श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 201–210

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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* शांकरभाष्य अध्याय ७ * २०१ बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ॥ धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥

बलं सामर्थ्यम् ओजो बलवताम् अहम् । तत् बलं च कामरागविवर्जितम् । कामः च रागः च कामरागौ कामः तृष्णा असन्निकृष्टेषु विषयेषु रागो रञ्जना प्राप्तेषु विषयेषु ताभ्यां विवर्जितं देहादिधारणमात्रार्थं बलम् अहम् अस्मि, न तु यत् संसारिणां तृष्णारागकारणम् । किं च धर्माविरुद्धो धर्मेण शास्त्रार्थेन अविरुद्धो यः प्राणिषु भूतेषु कामो यथा देहधारण -मात्राद्यर्थः अशनपानादि विषयः कामः अस्मि हे भरतर्षभ ॥ ११ ॥

बलवानोंका जो कामना और आसक्तिसे रहित बल - ओज- सामर्थ्य है, वह हूँ । ( अभिप्राय यह कि ) अप्राप्त विषयोंकी जो तृष्णा है, उसका नाम ' काम ' है और प्राप्त विषयोंमें जो प्रीति — तन्मयता है, उसका नाम ' राग ' है, उन दोनोंसे रहित, केवल देह आदिको धारण करनेके लिये जो बल है, वह मैं हूँ । जो संसारी जीवोंका बल कामना और आसक्तिका कारण है, वह मैं नहीं हूँ । तथा हे भरतश्रेष्ठ! प्राणियोंमें जो धर्मसे अविरुद्ध शास्त्रानुकूल कामना है, जैसे देहधारणमात्रके लिये खाने - पीनेकी इच्छा आदि, वह ( इच्छारूप ) काम भी मैं ही हूँ ॥ ११ ॥

किं च-ये चैव सात्त्विका भावा मत्त एवेति तान्विद्धि न ये च एव सात्त्विकाः सत्त्वनिर्वृता भावा: पदार्था राजसा रजोनिर्वृताः तामसाः तमोनिर्वृताः च ये केचित् प्राणिनां स्वकर्मवशाद् जायन्ते भावाः तान् मत्त एव जायमानान् इति एवं विद्धि सर्वान् समस्तान् एव । यद्यपि ते मत्तो जायन्ते तथापि न तु अहं तेषु तदधीनः तद्वशो यथा संसारिणः ते पुनः मयि मद्वशा मदधीनाः ॥ १२ ॥

तथा—

राजसास्तामसाश्च ये ।

त्वहं तेषु ते मयि ॥१२ ॥

जो सात्त्विक – सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए भाव-पदार्थ हैं और जो राजस - रजोगुणसे उत्पन्न हुए एवं तामस –तमोगुणसे उत्पन्न हुए भाव - पदार्थ हैं, उन सबको अर्थात् प्राणियोंके अपने कर्मानुसार ये जो कुछ भी भाव उत्पन्न होते हैं उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न हुए जान । यद्यपि वे मुझसे उत्पन्न होते हैं तथापि मैं उनमें नहीं हूँ अर्थात् संसारी मनुष्योंकी भाँति मैं उनके वशमें नहीं हूँ, परंतु वे मुझमें हैं यानी मेरे वशमें हैं— मेरे अधीन हैं ॥ १२ ॥

पृष्ठ 202

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२०२ * श्रीमद्भगवद्गीता * एवं भूतम् अपि परमेश्वरं नित्यशुद्धबुद्धमुक्त-स्वभावं सर्वभूतात्मानं निर्गुणं संसारदोषबीज-प्रदाहकारणं मां न अभिजानाति जगद् इति अनुक्रोशं दर्शयति भगवान् । तत् च किन्निमित्तं जगत: अज्ञानम् इति उच्यते— त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः ऐसा जो साक्षात् परमेश्वर नित्य - शुद्ध - बुद्ध-मुक्तस्वभाव एवं सब भूतोंका आत्मा गुणोंसे अतीत और संसाररूप दोषके बीजको भस्म करनेवाला मैं हूँ, उसको जगत् नहीं पहचानता! इस प्रकार भगवान् खेद प्रकट करते हैं और जगत्का यह अज्ञान किस कारणसे है, सो बतलाते हैं—

