श्रीगणेशाय नमः।
लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 331–340
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका
तुल्यानेवात्मनः सर्वान् रूपतेजोबलश्रुतैः ।
पिङ्गलान् सनिषङ्गांश्च सकपर्दान् सलोहितान् ॥
विशिष्टान् हरिकेशांश्च दृष्टिघ्नांश्च कपालिनः ।
महारूपान् विरूपांश्च विश्वरूपान् स्वरूपिणः ॥
रथिनश्चर्मिणश्चैव वर्मिणश्च वरूथिनः ।
सहस्त्रशतबाहूंश्च दिव्यान् भौमान्तरिक्षगान् ॥
स्थूलशीर्षानष्टदंष्ट्राद्विजिह्वांस्तांस्त्रिलोचनान् ।
अन्नादान् पिशिताशांश्च आज्यपान् सोमपानपि ॥
मीढुषोऽतिकपालांश्च शितिकण्ठोर्ध्वरेतसः ।
हव्यादाञ्छ्रुतधर्मांश्च धर्मिणो ह्यथ बर्हिणः ॥
आसीनान् धावतश्चैव पञ्चभूतान् सहस्रशः ।
अध्यापिनोऽध्यायिनश्च जपतो युञ्जतस्तथा ॥
धूमवन्तो ज्वलन्तश्च नदीमन्तो ऽतिदीप्तिनः ।
वृद्धान् बुद्धिमतश्चैव ब्रह्मिष्ठाञ्शुभदर्शनान् ॥
नीलग्रीवान्सहस्त्राक्षान्सर्वांश्चाथ क्षमाकरान् ।
अदृश्यान् सर्वभूतानां महायोगान् महौजसः ॥
भ्रमन्तोऽभिद्रवन्तश्च प्लवन्तश्च सहस्रशः ।
अयातयामानसृजद्रुद्रानेतान् सुरोत्तमान् ॥
ब्रह्मा दृष्ट्वाब्रवीदेनं मास्त्राक्षीरीदृशीः प्रजाः ।
स्रष्टव्या नात्मनस्तुल्याः प्रजा देव नमोऽस्तु ते ॥
अन्याः सृज त्वं भद्रं ते प्रजा वै मृत्युसंयुताः ।
नारप्स्यन्ते हि कर्माणि प्रजा विगतमृत्यवः ॥
एवमुक्तोऽब्रवीदेनं नाहं मृत्युजरान्विताः । प्रजाः त्रक्ष्यामि भद्रं ते स्थितोऽहं त्वं सृज प्रजाः
एते ये वै मया सृष्टा विरूपा नीललोहिताः ।
सहस्राणां सहस्त्रं तु आत्मनो निःसृताः प्रजाः ॥
एते देवा भविष्यन्ति रुद्रा नाम महाबलाः ।
पृथिव्यामन्तरिक्षे च दिक्षु चैव परिश्रिताः ॥
शतरुद्राः समात्मानो भविष्यन्तीति याज्ञिकाः ।
यज्ञभाजो भविष्यन्ति सर्वदेवगणैः सह ॥
स्वरूप " सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२ ९ उन्होंने रूप - तेज - बल - ज्ञानमें अपने ही सदृश, पिंगलवर्णवाले, ३०५ निषंगयुक्त, जटाजूटधारी, लोहितवर्णवाले, विशिष्ट, हरित | केशवा, देखनेमात्रसेनाश करनेवाले, कपालधारी, विशाल ३०६ रूपवाले, विकृत रूपवाले, विश्वरूप, स्वरूपवान्, | रथारूढ़, ढाल - कवच - वरूथ धारण किये हुए, लाखों भुजाओंवाले, स्वर्ग - पृथ्वी - अन्तरिक्षमें गमन करनेवाले, ३०७ स्थूल सिरवाले, आठ दाढ़ोंवाले, दो जीभोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, अन्न खानेवाले, मांस भक्षण करनेवाले, घृत ३०८ पीनेवाले, सोमपान करनेवाले, सुन्दर, बड़े - बड़े कपालवाले, नीले कण्ठवाले, ऊर्ध्वरेता ( ब्रह्मचारी ), हव्य खानेवाले, ३० ९ वेदपरायण, धार्मिक, मोरपंखसे सुशोभित, कुछ बैठे हुए, कुछ दौड़ते हुए, पाँच भूतोंवाले, कुछ अध्यापन करनेवाले, कुछ अध्ययन करनेवाले, कुछ जप करते हुए, कुछ ३१० योगाभ्यास करते हुए, कुछ धूमयुक्त, कुछ दीप्तिमान्, गंगाको धारण किये हुए, अत्यन्त कान्तिमान्, वृद्ध, ३११ बुद्धिसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ, शुभ दर्शनवाले, नीलग्रीवा ( कण्ठ ) -वाले, हजार नेत्रोंवाले, क्षमाकी निधि, सभी प्राणियोंसे अदृश्य, महान् योगवाले, महातेजस्वी, भ्रमण करते ३१२ हुए, इधर - उधर भागते हुए, कूदते हुए तथा अयातयाम— इन हजारों - हजार उत्तम रुद्रदेवताओंको उत्पन्न ३१३ किया॥३०३–३१३ ॥ इन्हें देखकर ब्रह्माजीने इन [ नीललोहित ] - से ३१४ कहा - ' ऐसी प्रजाओंका सृजन मत कीजिये; अपने सदृश प्रजाओंकी सृष्टि आपको नहीं करनी चाहिये । हे देव! आपको नमस्कार है । आपका कल्याण । आप ३१५ मृत्युयुक्त अन्य प्रजाओंका सृजन कीजिये; क्योंकि मृत्युरहित प्रजाएँ कार्योंका आरम्भ नहीं करेंगी ' ॥ ३१४ - ३१५ ॥ ॥ ३१६ ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे गये रुद्रने उनसे कहा- मैं मृत्यु तथा जरासे युक्त प्रजाओंका सृजन नहीं करूँगा । ३१७ । आपका कल्याण हो । अब मैं [ शान्त होकर ] बैठता हूँ और आप ही सृजन कीजिये । जिन हजारों - हजार विरूप नीललोहित रुद्रोंको मैंने सृजित किया है, वे मेरी आत्मासे निकली हुई ३१८ प्रजाएँ हैं । ये रुद्र नामवाले महाबली देवता होंगे । ये पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओंमें व्याप्त रहेंगे । इनमें समान ३१ ९ | आत्मावाले सौ रुद्र याज्ञिक होंगे; वे सभी देवताओंके साथ
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३३० अ
मन्वन्तरेषु ये देवा भविष्यन्तीह भेदतः ।
सार्धं तैरीज्यमानास्ते स्थास्यन्तीहायुगक्षयात् ॥
एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा महादेवेन धीमता ।
प्रत्युवाच नमस्कृत्य हृष्यमाणः प्रजापतिः ॥
एवं भवतु भद्रं ते यथा ते व्याहृतं विभो ।
ब्रह्मणा समनुज्ञाते तथा सर्वमभूत्किल ॥
ततः प्रभृति देवेशो न चासूयत वै प्रजाः ।
ऊर्ध्वरेताः स्थितः स्थाणुर्यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
