श्रीगणेशाय नमः।
लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 311–320
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप
आकाशं शब्दमात्रं च स्पर्शमात्रं समाविशत् ।
द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत् ॥ ४३
रूपं तथैव विशतः शब्दस्पर्शगुणावुभौ ।
त्रिगुणस्तु ततस्त्वग्निः सशब्दस्पर्शरूपवान् ॥ ४४
सशब्दस्पर्शरूपं च रसमात्रं समाविशत् ।
तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः ॥ ४५
शब्दस्पर्शं च रूपं च रसो वै गन्धमाविशत् ।
सङ्गता गन्धमात्रेण आविशन्तो महीमिमाम् ॥ ४६
तस्मात्पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शस्यते ।
शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ॥ ४७
परस्परानुप्रवेशाद्धारयन्ति परस्परम् ।
भूमेरन्तस्त्विदं सर्वं लोकालोकाचलावृतम् ॥ ४८
विशेषाश्चेन्द्रियग्राह्या नियतत्वाच्च ते स्मृताः ।
गुणं पूर्वस्य सर्गस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तराः ॥ ४ ९
तेषां यावच्च तद्यच्च यच्च तावद् गुणं स्मृतम् ।
उपलभ्याप्सु वै गन्धं केचिद् ब्रूयुरपां गुणम् ॥ ५०
पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रयात् ।
एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात् ॥ ५१
पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च ।
महादयो विशेषान्ता ह्यण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ५२
एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत् ।
विशेषेभ्योऽण्डमभवन्महत्तदुदकेशयम् ॥५३
अद्भिर्दशगुणाभिस्तु बाह्यतोऽण्डं समावृतम् ।
आपो दशगुणेनैतास्तेजसा बाह्यतो वृताः ॥ ५४
तेजो दशगुणेनैव वायुना बाह्यतो वृतम् ।
वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः ॥ ५५
आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम् ।
भूतादिर्महता चापि अव्यक्तेनावृतो महान् ॥ ५६
" सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३० ९ शब्दतन्मात्रावाला आकाश स्पर्शतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, अतः वायु शब्द तथा स्पर्शरूप दो गुणवाला हुआ । शब्द एवं स्पर्श – ये दोनों ही गुण रूपतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, अतः शब्द - स्पर्श - रूपयुक्त वह अग्नि तीन गुणोंवाला हुआ । शब्द - स्पर्श - रूपसहित अग्नि रसतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, इसलिये रसमय जलको चार गुणोंवाला जानना चाहिये । शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस — ये गन्धतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए । अतः गन्धतन्मात्राके साथ इस पृथ्वीमें इनके प्रवेश करनेपर पृथ्वी पाँच गुणोंवाली हुई, इसलिये यह स्थूलरूपा भूमि [ पाँचों ] भूतोंमें श्रेष्ठ कही जाती है । अतः [ अधिक गुणके कारण ] वे शब्द आदि गुण शान्त, घोर तथा मूढ़ तीन गुणवाले हैं; इसी कारणसे वे विशेष कहे गये हैं । परस्पर प्रवेश करनेके कारण वे एक-दूसरेको धारण करते हैं । भूमिके भीतर यह सब लोकालोकपर्वतसे आवृत है ॥ ४३–४८ ॥ वे विशेष ( शब्द आदि ) नियतत्वके कारण इन्द्रिय- ग्राह्य कहे गये हैं । सर्ग ( आकाश आदि ) -गुणको उत्तरोत्तर वायु आदि प्राप्त करते हैं । उन शब्द आदिमें जितनी मात्रामें जो गुण होता है, उतनी ही मात्रामें उसे कहा गया है । जलमें गन्धका अनुभव होनेपर कुछ लोग कहते हैं कि यह जलका गुण है । पृथ्वीमें उस गन्धको जल तथा वायुके संयोगसे जानना चाहिये । महान् आत्मावाले ये सातों [ महत्तत्त्व, अहंकार, शब्द आदि पाँच गुण ] एक- दूसरेके आश्रयसे रहते हैं । महत्तत्त्वसे लेकर [ शब्द आदि ] विशेषतक पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण तथा अव्यक्त [ परमेश्वर ] - के अनुग्रहसे ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं ॥ ४ ९ – ५२ ॥ जलमें बुलबुलेकी भाँति एक विशाल अण्ड उन विशेषों ( शब्द आदि ) - से एक ही बारमें उत्पन्न हुआ; वह जलमें स्थित था । वह अण्ड [ अपनेसे ] दस गुना विस्तारवाले जलसे बाहरसे घिरा था; यह जल दस गुना विस्तारवाले तेज ( अग्नि ) - से बाहरसे घिरा था, तेज दस गुना विस्तारवाले वायुसे बाहरसे घिरा था और वायु भी दस गुना विस्तारवाले आकाशसे बाहरसे | घिरा था, जिस आकाशसे वायु आवृत था, वह आकाश
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३१० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग शर्वश्चाण्डकपालस्थो भवश्चाम्भसि सुव्रताः । भूत आदिसे घिरा था । भूत आदि महत्तत्त्वसे घिरे थे और रुद्रोऽग्निमध्ये भगवानुग्रो वायौ पुनः स्मृतः भीमश्चावनिमध्यस्थो ह्यहङ्कारे महेश्वरः बुद्धौ च भगवानीशः सर्वतः परमेश्वरः एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् एता आवृत्य चान्योन्यमष्टौ प्रकृतयः स्थिताः प्रसर्गकाले स्थित्वा तु ग्रसन्त्येताः परस्परम् एवं परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिषु महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम् अण्डाज्जज्ञे स एवेशः पुरुषोऽर्कसमप्रभः तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धं स्वेच्छयैव तु स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते तस्य वामाङ्गजो विष्णुः सर्वदेवनमस्कृतः लक्ष्म्या देव्या ह्यभूद्देव इच्छया परमेष्ठिनः । दक्षिणाङ्गभवो ब्रह्मा सरस्वत्या जगद्गुरुः