सर्वमिदं जगत् ।

मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥१३ ॥

त्रिभिः गुणमयैः गुणविकारै रागद्वेषमोहादि-प्रकारैः भावैः पदार्थै: एभिः यथोक्तैः सर्वम् इदं प्राणिजातं जगत् मोहितम् अविवेकताम् आपादितं सत् न अभिजानाति माम् एभ्यो यथोक्तेभ्यो गुणेभ्यः परं व्यतिरिक्तं विलक्षणं च अव्ययं व्ययरहितं जन्मादिसर्वभावविकार -वर्जितम् इत्यर्थः ॥ १३ ॥

गुणोंमें विकाररूप सात्त्विक, राजस और तामस इन तीनों भावोंसे अर्थात् उपर्युक्त राग, द्वेष और मोह आदि पदार्थोंसे यह समस्त जगत् - प्राणिसमूह मोहित हो रहा है अर्थात् विवेकशून्य कर दिया गया है, अतः इन उपर्युक्त गुणोंसे अतीत - विलक्षण, अविनाशी -विनाशरहित तथा जन्मादि सम्पूर्ण भाव - विकारोंसे रहित मुझ परमात्माको नहीं जान पाता ॥ १३ ॥

कथं पुनः दैवीम् एतां त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं तो फिर इस देवसम्बन्धिनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको मनुष्य कैसे तरते हैं? इसपर

मायाम् अतिक्रामन्ति इति उच्यते— कहते हैं-दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥१४ ॥

दैवी देवस्य मम ईश्वरस्य विष्णोः स्वभूता हि यस्माद् एषा यथोक्ता गुणमयी मम माया दुरत्यया दुःखेन अत्ययः अतिक्रमणं यस्या सा दुरत्यया । तत्र एवं सति सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एव मायाविनं स्वात्मभूतं सर्वात्मना ये प्रपद्यन्ते ते मायाम् एतां सर्वभूत-मोहिनीं तरन्ति अतिक्रामन्ति संसारबन्धनाद् मुच्यन्ते इत्यर्थः ॥ १४ ॥

क्योंकि यह उपर्युक्त दैवी माया अर्थात् मुझ व्यापक ईश्वरकी निज शक्ति मेरी त्रिगुणमयी माया दुस्तर है अर्थात् जिससे पार होना बड़ा कठिन है, ऐसी है । इसलिये जो सब धर्मोंको छोड़कर अपने ही आत्मा मुझ मायापति परमेश्वरकी ही सर्वात्मभावसे शरण ग्रहण कर लेते हैं, वे सब भूतोंको मोहित करनेवाली इस मायासे तर जाते हैं - वे इसके पार हो जाते हैं अर्थात् संसार - बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ १४ ॥

पृष्ठ 203

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* शांकरभाष्य अध्याय ७ * २०३ यदि त्वां प्रपन्ना मायाम् एतां तरन्ति यदि आपके शरण हुए मनुष्य इस मायासे तर कस्मात् त्वाम् एव सर्वे न प्रपद्यन्ते इति जाते हैं तो फिर सभी आपकी शरण क्यों नहीं लेते? उच्यते- इसपर कहते हैं—

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥

न मां परमेश्वरं दुष्कृतिनः पापकारिणो मूढाः जो कोई पापकर्म करनेवाले मूढ़ और नराधम हैं प्रपद्यन्ते नराधमा नराणां मध्ये अधमा निकृष्टाः अर्थात् मनुष्योंमें अधम - नीच हैं एवं मायाद्वारा जिनका ज्ञान छीन लिया गया है वे हिंसा, मिथ्याभाषण ते च मायया अपहृतज्ञानाः सम्मुषितज्ञाना आसुरं आदि आसुरी भावोंके आश्रित हुए मनुष्य मुझ भावं हिंसानृतादिलक्षणम् आश्रिताः ॥ १५ ॥ परमेश्वरकी शरणमें नहीं आते ॥ १५ ॥

ये पुन: नरोत्तमाः पुण्यकर्माणः- परंतु जो पुण्यकर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ हैं ( वे क्या करते हैं सो बतलाते हैं - ) चतुर्विधा भजन्ते भजन्ते मां मां जनाः जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ॥ आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥

