श्रीगणेशाय नमः।
लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 351–360
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण.... शिवकी स्तुति ३४ ९ तं देवदेवं सुरसिद्धसङ्घा | महेश्वरं भूतगणाश्च सर्वे । गणेश्वरा नन्दिमुखास्तदानीं स्ववाहनैरन्वयुरीशमीशाः ॥ ५१ । अग्रे सुराणां च गणेश्वराणां तदाथ नन्दी गिरिराजकल्पम् । विमानमारुह्य पुरं प्रहर्तुं जगाम मृत्युं भगवानिवेशः ॥ ५२ यान्तं तदानीं तु शिलादपुत्र-मारुह्य नागेन्द्रवृषाश्ववर्यान् । देवास्तदानीं गणपाश्च सर्वे गणा ययुः स्वायुधचिह्नहस्ताः ॥ ५३ खगेन्द्रमारुह्य नगेन्द्रकल्पं खगध्वजो वामत एव शम्भोः । जगाम तूर्णं जगतां हि पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्तिः ॥ ५४ तं सर्वदेवाः सुरलोकनाथं सुरासुरेशं रराज यथा समन्ततश्चान्वयुरप्रमेयम् I शितशक्तिटङ्क-गदात्रिशूलासिवरायुधैश्च ॥५५ मध्ये भगवान् सुराणां विवाह वारिजपत्रवर्णः । सुमेरोः शिखराधिरूढः सहस्ररश्मिर्भगवान् सुतीक्ष्णः ॥ ५६ सहस्त्रनेत्रः प्रथमः सुराणां गजेन्द्रमारुह्य च दक्षिणेऽस्य । जगाम रुद्रस्य पुरं निहन्तुं यथोरगांस्तत्र तु वैनतेयः ॥ ५७ तं सिद्धगन्धर्वसुरेन्द्रवीराः सुरेन्द्रवृन्दाधिपमिन्द्रमीशम् समन्ततस्तुष्टुवुरिष्टदं जयेति शक्रं वरपुष्पवृष्ट्या ॥ ५८ तदा ह्यहल्योपपतिं सुरेशं जगत्पतिं देवपतिं दिविष्ठाः । K ईश्वरोंके नायक पूजनीय विनायककी पूजा करके तीनों पुरोंको जलानेके लिये गणेश्वरोंके साथ चल पड़े ॥ ५० ॥
उस समय सभी देवता, सिद्ध, भूतगण, नन्दी आदि गणेश्वर तथा अन्य ईश्वर अपने - अपने वाहनोंसे उन देवदेव ईश महेश्वरके पीछे - पीछे चले ॥ ५१ ॥
हिमालयसदृश विमानपर चढ़कर नन्दी [ सभी ] देवताओं तथा गणेश्वरोंके आगे होकर त्रिपुरपर प्रहार करनेके लिये चले, मानो भगवान् शिव मृत्युपर प्रहारहेतु चले हों ॥ ५२ ॥
उस समय जाते हुए शिलादपुत्र [ नन्दी ] - के पीछे सभी देवता, गणेश्वर तथा गणलोग विशाल हाथियों, बैलों और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर हाथोंमें अपने शस्त्र तथा चिह्न धारण किये हुए चले ॥ ५३ ॥
महाशक्तिशाली गरुड़ध्वज [ विष्णु ] गिरीन्द्रसदृश पक्षिराज [ गरुड़ ] - पर आरूढ़ होकर लोकोंके हितार्थ | तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये शिवजीके बायें होकर शीघ्रतापूर्वक चले ॥५४ ॥
सभी देवता तीक्ष्ण शक्ति ( बर्छा ), टंक, गदा, त्रिशूल, खड्ग आदि उत्तम आयुधोंसे युक्त होकर देवलोकके नाथ, देवताओं तथा असुरोंके स्वामी और अप्रमेय उन शिवके पीछे - पीछे सभी ओरसे चले ॥ ५५ ॥
कमलपत्र के समान वर्णवाले गरुड़वाहन भगवान् विष्णु देवताओंके मध्य ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सुमेरु [ पर्वत ] - के शिखरपर आरूढ़ हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्य हों ॥५६ ॥
गजेन्द्र ( ऐरावत ) - पर आरूढ़ होकर देवताओंके प्रमुख सहस्र नेत्रवाले [ इन्द्र ] रुद्रके दाहिनी ओर होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; मानो गरुड़ सर्पोंका नाश करनेके लिये चल दिये हों ॥५७ ॥
सिद्ध, गन्धर्व, श्रेष्ठ देवता तथा अन्य वीर देवताओंके स्वामी प्रभु उन इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे और वे श्रेष्ठ पुष्पवृष्टिके साथ कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले इन्द्रकी जय - जयकार कर रहे थे ॥ ५८ ॥
उस समय स्वर्गमें स्थित देवताओंने अहल्याके उपपति, देवताओंके ईश, जगत्के स्वामी, देवताओंके
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३५० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग प्रणेमुरालोक्य सहस्रनेत्रं | स्वामी तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको देखकर लीलापूर्वक सलीलमम्बा तनयं यथेन्द्रम् ॥ ५ ९ उसी प्रकार प्रणाम किया, जैसे माता पार्वती पुत्र यमपावकवित्तेशा वायुर्निरृतिरेव च अपां पतिस्तथेशानो भवं चानुसमागताः वीरभद्रो रणे भद्रो नैर्ऋत्यां वै रथस्य तु वृषभेन्द्रं समारुह्य रोमजैश्च समावृतः सेवां चक्रे पुरं हन्तुं देवदेवं त्रियम्बकम् । महाकालो महातेजा महादेव इवापरः वायव्यां सगणैः सार्धं सेवां चक्रे रथस्य तु मुखप सह सिद्धचारणैः सेनया च गिरिराजसन्निभः देवनाथगणवृन्दसंवृतो वारणेन च तथाग्निसम्भवः ॥ विघ्नं गणेशोऽप्यसुरेश्वराणां कृत्वा सुराणां भगवानविघ्नम् । विघ्नेश्वरो विघ्नगणैश्च सार्धं तं देशमीशानपदं जगाम ॥ तदा कालनिशाप्रकाशं शूलं कपालाभरणा करेण । प्रकम्पयन्ती च तदा सुरेन्द्रान् महासुरासृङ्मधुपानमत्ता ॥ मत्तेभगामी मदलोलनेत्रा मत्तैः पिशाचैश्च गणैश्च मत्तैः । मत्तेभचर्माम्बरवेष्टिताङ्गी ययौ पुरस्ताच्च गणेश्वरस्य ॥ तां सिद्धगन्धर्वपिशाचयक्ष-विद्याधराहीन्द्रसुरेन्द्रमुख्याः 1 प्रणेमुरुच्चैरभितुष्टुवुश्च जयेति देवीं हिमशैलपुत्रीम् ॥ मातरः सुरवरारिसूदनाः सादरं सुरगणैः सुपूजिताः । मातरं ययुरथ स्ववाहनैः स्वैर्गणैर्ध्वजधरैः समन्ततः ॥ कार्तिकेयको प्रणाम करती हैं ॥ ५ ९ ॥ । ॥ ६० यम, अग्नि, कुबेर, वायु, निर्ऋति, वरुण तथा ईशान भी शिवजीके पीछे - पीछे चले ॥ ६० ॥
