली बेल व पलाश ( इन्हें योगारंभ में नही सेवन करे ) ॥ २४ ॥
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६० घेरण्डसंहिता कदम्बं जम्बीरं निम्बं लकुचं लशुनं विषम् ।
कामरङ्गं प्रियालं च हिङ्गुशाल्मलीकेमुकम् ।
योगारम्भे वर्जयेत्पथ्यं स्त्रीवह्निसेवनम् ॥ २५ ॥
कदम्ब, जम्बीर, निम्ब, लकुच, लहसुन, विष, कमरख, प्रियाल ( व्याज ), हींग, शाल्मलि, गोभी, स्त्री, अग्नि इस सब पथ्य का सेवन योगारम्भ के समय वर्जित रखे ॥ २५ ॥
नवनीतं घृतं क्षीरं गुड शक्रादि चैक्षवम् ।
पञ्चरम्भां नारिकेलं दाडिमंमसिवासरम् ।
द्राक्षां तु नवनीं धात्रीं रसमम्लंविवर्जितम् ॥ २६ ॥
मक्खन, घी, शक्कर, गुड़, गन्ना, पाँच प्रकारीय केले, नारिकेल, अनार, सोंफ, मुनक्का, नवनी ( नोंनिया ), आँवला, और अम्लरस ये सब वर्जित हैं ॥ २६ ॥
एलाजातिलवङ्गं च पौरुषं जम्बु जाम्बुलम् ।
हरीतकीं च खर्जूरं योगी भक्षणमाचरेत् ॥ २७ ॥
योगी की सेवनीय वस्तुयें— इलायची, चमेली, लोंग, बलकारकदवा, जामुन, जाम्बुल, हरड़, खजूर ये वस्तु योगी को भक्षण करनी चाहिये ॥ २७ ॥
लघुपाकं प्रियं स्निग्धं तथा धातुप्रपोषणम् ।
मनोऽभिलषितं योग्यं योगी भोजनमाचरेत् ॥ २८ ॥
शीघ्र पकने वाली प्रिय, स्निग्ध, धातुओं की पोषक वस्तु योगी भोजन में ले ॥ २८ ॥
काठिन्यं दुरितं पूतिमुष्णं पर्युषितं तथा ।
अतिशीतं चातिचोष्णं भक्ष्यं योगी विवर्जयेत् ॥ २ ९ ॥
काठिन्यपूर्ण, बुरी, पापकारिणी, बासी, अतिठण्डा, अतिगर्म भोजन योगी वर्जन करे – न करें ॥ २ ९ ॥