यस्मादुक्तः स्थितोऽस्मीति तस्मात्स्थाणुरिति स्मृतः ।
एष देवो महादेवः पुरुषोऽर्कसमद्युतिः ॥
अर्धनारीनरवपुस्तेजसा ज्वलनोपमः ।
स्वेच्छयासौ द्विधाभूतः पृथक् स्त्री पुरुषः पृथक् ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । यज्ञभाग ग्रहण करनेवाले होंगे । सभी मन्वन्तरोंमें जो देवता ३२० भेदपूर्वक यहाँपर होंगे, उनके साथ पूजित होते हुए वे सभी रुद्र युगक्षयपर्यन्त यहाँ स्थित रहेंगे ॥ ३१६-३२० ॥ बुद्धिमान् महादेवजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रजापति ब्रह्माजी प्रसन्न होकर प्रणाम करके उनसे ३२१ बोले- ' हे विभो! आपने जैसा कहा वैसा ही हो; आपका कल्याण हो । ' ब्रह्माके ऐसा कहनेके बाद सब कुछ उसी प्रकारसे हुआ ॥ ३२१-३२२ ॥ उसी समयसे देवताओंके स्वामी शिवने प्रजाओंका ३२२ सृजन नहीं किया और वे प्रलयपर्यन्त स्थाणुवत् स्थित रहे तथा ब्रह्मचारी बने रहे । चूँकि उन्होंने कहा था कि ‘ मैं स्थित हूँ ’ — इसलिये वे ‘ स्थाणु ' कहे गये । ये भगवान् महादेव पुरुषस्वरूप, सूर्यके समान तेजवाले, अपने तेजसे ३२३ | अग्निके समान प्रतीत होनेवाले तथा आधा भाग नर और आधा भाग नारीके शरीरवाले हैं । वे अपनी इच्छासे दो भागोंमें अलग - अलग स्त्री तथा पुरुषरूपमें विभक्त हुए । वे परमेश्वर आधे भागसे ग्यारह रूपोंमें स्थित हैं । उसमें ३२४ जो शंकरकी अर्धांगिनी महाभागा महादेवी कही गयी हैं; वे ही भगवती पूर्वकालमें दक्षके द्वारा आराधित होकर ३२५
स एवैकादशार्धेन स्थितोऽसौ परमेश्वरः ।
तत्र या सा महाभागा शङ्करस्यार्धकायिनी ॥ ३२६
प्रागुक्ता तु महादेवी स्त्री सैवेह सती ह्यभूत् ।
हिताय जगतां देवी दक्षेणाराधिता पुरा ॥ ३२७
कार्यार्थं दक्षिणं तस्याः शुक्लं वामं तथासितम् ।
आत्मानं विभजस्वेति प्रोक्ता देवेन शम्भुना ॥
सा तथोक्ता द्विधाभूता शुक्ला कृष्णा च वै द्विजाः ।
तस्या नामानि वक्ष्यामि शृण्वन्तु च समाहिताः ॥
जगत्के हितके लिये सतीके रूपमें आविर्भूत हुई थीं । | सृष्टिकार्यके लिये उनका दाहिना भाग श्वेत तथा बायाँ ३२८ भाग कृष्ण था । जब भगवान् शम्भुने उनसे कहा कि अपनेको विभक्त करो, तब हे द्विजो! उनके ऐसा कहनेपर वे शुक्ल तथा कृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो गयीं । अब मैं उनके नाम बताऊँगा; आपलोग एकाग्रचित्त होकर ३२ ९ | सुनिये ॥ ३२३ – ३२ ९ ॥
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७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका अध्याय स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती । स्वाहा सती दाक्षायणी विद्या इच्छा शक्तिः क्रियात्मिका ॥
अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला ।
उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका ॥
ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरीति विश्रुता ।
गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी ॥
एकरूपमथैतस्याः पृथग्देहविभावनात् ।
सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता ॥
आज्ञा आवेशनी कृष्णा तामसी सात्त्विकी शिवा T
।
प्रकृतिर्विकृता रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी ॥
कालरात्रिर्महामाया रेवती भूतनायिका ।
द्वापरान्तविभागे च नामानीमानि सुव्रताः ॥
गौतमी कौशिकी चार्या चण्डी कात्यायनी सती ।
कुमारी यादवी देवी वरदा कृष्णपिङ्गला ॥
बर्हिध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी ।
महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी दृषद्वत्येकशूलधृक् ॥
अपराजिता बहुभुजा प्रगल्भा सिंहवाहिनी ।
शुम्भादिदैत्यहन्त्री च महामहिषमर्दिनी ॥
अमोघा विन्ध्यनिलया विक्रान्ता गणनायिका ।
देव्या नामविकाराणि इत्येतानि यथाक्रमम् ॥
भद्रकाल्या मयोक्तानि सम्यक्फलप्रदानि च ।
ये पठन्ति नरास्तेषां विद्यते न च पातकम् ॥
अरण्ये पर्वते वापि पुरे वाप्यथवा गृहे ।
रक्षामेतां प्रयुञ्जीत जले वाथ स्थलेऽपि वा ॥
व्याघ्रकुम्भीनचोरेभ्यो भयस्थाने विशेषतः ।
आपत्स्वपि च सर्वासु देव्या नामानि कीर्तयेत् ॥
आर्यकग्रहभूतैश्च पूतनामातृभिस्तथा ।
अभ्यर्दितानां बालानां रक्षामेतां प्रयोजयेत् ॥
महादेवी कले द्वे तु प्रज्ञा श्रीश्च प्रकीर्तिते ।
आभ्यां देवीसहस्राणि यैर्व्याप्तमखिलं जगत् ॥
अनया देवदेवोऽसौ सत्या रुद्रो महेश्वरः ।
आतिष्ठत्सर्वलोकानां हिताय परमेश्वरः ॥
रुद्रः पशुपतिश्चासीत्पुरा दग्धं पुरत्रयम् ।
देवाश्च पशवः सर्वे बभूवुस्तस्य तेजसा ॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि आदिसर्गक्रमं शुभम् ।
स याति ब्रह्मणो लोकं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥
