श्रीगणेशाय नमः।
लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 651–660
लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660
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अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका
ते देवा मुनयः सर्वे शिवमुद्दिश्य शङ्करम् ।
प्रणेमुश्च महात्मानो रुद्रध्यानेन विह्वलाः ॥ ५
जग्मुर्यथागतं देवा मुनयश्च तपोधनाः ।
तस्मादभ्यर्चयेन्नित्यमादित्यं शिवरूपिणम् ॥ ६
धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं मनसा कर्मणा गिरा । ऋषय ऊचुः रोमहर्षण सर्वज्ञ सर्वशास्त्रभृतां वर ॥ ७
व्यासशिष्य महाभाग वाह्नेयं वद साम्प्रतम् ।
शिवेन देवदेवेन भक्तानां हितकाम्यया ॥ ८
वेदात् षडङ्गादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च सर्वतः ।
तपश्च विपुलं तप्त्वा देवदानवदुश्चरम् ॥ ९
अर्थदेशादिसंयुक्तं गूढमज्ञाननिन्दितम् ।
वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ॥ १०
शिवेन कथितं शास्त्रं धर्मकामार्थमुक्तये ।
शतकोटिप्रमाणेन तत्र पूजा कथं विभोः ॥ ११
स्नानयोगादयो वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः । सूत उवाच पुरा सनत्कुमारेण मेरुपृष्ठे सुशोभने ॥ १२
पृष्टो नन्दीश्वरो देवः शैलादिः शिवसम्मतः ।
पृष्टोऽयं प्रणिपत्यैवं मुनिमुख्यैश्च सर्वतः ॥ १३
तस्मै सनत्कुमाराय नन्दिना कुलनन्दिना ।
कथितं यच्छिवज्ञानं शृण्वन्तु मुनिपुङ्गवाः ॥ १४
शैवं सङ्क्षिप्य वेदोक्तं शिवेन परिभाषितम् ।
स्तुतिनिन्दादिरहितं सद्यः प्रत्ययकारकम् ॥ १५
गुरुप्रसादजं दिव्यमनायासेन मुक्तिदम् । सनत्कुमार उवाच भगवन् सर्वभूतेश नन्दीश्वर महेश्वर ॥ १६ वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ६४ ९ सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये - ऐसा कहकर भगवान् रुद्र वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥ १–४ ॥ इसके बाद वे समस्त देवता तथा महान् आत्मावाले मुनिगण कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरको उद्देश्य करके प्रणाम करने लगे । तदनन्तर देवता तथा तपोधन मुनिलोग प्रसन्न होकर रुद्रका ध्यान करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही चले गये । अतएव धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मन - वचन - कर्मसे शिवरूप आदित्यकी नित्य पूजा करनी चाहिये॥५-६१२ ॥ ऋषिगण बोले- हे रोमहर्षण! हे सर्वज्ञ! सभी शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले हे व्यासशिष्य! हे महाभाग! अब आप हमें वाह्नेय ( अग्निपुराणोक्त ) शिवपूजाकी विधि बताइये । भक्तोंके कल्याणके लिये देवाधिदेव शिवने देवताओं तथा दानवोंके लिये दुश्चर कठोर तप करके षडंग वेदसे तथा सांख्ययोगसे भलीभाँति ग्रहण करके अर्थ - देश आदिसे युक्त, गूढ़, अविवेकियोंके द्वारा निन्दित, वर्णाश्रमकृत धर्मोंसे कहीं - कहीं विपरीत तथा कहीं - कहीं अनुकूल जिस शतकोटि प्रमाणवाले शास्त्रको धर्म - अर्थ - काम - मोक्षहेतु कहा है, उसमें उन सर्वव्यापी शिवकी पूजा, स्नान, योग आदिका क्या विधान है? उसे सुननेकी हमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ७–१११ / २ ॥ सूतजी बोले- पूर्वकालमें सनत्कुमारने अत्यन्त सुन्दर मेरुशिखरपर शिवजीके प्रिय शैलादि भगवान् नन्दीश्वरसे यही बात पूछी थी । प्रणाम करके श्रेष्ठ मुनियोंने भी इनसे ऐसा ही पूछा था । हे मुनीश्वरो! तब अपने कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने उन सनत्कुमारको जिस शिवज्ञानका उपदेश किया था, उसे आपलोग सुनें । स्वयं शिवके द्वारा संक्षिप्त करके परिभाषित किया गया वह शिवज्ञान वेदप्रतिपादित, निन्दा आदिसे रहित, शीघ्र ही श्रद्धा उत्पन्न करनेवाला, गुरुकृपासे प्राप्त होनेवाला, दिव्य तथा अनायास ही मुक्ति देनेवाला है॥१२–१५९ २ ॥ सनत्कुमार बोले - हे भगवन्! हे सर्वभूतेश! हे | नन्दीश्वर! हे महेश्वर! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके
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६५० कथं पूजादयः शम्भोर्धर्मकामार्थमुक्तये वक्तुमर्हसि शैलादे विनयेनागताय मे सूत उवाच सम्प्रेक्ष्य भगवान्नन्दी निशम्य वचनं पुनः कालवेलाधिकाराद्यमवदद्वदतां वरः शैलादि गुरुतः शास्त्रतश्चैवमधिकारं ब्रवीम्यहम् गौरवादेव संज्ञैषा शिवाचार्यस्य नान्यथा स्वयमाचरते यस्तु आचारे स्थापयत्यपि । आचिनोति च शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन चोच्यते तस्माद्वेदार्थतत्त्वज्ञमाचार्यं भस्मशायिनम् गुरुमन्वेषयेद्भक्तः सुभगं प्रियदर्शनम् प्रतिपन्नं जनानन्दं श्रुतिस्मृतिपथानुगम् । विद्ययाभयदातारं लौल्यचापल्यवर्जितम्