चतुर्विधाः चतुष्प्रकारा भजन्ते सेवन्ते मां हे भारत! आर्त अर्थात् चोर, व्याघ्र, रोग आदिके जनाः सुकृतिनः पुण्यकर्माणो हे अर्जुन । आर्त वशमें होकर किसी आपत्तिसे युक्त हुआ, जिज्ञासु आर्तिपरिगृहीतः तस्करव्याघ्ररोगादिना अभिभूत अर्थात् भगवान्‌का तत्त्व जाननेकी इच्छावाला, अर्थार्थी आपन्नो जिज्ञासुः भगवत्तत्त्वं ज्ञातुम् इच्छति यः यानी धनकी कामनावाला और ज्ञानी अर्थात् विष्णुके अर्थार्थी धनकामो ज्ञानी विष्णोः तत्त्ववित् च हे तत्त्वको जाननेवाला, हे अर्जुन! ये चार प्रकारके भरतर्षभ ॥ १६ ॥ पुण्यकर्मकारी मनुष्य मेरा भजन - सेवन करते हैं ॥ १६ ॥

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं तेषां चतुर्णां मध्ये ज्ञानी तत्त्ववित् तत्त्व-वित्त्वाद् नित्ययुक्तो भवति एकभक्तिः च अन्यस्य भजनीयस्य अदर्शनाद् अतः स एकभक्ति: विशिष्यते, विशेषम् आधिक्यम् आपद्यते अति-रिच्यते इत्यर्थः ।

एकभक्तिर्विशिष्यते ।

स च मम प्रियः ॥ १७ ॥

उन चार प्रकारके भक्तोंमें जो ज्ञानी है अर्थात् यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है वह तत्त्ववेत्ता होनेके कारण सदा मुझमें स्थित है और उसकी दृष्टिमें अन्य किसी भजनेयोग्य वस्तुका अस्तित्व न रहनेके कारण वह केवल एक मुझ परमात्मामें ही अनन्य भक्तिवाला होता है । इसलिये वह अनन्य प्रेमी ( ज्ञानी भक्त ) श्रेष्ठ माना जाता है । ( अन्य तीनोंकी अपेक्षा ) अधिक— उच्च कोटिका समझा जाता है ।

पृष्ठ 204

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२०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * प्रियो हि यस्माद् अहम् आत्मा ज्ञानिनः अतः तस्य अहम् अत्यर्थं प्रियः । प्रसिद्धं हि लोके आत्मा प्रियो भवति इति । तस्माद् ज्ञानिनः आत्मत्वाद् वासुदेवः प्रियो भवति इत्यर्थः । स च ज्ञानी मम वासुदेवस्य आत्मा एव इति मम अत्यर्थं प्रियः ॥ १७ ॥

क्योंकि मैं ज्ञानीका आत्मा हूँ इसलिये उसको अत्यन्त प्रिय हूँ । संसारमें यह प्रसिद्ध ही है कि आत्मा ही प्रिय होता है । इसलिये ज्ञानीका आत्मा होनेके कारण भगवान् वासुदेव उसे अत्यन्त प्रिय होता है । यह अभिप्राय है । तथा वह ज्ञानी भी मुझ वासुदेवका आत्मा ही है, अतः वह मेरा अत्यन्त प्रिय है ॥ १७ ॥

न तर्हि आर्तादयः त्रयो वासुदेवस्य प्रियाः । न, किं तर्हि - -उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी आस्थितः स हि युक्तात्मा उदारा उत्कृष्टाः सर्व एव एते त्रयः अपि मम प्रिया एव इत्यर्थः । न हि कश्चिद् मद्भक्तो मम वासुदेवस्य अप्रियो भवति, ज्ञानी तु अत्यर्थं प्रियो भवति इति विशेषः । तत् कस्माद् इति आह-ज्ञानी तु आत्मा एव न अन्यो मत्त इति मे मम मतं निश्चयः । आस्थित आरोढुं प्रवृत्तः स ज्ञानी हि यस्माद् अहम् एव भगवान् वासुदेवो न अन्यः अस्मि इति एवं युक्तात्मा समाहितचित्तः सन् माम् एव परं ब्रह्म गन्तव्यम् अनुत्तमां गतिं गन्तुं प्रवृत्त इत्यर्थः ॥ १८ ॥

तो फिर क्या आर्त आदि तीन प्रकारके भक्त आप वासुदेवके प्रिय नहीं हैं? यह बात नहीं, तो क्या बात है?

