श्रीगणेशाय नमः।

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 71–80

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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पञ्चमोपदेशः ६१

प्रातः स्नानोपवासादि कायक्लेशविधिं तथा ।

एकाहारं निराहारं यामान्ते च न कारयेत् ॥ ३० ॥

प्रात: समय स्नान, उपवासादि कायाक्लेश, विधि रहित कार्य और एक समय आहार, निराहार रहना और एक प्रहर बाद खाना, ये सब नहीं करने चाहिये ॥ ३० ॥

एवं विधिविधानेन प्राणायामं समाचरेत् ।

आरम्भे प्रथमं कुर्यात् क्षीराज्यं नित्यभोजनम् ।

मध्याह्ने चैव सायाह्ने भोजनद्वयमाचरेत् ॥ ३१ ॥

इस प्रकार विधि विधान से प्राणायाम करना चाहिये 1। पहले आरम्भ में दूध, घी और नित्य भोजन करना चाहिये । मध्याह्न और सायंकाल दो बार योगी को भोजन करना चाहिये ॥ ३१ ॥

नाडीशुद्धिः कुशासने मृगाजिने व्याघ्राजिने च कम्बले ।

स्थलासने समासीनः प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः ।

नाड़ीशुद्धिं समासाद्य प्राणायामं समभ्यसेत् ॥ ३२ ॥

( अब नाड़ी शुद्धि की विधि कहते हैं - ) कुशासन पर, मृगचर्म पर, व्याघ्रचर्म पर और कम्बल पर स्थल आसन पर समासीन होकर पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर नाड़ी शुद्धि करके प्राणायाम करे ॥ ३२ ॥

चण्डकापालिरुवाच

नाडीशुद्धिं कथं कुर्यान्नाड़ीशुद्धिस्तु कीदृशी ।

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तद्वदस्व दयानिधे ॥ ३३ ॥

( तब चण्डकापालि ने पूछा— ) हे दयानिधे! नाड़ीशुद्धि कैसे करनी चाहिये, नाड़ी शुद्धि कैसी होती है? उस सबको मैं सुनना चाहता हूँ, अतः इसे बताइये ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 72

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६२ घेरण्डसंहिता घेरण्ड उवाच मलाकुलासु नाड़ीषु मारुतो नैव गच्छति ।

प्राणायामः कथं सिध्येत्तत्त्वज्ञानं कथं भवेत् ।

तस्मादादौ नाड़ीशुद्धिं प्राणायामं ततोऽभ्यसेत् ॥ ३४ ॥

( उत्तर में कहते हैं— ) रक्तचर्मवसादि मल से युक्त नाड़ियों में पवन नहीं जा पाता है, तब प्राणायाम की सिद्धि कैसे होती है? और तत्वज्ञान कैसे होता है.? जिससे नाड़ी शुद्धि को पहले और प्राणायाम बाद में करे ॥ ३४ ॥

( विशेष — मलाकुलासु में कहीं - कहीं माला शब्द भी मिलता है । जिसका अर्थ ‘ माला की भाँति गुँथी हुई नाडियों में' होता है । )

नाड़ीशुद्धिर्द्विधा प्रोक्ता समनुर्निर्मनुस्तथा ।

बीजेन समनुं कुर्यान्निर्मनुं धौतकर्मणा ॥ ३५ ॥

नाड़ी सिद्धि भी दो प्रकार की समनु और निर्मनु कही गयी हैं— समनु को बीज मंत्र से और निर्मनु को धौतिकर्म से करना चाहिये ॥ ३५ ॥

धौतकर्म पुरा प्रोक्तं षट्कर्मसाधने यथा ।

शृणुष्व समनुं चण्ड! नाडीशुद्धिर्यथा भवेत् ॥ ३६ ॥

षट्कर्म साधन में धौतिकर्म पहले कह दिया है । अब समनु नाड़ी शुद्धि जैसे होती है, वह सुनो ॥ ३६ ॥

उपविश्यासने योगी पद्मासनं समाचरेत् ।

गुर्वादिन्यासनं कुर्याद् यथैव गुरुभाषितम् ।

नाड़ीशुद्धिं प्रकुर्वीत प्राणायामविशुद्धये ॥ ३७ ॥

योगी आसन पर बैठकर पद्मासन लगाये । गुरु आदि न्यास करके जैसा गुरु ने सिखाया है, उस प्रकार प्राणायाम सिद्धि हेतु, नाड़ी शुद्धि करे ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 73

