श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 11–20

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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[ ११ ] बिगड़ती दिखलायी दी है वहाँ उस विग्रहके अनुकूल केवल अर्थ लिख दिया गया है, विग्रह नहीं दिखलाया गया है । पाठकगण मेरी सुविधाओंको देखकर इसके लिये क्षमा करेंगे । आचार्यने श्रुति स्मृति - पुराण- इतिहासोंके जो प्रमाण उद्धृत किये हैं, वे किस ग्रन्थके किस स्थलके हैं, यह भी दिखलानेकी चेष्टा की गयी है । वहाँ जिन सांकेतिक चिह्नोंका प्रयोग किया गया है, उनकी सूची अलग छपी है । अनुवादमें पर्याय बतलानेके लिये कहीं ' अर्थात् ' शब्दसे तथा कहीं ( – समास करनेके लिये ( - ) छोटी लाइन लगायी गयी है । प्रकाशककी प्रार्थनापर काशी हिन्दूविश्वविद्यालयके विद्वान् प्रोफेसर याज्ञिक एम् ॰ ए ॰ महोदयने इस ग्रन्थकी सुन्दर भूमिका लिखनेकी कृपा की है, कृतज्ञ हूँ । ) डैशसे काम लिया गया है । सम्मान्य पं ० जीवनशंकरजी इसके लिये मैं उनका हृदयसे विनीत हरिकृष्णदास गोयन्दका निवेदन तीसरे संस्करणमें अनुवादक महोदयने इसमें यत्र - तत्र और भी आवश्यक संशोधन और परिवर्तन कर दिया । संशोधनके सम्बन्धमें जिन - जिन सज्जनोंने अपनी मूल्यवान् सम्मति दी थी उनके हम आभारी हैं । परमार्थ - प्रिय प्रेमी ग्राहकोंने इस पुस्तकको आदर देकर इसके पाँच संस्करण जल्दी बिक जानेमें जो हमें सहायता दी उसके लिये हम सबके कृतज्ञ हैं इस संस्करणको भी प्रेमपूर्वक अपनानेकी मननशील सज्जनोंसे प्रार्थना है । विनीत प्रकाशक

पृष्ठ 12

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अध्याय - सूची अध्याय प्रथमोऽध्यायः द्वितीयोऽध्यायः तृतीयोऽध्यायः चतुर्थोऽध्यायः पञ्चमोऽध्यायः षष्ठोऽध्यायः सप्तमोऽध्यायः अष्टमोऽध्यायः नवमोऽध्यायः पृष्ठ १७ २४ ७६ १०६ १४२ १६७ १ ९ ६ २११ २२६ अध्याय दशमोऽध्यायः एकादशोऽध्यायः द्वादशोऽध्यायः त्रयोदशोऽध्यायः चतुर्दशोऽध्यायः पञ्चदशोऽध्यायः षोडशोऽध्यायः सप्तदशोऽध्यायः अष्टादशोऽध्यायः पृष्ठ २४५ २६० २८५ २ ९ ८ ३५० ३६५ ३८० ३ ९ २ ४०४ सांकेतिक चिह्नोंका स्पष्टीकरण संकेत बृह ० उ ० छा ० उ ० ना ० उ ० जाबा ० उ ० तै ० सं ० तै ० उ ० के ० उ ० प्र ० उ ० क ० उ ० ई ० उ ० श्वे ०० उ ० स्पष्ट बृहदारण्यकोपनिषद् छान्दोग्योपनिषद् नारायणोपनिषद् जाबालोपनिषद् तैत्तिरीय संहिता तैत्तिरीयोपनिषद् केनोपनिषद प्रश्नोपनिषद् कठोपनिषद् ईशोपनिषद् श्वेताश्वतरोपनिषद् संकेत नृ ० पू ० उ ० मु ० उ ० तै ० ब्रा ० तै ० आर ० महा ० शान्ति ० महा ० स्त्री ० मनु ० विष्णुपु ० बोधा ० स्मृ ० गौ ० स्मृ ० आ ० स्मृ ० स्पष्ट नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् मुण्डकोपनिषद् तैत्तिरीय ब्राह्मण तैत्तिरीय आरण्यक = महाभारत शान्तिपर्व = महाभारत स्त्रीपर्व मनुस्मृति विष्णुपुराण बोधायनस्मृति गौतमस्मृति आपस्तम्बस्मृति

पृष्ठ 13

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श्रीहरिः ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य हिन्दी - भाषानुवादसहित ( उपोद्घात )