आचारपालकं धीरं समयेषु कृतास्पदम् ।
तं दृष्ट्वा सर्वभावेन पूजयेच्छिववद्गुरुम् ॥
आत्मना च धनेनैव श्रद्धावित्तानुसारतः ।
तावदाराधयेच्छिष्यः प्रसन्नोऽसौ यथा भवेत् ॥
सुप्रसन्ने महाभागे सद्यः पाशक्षयो भवेत् ।
गुरुर्मान्यो गुरुः पूज्यो गुरुरेव सदाशिवः ॥
संवत्सरत्रयं वाथ शिष्यान् विप्रान् परीक्षयेत् ।
प्राणद्रव्यप्रदानेन आदेशैश्च इतस्ततः ॥
उत्तमश्चाधमे योज्यो नीच उत्तमवस्तुषु ।
आकृष्टास्ताडिता वापि ये विषादं न यान्ति वै ॥
ते योग्याः शिवधर्मिष्ठाः शिवधर्मपरायणाः ।
संयता धर्मसम्पन्नाः श्रुतिस्मृतिपथानुगाः ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । लिये शिवकी पूजा आदिका क्या विधान है? हे शैलादे! ॥ १७ विनम्रतापूर्वक मुझ आये हुएको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १६-१७ ॥ । सूतजी बोले - [ हे मुनीश्वरो! ] उनकी ओर देखकर ॥ १८ तथा पुनः उनका वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् नन्दी समुचित समय उपस्थित जानकर उनसे कहने लगे ॥ १८ ॥
। शैलादि बोले - गुरु तथा शास्त्रसे प्राप्त ज्ञानके ॥ १ ९ आधारपर मैं अधिकार ( पात्रता ) - के विषयमें बता रहा हूँ । ॥ २० गौरवके कारण ही शिवशास्त्रके आचार्यकी ' गुरु ' – यह । संज्ञा होती है, इसके विपरीत नहीं । जो स्वयं आचरण करता ॥ २१ है, [ दूसरोंको भी ] आचारमें स्थापित करता है तथा शास्त्रके अर्थज्ञानका संग्रह करता है, वह आचार्य कहा जाता ॥ २२ है ॥ १ ९ -२० ॥ अतः भक्तको चाहिये कि वह वेदार्थतत्त्वज्ञ, भस्म २३ धारण करनेवाले, सुशील, प्रिय दर्शनवाले, सम्मानित लोगोंको आनन्दित करनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेवाले, विद्यासे अभय प्रदान करनेवाले, लालच तथा चपलतासे रहित, आचारका पालन करनेवाले, धैर्यशाली तथा सन्ध्या आदिकालोंमें समुचित स्थानपर स्थित रहनेवाले आचार्य गुरुका अन्वेषण करे । उस गुरुको प्राप्त करके अनन्य भावसे शिवकी ही भाँति उनका पूजन करना चाहिये । शिष्यको चाहिये कि वह शरीरसे, धनसे तथा श्रद्धा - विश्वासके अनुसार गुरुकी वैसी सेवा करे, जिससे वे प्रसन्न हो जायँ । महाभाग गुरुके प्रसन्न हो जानेपर शीघ्र पाश ( बन्धन ) -का क्षय हो जाता है । गुरु मान्य हैं, गुरु पूज्य हैं, गुरु साक्षात् सदाशिव ही हैं । २१ - २५ ॥ २४ | गुरुको भी चाहिये कि प्रिय वस्तुके प्रदानसे तथा २५ इधर - उधर अनेक कार्योंके लिये आदेशोंद्वारा तीन वर्षोंतक ब्राह्मण - शिष्योंकी परीक्षा करे । उत्तम [ शिष्य ] - को अधम २६ कार्यमें तथा अधमको उत्तम कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये । गुरुके द्वारा आकृष्ट तथा ताड़ित होनेपर भी जो २७ शिष्य विषादको प्राप्त नहीं होते, वे ही शिवधर्मके अधिकारी हैं । शिवधर्मिष्ठ, शिवधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, २८ | धर्मसम्पन्न, श्रुति - स्मृतिके मार्गका अनुसरण करनेवाले,
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अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका
सर्वद्वन्द्वसा धीरा नित्यमुद्युक्तचेतसः ।
परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ २ ९ ।
आर्जवा मार्दवाः स्वस्था अनुकूलाः प्रियंवदाः ।
अमानिनो बुद्धिमन्तस्त्यक्तस्पर्धा गतस्पृहाः ॥ ३०
शौचाचारगुणोपेता दम्भमात्सर्यवर्जिताः ।
योग्या एवं द्विजाः सर्वे शिवभक्तिपरायणाः ॥ ३१
एवंवृत्तसमोपेता वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
शोध्या एवंविधाश्चैव तत्त्वानां च विशुद्धये ॥ ३२
शुद्ध विनयसम्पन्नो मिथ्याकटुकवर्जितः ।
गुर्वाज्ञापालकश्चैव शिष्योऽनुग्रहमर्हति ॥ ३३
गुरुश्च शास्त्रवित्प्राज्ञस्तपस्वी जनवत्सलः ।
लोकाचाररतो ह्येवं तत्त्वविन्मोक्षदः स्मृतः ॥ ३४
सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः ।
सर्वोपायविधानज्ञस्तत्त्वहीनस्य निष्फलम् ॥ ३५
स्वसंवेद्ये परे तत्त्वे निश्चयो यस्य नात्मनि ।
आत्मनोऽनुग्रहो नास्ति परस्यानुग्रहः कथम् ॥ ३६
प्रबुद्धस्तु द्विजो यस्तु स शुद्धः साधयत्यपि ।
तत्त्वहीने कुतो बोधः कुतो ह्यात्मपरिग्रहः ॥ ३७
परिग्रहविनिर्मुक्तास्ते सर्वे पशवोदिताः ।
पशुभिः प्रेरिता ये तु सर्वे ते पशवः स्मृताः ॥ ३८
तस्मात्तत्त्वविदो ये तु ते मुक्ता मोचयन्त्यपि ।
संवित्तिजननं तत्त्वं परानन्दसमुद्भवम् ॥ ३ ९
तत्त्वं तु विदितं येन स एवानन्ददर्शकः ।
न पुनर्नाममात्रेण संवित्तिरहितस्तु यः ॥ ४०
अन्योन्यं तारयेन्नैव किं शिला तारयेच्छिलाम् ।
येषां तन्नाममात्रेण मुक्तिर्वै नाममात्रिका ॥ ४१
वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ६५१ [ सुख - दुःख आदि ] सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाले, धैर्यशाली, सदा उद्योगशील चित्तवाले, परोपकारमें लगे रहनेवाले, गुरुसेवामें निरत, सरल तथा मृदु स्वभाववाले, स्वस्थचित्त, गुरुके अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले, मानरहित, बुद्धिसम्पन्न, स्पर्धाविहीन, कामनाशून्य, शौच- आचार आदि गुणोंसे युक्त, दम्भ तथा मात्सर्यसे विहीन - इस प्रकारके शिवभक्तिपरायण सभी द्विज शिष्य होनेके अधिकारी हैं । [ इन्द्रिय आदि चौबीस ] तत्त्वोंकी शुद्धिके लिये मन-वाणी - कर्मसे इन आचरणोंसे सम्पन्न इस प्रकारके शिष्योंका शोधन करना चाहिये । शुद्ध हृदयवाले, विनयसे सम्पन्न, मिथ्या तथा कटुभाषणसे रहित और गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला शिष्य ही गुरुकृपाके योग्य होता | है ॥ २६–३३ ॥ शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान्, तपस्वी, लोकप्रिय, लोकाचारमें रत तथा तत्त्वज्ञानी गुरु मोक्ष देनेमें समर्थ बताया गया है । गुरु सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त शास्त्रोंमें निष्णात तथा सभी उपायोंके विधानको जाननेवाला भी हो, किंतु यदि वह आत्मज्ञानसे रहित हो, तो सब कुछ निष्फल है । स्वयं अनुभूत किये जानेवाले परात्मतत्त्वमें जिसकी निश्चित धारणा न हो, उसका अपना ही कल्याण नहीं है, तो उसके द्वारा दूसरेका कल्याण कैसे सम्भव है? जो आत्मज्ञानी द्विज है, वह स्वयं शुद्ध है और दूसरोंको भी शुद्ध कर देता है । तत्त्वहीन गुरुमें बोध कहाँसे होगा और उसका आत्मोद्धार कैसे होगा! जो आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे सब पशु कहे गये हैं । पशुतुल्य द्विजके द्वारा जो शिष्य ज्ञानप्रेरित किये जाते हैं, वे सब भी पशु ही कहे गये हैं । अतः जो लोग तत्त्ववेत्ता हैं, वे ही मुक्त हैं और दूसरोंको भी मुक्त कर सकते हैं । आत्मबोध उत्पन्न करनेवाला तत्त्व परानन्दको उत्पन्न करता है । उस तत्त्वको जिसने जान लिया, वही परमानन्दका दर्शन करानेमें समर्थ है, नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता । जो आत्मज्ञानविहीन है, वह दूसरेको | कभी नहीं तार सकता, क्या [ कोई ] शिला दूसरी
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[ उत्तरभाग ६५२ श्रीलिङ्गमहापुराण अ
योगिनां दर्शनाद्वापि स्पर्शनाद्भाषणादपि ।
सद्यः सञ्जायते चाज्ञा पाशोपक्षयकारिणी ॥
अथवा योगमार्गेण शिष्यदेहं प्रविश्य च ।
बोधयेदेव योगेन सर्वतत्त्वानि शोध्य च ॥
शुद्धिर्विहिता ज्ञानयोगेन योगिनाम् ।
शिष्यं परीक्ष्य धर्मज्ञं धार्मिकं वेदपारगम् ॥
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं बहुदोषविवर्जितम् ।
ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य कर्णात्कर्णागतेन तु ॥
दीपाद्दीपो यथा चान्यः सञ्चरेद्विधिवद्गुरुः ।
भौवनं च पदं चैव वर्णाख्यं मात्रमुत्तमम् ॥
कालाध्वरं महाभाग तत्त्वाख्यं सर्वसम्मतम् ।
भिद्यते यस्य सामर्थ्यादाज्ञामात्रेण सर्वतः ॥
तस्य सिद्धिश्च मुक्तिश्च गुरुकारुण्यसम्भवा ।
पृथिव्यादीनि भूतानि आविशन्ति च भौवने ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च भावतः ।
पदं वर्णाख्यकं विप्र बुद्धीन्द्रियविकल्पनम् ॥
कर्मेन्द्रियाणि मात्रं हि मनो बुद्धिरतः परम् ।
अहङ्कारमथाव्यक्तं कालाध्वरमिति स्मृतम् ॥
पुरुषादिविरिञ्च्यन्तमुन्मनत्वं परात्परम् ।
तथेशत्वमिति प्रोक्तं सर्वतत्त्वार्थबोधकम् ॥
अयोगी नैव जानाति तत्त्वशुद्धिं शिवात्मिकाम् ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिलाको [ नदी आदिसे ] पार करा सकती है । जिनका ४२ नाममात्रका ज्ञान है, उनकी मुक्ति भी नाममात्रकी होती है ॥ ३४ - ४१ ॥ योगियोंके दर्शन, स्पर्श तथा भाषणमात्रसे ही बन्धनका नाश करनेवाला अनुग्रह शीघ्र ही होता है । ४३ अथवा गुरुको योगमार्गसे शिष्यके देहमें प्रवेश करके योगके द्वारा सभी तत्त्वोंका शोधन करके शिष्यको ज्ञान प्रदान करना चाहिये । योगियोंके लिये ज्ञानयोगसे तीन ४४ गुणोंकी शुद्धि विहित है । गुरुको चाहिये कि धर्मको जाननेवाले, धर्मपरायण, वेदमें पारंगत तथा समस्त दोषोंसे रहित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य शिष्यकी ४५ सम्यक् परीक्षा करके ज्ञानसे ज्ञेयको देखकर गुरुपरम्परासे प्राप्त मार्गके द्वारा एक दीपकसे दूसरे दीपककी भाँति विधिपूर्वक उसे बोधमय करे ॥ ४२-४५९ २ ॥ ४६ भौवन, पद, वर्ण, मात्रा एवं कालाध्वरसंज्ञक— ये तत्त्व सर्वसम्मत एवं उत्तम हैं । हे महाभाग सनत्कुमार! गुरु आज्ञामात्र प्रभावसे जिस शिष्यकी इन तत्त्वोंकी ४७ संसारोन्मुखता नष्ट हो जाती है, उसी शिष्यको गुरुकारुण्यसमुत्पन्न सिद्धि और मुक्ति मिल जाती है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश - ये पंचमहाभूत ४८ भौवन पदवाच्य हैं अथवा इनका समावेश भौवनमें होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध - ये अपने स्वभावसे पद कहलाते हैं । हे विप्र! श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, ४ ९ जिह्वा, घ्राण - ये पंचज्ञानेन्द्रियाँ वर्णसंज्ञक हैं । वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ - ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ मात्रसंज्ञक । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार - इस अन्तःकरण-५० चतुष्टयको कालाध्वर कहा गया है । मानवीय आनन्दसे लेकर ब्रह्मानन्दपर्यन्त [ ब्रह्मापदपर्यन्त ] उन्मनी अवस्था [ अमनस्कत्व ] श्रेष्ठसे श्रेष्ठतर है तथा सर्वतत्त्व-५१ प्रकाशक ईशत्व इनसे भी श्रेष्ठ कहा गया है । इस कल्याणस्वरूपा तत्त्वशुद्धिको योगज्ञानशून्य प्राणी नहीं ५२ | जानता है ॥ ४६ - ५२ ॥ शिवपूजनोपायवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' शिवपूजनोपायवर्णन ' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
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अध्याय २१ ] शिवदीक्षाविधि - वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५३ इक्कीसवाँ अध्याय शिवदीक्षाविधि - वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य सूत उवाच
परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः ।
अलङ्कृत्य वितानाद्यैरीश्वरावाहनक्षमाम् ॥
एकहस्तप्रमाणेन मण्डलं परिकल्पयेत् ।
आलिखेत्कमलं मध्ये पञ्चरत्नसमन्वितम् ॥
चूर्णैरष्टदलं वृत्तं सितं वा रक्तमेव च ।
परिवारेण संयुक्तं बहुशोभासमन्वितम् ॥
आवाह्य कर्णिकायां तु शिवं परमकारणम् ।
अर्चयेत्सर्वयत्नेन यथाविभवविस्तरम् ॥
दलेषु सिद्धयः प्रोक्ताः कर्णिकायां महामुने ।
वैराग्यज्ञाननालं च धर्मकन्दं मनोरमम् ॥
वामा ज्येष्ठा च रौद्री च काली विकरणी तथा ।
बलविकरणी चैव बलप्रमथिनी क्रमात् ॥
सर्वभूतस्य दमनी केसरेषु च शक्तयः ।
मनोन्मनी महामाया कर्णिकायां शिवासने ॥
वामदेवादिभिः सार्धं द्वन्द्वन्यायेन विन्यसेत् ।
मनोन्मनं महादेवं मनोन्मन्याथ मध्यतः ॥
सूर्यसोमाग्निसम्बन्धात्प्रणवाख्यं शिवात्मकम् ।
पुरुषं विन्यसेद्वक्त्रं पूर्वे पत्रे रविप्रभम् ॥
अघोरं दक्षिणे पत्रे नीलाञ्जनचयोपमम् ।
उत्तरे वामदेवाख्यं जपाकुसुमसन्निभम् ॥
सद्यं पश्चिमपत्रे तु गोक्षीरधवलं न्यसेत् ।
ईशानं कर्णिकायां तु शुद्धस्फटिकसन्निभम् ॥
चन्द्रमण्डलसङ्काशं हृदयायेति मन्त्रतः ।
वाह्नेये रुद्रदिग्भागे शिरसे धूम्रवर्चसे ॥
शिखायै च नमश्चेति रक्ता नैर्ऋते दले ।
कवचायाञ्जनाभाय इति वायुदले न्यसेत् ॥
सूतजी बोले- गन्ध, वर्ण, रस आदिसे भलीभाँति भूमिकी परीक्षा करके ईश्वरके आवाहनयोग्य उस १ स्थानको वितान ( चाँदनी ) आदिसे अलंकृत करके वहाँ एक हाथ मापका मण्डल बनाना चाहिये । उसके मध्य में चूर्णोंके द्वारा पंचरत्नसमन्वित श्वेत या रक्तवर्ण गोल २ अष्टदल कमलकी रचना करनी चाहिये । तत्पश्चात् [ उस कमलकी ] कर्णिकामें परिवारसे युक्त, अति ३ शोभामय परम कारण शिवका आवाहन करके अपने सामर्थ्यके अनुसार पूर्ण प्रयत्नसे उनका पूजन करना चाहिये ॥ १–४ ॥ ४ हे महामुने! कर्णिकाके कमलदलोंमें [ अणिमा आदि आठ ] सिद्धियाँ स्थित बतायी गयी हैं । वैराग्य-५ ज्ञानरूप उसका नाल है तथा धर्मरूप उसका मनोरम कन्द ( मूल ) है । वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, ६ बलविकरणी, बलप्रमथिनी और सर्वभूतदमनी - क्रमशः ये आठ शक्तियाँ केसरोंमें स्थित हैं तथा महामायारूपा मनोन्मनी शिवासनरूप कर्णिकामें विराजमान हैं; उन-७ उन स्थानोंमें उनका ध्यान करना चाहिये । वामदेव आदिके साथ इन वामा आदि आठ शक्तियोंका तथा ८ मध्यमें देवी मनोन्मनीके साथ मनोन्मन महादेवकी दाम्पत्यरूपसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये ॥ ५ -८ ॥ सूर्य - चन्द्र - अग्निके सम्बन्धसे प्रणव नामक सूर्यतुल्य ९ प्रभावाले शिवरूप तत्पुरुषका [ कमलके ] पूर्व पत्रमें न्यास करना चाहिये । नीलांजनसदृश अघोरका दक्षिण पत्रमें, १० जपाकुसुमके समान वर्णवाले वामदेव नामक शिवका उत्तर पत्र, गोदुग्धके समान धवल सद्योजातका पश्चिम ११ पत्रमें और शुद्ध स्फटिकके समान कान्तिवाले ईशानका कमलकी कर्णिकामें न्यास करना चाहिये ॥ ९ –११ ॥ चन्द्रमण्डलसङ्काशाय हृदयाय नमः - इस मन्त्रसे १२ अग्निकोणके दलमें, धूम्रवर्चसे शिरसे नमः — इस मन्त्र ईशानकोणके दलमें, रक्ताभाय शिखायै नमः -१३ | इस मन्त्रसे नैर्ऋत्यकोणके दलमें और अञ्जनाभाय
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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६५४ 36 35 36 36 36 36 36 36 36 35 36 36 36 36 36 36 36 36 36 35 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 5 3