। युद्धमें प्रवीण वीरभद्र वृषभेन्द्रपर आरूढ़ होकर ॥ ६१ | रथके नैर्ऋत्यकोण ( दक्षिण - पश्चिम ) - में होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; अपने रोमजसंज्ञक बाणोंसे घिरे ॥ ६२ हुए वे देवदेव त्रियम्बककी सेवा कर रहे थे । दूसरे ॥ ६३ महादेवके समान प्रतीत होनेवाले महातेजस्वी महाकाल रथके वायव्यकोण ( उत्तर - पश्चिम ) - में होकर गणोंके । साथ रथकी सेवा कर रहे थे । ६१-६३ ॥ गिरिराजके समान प्रतीत होनेवाले तथा अग्निसे ६४ उत्पन्न षडानन भी सिद्धों, चारणों एवं देवसेनाके साथ शिवके गणोंसे आवृत होकरके हाथीपर सवार होकर चले ॥ ६४ ॥
विघ्नेश्वर भगवान् गणेश भी असुरेश्वरोंका विघ्नं ६५ करके तथा देवताओंका अविघ्न करके विघ्नगणों के साथ उस देश ( त्रिपुर ) की ओर शिवजीके पीछे - पीछे चले ॥ ६५ ॥
उस समय हाथमें कालरात्रिके समान प्रकाशमान ६६ | त्रिशूल धारण किये, कपालके आभूषणवाली, बड़े - बड़े असुरोंके रक्तरूपी मधुके पानसे मत्त, मतवाले हाथीके समान चालवाली, मदसे चंचल नेत्रोंवाली, मतवाले हाथियोंके चर्मरूपी वस्त्रसे वेष्टित अंगोंवाली काली देवताओंको ६७ कम्पित करती हुई मत्तपिशाचों तथा मतवाले गणोंके साथ गणेशजीके आगे - आगे चलीं ॥ ६६-६७ ॥ सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, विद्याधरों, सर्पों तथा प्रमुख देवताओंने उन देवी पार्वतीको प्रणाम किया, उच्च स्वरसे उनकी स्तुति की तथा उनका जयकार ६८ किया ॥ ६८ ॥
इसी प्रकार देवशत्रुओंका संहार करनेवाली तथा देवताओंके द्वारा आदरपूर्वक पूजित देवमाताएँ सभी ओर ध्वज धारण किये हुए अपने - अपने गणोंके साथ ६ ९ । अपने - अपने वाहनोंसे माताके पीछे - पीछे चलीं ॥६ ९ ॥
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण.... शिवकी स्तुति ३५१ दुर्गारूढमृगाधिपा दुरतिगा दोर्दण्डवृन्दैः शिवा बिभ्राणाङ्कुशशूलपाशपरशुं चक्रासिशङ्खायुधम् । प्रौढादित्यसहस्रवह्निसदृशैर्नेत्रैर्दहन्ती पथं बाला बालपराक्रमा भगवती दैत्यान् प्रहर्तुं ययौ ॥ ७० तं देवमीशं त्रिपुरं निहन्तुं गजैर्हयैः हलैश्च ययुः तदा तु देवेन्द्ररविप्रकाशाः । सिंहवरैरथैश्च वृषैर्य गणराजमुख्याः ॥ ७१ फालैर्मुसलैर्भुशुण्डै-गिरीन्द्रकूटैर्गिरिसन्निभास्ते 1 पुरस्ताद्ध महेश्वरस्य सुरेश्वरा भूतगणेश्वराश्च ॥ ७२ तथेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः सुरा गणेशाश्च गणेशमीशम् । जयेति वाग्भिर्भगवन्तमूचुः किरीटदत्ताञ्जलयः समन्तात् ॥७३ । ननृतुर्मुनयः सर्वे दण्डहस्ता जटाधराः ।
वृषुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ।
पुरत्रयं च विप्रेन्द्राः प्राणदत्सर्वतस्तथा ॥ ७४
गणेश्वरैर्देवगणैश्च भृङ्गी समावृतः सर्वगणेन्द्रवर्यः । जगाम योगी त्रिपुरं निहन्तुं विमानमारुह्य यथा महेन्द्रः ॥ ७५
केशो विगतवासाश्च महाकेशो महाज्वरः ।
सोमवल्ली सवर्णश्च सोमपः सेनकस्तथा ॥ ७६
सोमधृक् सूर्यवाचश्च सूर्यपेषणकस्तथा ।
सूर्याक्षः सूरिनामा च सुरः सुन्दर एव च ॥ ७७
प्रकुदः ककुदन्तश्च कम्पनश्च प्रकम्पनः ।
इन्द्रश्चेन्द्रजयश्चैव महाभीर्भीमकस्तथा ॥ ७८
शताक्षश्चैव पञ्चाक्षः सहस्राक्षो महोदरः ।
यमजिह्वः शताश्वश्च कण्ठनः कण्ठपूजनः ॥ ७ ९
द्विशिखस्त्रिशिखश्चैव तथा पञ्चशिखो द्विजाः ।
मुण्डोऽर्धमुण्डो दीर्घश्च पिशाचास्यः पिनाकधृक् ॥ ८०
पिप्पलायतनश्चैव तथा ह्यङ्गारकाशनः ।
शिथिलः शिथिलास्यश्च अक्षपादो ह्यजः कुजः ॥ ८१
अजवक्त्रो हयवक्त्रो गजवक्त्रोर्ध्ववक्त्रकः ।
इत्याद्याः परिवार्येशं लक्ष्यलक्षणवर्जिताः ॥ ८२
वृन्दशस्तं समावृत्य जग्मुः सोमं गणैर्वृताः ।
सहस्राणां सहस्राणि रुद्राणामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ८३
बालरूपा होते हुए भी अमित पराक्रमवाली तथा [ सबके द्वारा ] अनतिक्रमणीय भगवती दुर्गा सिंहपर सवार होकर [ अपनी ] भुजाओंमें अंकुश, शूल, पाश, परशु, चक्र, खड्ग, शंख आदि आयुध धारण किये हुए और मध्याह्नकालीन सूर्य तथा हजार अग्नियोंके समान [ देदीप्यमान ] नेत्रोंसे मार्गको जलाती हुई [ उन ] दैत्योंपर प्रहार करनेके लिये चलीं ॥७० ॥
