श्रीगणेशाय नमः।

लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 701–710

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले

कल्लोला चेति क्रमशः षोडशैव यथाविधि ।

शौण्डव्यूहः समाख्यात: शौण्डाया व्यूह उच्यते ॥ १५ ९

दन्तुरा रौद्रभागा च अमृता सकुला शुभा ।

चलजिह्वार्यनेत्रा च रूपिणी दारिका तथा ॥ १६०

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ।

खादिका रूपनामा च संहारी च क्षमान्तका ॥ १६१

कण्डिनी पेषिणी चैव महात्रासा कृतान्तिका ।

दण्डिनी किङ्करी बिम्बा वर्णिनी चामलाङ्गिनी ॥ १६२

द्रविणी द्राविणी चैव शक्तयः षोडशैव तु ।

कथितो हि मनोरम्यः शौण्डाया व्यूह उत्तमः ॥ १६३

प्रथमाख्यं प्रवक्ष्यामि व्यूहं परमशोभनम् ।

प्लविनी प्लावनी शोभा मन्दा चैव मदोत्कटा ॥ १६४

मन्दाक्षेपा महादेवी प्रथमावरणे स्मृताः । कामसन्दीपिनी देवी अतिरूपा मनोहरा । १६५

महावशा मदग्राहा विह्वला मदविह्वला ।

अरुणा शोषणा दिव्या रेवती भाण्डनायिका ॥ १६६

स्तम्भिनी घोररक्ताक्षी स्मररूपा सुघोषणा ।

व्यूहः प्रथम आख्यातः स्वायम्भुव यथा तथा ॥। १६७

कथितं प्रथमाव्यूहं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे ।

घोरा घोरतराघोरा अतिघोराघनायिका ॥ १६८

धावनी क्रोष्टुका मुण्डा चाष्टमी परिकीर्तिता ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १६ ९ ।

भीमा भीमतराभीमा शस्ता चैव सुवर्तुला ।

स्तम्भिनी रोदनी रौद्रा रुद्रवत्यचलाचला ॥ १७० ।

महाबला महाशान्तिः शाला शान्ता शिवाशिवा ।

बृहत्कक्षा महानासा षोडशैव प्रकीर्तिता ॥ १७१

प्रथमायाः समाख्यातो मन्मथव्यूह उच्यते ।

तालकर्णी च बाला च कल्याणी कपिला शिवा ॥ १७२

इष्टिस्तुष्टिः प्रतिज्ञा च प्रथमावरणे स्मृताः ।

ख्यातिः पुष्टिकरी तुष्टिर्जला चैव श्रुतिर्धृतिः ॥ १७३

कामदा शुभदा सौम्या तेजिनी कामतन्त्रिका ।

धर्मा धर्मवशा शीला पापहा धर्मवर्धिनी ॥ १७४ ।

विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ६ ९९ दण्डकी, घोणा, शोणा, सत्यवती तथा कल्लोला- ये क्रमशः सोलह शक्तियाँ हैं । शौण्डव्यूह कह दिया गया, अब शौण्डाव्यूह कहा जाता है ॥ १५२–१५९ ॥ दन्तुरा, रौद्रभागा, अमृता, शुभ सकुला, चलजिह्वा, आर्यनेत्रा, रूपिणी तथा दारिका - [ प्रथम आवरणमें ये आठ शक्तियाँ हैं । ] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये । खादिका, रूपनामा, संहारी, क्षमा, अन्तका, कण्डिनी, पेषिणी, महात्रासा, कृतान्तिका, दण्डिनी, किंकरी, बिम्बा, वर्णिनी, अमलांगिनी, द्रविणी तथा द्राविणी— ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं । मैंने इस मनोरम उत्तम शौण्डाव्यूहका वर्णन कर दिया ॥ १६०–१६३ ॥ इसके बाद मैं प्रथम नामक परम सुन्दर व्यूहका वर्णन करूँगा । प्लविनी, प्लावनी, शोभा, मन्दा, मदोत्कटा, मन्दा, आक्षेपा तथा महादेवी – ये पहले आवरणकी [ शक्तियाँ ] कही गयी हैं । देवी कामसंदीपनी, अतिरूपा, मनोहरा, महावशा, मदग्राहा, विह्वला, मदविह्वला, अरुणा, शोषणा, दिव्या, रेवती, भाण्डनायिका, स्तम्भिनी, घोररक्ताक्षी, स्मररूपा तथा सुघोषणा – [ ये दूसरे आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं । ] हे स्वायम्भुव! प्रथम व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मैं प्रथमा व्यूहका वर्णन करूँगा, उसे मुझसे सुनिये । घोरा, घोरतरा, अघोरा, अतिघोरा, अघनायिका, धावनी, क्रोष्टुका और आठवीं मुण्डा - [ ये पहले आवरणकी शक्तियाँ ] कही गयी हैं । पहला आवरण कह दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । भीमा, भीमतरा, अभीमा, उत्तम सुवर्तुला, स्तम्भिनी, रोदनी, रौद्रा, रुद्रवती, अचलाचला, महाबला, महाशान्ति, शाला, शान्ता, शिवाशिवा, बृहत्कक्षा, महानासा - [ दूसरे आवरणकी ] ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं ॥ १६४ - १७१ ॥ प्रथमा व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब मन्मथव्यूह कहा जाता है । तालकर्णी, बाला, कल्याणी, कपिला, शिवा, इष्टि, तुष्टि तथा प्रतिज्ञा — ये पहले आवरणकी शक्तियाँ कही गयी हैं । ख्याति, पुष्टिकरी, तुष्टि, जला, श्रुति, धृति, कामदा, शुभदा, सौम्या, तेजिनी, कामतन्त्रिका, धर्मा, धर्मवशा, शीला, पापहा तथा धर्मवर्धिनी - [ ये सोलह शक्तियाँ दूसरे आवरणकी

पृष्ठ 702

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७०० अ

मन्मथः कथितो व्यूहो मन्मथायाः शृणुष्व मे ।

धर्मरक्षा विधाना च धर्मा धर्मवती तथा ॥

सुमतिर्दुर्मतिर्मेधा विमला चाष्टमी स्मृता ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥

शुद्धिर्बुद्धिर्द्युतिः कान्तिर्वर्तुला मोहवर्धिनी ।

बला चातिबला भीमा प्राणवृद्धिकरी तथा ॥

निर्लज्जा निर्घृणा मन्दा सर्वपापक्षयङ्करी ।

कपिला चातिविधुरा षोडशैताः प्रकीर्तिताः ॥

मन्मथायिक उक्तस्ते भीमव्यूहं वदामि च ।

रक्ता चैव विरक्ता च उद्वेगा शोकवर्धिनी ॥

कामा तृष्णा क्षुधा मोहा चाष्टमी परिकीर्तिता ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥

