श्रीगणेशाय नमः।

लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 711–720

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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अध्याय २८ ] षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी

ग्रहणादिषु कालेषु शुभदेशेषु शोभनम् ।

विंशद्धस्तप्रमाणेन मण्डपं कूटमेव च ॥ १६

यथाष्टादशहस्तेन कलाहस्तेन वा पुनः ।

कृत्वा वेदिं तथा मध्ये नवहस्तप्रमाणतः ॥१७

अष्टहस्तेन वा कार्या सप्तहस्तेन वा पुनः ।

द्विहस्ता सार्धहस्ता वा वेदिका चातिशोभना ॥ १८

द्वादशस्तम्भसंयुक्ता साधुरम्या भ्रमन्तिका ।

परितो नव कुण्डानि चतुरस्त्राणि कारयेत् ॥ १ ९

ऐन्द्रिकेशानयोर्मध्ये प्रधानं ब्रह्मणः सुत ।

अथवा चतुरस्त्रं च योन्याकारमतः परम् ॥ २०

स्त्रीणां कुण्डानि विप्रेन्द्रा योन्याकाराणि कारयेत् ।

अर्धचन्द्रं त्रिकोणं च वर्तुलं कुण्डमेव च ॥ २१

षडस्त्रं सर्वतो वापि त्रिकोणं पद्मसन्निभम् ।

अष्टास्त्रं सर्वमाने तु स्थण्डिलं केवलं तु वा ॥ २२

चतुर्द्वारसमोपेतं चतुस्तोरणभूषितम् ।

दिग्गजाष्टकसंयुक्तं दर्भमालासमावृतम् ॥ २३

अष्टमङ्गलसंयुक्तं वितानोपरिशोभितम् ।

तुलास्तम्भद्रुमाश्चात्र बिल्वादीनि विशेषतः ॥ २४

बिल्वाश्वत्थपलाशाद्याः केवलं खादिरं तु वा ।

येन स्तम्भः कृतः पूर्वं तेन सर्वं तु कारयेत् ॥ २५

अथवा मिश्रमार्गेण वेणुना वा प्रकल्पयेत् ।

अष्टहस्तप्रमाणं तु हस्तद्वयसमायुतम् ॥ २६

तुलास्तम्भस्य विष्कम्भोऽनाहतस्त्रिगुणो मतः ।

द्व्यङ्गुलेन विहीनं तु सुवृत्तं निर्व्रणं तथा ॥ २७

* अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये ॥

विधिका वर्णन ७० ९ 36 36 35 36 96 96 95 96 95 36 36 36 96 96 95 96 36 36 36 ग्रहण आदि कालोंमें तीर्थ आदि उत्तम स्थानोंमें * बीस हाथ, अठारह हाथ अथवा सोलह हाथ- प्रमाणका सुन्दर कूटयुक्त मण्डप बनाकर उसके मध्यमें नौ हाथ, आठ हाथ, सात हाथ, दो हाथ अथवा डेढ़ हाथ विस्तारवाली एक अत्यन्त सुन्दर वेदिकाका निर्माण कराना चाहिये । उसके चारों ओर बारह स्तम्भ हों और एक सुन्दर तथा रम्य तुला स्थापित कर देनी चाहिये । उसके चारों ओर नौ चौकोर कुण्डोंका निर्माण कराना चाहिये । हे ब्रह्मपुत्र! पूर्व तथा ईशानकोणके मध्य प्रधान कुण्ड बनाना चाहिये, जो चौकोर या योनिके आकारका हो । हे विप्रेन्द्रो! स्त्रियोंके लिये कुण्ड योनिके आकारवाले ही बनाने चाहिये । कुण्ड अर्धचन्द्र, त्रिकोण, वर्तुल, षडस्त्र, त्रिकोण, पद्माकार तथा अष्टास्र बनाना चाहिये अथवा कुण्डोंके स्थानपर स्थण्डिल ही बना लेना चाहिये ॥ १६–२२ ॥ चार द्वारोंसे समन्वित, चार तोरणोंसे सुशोभित, आठों दिशाओंमें अष्ट दिग्गजोंसे समन्वित, दर्भमालासे युक्त, आठ मंगलोंसे संयुक्त और ऊपर वितान ( चँदोवा ) -से सुशोभित मण्डपका निर्माण कराना चाहिये । तुलास्तम्भ विशेषरूपसे बिल्व वृक्षोंके होने चाहिये । बेल, पीपल, पलाश अथवा खदिर ( खैर ) - की लकड़ीके स्तम्भ बनाने चाहिये । जिस वृक्षकी लकड़ीका प्रथम स्तम्भ हो, उसीसे अन्य भी निर्मित करने चाहिये अथवा अनेक काष्ठोंके मिश्रणसे अथवा केवल बाँससे ही स्तम्भ आदि बना लेने चाहिये । आठ हाथ - प्रमाणका स्तम्भ होना चाहिये; उसका दो हाथ भाग भूमिमें गाड़ देना चाहिये । तुलास्तम्भका | ऊपरी अनाच्छादित भाग आच्छादित भागका तीन गुना

युगादिषूपरागेषु तथा मन्वन्तरादिषु । संक्रान्तौ वैधृतिदिने चतुर्दश्यष्टमीषु च ॥

सितपञ्चदशीपर्वद्वादशीष्वष्टकासु च । यज्ञोत्सवविवाहेषु दुःस्वप्नाद्भुतदर्शने ॥

द्रव्यब्राह्मणलाभे वा श्रद्धा वा यत्र जायते । तीर्थे वायतने गोष्ठे कूपारामसरित्सु वा ॥ गृहे वाथ वने वापि तडागे रुचिरे तथा । महादानानि देयानि संसार भयभीरुणा ॥ ( मत्स्यपुराण २७४ । १ ९ – २३ ) संसारभयसे भीत मनुष्यको अयन - परिवर्तनके समय, विषुवयोगमें, पुण्यदिनों, व्यतीपात, दिनक्षय तथा युगादि तिथियोंमें, सूर्य-चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर, मन्वन्तरके प्रारम्भमें, संक्रान्तिके दिन, वैधृतियोगमें, चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णिमा, पर्वके दिन, द्वादशी तथा अष्टका ( हेमन्त - शिशिर ऋतुओंके कृष्णपक्षकी चारों अष्टमी तिथियाँ अष्टका कही गयी हैं ) तिथियोंमें, यज्ञ - उत्सव तथा विवाहके अवसरपर, दुःस्वप्नके देखने या किसी अद्भुत उत्पातादिके होनेपर यथेष्ट द्रव्य या ब्राह्मणके मिल जानेपर या जब जहाँ श्रद्धा उत्पन्न हो जाय, किसी तीर्थ, मन्दिर या गोशालामें, कूप, बगीचा या नदीके तटपर, अपने घरपर या पवित्र वनमें अथवा पवित्र तालाबके किनारे इन महादानोंको देना चाहिये ।

