श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 371–380

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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* शांकरभाष्य अध्याय १५ * ३७१ न एष दोषः अविद्याकृतोपाधिपरिच्छिन्न एकदेशः अंश इव कल्पितो यतः । दर्शितः च अयम् अर्थः क्षेत्राध्याये विस्तरशः । स च जीवो मदंशत्वेन कल्पितः कथं संसरति उत्क्रामति च इति उच्यते-मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि प्रकृतिस्थानि स्वस्थाने कर्णशष्कुल्यादौ प्रकृतौ स्थितानि कर्षति आकर्षति ॥ ७ ॥

उ ० – यह दोष नहीं है; क्योंकि अविद्याकृत उपाधिसे परिच्छिन्न, एकदेश ही अंशकी भाँति माना गया है । यह बात क्षेत्राध्यायमें विस्तारपूर्वक दिखलायी गयी है । वह मेरा अंशरूप माना हुआ जीव, संसारमें कैसे आता है और कैसे शरीर छोड़कर जाता है, सो बतलाते हैं— ( यह जीवात्मा ) मन जिनमें छठा है, ऐसी कर्णछिद्रादि अपने - अपने गोलकरूप प्रकृतियोंमें स्थित हुई, श्रोत्रादि इन्द्रियोंको आकर्षित करता है ॥ ७ ॥

कस्मिन् काले-शरीरं यदवाप्नोति गृहीत्वैतानि संयाति यत् च अपि यदा च अपि उत्क्रामति ईश्वरो देहादिसङ्घातस्वामी जीवः तदा कर्षति इति

श्लोकस्य द्वितीयपादः अर्थवशात् प्राथम्येन

सम्बध्यते । यदा च पूर्वस्मात् शरीरात् शरीरान्तरम् अवाप्नोति तदा गृहीत्वा एतानि मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि संयाति सम्यग् याति गच्छति । किम् इव इति आह वायुः पवनो गन्धान् इव आशयात् पुष्पादेः ॥ ८ ॥

कानि पुनः तानि इति — श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च अधिष्ठाय मनश्चायं श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च त्वगिन्द्रियं रसनं । घ्राणम् एव च मन: च षष्ठं प्रत्येकम् इन्द्रियेण सह अधिष्ठाय देहस्थो विषयान् शब्दादीन् उपसेवते ॥ ९ ॥

किस कालमें ( आकर्षित करता है )?

यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।

वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥

जब यह देहादि - संघातका स्वामी जीवात्मा शरीरको छोड़कर जाता है, तब ( इनको ) आकर्षित करता है । पहले और इस श्लोकके अर्थकी संगतिके वशसे

श्लोकके दूसरे पादकी व्याख्या पहले की गयी है ।

तथा जब यह जीवात्मा, पहले शरीरसे ( निकलकर ) दूसरे शरीरको पाता है, तब मनसहित इन छ: इन्द्रियोंको साथ लेकर जाता है । कैसे लेकर जाता है? सो बतलाते हैं- जैसे वायु गन्धके स्थानोंसे यानी पुष्पादिसे गन्धको लेकर जाता है, वैसे ही ॥ ८ ॥

वे ( मनसहित छः इन्द्रियाँ ) कौन - सी हैं?

रसनं घ्राणमेव च ।

विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥

यह शरीरमें स्थित ( जीवात्मा ) श्रोत्र, चक्षु, त्वचा, रसना और नासिका इनमेंसे प्रत्येक इन्द्रियको और उसके साथ छठे मनको, आश्रय बनाकर, शब्दादि विषयोंका सेवन किया करता है ॥९ ॥

पृष्ठ 372

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३७२ * श्रीमद्भगवद्गीता * एवं देहगतं देहात्— | इस प्रकार इस देहधारी ( जीवात्मा ) - को शरीरसे -उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥

उत्क्रामन्तं परित्यजन्तं देहं पूर्वोपात्तं स्थितं वा देहे तिष्ठन्तं भुञ्जानं वा शब्दादीन् च उपलभमानं गुणान्वितं सुखदुःखमोहाख्यैः गुणैः अन्वितम् अनुगतं संयुक्तम् इत्यर्थः । एवम्भूतम् अपि एनम् अत्यन्तदर्शनगोचरप्राप्तं विमूढा दृष्टादृष्टविषयभोगबलाकृष्टचेतस्तया अनेकधा मूढा न अनुपश्यन्ति अहो कष्टं वर्तते इति अनुक्रोशति च भगवान् । ये तु पुनः प्रमाणजनितज्ञानचक्षुषः ते एनं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषो विविक्तदृष्टय इत्यर्थः ॥ १० ॥