उस समय इन्द्र तथा सूर्यके समान कान्तिवाले मुख्य गणेश्वर त्रिपुरका नाश करनेके लिये हाथियों, घोड़ों, उत्तम सिंहों, रथों तथा वृषभोंपर सवार होकर उन भगवान् शिवके पीछे चले ॥ ७१ ॥
हलों, फालों, मुसलों, लौहनिर्मित गदाओं तथा पर्वतशिखरोंको धारण किये हुए गिरिसदृश वे सुरेश्वर, भूत तथा गणेश्वर महेश्वरके आगे - आगे चले ॥७२ ॥
इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता और [ सभी ] गणेश्वर अपने मुकुटोंको अंजलिपर टिकाकर [ प्रणाम करते हुए ] चारों ओरसे वाणीद्वारा ईश भगवान् गणेशकी जय बोल रहे थे ॥ ७३ ॥
हाथमें दण्ड लिये हुए जटाधारी सभी मुनियोंने नृत्य किया और आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने । पुष्पवर्षा की । हे विप्रेन्द्रो! त्रिपुर चारों ओरसे गूँज उठा ॥ ७४ ॥
सभी गणेश्वरोंमें श्रेष्ठ योगपरायण भृंगी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति गणेश्वरोंसे घिरे होकर चढ़कर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले ॥ हे द्विजो! केश, विगतवास, महाकेश, सोमवल्ली, सवर्ण, सोमप, सेनक, सोमधृक्, सूर्यपेषण, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रकुद, कम्पन, प्रकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, महाभी, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, यमजिह्व विमानपर ७५ ॥ महाज्वर, सूर्यवाच, ककुदन्त, भीमक, , शताश्व, कण्ठन, कण्ठपूजन, द्विशिख, त्रिशिख, पंचशिख, मुण्ड, अर्धमुण्ड, दीर्घ, पिशाचास्य, पिनाकधृक्, पिप्पलायतन, अंगारकाशन, शिथिल, शिथिलास्य, अक्षपाद, अज, कुज, अजवक्त्र, हयवक्त्र, गजवक्त्र, ऊर्ध्ववक्त्र तथा | अन्य लक्ष्यलक्षण- वर्जित गणेश्वर एक साथ मिलकर
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३५२ फ्र समावृत्य महादेवं देवदेवं महेश्वरम् दग्धुं पुरत्रयं जग्मुः कोटिकोटिगणैर्वृताः त्रयस्त्रिंशत्सुराश्चैव त्रयश्च त्रिशतास्तथा । त्रयश्च त्रिसहस्राणि जग्मुर्देवाः समन्ततः मातरः सर्वलोकानां गणानां चैव मातरः । भूतानां मातरश्चैव जग्मुर्देवस्य पृष्ठतः
भाति मध्ये गणानां च रथमध्ये गणेश्वरः ।
नभस्यमलनक्षत्रे तारामध्य इवोडुराट् ॥
रराज देवी देवस्य गिरिजा पार्श्वसंस्थिता ।
तदा प्रभावतो गौरी भवस्येव जगन्मयी ॥
शुभावती तदा देवी पार्श्वसंस्था विभाति सा ।
चामरासक्तहस्ताग्रा सा हेमाम्बुजवर्णिका ॥
अथ विभाति विभोर्विशदं वपु -र्भसितभासितमम्बिकया तया । सितमिवाभ्रमहो इह विद्यु नभसि देवपतेः परमेष्ठिनः ॥
भातीन्द्रधनुषाकाशं मेरुणा च यथा जगत् ।
हिरण्यधनुषा सौम्यं वपुः शम्भो: शशिद्युति ॥
सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं परमेष्ठिनः ।
यथोदये शशाङ्कस्य भात्यखण्डं हि मण्डलम् ॥
सदुकूला शिवे रक्ता लम्बिता भाति मालिका ।
छत्रान्ता रत्नजाकाशात्पतन्तीव सरिद्वरा ॥
अथ महेन्द्रविरिञ्चिविभावसु-प्रभृतिभिर्नतपादसरोरुहः I सह तदा च जगाम तयाम्बया सकललोकहिताय पुरत्रयम् ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । अपने गणसमुदायोंके साथ उन शिवजीको घेरकर चले । ॥ ८४ । इसी प्रकार [ अपने ] करोड़ों - करोड़ गणोंसे घिरे हुए हजारों - हजार रुद्र तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये । महादेव देवदेव महेश्वरको घेरकर चले ॥ ७६-८४ ॥ ॥ ८५ [ वसु, रुद्र, आदित्य आदि ] तैंतीस देवता; ब्रह्मा , विष्णु, महेश — ये तीनों देवता और उनके भेदरूप तीन सौ तथा तीन हजार तीन अन्य देवता सभी ओरसे वहाँ ॥ ८६ गये ॥ ८५ ॥
सभी लोकोंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ तथा भूतोंकी माताएँ शिवजीके पीछे - पीछे चलीं ॥ ८६ ॥
८७ रथके मध्य [ विराजमान ] गणेश्वर गणोंके बीच उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, जैसे निर्मल नक्षत्रोंवाले आकाशमें ताराओंके बीच चन्द्रमा ॥ ८७ ॥
८८ उस समय शिवके प्रभाव ( सामर्थ्य ) - के कारण ही जगन्मयी पार्वती देवी [ उन ] शिवके वामभागमें ८ ९ स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं । उस समय सुवर्णकमलके समान वर्णवाली देवी शुभावती ( पार्वतीकी सखी ) हाथके अग्रभागमें चँवर लिये हुए उनके बगलमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं ॥ ८८-८९ ॥ सर्वव्यापी देवेश्वर शिवका भस्मसे दीप्यमान अतिस्वच्छ विग्रह उन पार्वतीके साथ उसी प्रकार प्रतीत ९ ० हो रहा था, जैसे आकाशमें विद्युत् के साथ श्वेत बादल ॥ ९ ० ॥ ९ १ सुवर्णमय धनुषसे युक्त तथा चन्द्रमाकी प्रभावाला | शंकरजीका सौम्य शरीर इन्द्रधनुषसे युक्त आकाश अथवा मेरुपर्वतसे युक्त जगत्की भाँति प्रतीत हो रहा था ॥ ९ १ ॥ ९ २ रत्नोंकी किरणोंसे मिश्रित शिवजीका श्वेत छत्र उदयकालमें चन्द्रमाके पूर्णमण्डलके समान प्रतीत हो रहा था ॥ ९ २ ॥ ९ ३ शिवजीके गलेमें रेशमी वस्त्रसहित लटकती हुई रत्नमयी मोतियोंकी माला उनके छत्रके पास आकाशसे गिरती हुई गंगाके समान प्रतीत हो रही थी ॥ ९ ३ ॥ इस प्रकार महेन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि आदिके द्वारा वन्दित चरणकमलवाले शिवजीने समस्त संसारके हितके ९ ४ । लिये उन पार्वतीके साथ त्रिपुरके लिये प्रस्थान किया ॥ ९ ४ ॥