पृष्ठ 712

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७१० उभयोरन्तरं चैव षड्डूस्तं नृपते स्मृतम् द्वयोश्चतुर्हस्तकृतमन्तरं स्तम्भयोरपि षड्डूस्तमन्तरं ज्ञेयं स्तम्भयोरुपरि स्थितम् वितस्तिमात्रं विस्तारो विष्कम्भस्तावदुत्तरम् स्तम्भयोस्तु प्रमाणेन उत्तरद्वारसम्मितम् । षट्त्रिंशन्मात्रसंयुक्तं व्यायामं तु तुलात्मकम् विष्कम्भमष्टमात्रं तु यवपञ्चकसंयुतम् षट्त्रिंशन्मात्रनाभं स्यान्निर्माणाद्वर्तुलं शुभम् अग्रे मूले च मध्ये च हेमपट्टेन बन्धयेत् पट्टमध्ये प्रकर्तव्यमवलम्बनकत्रयम्

ताम्रेण च प्रकर्तव्यमवलम्बनकत्रयम् ।

आरेण वा प्रकर्तव्यमायसं नैव कारयेत् ॥

मध्ये चोर्ध्वमुखं कार्यमवलम्बः सुशोभनः । रश्मिभिस्तरणाग्रे वा बन्धयेच्च विधानतः

जिह्वामेकां तुलामध्ये तोरणं तु विधीयते ।

उत्तरस्य च मध्ये च शङ्कं दृढमनुत्तमम् ॥

वितानेनोपरि च्छाद्य दृढं सम्यक्प्रयोजयेत् ।

शङ्कोः सुषिरसम्पन्नं वलयं कारयेन्मुने ॥

तुलामध्ये वितानेन तुलया लम्बके तथा ।

वलयेन प्रयोक्तव्यं कुण्डलं वावलम्बनम् ॥

सुदृढं च तुलामध्ये नवमाङ्गुलमानतः ।

पट्टस्यैव तु विस्तारं पञ्चमात्रप्रमाणतः ॥

अपरौ सुदृढ fuust शुभद्रव्येण कारयेत् ।

शिक्याधस्तात्प्रकर्तव्यौ पञ्चप्रादेशविस्तरौ ।

सहस्त्रेण कर्तव्यौ पलानां धारकावुभौ ॥

शताष्टकेन वा कुर्यात्पलैः षट्शतमेव वा ।

चतुस्तालं च कर्तव्यो विस्तारो मध्यमस्तथा ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । बताया गया है । तुलाका दूसरा स्तम्भ पूर्ण गोलाकार तथा ॥ २८ । व्रणरहित होना चाहिये । हे राजन्! नीचेसे दोनों स्तम्भोंमें परस्पर दो अंगुल कम छ: हाथका अन्तर कहा गया है; । दोनों स्तम्भोंके बीच चार हाथका भी अन्तर रखा जा ॥ २ ९ सकता है । दोनों स्तम्भोंके ऊपरी भागोंके बीच छ: हाथका अन्तर जानना चाहिये । दोनों स्तम्भोंका विस्तार एक वितस्ति ( बारह अंगुल ) होना चाहिये और उतने ही परिमाणका ॥ ३० दूसरा विष्कम्भ भी होना चाहिये ॥ २३–२९ ॥ ऊपरके भागमें तुलाकी छड़ दोनों स्तम्भोंकी लम्बाईके । अनुकूल हो और तुलाका सन्तुलन करनेवाले छड़की ॥ ३१ लम्बाई छत्तीस अंगुल होनी चाहिये । विष्कम्भ आठ अंगुल । और पाँच यव हो । नाभि छत्तीस अंगुल लम्बी होनी चाहिये ॥ ३२ और इसे गोल तथा सुन्दर बनाना चाहिये । सिरेपर, मध्यमें और नीचेके भागमें सोनेका पट्ट लगाना चाहिये । मध्यके पट्ट तीन अवलम्बक लगाने चाहिये । इन अवलम्बकोंको ३३ ताम्रका अथवा पीतलका बनाना चाहिये; लोहेका कदापि नहीं बनाना चाहिये ॥ ३०–३३ ॥ ॥ ३४ पट्टको बीचमें लगानेका अवलम्ब सुन्दर हो तथा उसका मुख ऊपरकी ओर होना चाहिये । तोरणके ऊपरी सिरेपर इसे डोरियोंसे विधिवत् बाँध देना चाहिये । तुलाके ३५ मध्यमें तोरण बनाया जाता है, जो जिह्वाके आकारका होता है । उत्तर तथा दक्षिणके मध्यमें एक दृढ़ एवं सुन्दर शंकु होना चाहिये; वितानके सिरेपर दृढ़तापूर्वक इसे ३६ भलीभाँति लगा देना चाहिये । हे मुने! शंकुके वलयको छिद्रयुक्त बनाना चाहिये । तुलामध्यमें आलम्बनार्थ वितान ३७ साथ वलय अथवा कुण्डलाकृतिविशेषका प्रयोग करना चाहिये । तुलाके पट्टके बीचसे नौ अंगुल मानमें इसे दृढ़तापूर्वक जड़ देना चाहिये; बँधनेवाले पट्टका विस्तार ३८ पाँच वितस्ति होना चाहिये ॥ ३४–३८ ॥ शुभ द्रव्यसे दो अन्य सुदृढ़ गोलक बनवाने चाहिये । लटकनेवाली डोरीके नीचे पाँच प्रादेश ( अंगुष्ठ ३ ९ तथा तर्जनीके बीच की दूरी ) विस्तारवाले दो धार ( पलड़े ) बनवाने चाहिये; उन्हें एक हजार पल सुवर्णसे बनवाना चाहिये अथवा आठ सौ अथवा छः सौ पलोंसे ४० । बनवाना चाहिये । तुलाका मध्यम विस्तार चार ताल

पृष्ठ 713

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अध्याय २८ ] षोडश महादानों में

