श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 1–10
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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II 10 श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य हिन्दी अनुवादसहित गीताप्रेस गोरखपुर गीताप्रेस, गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR [ SINCE 1923 ] ]
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113011 श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य हिन्दी - अनुवाद - सहित मूल श्लोक, भाष्य, भाष्यार्थ, टिप्पणी तथा श्लोकोंके पदोंकी अकारादिक्रम सूचीसहित त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ अनुवादक-श्रीहरिकृष्णदास गोयन्दका
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ॐ श्रीपरमात्मने नमः भूमिका श्रीमद्भगवद्गीता संसारके अनेकानेक धर्मग्रन्थोंमें एक विशेष स्थान रखती है । श्रीकृष्णभगवान् स्वयं इसके वक्ता हैं और उनका कहना है ' गीता मे हृदयं पार्थ ' अतएव गीता सनातन धर्मावलम्बियों के हृदयकी राजेश्वरी हो, इसमें कोई आश्चर्य नहीं । साथ ही अन्य धर्मावलम्बियों एवं देश - देशान्तरवासियोंद्वारा भी यह अति प्रशंसित है । इसका दिव्य सन्देश किसी जाति वा देशविशेषके ही लिये उपादेय नहीं, इसका अमूल्य उपदेश सार्वभौम है । अपनी - अपनी भावनाके अनुसार असंख्य मनुष्योंने गीताके उपदेशोंका अनुसरण कर संसारयात्राको सुखपूर्वक पूरा किया है, उसके दृढ़ आलम्बनसे वे केवल भवसागर ही पार नहीं उतरे, अपने और मनोरथोंकी भी सिद्धि कर सके हैं । गीता सर्वशास्त्रमयी है । समस्त शास्त्रोंका मथन कर अमृतमयी गीताका आविर्भाव हुआ है । सर्वसिद्धान्तोंका जैसा सुन्दर और युक्तियुक्त समन्वय गीतामें मिलता है वैसा अन्य किसी ग्रन्थमें कदाचित् ही उपलब्ध हो । मतमतान्तरोंके वादविवाद, परम निःश्रेयसकी प्राप्तिके नाना मार्गोंकी बदाबदीका कोलाहल गीताके गम्भीर उपदेशमें शान्त होकर परस्पर सहायक हो जाता है । गीतामें नाना सिद्धान्तोंका एकीकरण ऐसी सुन्दरतासे किया गया है कि तत्त्व- जिज्ञासुको समस्त पथ एक ही राजमार्गकी ओर प्रवृत्त करते हैं । अधिकार और भावनाके अनुरूप ही साधनका आदेश मिल जाता है । एक और भी विशेषता इस ग्रन्थरत्नमें देखनेको मिलती है | मनुष्यके लिये उच्चतम आदर्शका निश्चय किया गया है और साथ ही उसको प्राप्त करनेके लिये सुलभ-से - सुलभ साधन भी बताये गये हैं । यही कारण है कि इस सात सौ श्लोककी छोटी - सी गीताको कामधेनु और कल्पवृक्षकी उपमा दी जाती है । महात्माओंने इसपर भाष्य रचकर आचार्यकी पदवी पायी । अनेक टीकाकारोंने अपनी बुद्धिको इस कसौटीपर कस पण्डित और ज्ञानीकी दुर्लभ ख्याति पायी और ज्ञानचक्षु प्रदानकर इसके तत्त्वानुसन्धानमें साधारण गतिके लोगोंको इसका मर्म हृदयङ्गम करनेमें सहायता प्रदान की । विद्याका परमलाभ गीताके रहस्यको समझना ही माना गया है । आचार्योंने अपने - अपने सिद्धान्तोंकी प्रामाणिकता स्थापन करनेमें गीताको एक मुख्य आधार माना है । गीतापर भाष्य रच अपने सिद्धान्तोंको गीता - सम्मत बताना ही उनका लक्ष्य रहा है । गीता - विरोधी किसी धर्म वा सम्प्रदायका प्रचार वे असम्भव समझते और जिस धर्म, आचार वा सिद्धान्तको ब्रह्मरूपा गीतासे सिद्ध कर दिया, वह अवश्य ही सर्वशास्त्र और वेद - सम्मत मान लिया जाता है । सम्प्रदाय, जाति और देशकी भिन्नताका निराकरण करनेवाला गीता एक सार्वभौम सिद्धान्तप्रतिपादक ग्रन्थ - रत्न है । उसके उपदेश और निर्दिष्ट साधनोंने मानव - जातिके लिये एक महान् धर्मकी नींव डाली है, उसके प्रचारसे प्राणिमात्रका कल्याण सम्भव है । हृदय - दौर्बल्यपर विजयी होकर गीतोक्त उपदेशसे मनुष्य कर्मरत हो सकता है । वह भक्तिरसामृतका आस्वादन करता हुआ ज्ञानी बन सकता है । ऐहिक और पारमार्थिक दोनों ही सुखोंकी प्राप्ति उसे अल्प प्रयाससे ही उपलब्ध होनेमें कोई सन्देह नहीं रहता । आधुनिक कालमें जो अनेकानेक जटिल प्रश्न नित्यप्रति समाज और व्यक्तिके समक्ष उपस्थित होते रहते हैं और बुद्धिको चकरा
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[ ४ ] देते हैं, उनके सुलझानेके लिये भी गीतामें पर्याप्त सामग्री विद्यमान है । परंतु खेद तो यह है कि ऐसे अवसरोंपर गीतासे पूर्ण सहायता नहीं ली जाती । इस त्रुटिकी पूर्ति के लिये गीता - प्रचार ही एकमात्र उपाय है । गीताके अध्ययन, श्रवण आदिसे जो लाभ होता है उसको भगवान्ने स्वयं अर्जुनके प्रति अपने उपदेशकी समाप्तिमें कहा है; फिर गीता - प्रचारसे अधिक भगवत्प्रीत्यर्थ और कौन कार्य मनुष्यसे बन सकता है । भगवदाज्ञाको यथाशक्ति पालन करने और उन्हींके कल्याणकारी उपदेशोंके प्रचारकी प्रेरणासे गीताका यह संस्करण प्रकाशित हुआ है । शांकरभाष्यका छपा हुआ मूल तो सुलभप्राप्त है परंतु मूलके साथ ही सरल हिन्दी - अनुवाद नहीं मिलता । नवलकिशोरप्रेस, लखनऊसे प्रकाशित ' नवलभाष्य ' में कई संस्कृतभाष्य और टीकाएँ प्रकाशित हुई थीं, परंतु वह हिन्दी - अनुवाद स्वतन्त्र था तिसपर भी वह ग्रन्थ अप्राप्य है और मूल्य अत्यधिक होनेसे सुलभ नहीं, दूसरा ग्रन्थ जिसमें अद्वैतसिद्धान्तकी टीकाएँ शांकरभाष्यके साथ छपी थीं वह कान्यकुब्ज श्रीजगन्नाथ शुक्लद्वारा सम्पादित होकर कलकत्तेसे प्रकाशित हुआ था । संवत् १ ९ २७ का द्वितीय संस्करण हमारे देखनेमें आया है । इसमें भी हिन्दी - अनुवाद स्वतन्त्र है । शांकरभाष्यका अनुवाद नहीं है । और वह पुस्तक भी दुष्प्राप्य है । गीताका एक संस्करण उपादेय था । उसका प्रकाशन श्रीज्वालाप्रसाद भार्गवने आगरेसे किया था । इस पुस्तकका केवल उत्तरभाग हमारे पास है | । लीथोकी छपी पुस्तक है, संवत् दिया नहीं है । इसमें शांकर और रामानुजभाष्यके साथ तीन टीकाएँ भी दी हैं और भाषा - अनुवाद शंकरके आधारपर है । श्रीभार्गवजी बड़े विद्वान् थे । समग्र महाभारतको मूल और अनुवादसहित उन्होंने प्रकाशित