तस्मिन्नण्डे इमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् ।
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥
लोकालोकद्वयं किञ्चिदण्डे ह्यस्मिन् समर्पितम् ।
यत्तु सृष्टौ प्रसंख्यातं मया कालान्तरं द्विजाः ॥
एतत्कालान्तरं ज्ञेयमहर्वै पारमेश्वरम् ।
रात्रिश्चैतावती ज्ञेया परमेशस्य कृत्स्नशः ॥
अहस्तस्य तु या सृष्टिः रात्रिश्च प्रलयः स्मृतः ।
नाहस्तु विद्यते तस्य न रात्रिरिति धारयेत् ॥
उपचारस्तु क्रियते लोकानां हितकाम्यया ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च ॥
॥ ५७ महत्तत्त्व [ उस ] अव्यक्तसे घिरा था॥५३–५६ ॥
हे सुव्रतो! शर्व [ उस ] अण्डके कपाल पर स्थित । हैं और भव जलमें स्थित हैं; रुद्र अग्निमें तथा भगवान् ॥ ५८ उग्र वायुमें [ स्थित ] कहे गये हैं; भीम पृथ्वीके | मध्यमें स्थित हैं, महेश्वर अहंकारमें स्थित हैं, भगवान् । ईश बुद्धिमें स्थित हैं और परमेश्वर सर्वत्र स्थित ॥ ५ ९ हैं ॥ ५७-५८ ॥ । अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे आवृत है और ॥ ६० एक - दूसरेको आवृत करके ये आठ प्रकृतियाँ ( मूर्तियाँ ) स्थित हैं । इस प्रकार स्थित होकर ये प्रसर्गकालमें एक-। दूसरेको ग्रसती हैं और सृष्टिकालमें साथ - साथ उत्पन्न ॥ ६१ होकर एक- दूसरेको धारण करती हैं । वे विकार आधार - आधेयभावसे विकारियोंमें रहते हैं । महेश्वर । अव्यक्तसे परे हैं । अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न हुआ है । ॥ ६२ । सूर्यके समान प्रभावाले वे पुरुष परमेश्वर ही अण्डसे उत्पन्न हुए; उन पुरुषमें [ उत्पद्यमान ] सृष्टिका उत्पादन । अपनी इच्छासे हुआ । वे ही प्रथम शरीरधारी और वे ही ॥६३ पुरुष कहे जाते है । सभी देवताओंसे नमस्कृत [ भगवान् ] विष्णु देवी लक्ष्मीके साथ शिवकी इच्छासे उनके बायें ॥ ६४ अंगसे उत्पन्न हुए और जगद्गुरु ब्रह्मा सरस्वतीके साथ [ उनके ] दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए ॥ ५ ९ - ६४ ॥ उस अण्डमें ये लोक और यह सम्पूर्ण जगत् ६५ स्थित है । नक्षत्रों, ग्रहों तथा वायुसहित सूर्य - चन्द्रमा भी इसीमें हैं । दोनों लोकालोक [ पर्वत ] तथा सब कुछ इस अण्डमें स्थित है । हे द्विजो! अब मैं सृष्टिमें कहे गये ६६ कालान्तरको बताता हूँ । इस कालान्तरको परमेश्वरका दिन जानना चाहिये और [ उन ] परमेश्वरकी पूर्णरूपसे उतने ही कालकी रात जाननी चाहिये । जो सृष्टि है, ६७ वही उनका दिन है और प्रलयकालको उनकी रात कहा गया है । ऐसा मानना चाहिये कि न तो उनका दिन है ६८ और न उनकी रात; [ केवल ] लोकोंके हितकी कामनासे [ उनके द्वारा ] रात - दिनका ऐसा उपचार किया जाता है ॥ ६५–६८९ / २ ॥ ६ ९ इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके विषय, पाँच महाभूत, सभी
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप " सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३११
तस्मात्सर्वाणि भूतानि बुद्धिश्च सह दैवतैः ।
अहस्तिष्ठन्ति सर्वाणि परमेशस्य धीमतः ॥ ७०
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अहरन्ते प्रलीयन्ते रात्र्यन्ते विश्वसम्भवः ।
स्वात्मन्यवस्थिते व्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते ॥ ७१
साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ ।
तमः सत्त्वरजोपेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ ॥ ७२
अनुपृक्तावभूतान्तावोतप्रोतौ परस्परम् ।
गुणसाम्ये लयो ज्ञेयो वैषम्ये सृष्टिरुच्यते ॥७३
तिले यथा भवेत्तैलं घृतं पयसि वा स्थितम् ।
तथा तमसि सत्त्वे च रजस्यनुसृतं जगत् ॥ ७४
उपास्य रजनीं कृत्स्नां परां माहेश्वरीं तथा ।
अहर्मुखे प्रवृत्तश्च परः प्रकृतिसम्भवः ॥ ७५
क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः ।
प्रधानं पुरुषञ्चैव प्रविश्य स महेश्वरः ॥ ७६
महेश्वरात् त्रयो देवा जज्ञिरे जगदीश्वरात् ।
शाश्वताः परमा गुह्याः सर्वात्मानः शरीरिणः ॥ ७७
एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुणाः ।
एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयो ऽग्नयः ॥ ७८
परस्पराश्रिता ह्येते परस्परमनुव्रताः ।
परस्परेण वर्तन्ते धारयन्ति परस्परम् ॥ ७ ९
अन्योन्यमिथुना ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः ।
क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजन्ति परस्परम् ॥ ८०
ईश्वरस्तु परो देवो विष्णुश्च महतः परः ।
ब्रह्मा च रजसा युक्तः सर्गादौ हि प्रवर्तते ॥ ८१
परः स पुरुषो ज्ञेयः प्रकृतिः सा परा स्मृता ॥ ८२