त्वात्मैव मे मतम् ।

मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥

ये सभी भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ हैं । अर्थात् वे तीनों भी मेरे प्रिय ही हैं । क्योंकि मुझ वासुदेवको अपना | कोई भी भक्त अप्रिय नहीं होता, परंतु ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है इतनी विशेषता है I ऐसा क्यों है सो कहते हैं— ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, वह मुझसे अन्य नहीं है, यह मेरा निश्चय है, क्योंकि वह योगारूढ़ होनेके लिये प्रवृत्त हुआ ज्ञानी ' स्वयं मैं ही भगवान् वासुदेव हूँ, दूसरा नहीं ' ऐसा युक्तात्मा - समाहितचित्त होकर मुझ परम प्राप्तव्य गतिस्वरूप परब्रह्ममें ही आनेके लिये प्रवृत्त है ॥ १८ ॥

ज्ञानी पुनः अपि स्तूयते— फिर भी ज्ञानीकी स्तुति करते हैं-बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 205

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* शांकरभाष्य अध्याय ७ * २०५ बहूनां जन्मनां ज्ञानार्थसंस्कारार्जनाश्रयाणाम् अन्ते समाप्तौ ज्ञानवान् प्राप्तपरिपाकज्ञानो मां वासुदेवं प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्षतः प्रपद्यते । कथम्, वासुदेवः सर्वम् इति । य एवं सर्वात्मानं मां प्रतिपद्यते स महात्मा न तत्समः अन्यः अस्ति अधिको वा । अतः सुदुर्लभः स मनुष्याणां सहस्रेषु इति उक्तम् ॥ १ ९ ॥ ज्ञानप्राप्तिके लिये जिनमें संस्कारोंका संग्रह किया जाय ऐसे बहुत - से जन्मोंका अन्त — समाप्ति होनेपर ( अन्तिम जन्ममें ) परिपक्व ज्ञानको प्राप्त हुआ ज्ञानी अन्तरात्मारूप मुझ वासुदेवको ' सब कुछ वासुदेव ही है ' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त होता है । जो इस प्रकार सर्वात्मरूप मुझ परमात्माको प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त हो जाता है, वह महात्मा है; उसके समान या उससे अधिक और कोई नहीं है, अतः कहा है कि हजारों मनुष्योंमें भी ऐसा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १ ९ ॥ आत्मा एव सर्वं वासुदेव इति एवम् ‘ यह सर्व जगत् आत्मस्वरूप वासुदेव ही है ' इस अप्रतिपत्तौ कारणम् उच्यते— प्रकार न समझमें आनेका कारण बतलाते हैं- —

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।

तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥

कामैः तैः तैः पुत्रपशुस्वर्गादिविषयैः हृतज्ञाना अपहृतविवेकविज्ञानाः प्रपद्यन्ते अन्यदेवताः प्राप्नुवन्ति वासुदेवाद् आत्मनः अन्या देवताः तं तं नियमं देवताराधने प्रसिद्धो यो यो नियमः तं तम् आस्थाय आश्रित्य प्रकृत्या स्वभावेन जन्मान्तरार्जितसंस्कारविशेषेण नियता नियमिताः स्वया आत्मीयया ॥ २० ॥

पुत्र, पशु, स्वर्ग आदि भोगोंकी प्राप्तिविषयक नाना कामनाओंद्वारा जिनका विवेक- विज्ञान नष्ट हो चुका है वे लोग अपनी प्रकृतिसे अर्थात् जन्म - जन्मान्तरमें इकट्ठे किये हुए संस्कारोंके समुदायरूप स्वभावसे प्रेरित हुए अन्य देवताओंको अर्थात् आत्मस्वरूप मुझ वासुदेवसे भिन्न जो देवता हैं, उनको, उन्हींकी आराधनाके लिये जो - जो नियम प्रसिद्ध हैं उनका अवलम्बन करके भजते हैं अर्थात् उनकी शरण लेते हैं ॥ २० ॥

तेषां च कामिनाम् – उन कामी पुरुषोंमेंसे-यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥

यो यः कामी यां यां देवतातनुं श्रद्धया जो - जो सकाम भक्त जिस - जिस देवताके स्वरूपका संयुक्तो भक्तः च सन् अर्चितुं पूजयितुम् इच्छति, श्रद्धा और भक्तियुक्त होकर अर्चन - पूजन करना तस्य तस्य कामिनः अचलां स्थिरां श्रद्धां ताम् चाहता है, उस उस भक्तकी देवताविषयक उस एव विदधामि स्थिरीकरोमि । श्रद्धाको मैं अचल — स्थिर कर देता हूँ ।

पृष्ठ 206

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२०६ * श्रीमद्भगवद्गीता * यया एव पूर्वं प्रवृत्तः स्वभावतो यो यां अभिप्राय यह कि जो पुरुष पहले स्वभावसे ही प्रवृत्त हुआ जिस श्रद्धाद्वारा जिस देवताके स्वरूपका पूजन करना चाहता है ( उस पुरुषकी उसी श्रद्धाको

देवतातनुं श्रद्धया अर्चितुम् इच्छति इति ॥ २१ ॥ । मैं स्थिर कर देता हूँ ) ॥ २१ ॥

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्या राधनमीहते ।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥

स तया मद्विहितया श्रद्धया युक्तः सन् । तस्या देवतातन्वा राधनम् आराधनम् ईहते चेष्टते । लभते च ततः तस्या आराधिताया देवता-तन्वाः कामान् ईप्सितान् मया एव परमेश्वरेण सर्वज्ञेन कर्मफलविभागज्ञतया विहितान् निर्मितान् तान् हि यस्मात् ते भगवता विहिताः कामा: तस्मात् तान् अवश्यं लभते इत्यर्थः । हितान् इति पदच्छेदे हितत्वं कामानाम् उपचरितं कल्प्यं न हि कामा हिताः कस्यचित् ॥ २२ ॥

मेरे द्वारा स्थिर की हुई उस श्रद्धासे युक्त हुआ वह उसी देवताके स्वरूपकी सेवा - पूजा करनेमें तत्पर होता है । और उस आराधित देवविग्रहसे कर्म - फल - विभागके जाननेवाले मुझ सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा निश्चित किये हुए इष्ट भोगोंको प्राप्त करता है । वे भोग परमेश्वरद्वारा निश्चित किये होते हैं इसलिये वह उन्हें अवश्य पाता है, यह अभिप्राय है । यहाँपर यदि ' हितान् ' ऐसा पदच्छेद करें तो भोगोंमें जो ' हितत्व ' है उसको औपचारिक समझना चाहिये, क्योंकि वास्तवमें भोग किसीके लिये भी हितकर नहीं हो सकते ॥ २२ ॥

यस्माद् अन्तवत्साधनव्यापारा अविवेकिनः क्योंकि वे कामी और अविवेकी पुरुष विनाशशील कामिनः च ते अतः - साधनकी चेष्टा करनेवाले होते हैं, इसलिये-अन्तवत्तु फलं

फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥२३ ॥

अन्तवद् विनाशि तु फलं तेषां तद् भवति अल्पमेधसाम् अल्पप्रज्ञानाम्, देवान् देवयजो यान्ति देवान् यजन्ति इति देवयजः ते देवान् यान्ति । मद्भक्ता यान्ति माम् अपि । एवं समाने अपि आयासे माम् एव न प्रपद्यन्ते अनन्तफलाय अहो खलु कष्टं वर्तन्ते, इति अनुक्रोधं दर्शयति भगवान् ॥ २३ ॥

उन अल्पबुद्धिवालोंका वह फल नाशवान्– विनाशशील होता है । देवयाजी अर्थात् जो देवोंका पूजन करनेवाले हैं वे देवोंको पाते हैं और मेरे भक्त मुझको ही पाते हैं । अहो! बड़े दुःखकी बात है कि इस प्रकार समान परिश्रम होनेपर भी लोग अनन्त फलकी प्राप्तिके लिये केवल मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें नहीं आते । इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं ॥ २३ ॥