उत्क्रमण करते हुएको अर्थात् पहले प्राप्त किये शरीरको छोड़कर जाते हुएको, अथवा शरीरमें स्थित रहते हुएको, या शब्दादि विषयोंका भोग करते हुएको, या सुख - दुःख - मोह आदि गुणोंसे युक्त हुएको भी, यानी इस प्रकार अत्यन्त दर्शनगोचर होते हुए भी इस आत्माको मूढ़ लोग, जो कि दृष्ट और अदृष्ट विषयभोगोंकी लालसाके बलसे चित्त आकृष्ट हो जानेके कारण अनेक प्रकारसे मोहित हो रहे हैं, नहीं देखते, अहो! यह बड़े दु: खकी बात है, इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं । परंतु जो प्रमाणजनित ज्ञाननेत्रोंसे युक्त हैं अर्थात् । विवेकदृष्टिवाले हैं, वे इसे देखते हैं ॥ १० ॥

केचित् तु– और कई एक-यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।

यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥

यतन्त: प्रयत्नं कुर्वन्तो योगिनः च समाहितचित्ता एनं प्रकृतम् आत्मानं पश्यन्ति अयम् अहम् अस्मि इति उपलभन्ते आत्मनि स्वस्यां बुद्धौ अवस्थितम् । यतन्तः अपि शास्त्रादिप्रमाणैः अकृतात्मानः असंस्कृतात्मानः तपसा तपसा इन्द्रियजयेन इन्द्रियजयेन च दुश्चरिताद् अनुपरता अशान्तदर्पात्मानः प्रयत्नं कुर्वन्तः अपि न एनं पश्यन्ति अचेतसः अविवेकिनः ॥ ११ ॥

प्रयत्न करनेवाले, समाहितचित्त योगीजन, इस आत्माको, जिसका कि प्रकरण चल रहा है, अपने अन्तःकरणमें स्थित देखते हैं अर्थात् ' यही मैं हूँ ' इस प्रकार आत्मस्वरूपका साक्षात् किया करते हैं । परंतु जिन्होंने तप और इन्द्रियजय आदि साधनोंद्वारा अपने अन्तःकरणका संस्कार नहीं किया है, जो बुरे आचरणोंसे उपराम नहीं हुए हैं, जो अशान्त और घमण्डी हैं, वे अविवेकी पुरुष, शास्त्रादिके प्रमाणोंसे प्रयत्न करते हुए भी, इस आत्माको नहीं देख पाते ॥ ११ ॥

पृष्ठ 373

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* शांकरभाष्य अध्याय १५ * ३७३ यत् पदं सर्वस्य अवभासकम् अपि अग्न्यादित्यादिकं ज्योतिः न अवभासयते, यत्प्राप्ताः च मुमुक्षवः पुनः संसाराभिमुखा न निवर्तन्ते, यस्य च पदस्य उपाधिभेदम् अनुविधीयमाना जीवा घटाकाशादय इव आकाशस्य अंशाः, तस्य पदस्य सर्वात्मत्वं सर्वव्यवहारास्पदत्वं च विवक्षुः चतुर्भिः

श्लोकैः विभूतिसङ्केपम् आह भगवान्–

सबको प्रकाशित करनेवाली अग्नि, सूर्य आदि ज्योतियाँ भी जिस परमपदको प्रकाशित नहीं कर सकतीं, जिस परमपदको प्राप्त हुए मुमुक्षुजन फिर संसारकी ओर नहीं लौटते, जैसे घट आदिके आकाश महाकाशके अंश हैं, वैसे ही उपाधिजनित भेदसे विभिन्न हुए जीव, जिस परमपदके ( कल्पित - भावसे ) अंश हैं, उस परमपदका, सर्वात्मत्व और समस्त व्यवहारका आधारत्व बतलानेकी इच्छासे भगवान् चार श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे विभूतियोंका वर्णन