अस्त्रायाग्निशिखाभाय इति दिक्षु प्रविन्यसेत् ।
नेत्रेभ्यश्चेति चैशान्यां पिङ्गलेभ्यः प्रविन्यसेत् ॥
शिवं सदाशिवं देवं महेश्वरमतः परम् ।
रुद्रं विष्णुं विरिञ्चिं च सृष्टिन्यायेन भावयेत् ॥
शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे ।
शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा ॥
वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्चसे । | कवचाय नमः - इस मन्त्रसे वायव्यकोणके दलमें न्यास १४ करना चाहिये । अग्निशिखाभाय अस्त्राय नमः - इस मन्त्रसे [ ऊर्ध्व आदि ] दिशाओंमें न्यास करना चाहिये और पिङ्गलेभ्यो नेत्रेभ्यो नमः - इस मन्त्रसे ईशान १५ दिशामें न्यास करना चाहिये । तदनन्तर शिव सदाशिव देव महेश्वर रुद्र, विष्णु और विरिंचि ( ब्रह्मा ) -की १६ सृष्टिके सृजन, पालन और संहारके क्रमसे भावना करनी चाहिये ॥ १२–१५ ॥ शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे । शान्ताय कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च ॥ १७
निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च ।
मन्त्रैरेतैर्महाभूतविग्रहं च सदाशिवम् ॥
ईशानमुकुटं देवं पुरुषास्यं पुरातनम् ।
अघोरहृदयं हृष्टं वामगुह्यं महेश्वरम् ॥
सद्यमूर्तिं स्मरेद्देवं सदसद्व्यक्तिकारणम् ।
पञ्चवक्त्रं दशभुजमष्टत्रिंशत्कलामयम् ॥
सद्यमष्टप्रकारेण प्रभिद्य च कलामयम् ।
वामं त्रयोदशविधैर्विभिद्य विततं प्रभुम् ॥
अघोरमष्टधा कृत्वा कलारूपेण संस्थितम् ।
पुरुषं च चतुर्धा वै विभज्य च कलामयम् ॥
ईशानं पञ्चधा कृत्वा पञ्चमूर्त्या व्यवस्थितम् ।
हंसहंसेति मन्त्रेण शिवभक्त्या समन्वितम् ॥
ओङ्कारमात्रमोङ्कारमकारं समरूपिणम् ।
आ ई ऊ ए तथा अम्बानुक्रमेणात्मरूपिणम् ॥
प्रधानसहितं देवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम् ।
अणोरणीयां समजं महतोऽपि महत्तमम् ॥
उर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमुमापतिम् ।
सहस्त्रशिरसं देवं सहस्त्राक्षं सनातनम् ॥
सहस्त्रहस्तचरणं नादान्तं नादविग्रहम् ।
खद्योतसदृशाकारं चन्द्ररेखाकृतिं प्रभुम् ॥
द्वादशान्ते भ्रुवोर्मध्ये तालुमध्ये गले क्रमात् ।
हृद्देशेऽवस्थितं देवं स्वानन्दममृतं शिवम् ॥
शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा ॥ वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्चसे । च प्रतिष्ठायै १८ तारकायान्तकाय च ॥ निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च — इन [ पाँच ] मन्त्रोंसे ईशानरूप मुकुट, १ ९ तत्पुरुषरूप मुख, अघोररूप हृदय, वामदेवरूप गुह्यदेश तथा सद्योजातरूप सम्पूर्ण विग्रहवाले, सत् - असत्की २० अभिव्यक्तिके कारणभूत, पुरातन, प्रसन्न तथा आकाश आदि पंचमहाभूतके विग्रहवाले महेश्वर सदाशिवका स्मरण करना चाहिये, जो पाँच मुख तथा दस भुजाओंसे २१ सुशोभित और अड़तीस कलाओंवाले हैं । कलामय सद्योजातका आठ प्रकारसे विभाग करके, महाप्रभु २२ | वामदेवका तेरह भेदोंसे विभाग करके, कलारूपमें स्थित अघोरका आठ प्रकारसे विभाग करके, कलामय तत्पुरुषका २३ चार प्रकारसे विभाग करके और पाँच मूर्तियोंमें व्यवस्थित ईशानका पाँच प्रकारसे विभाग करके उनका ध्यान करना चाहिये । हंसहंसाय विद्महे परमहंसाय धीमहि । २४ तन्नो हंसः प्रचोदयात् — इस हंसगायत्रीमन्त्रसे शिवभक्तिसे युक्त, ब्रह्मरूप, प्रणवरूप, अकाररूप, ब्रह्मतुल्यरूपवाले, २५ आ ई ऊ ए अर्थात् क्रमसे देवी- गणेश - सूर्य - विष्णुस्वरूप, प्रकृतियुक्त, उत्पत्ति - प्रलयसे रहित, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, २६ अजन्मा, महान्से भी महान्, ऊर्ध्वरेता, विरूपाक्ष, उमापति, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार हाथ तथा चरणोंवाले, सनातन, नादान्त ( प्रणवरूप ), नादप्रतिपाद्य २७ विग्रहवाले, सूर्यके समान आकारवाले, चन्द्ररेखासे युक्त विग्रहवाले, मूर्धा - भ्रूमध्य- तालुमध्य - कण्ठ तथा हृदयमें २८ | क्रमसे विराजमान अपने आनन्दमें मग्न, अमृतस्वरूप,
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अध्याय २१ ] शिवदीक्षाविधि - वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५५
विद्युद्वलयसङ्काशं विद्युत्कोटिसमप्रभम् । ।
श्यामं रक्तं कलाकारं शक्तित्रयकृतासनम् ॥ २ ९
सदाशिवं स्मरेद्देवं तत्त्वत्रयसमन्वितम् ।
विद्यामूर्तिमयं देवं पूजयेच्च यथाक्रमात् ॥३०
लोकपालांस्तथास्त्रेण पूर्वाद्यान् पूजयेत्पृथक् ।
चरुं च विधिनासाद्य शिवाय विनिवेदयेत् ॥ ३१
अर्धं शिवाय दत्त्वैव शेषार्धेन तु होमयेत् ।
अघोरेणाथ शिष्याय दापयेद्भोक्तुमुत्तमम् ॥ ३२
उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा पुरुषं विधिना यजेत् ।