सार्धत्रितालविस्तारः कलशस्य विधीयते ।

बध्नीयात्पञ्चपात्रं तु त्रिमात्रं षट्कमुच्यते ॥

चतुर्द्वारसमोपेतं द्वारमङ्गुलमात्रकम् ।

कुण्डलैश्च समोपेतैः शुक्लशुद्धसमन्वितैः ॥

कुण्डले कुण्डले कार्यं शृङ्खलापरिमण्डलम् । तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७११ ( मध्यमासे अंगुष्ठके बीचकी दूरी ) प्रमाणवाला बनाना ४१ चाहिये । कलशका विस्तार साढ़े तीन तालका बनानेका विधान है । वहाँपर एक विस्तृत पात्र बाँधना चाहिये; | उसे तीन अथवा छः अवधृति प्रमाणवाला कहा जाता ४२ है । वह चार छिद्रोंसे युक्त हो तथा प्रत्येक छिद्र एक अंगुल प्रमाणका हो । वह छिद्र श्वेत तथा शुद्ध द्रव्योंसे शृङ्खलाधारवलयमवलम्बेन योजयेत् ॥ ४३ | युक्त कुण्डलोंसे समन्वित हो । प्रत्येक कुण्डलमें जंजीर प्रादेशं वा चतुर्मात्रं भूमेस्त्यक्त्वावलम्बयेत् घटौ पुरुषमात्रौ तु कर्तव्यौ शोभनावुभौ ॥ तौ वालुकाभिः सम्पूर्य शिवं तत्र विनिःक्षिपेत् द्विहस्तमात्रमवटे स्थापनीयौ प्रयत्नतः निःशेषं पूरयेद्विद्वान् वालुकाभिः समन्ततः येन निश्चलतां गच्छेत्तेन मार्गेण कारयेत् श्रूयतां परमं गुह्यं वेदिकोपरिमण्डलम् । अष्टमाङ्गुलसंयुक्तं मङ्गलाङ्कुरशोभितम् फलपुष्पसमाकीर्णं धूपदीपसमन्वितम् वेदिमध्ये प्रकर्तव्यं दर्पणोदरसन्निभम् आलिखेन्मण्डलं पूर्वं चतुर्द्वारसमन्वितम् शोभोपशोभासम्पन्नं कर्णिकाकेसरान्वितम् वर्णजातिसमोपेतं पञ्चवर्णं तु कारयेत् वज्रं प्रागन्तरे भागे आग्नेय्यां शक्तिमुज्वलाम् आलिखेद्दक्षिणे दण्डं नैर्ऋत्यां खड्गमालिखेत् पाशश्च वारुणे लेख्यो ध्वजं वै वायुगोचरे कौबेर्यां तु गदा लेख्या ऐशान्यां शूलमालिखेत् शूलस्य वामदेशेन चक्रं पद्मं तु दक्षिणे एवं लिखित्वा पश्चाच्च होमकर्म समाचरेत् प्रधानहोमं गायत्र्या स्वाहा शक्राय वह्नये यमाय राक्षसेशाय वरुणाय च वायवे कुबेरायेश्वरायाथ विष्णवे ब्रह्मणे पुनः बाँध देनी चाहिये । कुण्डलमें बँधी हुई जंजीरको । तुलादण्डके अवलम्ब ( वलय ) - से जोड़ देना चाहिये । ४४ भूमिसे प्रादेशमात्र अथवा चार अंगुल छोड़कर पलड़ोंको । लटकाना चाहिये ॥ ३ ९ -४३१ / २ ॥ ॥ ४५ पुरुषप्रमाण ( फैलानेपर दोनों हाथोंके बीचकी दूरी ) - वाले दो सुन्दर घट बनाने चाहिये और उन । । दोनोंको बालूसे भरकर उनमें शिवकी स्थापना करनी ॥ ४६ चाहिये । दो हाथ गहरे गड्ढेमें उन घटोंको प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिये और गड्ढोंके रिक्त भागको चारों ओरसे बालूसे इस प्रकार भर देना चाहिये कि वे स्थिर ॥ ४७ हो जायँ ॥ ४४ - ४६ ॥ । अब परम रहस्यकी बात सुनिये । वेदीके ऊपर आठ ॥ ४८ अंगुल प्रमाणवाला, मांगलिक अंकुरोंसे सुशोभित, फल-। पुष्पोंसे परिपूर्ण एवं धूप - दीपसे समन्वित परिमण्डल बनाना चाहिये । वेदीके मध्यमें दर्पणके उदरभागके समान ॥ ४ ९ मण्डल बनाना चाहिये । पहले चार द्वारोंसे युक्त, शोभा तथा । उपशोभासे सम्पन्न एवं कर्णिका - केसरसे समन्वित मण्डलकी ॥ ५० रचना करनी चाहिये, उसे नानाविध रंगोंसे युक्त अथवा पाँच रंगोंसे बनाना चाहिये ॥ ४७– १–४९ १ / २ ॥ । मण्डलके पूर्वदिशामें वज्र, अग्निकोणमें उज्ज्वल ॥ ५१ शक्ति, दक्षिणमें दण्ड, नैर्ऋत्यकोणमें खड्ग, पश्चिममें । पाश, वायव्यकोणमें ध्वज, उत्तरमें गदा और ईशानकोणमें ॥ ५२ शूल तथा शूलके वामभागमें चक्र एवं दक्षिण भागमें पद्मकी रचना करनी चाहिये । इस प्रकार आयुधोंकी रचना करके । बादमें होमकर्म करना चाहिये ॥ ५०–५२१ / २ 11 ॥ ५३ प्रधान होम गायत्रीमन्त्रसे करना चाहिये; इसके बाद । ॐ शक्राय स्वाहा, ॐ वह्नये स्वाहा, ॐ यमाय ॥ ५४ । स्वाहा, ॐ राक्षसेशाय स्वाहा, ॐ वरुणाय स्वाहा,

पृष्ठ 714

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ७१२

स्वाहान्तं प्रणवेनैव होतव्यं विधिपूर्वकम् ।

स्वशाखाग्निमुखेनैव जयादिप्रतिसंयुतम् ॥ ५५

स्विष्टान्तं सर्वकार्याणि कारयेद्विधिवत्तदा ।

सर्वहोमाग्रहोमे च समित्पालाशमुच्यते ।

एकविंशतिसंख्यातं मन्त्रेणानेन होमयेत् ॥ ५६

अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय चास्मान्प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा भूः स्वाहा भुव: स्वाहा स्वः स्वाहा । भूर्भुवः स्वस्तथैव च ।

समिद्धोमश्च चरुणा घृतस्य च यथाक्रमम् ।

शुक्लान्नपायसं चैव मुद्गान्नं चरवः स्मृताः ॥ ५७

सहस्रं वा तदर्धं वा शतमष्टोत्तरं तु वा ॥ ५८

अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् । अग्निर्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः । तमीमहे महागयम् । अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् । प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयः स्याम पतयो रयीणाम् ।