अधिष्ठिता सा हि महेश्वरेण प्रवर्त चोद्यमने समन्तात् । अनुप्रवृत्तस्तु महांस्तदेनां चिरस्थिरत्वाद्विषयं श्रियः स्वयम् ॥ ८३ प्राणी तथा बुद्धि – ये सब देवताओंके साथ बुद्धिमान् परमेश्वरके दिनके समय विद्यमान रहते हैं और दिनके अन्तमें विलीन हो जाते हैं । रात्रिका अन्त होनेपर पुनः विश्वकी उत्पत्ति होती है । उस समय व्यक्तके अपनी आत्मामें स्थित होनेपर तथा विकारके विलीन हो जानेपर । प्रधान एवं पुरुष अपने लक्षणोंके साथ स्थित होते हैं । तम, सत्त्व तथा रजसे युक्त वे दोनों समत्वसे व्यवस्थित होकर एक - दूसरेमें मिलकर ओत - प्रोत हो जाते हैं । गुणोंकी साम्यस्थितिमें लयको जानना चाहिये और वैषम्यकी स्थितिमें सृष्टि कही जाती है । जैसे तिलमें तेल तथा दूधमें घी स्थित होता है, उसी प्रकार तम-सत्त्व - रजमें जगत् स्थित रहता है ॥ ६ ९ – ७४ ॥ पूरी रात परात्पर माहेश्वरीकी उपासना करके दिनका आरम्भ होनेपर प्रकृतिसे उत्पन्न परमेश्वर सृष्टिके लिये प्रवृत्त होते हैं । वे परमेश्वर महेश्वर ( शिव ) प्रधान तथा पुरुषमें प्रवेश करके श्रेष्ठ योगके द्वारा क्षोभ उत्पन्न करते हैं । तब शाश्वत, परम गुह्य, सर्वात्मा तथा शरीर-धारी तीन देवता [ उन ] जगदीश महेश्वरसे उत्पन्न होते हैं ॥ ७५–७७ ॥ ये ही तीनों [ ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ] देवता, ये ही तीनों गुण, ये ही तीनों लोक तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं । ये देवता एक - दूसरेका आश्रय लेकर एक - दूसरेका अनुसरण करते हुए एक - दूसरेसे व्यवहार करते हैं और एक- दूसरेको धारण करते हैं । ये परस्पर संयोग करते हैं तथा एक - दूसरेके उपजीवी हैं; क्षणभरके लिये इनका वियोग नहीं होता है, ये एक - दूसरेका त्याग [ कभी ] नहीं करते हैं ॥ ७८-८० ॥ महेश्वर सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, विष्णु महत्से परे हैं | और ब्रह्मा रजोगुणसे युक्त होकर सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होते हैं । उस पुरुषको ' पर ' जानना चाहिये और वह प्रकृति ' परा ' कही गयी है ॥ ८१-८२ ॥ महेश्वरके द्वारा अधिष्ठित वह प्रकृति सभी ओरसे सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होती है और उस समय चिरस्थायी होनेके कारण महत्तत्त्व ऐश्वर्यके विषयको स्वयं धारणकर । इस प्रकृतिका अनुगमन करता है ॥८३ ॥
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३१२ प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकालः प्रवर्तते ईश्वराधिष्ठितात्पूर्वं तस्मात्सदसदात्मकात् संसिद्धः कार्यकरणे रुद्रश्चाग्रे ह्यवर्तत । तेजसाप्रतिमो धीमानव्यक्तः सम्प्रकाशकः स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते 1 ब्रह्मा च भगवाँस्तस्माच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः
संसिद्धः कार्यकरणे तथा वै समवर्तत ।
एक एव महादेवस्त्रिधैवं स व्यवस्थितः ॥
अप्रतीपेन ज्ञानेन ऐश्वर्येण समन्वितः ।
धर्मेण चाप्रतीपेन वैराग्येण च तेऽन्विताः ॥
अव्यक्ताज्जायते तेषां मनसा यद्यदीहितम् ।
वशीकृतत्वात्त्रैगुण्यं सापेक्षत्वात्स्वभावतः ॥
चतुर्मुखस्तु ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तिकः स्मृतः ।
सहस्रमूर्धा पुरुषस्तिस्त्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ॥
ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे सङ्क्षिपत्यपि ।
पुरुषत्वे ह्युदासीनस्तिस्त्रोऽवस्थाः प्रजापतेः ॥
ब्रह्मा कमलगर्भाभो रुद्रः कालाग्निसन्निभः ।
पुरुषः पुण्डरीकाक्षो रूपं तत्परमात्मनः ॥
एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः ।
महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च ॥
नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । सबसे पहले ईश्वरसे अधिष्ठित तथा सत्-॥ ८४ असत्स्वरूप उस प्राकृत गुणवैषम्यके कारण सृष्टिका काल प्रवर्तित होता है । अपने तेजसे अनुपम, बुद्धिमान् , अव्यक्त तथा सम्यक् प्रकाश करनेवाले रुद्र सबसे पहले ॥ ८५ कार्य करनेमें तत्पर हुए । वे ही प्रथम शरीरधारी हैं और वे ही पुरुष कहे जाते हैं । चार मुखवाले तथा प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए और सृष्टिकार्य ॥ ८६ करनेमें समर्थ हुए । इस प्रकार वे एक ही महादेव तीन रूपोंमें व्यवस्थित हैं । वे [ महादेव ] अनुकूल ज्ञान तथा ८७ ऐश्वर्यसे युक्त हैं और वे तीनों देवता भी अनुकूल धर्म तथा वैराग्यसे युक्त हैं ॥ ८४–८८ ॥ वशीभूत होने तथा सापेक्ष होनेके कारण उन ८८ देवताओंके मनमें जो - जो त्रिगुणात्मक सृष्टिविषयकी अभिलाषा थी, वह स्वभावसे ही अव्यक्तसे उत्पन्न हुई ॥ ८ ९ ॥ ८ ९ वे परमेश्वर ही ब्रह्माके रूपमें चार मुखवाले तथा कालके रूपमें संहार करनेवाले कहे गये हैं । वे ही हजार सिरोंवाले पुरुष विष्णु भी हैं । इस प्रकार ९ ० स्वयम्भू [ परमेश्वर ] -की तीन अवस्थाएँ हैं । ब्रह्माके रूपमें वे लोकोंका सृजन करते हैं, कालके रूपमें ९ १ उनका संहार भी करते हैं और पुरुषके रूपमें उदासीन रहते हैं; उन प्रजापतिकी तीन अवस्थाएँ हैं । ब्रह्मा कमलगर्भकी आभावाले हैं, रुद्र कालाग्निके समान हैं ९ २ तथा पुरुष [ विष्णु ] कमलके समान नेत्रवाले हैं — यह उन परमात्माका रूप है ॥ ९ ० - ९ २ ॥ वे महेश्वर एक, दो, तीन तथा अनेक प्रकारके ९ ३ । शरीर धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं । वे महेश्वर अपनी लीलासे अनेक आकृति, क्रिया, रूप महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च ॥९ ४ तथा नामवाले शरीरोंको धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ त्रिधा यद्वर्तते लोके तस्मात्रिगुण उच्यते । वे [ परमेश्वर ] लोकमें तीन रूपोंमें विद्यमान हैं, चतुर्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः ॥ ९ ५ इसलिये वे तीन गुणोंवाले कहे जाते हैं और चार भागोंमें विभक्त होनेके कारण ' चतुर्व्यूह ' कहे गये हैं ॥ ९ ५ ॥ यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानयम् । ये विषयोंको प्राप्त करते हैं, ग्रहण करते हैं और यच्चास्य सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते ॥ ९ ६ | उनका भक्षण कर जाते हैं; ऐसा इनका शाश्वत भाव
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका
ऋषिः सर्वगतत्वाच्च शरीरी सोऽस्य यत्प्रभुः ।
स्वामित्वमस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् ॥
भगवान् भगवद्भावान्निर्मलत्वाच्छिवः स्मृतः ।
परमः सम्प्रकृष्टत्वादवनादोमिति स्मृतः ॥
सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वमयो यतः ।
त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्यं सम्प्रवर्तते ॥
सृजते ग्रसते चैव रक्षते च त्रिभिः स्वयम् ।
आदित्वादादिदेवोऽसावजातत्वादजः स्मृतः ॥
पाति यस्मात्प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः ।
देवेषु च महान् देवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥
सर्वगत्वाच्च देवानामवश्यत्वाच्च ईश्वरः ।
बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भूत उच्यते ॥
क्षेत्रज्ञः क्षेत्रविज्ञानादेकत्वात्केवलः स्मृतः ।
यस्मात्पुर्यां स शेते च तस्मात्पूरुष उच्यते ॥
अनादित्वाच्च पूर्वत्वात्स्वयम्भूरिति संस्मृतः ।
याज्यत्वादुच्यते यज्ञः कविर्विक्रान्तदर्शनात् ॥
क्रमणः क्रमणीयत्वात्पालकश्चापि पालनात् । आदित्यसंज्ञः कपिलो ह्यग्रजोऽग्निरिति स्मृतः
हिरण्यमस्य गर्भोऽभूद्धिरण्यस्यापि गर्भजः ।
तस्माद्धिरण्यगर्भत्वं पुराणेऽस्मिन्निरुच्यते ॥
स्वरूप " सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१३ है, इसलिये ये ' आत्मा ' कहे जाते हैं ॥ ९ ६ ॥ ९ ७ सर्वत्र गमन करनेके कारण ये ऋषि हैं; वे परमेश्वर इस शरीरके प्रभु हैं तथा इसपर उनका पूर्ण स्वामित्व है; अतः वे शरीरी हैं और सर्वत्र प्रवेश करनेके कारण वे विष्णु हैं ॥ ९ ७ ॥ ९ ८ वे ऐश्वर्यमय भावसे युक्त होनेके कारण ' भगवान् ' तथा निर्मल होनेके कारण ' शिव ' कहे गये हैं । वे विशिष्ट होनेके कारण ' परम ' तथा रक्षा करनेके कारण ९९ ‘ ओम् ' कहे गये हैं । वे सब कुछ सम्यक् जाननेके कारण ‘ सर्वज्ञ ' हैं तथा सर्वमय होनेके कारण ' सर्व ' हैं; वे अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके तीनों लोकोंका संचालन करते हैं; वे तीन रूपोंसे स्वयं [ जगत्का ] १०० सृजन करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥ ९ ८ - ९९ १ / २ ॥ वे आदि ( प्रारम्भ ) - में प्रकट होनेके कारण ' आदिदेव ' तथा अजन्मा होनेके कारण ' अज ' कहे गये १०१ हैं । वे समस्त प्रजाओंकी रक्षा करते हैं, इसलिये ' प्रजापति ' कहे गये हैं । वे देवताओंमें [ सबसे ] महान् देवता हैं, इसलिये ' महादेव ' कहे गये हैं । वे सर्वव्यापी होने तथा किसीके वशमें न होनेके कारण देवताओंके १०२ भी ' ईश्वर ', बृहत् होनेके कारण ' ब्रह्मा ' तथा अपने भूतत्व ( अस्तित्व ) - के कारण ' भूत ' कहे जाते हैं । वे क्षेत्रोंका ज्ञान रखनेके कारण ' क्षेत्रज्ञ ' तथा एकमात्र १०३ होनेके कारण ' केवल ' कहे गये हैं । चूँकि वे पुरी ( शरीर ) - में शयन करते हैं, इसलिये ' पुरुष ' कहे जाते हैं । वे अनादि होने तथा [ सबसे ] पहले होनेके कारण ' स्वयम्भू ' कहे गये हैं । वे यजनके योग्य होनेके कारण १०४ ' यज्ञ ' तथा इन्द्रियोंसे न दिखायी देनेवाली वस्तुओंको भी देखनेके कारण ' कवि ' कहे जाते हैं ॥ १००–१०४ ॥ वे क्रमणीय ( पहुँचके योग्य ) होनेके कारण ' क्रमण ', [ सबका ] पालन करनेके कारण ' पालक ', ॥ १०५ कपिलवर्ण होनेके कारण ' आदित्य ' और सबसे पहले उत्पन्न होनेके कारण ' अग्नि ' कहे गये हैं ॥ १०५ ॥
हिरण्यमय अण्ड इनसे उत्पन्न हुआ और ये भी १०६ | हिरण्यमय अण्डसे उत्पन्न हुए, अतः इस पुराणमें उन्हें
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३१४ स्वयम्भुवोऽपि वृत्तस्य कालो विश्वात्मनस्तु यः न शक्यः परिसंख्यातुमपि वर्षशतैरपि कालसंख्याविवृत्तस्य परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः तावच्छेषोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यान्ते प्रतिसृज्यते कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै । समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परे तु ये । यस्त्वयं वर्तते कल्पो वाराहस्तं निबोधत