करते हैं-यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।

यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१२ ॥

यद् आदित्यगतम् आदित्याश्रयं किं तत्, तेजो दीप्तिः प्रकाशो जगद् भासयते प्रकाशयति अखिलं समस्तम्, यत् चन्द्रमसि शशभृति तेजः अवभासकं वर्तते, यत् च अग्नौ हुतवहे तत् तेजो विद्धि विजानीहि मामकं मदीयं मम विष्णोः तद् ज्योतिः । अथवा यद् आदित्यगतं तेजः चैतन्यात्मकं ज्योतिः यत् चन्द्रमसि यत् च अग्नौ तत् तेजो विद्धि मामकं मदीयं मम विष्णोः तद् ज्योतिः । ननु स्थावरेषु जङ्गमेषु च तत् समानं चैतन्यात्मकं ज्योतिः तत्र कथम् इदं विशेषणं यद् आदित्यगतम् इत्यादि । न एष दोषः सत्त्वाधिक्याद आधिक्योप-पत्तेः । आदित्यादिषु हि सत्त्वम् अत्यन्त-प्रकाशम् अत्यन्तभास्वरम् अतः तत्र एव आविस्तरं ज्योतिः इति तद् विशिष्यते, न तु तत्र एव तद् अधिकम् इति । जो तेज - दीप्ति - प्रकाश सूर्यमें स्थित हुआ अर्थात् सूर्यके आश्रित हुआ समस्त जगत्को प्रकाशित करता है, जो प्रकाश करनेवाला तेज शशाङ्क – चन्द्रमामें स्थित है और जो अग्निमें वर्तमान है, उस तेजको तू मुझ विष्णुकी अपनी ज्योति समझ । अथवा जो तेज यानी चैतन्यमय ज्योति, सूर्यमें स्थित है, तथा जो चन्द्रमा और अग्निमें स्थित है, उस तेजको तू मुझ विष्णुकी स्वकीय ( चेतनमयी ) ज्योति समझ । पू ० — वह चेतनमयी ज्योति तो चराचर, सभी पदार्थोंमें समानभावसे स्थित है, फिर यह विशेषता कैसे बतलायी कि ' जो तेज सूर्यमें स्थित हैं ' इत्यादि । उ ० — सत्त्व — स्वच्छताकी अधिकतासे उनमें अधिकता सम्भव होनेके कारण यह दोष नहीं है; क्योंकि सूर्य आदिमें सत्त्व - अत्यन्त प्रकाश अत्यन्त स्वच्छता है, अत: उनमें ही ब्रह्मज्योति अत्यन्त प्रत्यक्ष प्रतिभासित होती है. इसीसे उनकी विशेषता बतलायी गयी है । यह बात नहीं कि वहीं कुछ ब्रह्मज्योति अधिक है ।

पृष्ठ 374

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३७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * यथा हि लोके तुल्ये अपि मुखसंस्थाने न जैसे संसारमें देखा जाता है कि समान भावसे सम्मुख – सामने स्थित होनेपर भी, काष्ठ या भित्ति काष्ठकुड्यादौ मुखम् आविर्भवति आदर्शादौ तु आदिमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं दीखता, पर दर्पण स्वच्छे स्वच्छतरे च तारतम्येन आविर्भवति आदि पदार्थमें, जो जितना स्वच्छ और स्वच्छतर होता है उसमें उसी तारतम्यसे, स्वच्छ और स्वच्छतर तद्वत् ॥ १२ ॥ दीखता है, वैसे ही ( इस विषय में समझो ) ॥ १२ ॥

किं च- तथा—

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१३ ॥

गां पृथिवीम् आविश्य प्रविश्य धारयामि भूतानि जगद् अहम् ओजसा बलेन यद् बलं कामरागविवर्जितम् ऐश्वरं जगद्विधारणाय पृथिव्यां प्रविष्टं येन गुर्वी पृथिवी न अधः पतति न विदीर्यते च । तथा च मन्त्रवर्णः - ' येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा ' ( तै ० सं ० ४। १ । ८ ) इति । स दाधार पृथिवीम् ' ( तै ० सं ० ४। १ । ८ ) इत्यादिः च । अतो गाम् आविश्य च भूतानि चराचराणि धारयामि इति युक्तम् उक्तम् । किं च पृथिव्यां जाता ओषधीः सर्वा व्रीहियवाद्याः पुष्णामि पुष्टिमती रसस्वादुमतीः च करोमि सोमो भूत्वा रसात्मकः सोमः सर्व-रसात्मको रसस्वभावः सर्वरसानाम् आकरः सोमः स हि सर्वा ओषधीः स्वात्मरसानुप्रवेशेन पुष्णाति ॥ १३ ॥

मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर अपने उस बलसे, जो कि कामना और आसक्तिसे रहित मेरा ऐश्वर्य - बल जगत्को धारण करनेके लिये पृथिवीमें प्रविष्ट है, जिस बलके कारण भारवती पृथिवी नीचे नहीं गिरती और फटती भी नहीं, सारे जगत्‌को धारण करता हूँ । यही बात वेदमन्त्र भी कहते हैं कि ' जिससे द्युलोक और भारवती पृथिवी दृढ़ है ' तथा ' वह पृथिवीको धारण करता है ' इत्यादि । अतः यह कहना ठीक ही है कि मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर चराचर समस्त भूतप्राणियोंको धारण करता हूँ । तथा मैं ही रसस्वरूप चन्द्रमा होकर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाली धान, जौ आदि समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ अर्थात् उनको पुष्ट और स्वादयुक्त किया करता हूँ । जो सब रसोंका आत्मा है, रस ही जिसका स्वभाव है, जो समस्त रसोंकी खानि है वह सोम है, वही अपने रसका सञ्चार करके समस्त वनस्पतियोंका पोषण किया करता है ॥१३ ॥

किं च- तथा—

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१४ ॥

पृष्ठ 375

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* शांकरभाष्य अध्याय १५ * ३७५ अहम् एव वैश्वानर उदरस्थः अग्निः भूत्वा ' अयम् अग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते ' ( बृह ० उ ० ५ । ९ । १ ) इत्यादिश्रुते: वैश्वानरः सन् प्राणिनां प्राणवतां देहम् आश्रितः प्रविष्टः प्राणापानसमायुक्तः प्राणापानाभ्यां समायुक्तः संयुक्तः पचामि पक्तिं करोमि चतुर्विधं चतुष्प्रकारम् अन्नम् अशनं भोज्यं भक्ष्यं चोष्यं लेह्यं च । भोक्ता वैश्वानरः अग्निः भोज्यम् अन्नं सोमः तद् एतद् उभयम् अग्नीषोमौ सर्वम् इति पश्यतः अन्नदोषलेपो न भवति ॥ १४ ॥

मैं ही, पेटमें रहनेवाला जठराग्नि होकर अर्थात् ' यह अग्नि वैश्वानर है जो कि पुरुषके भीतर स्थित है और जिससे यह ( खाया हुआ ) अन्न पचता है ' इत्यादि श्रुतियोंसे जिसका वर्णन किया गया है, वह वैश्वानर होकर, प्राणियोंके शरीरमें स्थित – प्रविष्ट होकर प्राण और अपानवायुसे संयुक्त हुआ भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य - ऐसे चार प्रकारके अन्नोंको पचाता हूँ । वैश्वानर अग्नि खानेवाला है और सोम खाया जानेवाला अन्न है । सुतरां यह सारा जगत् अग्नि और सोमस्वरूप है, इस प्रकार देखनेवाला मनुष्य अन्नके दोषसे लिप्त नहीं होता ॥ १४ ॥

किं च- तथा—

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५ ॥

सर्वस्य प्राणिजातस्य अहम् आत्मा सन् हृदि बुद्धौ सन्निविष्टः अतो मत्त आत्मनः सर्वप्राणिनां स्मृतिः ज्ञानं तदपोहनं च । येषां पुण्यकर्मिणां पुण्यकर्मानुरोधेन ज्ञानस्मृती भवतः तथा पापकर्मिणां पापकर्मानुरूपेण स्मृतिज्ञानयोः अपोहनं च अपायनम् अपगमनं च । वेदैः च सर्वैः अहम् एव परमात्मा वेद्यो वेदितव्यो वेदान्तकृद् वेदान्तार्थसम्प्रदायकृद् इत्यर्थः । वेदविद् वेदार्थविद् एव च अहम् ॥ १५ ॥ ।

मैं समस्त प्राणिमात्रका आत्मा होकर उनके अन्तःकरणमें स्थित हूँ । इसलिये समस्त प्राणियोंके स्मृति, ज्ञान और उनका लोप भी मुझ आत्मासे ही किया जाता है, अर्थात् जिन पुण्यकर्मा प्राणियोंको उनके पुण्यकर्मोंके अनुसार ज्ञान और स्मृति प्राप्त होते हैं तथा जिन पापाचारियोंके ज्ञान और स्मृतिका उनके पापकर्मानुसार लोप होता है ( वह मुझसे ही होता है ) । समस्त वेदोंद्वारा मैं परमात्मा ही जाननेयोग्य हूँ । तथा वेदान्तका कर्ता, अर्थात् वेदान्तार्थके सम्प्रदायका कर्ता और वेदके अर्थको समझनेवाला भी मैं ही हूँ ॥ १५ ॥