गायत्र्या च प्रधानस्य समिद्धोमस्तथैव च ।

चरुणा च तथाज्यस्य शक्रादीनां च होमयेत् ॥ ५ ९

वज्रादीनां च होतव्यं सहस्त्रार्धं ततः क्रमात् ।

ब्रह्म जज्ञेति मन्त्रेण ब्रह्मणे विष्णवे पुनः ॥ ६०

नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।

अयं विशेषः कथितो होममार्गः सुशोभनः ।

दूर्वया क्षीरयुक्तेन पञ्चविंशत्पृथक्पृथक् ॥ ६१

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ ६२ ।

ॐ वायवे स्वाहा, ॐ कुबेराय स्वाहा, ॐ ईश्वराय स्वाहा, ॐ विष्णवे स्वाहा तथा ॐ ब्रह्मणे स्वाहा— ' इन मन्त्रोंको बोलकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिये । | उस समय अपनी शाखामें उक्त अग्निविधानके अनुसार जयाहोमसे लेकर स्विष्टकृत् होमपर्यन्त सभी कार्य विधिवत् कराना चाहिये । सभी होमों तथा प्रधान होममें पलाश समिधा बतायी गयी है । इस मन्त्रसे इक्कीस आहुतियाँ देकर होम करना चाहिये - अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय चास्मान्प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा भूः स्वाहा भुव: स्वाहा स्वः स्वाहा भूर्भुवः स्वः स्वाहा । समिधाहोम चरु तथा घृतसे यथाक्रम करना चाहिये; श्वेत अन्नका पायस तथा कृशरान्न – ये चरु कहे गये हैं । एक हजार, उसका आधा ( पाँच सौ ) अथवा एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहिये ॥ ५३ - ५८ ॥ अग्न आयूषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥ ( यजु ० १ ९ । ३८ ) अग्निर्ऋषिः

पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः । तमीमहे महागयम् ॥

( यजु ० २६ । ९ ) अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् ॥ ( यजु ० ८।३८ ) प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयः स्याम । पतयो रयीणाम् ॥ ( कृष्णयजु ० १। ८ । १४ ) इन मन्त्रोंसे आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये । रुद्रगायत्रीमन्त्रसे समिधाओंके द्वारा प्रधान देवताके लिये हवन करना चाहिये; चरु तथा घृतसे इन्द्र आदि देवताओंके लिये हवन करना चाहिये । तत्पश्चात् क्रमसे वज्र आदिके निमित्त पाँच सौ आहुतियाँ देनी चाहिये । ब्रह्माके लिये ' ब्रह्म जज्ञानं ' * – इस मन्त्रसे और विष्णुके लिये ' नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ' - इस मन्त्रसे होम करना चाहिये; यह परम । सुन्दर मुख्य होमविधान कहा गया है । क्षीरयुक्त दूर्वाके द्वारा पृथक् - पृथक् पचीस आहुतियाँ ' त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय * ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः । स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः ॥ ( यजु ० १३।३ )

पृष्ठ 715

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अध्याय २८ ] षोडश महादानों में तुलापुरुषदानकी

दूर्वाहोमः प्रशस्तोऽयं वास्तुहोमश्च सर्वथा ।

प्रायश्चित्तमघोरेण सर्पिषा च शतं शतम् ॥ ६३

ब्रह्माणं दक्षिणे वामे विष्णुं विश्वगुरुं शिवम् ।

मध्ये देव्या समं ज्ञेयमिन्द्रादिगणसंवृतम् ॥ ६४

आदित्यं भास्करं भानुं रविं देवं दिवाकरम् ।

उषां प्रभां तथा प्रज्ञां सन्ध्यां सावित्रिमेव च ॥ ६५

पञ्चप्रकारविधिना खखोल्काय महात्मने ।

विष्टरां सुभगां चैव वर्धनीं च प्रदक्षिणाम् ॥ ६६

आप्यायनीं च सम्पूज्य देवीं पद्मासने रविम् ।

प्रभूतं वाथ कर्तव्यं विमलं दक्षिणे तथा ॥ ६७

सारं पश्चिमभागे च आराध्यं चोत्तरे यजेत् ।

मध्ये सुखं विजानीयात्केसरेषु यथाक्रमम् ॥ ६८

दीप्तां सूक्ष्मां जयां भद्रां विभूतिं विमलां क्रमात् ।

अमोघां विद्युतां चैव मध्यतः सर्वतोमुखीम् ॥६ ९

सोममङ्गारकं चैव बुधं गुरुमनुक्रमात् ।

भार्गवं च तथा मन्दं राहु केतुं तथैव च ॥ ७०

पूजयेद्धोमयेदेवं दापयेच्च विशेषतः ।

योगिनो भोजयेत्तत्र शिवतत्त्वैकपारगान् ॥ ७१

दिव्याध्ययनसम्पन्नान् कृत्वैवं विधिविस्तरम् ।

होमे प्रवर्तमाने च पूर्वदिक्स्थानमध्यमे ॥ ७२

आरोहयेद्विधानेन रुद्राध्यायेन वै नृपम् ।

धारयेत्तत्र भूपालं घटिकैकां विधानतः ॥ ७३

यजमानो जपेन्मन्त्रं रुद्रगायत्रिसंज्ञकम् ।

घटिकार्धं तदर्थं वा तत्रैवासनमारभेत् ॥७४

आलोक्य वारुणं धीमान् कूर्चहस्तः समाहितः ।

नृपश्च भूषणैर्युक्तः खड्गखेटकधारकः ॥ ७५

स्वस्तिरित्यादिभिश्चादावन्ते चैव विशेषतः ।

पुण्याहं ब्राह्मणैः कार्यं वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ७६