किया था और वेदोंको भी अर्थसहित छापा था । उनके प्रति कृतज्ञता प्रकाश करना हमारा धर्म है । खेद यही है कि उनके ग्रन्थ कहीं खोजनेपर भी अब नहीं मिलते । इन बातोंके उल्लेखसे केवल यही तात्पर्य है कि प्रस्तुत ग्रन्थकी उपादेयता हमको स्वीकार करना अभीष्ट है । मूल और हिन्दी - अनुवाद शांकरभाष्यका इससे पहले कहीं प्रकाशित हुआ है, ऐसा नहीं जान पड़ता । हिन्दी - भाषा - भाषियोंका परम सौभाग्य है जो अल्प मूल्यमें ही वे इस उच्च कोटिके ग्रन्थको, जिसपर इतनी टीकाएँ हो चुकी हैं, अब सहजमें प्राप्त कर सकते हैं । हमारे धर्मग्रन्थोंमें गीताका क्या स्थान है और अन्य ग्रन्थोंसे उसका क्या सम्बन्ध है, विज्ञ सुधीजन भली प्रकार जानते हैं, उसका संक्षिप्त वर्णन ही पर्याप्त होगा । अखिल धर्मोंका मूल हिन्दूलोग वेदको मानते हैं । वेद स्वत: प्रमाण और ईश्वरकी वाणी है । वेदकी आज्ञाके अनुसार धर्म और अधर्म - कार्यका अन्तिम निर्णय होता है । ईश्वरीय ज्ञान भी हमको वेदसे ही प्राप्त होता है । अन्य धर्मग्रन्थ वेदोक्त और वेद - प्रतिपादित धर्मको सुलभ रीतिसे समझानेके लिये निर्मित हुए हैं । वेद ही उनका आधार है । परंतु वेदके दो भाग हैं –मन्त्र और ब्राह्मण । ब्राह्मण – भागके अन्तर्गत यज्ञादि कर्मकाण्ड हैं और दूसरा आरण्यक वा ज्ञानकाण्ड है । इसी ज्ञानकाण्डमें उपनिषदोंकी गणना है । प्राचीन शास्त्र और विद्याओंमें प्रायः एक उपनिषद् - भाग हुआ करता था जो तद्विषयक रहस्यमय ज्ञानकी शिक्षा देता था । उच्च कोटिके अधिकारी उसको गुरुमुखसे श्रवण कर प्राप्त कर सकते थे । साधारण जिज्ञासुओंको उस रहस्यमय तात्त्विक ज्ञानका अधिकारी नहीं समझा जाता था और उसकी प्राप्तिके लिये गुरुका उपदेश परमावश्यक माना जाता था । वेदान्त - शास्त्रमें उपनिषद्का इसी प्रकार मुख्य स्थान है । वेदोंका अन्तिम उपदेश ही वेदान्त है । कर्मकाण्डीको उपनिषद् के रहस्यमय आध्यात्मिक ज्ञानका अधिकारी बननेपर ही उपदेशसे लाभ हो सकता
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[ ५ ] था । इतना ध्यान रखनेकी बात है कि गुह्यविद्या या उपदेश अनधिकारीको न देनेसे उसीका कल्याण था । स्वार्थवश गुप्त रखना सिद्धान्तानुकूल नहीं था । वेदान्तके तीन प्रस्थान हैं । श्रौत - प्रस्थान उपनिषद् हैं जो वेदके ही अंग हैं, दूसरा स्मार्त - प्रस्थान है जो गीता है और तीसरा प्रस्थान दार्शनिक है जो वेदव्यास - प्रणीत ब्रह्मसूत्र है । इन प्रस्थानत्रयके आधारपर समस्त वेदान्त - साहित्यकी रचना हुई है । इन्हींपर भाष्य लिखकर महात्माओं और धर्मप्रवर्तकोंने आचार्य - पदवी प्राप्त की है । देशकी यही प्रणाली थी कि प्रस्थानत्रयपर भाष्य रचकर अपने सिद्धान्तों की पुष्टि एवं प्रचार किया जाता था । इनका समन्वय भाष्योंद्वारा किये बिना किसी सिद्धान्तको वेद या धर्ममूलक कहनेका कोई साहस नहीं कर सकता था । मतलब यह कि सिद्धान्तप्रतिपादक स्वतन्त्र ग्रन्थरचनाकी अपेक्षा प्रस्थानत्रयीपर