भगवत ईश्वरस्य नारायणाख्यस्य विभूति - ' यदादित्यगतं तेजः ' इत्यादि चार श्लोकोंद्वारा सङ्क्षेप उक्तो विशिष्टोपाधिकृतो ' यदादित्यगतं नारायण नामक भगवान् ईश्वरकी, विशेष - उत्तम तेज: ' इत्यादिना । उपाधियोंसे होनेवाली विभूतियाँ संक्षेपसे कही गयीं ।

पृष्ठ 376

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३७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * अथ अधुना तस्य एव क्षराक्षरोपाधि-प्रविभक्ततया निरुपाधिकस्य केवलस्य स्वरूप-निर्दिधारयिषया उत्तरश्लोका आरभ्यन्ते । तत्र सर्वम् एव अतीतानागतानन्तराध्यायार्थजातं त्रिधा राशीकृत्य आह— अब, क्षर और अक्षर – इन दोनों उपाधियोंसे अलग बतलाकर, उसी उपाधिरहित शुद्ध परमात्माके स्वरूपका निश्चय करनेकी इच्छासे अगले श्लोकोंका आरम्भ किया जाता । उनमें पहलेके और आगे आनेवाले सभी अध्यायोंके समस्त अभिप्रायको तीन भेदोंमें विभक्त करके कहते हैं-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर

क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥

द्वौ इमौ पृथग् राशीकृतौ पुरुषौ इति उच्येते लोके संसारे क्षरः च क्षरति इति क्षरो विनाशी एको राशिः अपरः पुरुषः अक्षरः तद्विपरीतो भगवतो मायाशक्तिः क्षराख्यस्य पुरुषस्य उत्पत्तिबीजम् अनेकसंसारिजन्तुकामकर्मादि-संस्काराश्रयः अक्षरः पुरुष उच्यते । कौ तौ पुरुषौ इति आह स्वयम् एव भगवान् -समुदायरूपसे पृथक् किये हुए ये दो भाव संसारमें पुरुष नामसे कहे जाते हैं । इनमेंसे एक समुदाय क्षीण होनेवाला - नाशवान् क्षर पुरुष है और दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है, जो कि भगवान्‌की मायाशक्ति है, क्षर पुरुषकी उत्पत्तिका बीज है तथा अनेक संसारी जीवोंकी कामना और कर्म आदिके संस्कारोंका आश्रय है, वह अक्षर पुरुष कहलाता है । वे दोनों पुरुष कौन हैं? सो भगवान् स्वयं ही बतलाते हैं— क्षरः सर्वाणि भूतानि समस्तं विकारजातम् समस्त भूत अर्थात् प्रकृतिका सारा विकार तो क्षर इत्यर्थः । कूटस्थः कूटो राशी राशिः इव स्थितः अथवा कूटो माया वञ्चना जिह्मता कुटिलता इति पर्याया अनेकमायादिप्रकारेण स्थितः कूटस्थः संसारबीजानन्त्याद् न क्षरति इति अक्षर उच्यते ॥ १६ ॥

पुरुष है और कूटस्थ अर्थात् जो कूट- राशिकी भाँति स्थित है अथवा कूट नाम मायाका है जिसके वञ्चना, छल, कुटिलता आदि पर्याय हैं, उपर्युक्त माया आदि अनेक प्रकारसे जो स्थित है, वह कूटस्थ है । संसारका बीज, अन्तरहित होनेके कारण वह कूटस्थ नष्ट नहीं होता, अतः अक्षर कहा जाता है ॥ १६ ॥

आभ्यां क्षराक्षराभ्यां विलक्षणः क्षराक्षरोपाधि- तथा जो क्षर और अक्षर - इन दोनोंसे विलक्षण द्वयदोषेण अस्पृष्टो नित्यशुद्धबुद्धमुक्त है और क्षर - अक्षररूप दोनों उपाधियोंके दोषसे रहित स्वभावः है वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाववाला—