पञ्चगव्यं ततः प्राश्य ईशानेनाभिमन्त्रितम् ॥ ३३
वामदेवेन भस्माङ्गी भस्मनोद्धूलयेत्क्रमात् ।
कर्णयोश्च जपेद्देवीं गायत्रीं रुद्रदेवताम् ॥ ३४
ससूत्रं सपिधानं च वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम् ।
तत्पूर्वं हेमरत्नौघैर्वासितं वै हिरण्मयम् ॥ ३५
कलशान् विन्यसेत्पञ्च पञ्चभिर्ब्राह्मणैस्ततः ।
होमं च चरुणा कुर्याद्यथाविभवविस्तरम् ॥ ३६
शिष्यं च वासयेद्भक्तं दक्षिणे मण्डलस्य तु ।
दर्भशय्यासमारूढं शिवध्यानपरायणम् ॥ ३७
अघोरेण यथान्यायमष्टोत्तरशतं पुनः ।
घृतेन हुत्वा दुःस्वप्नं प्रभाते शोधयेन्मलम् ॥ ३८
एवं चोपोषितं शिष्यं स्नातं भूषितविग्रहम् ।
नववस्त्रोत्तरीयं च सोष्णीषं कृतमङ्गलम् ॥ ३ ९
दुकूलाद्येन वस्त्रेण नेत्रं बद्ध्वा प्रवेशयेत् ।
सुवर्णपुष्पसम्मिश्रं यथाविभवविस्तरम् ॥ ४०
ईशानेन च मन्त्रेण कुर्यात्पुष्पाञ्जलिं प्रभोः ।
प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा रुद्राध्यायेन वा पुनः ॥ ४१
कल्याणकारी, विद्युद्वलयसदृश, करोड़ों विद्युत् के समान प्रभावाले, श्यामरक्त वर्णवाले, गम्भीर आकारवाले, शक्तित्रय ( तीनों शक्तियों ) पर विराजमान तीन तत्त्वोंसे युक्त तथा विद्यामूर्ति स्वरूप भगवान् सदाशिव ईशानका इस प्रकार स्मरण करना चाहिये और यथाक्रमसे उनका पूजन करना चाहिये ॥ १६–३० ॥ तत्पश्चात् पूर्व आदि दिशाओंसे सम्बन्धित [ इन्द्र आदि ] लोकपालोंका अस्त्रमन्त्रसे अलग - अलग पूजन करना चाहिये । इसके बाद विधिपूर्वक चरु बनाकर उसका आधा भाग शिवको अर्पित करना चाहिये । शिवको निवेदित करनेके बाद शेष चरुके आधे भागसे हवन कर देना चाहिये । तदनन्तर बचे हुए उत्तम चरुको अघोर मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके भक्षण करनेके लिये शिष्यको दिलाना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥ चरुका भक्षण करनेके अनन्तर आचमन करके शुद्ध होकर शिष्यको विधिपूर्वक तत्पुरुषका यजन करना चाहिये । तत्पश्चात् ईशान मन्त्रसे अभिमन्त्रित किये गये पंचगव्यका प्राशन करके वामदेवमन्त्रसे सर्वांग भस्म धारण करना चाहिये, गुरुको शिष्यके दोनों कानोंमें रुद्रदैवत्य गायत्री ( रुद्रगायत्री ) - का जप करना चाहिये । होमके पूर्व सूत्रयुक्त, आच्छादनयुक्त, दो वस्त्रोंसे घिरा हुआ तथा हेमरत्नोंसे अधिवासित जो सुवर्णमय अधिवासनमण्डल है, उसमें पाँच ब्रह्ममन्त्रोंसे पाँच कलशोंका स्थापन करना चाहिये । तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार चरुसे होम करना चाहिये ॥ ३३-३६ ॥ इसके बाद शिव ध्यानपरायण भक्त शिष्यको मण्डलके दक्षिण भागमें कुशकी शैय्यापर शयन कराना चाहिये । पुनः प्रात: काल होनेपर अघोरमन्त्रसे विधिपूर्वक घृतकी एक सौ आठ आहुति देकर दुःस्वप्नरूप मलका शोधन करे । इस प्रकार व्रती शिष्यको स्नान कराकर उसके शरीरको भूषित करके, उसे नवीन वस्त्र, उत्तरीय तथा | पगड़ी धारण कराकर और उससे समस्त मंगलकृत्य सम्पन्न कराकर दुपट्टा आदिसे उसके नेत्रको बाँधकर उसे मण्डलमें प्रवेश कराये । शिष्य अपने धनसामर्थ्यके | अनुसार सुवर्णयुक्त पुष्प अंजलिमें लेकर ईशानमन्त्रसे
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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६५६ केवलं प्रणवेनाथ शिवध्यानपरायणः । प्रभुको पुष्पांजलि अर्पित करे और पुनः रुद्राध्याय अथवा सङ्क्षिपेत्स्वयम् ॥ ४२ केवल प्रणवका उच्चारण करता हुआ शिवके ध्यानमें ध्यात्वा तु देवदेवेशमीशाने यस्मिन् मन्त्रे पतेत्पुष्पं तन्मन्त्रस्तस्य सिध्यति शिवाम्भसा तु संस्पृश्य अघोरेण च भस्मना शिष्यमूर्धनि विन्यस्य गन्धाद्यैः शिष्यमर्चयेत् । वारुणं परमं श्रेष्ठं द्वारं वै सर्ववर्णिनाम् क्षत्रियाणां विशेषेण द्वारं वै पश्चिमं स्मृतम् । नेत्रावरणमुन्मुच्य मण्डलं दर्शयेत्ततः
कुशासने तु संस्थाप्य दक्षिणामूर्तिमास्थितः ।
तत्त्वशुद्धिं ततः कुर्यात्पञ्चतत्त्वप्रकारतः ॥
निवृत्त्या रुद्रपर्यन्तमण्डमण्डोद्भवात्मज ।
प्रतिष्ठया तदूर्ध्वं च यावदव्यक्तगोचरम् ॥
विश्वेश्वरान्तं वै विद्या कलामात्रेण सुव्रत ।
तदूर्ध्वमार्गं संशोध्य शिवभक्त्या शिवं नयेत् ॥
समर्चनाय तत्त्वस्य तस्य भोगेश्वरस्य वै ।
तत्त्वत्रयप्रभेदेन चतुर्भिरुत वा तथा ॥
होमयेदङ्गमन्त्रेण शान्त्यतीतं सदाशिवम् ।
सद्यादिभिस्तु शान्त्यन्तं चतुर्भिः कलया पृथक् ॥
शान्त्यतीतं मुनिश्रेष्ठ ईशानेनाथवा पुनः ।
प्रत्येकमष्टोत्तरशतं दिशाहोमं तु कारयेत् ॥
ईशान्यां पञ्चमेनाथ प्रधानं परिगीयते ।
समिदाज्यचरूल्लाँजान् सर्षपांश्च यवांस्तिलान् ॥
द्रव्याणि सप्त होतव्यं स्वाहान्तं प्रणवादिकम् ।
तेषां पूर्णाहुतिर्विप्र ईशानेन विधीयते ॥
सहंसेन यथान्यायं प्रणवाद्येन सुव्रत ।