स्वरूप " सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३३१ स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, ३३० सती, दाक्षायणी, विद्या, इच्छा, शक्ति, क्रियात्मिका, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, उमा, हैमवती, कल्याणी, एकमातृका, ३३१ ख्याति, प्रज्ञा, महाभागा, लोकप्रसिद्ध गौरी, गणाम्बिका, महादेवी, नन्दिनी तथा जातवेदसी - ये नाम हैं । पृथक् देह ३३२ धारण करनेसे पहले इनका एक ही रूप था । सावित्री, वरदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, आज्ञा, आवेशनी, कृष्णा, ३३३ तामसी, सात्त्विकी, शिवा, प्रकृति, विकृता, रौद्री, दुर्गा, ३३४ भद्रा, प्रमाथिनी, कालरात्रि, महामाया, रेवती, भूतनायिका— हे सुव्रतो! द्वापरयुग अन्तमें ये उनके नाम हुए । इसी ३३५ प्रकार गौतमी, कौशिकी, आर्या, चण्डी, कात्यायनी, सती, कुमारी, यादवी, देवी, वरदा, कृष्णपिंगला, बर्हिध्वजा, ३३६ शूलधरा, परमा, ब्रह्मचारिणी, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, दृषद्वती, एकशूलधृक्, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, ३३७ शुम्भादिदैत्यहन्त्री, महामहिषमर्दिनी, अमोघा, विन्ध्यनिलया, विक्रान्ता, गणनायिका- मैंने देवी भद्रकालीके इन ३३८ नामविकारोंको यथाक्रम बता दिया, जो सम्यक् फल प्रदान करनेवाले हैं । जो लोग इनका पाठ करते हैं, उनका पाप ३३ ९ शेष नहीं रह जाता है । जंगलमें, पर्वतपर, नगरमें, घरमें, जल अथवा स्थल कहीं भी रक्षाके लिये इनका प्रयोग ३४० करना चाहिये । विशेष रूपसे बाघ, हाथी तथा चोरोंसे भयके स्थानमें और सभी प्रकारकी विपत्तियोंमें देवी ३४१ नामोंको पढ़ना चाहिये । बुरे ग्रहों, भूतों, पूतना तथा मातृगणोंसे पीड़ित शिशुओंकी रक्षा के लिये इन नामोंका प्रयोग करना ३४२ चाहिये॥३३०–३४३ ॥ ‘ प्रज्ञा ' तथा ' श्री ' — ये महादेवीकी दो कलाएँ कही ३४३ गयी हैं । इन दोनोंसे हजारों देवियाँ उत्पन्न हुई हैं, जिनके ३४४ द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है । देवदेव महेश्वर परमेश्वर रुद्र सभी लोकोंके हितके लिये इन सतीके साथ [ सर्वदा ] विद्यमान रहते हैं । रुद्र पशुपति हैं । इन्होंने ही पूर्वकालमें ३४५ त्रिपुरको दग्ध किया था । उन्हींके तेजसे सभी देवता पशु ३४६ [ जीव ] हुए । जो [ व्यक्ति ] आदिसृष्टिके शुभ क्रमकौ पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा उत्तम द्विजोंको सुनाता है, ३४७ | वह ब्रह्मलोकको जाता है ॥ ३४४–३४७ ॥ ॥ ७० ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिविस्तारो नाम सप्ततितमोऽध्यायः सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' सृष्टिविस्तार ' नामक
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३३२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग इकहत्तरवाँ अध्याय तारकासुरके पुत्रों — विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह ऋषय ऊचुः
समासाद्विस्तराच्चैव सर्गः प्रोक्तस्त्वया शुभः ।
कथं पशुपतिश्चासीत्पुरं दग्धुं महेश्वरः ॥
कथं च पशवश्चासन् देवाः सब्रह्मकाः प्रभोः ।
मयस्य तपसा पूर्वं सुदुर्गं निर्मितं पुरम् ॥
हैमं च राजतं दिव्यमयस्मयमनुत्तमम् ।
सुदुर्गं देवदेवेन दग्धमित्येव नः श्रुतम् ॥
कथं ददाह भगवान् भगनेत्रनिपातनः ।
एकेनेषुनिपातेन दिव्येनापि तदा कथम् ॥
विष्णुनोत्पादितैर्भूतैर्न दग्धं तत्पुरत्रयम् ।
पुरस्य सम्भवः सर्वो वरलाभः पुरा श्रुतः ॥
इदानीं दहनं सर्वं वक्तुमर्हसि सुव्रत ।
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः ॥
यथा श्रुतं तथा प्राह व्यासाद्विश्वार्थसूचकात् । सूत उवाच त्रैलोक्यस्यास्य शापाद्धि मनोवाक्कायसम्भवात् ॥
निहते तारके दैत्ये तारपुत्रे सबान्धवे ।
स्कन्देन वा प्रयत्नेन तस्य पुत्रा महाबलाः ॥
विद्युन्माली तारकाक्षः कमलाक्षश्च वीर्यवान् ।
तपस्तेपुर्महात्मानो महाबलपराक्रमाः ॥
तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः ।
तपसा कर्शयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्तमाः ॥
तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम् । दैत्या ऊचुः अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु सर्वदा ॥
ह वरयामासुः सर्वलोकपितामहम् ।
तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरव्ययः ॥