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥

पृष्ठ 377

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* शांकरभाष्य अध्याय १५ * ३७७ उत्तम उत्कृष्टतमः पुरुषः तु अन्यः अत्यन्त-विलक्षण आभ्यां परमात्मा इति परमः च असौ देहाद्यविद्याकृतात्मभ्य आत्मा च सर्वभूतानां प्रत्यक्चेतन इत्यतः परमात्मा इति उदाहृत उक्तो वेदान्तेषु । स एव विशेष्यते— यो लोकत्रयं भूर्भुवः स्वराख्यं स्वकीयया चैतन्यबलशक्त्या आविश्य प्रविश्य बिभर्ति स्वरूपसद्भावमात्रेण बिभर्ति धारयति अव्ययो न अस्य व्ययो विद्यते इति अव्यय ईश्वरः सर्वज्ञो नारायणाख्य ईशनशीलः ॥ १७ ॥

उत्तम — अतिशय उत्कृष्ट पुरुष तो अन्य ही है । अर्थात् इन दोनोंसे अत्यन्त विलक्षण है, जो कि परमात्मा नामसे कहा गया है । वह ईश्वर अविद्याजनित शरीरादि आत्माओंकी अपेक्षा पर है और सब प्राणियोंका आत्मा यानी अन्तरात्मा है, इस कारण वेदान्तवाक्योंमें वह ‘ परमात्मा ' नामसे कहा गया है । उसीका विशेषरूपसे निरूपण करते हैं— जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग - इन तीनों लोकोंको, अपने चैतन्य - बलकी शक्तिसे उनमें प्रविष्ट होकर, केवल स्वरूप - सत्तामात्रसे उनको धारण करता है और जो अविनाशी ईश्वर है, अर्थात् जिसका कभी नाश न हो, ऐसा नारायण नामक सर्वज्ञ और सबका शासन करनेवाला है ॥ १७ ॥

यथा व्याख्यातस्य ईश्वरस्य पुरुषोत्तम इति उपर्युक्त ईश्वरका ‘ पुरुषोत्तम ' यह नाम प्रसिद्ध है, एतद् नाम प्रसिद्धं तस्य नामनिर्वचनप्रसिद्धया उसका यह नाम किस कारणसे हुआ? इसकी हेतुसहित उपपत्ति बतलाकर, नामकी सार्थकता दिखलाते अर्थवत्त्वं नाम्नो दर्शयन् निरतिशयः अहम् ईश्वर हुए भगवान् अपने स्वरूपको प्रकट करते हैं कि ‘ मैं इति आत्मानं दर्शयति भगवान्– निरतिशय ईश्वर हूँ ' -यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च यस्मात् क्षरम् अतीतः अहं संसारमायावृक्षम् अश्वत्थाख्यम् अतिक्रान्तः अहम् अक्षराद् अपि संसारवृक्षबीजभूताद् अपि च उत्तम उत्कृष्टतम ऊर्ध्वतमो वा, अतः क्षराक्षराभ्याम् उत्तमत्वाद् अस्मि भवामि लोके वेदे च प्रथितः प्रख्यातः पुरुषोत्तम इति एवं मां भक्तजना विदुः कवयः काव्यादिषु च इदं नाम निबध्नन्ति पुरुषोत्तम इति अनेन अभिधानेन अभिगृणन्ति ॥ १८ ॥

प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥

क्योंकि मैं क्षरभावसे अतीत हूँ अर्थात् अश्वत्थ नामक मायामय संसारवृक्षका अतिक्रमण किये हुए हूँ और संसारवृक्षके बीजस्वरूप अक्षरसे ( मूल प्रकृतिसे ) भी उत्तम - अतिशय उत्कृष्ट अथवा अतिशय उच्च हूँ । इसीलिये अर्थात् क्षर और अक्षरसे उत्तम होनेके कारण लोक और वेदमें मैं पुरुषोत्तम नामसे विख्यात हूँ । भक्तजन मुझे इसी प्रकार जानते हैं और कविजन भी काव्यादिमें इसी नामका प्रयोग करते हैं अर्थात् ' पुरुषोत्तम ' इसी नामसे ही मेरा वर्णन करते हैं ॥ १८ ॥