ॐ नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम् ।

अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥

अव्यक्तसे अर्थात् मायासे श्रीनारायण - आदिपुरुष सर्वथा अतीत ( अस्पृष्ट ) हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अव्यक्त — प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है, ये भूः, भुवः आदि सब लोक और सात द्वीपोंवाली पृथिवी ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है । स भगवान् सृष्ट्वा इदं जगत् तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः मरीच्यादीन् अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन् प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं ग्राहयामास वेदोक्तम् । ततः अन्यान् च सनकसनन्दनादीन् उत्पाद्य निवृत्तिलक्षणं धर्मं ज्ञानवैराग्यलक्षणं ग्राहयामास । द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणः च । जगतः स्थितिकारणं प्राणिनां साक्षात् अभ्युदयनिःश्रेयसहेतुः यः स धर्मो ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोऽर्थिभिः अनुष्ठीयमानः । उस भगवान्ने इस जगत्को रचकर इसके पालन करनेकी इच्छा करते हुए पहले मरीचि आदि प्रजापतियोंको रचकर उनको वेदोक्त प्रवृत्तिरूप धर्म ( कर्मयोग ) ग्रहण करवाया । फिर उनसे अलग सनक, सनन्दनादि ऋषियोंको उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं ऐसा निवृत्तिरूप धर्म ( ज्ञानयोग ) ग्रहण करवाया । वेदोक्त धर्म दो प्रकारका है- एक प्रवृत्तिरूप, दूसरा निवृत्तिरूप । जो जगत् की स्थितिका कारण तथा प्राणियोंकी उन्नतिका और मोक्षका साक्षात् हेतु है एवं कल्याणकामी ब्राह्मणादि वर्णाश्रम - अवलम्बियोंद्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है ।

पृष्ठ 14

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१४ * श्रीमद्भगवद्गीता * दीर्घेण कालेन अनुष्ठातॄणां कामोद्भवाद् हीयमानविवेकविज्ञानहेतुकेन अधर्मेण अभि-भूयमाने धर्मे प्रवर्धमाने च अधर्मे, जगत: स्थितिं परिपिपालयिषुः स आदिकर्ता नारायणाख्यो विष्णुः भौमस्य ब्रह्मणो ब्राह्मणत्वस्य रक्षणार्थं देवक्यां वसुदेवाद् अंशेन कृष्णः किल सम्बभूव । ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षणेन रक्षितः स्याद् वैदिको धर्मः तदधीनत्वाद् वर्णाश्रमभेदानाम् । स च भगवान् ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्य-तेजोभिः सदा सम्पन्नः त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं स्वां मायां मूलप्रकृतिं वशीकृत्य अजः अव्ययो भूतानाम् ईश्वरो नित्यशुद्धबुद्ध -मुक्तस्वभावः अपि सन् स्वमायया देहवान् इव जात इव च लोकानुग्रहं कुर्वन् इव लक्ष्यते । स्वप्रयोजनाभावे अपि भूतानुजिघृक्षया वैदिकं हि धर्मद्वयम् अर्जुनाय शोकमोह-महोदधौ निमग्नाय उपदिदेश, गुणाधिकैः हि गृहीतः अनुष्ठीयमानः च धर्मः प्रचयं गमिष्यति इति । तं धर्मं भगवता यथोपदिष्टं वेदव्यासः सर्वज्ञो भगवान् गीताख्यैः सप्तभिः