प्रथमः साम्प्रतस्तेषां कल्पोऽयं वर्तते द्विजाः ।
यस्मिन् स्वायम्भुवाद्यास्तु मनवस्ते चतुर्दश ॥
अतीता वर्तमानाश्च भविष्या ये च वै पुनः ।
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ॥
पूर्ण युगसहस्त्रं वै परिपाल्या महेश्वरैः ।
प्रजाभिस्तपसा चैव तेषां शृणुत विस्तरम् ॥
मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च ।
कथितानि भविष्यन्ति कल्पः कल्पेन चैव हि ॥
अतीतानि च कल्पानि सोदर्काणि सहान्वयैः ।
अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ॥
आपो ह्यग्रे समभवन्नष्टे च पृथिवीतले ।
शान्ततारैकनीरेऽस्मिन्न प्राज्ञायत किञ्चन ॥
एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
तदा भवति वै ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः ।
ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा ॥
सत्त्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमुदैक्षत ।
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥
आपो नाराश्च सूनव इत्यपां नाम शुश्रुमः । आपूर्य ताभिरयनं कृतवानात्मनो श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । ' हिरण्यगर्भ ' कहा जाता है ॥ १०६ ॥
॥ १०७ अतीत विश्वात्मा स्वयम्भूका जो काल है, उसकी गणना सौ वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती है ॥ वर्तमान ब्रह्माकी कालसंख्याको परार्ध कहा गया है । ॥ १०८ उतने ही परिमाणवाला इनका काल [ द्वितीय परार्ध ] शेष रहता है; उसके अन्तमें जगत्का संहार हो जाता है । कल्पोंके हजारों करोड़ जो दिन व्यतीत हो गये हैं, उतने ॥ १० ९ ही दूसरे अभी शेष हैं ॥ १०७-१०८१ / २ ॥ जो यह वाराहकल्प चल रहा है, उसके विषयमें सुनिये । हे द्विजो! यह वर्तमान कल्प उनमें प्रथम ११० [ कल्प ] है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु व्यवस्थित हैं । बीत चुके, वर्तमान तथा अभी होनेवाले १११ जो मनु हैं, उन महेश्वर मनुओं द्वारा अपनी तपस्यासे प्रजाओंके साथ सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन पूरे हजार वर्षोंतक किया जाता है; अब ११२ उनका विस्तृत वर्णन सुनिये ॥ १० ९ - ११२ ॥ [ हे ऋषियो! ] एक मन्वन्तरके वर्णनसे सभी ११३ मन्वन्तरोंका तथा एक कल्पके वर्णनसे दूसरे कल्पका भी वर्णन हो जायगा । अपने वंशके राजाओंके साथ बीते ११४ हुए कल्प जिस रूपमें होते हैं, विद्वान्को वैसा ही तर्क ( अनुमान ) अनागत ( भविष्य ) कल्पोंके विषयमें भी कर लेना चाहिये ॥ ११३-११४ ॥ ११५ पृथ्वीतलके नष्ट हो जानेपर सबसे पहले जल प्रादुर्भूत हुआ; विनष्ट नक्षत्रोंसे युक्त तथा उस विस्तृत ११६ । जलमय ब्रह्माण्डमें कुछ भी नहीं मालूम पड़ता था । उस एकार्णव ( प्रलयसागर ) -में [ समस्त ] स्थावर - जंगमके विनष्ट हो जानेपर हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरवाले, हजार ११७ सिरवाले तथा स्वर्णिम रंगवाले अतीन्द्रिय ब्रह्मा पुरुषरूपमें प्रकट हुए । उस समय नारायणसंज्ञक वे ब्रह्मा जलमें ११८ सोये हुए थे । पुनः सत्त्वगुणके उद्रेकके कारण जगे हुए उन ब्रह्माने लोकको शून्य देखा । लोग उन नारायणके प्रति इस श्लोकको उदाहृत करते हैं — जलका अर्थ है यतः ॥११ ९ ‘ नार ’ तथा ‘ सूनु ’ – हमलोग जलके ये दो नाम सुनते हैं । अप्सु शेते यतस्तस्मात्ततो नारायणः स्मृतः । उस जलसे पूरित करके उन्होंने अपना ' अयन ' चतुर्युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः ॥ १२० | ( निवासस्थान ) बनाया और वे जलमें सोते हैं, इसलिये
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप
शर्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात् ।
ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन् वायुर्भूत्वा समाचरत् ॥ १२१
निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्तु सः ।
ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम् ॥ १२२
अनुमानादसम्मूढो भूमेरुद्धरणं पुनः ।
अकरोत्स तनूमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा ॥ १२३
ततो महात्मा भगवान् दिव्यरूपमचिन्तयत् ।
सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स तु समन्ततः ॥ १२४
किन्नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं महीमिमाम् ।
जलक्रीडानुसदृशं वाराहं रूपमाविशत् ॥ १२५
अधृष्यं सर्वभूतानां वाड्मयं ब्रह्मसंज्ञितम् ।
पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ॥ १२६
अद्भिः सञ्छादितां भूमिं स तामाशु प्रजापतिः ।
उपगम्योज्जहारैनामापश्चापि समाविशत् ॥ १२७
सामुद्रा वै समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च ।
रसातलतले मग्नां रसातलपुटे गताम् ॥ १२८
प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्र्याभ्युज्जहार गाम् ।
ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः ॥ १२ ९
मुमोच पूर्ववदसौ धारयित्वा धराधरः ।