विधिका वर्णन ७१३ मामृतात् ॥ ' मन्त्रसे देनी चाहिये । ये दूर्वाहोम तथा वास्तु-होम सर्वथा प्रशस्त हैं । घृतके द्वारा अघोर मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ प्रदान करके प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ५ ९ -६३ ॥ [ देवतामण्डलके ] दाहिने भागमें ब्रह्मा, बायें भागमें विष्णु, मध्यमें देवी पार्वतीके साथ इन्द्र आदि गणोंसे आवृत विश्वगुरु शिवको जानना चाहिये । [ ग्रहमण्डलका निरूपण किया जा रहा है- ] आदित्य, भास्कर, भानु, रवि, भगवान् दिवाकर, उषा, प्रभा, प्रज्ञा, सन्ध्या तथा सावित्री - पंच प्रकार विधिसे ‘ महात्मने खखोल्काय नमः ' – ऐसा कहकर इनकी स्थापना - पूजा करनी चाहिये । विष्टरा, सुभगा, वर्धनी, प्रदक्षिणा तथा देवी आप्यायनीकी पूजा करके पद्मासनपर रविकी पूजा करनी चाहिये । प्रारम्भमें प्रभूतकी, दक्षिणमें विमलकी, पश्चिम भागमें सारकी, उत्तरमें आराध्यकी तथा मध्यमें सुखकी पूजा करनी चाहिये । कमलके दलोंमें क्रमशः दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युताको और मध्यमें सर्वतोमुखीको जानना चाहिये । तत्पश्चात् चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतुकी स्थापना करके इनके निमित्त पूजन हवन-दान कराना चाहिये । इस प्रकार सभी विधान विस्तारपूर्वक करके इस अवसरपर शिवतत्त्वके पारगामी विद्वान् एवं वेदाध्ययनसे सम्पन्न योगियोंको भोजन कराना चाहिये ॥ ६४–७११ / २ ॥ हवन - कार्यके आरम्भ हो जानेपर पूर्वदिशाके मध्यभागमें रुद्राध्यायका पाठ करते हुए विधानपूर्वक राजाको तुलापर चढ़ाये और विधानपूर्वक वहाँ राजाको एक घड़ीतक बैठाये रखे । उस समय यजमान [ राजा ] रुद्रगायत्री नामक मन्त्रका जप करे । वह एक घटिकाका | आधा अथवा उसके भी आधे समयतक आसन लगाये रखे । सूर्यबिम्बको देखकर बुद्धिमान् ब्राह्मण समाहितचित्त होकर हाथमें कूर्च धारण किये रहे एवं सभी आभूषणोंसे युक्त राजा हाथमें खड्ग तथा खेटक धारण किये रहे । कर्म आदि तथा अन्तमें वेदवेदांगमें पारंगत ब्राह्मणोंके | द्वारा विशेषरूपसे स्वस्तिवाचनके साथ पुण्याहवाचन

पृष्ठ 716

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७१४ जयमङ्गलशब्दादिब्रह्मघोषैः सुशोभनैः । नृत्यवाद्यादिभिर्गीतैः सर्वशोभासमन्वितैः

स्वमेवं चन्द्रदिग्भागे सुवर्णं तत्र विक्षिपेत् ।

तुलाधारौ समौ वृत्तौ तुलाभारः सदा भवेत् ॥

शतनिष्काधिकं श्रेष्ठं तदर्थं मध्यमं स्मृतम् ।

तस्यार्धं च कनिष्ठं स्यात्त्रिविधं तत्र कल्पितम् ॥

वस्त्रयुग्ममथोष्णीषं कुण्डलं कण्ठशोभनम् ।

अङ्गुलीभूषणं चैव मणिबन्धस्य भूषणम् ॥

एतानि चैव सर्वाणि प्रारम्भे धर्मकर्मणि ।

पाशुपतव्रतायाथ भस्माङ्गाय प्रदापयेत् ॥

पूर्वोक्तभूषणं सर्वं सोष्णीषं वस्त्रसंयुतम् ।

दद्यादेतत्प्रयोक्तृभ्य आच्छादनपटं बुधः ॥

दक्षिणां च शतं सार्धं तदर्धं वा प्रदापयेत् ।

योगिनां चैव सर्वेषां पृथङ्निष्कं प्रदापयेत् ॥

यागोपकरणं दिव्यमाचार्याय प्रदापयेत् ।

इतरेषां यतीनां तु पृथङ्निष्कं प्रदापयेत् ॥

तुलारोहसुवर्णं च शिवाय विनिवेदयेत् ।

प्रासादं मण्डपं चैव प्राकारं भूषणं तथा ॥

सुवर्णपुष्पं पटहं खड्गं वै कोशमेव च ।

कृत्वा दत्त्वा शिवायाथ किञ्चिच्छेषं च बुद्धिमान् ॥

आचार्येभ्यः प्रदातव्यं भस्माङ्गेभ्यो विशेषतः ।

बन्दीकृतान् विसृज्याथ कारागृहनिवासिनः ॥

सहस्रकलशैस्तत्र सेचयेत्परमेश्वरम् ।

घृतेन केवलेनापि देवदेवमुमापतिम् ॥

पयसा वाथ दध्ना वा सर्वद्रव्यैरथापि वा ।

ब्रह्मकूर्चेन वा देवं पञ्चगव्येन वा पुनः ॥

गायत्र्या चैव गोमूत्रं गोमयं प्रणवेन वा ।

आप्यायस्वेति वै क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि ॥

तेजोऽसीत्याज्यमीशानमन्त्रेणैवाभिषेचयेत् ।

देवस्यत्वेति देवेशं कुशाम्बुकलशेन वै ॥

रुद्राध्यायेन वा सर्वं स्नापयेत्परमेश्वरम् ।

सहस्रकलशं शम्भोर्नाम्नां चैव सहस्रकैः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग किया जाना चाहिये और जय आदि मांगलिक शब्दों, ॥ ७७ परम सुन्दर वेदध्वनियों तथा सब प्रकारकी शोभासे युक्त नृत्य - वाद्य - गीत आदिके साथ उत्तर दिशाभागमें स्थित ७८ | पलड़ेपर अपने भारके बराबर सुवर्ण रखे, ताकि तुलाके दोनों पलड़े समान हो जायँ; इस प्रकार तुलाभार सदा अक्षय बना रहे । सौ निष्कसे अधिक परिमाणवाली तुला ७ ९ श्रेष्ठ, पचास निष्कवाली मध्यम और पचीस निष्कवाली कनिष्ठ कही गयी है - इस प्रकार तुला तीन प्रकारकी ८० कही गयी है॥७२–७९ ॥ अग्रपूजाके प्रारम्भमें दोनों वस्त्र, उष्णीष, कुण्डल, ८१ कण्ठहार, अँगूठी तथा मणिबन्धभूषण ( कंकण ) —ये सभी वस्तुएँ भस्मराग धारण किये हुए पाशुपतव्रतमें ८२ निरत शैवाचार्यको प्रदान कराने चाहिये । बुद्धिमान्‌को चाहिये कि पूर्वोक्त आभूषण, वस्त्रयुक्त उष्णीष एवं ८३ उत्तरीय - यह सब ऋत्विजोंको प्रदान करे और एक सौ पचास अथवा उसका आधा निष्क सुवर्णकी दक्षिणा प्रदान ८४ प्रदान प्रदान ८५ प्रदान सुवर्ण ८६ पटह, करे । साथ ही सभी योगियोंको अलगसे सुवर्णमुद्रा करे । इस अवसरपर दिव्य यागोपकरण आचार्यको करे और अन्य यतियोंको पृथक् रूपसे सुवर्णमुद्रा करे । बुद्धिमान्‌को चाहिये कि तुलापर रखे हुए तथा प्रासाद, मण्डप, प्राकार, आभूषण, सुवर्णपुष्प, खड्ग, कोश - इन सबको एकत्र करके इनमेंसे कुछ भाग बचाकर शिवको प्रदान कर दे और बचे हुए ८७ भागको विशेषरूपसे भस्मधारी आचार्योंको प्रदान करे । कारागारमें स्थित बन्दियोंको मुक्त करके सहस्र कलशोंके ८८ | जलसे अथवा केवल घृतसे, दूधसे, दहीसे अथवा नारिकेल आदिके जलसे देवदेव परमेश्वर उमापतिका अभिषेक ८ ९ करना चाहिये; अथवा ब्रह्मकूर्चके द्वारा पंचगव्य से शिवजीका अभिषेक करना चाहिये । गायत्रीमन्त्रसे गोमूत्र, प्रणवमन्त्रसे गोमय, ‘ आप्यायस्व०’– मन्त्रसे दूध, ' दधिक्राव्णो ० ' -९ ० मन्त्रसे दही तथा ' तेजोऽसीति ० ' – मन्त्रसे घृत ग्रहणकर ईशानमन्त्रसे ही अभिषेक करना चाहिये । ‘ देवस्य ९९ त्वा ० ' – इस मन्त्रके द्वारा कलशमें स्थित कुशाम्बुसे देवेशका अभिषेक करे अथवा रुद्राध्यायके द्वारा ९ २ । परमेश्वर शिवका अभिषेक करे । भगवान् विष्णुके द्वारा