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पञ्चमोपदेशः ६३

वायुबीजं ततो ध्यात्वा धूम्रवर्णं सतेजसम् ।

चन्द्रेण पूरयेद्वायुं बीजैः षोडशकैः सुधीः ॥ ३८ ॥

उस वायुबीज का ध्यान करके जो धूम और तेज युक्त है, सोलह बीज को जपते हुए चन्द्र मार्ग ( वामनासापुट ) से वायु को खींचना चाहिये ॥ ३८ ॥

चतुःषष्ट्या मात्रया च कुम्भकेनैव धारयेत् ।

द्वात्रिंशन्मात्रया वायुं सूर्यनाड्या च रेचयेत् ॥ ३ ९ ॥

तथा ६४ बार कुम्भक के समय (प्राणायाम को ) धारण करे । पुनः ३२ बार उच्चारण करते हुए सूर्यनाड़ी ( दायें नासा पुट ) से वायु का रेचन करे ॥ ३ ९ ॥

नाभिमूलाद्वह्निमुत्थाप्य ध्यायेत्तेजोऽवनीयुतम् ।

वह्निबीजषोडशेन सूर्यनाड्या च पूरयेत् ॥ ४० ॥

नाभिमूल से अग्नि को उठाकर भूमि तत्व सहित उस तेज का ध्यान करे । सोलह बार अग्निबीज 'र' जपते हुए सूर्य नाड़ी से पवन को पूर्ण करे ॥ ४० ॥

चतुःषष्ट्या च मात्रया कुम्भकेनैव धारयेत् ।

द्वात्रिंशन्मात्रया वायुं शशिनाड्या च रेचयेत् ॥ ४१ ॥

चौंसठ बार जपते हुए कुंभक से धारण करे, और बत्तीस बार से चन्द्रनाड़ी से उसका रेचन करे ॥ ४१ ॥

नासाग्रे शशिधृग्बिम्बं ध्यात्वा ज्योत्स्नासमन्वितम् ।

ठं बीजंषोडशेनैव इडया पूरयेन्मरुत् ॥ ४२ ॥

फिर नासिका के अग्रभाग में चन्द्रिका से युक्तचन्द्र का ध्यान करके ‘ठं’ बीज को सोलह बार जपते हुए इड़ा से वायु पूरक करे ॥ ४२ ॥

चतुःषष्ट्या मात्रया च वं बीजेनैव धारयेत् ।

अमृतं प्लावितं ध्यात्वा नाड़ीधौतं विभावयेत् ।

लकारेण द्वात्रिंशेन दृढं भाव्यं विरेचयेत् ॥। ४३ ॥

पृष्ठ 74

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६४ घेरण्डसंहिता चौंसठ बार ‘ वं’ बीज को जपते हुए धारण करे । (नासिका के अग्रभाग में मानो) अमृत नित्य गिरता है, उसका ध्यान करके नाड़ी धौति की भावना करनी चाहिये । तथा बत्तीस बार लकार बीज ( ल) की भावना करते (जपते ) रेचन करे ॥ ४३ ॥

एवं विधां नाड़ीशुद्धिं कृत्वा नाड़ी विशोधयेत् ।

दृढ़ो भूत्वासनं कृत्वा प्राणायामं समाचरेत् ॥ ४४ ॥

इस प्रकार नाड़ी शुद्धि करके नाड़ी का शोधन करना चाहिये । तथा दृढ़ता से आसन लगाकर प्राणायाम करना चाहिये ॥ ४४ ॥

कुम्भकस्यभेदाः

सहितः सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा ।

भस्त्रिका भ्रामरी मूर्छा केवली चाष्टकुम्भिकाः ॥ ४५ ॥

(प्राणायाम के प्रकार बताते हैं - ) सहित, सूर्यभेद, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा, केवली ये आठ प्रकारीय कुंभक प्राणायाम होते हैं ॥ ४५ ॥

सहितकुम्भकः

सहितो द्विविधः प्रोक्तः सगर्भश्चनिगर्भकः ।

सगर्भो बीजमुच्चार्य निगर्भो बीजवर्जितः ॥ ४६ ॥

सहित कुंभक दो प्रकार का कहा गया है– सगर्भ और निर्गर्भ । सगर्भ को बीजमंत्र का उच्चारण करते हुए और निगर्भ को बीज का उच्चारण न करते हुए प्राणायाम करे ॥ ४६ ॥