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण.... शिवकी स्तुति ३५३ दग्धुं समर्थो मनसा क्षणेन चराचरं सर्वमिदं त्रिशूली । किमत्र दग्धुं त्रिपुरं पिनाकी स्वयं गतश्चात्र गणैश्च सार्धम् ॥ रथेन किं चेषुवरेण तस्य गणैश्च किं देवगणैश्च शम्भोः । पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्तेः किमेतदित्याहुरजेन्द्रमुख्याः ॥ मन्वाम नूनं भगवान् पिनाकी
लीलार्थमेतत्सकलं प्रवर्तुम् ।
व्यवस्थितश्चेति तथान्यथा चे-दाडम्बरेणास्य फलं किमन्यत् ॥
पुरत्रयस्यास्य समीपवर्ती सुरेश्वरैर्नन्दिमुखैश्च नन्दी । गणैर्गणेशस्तु रराज देव्या जगद्र मेरुरिवाष्टशृङ्गैः ॥ अथ निरीक्ष्य सुरेश्वरमीश्वरं सगणमद्रिसुतासहितं तदा । त्रिपुररङ्गतलोपरि संस्थितः सुरगणोऽनुजगाम स्वयं तथा ॥ जगत्त्रयं सर्वमिवापरं तत् पुरत्रयं तत्र विभाति सम्यक् । नरेश्वरैश्चैव गणैश्च देवैः त्रिविधैर्मुनीन्द्राः ॥
अथ सज्यं धनुः कृत्वा शर्वः सन्धाय तं शरम् ।
युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत् ॥
तस्मिंस्थिते महादेवे रुद्रे विततकार्मुके ।
पुराणि तेन कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै ॥
एकीभावं गते चैव त्रिपुरे समुपागते ।
बभूव तुमुलो हर्षो देवतानां महात्मनाम् ॥
ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।
जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो ऽष्टमूर्तिनम् ॥
अथाह भगवान् ब्रह्मा भगनेत्रनिपातनम् ।
पुष्ययोगेऽपि सम्प्राप्ते लीलावशमुमापतिम् ॥
स्थाने तव महादेव चेष्टेयं परमेश्वर ।
पूर्वदेवाश्च देवाश्च समास्तव यतः प्रभो ॥
तथापि देवा धर्मिष्ठाः पूर्वदेवाश्च पापिनः ।
यतस्तस्माज्जगन्नाथ लीलां त्यक्तुमिहार्हसि ॥
त्रिशूलधारी पिनाकी ( शिव ) मनसे ही क्षणभरमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को दग्ध करनेमें समर्थ हैं, तो फिर वे त्रिपुरको जलानेके लिये गणोंके साथ वहाँ ९ ५ क्यों जा रहे हैं? तीनों पुरोंको जलानेके लिये उन अलुप्त शक्तिवाले शम्भुको रथसे, उत्तम बाणसे, गणोंसे तथा देवताओंसे क्या प्रयोजन है - ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रमुख देवोंने ऐसा कहा । हमलोग तो समझते हैं कि ९ ६ पिनाकधारी भगवान् [ शिव ] - लीलाके लिये यह सब करनेके लिये प्रवृत्त हैं; अन्यथा [ इस ] आडम्बरसे इन्हें दूसरा कौन - सा लाभ है? ॥ ९ ५ – ९ ७ ॥ ९ ७ इस त्रिपुरके समीपस्थित नन्दी, नन्दिकेश्वर आदि सुरेश्वरोंके साथ, गणेशजी गणोंके साथ तथा मेरुपर्वत आठ शिखरोंके साथ जिस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, उसी प्रकार जगद्रथ ( शिव ) देवी [ पार्वती ] -के साथ ९ ८ शोभायमान थे ॥ ९ ८ ॥। इसके बाद गणों तथा पार्वतीसहित सुरेश्वर शिवको देखकर त्रिपुरके युद्धक्षेत्रमें उपस्थित देवसमूहने स्वयं उनका अनुगमन किया ॥ ९९ ॥
९९ मुनीश्वरो! युद्धकालमें तीन प्रकारके दैत्योंसे युक्त वे तीनों पुर राजाओं, [ सिद्ध आदि ] गणों तथा देवताओंसे युक्त तीनों लोकके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ १०० ॥
इसके बाद धनुषपर डोरी चढ़ाकर उसपर बाण १०० रखकर उसे पाशुपत - अस्त्रसे युक्त करके शिवजीने त्रिपुरका चिन्तन किया ॥ १०१ ॥
१०१ धनुष ताने हुए उन महादेवके खड़े होनेपर उसी समय तीनों पुर शीघ्र ही आपसमें जुड़ गये । तीनों पुरोंके १०२ एकमें मिल जानेपर तथा समीपमें आ जानेपर महान् आत्मावाले १०३ [ इन्द्र आदि ] देवताओंको परम हर्ष हुआ ॥ १०२-१०३ ॥ तदनन्तर सभी देवगण, सिद्ध तथा महर्षिगण अष्टमूर्ति १०४ [ शिव ] -की स्तुति करते हुए उनकी जय बोलने लगे ॥ १०४ ॥
इसके बाद पुष्य नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर १०५ भगवान् ब्रह्माने भगके नेत्रका विनाश करनेवाले लीलासक्त उमापतिसे कहा - हे महादेव! हे परमेश्वर! १०६ हे प्रभो! इस स्थानपर आपकी यह भावना है कि दैत्य तथा देवता आपके लिये समान हैं, फिर भी देवता १०७ | धर्मनिष्ठ हैं और दैत्य पापी हैं; अतः हे जगन्नाथ!