भाष्य लिखनेको अधिक महत्त्व दिया गया था और भाष्योंके समन्वयसे मतकी पुष्टि की जाती थी । गीताके अध्यायोंकी समाप्तिमें ' उपनिषत्सु ' शब्द आता है । भगवान्के श्रीमुखसे यह उपदेश हुआ है तो वेद और उपनिषद्का दर्जा उसे दिया गया तो कोई आश्चर्य नहीं, परंतु वेद अपौरुषेय हैं और उपनिषद् श्रौत हैं । अतएव गीता स्मार्त - प्रस्थानके ही अन्तर्गत है । गीतापर अनेक भाष्य और टीकाएँ बनी हैं । और अब भी उसके विवेचनमें जो साहित्य बनता जाता है, वह भी उपेक्षणीय नहीं है । परन्तु गीताका अध्ययन स्वतन्त्ररूपसे बहुत कम हुआ है । सिद्धान्तप्रतिपादन और साम्प्रदायिक दृष्टिसे ही उसपर अधिक विचार हुआ है । उसका परिणाम यह हुआ है कि गीताका वास्तविक अर्थ कठिनतासे समझमें आता है । प्रतिभाशाली आचार्यों और टीकाकारोंके मतविभिन्नतासे साधारण बुद्धिके लोग घबड़ा जाते हैं । महाकवि और उसके उत्कृष्ट काव्यमें ऐसी शक्ति होती है कि समाजकी प्रगतिके साथ उसमें नये अर्थ निकाले जाते हैं और उसके द्वारा नवीन भावनाओंकी पूर्ति होती रहती है । फिर गीता - जैसे अतुलनीय ग्रन्थमें समय - समयपर आवश्यकतानुसार अनेक आशय और अर्थ निकाले गये तो कोई नयी बात नहीं है । इससे ग्रन्थकी महिमाका परिचय मिलता है । परन्तु उसके मूल सिद्धान्तोंको यथावत् निश्चयपूर्वक खोज निकालना अवश्य ही अति कठिन हो जाता है । जिस ग्रन्थने अपूर्व समन्वय किया है, वही मत - विभिन्नताके कारण परस्परविरोधी सिद्धान्तोंका समर्थक बना लिया गया है । मनुष्यको सत्यका अंश भी बुद्धिगम्य हो जाय तो वह कृतकृत्य हो जाता है । भाष्यकारोंने जैसा अपने अनुभवसे गीताके तत्त्वको समझा, वैसा ही वर्णन किया है । उनके समन्वयमें जो आनन्द है, वह उनके पक्षपात और विरोधकी आलोचनामें नहीं है । अतएव इस बातकी चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं है कि गीताके वास्तविक अर्थकी रक्षा भगवान् शंकराचार्यने अपने भाष्यमें कहाँतक की है । प्रचारकको सम्भवतः अत्युक्तिका आश्रय आवश्यक होता है । यह भी याद रखना उचित है—
शङ्करः शङ्करः साक्षाद् व्यासो नारायणः स्वयम् ।
तयोर्विवादे सम्प्राप्ते न जाने किं करोम्यहम् ॥
भगवान् शंकराचार्यके कुछ सिद्धान्तोंका स्थूलरूपसे वर्णन करना युक्तियुक्त है, जिससे गीताभाष्यमें जो उनका दृष्टिबिन्दु है वह सहजमें अवगत हो जाय । इस बातके माननेमें हमें कोई संकोच नहीं कि अनेक
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[ ६ ] वाक्य गीतामें ऐसे मिल सकते हैं, जिनको द्वैत और अद्वैतसिद्धान्ती अपना प्रमाणवचन बना सकते हैं, गीताके कई मार्मिक श्लोक दोनों पक्षोंके समर्थक समझे जा सकते हैं । श्रीशंकराचार्यसे पूर्व जो गीतापर भाष्य लिखे गये उनमेंसे अब एक भी नहीं मिलता । भर्तृप्रपञ्चके भाष्यका श्रीशंकराचार्यने उल्लेख किया है और उसका खण्डन भी किया है । भर्तृप्रपञ्चके अनुसार कर्म और ज्ञान दोनोंसे मिलकर मोक्षकी प्राप्ति होती