सगर्भः प्राणायामं सगर्भं च प्रथमं कथयामि ते ।

सुखासने चोपविश्य प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः ।

ध्यायेद्विधिं रजोगुणं रक्तवर्णमवर्णकम् ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 75

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: पञ्चमोपदेश ६५ सगर्भ प्राणायाम मैं प्रथम कहता हूँ । सुखासन में बैठकर प्राङ्मुख या उत्तर मुख होकर रजोगुण रूप रक्तवर्ण और अ वर्ण स्वर का ध्यान करे ॥ ४७ ॥

इडया पूरयेद्वायुं मात्रया षोडशैः सुधीः ।

पूरकान्ते कुम्भकाद्ये कर्तव्यस्तूड्डीयानकः ॥ ४८ ॥

सोलहबार जपते हुए वामनासा से वायु पूरित करे, और पूरक के अंत में कुंभक के पहले ( अर्थात् वायु खींचने के बाद ) उड्डीयान करना चाहिये ॥ ४८ ॥

सत्त्वमयं हरिंध्यात्वा उकारं कृष्णवर्णकम् ।

चतुःषष्ट्या च मात्रया कुम्भकेनैव धारयेत् ॥ ४ ९ ॥

पुन: उकार स्वरूप कृष्णवर्ण सत्वगुणरूप विष्णु का ध्यान करके चौंसठ बार जप से कुंभक से धारण करे ॥ ४ ९ ॥

तमोमयं शिवं ध्यात्वा मकारं शुक्लवर्णकम् ।

द्वात्रिंशन्मात्रया चैव रेचयेद्विधिनाः पुनः ॥ ५० ॥

पुन: मकार स्वरूप शुक्लवर्ण रूप तमोमय शिव का ध्यान करके बत्तीस बार जप विधि से रेचन करना चाहिये ॥ ५० ॥

पुनः पिङ्गलयापूर्य कुम्भकेनैव धारयेत् ।

इडया रेचयेत् पश्चात् तद्बीजेन क्रमेण तु ॥ ५१ ॥

फिर दायें छिद्र से पूरक करके कुंभक से धारण करे, पुनः उसी बीज से वामछिद्र से रेचन करे ॥ ५१ ॥

अनुलोमविलोमेन वारं वारं च साधयेत् ।

पूरकान्ते कुम्भकांते धृतनासापुटद्वयम् ।

कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठैः तर्जनीमध्यमे विना ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 76

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६६ घेरण्डसंहिता अनुलोम विलोम से बार- बार इसे साधना चाहिये । पूरकान्त और कुम्भकान्त में दोनों नासापुटों को कनिष्ठिकाअनामिका और अंगुष्ठ इन्हीं तीनों से तथा तर्जनी और मध्यमा के बिना ही ( प्राणायाम करे ) ॥ ५३ ॥

निगर्भः प्राणायामो निगर्भस्तु विना बीजेन जायते । एकादिशतपर्यन्तं पूरककुम्भकरेचनम् ॥ ५३ ॥ निगर्भ प्राणायाम बिना बीज के ही हो जाता है । इस प्रकार पूरक,

कुंभक और रेचक कुल एक से लेकर सौ तक मात्रायें होती हैं ॥ ५३ ॥

उत्तमा विंशतिर्मात्रा षोडशी मात्रा मध्यमा ।

अधमा द्वादशी मात्रा प्राणायामास्त्रिधा स्मृताः ॥ ५४ ॥

उत्तम प्राणायाम बीस मात्रा वाला, मध्यम सोलह मात्रा वाला तथा अधम बारह मात्रा वाला इस प्रकार तीन प्राणायाम हैं ॥ ५४ ॥

अधमाज्जायते घर्मो मेरुकंपं च मध्यमात् ।

उत्तमाच्च भूमित्यागस्त्रिविधंसिद्धिलक्षणम् ॥ ५५ ॥

अधम प्राणायाम से धर्म ( गर्मी) होती है, मध्यम से मेरुदण्ड में कंपन और उत्तम से भूमि त्याग ( भूमि से ऊपर उठना संभव ) होता है । इस प्रकार ( प्राणायाम का ) सिद्धि लक्षण है ॥ ५५ ॥