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता ॥ १३०
तत्समा ह्युरुदेहत्वान्न मही याति सम्प्लवम् ।
तत उत्क्षिप्य तां देवो जगतः स्थापनेच्छया ॥ १३१
पृथिव्याः प्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः ।
पृथिवीं च समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन् ॥ १३२
प्राक्सर्गे दह्यमाने तु तदा संवर्तकाग्निना ।
तेनाग्निना विशीर्णास्ते पर्वता भूरि विस्तराः ॥ १३३
शैत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना तेन संहताः ।
निषिक्ता यत्र यत्रासंस्तत्र तत्राचलाभवन् ॥ १३४
सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१५ ‘ नारायण ' कहे गये हैं ॥ ११५–११९ १ / २ ॥ हजार चतुर्युगीतक KKKKKKKKKKKKK जलमें निवास करनेके पश्चात् रात्रिके अन्तमें उन्होंने सृष्टि करनेके उद्देश्यसे ब्रह्माका रूप धारण किया । ब्रह्माजी वायु होकर उस जलमें विचरण करने लगे, जैसे कि वर्षाऋतुमें रात्रिमें खद्योत विचरण करता है । तदनन्तर ज्ञानसम्पन्न उन ब्रह्माने अनुमानपूर्वक पृथ्वीको जलके भीतर गयी हुई जानकर पहले के कल्पोंमें जैसा रूप धारण किया था, उस अन्य रूपको धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेका निश्चय किया । तत्पश्चात् महात्मा भगवान् [ ब्रह्मा ] उस दिव्य रूपका चिन्तन करने लगे । सभी ओरसे जलसे व्याप्त पृथ्वीको देखकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन - सा रूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार करूँ ॥ १२० - १२ ४१/२ ॥ उन्होंने जलक्रीड़ाके अनुरूप, सभी प्राणियोंसे अजेय, वेदमय तथा ब्रह्मसंज्ञक वाराहरूप धारण किया और पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया । उन [ वाराहरूपधारी ] प्रजापतिने जलसे घिरी हुई पृथ्वीके पास पहुँचकर उसे उठा लिया और समुद्र जलको समुद्रोंमें तथा नदियोंके जलको नदियोंमें समाविष्ट कर दिया । इस प्रकार उन प्रभुने लोक - कल्याणके लिये रसातलमें गयी हुई तथा समुद्रतलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपने दंष्ट्रापर उठा लिया । इसके बाद उन धरणीधरने पृथ्वीको उसके [ मूल ] स्थानमें लाकरके पूर्वकी भाँति रखकर छोड़ दिया । वह पृथ्वी उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाकी भाँति स्थित हो गयी और उसीके समान विशाल देह होनेके कारण पृथ्वी [ पुनः ] डूब न सकी ॥ १२५–१३०९ / २ ॥ तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले भगवान्ने उसे उठा करके जगत्की स्थापनाकी इच्छासे पृथ्वीका विभाग करनेके लिये मनमें निश्चय किया । उन्होंने पृथ्वीको समतल करके पृथ्वीपर पर्वतोंको संग्रहीत किया । संवर्तक अग्निद्वारा पूर्व सृष्टिके दग्ध कर दिये जानेपर उस समय बहुत विस्तारवाले वे पर्वत उस अग्निसे विशीर्ण हो गये थे । उस एकार्णवमें वायुप्रवाहके | द्वारा एकत्रित होकर शीतके कारण वे जहाँ - जहाँ जम
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३१६ तदाचलत्वादचलाः पर्वभिः पर्वताः स्मृताः गिरयो हि निगीर्णत्वाच्छयानत्वाच्छिलोच्चयाः ततस्तेषु विकीर्णेषु कोटिशो हि गिरिष्वथ विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् । भूराद्यांश्चतुरो लोकान् पुनः सोऽथ व्यकल्पयत् लोकान् प्रकल्पयित्वाथ प्रजासर्गं ससर्ज ह । ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः
ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां कल्पादिषु यथा पुरा ।
तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥
बुद्ध्याश्च समकाले वै प्रादुर्भूतस्तमोमयः ।
तमो मोहो महामोहस्तामिस्त्रश्चान्धसंज्ञितः ॥
अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ।
पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः ॥
संवृतस्तमसा चैव बीजाङ्कुरवदावृतः ।
बहिरन्तश्चाप्रकाशस्तब्धो निः संज्ञ एव च ॥
यस्मात्तेषां वृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च ।
तस्मात्ते संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥
मुख्यसर्गं तथाभूतं दृष्ट्वा ब्रह्मा ह्यसाधकम् ।
अप्रसन्नमनाः सोऽथ ततोऽन्यं सो ह्यमन्यत ॥
तस्याभिध्यायतश्चैव तिर्यक्स्स्रोता ह्यवर्तत ।
यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तः स तिर्यक्त्रोतास्ततः स्मृतः ॥
पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ।
तस्याभिध्यायतोऽन्यं वै सात्त्विकः समवर्तत ॥