पृष्ठ 378

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३७८ * श्रीमद्भगवद्गीता * अथ इदानीं यथा निरुक्तम् आत्मानं यो वेद अब इस प्रकार बतलाये हुए आत्मतत्त्वको जो तस्य इदं फलम् उच्यते- जानता है उसके लिये यह फल बतलाया जाता है— यो मामेवमसम्मूढो जानाति जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां यो माम् ईश्वरं यथोक्तविशेषणम् एवं यथोक्तेन प्रकारेण असम्मूढः सम्मोहवर्जितः सन् जानाति अयम् अहम् अस्मि इति पुरुषोत्तमं स सर्ववित् सर्वात्मना सर्वं वेत्ति इति सर्वज्ञः सर्वभूतस्थं भजति मां सर्वभावेन सर्वात्मचित्ततया हे भारत ॥ १ ९ ॥ सर्वभावेन भारत ॥ १ ९ ॥ | जो कोई अज्ञानसे रहित हुआ पुरुष, उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त मुझ पुरुषोत्तम ईश्वरको, ऊपर कहे हुए प्रकारसे यह जानता है कि ' यह ( पुरुषोत्तम ) मैं हूँ, वह सर्वज्ञ है — वह सर्वात्मभावसे सबको जानता है, अतः सर्वज्ञ है और हे भारत! ( वह ) सब भूतों में स्थित मुझ परमात्माको ही सर्वभावसे- सबका आत्मा समझकर भजता है ॥ १ ९ ॥ अस्मिन् अध्याये भगवत्तत्त्वज्ञानं मोक्षफलम् इस अध्यायमें मोक्षरूप फलके देनेवाले भगवत्-उक्त्वा अथ इदानीं तत् स्तौति- तत्त्वज्ञानको कहकर अब उसकी स्तुति करते हैं—

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।

एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥२० ॥

इति एतद् गुह्यतमं गोप्यतमम् अत्यन्तरहस्यम् इति एतत् । किं तत् शास्त्रम् । यद्यपि गीताख्यं समस्तं शास्त्रम् उच्यते तथापि अयम् एव अध्याय इह शास्त्रम् इति उच्यते स्तुत्यर्थं प्रकरणात् । सर्वो हि गीताशास्त्रार्थः अस्मिन् अध्याये समासेन उक्तो न केवलं सर्वः च वेदार्थ इह परिसमाप्तो ' यस्तं वेद स वेदवित् ' ‘ वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ' इति च उक्तम् । इदम् उक्तं कथितं मया हे अनघ अपाप । एतत् शास्त्रं यथादर्शितार्थं बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्याद् भवेद् न अन्यथा कृतकृत्यः च भारत । यह गुह्यतम - सबसे अधिक गोपनीय अर्थात् अत्यन्त गूढ़ रहस्य है । वह क्या है? शास्त्र । यद्यपि सारी गीताका नाम ही शास्त्र कहा जाता है, परंतु यहाँ स्तुतिके लिये प्रकरणसे यह ( पंद्रहवाँ ) अध्याय ही ‘ शास्त्र ' नामसे कहा गया है । क्योंकि इस अध्यायमें केवल सारे गीताशास्त्रका अर्थ ही संक्षेपसे नहीं कहा गया है, किंतु इसमें समस्त वेदोंका अर्थ भी समाप्त हो गया है । यह कहा भी है कि ‘ जो उसे जानता है वही वेदको जाननेवाला है ' ' समस्त वेदोंसे मैं ही जाननेयोग्य हूँ । ' हे निष्पाप अर्जुन! ऐसा यह ( परम गोपनीय शास्त्र ) मैंने कहा है । हे भारत! ऊपर दिखलाये हुए अर्थसे युक्त इस शास्त्रको जानकर ही, मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है, अन्य प्रकारसे नहीं ।

पृष्ठ 379

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* शांकरभाष्य अध्याय १५ * ३७ ९ कृतं कृत्यं कर्तव्यं येन स कृतकृत्यो विशिष्टजन्मप्रसूतेन ब्राह्मणेन यत् कर्तव्यं तत् सर्वं भगवत्तत्त्वे विदिते कृतं भवेद् इत्यर्थः । न च अन्यथा कर्तव्यं परिसमाप्यते कस्यचिद् इति अभिप्रायः । ‘ सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ' इति च उक्तम् । ' एतद्धि जन्मसामग्र्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः । प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ ' ( मनुस्मृति १२ । ९ ३ ) इति च मानवं वचनम् । यत एतत् परमार्थतत्त्वं मत्तः श्रुतवान् असि ततः कृतार्थः त्वं भारत इति ॥ २० ॥