प्राणायामात् खेचरत्त्वं प्राणायामाद् रोगनाशनम् ।

प्राणायामाद्बोधयेच्छक्तिं प्राणायामान्मनोन्मनी ।

आनन्दो जायते चित्ते प्राणायामी सुखी भवेत् ॥ ५६ ॥

प्राणायाम से खेचरत्व प्राप्त होता है, प्राणायाम से रोगनाश होता है, प्राणायाम से बोधशक्ति प्राप्त होती है, प्राणायाम से ज्ञान प्राप्ति और चित्त में आनंद होता है । प्राणायाम करने वाला मनुष्य अवश्य सुखी होता है ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 77

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पञ्चमोपदेशः ६७ सूर्यभेदकुम्भक: घेरण्ड उवाच

कथितं सहितं कुम्भं सूर्यभेदनकं शृणु ।

पूरयेत् सूर्यनाड्या च यथाशक्ति बहिर्मरुत् ॥ ५७ ॥

( सूर्यभेदक कुंभक विधि कहते हैं - ) सहित कुंभक ( ऊपर ) बताया गया है । अब सूर्य भेदक प्राणायाम को सुनो- प्रथम दायें छिद्र से पूरक को

यथा शक्तिधारयेद्बहुयत्नेनकरे ॥ ५७ ॥ कुम्भकेन जलन्धरैः ।

यावत् स्वेदं नखकेशाभ्यां तावत्कुर्वतु कुम्भकम् ॥ ५८ ॥

पुनः यत्नपूर्वक जालंधर मुद्रा से कुंभक धारण करे । जब तक कि नखकेशों से पसीना न आये, तब तक कुंभक को करे ॥ ५८ ॥

प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ तथैव च ।

नागः कूर्मश्च कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः ॥ ५ ९ ॥

प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान ये पंचप्राण हैं । नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय ये पाँच पवन होते हैं ॥ ५ ९ ॥

हृदि प्राणो वहेन्नित्यमपानो गुदमण्डले ।

समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यगः ॥ ६० ॥

हृदय में नित्य प्राण गमन करता है, गुदा में अपान, नाभि में समान, कंठमध्य में उदानवायु ( गमन करता है) ॥ ६० ॥

व्यानो व्याप्य शरीरे तु प्रधानाः पञ्च वायवः ।

प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥ ६१ ॥

व्यानवायु पूर्ण शरीर में व्यापता है । ये पंच प्राणादिवायु प्रमुख हैं और नागादि पाँच वायु गौण हैं ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 78

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६८ घेरण्डसंहिता

तेषामपि च पञ्चानां स्थानानि च वदाम्यहम् ।

उद्गारे नाग आख्यात: कूर्मस्तून्मीलने स्मृतः ॥ ६२ ॥

कृकलः क्षुत्कृते ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ।

न जहाति मृते क्वापि सर्वव्यापी धनञ्जयः ॥ ६३ ॥

(नागादि वायुओं के स्थान बताते हैं- ) उनमें पाँच वायुओं के स्थान मैं बताता हूँ । डकार में नाग वायु कही है, आँख उन्मीलन में कूर्म कही है, कृकल छींकने में, जंभाई में देवदत्त पवन और सर्वव्यापक धनंजय पवन मरने पर भी नहीं छोड़ती है ॥ ६२-६३ ॥ नागो गृह्णाति चैतन्यं कूर्मश्चैव निमेषणम् ।

क्षुत्तृषं कृकलश्चैव जृम्भणं चतुर्थेन तु ।

भवेद्धनञ्जयाच्छब्दं क्षणमात्रं न निःसरेत् ॥ ६४ ॥

नाग चैतन्य को ग्रहण करती है, कूर्म निमेष को, क्षुधा और प्यास को कृकल, तथा जृम्भण को देवदत्त पवन ग्रहण करती है, धनंजय पवन एक क्षण को भी शरीर से बाहर नहीं होती है ॥ ६४ ॥

सर्वे ते सूर्यसम्भिन्ना नाभिमूलात् समुद्धरेत् ।

ईडया रेचयेत् पश्चाद् धैर्येणाखण्डवेगतः ॥ ६५ ॥

वे सारे सूर्यभेदक प्राणायाम नाभि से उठाकर धैर्य से वेगपूर्वक वामनासापुट से रेचन करे ॥ ६५ ॥

पुनः सूर्येण चाकृष्य कुम्भयित्वा यथाविधि ।

रेचयित्वा साधयेत्तु क्रमेण च पुनः पुनः ॥ ६६ ॥

पुन: दायें नासापुट से श्वास खींचकर यथाविधि कुंभक करके क्रम से रेचन करके बार - बार साधन करे ॥ ६६ ॥