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किं रथेन ध्वजेनेश तव दग्धुं पुरत्रयम् ।
इषुणा भूतसङ्घैश्च विष्णुना च मया प्रभो ॥
पुष्ययोगे त्वनुप्राप्ते पुरं दग्धुमिहार्हसि ।
यावन्न यान्ति देवेश वियोगं तावदेव तु ॥
दग्धुमर्हसि शीघ्रं त्वं त्रीण्येतानि पुराणि वै ।
अथ देवो महादेवः सर्वज्ञस्तदवैक्षत ॥
पुरत्रयं विरूपाक्षस्तत्क्षणाद्भस्म वै कृतम् ।
सोमश्च भगवान् विष्णुः कालाग्निर्वायुरेव च ॥
शरे व्यवस्थिताः सर्वे देवमूचुः प्रणम्य तम् ।
दग्धमप्यथ देवेश वीक्षणेन पुरत्रयम् ॥
अस्मद्धितार्थं देवेश शरं मोक्तुमिहार्हसि ।
अथ सम्मृज्य धनुषो ज्यां हसन् त्रिपुरार्दनः ॥
मुमोच बाणं विप्रेन्द्रा व्याकृष्याकर्णमीश्वरः ।
तत्क्षणात् त्रिपुरं दग्ध्वा त्रिपुरान्तकरः शरः ॥
देवदेवं समासाद्य नमस्कृत्य व्यवस्थितः ।
रेजे पुरत्रयं दग्धं दैत्यकोटिशतैर्वृतम् ॥
इषुणा तेन कल्पान्ते रुद्रेणेव जगत्त्रयम् ।
ये पूजयन्ति तत्रापि दैत्या रुद्रं सबान्धवाः ॥
गाणपत्यं तदा शम्भोर्ययुः पूजाविधेर्बलात् ।
न किञ्चिदब्रुवन् देवाः सेन्द्रोपेन्द्रा गणेश्वराः ॥
भयाद्देवं निरीक्ष्यैव देवीं हिमवतः सुताम् ।
दृष्ट्वा भीतं तदानीकं देवानां देवपुङ्गवः ॥
किं चेत्याह तदा देवान् प्रणेमुस्तं समन्ततः ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग फ्र आप यहाँ अपनी लीलाका त्याग करें । हे ईश! हे १०८ प्रभो! तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये आपको रथ, ध्वज, बाण, भूतगणों, विष्णु तथा मुझ [ ब्रह्मा ] - से क्या १० ९ प्रयोजन है? पुष्ययोग प्राप्त होनेपर आप कृपा करके ११० त्रिपुरको दग्ध कर दीजिये । हे देवेश! जबतक ये तीनों पुर अलग - अलग न हो जायँ, तबतक आप इन्हें जला दीजिये ॥ १०५–१०९ १ / २ ॥ तदनन्तर सब कुछ जाननेवाले तथा विरूपाक्ष ( त्रिलोचन ) भगवान् महादेवने त्रिपुरकी ओर देखा और उसी क्षण उसे भस्म कर दिया । तब उनके बाणमें स्थित चन्द्र, भगवान् विष्णु, कालाग्नि तथा वायु - इन सभीने उन शिवजीको प्रणाम करके कहा - हे देवेश! आपके देखनेमात्र से त्रिपुर दग्ध हो गया, फिर भी हे देवेश! हमलोगोंके हितके लिये आप बाणको छोड़ दीजिये ॥ ११०–११२९ २ ॥ हे विप्रेन्द्रो! इसके बाद धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसे कानतक खींचकर त्रिपुरका नाश करनेवाले शिवने हँसते हुए बाण छोड़ दिया । त्रिपुरका नाश १११ करनेवाला वह बाण उसी क्षण त्रिपुरको जलाकर देवदेवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके व्यवस्थित हो ११२ गया ॥ ११३-११४१ / २ ॥ उस बाणके द्वारा सैकड़ों - करोड़ दैत्योंसहित दग्ध ११३ किया गया वह त्रिपुर कल्पके अन्तमें रुद्रके द्वारा दग्ध किये गये त्रिलोकके समान प्रतीत हो रहा था । वहाँ ११४ [ त्रिपुरमें ] भी जिन दैत्योंने बान्धवोंके साथ रुद्रका पूजन ११५ किया, उन्होंने शम्भुकी पूजाविधिके प्रभावसे गाणपत्य ( गणपतिपद ) प्राप्त किया ॥ ११५-११६१ / २ ॥ ११६ इन्द्र - विष्णुसहित सभी देवता तथा गणेश्वर शिव तथा हिमालयपुत्री देवी [ पार्वती ] की ओर देखकर ११७ भयवश कुछ नहीं बोले । तब देवताओंकी सेनाको ११८ | भयभीत देखकर देवश्रेष्ठ [ शिव ] -ने देवताओंसे कहा— ११ ९ | ' क्या बात है? ' इसपर वे सभी ओरसे उन्हें केवल 1985 Lingamahapuran_Section_13_1_Back
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण.... शिवकी स्तुति ३५५ aa न्दिरे नन्दिनमिन्दुभूषणं aa न्दिरे पर्वतराजसम्भवाम् । aa न्दिरे चाद्रिसुतासुतं प्रभुं ववन्दिरे देवगणा महेश्वरम् ॥
तुष्टाव हृदये ब्रह्मा देवैः सह समाहितः ।
विष्णुना च भवं देवं त्रिपुरारातिमीश्वरम् ॥
श्रीपितामह उवाच
प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर ।
प्रसीद जगतां नाथ प्रसीदानन्ददाव्यय ॥
पञ्चास्य रुद्ररुद्राय पञ्चाशत्कोटिमूर्तये ।
आत्मत्रयोपविष्टाय विद्यातत्त्वाय ते नमः ॥
शिवाय शिवतत्त्वाय अघोराय नमो नमः ।
अघोराष्टकतत्त्वाय द्वादशात्मस्वरूपिणे ॥
विद्युत्कोटिप्रतीकाशमष्टकाशं सुशोभनम् ।
रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय शिवात्मने ॥
अग्निवर्णाय रौद्राय अम्बिकार्धशरीरिणे ।
धवलश्यामरक्तानां मुक्तिदायामराय च ॥
ज्येष्ठाय रुद्ररूपाय सोमाय वरदाय च ।
त्रिलोकाय त्रिदेवाय वषट्काराय वै नमः ॥