है, श्रीशंकराचार्य केवल विशुद्ध ज्ञान ही मोक्षप्राप्तिका उपाय बताते हैं । यही भेद एकायन - सम्प्रदाय और उपनिषद् में भी है । एकायनके मतमें आत्मा परमेश्वरका अंश है और उसीके आश्रित है । उपनिषद् आत्मा और ब्रह्मकी अभिन्नताका निरूपण करते हैं । उपनिषद् ज्ञान मोक्षका साधन है और एकायन प्रपत्तिसे मोक्ष मानते हैं । और गीतामें स्पष्ट ऐसे वचन हैं कि जीव ईश्वरका सनातन अंश है ' ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' और ईश्वरकी शरणागति और आश्रयमें ही उसका कल्याण है, ' मामेकं शरणं व्रज ' यह सिद्धान्तवाक्य प्रपत्तिका पोषक है । भक्तिहीन कर्म व्यर्थ है और भक्तिहीन ज्ञान शुष्क एवं नीरस है । उपनिषद् के अनुसार प्रकृति मिथ्या है और एकायन प्रकृतिको नित्य परन्तु परमेश्वरके अधीन मानते हैं । उपनिषद् के अनुसार ज्ञानीके लिये प्रकृति विलीन हो जाती है और एकायनका मत है कि ज्ञानी प्रकृतिके खेलको देखा करता है । इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि पाञ्चरात्र और एकायनके सिद्धान्त गीतामें स्पष्ट मिलते हैं । परन्तु यह भी सहसा नहीं कहा जा सकता कि श्रीशंकराचार्यके सिद्धान्तोंका भी समर्थन गीता पूर्णतः नहीं करती । वैसे तो शांकरसिद्धान्तका विस्तृतरूपसे प्रतिपादन ब्रह्मसूत्रके शारीरक नामक भाष्यमें किया गया है, परन्तु गीता - भाष्यसे भी वह भली प्रकार अवगत हो जाता है । सिद्धान्त अति संक्षेपसे यह है कि मनुष्यको निष्कामभावसे स्वकर्ममें प्रवृत्त रहकर चित्तशुद्धि करनी चाहिये । चित्तशुद्धिका उपाय ही फलाकाङ्क्षाको छोड़कर कर्म करना है । जबतक चित्तशुद्धि न होगी, जिज्ञासा उत्पन्न नहीं हो सकती, बिना जिज्ञासाके मोक्षकी इच्छा ही असम्भव है । पश्चात् विवेकका उदय होता है । विवेकका अर्थ है नित्य और अनित्य वस्तुका भेद समझना । संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं और केवल आत्मा उनसे पृथक् एवं नित्य है, ऐसा अनुभव होनेसे विवेकमें दृढ़ता होती है, दृढ़ विवेकसे वैराग्य उत्पन्न होता है । लोकपरलोकके यावत् सुख और भोगोंके प्रति पूर्ण विरक्ति बिना वैराग्य दृढ़ नहीं होता । अनित्य वस्तुओंमें वैराग्य मोक्षका प्रथम कारण है और इसीसे शम, दम, तितिक्षा और कर्म - त्याग सम्भव होते हैं, इसके पश्चात् मोक्षका कारण जो ज्ञान है; उसका उदय होता है । बिना विशुद्ध ज्ञानके मोक्ष किसी प्रकार भी नहीं मिल सकता ।
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया ।
ब्रह्मात्मकबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा ॥
जिन साधनोंका फल अनित्य है वे मोक्षके कारण हो ही नहीं सकते । मोक्षका स्वरूप है जीवात्मा-परमात्माकी अभिन्नताका ज्ञान । दोनों एक स्वरूप हैं, इसी ज्ञानका नाम मोक्ष है । जीवात्मा - परमात्मामें जो भेद मालूम होता है वह प्रकृतिके कारणसे है । इस भ्रान्तिकी निवृत्ति ज्ञानद्वारा होती है । द्वैत जो भासता है उसका कारण माया है । और वह माया अनिर्वचनीया है । न तो वह सत् है और न असत् है और दोनोंहीके धर्म उसमें भासते हैं । इसीलिये उसको ' अनिर्वचनीया ' विशेषण दिया गया