पृष्ठ 207

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* शांकरभाष्य अध्याय ७ * २०७ किन्निमित्तं माम् एव न प्रपद्यन्ते इति वे मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें क्यों नहीं आते, सो उच्यते- बतलाते हैं— अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो अव्यक्तम् अप्रकाशं व्यक्तिम् आपन्नं प्रकाशं गतम् इदानीं मन्यन्ते मां नित्यप्रसिद्धम् ईश्वरम् अपि सन्तम् अबुद्धयः अविवेकिनः परं भावं परमात्मस्वरूपम् अजानन्तः अविवेकिनो मम अव्ययं व्ययरहितम् अनुत्तमं निरतिशयं मदीयं भावम् अजानन्तो मन्यन्ते इत्यर्थः ॥ २४ ॥

ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥

मेरे अविनाशी निरतिशय परम भावको अर्थात् परमात्मस्वरूपको न जाननेवाले बुद्धिरहित- विवेक-हीन मनुष्य मुझको, यद्यपि मैं नित्य - - प्रसिद्ध सबका ईश्वर हूँ तो भी, ऐसा समझते हैं कि यह पहले प्रकट नहीं थे, अब प्रकट हुए हैं । अभिप्राय यह कि मेरे वास्तविक प्रभावको न समझनेके कारण वे ऐसा मानते हैं ॥ २४ ॥

तदीयम् अज्ञानं किन्निमित्तम् इति उच्यते- - उनका वह अज्ञान किस कारणसे है? सो

बतलाते हैं-नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥

न अहं प्रकाशः सर्वस्य लोकस्य केषाञ्चिद् । एव मद्भक्तानां प्रकाशः अहम् इति अभिप्रायः । योगमायासमावृतो योगो गुणानां युक्तिः घटनं सा एव माया योगमाया तया योगमायया समावृत्तः सञ्च्छन्न इत्यर्थः । अत एव मूढो लोकः अयं न अभिजानाति माम् अजम् अव्ययम् ॥ २५ ॥

तीनों गुणोंके मिश्रणका नाम योग है और वही माया है - उस योगमायासे आच्छादित हुआ मैं समस्त प्राणिसमुदायके लिये प्रकट नहीं रहता हूँ, अभिप्राय यह कि किन्हीं - किन्हीं भक्तोंके लिये ही मैं प्रकट होता हूँ । इसलिये यह मूढ़ जगत् ( प्राणिसमुदाय ) मुझ जन्मरहित अविनाशी परमात्माको नहीं जानता ॥ २५ ॥

यया योगमायया समावृतं मां लोको न जिस योगमायासे छिपे हुए मुझ परमात्माको अभिजानाति, न असौ योगमाया मदीया संसार नहीं जानता, वह योगमाया, मेरी ही होनेके सती मम ईश्वरस्य मायाविनो ज्ञानं प्रतिबधाति कारण मुझ मायापति ईश्वरके ज्ञानका प्रतिबन्ध नहीं कर सकती, जैसे कि अन्य मायावी ( बाजीगर ) यथा अन्यस्य अपि मायाविनो माया ज्ञानं पुरुषोंकी माया भी उनके ज्ञानको ( आच्छादित नहीं तद्वत् । यत एवम् अतः करती ) इसलिये -

पृष्ठ 208

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२०८ * श्रीमद्भगवद्गीता * वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां अहं तु वेद जाने समतीतानि समतिक्रान्तानि भूतानि वर्तमानानि च अर्जुन भविष्याणि च भूतानि वेद अहम्, मां तु वेद न कश्चन मद्भक्तं मच्छरणम् एकं मुक्त्वा मत्तत्त्ववेदनाभावाद् एव न मां भजते ॥ २६ ॥

तु वेद न कश्चन ॥२६ ॥

हे अर्जुन! जो पूर्वमें हो चुके हैं उन प्राणियोंको एवं जो वर्तमान हैं और जो भविष्यमें होनेवाले हैं उन सब भूतोंको मैं जानता हूँ । परंतु मेरे शरणागत भक्तको छोड़कर मुझे और कोई भी नहीं जानता और मेरे तत्त्वको न जाननेके कारण ही ( अन्य जन ) मुझे नहीं भजते ॥ २६ ॥