अभिप्राय यह है कि जिसने करनेयोग्य सब कुछ कर लिया हो, वह कृतकृत्य है, अतः श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेनेवाले ब्राह्मणद्वारा जो कुछ किया जानेयोग्य है, वह सब भगवान्का तत्त्व जान लेनेपर किया हुआ हो जाता है । अन्य प्रकारसे किसीके भी कर्तव्यकी समाप्ति नहीं होती । कहा भी है कि ' हे पार्थ! समस्त कर्म समुदाय, ज्ञानमें सर्वथा समाप्त हो जाता है । ' तथा मनुका भी वचन है कि ' विशेषरूपसे ब्राह्मणके जन्मकी यही पूर्णता है; क्योंकि इसीको प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य होता है अन्य प्रकारसे नहीं । ' हे भारत! क्योंकि तूने मुझसे यह परमार्थतत्त्व सुना है, इसलिये तू कृतार्थ हो गया है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकर-भगवतः कृतौ श्रीभगवद्गीताभाष्ये पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 380

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
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ॐ षोडशोऽध्यायः दैवी आसुरी राक्षसी च इति प्राणिनां प्रकृतयो नवमे अध्याये सूचिताः तासां विस्तरेण प्रदर्शनाय अभयं सत्त्वसंशुद्धिः इत्यादिः अध्याय आरभ्यते, तत्र संसारमोक्षाय दैवी प्रकृति: निबन्धनाय आसुरी राक्षसी च इति दैव्या आदानाय प्रदर्शनं क्रियते इतरयोः परिवर्जनाय, श्रीभगवानुवाच-नवें अध्यायमें प्राणियोंकी दैवी, आसुरी और राक्षसी - – ये तीन प्रकारकी प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं । उन्हें विस्तारपूर्वक दिखानेके लिये ' अभयं सत्त्वसंशुद्धि: ' इत्यादि ( श्लोकोंसे युक्त सोलहवाँ ) अध्याय आरम्भ किया जाता है । उन तीनोंमें दैवी प्रकृति संसारसे मुक्त करनेवाली है, तथा आसुरी और राक्षसी प्रकृतियाँ बन्धन करनेवाली हैं, अत: यहाँ दैवी प्रकृति सम्पादन करनेके लिये और दूसरी दोनों त्यागनेके लिये दिखलायी जाती हैं-श्रीभगवान् बोले-अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥

अभयम् अभीरुता सत्त्वसंशुद्धिः सत्त्वस्य अन्तःकरणस्य संव्यवहारेषु परवञ्चनमायानृता-दिपरिवर्जनं शुद्धभावेन व्यवहार इत्यर्थः । ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ज्ञानं शास्त्रत आचार्यतः च आत्मादिपदार्थानाम् अवगमः अवगतानाम् इन्द्रियाद्युपसंहारेण एकाग्रतया स्वात्मसंवेद्यता-पादनं योगः तयोः ज्ञानयोगयोः व्यवस्थितिः व्यवस्थानं तन्निष्ठता एषा प्रधाना दैवी सात्त्विकी सम्पत् । यत्र च येषाम् अधिकृतानां या प्रकृतिः सम्भवति सात्त्विकी सा उच्यते-दानं यथाशक्ति संविभागः अन्नादीनाम् । अभय - निर्भयता, सत्त्वसंशुद्धि - अन्तः करणकी शुद्धि व्यवहारमें दूसरेके साथ ठगाई, कपट और झूठ आदि अवगुणोंको छोड़कर शुद्ध भावसे आचरण करना । ज्ञान और योगमें निरन्तर स्थिति - शास्त्र और आचार्यसे आत्मादि पदार्थोंको जानना ' ज्ञान ' है और उन जाने हुए पदार्थोंका इन्द्रियादिके निग्रहसे ( प्राप्त ) एकाग्रताद्वारा अपने आत्मामें प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना ' योग ' है । उन ज्ञान और योग दोनोंमें स्थिति अर्थात् स्थिर हो जाना - तन्मय हो जाना, यही प्रधान सात्त्विकी - दैवी संपद है । और भी जिन अधिकारियोंकी जिस विषयमें जो सात्त्विकी प्रकृति हो सकती है वह कही जाती है— दान — अपनी शक्तिके अनुसार अन्नादि वस्तुओंका विभाग करना ।