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अध्याय २ ९ ] विष्णुना कथितैर्वापि दक्षेण मुनिमुख्येन महापूजा प्रकर्तव्या शिवार्चकाय दातव्या षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि

तण्डिना कथितैस्तु वा ।

कीर्तितैरथ वा पुनः॥९

महादेवस्य भक्तितः ।

दक्षिणा स्वगुरोः सदा ॥ ९

७१५ कहे गये ' अथवा [ शिवभक्त ] तण्डीके द्वारा कहे गये २ ३ अथवा मुनिश्रेष्ठ दक्षके द्वारा कहे गये ३ शिवके हजार नामोंसे हजार कलशोंके जलसे शिवका अभिषेक करे ॥ ८० - ९ ३ ॥ ४ भक्तिपूर्वक अपने गुरु महादेवकी सदा महापूजा करनी चाहिये और शिवपूजकको दक्षिणा प्रदान करनी देहार्णवं च सर्वेषां दक्षिणा च यथाक्रमम् । चाहिये । तुलाद्रव्य और दक्षिणा यथाक्रम ऋत्विज् आदि तथा दीनों, अन्धों, दरिद्रोंको देनी चाहिये; साथ ही दीनान्धकृपणानां च बालवृद्धकृशातुरान् ॥ ९ ५ बालकों, वृद्धों, निर्बलों तथा रोगियोंको विधान-पूर्वक भोजन कराना चाहिये और दक्षिणा भी देनी

भोजयेच्च विधानेन दक्षिणामपि दापयेत् ॥ ९ ६ । चाहिये ॥ ९ ४ - ९ ६ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तुलापुरुषदानविधिर्नामाष्टाविंशत्तमोऽध्यायः ॥ २८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' तुलापुरुषदानविधि ' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

उनतीसवाँ अध्याय षोडशमहादानान्तर्गत सनत्कुमार उवाच

तुला ते कथिता ह्येषा आद्या सामान्यरूपिणी ।

हिरण्यगर्भं वक्ष्यामि द्वितीयं सर्वसिद्धिदम् ॥ १

अधः पात्रं सहस्त्रेण हिरण्येन विधीयते ।

ऊर्ध्वपात्रं तदर्धेन मुखं संवेशमात्रकम् ॥ २

हैममेवं शुभं कुर्यात्सर्वालङ्कारसंयुतम् ।

अधःपात्रे स्मरेद्देवीं गुणत्रयसमन्विताम् ॥ ३

चतुर्विंशतिकां देवीं ब्रह्मविष्ण्वग्निरूपिणीम् ।

ऊर्ध्वपात्रे गुणातीतं षड्विंशकमुमापतिम् ॥ ४

आत्मानं पुरुषं ध्यायेत्पञ्चविंशकमग्रजम् । हिरण्यगर्भदानकी विधि सनत्कुमार बोले- मैंने आपसे प्रथमतः सामान्यरूपसे तुलादानका वर्णन कर दिया; अब समस्त सिद्धियोंको देनेवाले हिरण्यगर्भदानके विषयमें बताऊँगा ॥ १ ॥

इसके लिये हजार स्वर्ण मुद्राओंसे एक नीचेका पात्र बनाना चाहिये और उसके आधे अर्थात् पाँच सौ स्वर्ण - मुद्राओंसे उसके प्रवेश - प्रमाण मुखवाला ऊर्ध्वपात्र ( ढक्कन ) निर्मित कराना चाहिये । उस शुभ स्वर्णपात्रको सभी अलंकारोंसे विभूषित करना चाहिये ॥२१ / २ ॥ तत्पश्चात् नीचेके मुख्य पात्रमें त्रिगुणात्मिका, चतुर्विंशति - तत्त्वस्वरूपिणी तथा ब्रह्मा - विष्णु - अग्निस्वरूपा भगवतीका ध्यान करे और ऊपरके पात्रमें छब्बीसवें तत्त्वरूप गुणातीत उमापति सदाशिवका और पचीसवें तत्त्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषका ध्यान करे ॥ ३-४९ / २ ॥ तदनन्तर पूर्वकी भाँति बताये गये स्थानमें वेदी तथा पूर्वोक्तस्थानमध्येऽथ वेदिकोपरि मण्डले ॥ ५ मण्डल बनाकर पात्रको लेकर शालि ( धान ) -के ऊपर १. भगवान् विष्णुद्वारा कथित यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ९ ८ वें अध्यायमें है । २. शिवभक्त तण्डीप्रोक्त यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ६५ वें अध्यायमें वर्णित है । ३. मुनिश्रेष्ठ दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनाम ' शिवरहस्य ' नामक ग्रन्थमें वर्णित है ।

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७१६ शालिमध्ये क्षिपेन्नीत्वा नववस्त्रैश्च वेष्टयेत् माषकल्केन चालिप्य पञ्चद्रव्येण पूजयेत् ईशानाद्यैर्यथान्यायं पञ्चभिः परिपूजयेत् पूर्ववच्छिवपूजा च होमश्चैव यथाक्रमम् देवीं गायत्रिकां जप्त्वा प्रविशेत्प्राङ्मुखः स्वयम् । विधिनैव तु सम्पाद्य गर्भाधानादिकां क्रियाम् कृत्वा षोडशमार्गेण विधिना ब्राह्मणोत्तमः दूर्वाङ्कुरैस्तु कर्तव्या सेचना दक्षिणे पुटे औदुम्बरफलैः सार्धमेकविंशत्कुशोदकम् । ईशान्यां तावदेवात्र कुर्यात् सीमन्तकर्मणि उद्वहेत्कन्यकां कृत्वा त्रिंशन्निष्केण शोभनाम् । अलङ्कृत्य तथा हुत्वा शिवाय विनिवेदयेत् अन्नप्राशनके विद्वान् भोजयेत्पायसादिभिः । एवं विश्वजितान्ता वै गर्भाधानादिकाः क्रियाः