ऋषिगण बोले - [ हे सूतजी! ] आपने संक्षेपमें तथा विस्तारसे शुभ सर्गका निरूपण कर दिया । पशुपति १ महेश्वरने पुरको कैसे दग्ध किया और ब्रह्मासहित सभी देवता प्रभुके पशु कैसे हो गये? मयकी तपस्याके द्व २ पूर्वकालमें उत्तम दुर्गमय पुर निर्मित किया गया था । हमने सुना है कि देवदेव [ शिव ] ने सोने, चाँदी तथा लोहेसे निर्मित दिव्य, उत्तम तथा सुन्दर दुर्गको जला ३ दिया था । भगके नेत्रका नाश करनेवाले भगवान् शिवने केवल एक बाणके प्रक्षेपसे उसे कैसे जला दिया और ४ | विष्णुके द्वारा उत्पन्न किये गये भूतगण उन तीनों पुरोंको क्यों नहीं जला सके? हमलोगोंने [ उस ] पुरकी उत्पत्ति ५ तथा सम्पूर्ण वरप्राप्तिके विषयमें पहले ही सुन लिया हैं; अब हे सुव्रत! [ पुरके ] दहनके विषयमें पूर्णरूपसे ६ बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १–५१ / २ ॥ तब उनका वचन सुनकर पौराणिकोंमें उत्तम सूतजीने समस्त अर्थोंके सूचक व्यासजीसे [ इस विषयमें ] जैसा सुना था, उसे बताया ॥ ६१/२ ॥ ७ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] इस त्रिलोकीके मन - वाणी- शरीरजन्य शापके कारण स्कन्द ( कार्तिकेय ) -८ के द्वारा प्रयत्नपूर्वक बान्धवोंसहित तारपुत्र दैत्य तारकके मार दिये जानेपर उसके महाबली पुत्रों विद्युन्माली, ९ तारकाक्ष तथा पराक्रमी कमलाक्षने तप किया । महान् बल तथा पराक्रमवाले वे महात्मा कठोर तपमें लीन १० होकर परम नियममें स्थित थे । उन श्रेष्ठ दानवोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको दुर्बल बना दिया । तब उनपर प्रसन्न होकर वरदाता ब्रह्माजीने उन्हें वर प्रदान किया॥७–१०१ / २ ॥ ११ दैत्य बोले – ' सभी प्राणियोंसे सर्वदा हम सभीका अवध्यत्व हो ' ' – उन सभीने एक साथ सभी लोकोंके १२ । पितामहसे यह वर माँगा । तब लोकोंके स्वामी अव्यय
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अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों — विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका KKKKKKKKKKKKK¶¶¶¶¶¶¶¶¶¶KKKKKKKKK वृत्तान्त ३३३ नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमतोऽसुराः । देव ब्रह्माने उनसे कहा— ' हे असुरो! सभीको अमरत्व अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते ॥ १३ नहीं हुआ करता, अतः इसे छोड़ो और दूसरा वर माँगो, जो तुमलोगोंको अच्छा लगता हो ' ॥११- १३ ॥ ततस्ते सहिता दैत्याः सम्प्रधार्य परस्परम् । तदनन्तर उन दैत्योंने मिलकर आपसमें विचार ब्रह्माणमब्रुवन् दैत्याः प्रणिपत्य जगद्गुरुम् ॥ १४ ।
वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम् ।
विचरिष्याम लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो ॥ १५
तथा वर्षसहस्त्रेषु समेष्यामः परस्परम् ।
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ ॥ १६
समागतानि चैतानि यो हन्याद्भगवंस्तदा ।
एकेनैवेषुणा देवः स नो मृत्युर्भविष्यति ॥
एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम् ।
ततो मयः स्वतपसा चक्रे वीरः पुराण्यथ ॥
काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम् ।
आयसं चाभवद्भूमौ पुरं तेषां महात्मनाम् ॥
एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम् ।
काञ्चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम् ॥
विद्युन्मालेश्चायसं वै त्रिविधं दुर्गमुत्तमम् ।
मयश्च बलवांस्तत्र दैत्यदानवपूजितः ॥
हैरण्ये राजते चैव कृष्णायसमये तथा ।
आलयं चात्मनः कृत्वा तत्रास्ते बलवांस्तदा ॥
१७ करके जगद्गुरु ब्रह्माको प्रणाम करके कहा- हे लोकेश! हे जगद्गुरो! तीन पुर स्थापित करके हमलोग आपकी १८ कृपासे इस पृथ्वीपर विचरण करें । हमलोग एक हजार वर्षमें आपसमें मिलें और हे अनघ! ये तीनों पुर एकीभावको प्राप्त हों । हे भगवन्! जो इन इकट्ठे हुए को एक ही बाणसे नष्ट कर दे, वह देव हमलोगोंका १ ९ मृत्युस्वरूप हो॥१४–१७ ॥ ' ऐसा ही हो ' – उनसे यह कहकर ब्रह्मदेव स्वर्गलोक चले गये । इसके बाद वीर [ दानव ] मयने अपनी तपस्याके द्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया । उन महात्माओंका २० सुवर्णमय पुर स्वर्गमें, रजत ( चाँदी ) -मय पुर अन्तरिक्षमें तथा लौहमय पुर पृथ्वीपर था । उनमेंसे प्रत्येक पुर लम्बाई तथा चौड़ाई में एक सौ योजनवाला और एक २१ । समान था । सोनेका पुर तारकाक्षका, चाँदीका पुर कमलाक्षका और लोहेका पुर विद्युन्मालीका था; तीनों प्रकारके दुर्ग उत्तम थे । बलशाली मय दैत्यों तथा दानवोंसे पूजित था; वह बलवान् मय वहाँ स्वर्णमय, २२ | रजतमय एवं काले लौहमय पुरमें अपना भवन बनाकर
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३३४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
एवं बभूवुर्दैत्यानामतिदुर्गाणि सुव्रताः ।
पुराणि त्रीणि विप्रेन्द्रास्त्रैलोक्यमिव चापरम् ॥ २३
पुरत्रये तदा जाते सर्वे दैत्या जगत्त्रये ।
पुरत्रयं प्रविश्यैव बभूवुस्ते बलाधिकाः ॥ २४
कल्पद्रुमसमाकीर्णं गजवाजिसमाकुलम् ।
नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालैः समावृतम् ॥ २५
सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः 1 पद्मरागमयैः शुभ्रैः शोभितं चन्द्रसन्निभैः ॥ २६
प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः ।