अघोरेण च मन्त्रेण प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
लीन होकर मण्डलकी तीन प्रदक्षिणा करके देवदेवेशका । ध्यान करके पुष्पको ईशान दिशामें स्वयं प्रक्षिप्त कर ॥ ४३ दे । पुष्प जिस मन्त्रपर गिरे, वही मन्त्र उसके लिये सिद्ध हो जाता है । तदनन्तर मंगल जल तथा अघोरमन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्मसे शिष्यका स्पर्श करके शिष्यके ॥ ४४ सिरपर अपना हाथ रखकर गुरुको गन्ध आदि उपचारोंसे शिष्यका पूजन करना चाहिये ॥ ३७– ४३१/२ ॥ वरुणसम्बन्धी पश्चिम द्वार प्रवेशके लिये सभी ॥ ४५ वर्णोंके लिये श्रेष्ठ है और यह विशेष रूपसे क्षत्रियोंके लिये अत्युत्तम कहा गया है । प्रवेशके अनन्तर शिष्यके नेत्रका ४६ वस्त्रावरण हटाकर उसे मण्डल दिखाना चाहिये । इसके बाद शिष्यको कुशासनपर बैठाकर दक्षिणामूर्ति शिवका आश्रय लेकर पंचतत्त्वप्रकारसे तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये । ४७ हे सनत्कुमार! हे सुव्रत! क्रमसे पृथ्वी आदि पंचमहाभूतोंसे लेकर अहंकारपर्यन्त अण्डकी निवृत्तिसे, उस अहंकारसे भी ऊपर अव्यक्तगोचर प्रकृतिपर्यन्त स्थितिके द्वारा तथा ४८ ज्ञानकलासे पुरुषतकका ज्ञान करके उससे भी ऊपर परम शिवकी प्राप्ति मार्गको शिवभक्तिके द्वारा आवरणरहित ४ ९ करके शिष्यको तुरीय शिवतक पहुँचा दे । तत्पश्चात् उन योगेश्वर तत्त्वरूप शिवके समर्चनके लिये प्रकृति, पुरुष, ईश्वर - इन तत्त्वत्रय अथवा अहंकार आदि चार तत्त्वों ५० क्रमसे शान्त्यतीत कलामें स्थित सदाशिवके निमित्त ईशानमन्त्रसे होम कर दे, साथ ही पृथक् गणनासे सद्योजात आदि चार मन्त्रोंके द्वारा शान्त्यन्त शिवके लिये होम कर ५१ दे; हे मुनिश्रेष्ठ! इसके बाद ईशानमन्त्रसे परम शिवको एक सौ आठ आहुति देकर ऋत्विजोंके द्वारा एक सौ आठ आहुतिसे दिग्देवताहोम कराना चाहिये ॥ ४४ - ५१ ॥ ५२ ईशान दिशामें पाँचवें ईशानमन्त्रसे किया गया याग प्रधान याग कहा जाता है । मन्त्रके आदिमें प्रणव तथा ५३ अन्तमें स्वाहा लगाकर समिधा, घृत, चरु, लाजा ( लावा ), सरसों, यव, तिल - इन सात द्रव्योंका हवन करना चाहिये । हे विप्र! उनकी पूर्णाहुति ईशानमन्त्रसे ५४ । की जाती है । हे सुव्रत! प्रणवयुक्त हंसगायत्रीमन्त्रसहित
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अध्याय २१ ] शिवदीक्षाविधि - वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य
जयादिस्विष्टपर्यन्तमग्निकार्यं क्रमेण तु ।
गुणसंख्याप्रकारेण प्रधानेन च योजयेत् ॥
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भूतानि ब्रह्मभिर्वापि मौनी बीजादिभिस्तथा ।
अथ प्रधानमात्रेण प्राणापानौ नियम्य च ॥
षष्ठेन भेदयेदात्मप्रणवान्तं कुलाकुलम् ।
अन्योऽन्यमुपसंहृत्य ब्रह्माणं केशवं हरम् ॥
रुद्रे रुद्रं तमीशाने शिवे देवं महेश्वरम् ।
तस्मात्सृष्टिप्रकारेण भावयेद्भवनाशनम् ॥
स्थाप्यात्मानममुं जीवं ताडनं द्वारदर्शनम् ।
दीपनं ग्रहणं चैव बन्धनं पूजया सह ॥
अमृतीकरणं चैव कारयेद्विधिपूर्वकम् ।
षष्ठान्तं सद्यसंयुक्तं तृतीयेन समन्वितम् ॥
फडन्तं संहृतिः प्रोक्ता पञ्चभूतप्रकारतः ।
सद्याद्यषष्ठसहितं शिखान्तं सफडन्तकम् ॥
ताडनं कथितं द्वारं तत्त्वानामपि योगिनः ।
प्रधानं सम्पुटीकृत्य तृतीयेन च दीपनम् ॥
आद्येन सम्पुटीकृत्य प्रधानं ग्रहणं स्मृतम् ।
प्रधानं प्रथमेनैव सम्पुटीकृत्य पूर्ववत् ॥
बन्धनं परिपूर्णेन प्लावनं चामृतेन च ।
शान्त्यतीता ततः शान्तिर्विद्या नाम कलामला ॥
प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्च कलासङ्क्रमणं स्मृता ।
तत्त्ववर्णकलायुक्तं भुवनेन यथाक्रमम् ॥
मन्त्रैः पादैः स्तवं कुर्याद्विशोध्य च यथाविधि ।
आद्येन योनिबीजेन कल्पयित्वा च पूर्ववत् ॥
६५७ अघोरमन्त्रसे विधिपूर्वक प्रायश्चित्त किया जाता है । ५५ जया, अभ्यातान आदिसे लेकर स्विष्टकृत् - होमपर्यन्त अग्निकार्यको तीन प्रकारसे पूर्वोक्त प्रधान होमके साथ युक्त कर देना चाहिये ॥ ५२–५५ ॥ ५६ तत्पश्चात् गुरुको चाहिये कि मौन होकर बीजस्वरूप [ सद्योजात आदि ] वेदमन्त्रोंसे पृथ्वी आदि पंचमहाभूतोंका तथा केवल ईशानमन्त्रसे प्राण - अपान वायुका निरोध ५७ करके छठे ' नमो हिरण्यबाहवे ० ' इस मन्त्रसे आत्मवाचक प्रणवके अन्तरूप नादसमुदायसे व्याप्त ब्रह्मरन्ध्रका भेदन । करे । तत्पश्चात् ब्रह्मा, केशव तथा रुद्रको अन्योन्य ५८ रूपसे उपसंहृत करके अर्थात् ब्रह्माको केशवमें, केशवको | हरमें विलीन करके संहारमूर्ति हरको रुद्रमें, उन रुद्रको ईशानमें और उन महेश्वर ईशानको शिवमें उपसंहृत ५ ९ करके पुनः सृष्टिक्रमसे भवनाशक रुद्रका चिन्तन करे ॥ ५६-५८ ॥ इसके बाद शिष्यके जीवको रुद्रमें स्थापित करके ६० ताड़न, द्वारदर्शन, दीपन, ग्रहण, पूजासहित बन्धन और अमृतीकरण विधिपूर्वक कराना चाहिये । अघोरमन्त्रके आदिमें सद्योजातमन्त्र और अन्तमें षष्ठ मन्त्र - ' नमो ६१ हिरण्यबाहवे ० ' तथा सबके अन्तमें ' फट् ' शब्द प्रयुक्त करके पृथ्वी आदि पंचभूतोंके प्रकारसे संहृति कही गयी है । सद्योजात आदिमें, इसके बाद ' नमो हिरण्यबाहवे ० ' ६२ और पुनः अन्तमें ' शिखा ' तथा ' फट् ' लगा हुआ मन्त्र दीक्षायोगीके लिये ताड़न तथा तत्त्वोंका द्वारदर्शन कहा गया है; अघोरमन्त्रसे सम्पुटित करके प्रधान ईशानमन्त्रको ६३ । ' दीपन ' कहा गया है । सद्योजातमन्त्रसे सम्पुटित करके ईशानमन्त्रको ग्रहण तथा उसी ग्रहणकी ही तरह सद्योजात मन्त्र से सम्पुटित करके ईशानमन्त्रको बन्धन ६४ भी कहा गया है और समग्र त्रियम्बकमन्त्रसे प्लावन अर्थात् अमृतीकरण बताया गया है ॥५ ९ –६३१ / २ ॥ शान्त्यतीता, प्रतिष्ठा, अमला, विद्या, शान्ति तथा ६५ निवृत्ति - ये कलाएँ कही गयी हैं । इनका यथाक्रम परस्पर संक्रमण करके तत्त्व, वर्ण, कला, भुवन, मन्त्र और पद – इन षडध्वोंका शोधन करके और पुनः प्रणव ६६ | तथा योनिबीज ( ह्रीं ) - से सम्पुटित करके शिवप्रतिपादक
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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ६५८ YA YA 99 96 96 95 36 36 35 36 36 36 36 36 36 36 96 96 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 96 96 95 96 95 36 36 36 36 36 35 पूजासम्प्रोक्षणं विद्धि ताडनं हरणं तथा संहतस्य च संयोगं विक्षेपं च यथाक्रमम् अर्चना च तथा गर्भधारणं जननं पुनः अधिकारो भवेद्भानोर्लयश्चैव विशेषतः उत्तमाद्यं तथान्त्येन योनिबीजेन सुव्रत । उद्धारे प्रोक्षणे चैव ताडने च महामुने
अघोरेण फडन्तेन संसृतिश्च न संशयः ।
प्रतितत्त्वं क्रमो ह्येष योगमार्गेण सुव्रत ॥
मुष्टिना चैव यावच्च तावत्कालं नयेत्क्रमात् ।
विषुवेण तु योगेन निवृत्त्यादि शिवान्तिकम् ॥
एकत्र समतां याति नान्यथा तु पृथक् पृथक् ।
नासाग्रे द्वादशान्तेन पृष्ठेन सह योगिनाम् ॥
क्षन्तव्यमिति विप्रेन्द्र देवदेवस्य शासनम् ।
हेमराजतताम्राद्यैर्विधिना कल्पिते च ॥
सकूर्चेन सवस्त्रेण तन्तुना वेष्टितेन च ।
तीर्थाम्बुपूरितेनैव रत्नगर्भेण सुव्रत ॥
संहितामन्त्रितेनैव रुद्राध्यायस्तुतेन च ।
सेचयेच्च ततः शिष्यं शिवभक्तं च धार्मिकम् ॥
सोऽपि शिष्यः शिवस्याग्रे गुरोरग्रे च सादरम् ।
वह्नेश्च दीक्षां कुर्वीत दीक्षितश्च तथाचरेत् ॥
वरं प्राणपरित्यागश्छेदनं शिरसोऽपि वा ।
न त्वनभ्यर्च्य भुञ्जीयाद्भगवन्तं सदाशिवम् ॥
। मन्त्रोंके द्वारा यथाविधि अर्थका विचार करके स्तवन 363636363636363636363636 ॥ ६७ करना चाहिये ॥ ६४–६६ ॥ पूजासम्प्रोक्षण, ताड़न, हरण, अत्यन्त शुद्ध मनका संयोग, यथाक्रम विक्षेप, अर्चना, गर्भधारण ( वागीशीके । गर्भमें स्थापन ), पुनर्जनन, भानुका अधिकार अर्थात् ॥ ६८ तत्सदृश ज्ञानका निवारक रूप और विशेषरूपसे अविद्याका नाश होता है - ऐसा जानिये ॥ ६७-६८ ॥ हे सुव्रत! हे महामुने! उद्धार, प्रोक्षण तथा ताड़नमें ॥ ६ ९ प्रारम्भमें उत्तम ईशानमन्त्र और इसके अन्तमें योनिबीजके साथ मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये और अन्तमें ' फट्'-से युक्त अघोरमन्त्रके द्वारा संसृति होती है; इसमें सन्देह ७० नहीं है । हे सुव्रत! प्रत्येक तत्त्वके लिये योगमार्गके द्वारा यही क्रम निर्धारित है ॥ ६ ९ -७० ॥ जबतक मुष्टिसदृश प्राणायाममें स्थित रहे, उतने ७१ कालको विषुवयोग द्वारा क्रमसे निवृत्तिकलासे लेकर शिवाकलापर्यन्त व्यतीत करे । साधक नासिका अग्रभागपर दृष्टिको स्थिर करके योगियोंके चरमावयवभूत मन्त्रसे द्वादशान्त ( परम तत्त्व शिव ) - के साथ समताको ७२ प्राप्त होता है; पृथक् - पृथक् स्थानोंपर दृष्टि रखनेसे नहीं । हे विप्रेन्द्र! दीक्षितको सुख - दुःख आदि द्वन्द्वसमूहों को सहना चाहिये - ऐसा देवदेव शिवका ७३ | आदेश है ॥ ७१-७२१ / २ ॥ हे सुव्रत! सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबे आदि धातुओंसे निर्मित, कूर्चयुक्त, वस्त्र तथा तन्तुसे वेष्टित, ७४ | तीर्थजलसे परिपूर्ण, रत्नप्रक्षिप्त, संहिता मन्त्रसे अभिमन्त्रित, रुद्राध्यायसे स्तुत कलशके जलसे पवमान आदि मन्त्रोंके द्वारा धार्मिक शिवभक्त शिष्यका अभिषेक करना चाहिये ॥ ७३–७५ ॥ ७५ वह [ अभिषिक्त ] शिष्य भी शिव, गुरु तथा अग्निके समक्ष आदरपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होकर बताये जानेवाले नियमोंका पालन करे । ७६ | चाहे प्राण चला जाय अथवा सिर कट जाय, किंतु भगवान् सदाशिवका पूजन किये बिना भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिये । इस प्रकार दीक्षा प्राप्त करनी चाहिये ७७ । और यथाविधि शिवपूजन करना चाहिये । तीनों कालोंमें