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[ ७ ] है । वास्तवमें माया भी मिथ्या है । क्योंकि सत्से असत्की उत्पत्ति सम्भव नहीं और सत् - असत्का मेल भी सम्भव नहीं और असत् में कोई शक्ति ही नहीं । अतएव जगत् केवल भ्रान्तिमात्र है और स्वप्नवत् है । भगवान् शंकराचार्यको ' मायावादी ' कहना न्यायसंगत नहीं । उन्होंने मायाका प्रतिपादन नहीं किया । जब विपक्षी दृश्यमान, परन्तु मिथ्या जगत्का कारण आग्रहपूर्वक पूछता है तो मायाको, जो स्वयं मिथ्या है, बता दिया जाता है । यही कारण है कि जीवभाव वा जीवका यह अनुभव कि वह बद्ध है, वास्तवमें कल्पित है, अज्ञानके आवरणसे जीव अपने स्वरूपको भूला हुआ है और ज्ञान ही इस अज्ञानका नाशक है । भगवान् शंकराचार्य निवृत्ति मार्गके उपदेष्टा हैं और गीताको भी उन्होंने निवृत्ति - मार्ग - प्रतिपादक ग्रन्थ माना है । उनके मतानुसार संन्यासके बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । यही उनका पुनः - पुनः कथन है । परन्तु इतना ध्यान रखना उचित है कि कर्म वा प्रवृत्तिमार्गको वे चित्तशुद्धिके लिये आवश्यक समझते हैं । अतएव वे सभीको संन्यासका अधिकारी नहीं मानते । सच्चा संन्यास अर्थात् विद्वत्संन्यास वही है जिसमें मनुष्य किसी वस्तुका त्याग नहीं करता वरं पके फल जैसे वृक्षसे आप ही गिर पड़ते हैं, संसारसे वह सर्वथा निर्लिप्त हो जाता है । लोहेके तप्त गोलेको हाथसे छोड़ देनेके लिये किसके आदेशकी प्रतीक्षा होती है? गीताभाष्यमें यही सिद्धान्त भगवान् शंकराचार्यने प्रतिपादित किया है । आधुनिक संसारके इतिहासमें शंकर - जैसा कोई ज्ञानी और दार्शनिक दूसरा नहीं मिलता । उनके सिद्धान्तोंको समझनेमें यह हिन्दी - अनुवाद अत्यन्त सहायक होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं । अनुवादक महाशयके सराहनीय परिश्रमकी सफलता इसीमें है कि आचार्यके सिद्धान्तोंसे हम सुगमतापूर्वक परिचय प्राप्त करें और हममें मुमुक्षुताका भाव भली प्रकार जाग्रत् हो । काशी हिन्दूविश्वविद्यालय आश्विन शुक्ल ४, सं ० १ ९ ८८ } जीवनशंकर याज्ञिक
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भगवान् गीताप्रेस, गोरखपुर
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श्रीपरमात्मने नमः नम्र निवेदन
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
मूकं करोति वाचालं पङ्गं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥
परम आदरणीय जगद्गुरु श्री श्री आद्यशंकराचार्य भगवान्कृत विश्वविख्यात श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यको कौन नहीं जानता? आज यह भाष्य गीताके समस्त भाष्य और टीकाओंमें मुकुटमणि माना जाता है, वेदान्तके पथिकोंके लिये तो यह परमोत्कृष्ट पथप्रदर्शक है, इसीलिये प्रायः सभी अद्वैतवादी टीकाकारोंने इसका सर्वथा अनुसरण किया है । आचार्य के कथनसे यह सिद्ध होता है कि उनके भाष्य - निर्माणके समय श्रीमद्भगवद्गीतापर अन्य बहुत - सी टीकाएँ प्रचलित थीं, खेद है कि आज उनमेंसे एक भी उपलब्ध नहीं है । परंतु आचार्य कहते हैं कि उनसे ग्रन्थका यथार्थ तत्त्व भलीभाँति समझमें नहीं आता था, उसी यथार्थ तत्त्वको दिखलानेके लिये आचार्यको स्वतन्त्र भाष्य - रचना करनी पड़ी । इस भाष्यमें आचार्यने बड़ी बुद्धिमानीके साथ अपने मतकी स्थापना की है । स्थान - स्थानपर शास्त्रार्थकी पद्धतिसे विस्तृत विवेचन कर अर्थको सुस्पष्ट किया है । कुछ समयसे जगत्में श्रीमद्भगवद्गीताका प्रचार जोरसे बढ़ रहा है । सभी प्रकारके विद्वान् अपनी - अपनी दृष्टिसे गीताका मनन कर रहे हैं, परन्तु गीताका मनन करनेके लिये आचार्यकृत भाष्यको समझने की बड़ी ही आवश्यकता है । इसीसे अनेक विभिन्न भाषाओंमें भाष्यका अनुवाद भी हो चुका है । हिन्दीमें भी दो-एक अनुवाद इससे पूर्व निकले थे, परन्तु कई कारणोंसे उनसे हिन्दी - जनता विशेष लाभ नहीं उठा सकी, इसीसे हिन्दीमें एक ऐसे अनुवादके प्रकाशित होनेकी आवश्यकता प्रतीत होने लगी, जिससे गीताप्रेमी हिन्दी-भाषी पाठक सुगमतासे आचार्यका मत जान सकें । मेरे पूजनीय ज्येष्ठ भ्राता श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने, जिनके अनवरत सङ्ग और सदुपदेशोंसे मेरी इस ओर किञ्चित् प्रवृत्ति हुई और होती है, मुझे भाष्यका अनुवाद करनेकी आज्ञा दी; पहले तो अपनी विद्या-बुद्धिकी ओर देखकर मेरा साहस नहीं हुआ, परन्तु उनकी कृपाभरी प्रेरणाने अन्तमें मुझे इस कार्यमें प्रवृत्त कर ही दिया । गत सं ० १ ९ ८४ के मार्गशीर्ष - मासमें मैंने व्यापारके कामसे प्रतिदिन कुछ समय निकालकर अनुवाद करना आरम्भ किया और माघके अन्ततक सतरहवें अध्यायतकका अनुवाद लिख गया । इसके पश्चात् अनेक बार ग्रन्थके प्रकाशित करनेकी बात उठी परन्तु अपनी अल्पज्ञताके कारण किसी अच्छे विद्वान्को दिखलाकर संशोधन करवाये बिना छपानेका साहस नहीं हुआ । इस बार मेरे प्रार्थना करनेपर श्रीविशुद्धानन्द सरस्वती-अस्पताल कलकत्ताके प्रसिद्ध वैद्य पं ० श्रीहरिवक्षजी जोशी काव्य - सांख्य- स्मृति- तीर्थ महोदयने प्रायः एक मासतक कठिन परिश्रम करके समस्त ग्रन्थको मूल भाष्यके साथ अक्षरशः मिलाकर यथोचित् संशोधन कर देनेकी कृपा की । इसीसे आज यह आपलोगोंकी सेवामें मुद्रितरूपमें उपस्थित किया जा सका है । इस कृपाके लिये मैं सम्मान्य श्रीजोशीजी महाराजका हृदयसे कृतज्ञ हूँ ।