केन पुनः त्वत्तत्त्ववेदनप्रतिबन्धेन प्रतिबद्धानि आपका तत्त्व जाननेमें ऐसा कौन प्रतिबन्धक सन्ति जायमानानि सर्वभूतानि त्वां न विदन्ति है, जिससे मोहित हुए सभी उत्पत्तिशील प्राणी आपको नहीं जान पाते? यह जाननेकी इच्छा होनेपर इति अपेक्षायाम् इदम् आह— कहते हैं— इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे इच्छाद्वेषसमुत्थेन इच्छा च द्वेषः च इच्छाद्वेषौ ताभ्यां समुत्तिष्ठति इति इच्छाद्वेषसमुत्थः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन । केन इति विशेषापेक्षायाम् इदम् आह— द्वन्द्वमोहेन द्वन्द्वनिमित्तो मोहो द्वन्द्वमोहः तौ एव इच्छाद्वेषौ शीतोष्णवत् परस्परविरुद्धौ सुखदुःखतद्धेतुविषयौ यथाकालं सर्वभूतैः सम्बध्यमानौ द्वन्द्वशब्देन अभिधीयेते । तत्र यदा इच्छाद्वेषौ सुखदुःखतद्धेतुसम्प्राप्त्या लब्धात्मकौ भवतः तदा तौ सर्वभूतानां प्रज्ञायाः

स्ववशापादनद्वारेण परमार्थात्मतत्त्वविषय-ज्ञानोत्पत्तिबन्धकारणं मोहं जनयतः ।

यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥

इच्छा और द्वेष इन दोनोंसे जो उत्पन्न होता है उसका नाम इच्छाद्वेषसमुत्थ है, उससे ( प्राणी मोहित होते हैं । ) वह कौन है? ऐसी विशेष जिज्ञासा होनेपर यह कहते हैं-द्वन्द्वोंके निमित्तसे होनेवाला जो मोह है उस द्वन्द्व-मोहसे ( सब मोहित होते हैं ) । शीत और उष्णकी भाँति परस्परविरुद्ध ( स्वभाववाले ) और सुख - दुःख तथा उनके कारणोंमें रहनेवाले वे इच्छा और द्वेष ही यथासमय सब भूतप्राणियोंसे सम्बन्धयुक्त होकर द्वन्द्व नामसे कहे जाते हैं । सो ये इच्छा और द्वेष, जब इस प्रकार सुख - दुःख और उनके कारणकी प्राप्ति होनेपर प्रकट होते हैं, तब वे सब भूतोंकी बुद्धिको अपने वशमें करके परमार्थ - तत्त्वविषयक ज्ञानकी उत्पत्तिका प्रतिबन्ध करनेवाले मोहको उत्पन्न करते हैं ।

पृष्ठ 209

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* शांकरभाष्य अध्याय ७ * २० ९ न हि इच्छाद्वेषदोषवशीकृतचित्तस्य यथा-भूतार्थविषयज्ञानम् उत्पद्यते बहिः अपि किमु वक्तव्यं ताभ्याम् आविष्टबुद्धेः सम्मूढस्य प्रत्यगात्मनि बहुप्रतिबन्धे ज्ञानं च उत्पद्यते इति । अतः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत भरतान्वयज सर्वभूतानि सम्मोहितानि सन्ति सम्मोह सम्मूढतां सर्गे जन्मनि उत्पत्तिकाले इति एतद् यान्ति गच्छन्ति हे परन्तप । मोहवशानि एव सर्वभूतानि जायमानानि जायन्ते इति अभिप्रायः । यत एवम् अतः तेन द्वन्द्वमोहेन प्रतिबद्ध-प्रज्ञानानि सर्वभूतानि सम्मोहितानि माम् | आत्मभूतं न जानन्ति अत एव आत्मभावेन मां न भजन्ते ॥ २७ ॥

जिसका चित्त इच्छा - द्वेषरूप दोषोंके वशमें फँस रहा है, उसको बाहरी विषयोंके भी यथार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त नहीं होता, फिर उन दोनोंसे जिसकी बुद्धि आच्छादित हो रही है ऐसे मूढ़ पुरुषको अनेकों प्रतिबन्धोंवाले अन्तरात्माके सम्बन्धमें ज्ञान नहीं होता, इसमें तो कहना ही क्या है? इसलिये हे भारत! अर्थात् भरतवंशमें उत्पन्न अर्जुन! उस इच्छा - द्वेष - जन्य द्वन्द्व - निमित्तक मोहके द्वारा मोहित हुए समस्त प्राणी, हे परंतप! जन्मकालमें— उत्पन्न होते ही मूढभावमें फँस जाते हैं । अभिप्राय यह है कि उत्पत्तिशील समस्त प्राणी मोहके वशीभूत हुए ही उत्पन्न होते हैं । ऐसा होनेके कारण द्वन्द्वमोहसे जिनका ज्ञान प्रतिबद्ध हो गया है वे मोहित हुए समस्त प्राणी अपने आत्मारूप मुझ ( परमात्मा ) - को नहीं जानते और इसीलिये वे आत्मभावसे मुझे नहीं भजते ॥ २७ ॥