मध्ये गगनरूपाय गगनस्थाय ते नमः ।
अष्टक्षेत्राष्टरूपाय अष्टतत्त्वाय ते नमः ॥
चतुर्धा च चतुर्धा च चतुर्धा संस्थिताय च ।
पञ्चधा पञ्चधा चैव पञ्चमन्त्रशरीरिणे ॥
चतुःषष्टिप्रकाराय अकाराय नमो नमः ।
द्वात्रिंशत्तत्त्वरूपाय उकाराय नमो नमः ॥
षोडशात्मस्वरूपाय मकाराय नमो नमः ।
अष्टधात्मस्वरूपाय अर्धमात्रात्मने नमः ॥
प्रणाम करते रहे । देवताओंने इन्दुभूषण नन्दीको प्रणाम किया, पर्वतराजकी पुत्री [ पार्वती ] को प्रणाम किया, | पार्वतीपुत्र [ गणेश ] - को प्रणाम किया और प्रभु महेश्वरको १२० प्रणाम किया । इसके बाद ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर देवताओं तथा विष्णुके साथ त्रिपुरशत्रु भगवान् भव ईश्वरकी हृदयसे स्तुति करने लगे ॥ ११७-१२१ ॥ १२१ श्रीपितामह बोले- हे देवदेवेश! प्रसन्न हो जाइये । हे परमेश्वर! प्रसन्न हो जाइये । हे जगन्नाथ! प्रसन्न हो जाइये । हे आनन्ददाता! हे अव्यय! हे पंचमुख! प्रसन्न हो जाइये । [ यम आदि ] रुद्रोंको भी १२२ रुलानेवाले, पचास करोड़ मूर्तिवाले, [ विश्व - प्राज्ञ– तैजस ] तीन रूपोंमें स्थित रहनेवाले तथा विद्याओंमें १२३ मुख्य कारणस्वरूप आपको नमस्कार है । शिव, शिवतत्त्व, अघोर, भैरवाष्टकके कारणरूप तथा द्वादश आत्मास्वरूपीको
बार - बार नमस्कार है । १२२ - १२४ ॥
१२४ करोड़ों विद्युत् के समान तथा पृथिवी आदिमें प्रकाशमान अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके इस लोकमें विराजमान शिवस्वरूपको नमस्कार है ॥ १२५ ॥
१२५ अग्निके समान वर्णवाले, भयानक, अम्बिकाको अपने आधे शरीरमें धारण करनेवाले ( अर्धनारीश्वर ), रुद्र - विष्णु - ब्रह्माको मुक्ति देनेवाले, मृत्युरहित, ज्येष्ठ, १२६ भयंकर रूपवाले, सोमस्वरूप, वर प्रदान करनेवाले, त्रिलोकस्वरूप, त्रिदेवस्वरूप तथा वषट्कारस्वरूप शिवको १२७ नमस्कार है ॥ १२६ - १२७ ॥ हृदयकमलके मध्य गगनसदृशरूपवाले तथा गगनमें स्थित आपको नमस्कार है । [ सूर्य आदि ] आठ स्थानोंमें १२८ [ रुद्र आदि ] आठ रूपोंवाले तथा पृथ्वी आदि आठ तत्त्वोंवाले आपको नमस्कार है । चारों वेदरूपसे, चारों आश्रमरूपसे तथा चतुर्व्यूहरूपसे अवस्थित, आकाश १२ ९ आदि पंचभूत प्रकारसे, सद्योजात आदि पाँचरूपसे अवस्थित, सद्योजात आदि पंचमन्त्ररूप शरीरवाले शिवको नमस्कार है ॥ १२८-१२९ ॥ १३० चौंसठ प्रकारके शिक्षोक्त वर्णरूपवाले अकारको बार - बार नमस्कार है । बत्तीस मातृकारूपवाले उकारको १३१ । बार- बार नमस्कार है । सोलह तत्त्व रूपवाले मकारको 1985 Lingamahapuran_Section_13_2_Front
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३५६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग अफ्र
ओङ्काराय नमस्तुभ्यं चतुर्धा संस्थिताय च ।
गगनेशाय देवाय स्वर्गेशाय नमो नमः ॥ १३२
सप्तलोकाय पातालनरकेशाय वै नमः ।
अष्टक्षेत्राष्टरूपाय परात्परतराय च ॥ १३३
सहस्त्रशिरसे तुभ्यं सहस्राय च ते नमः ।
सहस्त्रपादयुक्ताय शर्वाय परमेष्ठिने ॥१३४
नवात्मतत्त्वरूपाय नवाष्टात्मात्मशक्तये ।
पुनरष्टप्रकाशाय तथाष्टाष्टकमूर्तये ॥ १३५
चतुःषष्ट्यात्मतत्त्वाय पुनरष्टविधाय ते ।
गुणाष्टक वृतायैव गुणिने निर्गुणाय ते ॥ १३६
मूलस्थाय नमस्तुभ्यं शाश्वतस्थानवासिने ।
नाभिमण्डलसंस्थाय हृदि निःस्वनकारिणे ॥ १३७
कन्धरे च स्थितायैव तालुरन्ध्रस्थिताय च ।
भ्रूमध्ये संस्थितायैव नादमध्ये स्थिताय च ॥ १३८
चन्द्रबिम्बस्थितायैव शिवाय शिवरूपिणे ।
वह्निसोमार्करूपाय षट्त्रिंशच्छक्तिरूपिणे ॥ १३ ९ ।
त्रिधा संवृत्य लोकान् वै प्रसुप्तभुजगात्मने ।
त्रिप्रकारं स्थितायैव त्रेताग्निमयरूपिणे ॥ १४०
सदाशिवाय शान्ताय महेशाय पिनाकिने ।
सर्वज्ञाय शरण्याय सद्योजाताय वै नमः ॥ १४१
अघोराय नमस्तुभ्यं वामदेवाय ते नमः ।
तत्पुरुषाय नमोऽस्तु ईशानाय नमो नमः ॥ १४२
नमस्त्रिंशत्प्रकाशाय शान्तातीताय वै नमः ।
अनन्तेशाय सूक्ष्माय उत्तमाय नमोऽस्तु ते ॥ १४३ ।
बार - बार नमस्कार है । आठ प्रकारके आत्मस्वरूपवाले अर्धमात्रात्मक नादरूपको नमस्कार । [ अकार, उकार , मकार, अर्धमात्रात्मक नादरूप ] चार प्रकारसे स्थित आप ओंकार ( प्रणवरूप ) - को नमस्कार है । आकाश के स्वामी तथा स्वर्गके स्वामी शिवको बार - बार नमस्कार है ॥ १३०–१३२ ॥ सात लोकस्वरूप, पाताल तथा नरकके स्वामी , | [ पृथ्वी आदि ] आठ क्षेत्रोंके रूपमें आठ स्वरूपोंवाले तथा परात्परतर ( सर्वोत्कृष्ट ) शिवको नमस्कार है ॥ १३३ ॥