श्लोकशतैः उपनिबबन्ध ।

तद् इदं गीताशास्त्रं समस्तवेदार्थसारसङ्ग्रहभूतं दुर्विज्ञेयार्थम् । बहुत कालके बाद जब धर्मानुष्ठान करनेवालोंके अन्तःकरणमें कामनाओंका विकास होनेसे विवेक-विज्ञानका ह्रास हो जाना ही जिसकी उत्पत्तिका कारण है ऐसे अधर्मसे धर्म दबता जाने लगा और अधर्मकी वृद्धि होने लगी तब जगत्‌की स्थिति सुरक्षित रखनेकी इच्छावाले वे आदिकर्ता नारायणनामक श्रीविष्णुभगवान् भूलोकके ब्रह्मकी अर्थात् भूदेवों ( ब्राह्मणों ) -के ब्राह्मणत्वकी रक्षा करनेके लिये श्रीवसुदेवजीसे श्रीदेवकीजीके गर्भमें अपने अंशसे ( लीलाविग्रहसे ) श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए । यह प्रसिद्ध है । ब्राह्मणत्वकी रक्षासे ही वैदिक धर्म सुरक्षित रह सकता है, क्योंकि वर्णाश्रमोंके भेद उसीके अधीन हैं । ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदिसे सदा सम्पन्न वे भगवान् यद्यपि अज, अविनाशी, सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर और नित्य शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव हैं, तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति वैष्णवी मायाको वशमें करके अपनी लीलासे शरीरधारीकी तरह उत्पन्न हुए - से और लोगोंपर अनुग्रह करते हुए - से दीखते हैं अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी भगवान्ने भूतोंपर दया करनेकी इच्छासे, यह सोचकर कि अधिक गुणवान् पुरुषोंद्वारा ग्रहण किया हुआ और आचरण किया हुआ धर्म अधिक विस्तारको प्राप्त होगा, शोकमोहरूप महत्समुद्रमें डूबे हुए अर्जुनको दोनों ही प्रकारके वैदिक धर्मोंका उपदेश किया । उक्त दोनों प्रकारके धर्मोंको भगवान्ने जैसे-जैसे कहा था ठीक वैसे ही सर्वज्ञ भगवान् वेदव्यासजीने गीतानामक सात सौ श्लोकोंके रूपमें ग्रथित किया । ऐसा यह गीताशास्त्र सम्पूर्ण वेदार्थका सार - संग्रह-रूप है और इसका अर्थ समझनेमें अत्यन्त कठिन है ।

पृष्ठ 15

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* शांकरभाष्य तदर्थाविष्करणाय अनेकैः विवृतपदपदार्थ-वाक्यार्थन्यायम् अपि अत्यन्तविरुद्धानेकार्थ-त्वेन लौकिकैः गृह्यमाणम् उपलभ्य अहं विवेकतः अर्थनिर्धारणार्थं सङ्क्षेपतो विवरणं करिष्यामि । तस्य अस्य गीताशास्त्रस्य सङ्क्षेपतः प्रयोजनं परं निःश्रेयसं सहेतुकस्य संसारस्य अत्यन्तोपरमलक्षणम् । तत् च सर्वकर्मसन्यास-पूर्वकाद् आत्मज्ञाननिष्ठारूपाद् धर्माद् भवति । तथा इमम् एव गीतार्थधर्मम् उद्दिश्य भगवता एव उक्तम् ‘ स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने ' इति अनुगीतासु । किं च अन्यदपि तत्रैव उक्तम्-' नैव धर्मी न चाधर्मी न चैव हि शुभाशुभी । यः स्यादेकासने लीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तयन् ॥ ' ' ज्ञानं सन्यासलक्षणम् ' इति च । इह अपि च अन्ते उक्तम् अर्जुनाय — ‘ सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ' इति । अभ्युदयार्थः अपि यः प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो वर्णाश्रमान् च उद्दिश्य विहितः स देवादि -स्थानप्राप्तिहेतुः अपि सन् ईश्वरार्पणबुद्ध्या अनुष्ठीयमानः सत्त्वशुद्धये भवति फलाभि -सन्धिवर्जितः । शुद्धसत्त्वस्य च ज्ञाननिष्ठायोग्यताप्राप्तिद्वारेण ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन च निःश्रेयसहेतुत्वम् अपि प्रतिपद्यते । ( उपोद्घात ) * १५ यद्यपि उसका अर्थ प्रकट करनेके लिये अनेक पुरुषोंने पदच्छेद, पदार्थ, वाक्यार्थ और आक्षेप, समाधानपूर्वक उसकी विस्तृत व्याख्याएँ की हैं, तो भी लौकिक मनुष्योंद्वारा उस गीताशास्त्रका अनेक प्रकारसे ( परस्पर ) अत्यन्त विरुद्ध अनेक अर्थ ग्रहण किये जाते देखकर, उसका विवेकपूर्वक अर्थ निश्चित करनेके लिये मैं संक्षेपसे व्याख्या करूँगा । संक्षेपमें इस गीताशास्त्रका प्रयोजन परमकल्याण अर्थात् कारणसहित संसारकी अत्यन्त उपरतिरूप है, यह ( परमकल्याण ) सर्वकर्मसन्यासपूर्वक आत्मज्ञाननिष्ठारूप धर्मसे प्राप्त होता है । इसी गीतार्थरूप धर्मको लक्ष्य करके स्वयं भगवान् ने ही अनुगीतामें कहा है कि ' ब्रह्मके परमपदको ( मोक्षको ) प्राप्त करनेके लिये वह ( गीतोक्त ज्ञाननिष्ठारूप ) धर्म ही सुसमर्थ है । ' इसके सिवा कहीं ऐसा भी कहा है कि ' जो न धर्मी, न अधर्मी और न शुभाशुभी होता है तथा जो कुछ भी चिन्तन न करता हुआ तूष्णीभावसे एक जगदाधार ब्रह्ममें लीन हुआ रहता है ( वही उसको पाता है ) । ' यह भी कहा है कि ' ज्ञानका लक्षण ( चिह्न ) संन्यास है । ' यहाँ ( गीताशास्त्रमें ) भी अन्तमें अर्जुनसे कहा है-' सब धर्मोंको छोड़कर एकमात्र मेरी शरणमें आ जा । ' अभ्युदय — सांसारिक उन्नति ही जिसका फल है ऐसा जो प्रवृत्तिरूप धर्म, वर्ण और आश्रमोंको लक्ष्य करके कहा गया है, वह यद्यपि स्वर्गादिकी प्राप्तिका ही साधन है तो भी फल - कामना छोड़कर ईश्वरार्पणबुद्धिसे किया जानेपर अन्त: करणकी शुद्धि करनेवाला होता है । तथा शुद्धान्तःकरण पुरुषको पहले ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्ति कराकर फिर ज्ञानोत्पत्तिका कारण होने-से ( वह प्रवृत्तिरूप धर्म ) कल्याणका भी हेतु होता है ।