शक्तिबीजेन कर्तव्या ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।

शेषं सर्वं च विधिवत्तुलाहेमवदाचरेत् ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । स्थापित कर देना चाहिये और उसे नवीन वस्त्रोंसे ढँक देना ॥ ६ चाहिये । पुनः माष ( उड़द ) - के उबटनसे आलेप करके पंचोपचारोंसे ईशान आदि पाँच मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक । उस पात्रकी पूजा करनी चाहिये । शिवपूजा तथा होम भी ॥ ७ पूर्वकी भाँति क्रमानुसार करना चाहिये ॥५–७ ॥ भगवती गायत्रीका जप करके पूर्वाभिमुख बैठ जाय ॥ ८ और स्वयं श्रेष्ठ आचार्य गर्भाधान आदि सोलह संस्कार । विधिपूर्वक सम्पन्न करके दूर्वाके अंकुरोंसे दक्षिण पुटमें ॥ ९ सेचन करे । गूलरके फलोंसहित इक्कीस कुशाके जलसे ईशान दिशामें सीमन्तकर्म करे । तीस निष्क परिमाणकी ॥ १० सुवर्णकी सुन्दर कन्या बनाकर उसे [ भूषण - वस्त्र आदिसे ] अलंकृत करके हवनकर भगवान् शिवको अर्पित करे । ॥ ११ विद्वान्‌को चाहिये कि अन्नप्राशन - संस्कारमें पायस ( खीर ) आदिका भोजन कराये । इस प्रकार वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको ॥ १२ गर्भाधानसे लेकर विश्वजित्पर्यन्त उन सभी संस्कारोंको शक्तिबीजके साथ करना चाहिये । शेष सभी कृत्य स्वर्ण-१३ | तुलादानकी भाँति विधिवत् करना चाहिये॥८–१३ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्यगर्भदानविधिर्नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' हिरण्यगर्भदानविधि ' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ९ ॥ तीसवाँ अध्याय तिलपर्वतदानविधि सनत्कुमार उवाच अधुना सम्प्रवक्ष्यामि तिलपर्वतमुत्तमम् पूर्वोक्तस्थानकाले तु कृत्वा सम्पूज्य यत्नतः सुसमे भूतले रम्ये वेदिना च विवर्जिते दशतालप्रमाणेन दण्डं संस्थाप्य वै मुने अद्भिः सम्प्रोक्ष्य पश्चाद्धि तिलांस्त्वस्मिन् विनिक्षिपेत् पञ्चगव्येन तं देशं प्रोक्षयेद् ब्राह्मणोत्तमः

मण्डलं कल्पयेद्विद्वान् पूर्ववत्सुसमन्ततः ।

नववस्त्रैश्च संस्थाप्य रम्यपुष्पैर्विकीर्य च ॥

तस्मिन् सञ्चयनं कार्यं तिलभारैर्विशेषतः ।

दण्डप्रादेशमुत्सेधमुत्तमं परिकीर्तितम् ॥

* अंगुष्ठसे मध्यमाकेबीचकी दूरीको एक ताल कहा जाता सनत्कुमार बोले – हे मुने! अब मैं उत्तम । तिलपर्वतदानका विधिवत् वर्णन करूँगा । पूर्वमें बताये ॥ १ गये स्थान तथा कालमें प्रयत्नपूर्वक पूजन करके । तिलपर्वतका दान करे । वेदीरहित सुन्दर समतल भूमिपर ॥ २ दस ताल * प्रमाणका दण्ड स्थापित करके जल छिड़ककर । उसपर तिलराशि रखे; श्रेष्ठ ब्राह्मणको चाहिये कि ॥ ३ पंचगव्यसे उस स्थानका प्रोक्षण करे ॥ १-३ ॥ तदनन्तर विद्वान् पूर्ववत् चारों ओर गोल मण्डल ४ बनाये । नये वस्त्रोंको रखकर उसपर सुन्दर पुष्प बिखेरकर वहाँ तिलके बीजोंके भारोंका ढेर लगाये । ५ | तिलराशि स्थापित किये गये दण्डसे प्रादेशमात्र ऊपर है । ( वायुपुराण ८। १०३ )

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अध्याय ३१ ] सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि

चतुरङ्गुलहीनं तु मध्यमं मुनिपुङ्गवाः ।

दण्डतुल्यं कनिष्ठं स्याद्दण्डहीनं न कारयेत् ॥ ६

वेष्टयित्वा नवैर्वस्त्रैः परितः पूजयेत्क्रमात् ।

सद्यादीनि प्रविन्यस्य पूजयेद्विधिपूर्वकम् ॥ ७

अष्टदिक्षु च कर्तव्याः पूर्वोक्ता मूर्तयः क्रमात् ।

त्रिनिष्केन सुवर्णेन प्रत्येकं कारयेत्क्रमात् ॥ ८

दक्षिणा विधिना कार्या तुलाभारवदेव तु ।

होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो यथावन्मुनिसत्तमाः ॥ ९

अर्चयेद्देवदेवेशं लोकपालसमावृतम् ।

तिलपर्वतमध्यस्थं तिलपर्वतरूपिणम् ॥ १०

शिवार्चना च कर्तव्या सहस्त्रकलशादिभिः ।

दर्शयेत्तिलमध्यस्थं देवदेवमुमापतिम् ॥ ११

पूजयित्वा विधानेन क्रमेण च विसर्जयेत् ।

श्रोत्रियाय दरिद्राय दापयेत्तिलपर्वतम् ॥ १२

एवं तिलनगः प्रोक्तः सर्वस्मादधिकः परः ॥ १३

७१७ हो, तो उसे उत्तम कहा गया है । हे श्रेष्ठ मुनियो! दण्डसे चार अंगुल कम रहनेपर मध्यम तथा दण्डके बराबर होनेपर कनिष्ठ श्रेणीका होता है । तिलके ढेरको दण्डसे नीचे नहीं करना चाहिये । इस तिलपर्वतको नवीन वस्त्रोंसे चारों ओरसे लपेटकर क्रमसे पूजन करना चाहिये । वहाँ ' सद्योजात ' आदि पंचब्रह्मोंको क्रमसे स्थापित करके विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये । पूर्वमें कही गयी मूर्तियोंको आठों दिशाओंमें क्रमसे स्थापित करना चाहिये; प्रत्येक मूर्तिको तीन निष्क सुवर्णसे निर्मित कराना चाहिये ॥ ४-८ ॥ तुलाभारके कृत्यकी भाँति इसमें दक्षिणा देनी चाहिये । हे श्रेष्ठ मुनियो! इस दानमें पूर्वकी भाँति यथावत् होम करना भी बताया गया है । लोकपालोंसे आवृत, तिल पर्वतके मध्यमें विराजमान तथा तिलपर्वतरूपी । देवदेवेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये । हजार कलशोंसे शिवकी अर्चना करनी चाहिये । अपने इष्टजनोंको तिलके मध्यमें स्थित देवाधिदेव उमापतिका दर्शन कराना चाहिये । इस प्रकार विधिपूर्वक उनका पूजन करके विसर्जन करना चाहिये । तत्पश्चात् उस तिलपर्वतको धनहीन श्रोत्रिय [ ब्राह्मण ] - को दिला देना चाहिये । इस प्रकार मैंने आपसे तिलपर्वतके दानका वर्णन कर दिया; । यह सभी दानोंसे श्रेष्ठ है॥९ –१३ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलपर्वतदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' तिलपर्वतदान ' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

इकतीसवाँ अध्याय सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि सनत्कुमार उवाच

अथान्यं पर्वतं सूक्ष्ममल्पद्रव्यं महाफलम् ।

द्रव्यमात्रोपसंयुक्ते काले मध्यं विधीयते ॥ १

गोमयालिप्तभूमौ तु ह्यम्बराणि प्रकीर्य च ।

तन्मध्ये निक्षिपेद्धीमांस्तिलभारत्रयं शुभम् ॥ २

सनत्कुमार बोले- अब एक अन्य सूक्ष्म तिलपर्वतके दानके विषयमें बताता हूँ, जो व्ययमें अल्प द्रव्यवाला, किंतु महान् फल प्रदान करनेवाला है । जब भी व्यक्ति द्रव्यसे सम्पन्न हो जाय, तब इस पवित्र | कृत्यको करे ॥१ ॥

बुद्धिमान् पुरुषको गोमयसे विधिवत् लीपी गयी भूमिपर वस्त्र बिछाकर उसके मध्यमें तीन भार विशुद्ध । तिल स्थापित करना चाहिये ॥२ ॥

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[ उत्तरभाग श्रीलिङ्गमहापुराण ७१८

पद्ममष्टदलं कुर्यात्कर्णिकाकेसरान्वितम् ।

दशनिष्केण तत्कार्यं तदर्धार्धेन वा पुनः ॥

तिलमध्ये न्यसेत्पद्मं पद्ममध्ये महेश्वरम् ।

आराध्य विधिवद्देवं वामादीनि प्रपूजयेत् ॥

शक्तिरूपं सुवर्णेन त्रिनिष्केण तु कारयेत् ।

न्यासं तु परितः कुर्याद्विघ्नेशान् परिभागतः ॥

पूर्वोक्तहेममानेन विघ्नेशानपि कारयेत् ।

तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् ॥

तदनन्तर कर्णिका तथा केसरसे युक्त सुवर्णका अष्टदल कमल बनाना चाहिये । इसे दस निष्क ३ अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे प्रमाणवाले सुवर्णसे निर्मित करना चाहिये । इस [ अष्टदल ] कमलको तिलके मध्य रखना चाहिये । ४ और कमलके बीच शिवजीकी विधिवत् आराधना करके उनकी वामदेव आदि मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये । तीन निष्क सुवर्णके द्वारा शक्तिकी प्रतिमा बनानी चाहिये । इसी प्रकार आठों दिशाओंमें अष्ट ५ । विनायकोंकी स्थापना करनी चाहिये । पूर्वमें कहे गये तीन निष्क सुवर्णसे विघ्नेश्वरोंकी भी प्रतिमा बनानी चाहिये । विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा क्रमसे उनकी पूजा करके दानादि शेष क्रियाएँ पूर्वोक्त क्रमसे ६ | करें ॥ ३-६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णन ' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥

बत्तीसवाँ अध्याय सुवर्णपृथ्वी महादानविधि सनत्कुमार उवाच

जपहोमार्चनादानाभिषेकाद्यं च पूर्ववत् ।

सुवर्णमेदिनीदानं प्रवक्ष्यामि समासतः ॥

पूर्वोक्तदेशकाले तु कारयेन्मुनिभिः सह ।

लक्षणेन यथापूर्वं कुण्डे वा मण्डलेऽथ वा ॥

मेदिनीं कारयेद्दिव्यां सहस्त्रेणापि वा पुनः ।

एकहस्ता प्रकर्तव्या चतुरस्त्रा सुशोभना ॥

सप्तद्वीपसमुद्राद्यैः पर्वतैरभिसंवृता ।

सर्वतीर्थसमोपेता मध्ये मेरुसमन्विता ॥

अथवा मध्यतो द्वीपं नवखण्डं प्रकल्पयेत् ।

पूर्ववन्निखिलं कृत्वा मण्डले वेदिमध्यतः ॥

सप्तभागैकभागेन सहस्राद्विधिपूर्वकम् ।

शिवभक्ते प्रदातव्या दक्षिणा पूर्वचोदिता ॥

सनत्कुमार बोले- - अब मैं सुवर्णमेदिनीदानका संक्षेपमें वर्णन करूँगा । जप, होम, पूजा, दान, अभिषेक १ | आदि कृत्य पूर्वोक्त देशकालमें पूर्वकी भाँति मुनियोंके द्वारा सम्पन्न कराये जाने चाहिये । यह कार्य पूर्वकथित २ लक्षणकी भाँति कुण्डमें या मण्डलमें किया जाना चाहिये ॥ १-२ ॥ एक हजार सुवर्णमुद्राओंसे अथवा उसके आधे ३ अथवा उसके आधेसे दिव्य पृथ्वीका आकार बनाना चाहिये । उसे चौकोर, अत्यन्त सुन्दर तथा एक हाथ ४ । लम्बी - चौड़ी बनाये । वह सात द्वीपों, समुद्रों तथा पर्वतोंसे घिरी हुई हो; सभी तीर्थोंसे युक्त हो तथा मध्यमें मेरुसे सुशोभित हो । मध्य भागमें नौखण्डोंके साथ ५ जम्बूद्वीपका निर्माण करे । मण्डलमें वेदीके मध्य पूर्वकी भाँति सम्पूर्ण कृत्य करके सहस्र स्वर्णमुद्राओंके सातवें ६ | भागको शिवभक्तको विधिपूर्वक देना चाहिये; इसमें