शोभितं त्रिपुरं तेषां पृथक्पृथगनुत्तमैः ॥ २७
दिव्यस्त्रीभिः सुसम्पूर्णं गन्धर्वैः सिद्धचारणैः ।
रुद्रालयैः प्रतिगृहं साग्निहोत्रैर्द्विजोत्तमाः ॥ २८
वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिस्तु सर्वतः ।
मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः ॥ २ ९
रथैश्च विविधाकारैर्विचित्रैर्विश्वतोमुखैः ।
सभाप्रपादिभिश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक् पृथक् ॥ ३०
वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः समन्ततः ।
अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्मयस्यैव च मायया ॥ ३१
पतिव्रताभिः सर्वत्र सेवितं मुनिपुङ्गवाः ।
कृत्वापि सुमहत्पापमपापैः शङ्करार्चनात् ॥ ३२
दैत्येश्वरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजाः ।
श्रौतस्मार्तार्थधर्मज्ञैस्तद्धर्मनिरतैः सदा ॥ ३३
महादेवेतरं त्यक्त्वा देवं तस्यार्चनं स्थितैः ।
व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सर्वायुधधरैः सदा ॥ ३४
सर्वदा क्षुधितैश्चैव दावाग्निसदृशेक्षणैः ।
प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा ॥३५
नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्धजैः 1 नीलाद्रिमेरुसङ्काशैर्नीरदोपमनिःस्वनैः मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः ॥ ३६
अथ समररतैः सदासमन्ता-च्छिवपदपूजनया सुलब्धवीर्यैः ।
रहा करता था ॥ १८ - २२ ॥
हे सुव्रतो! हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार दैत्योंके सुदृढ़ किलोंसे युक्त वे तीनों पुर दूसरे त्रिलोकीके समान थे । तब तीनों पुरोंके [ निर्मित ] हो जानेपर वे सभी दैत्य उन तीनों पुरोंमें प्रवेश करके तीनों लोकोंमें अत्यधिक बलशाली हो गये ॥ २३-२४ ॥ उनके तीनों पुर कल्पवृक्षोंसे भरे हुए, हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण, अनेक भवनोंसे सुशोभित, मणियोंके जालोंसे घिरे हुए, सभी ओर द्वारोंवाले, सूर्यमण्डलसदृश विमानोंसे युक्त, पद्मरागमय चन्द्रसदृश उज्ज्वल महलोंसे सुशोभित और कैलासशिखरके समान दिव्य तथा अत्युत्तम फाटकोंसे पृथक् - पृथक् मण्डित थे । हे श्रेष्ठ द्विजो! वे पुर दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों एवं चारणोंसे भरे हुए थे । प्रत्येक घरमें रुद्रालय थे और अग्निहोत्र होता था । वे पुर सभी ओर बावलियों, कुओं, तालाबों और बड़ी-बड़ी झीलोंसे युक्त थे; मत्त हाथियोंके झुण्डों, अति सुन्दर घोड़ों, चारों ओर मुखवाले अनेक प्रकारके अद्भुत रथों, सभाभवनों, पानीय ( जल ) - की शालाओं तथा क्रीड़ास्थलोंसे पृथक् - पृथक् समन्वित थे । वे पुर चारों ओर अनेकविध वेदाध्ययनशालाओंसे युक्त थे और मय [ दानव ] - की मायासे अन्य लोगोंद्वारा मनसे भी अलंघ्य थे । हे मुनिश्रेष्ठो! वे पुर सर्वत्र पतिव्रता स्त्रियोंके द्वारा सेवित थे । हे द्विजो! वे पुर बड़े - बड़े पाप करके भी शंकरजीकी पूजाके कारण पापरहित, श्रौतस्मार्त धर्मोंके ज्ञाता तथा अपने धर्मके प्रति परायण भार्यासहित महाभाग्यशाली दैत्योंसे सदा समन्वित थे; महादेवके अतिरिक्त अन्य देवताको छोड़कर उन [ शिव ] –के अर्चनमें स्थित, चौड़ी छातीवाले, बैलके समान कंधेवाले, सर्वदा समस्त आयुध धारण करनेवाले, सदा उपवास करनेवाले, दावानलके समान नेत्रोंवाले, उनमें कुछ शान्त तथा कुछ कुपित, कुबड़े, बौने, नील कमलदलकी आभा सदृश, काले एवं घुँघराले बालोंवाले, नीलपर्वत तथा मेरुके समान प्रतीत होनेवाले, मेघके समान गर्जन करनेवाले, मयके द्वारा रक्षित तथा शिक्षित और युद्धकी तीव्र इच्छावाले दैत्योंसे परिपूर्ण थे । इस प्रकार वे पुर
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अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों - विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका रविमरुदमरेन्द्रसन्निकाशैः सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं तत् ॥
सेन्द्रा देवा द्विजश्रेष्ठा द्रुमा दावाग्निना यथा ।
पुरत्रयाग्निना दग्धा ह्यभवन् दैत्यवैभवात् ॥
अथैवं ते तदा दग्धा देवा देवेश्वरं हरिम् ।
अभिवन्द्य तदा प्राहुस्तमप्रतिमवर्चसम् ॥
सोऽपि नारायणः श्रीमान् चिन्तयामास चेतसा ।
किं कार्यं देवकार्येषु भगवानिति स प्रभुः ॥
तदा सस्मार वै यज्ञं यज्ञमूर्तिर्जनार्दनः ।
यज्वा यज्ञभुगीशानो यज्वनां फलदः प्रभुः ॥
ततो यज्ञः स्मृतस्तेन देवकार्यार्थसिद्धये ।
देवं ते पुरुषं चैव प्रणेमुस्तुष्टुवुस्तदा ॥
भगवानपि तं दृष्ट्वा यज्ञं प्राह सनातनम् ।
सनातनस्तदा सेन्द्रान् देवानालोक्य चाच्युतः ॥
श्रीविष्णुरुवाच
अनेनोपसदा देवा यजध्वं परमेश्वरम् ।
पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये ॥
सूत उवाच
अथ तस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः ।