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[ १० ] अपनी अल्पबुद्धि और सीमित सामर्थ्यके अनुसार यथासाध्य मैंने सरल हिन्दीमें आचार्यका भाव ज्यों - का - त्यों रखनेकी चेष्टा की है, तथापि मैं यह कह नहीं सकता, मैं इसमें सम्पूर्णतया सफल हुआ हूँ । एक तो परम तात्त्विक विषय, दूसरे आचार्यकी लिखी हुई उस कालकी कठिन संस्कृत, जिसमें बड़े-बड़े विद्वान् भी गीता - सम्बन्धी विषयका अध्ययन कम होनेके कारण भ्रममें पड़ जाया करते हैं, मुझ-जैसा साधारण मनुष्य सर्वथा भ्रमरहित होनेका दावा कैसे कर सकता है? तथापि भगवत्कृपासे जो कुछ हो सका है, वह आपके सामने है । विषयकी कठिनतासे कहीं - कहीं वाक्यरचनामें कठिनता आ गयी हो तो सहृदय पाठक क्षमा करें । ऐसे ग्रन्थके अनुवादमें किन - किन कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है और अपनी स्वतन्त्रताको छोड़कर पराधीनताके किन - किन नियमोंमें कैसे बँध जाना पड़ता है, इसका अनुभव उन्हीं पाठक और लेखक महोदयोंको है जो कभी इस प्रकारका कार्य कर चुके हैं, या कर रहे हैं । भगवान् श्रीकृष्णके परम अनुग्रहसे मुझ - सरीखे व्यक्तिको आचार्यकृत भाष्यके किञ्चित् मननका सुअवसर प्राप्त हुआ, यह मेरे लिये बड़े ही सौभाग्यका विषय है । श्रद्धेय विद्वन्मण्डली और गीताप्रेमी महानुभावोंसे प्रार्थना है कि वे बालकके इस प्रयासको स्नेहपूर्वक देखें और जहाँ कहीं प्रमादवश भूल रह गयी हो, उसे बतलानेकी कृपा अवश्य करें, जिससे मुझे अपनी भूलोंको सुधारनेका अवसर मिले और यदि सम्भव हो तो आगामी संस्करणमें भूलें सुधार दी जायँ । यद्यपि मैं मराठी नहीं जानता, तथापि जहाँ कुछ विशेष समझनेकी आवश्यकता हुई है वहाँ मैंने पूना आचार्यकुलके आचार्य भक्त पं ० श्रीविष्णु वामन वापट शास्त्रीजीकृत मराठी भाष्यार्थसे सहायता ली है, इसके लिये मैं पण्डितजीका कृतज्ञ हूँ । एक बात ध्यानमें रखनी चाहिये । अनुवाद कैसा ही क्यों न हो, जो आनन्द और स्वारस्य मूल ग्रन्थमें होता है वह अनुवादमें नहीं आ सकता । इसी विचारसे इसमें मूल भाष्य भी साथ रखा गया है । साधारण संस्कृत जाननेवाले सज्जन भी आचार्यके मूल लेखको सहज ही समझ सकें, इसके लिये भाष्यके पद अलग-अलग करके और वाक्योंके छोटे - छोटे भाग करके लिखे गये हैं । व्याकरणके नियमानुसार यदि इसमें किसी प्रकारकी त्रुटि जान पड़े तो विद्वान् महोदयगण क्षमा करें । जहाँ शास्त्रार्थकी पद्धतिसे भाष्य लिखा गया है वहाँ अनुवादमें पूर्वपक्ष और उत्तरपक्षकी कल्पना करके ‘ पू ० ' और सुविधा होगी । भाष्यमें मूल दिये गये हैं । मूल ही कर दिया गया कहीं तो टिप्पणीमें अनुसार कार्य कर ' उ०’- शब्द लिख दिये गये हैं, आशा है, पाठकोंको
श्लोकके जो शब्द आये हैं, वे दूसरे टाइपोंमें, तथा जहाँ
श्लोकके पदोंका आगे - पीछेका सम्बन्ध जोड़नेके लिये
है, परन्तु सभी जगह यह बात हिन्दीमें लिखकर नहीं इसका स्पष्टीकरण कर दिया है, कहीं श्लोकके अन्तमें दिया गया है, शब्दोंका अर्थ नहीं दिया गया है । इससे विषयके समझनेमें बहुत प्रतीक आये हैं, वे दूसरे टाइपोंमें भाष्यकारने जैसा लिखा है वैसा जनायी जा सकी, अतः कहीं-लिखा गया है और कहीं उसके आचार्यने समासोंका जो विग्रह दिखाया है, उसके सम्बन्धमें भी यही बात है । जहाँतक बन पड़ा है, उसी प्रणालीसे अनुवादमें समासका विग्रह दिखलानेकी चेष्टा की गयी है, परन्तु जहाँ भाषाकी शैली