जया निद्रा भयालस्या जलंतृष्णोदरी दरा ।

कृष्णा कृष्णाङ्गिनी वृद्धा शुद्धोच्छिष्टाशनी वृषा ॥

कामना शोभिनी दग्धा दुःखदा सुखदावली ।

भीमव्यूहः समाख्यातो भीमायीव्यूह उच्यते ॥

आनन्दा च सुनन्दा च महानन्दा शुभङ्करी ।

वीतरागा महोत्साहा जितरागा मनोरथा ॥

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ।

मनोन्मनी मनःक्षोभा मदोन्मत्ता मदाकुला ॥

मन्दगर्भा महाभासा कामानन्दा सुविह्वला ।

महावेगा सुवेगा च महाभोगा क्षयावहा ॥

क्रमिणी क्रामणी वक्रा द्वितीयावरणे स्मृताः ।

कथितं तव भीमायीव्यूहं परमशोभनम् ॥

शाकुनं कथयाम्यद्य स्वायम्भुव मनोत्सुकम् ।

योगा वेगा सुवेगा च अतिवेगा सुवासिनी ॥

देवी मनोरयावेगा जलावर्ता च धीमती ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥

रोधिनी क्षोभिणी बाला विप्राशेषासुशोषिणी ।

विद्युता भासिनी देवी मनोवेगा च चापला ॥

विद्युजिह्वा महाजिह्वा भृकुटी कुटिलानना ।

फुल्लज्वाला महाज्वाला सुज्वाला च क्षयान्तिका ॥

शाकुनः कथितो व्यूहः शाकुनायाः शृणुष्व मे ।

ज्वालिनी चैव भस्माङ्गी तथा भस्मान्तगा तता ॥

ग हैं । ] मन्मथव्यूह कह दिया गया, अब मन्मथाव्यूहको १७५ । मुझसे सुनिये । धर्मरक्षा, विधाना, धर्मा, धर्मवती, सुमति, । दुर्मति, मेधा तथा आठवीं शक्ति विमला कही गयी है । १७६ पहला आवरण बता दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । शुद्धि, बुद्धि, द्युति, कान्ति, वर्तुला, मोहवर्धिनी, १७७ बला, अतिबला, भीमा, प्राणवृद्धिकरी, निर्लज्जा, निर्घृणा, मन्दा, सर्वपापक्षयंकरी, कपिला तथा अतिविधुरा - ये १७८ सोलह [ शक्तियाँ ] बतायी गयी हैं॥१७२–१७८ ॥ मैंने आपसे मन्मथाव्यूहका वर्णन कर दिया, अब १७ ९ भीमव्यूह बता रहा हूँ । रक्ता, विरक्ता, उद्वेगा, शोकवर्धिनी, कामा, तृष्णा, क्षुधा तथा आठवीं शक्ति मोहा कही गयी है । यह पहला आवरण कह दिया, अब दूसरा आवरण सुनिये । १८० जया, निद्रा, भया, आलस्या, जलतृष्णोदरी, दरा, कृष्णा, कृष्णांगिनी, वृद्धा, शुद्धोच्छिष्टाशनी, वृषा, कामना, शोभिनी, १८१ दग्धा, दुःखदा तथा सुखदावली - [ ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं । ] भीमव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब १८२ भीमायीव्यूह बताया जाता | आनन्दा, सुनन्दा, महानन्दा, शुभंकरी, वीतरागा, महोत्साहा, जितरागा तथा मनोरथा-१८३ [ ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरण की हैं । ] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये । मनोन्मनी, १८४ मनः क्षोभा, मदोन्मत्ता, मदाकुला, मन्दगर्भा, महाभासा, कामा, आनन्दा, सुविह्वला, महावेगा, सुवेगा, महाभोगा, क्षयावहा, १८५ क्रमिणी, क्रामिणी तथा वक्रा — ये दूसरे आवरणमें बतायी गयी हैं; मैंने आपसे अत्यन्त सुन्दर भीमायीव्यूहके विषयमें १८६ कह दिया ॥ १७ ९ –१८६ ॥ हे स्वायम्भुव! अब मैं मनोहर शाकुनव्यूह बताता १८७ । हूँ । योगा, वेगा, सुवेगा, अतिवेगा, देवी सुवासिनी, मनोरयावेगा, जलावर्ता और धीमती - [ ये प्रथम आवरणकी १८८ आठ शक्तियाँ बतायी गयी हैं । ] प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये । रोधिनी, १८ ९ क्षोभिणी, बाला, विप्रा - शेषासुशोषिणी, विद्युता, देवी भासिनी, मनोवेगा, चापला, विद्युज्जिह्वा, महाजिह्वा, १ ९ ० भृकुटी, कुटिलानना, फुल्लज्वाला, महाज्वाला, सुज्वाला और क्षयान्तिका; यह शाकुनव्यूह कह दिया गया, अब १ ९९ । मुझसे शाकुनाव्यूह सुनिये । ज्वालिनी, भस्मांगी, भस्मांतगा,

पृष्ठ 703

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अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले

भाविनी च प्रजा विद्या ख्यातिश्चैवाष्टमी स्मृता ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ १ ९ २

उल्लेखा च पताका च भोगा भोगवती खगा ।

भोगभोगव्रता योगा भोगाख्या योगपारगा ॥ १ ९ ३

ऋद्धिर्बुद्धिर्धृतिः कान्तिः स्मृतिः साक्षाच्छ्रुतिर्धरा ।

शाकुनाया महाव्यूहः कथितः कामदायकः ॥ १ ९ ४ ।

स्वायम्भुव शृणु व्यूहं सुमत्याख्यं सुशोभनम् ।

परेष्टा च परादृष्टा ह्यमृता फलनाशिनी ॥ १ ९ ५

हिरण्याक्षी सुवर्णाक्षी देवी साक्षात्कपिञ्जला ।

कामरेखा च कथितं प्रथमावरणं शृणु ॥ १ ९ ६

रत्नद्वीपा च सुद्वीपा रत्नदा रत्नमालिनी ।

रत्नशोभा सुशोभा च महाशोभा महाद्युतिः ॥ १ ९ ७

शाम्बरी बन्धुरा ग्रन्थिः पादकर्णा करानना । हयग्रीवा च जिह्वा च सर्वभासेति शक्तयः । १ ९ ८ ।

कथितः सुमतिव्यूहः सुमत्या व्यूह उच्यते ।

सर्वाशी च महाभक्षा महादंष्ट्रातिरौरवा ॥ १ ९९

विस्फुलिङ्गा विलिङ्गा च कृतान्ता भास्करानना ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ २००