हजार सिरोंवाले, हजार रूपोंवाले, हजार पैरोंसे युक्त आप शर्व परमेष्ठीको नमस्कार है । [ पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, नभ, अनिल, ज्योति, आप ( जल ), पृथ्वी ] नौ आत्मतत्त्वमय स्वरूपवाले, सत्रह आत्मशक्तियोंवाले, अष्टप्रकाशस्वरूप ( उर आदि स्थानोंमें वर्णोंको अभिव्यंजित करनेवाले ), आठ मूर्तियोंवाले, चौंसठ योगिनियोंके प्राणतत्त्वरूप, भव आदि आठ नामोंवाले, आठ गुणोंसे युक्त, [ सत्त्व, रज, तम ] तीनों गुणोंसे युक्त तथा गुणोंसे शून्य आप [ शिव ] -को नमस्कार है ॥ १३४–१३६ ॥ मूलाधारचक्रमें विराजमान, शाश्वत स्थानमें निवास करनेवाले, नाभिमण्डलमें स्थित तथा हृदयमें प्राणवायु ध्वनि करनेवाले आप [ शिव ] - को नमस्कार है । ग्रीवामें स्थित, तालुछिद्रमें स्थित, भौहोंके मध्यमें स्थित, नादके मध्यमें स्थित, चन्द्रबिम्बमें स्थित, कल्याणकारी, शिवस्वरूप, अग्नि - चन्द्र - सूर्यरूपवाले, छत्तीस शक्तिरूपवाले, तीन प्रकारके [ सत्त्व, रज, तम ] गुणोंसे लोकोंको वेष्टितकर सोये हुए सर्परूप [ कुण्डलिनीरूप ] - वाले, [ गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि ] तीन रूपसे स्थित त्रेताग्निमय रूपवाले, सदाशिव, शान्तस्वभाववाले, महेश्वर, पिनाकधारी, सब कुछ जाननेवाले तथा शरण देनेवाले सद्योजातको नमस्कार है । आप अघोरको नमस्कार है । आप वामदेवको नमस्कार है । तत्पुरुषको नमस्कार 1 । ईशानको बार - बार नमस्कार है॥१३७–१४२ ॥ तीसों मुहूर्तोंमें सदा प्रकाशमान रहनेवालेको नमस्कार है । शान्तातीतको नमस्कार है । आप अनन्तेश, सूक्ष्म तथा
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण.... शिवकी स्तुति ३५७
एकाक्षाय नमस्तुभ्यमेकरुद्राय ते नमः ।
नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं श्रीकण्ठाय शिखण्डिने ॥
अनन्तासनसंस्थाय अनन्तायान्तकारिणे ।
विमलाय विशालाय विमलाङ्गाय ते नमः ॥
विमलासनसंस्थाय विमलार्थार्थरूपिणे ।
योगपीठान्तरस्थाय योगिने योगदायिने ॥
योगिनां हृदि संस्थाय सदा नीवारशूकवत् ।
प्रत्याहाराय ते नित्यं प्रत्याहाररताय ते ॥
प्रत्याहाररतानां च प्रतिस्थानस्थिताय च ।
धारणायै नमस्तुभ्यं धारणाभिरताय ते ॥
धारणाभ्यासयुक्तानां पुरस्तात्संस्थिताय च ।
ध्यानाय ध्यानरूपाय ध्यानगम्याय ते नमः ॥
ध्येयाय ध्येयगम्याय ध्येयध्यानाय ते नमः ।
ध्येयानामपि ध्येयाय नमो ध्येयतमाय ते ॥
समाधानाभिगम्याय समाधानाय ते नमः ।
समाधानरतानां तु निर्विकल्पार्थरूपिणे ॥
दग्ध्वोद्धृतं सर्वमिदं त्वयाद्य जगत्त्रयं रुद्र पुरत्रयं हि । कः स्तोतुमिच्छेत्कथमीदृशं त्वां स्तोष्येहि तुष्टाय शिवाय तुभ्यम् ॥ भक्त्या च तुष्ट्याद्भुतदर्शनाच्च मर्त्या अमर्त्या अपि देवदेव । गणाः सिद्धगणैः प्रणामं कुर्वन्ति देवेश गणेश तुभ्यम् ॥ निरीक्षणादेव विभोऽसि दग्धुं पुरत्रयं चैव जगत्त्रयं च । लीलालसेनाम्बिकया क्ष दग्धं किलेषुश्च तदाथ मुक्तः ॥ उत्तमको नमस्कार है । आप एकाक्ष ( एकमात्र ज्ञानरूपी १४४ नेत्रवाले ) - को नमस्कार है । आप अद्वितीय रुद्रको । नमस्कार है । आप त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डीको नमस्कार है ॥ १४३-१४४ ॥ १४५ अनन्त ( शेष ) - रूपी आसनपर स्थित, अनन्तस्वरूप, अन्त करनेवाले, विशुद्ध, विशाल तथा स्वच्छ अंगोंवाले १४६ आपको नमस्कार है । विमल आसनपर विराजमान, विमल ज्ञानके अर्थस्वरूप, योगपीठके मध्यस्थित योगी, योग प्रदान करनेवाले, नीवार ( जंगली धान्य ) - के शूक १४७ ( सूक्ष्म अग्रभाग ) - की भाँति योगियोंके हृदयमें सदा स्थित रहनेवाले आपको नमस्कार है । प्रत्याहारस्वरूप, प्रत्याहारमें निरत, प्रत्याहारमें रत लोगोंके हृदयमें विराजमान, १४८ धारणास्वरूप तथा धारणामें निरत आपको नमस्कार है ॥ १४५–१४८ ॥ १४ ९ धारणाके अभ्यासमें लगे हुए लोगोंके सामने [ सदा ] विराजमान, ध्यान, ध्यानरूप तथा ध्यानगम्य आपको नमस्कार है । ध्येय, ध्येयगम्य, ध्यान करनेयोग्य, १५० ध्यानवाले आपको नमस्कार है । ध्यानयोग्य [ ब्रह्मा, विष्णु आदि ] - के भी ध्येय तथा सबसे अधिक ध्यानयोग्य आपको नमस्कार है । समाधानके द्वारा प्राप्य, समाधानस्वरूप, १५१ समाधान ( ध्यान ) - में रत लोगोंके लिये निर्विकल्प अर्थस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १४ ९ - १५१ ॥ हे रुद्र! त्रिपुरको दग्ध करके आपने तीनों लोकोंका उद्धार कर दिया । ऐसे प्रभावशाली आपकी स्तुति करनेका सामर्थ्य कौन रखता है; फिर भी [ स्वयं ] १५२ सन्तुष्ट रहनेवाले आप शिवकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ १५२ ॥