ऊर्ध्वस्त्रोतास्तृतीयस्तु स वै चोर्ध्वं व्यवस्थितः । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । गये, वहाँ - वहाँ पर्वत बन गये 1 । वे चलायमान न होनेके ॥ १३५ कारण ' अचल ', पर्वोंसे युक्त होनेके कारण ' पर्वत ' | निगीर्ण होनेके कारण ' गिरि ' तथा [ भूमिपर ], शयन । करनेके कारण ' शिलोच्चय ' कहे गये हैं । इस प्रकार ॥ १३६ । [ भगवान् ] विश्वकर्मा प्रत्येक कल्पमें उन करोड़ों | पर्वतोंके [ इधर - उधर ] बिखर जानेपर बार - बार उनका विभाग करते हैं ॥ १३१–१३६ ॥ ॥ १३७ तदनन्तर उन्होंने समुद्रों, सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको, भूः आदि चारों लोकोंको बनाया । इसके बाद ॥ १३८ लोकोंकी रचना करके उन्होंने प्रजासर्गकी रचना की, विविध प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले स्वयम्भू भगवान् [ ब्रह्मा ] -ने उसी प्रकारकी सृष्टिकी रचना की, १३ ९ जैसा उन्होंने पहलेके कल्पोंमें किया था । सृष्टिके समय बुद्धिपूर्वक सर्गका चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माकी बुद्धिसे तमोमय [ अविद्यात्मक ] सर्ग उत्पन्न हुआ; वह तम, १४० मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध - इन नामोंवाला है । इस प्रकार पाँच पर्वोंवाली यह अविद्या उन महात्मासे उत्पन्न हुई । ध्यान करते हुए अभिमानी ब्रह्माका वह सर्ग १४१ पाँच प्रकारसे अवस्थित हुआ । वह तमसे आवृत, बीजांकुरकी भाँति ढका हुआ, बाहर तथा भीतरसे १४२ प्रकाशरहित, स्तब्ध तथा निःसंज्ञ ( चेतनाशून्य ) था ॥ १३७ – १४२ ॥ [ पर्वतों ] की बुद्धि ढँकी हुई थी और उनके १४३ दुःख तथा क्रिया - कलाप भी ढँके हुए थे, अतः संवृतात्मा ( आवृत आत्मावाले ) वे नग ( पर्वत ) प्रथम उत्पन्न ( मुख्य ) कहे गये हैं ॥ १४३ ॥
१४४ उस प्रकारके प्रथम सर्गको कार्यहेतु व्यर्थ समझकर वे ब्रह्मा अप्रसन्नचित्त हो गये । तब वे अन्य सर्गका विचार करने लगे । ऐसा चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मासे १४५ तिर्यक्त्रोत ( बहिर्मुख इन्द्रियप्रवाहवाला ) -सर्ग उत्पन्न हुआ । वह [ सर्ग ] तिर्यक् प्रवृत्तिवाला था, इसलिये उसे १४६ तिर्यक्स्रोत कहा गया है । है द्विजो! वे उत्पथग्राही पशु-पक्षी आदिके रूपमें प्रसिद्ध हुए । इसके बाद अन्य सर्गका ध्यान करते ब्रह्मासे ऊर्ध्वस्रोत ( ऊर्ध्व यस्मात्प्रवर्तते चोर्ध्वमूर्ध्वस्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४७ | इन्द्रियप्रवाहवाला ) तीसरा हुए उन सात्त्विक सर्ग उत्पन्नहुआ;
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका
ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च संवृताः ।
प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्स्रोतोभवाः स्मृताः ॥
ते सत्त्वस्य च योगेन सृष्टाः सत्त्वोद्भवाः स्मृताः ।
ऊर्ध्वस्स्रोतास्तृतीयो वै देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥
प्रकाशाद्वहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः ।
ते ऊर्ध्वस्रोतसो ज्ञेयास्तुष्टात्मानो बुधैः स्मृताः ॥
ऊर्ध्वस्स्रोतस्सु सृष्टेषु देवेषु वरदः प्रभुः ।
प्रीतिमानभवद् ब्रह्मा ततोऽन्यं सोऽभ्यमन्यत ॥
ससर्ज सर्गमन्यं हि साधकं प्रभुरीश्वरः ।
ततोऽभिध्यायतस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा ॥
प्रादुरासीत्तदा व्यक्तादर्वाक्स्त्रोतास्तु साधकः ।
यस्मादर्वाक् न्यवर्तन्त ततोऽर्वाक्स्त्रोतसस्तु ते ॥
ते च प्रकाशबहुलास्तमःपृक्ता रजोऽधिकाः ।
तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः ॥
संवृता बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते ।
लक्षणैस्तारकाद्यैस्ते ह्यष्टधा तु व्यवस्थिताः ॥
सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वसहधर्मिणः । इत्येष तैजसः सर्गो ह्यर्वाक्स्त्रोतः प्रकीर्तितः
पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्धा तु व्यवस्थितः ।
विपर्ययेण शक्त्या च सिद्ध्या तुष्ट्या तथैव च ॥
स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तितः । सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु ऋषिदेवेषु कृत्स्नशः इत्येष प्राकृतः सर्गो वैकृतोऽनवमः स्मृतः । भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्गः स उच्यते स्वरूप " सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१७ फ्र वह ऊर्ध्वरूपसे व्यवस्थित था । चूँकि यह ऊर्ध्वभावसे १४८ कार्य करता था, अतः यह [ सर्ग ] ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है । वे सुख - प्रीतिकी अधिक प्रवृत्तिवाले, बाहर तथा भीतरसे संवृत और बाहर तथा भीतरसे प्रकाशमय थे, १४ ९ । इसलिये वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं । वे सत्त्वगुणके योगसे सृजित किये गये, इसलिये वे सत्त्वोद्भव कहे गये हैं । ऊर्ध्वस्रोत नामक वह तीसरा सर्ग १५० देवसर्ग कहा गया है । बाहर तथा भीतर प्रकाशसे युक्त रहनेके कारण वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं । ऊर्ध्वस्रोतके रूपमें ज्ञेय वे लोग विद्वानोंके द्वारा सन्तुष्ट
१५१ आत्मावाले कहे गये हैं । १४४–१५० ॥