रागा रङ्गवती श्रेष्ठा महाक्रोधा च रौरवा ।

क्रोधनी वसनी चैव कलहा च महाबला ॥ २०१

कलन्तिका चतुर्भेदा दुर्गा वै दुर्गमानिनी ।

नाली सुनाली सौम्या च इत्येवं कथितं मया ॥ २०२

गोपव्यूहं वदाम्यत्र शृणु स्वायम्भुवाखिलम् ।

पाटली पाटवी चैव पाटी विटिपिटा तथा ॥ २०३

कङ्कटा सुपटा चैव प्रघटा च घटोद्भवा ।

प्रथमावरणं चात्र भाषया कथितं मया ॥ २०४

नादाक्षी नादरूपा च सर्वकारी गमागमा ।

अनुचारी सुचारी च चण्डनाडी सुवाहिनी ॥ २०५

सुयोगा च वियोगा च हंसाख्या च विलासिनी ।

सर्वगा सुविचारा च वञ्चनी चेति शक्तयः ॥ २०६

गोपव्यूहः समाख्यातो गोपायीव्यूह उच्यते ।

भेदिनी च्छेदिनी चैव सर्वकारी क्षुधाशनी ॥ २०७

उच्छुष्मा चैव गान्धारी भस्माशी वडवानला ।

प्रथमावरणं चैव द्वितीयावरणं शृणु ॥ २०८ ।

विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०१ तता, भाविनी, प्रजा, विद्या तथा आठवीं शक्ति ख्याति बतायी गयी है । पहला आवरण बता दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । उल्लेखा, पताका, भोगा, भोगवती, खगा, भोगभोगव्रता, योगा, भोगाख्या, योगपारगा, ऋद्धि, बुद्धि, धृति, कान्ति, स्मृति, श्रुति और धरा - [ ये सोलह शक्तियाँ कही गयी हैं । ] कामनाओंको पूर्ण करनेवाला यह महान् शाकुनाव्यूह कह दिया गया । १८७–१९ ४ ॥ हे स्वायम्भुव! अब सुमति नामक अति सुन्दर व्यूहको सुनिये । [ इसके प्रथम आवरणमें ये आठ शक्तियाँ हैं - ] परेष्टा, परादृष्टा, अमृता, फलनाशिनी, हिरण्याक्षी, सुवर्णाक्षी, देवी कपिंजला तथा कामरेखा । पहला आवरण बता दिया गया, अब दूसरा आवरण । सुनिये । रत्नद्वीपा, सुद्वीपा, रत्नदा, रत्नमालिनी, रत्नशोभा, सुशोभा, महाशोभा, महाद्युति, शाम्बरी, बन्धुरा, ग्रन्थि, पादकर्णा, करानना, हयग्रीवा, जिह्वा और सर्वभासा – ये [ सोलह ] शक्तियाँ हैं । सुमतिव्यूह कह दिया गया, अब सुमत्याव्यूह बताया जाता है । सर्वाशी, महाभक्षा, महादंष्ट्रा, अतिरौरवा, विस्फुलिङ्गा, विलिङ्गा, कृतान्ता तथा भास्करानना [ ये पहले आवरणकी आठ शक्तियाँ हैं ] । प्रथम आवरण बता दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । रागा, रंगवती, श्रेष्ठा, महाक्रोधा, रौरवा, क्रोधनी, वसनी, कलहा, महाबला, कलन्तिका, चतुर्भेदा, दुर्गा, दुर्गमानिनी, नाली, सुनाली तथा सौम्या - इस प्रकार मैंने यह [ दूसरा आवरण ] कह दिया ॥ १ ९५–२०२ ॥ हे स्वायम्भुव! अब मैं गोपव्यूह बता रहा हूँ; आप वह सब सुनिये । पाटली, पाटवी, पाटी, विटिपिटा, कंकटा, सुपटा, प्रघटा तथा घटोद्भवा [ प्रथम आवरणमें ये आठ शक्तियाँ हैं ] । मैंने पहला आवरण बता दिया । नादाक्षी, नादरूपा, सर्वकारी, गमा, अगमा, अनुचारी, सुचारी, चण्डनाड़ी, सुवाहिनी, सुयोगा, वियोगा, हंसा, विलासिनी, सर्वगा, सुविचारा तथा वंचनी — ये शक्तियाँ [ दूसरे आवरणकी ] हैं; गोपव्यूह बता दिया गया, अब गोपायीव्यूहका वर्णन किया जाता है । भेदिनी, छेदिनी, सर्वकारी, क्षुधाशनी, उच्छुष्मा, गान्धारी, भस्माशी तथा वड़वानल [ ये पहले आवरणकी आठ शक्तियाँ हैं ] ।

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७०२

अन्धा बाह्वासिनी बाला दीपाक्षमा तथैव च ।

अक्षा त्र्यक्षा च हृल्लेखा हृद्गतामायिकापरा ॥ २० ९

आमयासादिनी भिल्ली सह्यासह्या सरस्वती ।

रुद्रशक्तिर्महाशक्तिर्महामोहा च गोनदी ॥ २१०

गोपायी कथितो व्यूहो नन्दव्यूहं वदामि ते ।

नन्दिनी च निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च यथाक्रमम् ॥ २११

विद्या नासा खग्रसिनी चामुण्डा प्रियदर्शिनी ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ २१२