पृष्ठ 16

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१६ * श्रीमद्भगवद्गीता * तथा च इमम् एव अर्थम् अभिसन्धाय वक्ष्यति — ' ब्रह्मण्याधाय कर्माणि ' ' योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ' इति । इमं द्विप्रकारं धर्मं निःश्रेयसप्रयोजनं परमार्थतत्त्वं च वासुदेवाख्यं परब्रह्म अभिधेय भूतं विशेषतः - अभिव्यञ्जयद् विशिष्टप्रयोजन-सम्बन्धाभिधेयवद् गीताशास्त्रम् । यतः तदर्थे विज्ञाते समस्तपुरुषार्थसिद्धिः, अतः तद्विवरणे यत्नः क्रियते मया । इसी अर्थको लक्ष्यमें रखकर आगे कहेंगे कि, ' कर्मोंको ब्रह्ममें अर्पण कर ' ' योगिजन आसक्ति छोड़कर आत्मशुद्धिके लिये कर्म करते हैं ' इत्यादि । परमकल्याण ही जिनका प्रयोजन है, ऐसे इन दो प्रकारके धर्मोंको और लक्ष्यभूत वासुदेवनामक परब्रह्मरूप परमार्थतत्त्वको विशेषरूपसे अभिव्यक्त ( प्रकट ) करनेवाला यह गीताशास्त्र असाधारण प्रयोजन, सम्बन्ध और विषयवाला है । ऐसे इस ( गीताशास्त्र ) - का अर्थ जान लेनेपर समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है, अतएव इसकी व्याख्या करनेके लिये मैं प्रयत्न करता हूँ ।

पृष्ठ 17

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ॐ श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र उवाच-धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः I ।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

धृतराष्ट्र बोले — हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें युद्धकी इच्छासे इकट्ठे होनेवाले क्या किया?॥ १ ॥

सञ्जय उवाच— -दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।

आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

संजय बोले — उस समय राजा दुर्योधन पाण्डवोंकी सेनाको व्यूहरचनासे युक्त जाकर कहने लगा ॥ २ ॥

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।

व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥

१ ॥

मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने २ ॥ देखकर गुरु द्रोणके पास ३ ॥ गुरुजी! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहरचनासे युक्त की हुई पाण्डवोंकी इस बड़ी भारी सेनाको देखिये ॥ ३ ॥

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥५ ॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥

इस सेनामें महाधनुर्धर वीर, लड़नेमें भीम और अर्जुनके समान सात्यकि, विराट और महारथी द्रुपद, बलवान् धृष्टकेतु, चेकितान तथा काशिराज एवं नरश्रेष्ठ पुरुजित् कुन्तिभोज और शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु, बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र - ये सभी महारथी हैं ॥ ४-६ ॥

पृष्ठ 18

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१८ * श्रीमद्भगवद्गीता *

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।

नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥

हे द्विजोत्तम! हमारे पक्षके भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये । आपकी जानकारीके लिये मैं उनके नाम बतलाता हूँ जो कि मेरी सेनाके नेता हैं ॥ ७ ॥

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८ ॥

आप, पितामह भीष्म, कर्ण और रणविजयी कृपाचार्य, वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र ( भूरिश्रवा ) ॥ ८ ॥