हे देवदेव! आपकी भक्ति, तुष्टि तथा अद्भुत दर्शनके कारण ये मानव, देवता तथा सिद्धगणोंसहित समस्त गण आपको प्रणाम करते हैं । हे देवेश! हे गणेश! आपको नमस्कार है ॥ १५३ ॥
१५३ हे विभो! आप तो देखनेमात्रसे ही तीनों पुरों तथा तीनों लोकोंको जला देनेमें समर्थ हैं । अम्बिका साथ लीलासक्त आपने क्षणभरमें त्रिपुरको जला दिया और [ सोम आदिके प्रार्थना करनेपर ] उस समय बाणको भी १५४ | मुक्त कर दिया ॥ १५४ ॥
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३५८ कृतो रथश्चेषुवरश्च शुभ्रं शरासनं त्रिपुरक्षयाय । अनेकयनैश्च मयाथ तुभ्यं फलं न दृष्टं सुरसिद्धसङ्घैः ॥ देवव हरिश्च रुद्रः स्वयं शक्रपितामहौ च । त्वमेव सर्वे भगवन् कथं तु स्तोष्ये ह्यतोष्यं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥ अनन्तपादस्त्वमनन्तबाहु-रनन्तमूर्धान्तकरः शिवश्च । अनन्तमूर्तिः कथमीदृशं त्वां तोष्ये तोष्यं कथमीदृशं त्वाम् ॥ नमो नमः सर्वविदे शिवाय
रुद्राय शर्वाय भवाय तुभ्यम् ।
स्थूलाय सूक्ष्माय सुसूक्ष्मसूक्ष्म-सूक्ष्माय सूक्ष्मार्थविदे विधात्रे ॥
स्रष्ट्रे नमः सर्वसुरासुराणां भर्त्रे च हर्त्रे जगतां विधात्रे । नेत्रे सुराणामसुरेश्वराणां दात्रे प्रशास्त्रे मम सर्वशास्त्रे ॥ वेदान्तवेद्याय सुनिर्मलाय
वेदार्थविद्भिः सततं स्तुताय ।
वेदात्मरूपाय भवाय तुभ्य-मन्ताय मध्याय सुमध्यमाय ॥
आद्यन्तशून्याय च संस्थिताय तथा त्वशून्याय च लिङ्गिने च । अलिङ्गिने लिङ्गमयाय तुभ्यं लिङ्गाय वेदादिमयाय साक्षात् ॥ रुद्राय मूर्धाननिकृन्तनाय ममादिदेवस्य च यज्ञमूर्तेः । विध्वान्तभङ्गं मम कर्तुमीश दृष्ट्वैव भूमौ करजाग्रकोट्या ॥ अहो विचित्रं तव देवदेव विचेष्टितं सर्वसुरासुरेश । देव देवैः सह देवकार्यं य निर्गुणरूपतत्त्व ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग आपके द्वारा त्रिपुरके नाशके लिये मैंने अनेक यत्नोंसे रथ, श्रेष्ठ बाण तथा सुन्दर धनुष आपके लिये निर्मित किया था; किंतु देवताओं तथा सिद्धजनों द्वारा १५५ युद्धरूपी फलको नहीं जाना जा सका अर्थात् परम महिमावाले आपने क्षणभरमें त्रिपुरका नाश कर दिया ॥ १५५ ॥
रथ, रथी, देवश्रेष्ठ विष्णु, स्वयं रुद्र, इन्द्र १५६ । ब्रह्मा – ये सब आप ही हैं । हे भगवन्! मैं आप अतोष्य, ( स्तुति न किये जा सकनेवाले ) - की स्तुति कैसे करूँ; अतः सिर झुकाकर [ केवल ] प्रणाम करता हूँ ॥ १५६ ॥
आप अनन्त चरणोंवाले, अनन्त भुजाओंवाले, १५७ अनन्त सिरवाले, अनन्त रूपोंवाले, संहार करनेवाले तथा | कल्याण करनेवाले हैं - ऐसे प्रभाववाले आपकी स्तुति कैसे करूँ; आप अतोष्यकी स्तुति कैसे करूँ? ॥ १५७ ॥
आप सर्ववेत्ता, शिव, रुद्र, शर्व, भव, स्थूल, १५८ सूक्ष्म, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, सूक्ष्म अर्थोंको जाननेवाले तथा विधाताको नमस्कार है ॥ १५८ ॥
सभी देवताओं तथा असुरोंके स्रष्टा, लोकोंका सृजन - पालन - संहार करनेवाले, देवताओं तथा असुरोंके १५ ९ नायक, सब कुछ देनेवाले और मुझपर तथा सभीपर शासन करनेवालेको नमस्कार है ॥ १५ ९ ॥ वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, परम शुद्ध, वेदार्थके ज्ञाताओं द्वारा निरन्तर स्तुत, वेदके आत्मास्वरूप, भव, १६० अन्त, रहित १६१ साक्षात् ब्रह्माके मध्य तथा सुमध्यम आपको नमस्कार है ॥ १६० ॥
आदि तथा अन्तसे रहित, सर्वत्र विद्यमान, शून्यत्वसे लिङ्गी, अलिङ्गी, लिङ्गमय, लिङ्गस्वरूप तथा वेदादिमय ( प्रणवरूप ) आपको नमस्कार ॥। १६१ ॥ मेरे भी आदिदेव यज्ञमूर्ति विष्णुके तथा मुझ अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये अपराधस्थानमें देखकर [ अपने ] नाखूनके अग्रभागसे मेरे मस्तकका १६२ छेदन करनेवाले हे ईश! आप रुद्रको नमस्कार है ॥ १६२ ॥
हे देवदेव! हे समस्त देवताओं तथा असुरोंके ईश! आपका क्रिया - कलाप विचित्र है । हे निर्गुणरूपतत्त्व! आप देवताओंके साथ देहधारीकी भाँति देवोंका कार्य १६३ | करेंगे ॥ १६३ ॥