गृह्या नारायणी मोहा प्रजा देवी च चक्रिणी ।

कङ्कटा च तथा काली शिवाद्योषा ततः परम् ॥ २१३

विरामा या च वागीशी वाहिनी भीषणी तथा ।

सुगमा चैव निर्दिष्टा द्वितीयावरणे स्मृता ॥ २१४

नन्दव्यूहो मया ख्यातो नन्दाया व्यूह उच्यते ।

विनायकी पूर्णिमा च रङ्कारी कुण्डली तथा ॥ २१५

इच्छा कपालिनी चैव द्वीपिनी च जयन्तिका ।

प्रथमावरणे चाष्टौ शक्तयः परिकीर्तिताः ॥ २१६

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ।

पावनी चाम्बिका चैव सर्वात्मा पूतना तथा ॥ २१७

छगली मोदिनी साक्षाद्देवी लम्बोदरी तथा ।

संहारी कालिनी चैव कुसुमा च यथाक्रमम् ॥ २१८

शुक्रा तारा तथा ज्ञाना क्रिया गायत्रिका तथा ।

सावित्री चेति विधिना द्वितीयावरणं स्मृतम् ॥ २१ ९

नन्दायाः कथितो व्यूहः पैतामहमतः परम् ।

नन्दिनी चैव फेत्कारी क्रोधा हंसा षडङ्गुला ॥ २२०

आनन्दा वसुदुर्गा च संहारा ह्यमृताष्टमी ।

प्रथमावरणं प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥ २२१ ।

कुलान्तिकानला चैव प्रचण्डा मर्दिनी तथा ।

सर्वभूताभया चैव दया च वडवामुखी ॥२२२ ।

लम्पटा पन्नगा देवी कुसुमा विपुलान्तका ।

केदारा च तथा कूर्मा दुरिता मन्दरोदरी ॥ २२३ ।

खड्गचक्रेति विधिना द्वितीयावरणं स्मृतम् ।

व्यूहः पैतामहः प्रोक्तो धर्मकामार्थमुक्तिदः ॥ २२४

पितामहाया व्यूहं च कथयामि शृणुष्व वज्रा च नन्दना शावा राविका रिपुभेदिनी ॥। २२५

रूपा चतुर्था योगा च प्रथमावरणे स्मृताः ।

भूतानादा महाबाला खर्परा च तथापरा ॥ २२६ ।

प्रथम आवरण बता दिया गया, अब द्वितीय आवरण सुनिये । अन्धा, बाह्वासिनी, बाला, दीपाक्षमा, अक्षा, त्र्यक्षा, हृल्लेखा, हृद्गतामायिकापरा, आमयासादिनी, भिल्ली, सह्यासह्या, सरस्वती, रुद्रशक्ति, महाशक्ति, महामोहा और गोनदी ॥ २०३–२१० ॥ गोपायीव्यूहके विषयमें बता दिया, अब आपको नन्दव्यूह बता रहा हूँ । नन्दिनी, निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, नासा, खग्रसिनी, चामुण्डा तथा प्रियदर्शिनी [ ये पहले आवरणकी शक्तियाँ हैं ] । पहला आवरण कह दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । गृह्या, नारायणी, मोहा, प्रजादेवी, चक्रिणी, कंकटा, काली, शिवा, आद्या, उषा, विरामा, वागीशी वाहिनी, भीषणी, सुगमा तथा निर्दिष्टा– [ सोलह शक्तियाँ ] दूसरे आवरणमें कही गयी हैं । I मैंने नन्दव्यूह बता दिया, अब नन्दाव्यूह बताता हूँ । विनायकी, पूर्णिमा, रंकारी, कुण्डली, इच्छा, कपालिनी, द्वीपिनी तथा जयन्तिका -ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणमें बतायी गयी हैं । पहला आवरण बता दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । पावनी, अम्बिका, सर्वात्मा, पूतना, छगली, मोदिनी, देवी लम्बोदरी, संहारी, कालिनी, कुसुमा, शुक्रा, तारा, ज्ञाना, क्रिया, गायत्री तथा सावित्री-ये क्रमसे [ सोलह देवियाँ ] हैं । इसे [ नन्दाव्यूहका ]

द्वितीय आवरण कहा गया है । ॥ २११ - २१ ९ ॥

नन्दाव्यूह कह दिया, अब इसके बाद पैतामहव्यूह बताता हूँ । नन्दिनी, फेत्कारी, क्रोधा, हंसा, षडंगुला, आनन्दा, वसुदुर्गा तथा संहारामृता आठवीं शक्ति बतायी गयी हैं । यह प्रथम आवरण कह दिया गया, अब दूसरा आवरण सुनिये । कुलान्तिका, अनला, प्रचण्डा, मर्दिनी, सर्वभूताभया, दया, वड़वामुखी, लम्पटा, पन्नगा देवी, कुसुमा, विपुलान्तका, केदारा, कूर्मा, दुरिता, मन्दरोदरी, खड्गचक्रा — यह द्वितीय आवरण सम्यक् रूपसे कहा गया है । धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले पैतामहव्यूहका वर्णन कर दिया, अब मैं पितामहाव्यूह बता रहा हूँ; इसे मुझसे सुनिये । वज्रा, नन्दना, शावा, राविका, रिपुभेदिनी, रूपा, चतुर्था तथा योगा - ये शक्तियाँ प्रथम आवरणमें बतायी गयी हैं । भूतानादा,

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अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले

भस्मा कान्ता तथा वृष्टिर्द्विभुजा ब्रह्मरूपिणी ।

सैह्या वैकारिका जाता कर्ममोटी तथापरा ॥ २२७

महामोहा महामाया गान्धारी पुष्पमालिनी ।

शब्दापी च महाघोषा षोडशैव तथान्तिमे ॥ २२८ ।

सर्वाश्च द्विभुजा देव्यो बालभास्करसन्निभाः ।

पद्मशङ्खधराः शान्ता रक्तस्त्रग्वस्त्रभूषणाः ॥ २२ ९ ।

सर्वाभरणसम्पूर्णा मुकुटाद्यैरलङ्कृताः ।

मुक्ताफलमयैर्दिव्यै रत्नचित्रैर्मनोरमैः ॥ २३० ।

विभूषिता गौरवर्णा ध्येया देव्यः पृथक्पृथक् ।

एवं सहस्रकलशं ताम्रजं मृन्मयं तु वा ॥ २३१

पूर्वोक्तलक्षणैर्युक्तं रुद्रक्षेत्रे प्रतिष्ठितम् ।

भवाद्यैर्विष्णुना प्रोक्तैर्नाम्नां चैव सहस्रकैः ॥ २३२ ।

सम्पूज्य विन्यसेदग्रे सेचयेद्बाणविग्रहम् ।

अभिषिच्य च विज्ञाप्य सेचयेत्पृथिवीपतिम् ॥ २३३

एवं सहस्त्रकलशं सर्वसिद्धिफलप्रदम् ।

चत्वारिंशन्महाव्यूहं सर्वलक्षणलक्षितम् ॥ २३४

सर्वेषां कलशं प्रोक्तं पूर्ववद्धेमनिर्मितम् ।

सर्वे गन्धाम्बुसम्पूर्णपञ्चरत्नसमन्विताः ॥ २३५

तथा कनकसंयुक्ता देवस्य घृतपूरिताः ।

क्षीरेण वाथ दध्ना वा पञ्चगव्येन वा पुनः ॥ २३६ ।

ब्रह्मकूर्चेन वा मध्यमभिषेको विधीयते ।

रुद्राध्यायेन रुद्रस्य नृपतेः शृणु सत्तम ॥ २३७

अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः ।

सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ २३८ ।

मन्त्रेणानेन राजानं सेचयेदभिषेचितम् ।

होमं च मन्त्रेणानेन अघोरेणाघहारिणा ॥ २३ ९

प्रागाद्यं देवकुण्डे वा स्थण्डिले वा घृतादिभिः ।

समिदाज्यचरुं लाजशालिनीवारतण्डुलैः ॥ २४० ।

विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०३ महाबाला, खर्परा, भस्मा, कान्ता, वृष्टि, द्विभुजा ब्रह्मरूपिणी, सैह्या, वैकारिका, जाता, कर्ममोटी, महामोहा, महामाया, पुष्पमाला धारण करनेवाली गान्धारी, शब्दापी, महाघोषा -ये सोलह शक्तियाँ दूसरे आवरणमें बतायी गयी हैं ॥ २२०-२२८ ॥ ये सभी देवियाँ दो भुजाओंसे युक्त, बालसूर्यके समान प्रभावाली, [ हाथोंमें ] कमल तथा शंख धारण करनेवाली, शान्तस्वभाव, रक्तवर्णकी माला तथा वस्त्रसे विभूषित, समस्त आभूषणोंसे परिपूर्ण, मोतियोंसे जटित दिव्य मुकुट आदिसे अलंकृत, भाँति - भाँतिके अद्भुत तथा मनोरम रत्नोंसे विभूषित और गौरवर्णवाली हैं । इन देवियोंका पृथक् - पृथक् ध्यान करना चाहिये ॥ २२ ९ -२३०१ / २ ॥ इस प्रकार ताँबे अथवा मिट्टीके बने तथा पूर्वकथित लक्षणोंसे युक्त हजार कलशोंको रुद्रक्षेत्रमें प्रतिष्ठित करे । विष्णुके द्वारा कहे हुए ' भव ' आदि हजार नामोंसे [ प्रत्येक कलशमें ] पूजन करके सम्मुख बाणविग्रह ( बाणलिङ्ग ) स्थापित करके अभिषेक करना चाहिये । अभिषेक - प्रार्थना करके पृथ्वीपतिका अभिषेचन करना चाहिये । इस प्रकार चालीस महाव्यूहोंवाला तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न यह हजार कलशोंसे अभिषेचन सभी सिद्धियों को देनेवाला है ॥ २३१ - २३४ ॥ सभी कलशोंके मध्यमें पूर्वोक्त प्रमाणका स्वर्णनिर्मित कलश बताया गया है । सभी कलश सुगन्धित जलसे परिपूर्ण तथा पंचरत्नोंसे समन्वित होने चाहिये । रुद्रदेवके कलश स्वर्णयुक्त तथा घृतपूरित होने चाहिये । गायके दूध, दही, पंचगव्य अथवा ब्रह्मकूर्चसे रुद्रका मध्य-अभिषेक किया जाता है । हे सत्तम! रुद्रका अभिषेक रुद्राध्यायसे किया जाता है; अब राजाके अभिषेकके विषयमें सुनिये।‘अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥'— इस मन्त्रके द्वारा मूर्धाभिषिक्त राजाका अभिसेचन करना चाहिये और इसी पापनाशक अघोर मन्त्रसे होम भी करना चाहिये ॥ २३५—२३९ ॥ देवकुण्डमें अथवा स्थण्डिलमें घृतसे सिक्त लाजा, शालि, नीवार तथा तण्डुलसहित समिधा और चरुकी एक

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७०४ अष्टोत्तरशतं हुत्वा राजानमधिवासयेत् । पुण्याहं स्वस्ति रुद्राय कौतुकं हेमनिर्मितम्

भसितं च मृणालेन बन्धयेद्दक्षिणे करे ।

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।

मन्त्रेणानेन राजानं सेचयेद्वाथ होमयेत् ॥

सर्वद्रव्याभिषेकं च होमद्रव्यैर्यथाक्रमम् ।

प्रागाद्यं ब्रह्मभिः प्रोक्तं सर्वद्रव्यैर्यथाक्रमम् ॥

तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि ।

तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥

स्वाहान्तं पुरुषेणैवं प्राक्कुण्डं होमयेद्विजः ।

अघोरेण च याम्ये च होमयेत्कृष्णवाससा ॥

वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय

नमो रुद्राय नमः ।

इत्याद्युक्तक्रमेणैव जुहुयात्पश्चिमे नरः ॥

सद्येन पश्चिमे होमः सर्वद्रव्यैर्यथाक्रमम् ।

सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः ॥

भवे भवेनाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ।

स्वाहान्तं जुहुयादग्नौ मन्त्रेणानेन बुद्धिमान् ॥

आग्नेय्यां च विधानेन ऋचा रौद्रेण होमयेत् ।

जातवेदसे सुनवाम सोममित्यादिना ततः ।

नैर्ऋते पूर्ववद्द्रव्यैः सर्वैर्होमो विधीयते ॥

मन्त्रेणानेन दिव्येन सर्वसिद्धिकरेण च ।

निमि निशि दिश स्वाहा खड्ग राक्षसभेदन ॥

रुधिराज्यार्द्र नैर्ऋत्यै स्वाहा नमः स्वधा नमः ।

यथेष्टं विधिना द्रव्यैर्मन्त्रेणानेन होमयेत् ॥

यम्यां हि विविधैर्द्रव्यैरीशानेन द्विजोत्तमाः ।

ईशान्यामथ पूर्वोक्तैर्द्रव्यैर्होममथाचरेत् ॥

ईशानाय कद्रुद्राय प्रचेतसे त्र्यम्बकाय ।

शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥

[ उत्तरभाग श्रीलिङ्गमहापुराण | सौ आठ आहुति देकर पूर्वाभिमुख राजाका अधिवासन ॥ २४१ करना चाहिये । तदनन्तर रुद्रके लिये पुण्याहवाचन तथा स्वस्तिवाचन करके भस्म तथा मृणालसहित स्वर्णनिर्मित कंकण राजाके दाहिने हाथमें बाँधना चाहिये । इसके बाद २४२ ' त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुक-मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ ' – इस मन्त्रसे राजाका २४३ अभिषेक करना चाहिये और इसके बाद हवन करना चाहिये ॥ २४० - २४३ ॥ २४४ क्रमानुसार लाजा आदि होमद्रव्योंसे सर्वद्रव्याभिषेक करना चाहिये । प्राक् आदिके क्रमसे पंचब्रह्म मन्त्रोंके द्वारा सभी द्रव्योंसे हवन करना बताया गया है । २४५ । ' तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् ' – इस तत्पुरुषमन्त्र के अन्तमें स्वाहा जोड़कर २४६ द्विजको पूर्व दिशाके कुण्डमें हवन करना चाहिये । कृष्णवस्त्रधारी आचार्यको अघोरमन्त्रसे दक्षिण दिशामें हवन करना चाहिये । इसी प्रकार मनुष्यको चाहिये कि ' वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय २४७नमः ' – इस मन्त्रसे उक्त क्रमके अनुसार पश्चिम कुण्डमें हवन करे । यथाक्रम सद्योजात मन्त्रसे समस्त २४८ द्रव्योंसे उसके पार्श्ववर्ती उत्तर दिशामें होम किया जाना चाहिये; ' सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः । २४ ९ भवे भवेनाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः स्वाहा ' – इस मन्त्रके द्वारा बुद्धिमान्‌को अग्निमें आहुति डालनी चाहिये ॥ २४४–२४९ ॥ तदनन्तर ' यो रुद्रो यो अग्नौ ० ' - इस मन्त्र २५० साथ ' जातवेदसे सुनवाम सोमम् ० ' इत्यादि मन्त्रके द्वारा विधानपूर्वक अग्निकोणके कुण्डमें हवन करे । २५१ इसके बाद ' निमि निशि दिश स्वाहा खड्ग राक्षस-भेदन रुधिराज्यार्द्र नैर्ऋत्यै स्वाहा नमः स्वधा नमः ' -२५२ इस सर्वसिद्धिकारक दिव्य मन्त्रके द्वारा नैर्ऋत्यकोणमें पूर्वकी भाँति सभी द्रव्योंसे होम किया जाता है । हे द्विजश्रेष्ठो! वायव्यकोणके कुण्डमें ईशानमन्त्रद्वारा विविध २५३ द्रव्योंसे हवन करे, हवनका मन्त्र है - ' ईशानाय कद्रुद्राय प्रचेतसे त्र्यम्बकाय शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् । ' २५४ | इसी प्रकार ईशानकोणके कुण्डमें भी ईशानमन्त्रके ही