कुम्भकः सूर्यभेदस्तु जरामृत्युविनाशकः ।

पृष्ठ 79

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पञ्चमोपदेशः ६ ९

बोधयेत् कुण्डलीं शक्तिं देहानलं विवर्धयेत् ।

इति ते कथितं चण्ड सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥। ६७ ॥

( सूर्यभेदक कुंभक फल कहते हैं - ) सूर्यभेदक कुंभक जरामृत्यु का विनाशक है, यह कुंडलिनी शक्ति और जठराग्नि को बढ़ाने वाला है । इस प्रकार यह उत्तम सूर्यभेदक प्राणायाम कहा गया है ॥ ६७ ॥

उज्जायीकुम्भकः

नासाभ्यां वायुमाकृष्य मुखमध्ये च धारयेत् ।

हृद्गलाभ्यां समाकृष्य वायुं वक्त्रे च धारयेत् ॥ ६८ ॥

( उज्जायी कुंभक विधि बताते हैं - ) नासापुटों से वायु खींचकर वायु को मुख से धारण करे । हृदय और गले के पवन को खींचकर मुख के मध्य में धारण करे ॥ ६८ ॥

मुखं प्रक्षाल्य सवन्द्य कुर्याज्जालन्धरं ततः ।

आशक्ति कुम्भकं कृत्वा धारयेदविरोधत: ॥ ६ ९ ॥

पुनः मुख धोकर वन्दन करके जालंधर को करे । फिर कुंभक को यथाशक्ति धारण करें, पुनः रेचन करे ॥ ६ ९ ॥

उज्जायीकुम्भकं कृत्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ।

न भवेत् कफरोगश्च क्रूरवायुरजीर्णकम् ॥ ७० ॥

उज्जायी कुंभक को करके सब कार्यों को साधना चाहिये इससे कफरोग, वायु और अजीर्ण नहीं होता ॥ ७० ॥

आमवातः क्षयः कासो ज्वरप्लीहा न विद्यते । ॥ ७१ ॥ जरामृत्युविनाशाय चोज्जायीं साधयेन्नरः

आमवात, क्षय, कास, ज्वर, प्लीहा भी ( उज्जायी कुंभक को साधने से ) नहीं होता । मनुष्य जरामृत्युविनाशक उज्जायी प्राणायाम को साधे ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 80

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७० घेरण्डसंहिता

जिह्वया वायुमाकृष्यशीतलीकुम्भकःउदरे पूरयेच्छनैः ।

क्षणं च कुम्भकं कृत्वा नासाभ्यां रेचयेत् पुनः ॥ ७२ ॥

( उज्जायी कुंभक की विधि बताते हैं — ) जिह्वा से धीरे - धीरे वायु को खींचकर उदर में भरे । पुनः क्षणभर कुंभक करके नासाछिद्रों से रेचन .करे ॥ ७२ ॥

सर्वदा साधयेद्योगी शीतलीकुम्भकं शुभम् ।

अजीर्णं कफपित्तञ्च नैव तस्य प्रजायते ॥ ७३ ॥

यह शीतली कुंभक योगी को शुभदायक है, अतः इसे साधना चाहिये । क्योंकि अजीर्ण, कफ और पित्त उसे नहीं होता है ॥ ७३ ॥

भस्त्रिकाकुम्भकः

भस्त्रैव लोहकाराणां यथाक्रमेण सम्भ्रमेत् ।

तथा वायुं च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनैः ॥ ७४ ॥

जिस प्रकार लुहारों की धौंकनी क्रम से वायु को खींचती है, वैसे ही धीरे - धीरे वायु को नासाछिद्रों से भरना चाहिये ॥ ७४ ॥

एवं विंशतिवारं च कृत्वा कुर्याच्च कुम्भकम् ।

तदन्ते चालयेद्वायुं पूर्वोक्तं च यथाविधि ॥ ७५ ॥

इस प्रकार बीस बार करके कुंभक करना चाहिये । तब अंत में पूर्वोक्त विधि से वायु को चलाये ( निकालना ) चाहिये ॥ ७५ ॥

त्रिवारं साधयेदेनं भस्त्रिकाकुम्भकं सुधीः ।

न च रोगो न क्लेशश्च आरोग्यं च दिने दिने ॥ ७६ ॥

इस भस्त्रिका कुंभक को बुद्धिमान तीन बार साधे । इससे न रोग और न क्लेश होता है तथा दिन- दिन आरोग्य प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