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः इनके सिवा अन्य भी बहुत - से शूरवीर मेरे लिये प्राण देनेको तैयार हैं, जो कि धारण करनेवाले और सब के - - सब युद्धविद्यामें निपुण हैं ॥ ९ ॥

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥

।

॥ ९ ॥

नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंको १० ॥ ऐसी वह पितामह भीष्मद्वारा रक्षित हमारी सेना सब प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन पाण्डवों की यह सेना सहज ही जीती जा सकती है ॥ १० ॥

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥

अतः आपलोग सब - के - सब सभी मोरचोंपर अपनी - अपनी जगह डटे हुए, केवल पितामह भीष्मकी ही रक्षा करते रहें ॥ ११ ॥

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।

सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

इसके बाद कुरुवंशियोंमें वृद्ध प्रतापी पितामह भीष्मने उस दुर्योधनके हृदयमें स्वरसे सिंहके समान गर्जकर शङ्ख बजाया ॥१२ ॥

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।

सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

१२ ॥

हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च १३ ॥ फिर एक साथ ही शङ्ख, नगारे, ढोल, मृदंग और रणसिंगा आदि बाजे बजे, वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ ॥ १३ ॥

पृष्ठ 19

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* शांकरभाष्य अध्याय १ * १ ९

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥

फिर सफेद घोड़ोंसे युक्त बड़े भारी रथमें बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनने भी अपने अलौकिक शङ्ख बजाये ॥ १४ ॥

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥

श्रीकृष्णने पाञ्चजन्यनामक और अर्जुनने देवदत्तनामक शङ्ख बजाया । भयानक कर्मकारी वृकोदर भीमने पौण्ड्रनामक अपना महान् शङ्ख बजाया ॥ १५ ॥

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय, नकुलने सुघोष और सहदेवने मणिपुष्पकनामवाला शङ्ख बजाया ॥ १६ ॥

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।

धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।

सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥

हे पृथ्वीनाथ! महाधनुर्धारी काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न और विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा महाबाहु सुभद्रापुत्र अभिमन्यु - इन सबने भी सब बजाये ॥ १७-१८ ॥

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।

नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥

वह भयंकर शब्द आकाश और पृथ्वीको गुँजाता हुआ धृतराष्ट्र - पुत्रोंके हृदय

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

अर्जुन उवाच-सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥

ओरसे अलग - अलग शङ्ख १ ९ ॥ विदीर्ण करने लगा ॥ १ ९ ॥ २० ॥ २१ ॥ २२ ॥

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२० * श्रीमद्भगवद्गीता * हे पृथ्वीनाथ! फिर उस शस्त्र चलनेकी तैयारीके समय युद्धके लिये सजकर डटे हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंको देखकर कपिध्वज अर्जुन धनुष उठाकर श्रीकृष्णसे इस तरह कहने लगा कि हे अच्युत! जबतक मैं इन खड़े हुए युद्धेच्छुक वीरोंको भलीभाँति देखूँ कि इस रण - उद्योगमें मुझे किन - किनके आप मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा रखिये ॥ २०-२२ ॥

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥

( मेरी यह प्रबल इच्छा है कि ) दुर्मति दुर्योधनका युद्धमें भला चाहनेवाले हैं, उन युद्ध करनेवालोंको मैं भली प्रकार देखूँ ॥ २३ ॥

सञ्जय उवाच-एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।

उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान्कुरूनिति ॥

साथ युद्ध करना है तबतक २३ ॥ जो ये राजालोग यहाँ आये २४ ॥ २५ ॥ संजय बोले — हे भारत! निद्राजित् अर्जुनद्वारा इस प्रकार प्रेरित हुए श्रीकृष्ण उस उत्तम रथको दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणाचार्यके तथा अन्य सब राजाओंके सामने खड़ा करके बोले, हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कौरवोंको देख ॥ २४-२५ ॥

तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् ।

आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥

२६ ॥

२७ ॥

२८ ॥

२ ९ ॥

फिर वह पृथापुत्र अर्जुन वहाँ दोनों सेनाओंमें खड़े हुए अपने ताऊ, चाचोंको, दादोंको, गुरुओंको, मामोंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको, मित्रोंको, ससुरोंको और सुहृद्वर्गको देखने लगा । वहाँ उन सभी कुटुम्बियोंको खड़े हुए देखकर अत्यन्त करुणासे घिरकर वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ इस प्रकार कहने लगा, हे कृष्ण! सामने खड़े हुए युद्धेच्छुक स्वजन - समुदायको देखकर मेरे सब अङ्ग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, मेरे शरीरमें कम्प और रोमाञ्च होते हैं॥२६–२९ ॥