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अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले ५६ ५६ ५६ ५६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६

प्रधानं पूर्ववद्द्रव्यैरीशानेन द्विजोत्तमाः ।

प्रतिद्रव्यं सहस्रेण जुहुयान्नृपसन्निधौ ॥ २५५

स्वयं वा जुहुयादग्नौ भूपतिः शिववत्सलः । ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥ २५६

प्रायश्चित्तमघोरेण शेषं सामान्यमाचरेत् ।

कृताधिवासं राजानं शङ्खभेर्यादिनिस्वनैः ॥ २५७

जयशब्दरवैर्दिव्यैर्वेदघोषैः सुशोभनैः ।

सेचयेत्कूर्चतोयेन प्रोक्षयेद्वा नृपोत्तमम् ॥ २५८

रुद्राध्यायेन विधिना रुद्रभस्माङ्गधारिणम् ।

शङ्खचामरभेर्याद्यं छत्रं चन्द्रसमप्रभम् ॥ २५ ९

शिबिकां वैजयन्तीं च साधयेन्नृपतेः शुभाम् ।

राज्याभिषेकयुक्ताय क्षत्रियायेश्वराय वा ॥ २६०

नृपचिह्नानि नान्येषां क्षत्रियाणां विधीयते ।

प्रमाणं चैव सर्वेषां द्वादशाङ्गुलमुच्यते ॥ २६१

पलाशोदुम्बराश्वत्थवटाः पूर्वादितः क्रमात् ।

तोरणाद्यानि वै तत्र पट्टमात्रेण पट्टिकाः ॥ २६२

अष्टमाङ्गुलसंयुक्तदर्भमालासमावृतम् दिग्ध्वजाष्टकसंयुक्तं द्वारकुम्भैः सुशोभनम् ॥ २६३

हेमतोरणकुम्भैश्च भूषितं स्नापयेन्नृपम् ।

सर्वोपरि समासीनं शिवकुम्भेन सेचयेत् ॥ २६४

तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि ।

तन्नः शिवः प्रचोदयात् ॥ २६५

मन्त्रेणानेन विधिना वर्धन्या गौरिगीतया ।

रुद्राध्यायेन वा सर्वमघोरायाथ वा पुनः ॥ २६६

दिव्यैराभरणैः शुक्लैर्मुकुटाद्यैः सुकल्पितैः ।

क्षौमवस्त्रैश्च राजानं तोषयेन्नियतं शनैः ॥ २६७

विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०५ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ । द्वारा पूर्वकथित द्रव्योंसे हवन करना चाहिये । हे द्विजश्रेष्ठो! प्रधान कुण्डमें भी ईशानमन्त्रके द्वारा पूर्ववत् सभी द्रव्योंसे हवन करना चाहिये । [ आचार्यको ] प्रत्येक कुण्डमें एक - एक हजार आहुति राजाकी सन्निधिमें प्रदान करनी चाहिये; अथवा ' ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम् ' – इस मन्त्रसे शिवभक्तिपरायण राजा अग्निमें स्वयं आहुति प्रदान करे ॥ २५०–२५६ ॥ प्रायश्चित्त अघोरमन्त्रसे करना चाहिये तथा अवशिष्ट कर्म अन्य यागके समान करना चाहिये । शंख - भेरी आदिकी ध्वनि, जयकारकी ध्वनि तथा मंगलमय दिव्य वेद - ध्वनिके बीच रुद्राध्यायका पाठ करके अधिवासित राजाका कूर्च - जलसे अभिषेक करना चाहिये अथवा रुद्राक्ष एवं भस्म धारण किये हुए नृपश्रेष्ठका प्रोक्षण करना चाहिये । तत्पश्चात् आचार्यको चाहिये कि राजाके लिये शंख, चामर, भेरी, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् छत्र, पालकी, शुभ ध्वजा आदि साधन प्रस्तुत करे । राज्याभिषेकके योग्य क्षत्रियके लिये अथवा देवताके लिये ही ये सब राजचिह्न हैं; अन्य क्षत्रियोंके लिये अभिषेकका विधान नहीं है । पूर्वादि क्रमसे [ चारों दिशाओं में ] पलाश, गूलर, पीपल और बरगदकी शाखाएँ बाँधनी चाहिये और [ अभिषेक - मण्डपमें ] तोरण आदि तथा रेशमके वस्त्रकी पट्टिका लगा देनी चाहिये । इसमें पलाश आदि सभीकी शाखाओंका प्रमाण बारह अंगुल बताया गया है । अभिषेक - मण्डपको आठ - आठ अंगुल प्रमाणवाले दर्भोंकी मालासे समावृत, आठों दिशाओंमें ध्वजासे अलंकृत, द्वारकुम्भोंसे सुशोभित तथा सुवर्णके तोरणमय कलशोंसे विभूषित करके राजाको स्नान कराना चाहिये । ' तन्महेशाय विद्महे | वाग्विशुद्धाय धीमहि । तन्नः शिवः प्रचोदयात् ॥ ' -इस मन्त्रके द्वारा शिवकुम्भके जलसे, गौरीगायत्री मन्त्रके द्वारा वर्धनीके जलसे और रुद्राध्याय अथवा अघोरमन्त्रके द्वारा सभी कुम्भोंके जलसे सर्वोच्च आसनपर विराजमान

राजाका अभिषेक करना चाहिये । २५७ -२६६ ॥

तदनन्तर उत्तम प्रकारसे निर्मित किये गये उज्ज्वल

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७०६ 95 अष्टषष्टिपलेनैव हेम्ना कृत्वा सुदर्शनम् । नवरत्नैरलङ्कृत्य दद्याद्वै दक्षिणां गुरोः