ऊर्ध्वस्रोतवाले देवताओंके सृष्ट हो जानेपर वर प्रदान करनेवाले प्रभु भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और १५२ उसके बाद वे दूसरी सृष्टिका विचार करने लगे । तब प्रभु ब्रह्माने अन्य साधक सर्गका सृजन किया । उस समय ध्यान करते हुए उन सत्यके अभिध्यायी व्यक्त १५३ | ब्रह्मासे अर्वाक्स्रोत ( बाहर तथा भीतरसे इन्द्रियप्रवाहवाला ) साधक सर्ग उत्पन्न हुआ । इस सृष्टिके लोग अर्वाक्रूपसे कार्यमें प्रवृत्त हुए, इसलिये वे अर्वाक्स्रोता कहे गये हैं । १५४ वे प्रकाशबाहुल्यवाले, तमोगुणसे युक्त तथा रजोगुणकी अधिकतावाले थे, इसलिये वे बहुत दुःखसे युक्त थे तथा बार - बार कर्म करनेवाले थे । बाहर तथा भीतरसे संवृत १५५ वे लोग साधक ( कार्यसाधनमें तत्पर ) मनुष्य थे; वे तारक आदि लक्षणोंके द्वारा आठ प्रकारसे व्यवस्थित हुए । सिद्ध आत्मावाले वे मनुष्य गन्धर्वोंके समान ॥ १५६ गुणधर्मवाले थे । इस अर्वाक्स्रोत सृष्टिको ' तैजस ' सर्ग कहा गया है ॥ १५१–१५६ ॥ पाँचवाँ सर्ग ' अनुग्रह ' है; यह विपर्यय, शक्ति, १५७ सिद्धि तथा तुष्टिके द्वारा चार प्रकारसे व्यवस्थित है । स्थावरों ( वृक्ष आदि ) में विस्तारके कारण भेद होता है, पशु आदि सामर्थ्य से होता है, मनुष्य प्रारब्धजन्य सिद्धिसे ॥ १५८ युक्त होते हैं और ऋषियों तथा देवताओंमें सम्पूर्ण तुष्टिके द्वारा चतुर्थ भेद होता है । चार प्रकारवाला यह प्राकृत ( प्रकृतिनिरूपण विषयवाला ) तथा विकारको प्राप्त अनुग्रह ॥ १५ ९ | [ नामक ] सर्ग श्रेष्ठ कहा गया है ॥ १५७-१५८१ / २ ॥
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३१८ निवृत्तं वर्तमानं च तेषां जानन्ति वै पुनः भूतादिकानां भूतानां सप्तमः सर्ग एव च तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः । स्वादनाश्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते
विपर्ययेण भूतादिरशक्त्या च व्यवस्थितः ।
प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणः स्मृतः ॥
तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते ।
वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥
इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः ।
मुख्यसर्गश्चतुर्थश्च मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥
ततोऽर्वाक्स्त्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः । अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः
पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥
अबुद्धिपूर्वकाः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।
बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते षट् पुनर्ब्रह्मणस्तु ते ॥
विस्तरानुग्रहः सर्गः कीर्त्यमानो निबोधत ।
चतुर्धावस्थितः सोऽथ सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥
इत्येते प्राकृताश्चैव वैकृताश्च नव स्मृताः ।
परस्परानुरक्ताश्च कारणैश्च बुधैः स्मृताः ॥
अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ।
ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ ॥
पूर्वोत्पन्नौ पुरा तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ ।
व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । मनु आदिका सर्ग भूतोंका छठा सर्ग कहा फ ॥ १६० जाता है । उन उत्पद्यमान भूतोंके प्राक्कर्म, वर्तमान तथा भविष्यको वे भूतादिक निश्चित रूपसे जानते हैं । भूतादिक भूतों ( मनुष्यों i ) ) - - का सातवाँ सर्ग है । [ पूर्वोक्त ] ॥ १६१ उन सभी भूतादिकोंको निःस्पृह, दानशील, कर्मफलका आस्वादन करनेवाला तथा अशील जानना चाहिये । भूतादि ( अहंकार ) अज्ञानसे तथा विष्णुमायासे व्यवस्थित १६२ होता है ॥ १५ ९ - १६११/२ ॥ महत्से होनेवाले सर्गको ब्रह्माका प्रथम सर्ग कहा गया है । तन्मात्राओंका जो दूसरा सर्ग है, वह भूतसर्ग १६३ कहा जाता है । वैकारिक तीसरा सर्ग ऐन्द्रियसर्ग कहा गया है । यह सब प्राकृत सर्ग है, जो बुद्धिपूर्वक हुआ है । चौथा मुख्य सर्ग है; सभी स्थावर मुख्य कहे गये १६४ हैं । इसके बाद [ तिर्यक्स्रोत, ऊर्ध्वस्रोत तथा अर्वाक्स्रोतके क्रमसे ] अर्वाक् - स्रोतोंका सर्ग है; उनमें सातवाँ जो अर्वाक्स्रोतोंका सर्ग है, वह मानुषसर्ग है । आठवाँ ॥ १६५ अनुग्रहसर्ग है; वह सात्त्विक, तामस तथा राजस भेदोंवाला होता है [ सात्त्विकको देवताओंमें, तामसको पशुओंमें तथा राजसको मनुष्योंमें जानना चाहिये ] । इस १६६ प्रकार ये पाँच वैकृत सर्ग तथा तीन प्राकृत सर्ग कहे गये हैं । [ सनक आदिका ] जो नौवाँ सर्ग है, वह प्राकृत तथा वैकृत [ दोनों रूपोंवाला ] कहा गया है । ब्रह्माके जो तीन १६७ प्राकृतसर्ग कहे गये हैं, वे अबुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं और जो [ शेष ] छ: सर्ग हैं, वे बुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं ॥ १६२—१६७ ॥ १६८ [ हे ऋषियो! ] अब मैं विस्तृत अनुग्रहसर्गका वर्णन कर रहा हूँ; आपलोग उसे जान लें । वह सभी भूतोंमें पूर्णरूपसे चार प्रकारसे अवस्थित है । ये जो १६ ९ प्राकृत तथा वैकृत [ कुल ] नौ सर्ग कहे गये हैं, उन्हें विद्वानोंने कारणोंके द्वारा एक - दूसरेसे अनुरक्त ( सम्बद्ध ) बताया है॥१६८-१६९ ॥ १७० आरम्भमें ब्रह्माजीने अपने ही सदृश मानस पुत्रोंका सृजन किया । उनमेंसे सबसे पहले उत्पन्न तथा सभीके पूर्वज ऋभु तथा सनत्कुमार — ये दोनों ऊर्ध्वरेता ( ब्रह्मचारी ) १७१ | थे | आठवाँ कल्प व्यतीत होनेपर प्राचीन एवं लोकसाक्षी