सिंहनादं महत्कृत्वा यज्ञेशं तुष्टुवुः सुराः ॥
ततः सञ्चिन्त्य भगवान् स्वयमेव जनार्दनः ।
पुनः प्राह स सर्वांस्तांस्त्रिदशांस्त्रिदशेश्वरः ॥
हत्वा दग्ध्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा ।
यजेद्यदि महादेवमपापो नात्र संशयः ॥
अपापा नैव हन्तव्या: पापा एव न संशयः ।
हन्तव्याः सर्वयत्नेन कथं वध्याः सुरोत्तमाः ॥
वृत्तान्त ३३५ 97 96 95 36 36 36 36 36 36 36 36 36 सदा ££££££££££ युद्धपरायण, भलीभाँति शिवके चरणोंकी ******** पूजाके ३७ द्वारा प्राप्त पराक्रमवाले, सूर्य - वायु - इन्द्रसदृश, देवताओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त दृढ़ दैत्योंसे सेवित थे ॥ २५–३७ ॥ ३८ हे द्विजश्रेष्ठो! दैत्योंके वैभवके कारण तीनों पुरोंकी अग्निसे इन्द्रसहित देवतागण उसी प्रकार दग्ध हो गये, जैसे दावाग्निसे वृक्ष दग्ध हो जाते हैं ॥ ३८ ॥
३ ९ इस प्रकार उन दग्ध देवताओंने अतुलनीय तेजवाले देवेश्वर विष्णुको प्रणाम करके उनको [ यह सब ] ४० बताया ॥ ३ ९ ॥ तब उन श्रीमान् प्रभु भगवान् नारायणने मनमें सोचा कि देवताओंके कार्यके विषयमें क्या किया जाना ४१ चाहिये । इसके बाद यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले तथा यज्ञमूर्ति प्रभु जनार्दनने यज्ञदेवका स्मरण किया ॥ ४०-४१ ॥ ४२ तदनन्तर देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये उनके द्वारा स्मरण किये गये यज्ञदेव उपस्थित हुए । तब उन देवताओंने यज्ञदेवको प्रणाम किया और उनकी स्तुति ४३ की । इसके बाद सनातन यज्ञको देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखकर सनातन भगवान् अच्युत ( विष्णु ) उनसे कहने लगे॥४२-४३ ॥ श्रीविष्णु बोले- हे देवताओ! तीनों पुरोंके विनाशके ४४ | लिये तथा तीनों लोकोंकी समृद्धिके लिये इन [ उपस्थित ] उपसद नामक यज्ञके द्वारा परमेश्वरका यजन कीजिये ॥ ४४ ॥
सूतजी बोले- उन बुद्धिमान् देवदेवका वचन सुनकर महान् सिंहनाद करके देवतागण [ उन ] यज्ञेशकी ४५ स्तुति करने लगे ॥ ४५ ॥
इसके बाद स्वयं विचार करके देवताओंके स्वामी वे भगवान् जनार्दन पुनः सभी देवताओंसे बोले— ४६ प्राणियोंको मारकर तथा जलाकर और अन्यायपूर्वक भोग - विलास करके भी यदि कोई महादेवकी पूजा करे, ४७ | तो वह पापरहित हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ४६-४७ ॥ ' निष्पाप लोगोंकी हत्या नहीं की जानी चाहिये; ४८ | केवल पापियोंकी ही हत्या पूर्णप्रयत्नसे की जानी
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३३६ असुरा दुर्मदाः पापा अपि देवैर्महाबलैः तस्मान्न वध्या रुद्रस्य प्रभावात्परमेष्ठिनः कोऽहं ब्रह्माथवा देवा दैत्या देवारिसूदनाः मुनयश्च महात्मानः प्रसादेन विना प्रभोः यः सप्तविंशको नित्यः परात्परतरः प्रभुः विश्वामरेश्वरो वन्द्यो विश्वाधारो महेश्वरः स एव सर्वदेवेशः सर्वेषामपि शङ्करः लीलया देवदैत्येन्द्रविभागमकरोद्धरः तस्यांशमेकं सम्पूज्य देवा देवत्वमागताः । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 5 । । चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है । हे श्रेष्ठ देवताओ! पापी ॥ ४ ९ । होते हुए भी दुर्मद असुर महाबली देवताओंके द्वारा वध्य कैसे हो सकते हैं? क्योंकि परमेष्ठी रुद्रके प्रभावके । कारण वे वध्य नहीं हैं । हे देवताओ! प्रभु [ शिव ] -की ॥ ५० कृपाके बिना मैं कौन हूँ, ब्रह्मा कौन हैं, दैत्य कौन हैं, | देवशत्रुओंके विनाशक कौन हैं और महात्मा मुनिगण । कौन हैं? ॥ ४८ - ५० ॥ ॥ ५१ जो सत्ताईस तत्त्वोंसे युक्त, शाश्वत, महान्से भी । महत्तर, प्रभुतासम्पन्न, सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, वन्दनीय, विश्वके आधार, महेश्वर, सर्वदेवेश तथा सबके स्वामी ॥ ५२ हैं; उन हर शंकरने ही [ अपनी ] लीलासे देवताओं एवं दैत्योंका विभाजन किया है ॥ ५१-५२ ॥ ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो ह्यहं विष्णुत्वमेव च ॥५३ उनके एक अंश ( लिङ्गरूप ) - की पूजा करके
तमपूज्य जगत्यस्मिन् कः पुमान् सिद्धिमिच्छति ।
तस्मात्तेनैव हन्तव्या लिङ्गार्चनविधेर्बलात् ॥
धर्मनिष्ठाश्च ते सर्वे श्रौतस्मार्तविधौ स्थिताः ।
तथापि यजमानेन रौद्रेणोपसदा प्रभुम् ।
रुद्रमिष्ट्वा यथान्यायं जेष्यामो दैत्यसत्तमान् ॥
सतारकाक्षेण मयेन तं स्वस्थं च गुप्तं स्फटिकाभमेकम् । को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम् ॥ सूत उवाच
एवमुक्त्वा हरिश्चेष्ट्वा यज्ञेनोपसदा प्रभुम् ।
उपविष्टो ददर्शाथ भूतसङ्घान् सहस्रशः ॥
शूलशक्तिगदाहस्तान् टङ्कोपलशिलायुधान् ।
नानाप्रहरणोपेतान्नानावेषधरांस्तदा ॥
कालाग्निरुद्रसङ्काशान् कालरुद्रोपमांस्तदा ।
प्राह देवो हरिः साक्षात्प्रणिपत्य स्थितान् प्रभुः ॥
देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है और मुझ विष्णुने विष्णुत्व प्राप्त किया है । ५४ उनकी पूजा किये बिना इस जगत् में कौन व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः लिङ्गार्चनविधिके प्रभावसे उन्हींके द्वारा वे दैत्य हन्तव्य हैं । यद्यपि वे सभी [ दैत्य ] धर्मनिष्ठ हैं तथा श्रौत - स्मार्तविधानमें स्थित हैं, फिर भी ५५ उपसद नामक रुद्रयज्ञसे यजमानके द्वारा विधिपूर्वक प्रभु रुद्रका यजन करके हमलोग महादैत्योंको जीत सकेंगे । एकमात्र त्रिनेत्र भगवान् [ शिव ] - को छोड़कर तारकाक्षसहित [ दानव ] मयके द्वारा सुरक्षित, स्वस्थ, गुप्त तथा स्फटिकके समान आभावाले तीनों पुरोंको नष्ट करनेमें ५६ भला कौन समर्थ है? ॥ ५३–५६ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार उपसद [ नामक ] यज्ञके द्वारा प्रभु [ शिव ] - का यजन करके बैठे हुए विष्णुने हजारों भूतसमुदायोंको देखा । तब शूल - शक्ति-५७ गदासे युक्त हाथोंवाले, टंक - उपल - शिलाको आयुध रूपमें धारण किये हुए, अनेक प्रकारके प्रहारयोग्य ५८ अस्त्रोंसे समन्वित, अनेक वेषोंको धारण किये हुए, कालाग्नि रुद्रके समान प्रतीत होनेवाले तथा कालरुद्रके सदृश उन उपस्थित भूतोंको प्रणाम करके साक्षात् प्रभु ५ ९ । विष्णुदेव कहने लगे ॥ ५७–५९ ॥
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अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों – विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षकावृत्तान्त ३३७ विष्णुरुवाच 36363536355555555 विष्णु बोले - हे वीरो! उस [ त्रिपुर ] दैत्यके
दग्ध्वा भित्त्वा च भुक्त्वा च गत्वा दैत्यपुरत्रयम् ।
पुनर्यथागतं वीरा गन्तुमर्हथ भूतले ॥ ६०
ततः प्रणम्य देवेशं भूतसङ्घाः पुरत्रयम् ।
प्रविश्य नष्टास्ते सर्वे शलभा इव पावकम् ॥ ६१
ततस्तु नष्टास्ते सर्वे भूता देवेश्वराज्ञया ।
ननृतुर्मुमुदुश्चैव जगुर्दैत्याः सहस्रशः ॥ ६२
तुष्टुवुर्देवदेवेशं परमात्मानमीश्वरम् ।
ततः पराजिता देवा ध्वस्तवीर्याः क्षणेन तु ॥ ६३
सेन्द्राः सङ्गम्य देवेशमुपेन्द्रं धिष्ठिता भयात् ।
तान् दृष्ट्वा चिन्तयामास भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ ६४
किं कृत्यमिति सन्तप्तः सन्तप्तान् सेन्द्रकान् क्षणम् ।
कथं तु तेषां दैत्यानां बलं हत्वा प्रयत्नतः ॥ ६५
देवकार्यं करिष्यामि प्रसादात्परमेष्ठिनः ।
पापं विचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः ॥ ६६
तस्माद्दैत्या न वध्यास्ते भूतैश्चोपसदोद्भवैः ।
पापं नुदति धर्मेण धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ६७
धर्मादैश्वर्यमित्येषा श्रुतिरेषा सनातनी ।
दैत्याश्चैते हि धर्मिष्ठाः सर्वे त्रिपुरवासिनः ॥ ६८
तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथा द्विजपुङ्गवाः ।
कृत्वापि सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयन्ति ये ॥ ६ ९
मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा ।
पूजया भोगसम्पत्तिरवश्यं जायते द्विजाः ॥ ७०
तस्मात्ते भोगिनो दैत्या लिङ्गार्चनपरायणाः ।
तस्मात्कृत्वा धर्मविघ्नमहं देवाः स्वमायया ॥ ७१
दैत्यानां देवकार्यार्थं जेष्येऽहं त्रिपुरं क्षणात् । सूत उवाच
विचार्यैवं ततस्तेषां भगवान् पुरुषोत्तमः ।
कर्तुं व्यवसितश्चाभूद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम् ॥७२
असृजच्च महातेजाः पुरुषं चात्मसम्भवम् ।
मायी मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः ॥ ७३
तीनों पुरोंमें जाकर सभीको जलाकर, छिन्न - भिन्न करके और उनका भक्षण करके पुनः आपलोग जैसे आये हैं, वैसे ही भूतलपर चले जायँ ॥६० ॥
तत्पश्चात् देवेशको प्रणाम करके तीनों पुरोंमें प्रवेश करके वे भूतगण उसी तरह नष्ट हो गये, जैसे अग्निमें प्रवेश करके शलभ ( पतिंगे ) नष्ट हो जाते हैं ॥ ६१ ॥
तब देवेश्वरकी आज्ञासे उन सभी भूतोंके नष्ट हो जानेपर हजारों दैत्य आनन्द मनाने लगे, नाचने - गाने लगे और देवेश परमात्मा ईश्वरकी स्तुति करने लगे ॥ ६२ 11 तदनन्तर क्षणभरमें पराजित तथा नष्ट पराक्रमवाले इन्द्रसहित देवतागण देवेश विष्णुके पास पहुँचकर भयपूर्वक खड़े हो गये । तब इन्द्रसहित उन सन्तप्त देवताओंको देखकर भगवान् पुरुषोत्तम उस समय दुःखी होकर सोचने लगे-क्या किया जाना चाहिये? प्रयत्नपूर्वक उन दैत्योंका बल नष्ट करके मैं कैसे देवताओंका कार्य करूँगा? विचारपूर्वक देखा जाय, तो शिवकी कृपासे उन धर्मनिष्ठ दैत्योंमें पाप | नहीं है, अतः वे दैत्य उपसद [ नामक ] यज्ञसे उत्पन्न भूतोंके द्वारा वध्य नहीं हैं । धर्मसे ही पाप नष्ट होता है; सब कुछ धर्ममें ही प्रतिष्ठित है । धर्मसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है - यह सनातनी श्रुति है । [ सूतजीने कहा- ] हे द्विजश्रेष्ठो! तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे सभी दैत्य धर्मनिष्ठ थे, अर्थात् अनुष्ठानमें तत्पर थे । अतः वे अवध्यताको प्राप्त हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है । बहुत बड़ा पाप करके भी जो लोग रुद्रका अर्चन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; जैसे जलसे कमल मुक्त रहता है । हे द्विजो! शिवकी पूजासे भोगसम्पदा अवश्य प्राप्त होती है; वे दैत्य लिङ्ग - पूजामें परायण हैं, अतः वे भोगोंसे युक्त हैं । [ विष्णुने कहा- ] हे देवताओ! इसलिये मैं देवताओंके कार्यके लिये अपनी मायासे दैत्योंके धर्म ( अनुष्ठान ) - में विघ्न डालकर क्षणभरमें तीनों पुरोंको जीत लूँगा ॥ ६३ - ७१ १/२ ॥ सूतजी बोले – ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तम उन देवशत्रुओं ( दैत्यों ) -के धर्ममें विघ्न उत्पन्न करनेके लिये । प्रवृत्त हुए । महातेजस्वी मायावी अच्युतने उनके धर्मविघ्नके
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३३८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग शास्त्रं च शास्ता सर्वेषामकरोत्कामरूपधृक् । लिये अपने शरीरसे मायामय पुरुषका सृजन किया । सबके सर्वसम्मोहनं मायी दृष्टप्रत्ययसंयुतम् ॥७४ शासक तथा स्वेच्छासे रूप धारण करनेवाले मायापति एतत्स्वाङ्गभवायैव पुरुषायोपदिश्य तु मायी मायामयं शास्त्रं ग्रन्थषोडशलक्षकम् श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम् । इहैव स्वर्गनरकं प्रत्ययं नान्यथा पुनः तच्छास्त्रमुपदिश्यैव पुरुषायाच्युतः स्वयम् पुरत्रयविनाशाय प्राहैनं पुरुषं हरिः
गन्तुमर्हसि नाशाय भो तूर्णं पुरवासिनाम् ।
धर्मास्तथा प्रणश्यन्तु श्रौतस्मार्ता न संशयः ॥
ततः प्रणम्य तं मायी मायाशास्त्रविशारदः ।
प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं मुनिर्मायां तदाकरोत् ॥
मायया तस्य ते दैत्याः पुरत्रयनिवासिनः ।
श्रौतं स्मार्तं च सन्त्यज्य तस्य शिष्यास्तदाभवन् ॥
तत्यजुश्च महादेवं शङ्करं परमेश्वरम् ।
नारदोऽपि तदा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः ॥
प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः ।
मुनिः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च संवृतः सर्वतः स्वयम् ॥
स्त्रीधर्मं चाकरोत्स्त्रीणां दुश्चारफलसिद्धिदम् ।
चक्रुस्ताः सर्वदा लब्ध्वा सद्य एव फलं स्त्रियः ॥
जनासक्ता बभूवुस्ता विनिन्द्य पतिदेवताः ।
अद्यापि गौरवात्तस्य नारदस्य कलौ मुनेः ॥
नार्यश्चरन्ति सन्त्यज्य भर्तृन् स्वैरं वृथाधमाः ।
स्त्रीणां माता पिता बन्धुः सखा मित्रं च बान्धवः ॥
भर्ता एव न सन्देहस्तथाप्यासहमायया ।
कृत्वापि सुमहत्पापं या भर्तुः प्रेमसंयुता ॥
[ विष्णु ] - ने देखनेमात्रसे विश्वास उत्पन्न करनेवाले भावसे । युक्त अतएव सबको मोहित करनेवाले शास्त्रका निर्माण ॥ ७५ किया । षोडशलक्षक अर्थात् अत्यन्त विस्तृत श्रुति - स्मृतिसे विरुद्ध तथा वर्णाश्रम - धर्मोंसे रहित इस मायामय शास्त्रका उपदेश अपने शरीरसे उत्पन्न पुरुषको करना चाहिए और ॥ ७६ स्वर्ग - नरक यहीं पर है, ऐसा विश्वास करना चाहिये, इसके । अतिरिक्त कुछ नहीं — इसे प्रतिपादित करनेवाले उस शास्त्रको ॥ ७७ उस पुरुषको स्वयं पढ़ाकर मायामय अच्युत विष्णुने तीनों पुरोंके विनाशहेतु उस पुरुषसे कहा – [ हे पुरुष! ] त्रिपुरवासियोंके नाशके लिये तुम शीघ्र जाओ और ऐसा ७८ प्रयत्न करो, जिससे [ वहाँके ] श्रौतस्मार्त धर्म नष्ट हो जायँ; इसमें संशय नहीं है ॥ ७२–७८ ॥ तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके मायाशास्त्रविशारद ७ ९ | मायावी मुनिने उन पुरोंमें शीघ्र प्रवेश करके माया रची ॥ ७ ९ ॥ तब तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे दैत्य उसकी ८० मायाके कारण श्रौत - स्मार्त धर्मोंका त्याग करके उसके शिष्य हो गये और उन्होंने महादेव परमेश्वर शंकरको ८१ | छोड़ दिया ॥ ८० १/२ ॥ तत्पश्चात् मायामय प्रभुके आदेशसे [ अपने ] शिष्यों - प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए मायावी नारदमुनि ८२ भी उस पुरमें प्रवेश करके उस मायावी [ पुरुष ] -से स्वयं दीक्षित हुए । उन्होंने स्त्रियोंको दुराचार फलकी सिद्धि देनेवाले स्त्रीधर्मका उपदेश दिया । उन स्त्रियोंने ८३ | उसका सदा पालन किया और शीघ्र ही उसका फल प्राप्तकर वे अपने पतिदेवोंकी अवहेलना करके अन्य लोगोंमें आसक्त हो गयीं । उन नारदमुनिके गुरुत्वके ८४ कारण आज भी कलियुगमें अधम स्त्रियाँ पतियोंका त्याग करके व्यभिचार करती हैं ॥ ८१-८४९ / २ ॥ ८५ पति ही स्त्रियोंका माता - पिता, बन्धु, सखा, मित्र तथा बान्धव होता है; इसमें सन्देह नहीं है । फिर भी विष्णुकी असह माया के कारण उन स्त्रियोंने वैसा किया । ८६ | बड़ा - से - बड़ा पाप करके भी जो [ स्त्री ] पतिके प्रति