दशधेनु सवस्त्रं च दद्यात्क्षेत्रं सुशोभनम् ।

शतद्रोणतिलं चैव शतद्रोणांश्च तण्डुलान् ॥

शयनं वाहनं शय्यां सोपधानां प्रदापयेत् ।

योगिनां चैव सर्वेषां त्रिंशत्पलमुदाहृतम् ॥

अशेषांश्च तदर्धेन शिवभक्तांस्तदर्धतः ।

महापूजां ततः कुर्यान्महादेवस्य वै नृपः ॥

एवं समासतः प्रोक्तं जयसेचनमुत्तमम् ।

एवं पुराभिषिक्तस्तु शक्रः शक्रत्वमागतः ॥

ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो विष्णुर्विष्णुत्वमागतः ।

अम्बिका चाम्बिकात्वं च सौभाग्यमतुलं तथा ॥

सावित्री च तथा लक्ष्मीर्देवी कात्यायनी तथा ।

नन्दिनाथ पुरा मृत्यू रुद्राध्यायेन वै जितः ॥

अभिषिक्तोऽसुरः पूर्वं तारकाख्यो महाबलः ।

विद्युन्माली हिरण्याक्षो विष्णुना वै विनिर्जितः ॥

नृसिंहेन पुरा दैत्यो हिरण्यकशिपुर्हतः ।

स्कन्देन तारकाद्याश्च कौशिक्या च पुराम्बया ॥

सुन्दोपसुन्दतनयौ जितौ दैत्येन्द्रपूजितौ ।

वसुदेवसुदेवौ तु निहतौ कृतकृत्यया ॥

स्नानयोगेन विधिना ब्रह्मणा निर्मितेन तु ।

दैवासुरे दितिसुता जिता देवैरनिन्दिताः ॥

स्नाप्यैव सर्वभूपैश्च तथान्यैरपि भूसुरैः ।

प्राप्ताश्च सिद्धयो दिव्या नात्र कार्या विचारणा ॥

अहोऽभिषेकमाहात्म्यमहो शुद्धसुभाषितम् ।

येनैवमभिषिक्तेन सिद्धैर्मृत्युर्जितस्त्विति ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 96 9 | मुकुट आदि दिव्य आभूषणों तथा रेशमी वस्त्रोंसे राजाको ॥ २६८ विभूषित करना चाहिये । राजाको चाहिये कि [ इस अवसरपर ] अड़सठ पल प्रमाणका एक सुदर्शन चक्र बनवाकर उसे नौ रत्नोंसे जटित कराकर गुरुको दक्षिणा २६ ९ प्रदान करे; साथ ही वस्त्रसहित दस गायें तथा उत्तम भूमि प्रदान करे । सौ द्रोण तिल, सौ द्रोण चावल, वाहन, विस्तर तथा तकियासहित शय्या भी [ गुरुको ] प्रदान करना २७० चाहिये । योगियोंके लिये सुवर्णके तीस पलका दान बताया गया है और अन्य सामग्रियाँ आधी देनी चाहिये तथा शिवभक्तोंको उससे भी आधी प्रदान करनी २७१ चाहिये । तदनन्तर राजाको महादेवकी महापूजा करनी चाहिये ॥ २६७ - २७१ ॥ २७२ इस प्रकार मैंने उत्तम जयाभिषेकका वर्णन संक्षेपमें कर दिया । पूर्वकालमें इसी प्रकारसे अभिषिक्त होकर इन्द्रने इन्द्रत्व प्राप्त किया था । इसी प्रकार ब्रह्माको २७३ ब्रह्मत्व, विष्णुको विष्णुत्व तथा अम्बिकाको अम्बिकात्व प्राप्त हुआ था । सावित्री, भगवती लक्ष्मी तथा कात्यायनीने भी [ इसी अभिषेकके प्रभावसे ] अतुल सौभाग्य प्राप्त २७४ । किया था । पूर्व कालमें रुद्राध्यायसे अभिषिक्त होकर नन्दीने मृत्युको भी जीत लिया था । इसी अभिषेकके २७५ प्रभावसे महाबली असुर तारक तथा विद्युन्माली देवताओंसे अजेय हो गये थे और भगवान् विष्णुने हिरण्याक्षको पराजित किया था । इसी प्रकार इसी स्नानयोगसे २७६ | प्राचीनकालमें नृसिंहने दैत्य हिरण्यकशिपुका वध किया था, कार्तिकेयने तारक आदिका संहार किया था, अम्बा कौशिकीने बड़े - बड़े दैत्योंके द्वारा पूजित सुन्द - उपसुन्दके २७७ | पुत्रोंको जीत लिया था और कृतकृत्याने वसुदेव तथा सुदेवका वध किया था । विधिपूर्वक ब्रह्माके द्वारा निर्मित इसी स्नानयोग ( जयाभिषेक ) - से देवासुर-२७८ संग्राममें देवताओंने प्रतापी दितिपुत्रोंको जीता था । सभी राजा तथा अन्य ब्राह्मणोंने भी अभिषिक्त होकर अलौकिक २७ ९ सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २७२-२७९ ॥ इस अभिषेकका ऐसा माहात्म्य! यह कैसा पवित्र २८० | सुभाषित है कि जिसके द्वारा अभिषिक्त होनेके कारण 1985 Lingamahapuran_Section_24_1_Back

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अध्याय २८ ] षोडश महादानोंमें

कल्पकोटिशतेनापि यत्पापं समुपार्जितम् ।

स्नात्वैवं मुच्यते राजा सर्वपापैर्न संशयः ॥

व्याधितो मुच्यते राजा क्षयकुष्ठादिभिः पुनः ।

स नित्यं विजयी भूत्वा पुत्रपौत्रादिभिर्युतः ॥

जनानुरागसम्पन्नो देवराज इवापरः ।

मोदते पापहीनश्च प्रियया धर्मनिष्ठया ॥

उद्देशमात्रं कथितं फलं परमशोभनम् ।

नृपाणामुपकाराय स्वायम्भुव मनो मया ॥

तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७०७ सिद्धिको प्राप्त हुए लोगोंने मृत्युतकको जीत लिया । इस २८१ विधिसे स्नान करके कोई राजा करोड़ों कल्पोंमें भी जो पाप संचित किया गया हो, उन सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । क्षय कुष्ठ आदि २८२ व्याधियोंसे राजा छुटकारा पा जाता है, वह विजयी होकर सदा पुत्र - पौत्र आदिसे सम्पन्न रहता है, प्रजाजनोंके अनुरागसे युक्त रहता है, दूसरे इन्द्रकी भाँति सुशोभित होता है तथा पापहीन रहते हुए अपनी धर्मनिष्ठ पत्नीके २८३ साथ आनन्द प्राप्त करता है । हे स्वायम्भुव मनु! राजाओंके उपकारके लिये ही मैंने संक्षेपमें [ जयाभिषेकका ] वर्णन किया है, इसका फल अत्यन्त २८४ | कल्याणकारक है ॥२८०–२८४ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अभिषेकविधिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' अभिषेकविधि ' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय स्वायम्भुव मनुके प्रति सनत्कुमारप्रोक्त षोडश * सूत उवाच