के पुनः अनेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ताः सन्तः तो फिर इस द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए ऐसे कौन - से त्वां विदित्वा यथाशास्त्रम् आत्मभावेन भजन्ते मनुष्य हैं जो आपको शास्त्रोक्त प्रकारसे आत्मभावसे भजते हैं? इस अपेक्षित अर्थको दिखानेके लिये इति अपेक्षितम् अर्थं दर्शयितुम् उच्यते— कहते हैं-येषां त्वन्तगतं त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥

येषां तु पुनः अन्तगतं समाप्तप्रायं क्षीणं पापं जनानां पुण्यकर्मणां पुण्यं कर्म येषां सत्त्वशुद्धिकारणं विद्यते ते पुण्यकर्माणः तेषां पुण्यकर्मणाम्, ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता यथोक्तेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ता भजन्ते मां परमात्मानं दृढव्रताः, एवम् एव परमार्थतत्त्वं न अन्यथा इति एवं निश्चितविज्ञाना दृढव्रता उच्यन्ते ॥ २८ ॥

जिन पुण्यकर्मा पुरुषोंके पापोंका लगभग अन्त हो गया होता है, अर्थात् जिनके कर्म पवित्र यानी अन्तःकरणकी शुद्धिके कारण होते हैं वे पुण्यकर्मा हैँ ऐसे उपर्युक्त द्वन्द्वमोहसे मुक्त हुए वे दृढ़व्रती पुरुष मुझ परमात्माको भजते हैं । ' परमार्थतत्त्व ठीक इसी प्रकार है, दूसरी प्रकार नहीं ' ऐसे निश्चित विज्ञानवाले पुरुष दृढ़व्रती कहे जाते हैं ॥ २८ ॥

पृष्ठ 210

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२१० * श्रीमद्भगवद्गीता * ते किमर्थं भजन्ते, इति उच्यते- ' वे किसलिये भजते हैं! सो कहते हैं—

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।

ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २ ९ ॥

जरामरणमोक्षाय जरामरणमोक्षार्थं मां परमेश्वरम् | जो पुरुष जरा और मृत्युसे छूटनेके लिये मुझ आश्रित्य मत्समाहितचित्ताः सन्तो यतन्ति प्रयतन्ते परमेश्वरका आश्रय लेकर अर्थात् मुझमें चित्तको समाहित करके प्रयत्न करते हैं, वे जो परब्रह्म है ये ते यद् ब्रह्म परं तद् विदुः कृत्स्नं समस्तम् उसको जानते हैं एवं समस्त अध्यात्म अर्थात् अध्यात्मं प्रत्यगात्मविषयं वस्तु तद् विदुः " कर्म च अन्तरात्मविषयक वस्तुको और अखिल समस्त कर्मको अखिलं समस्तं विदुः ॥ २ ९ ॥ भी जानते हैं ॥ २ ९ ॥

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।

प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥

साधिभूताधिदैवम् अधिभूतं च अधिदैवं च ( इसी प्रकार ) जो मनुष्य मुझ परमेश्वरको अधिभूताधिदैवं सह अधिभूताधिदैवेन साधिभूताधिदैव अर्थात् अधिभूत और अधिदैवके साधिभूताधिदैवं च मां ये विदुः साधियज्ञं च सहित जानते हैं एवं साधियज्ञ अर्थात् अधियज्ञके सह अधियज्ञेन साधियज्ञं ये विदुः प्रयाणकाले अपि च मरणकाले अपि च मां ते विदुः सहित भी जानते हैं वे निरुद्ध चित्त योगी लोग मरण-युक्तचेतसः समाहितचित्ता इति ॥ ३० ॥ कालमें भी मुझे यथावत् जानते हैं ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्म-पर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छंकर-भगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्ये ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