स्नात्वा देवं नमस्कृत्य देवदेवमुमापतिम् ।

दिव्येन चक्षुषा रुद्रं नीललोहितमीश्वरम् ॥ १

दृष्ट्वा तुष्टाव वरदं रुद्राध्यायेन शङ्करम् ।

देवोऽपि तुष्ट्या निर्वाणं राज्यान्ते कर्मणैव तु ॥ २

तवास्तीति सकृच्चोक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ।

स्वायम्भुवो मनुर्देवं नमस्कृत्य वृषध्वजम् ॥३

आरुरोह महामेरुं महावृषमिवेश्वरः ।

तत्र देवं हिरण्याभं योगैश्वर्यसमन्वितम् ॥ ४ ।

महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन सूतजी बोले- तदनन्तर इस विधिसे स्नान करके देवदेव उमापति नीललोहित भगवान् रुद्रको नमस्कारकर तथा दिव्य दृष्टिसे उन्हें देखकर वे स्वायम्भुव मनु रुद्राध्यायके द्वारा वरदायक शंकरकी स्तुति करने लगे । भगवान् शिव भी उनकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर ' [ दीर्घकालतक ] राज्य करके अन्तमें सत्कर्मसे तुम्हारा मोक्ष होगा ' - ऐसा एक बार कहकर वहींपर अन्तर्धान हो गये॥१-२१ / २ ॥ वृषभध्वज भगवान् शिवको नमस्कार करके स्वायम्भुव मनु मेरुशृंगपर उसी प्रकार आरूढ़ हुए, जैसे सर्ग - प्रतिसर्गरूप पंचलक्षणात्मक पुराणोंके वर्ण्य विषयमें दान - विधानका विस्तारसे निरूपण हुआ है, जिसका संग्रह परवर्ती निबन्धग्रन्थों— कृत्यकल्पतरु ( दानखण्ड ), हेमाद्रि ( चतुर्वर्गचिन्तामणि ), दानमयूख तथा दानसागर आदिमें विस्तारसे हुआ है । श्रीलिङ्गमहापुराणके उत्तरभागके अट्ठाईसवें अध्यायसे चौवालीसवें अध्यायतक सत्रह अध्यायोंमें षोडश महादानोंका वर्णन संक्षेपमें आया है । इसकी पूर्ण जानकारीके लिये उपर्युक्त निबन्धग्रन्थ, मत्स्य, अग्नि आदि पुराणों तथा दानपद्धतियोंका अवलोकन करना चाहिये । पुराणोंमें षोडश महादानोंके नामोंमें अन्तर भी प्राप्त होता है । श्रीलिङ्गमहापुराणमें षोडश महादानोंके अन्तर्गत जिन दानोंका परिगणन हुआ है, उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं — १ - तुलापुरुष, २ - हिरण्यगर्भ, ३- तिलपर्वत तथा सूक्ष्म तिलपर्वत, ४- सुवर्णमेदिनी, ५ - कल्पपादप, ६ - गणेशेश, ७ - सुवर्णधेनु, ८ - लक्ष्मी, ९ - तिलधेनु, १०- गोसहस्र, ११ - हिरण्याश्व, १२ - कन्या, १३ - हिरण्यवृष, १४- सुवर्णगज, १५ - लोकपालाष्टक तथा १६ - ब्रह्मा - विष्णु - महेश- मूर्तिदान । 1985 Lingamahapuran_Section_24_2_Front

पृष्ठ 710

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७०८

सनत्कुमारं वरदमपश्यद्ब्रह्मणः सुतम् ।

नमश्चकार वरदं ब्रह्मण्यं ब्रह्मरूपिणम् ॥

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव च महाद्युतिः ।

सोऽपि दृष्ट्वा मनुं देवो हृष्टरोमाभवन्मुनिः ॥

सनत्कुमारः प्राहेदं घृणया च घृणानिधे । सनत्कुमार उवाच दृष्ट्वा सर्वेश्वराच्छान्ताच्छङ्करान्नीललोहितात् ॥

लब्ध्वाभिषेकं सम्प्राप्तो विवक्षुर्वद यद्यपि ।

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥

विज्ञापयामास कथं कर्मणा निर्वृतिर्विभो ।

वक्तुमर्हसि चास्माकं कर्मणा केवलेन च ॥

ज्ञानेन निर्वृतिः सिद्धा विभो मिश्रेण वा क्वचित् ।

अथ तस्य वचः श्रुत्वा श्रुतिसारविदां निधिः ॥

सनत्कुमारो भगवान् कर्मणा निर्वृतिं क्रमात् ।

मिश्रेण च क्रमादेव क्षणाज्ज्ञानेन वै मुने ॥

पुरामानेन चोष्ट्रत्वमगमं नन्दिनः प्रभोः ।

शापात्पुनः प्रसादाद्धि शिवमभ्यर्च्य शङ्करम् ॥

प्रसादान्नन्दिनस्तस्य कर्मणैव सुतो ह्यहम् ।

श्रुत्वोत्तमां गतिं दिव्यामवस्थां प्राप्तवानहम् ॥

शिवार्चनप्रकारेण शिवधर्मेण नान्यथा । श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग सदाशिव महावृषभपर आरूढ़ होते हैं । वहाँपर उन्होंने ५ स्वर्णकी आभावाले, योगके प्रतापसे युक्त तथा वर प्रदान करनेवाले ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारको देखा । [ उन्हें देखकर ] महातेजस्वी मनुने उन वरदायक, ब्रह्मज्ञानी तथा ब्रह्मरूप ६ [ सनत्कुमार ] - को नमस्कार किया और दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की । मनुको देखकर मुनि सनत्कुमार भी हर्षके कारण पुलकित हो उठे और ' हे कृपानिधे! ' इस प्रकार सम्बोधित करके दयापूर्वक उनसे कहने लगे॥३–६१ / २ ॥ ७ सनत्कुमार बोले- शान्तस्वभाववाले नीललोहित सर्वेश्वर शिवका दर्शन करके उनसे जयाभिषेक प्राप्त करके आप यहाँ आये हैं । यदि आप कुछ और पूछने के ८ इच्छुक हैं, तो पूछिये । तब उनका वचन सुनकर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करके मनुने कहा - हे विभो! कर्मके द्वारा मुक्ति कैसे हो सकती है? हे विभो! आप हम लोगोंको कृपा करके यह बतायें कि केवल कर्मसे ९ अथवा ज्ञानसे अथवा ज्ञान - कर्मके मिश्रित प्रभावसे किस प्रकार मुक्ति मिलती है? ॥७ – ९ ॥ उनका वचन सुनकर वेदरहस्योंको जाननेवालोंमें १० | श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमारने कहा — हे मुने! कर्मके द्वारा क्रमसे मुक्ति हो जाती है, कर्मयुक्त ज्ञानसे भी क्रमशः मुक्ति होती है, किंतु शुद्ध ज्ञानसे क्षणमात्रमें मोक्ष हो ११ जाता है॥१०-११ ॥ पूर्वकालमें प्रभु नन्दीका अपमान करनेके कारण उनके शापसे मैं ऊँटकी योनिको प्राप्त हो गया था; १२ पुनः उन्हींकी कृपासे कल्याणकारी भगवान् शिवका अर्चन करके उस शिवार्चनरूप कर्मके कारण ही मैं ब्रह्माजीका पुत्र हुआ और उन्हीं नन्दीके अनुग्रहसे १३ उत्तम मुक्तिमार्गका श्रवण करके शिवधर्मरूप शिवार्चनकी | रीति से दिव्य अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥१२-१३१ / २ ॥ राज्ञां षोडशदानानि नन्दिना कथितानि च ॥१४ महात्मा नन्दिकेश्वरने राजाओंको [ दानरूप ] कर्मके द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्तिके लिये तुलारोहण धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं कर्मणैव महात्मना । आदि सोलह दानोंका वर्णन किया है; उन्हें आप

तुलादिरोहणाद्यानि शृणु तानि यथातथम् ॥ १५ । यथाविधि सुनिये ॥१४- १५ ॥