श्रीगणेशाय नमः।

लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 721–730

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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अध्याय ३३ ] कल्पपादपदानविधि ७१ ९ सहस्रकलशाद्यैश्च शङ्करं पूजयेच्छिवम् । दक्षिणा पूर्वकी भाँति बतायी गयी है । हजार कलश आदिके द्वारा कल्याणकारी भगवान् शिवकी पूजा करनी सुवर्णमेदिनीप्रोक्तं चाहिये । इस लिङ्गपुराणमें कहा गया सुवर्णमेदिनीदान लिङ्गेऽस्मिन् दानमुत्तमम् ॥ ७ अत्यन्त श्रेष्ठ है॥३–७ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सुवर्णमेदिनीदानं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ॥ ३२ ॥

‘ सुवर्णमेदिनीदान ’ नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

KKKKKKKKKKKK तैंतीसवाँ अध्याय कल्पपादपदानविधि सनत्कुमार उवाच

अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि कल्पपादपमुत्तमम् ।

शतनिष्केण कृत्वैवं सर्वशाखासमन्वितम् ॥ १

शाखानां विविधं कृत्वा मुक्तादामाद्यलम्बनम् ।

दिव्यैर्मारकतैश्चैव चाङ्कुराग्रं प्रविन्यसेत् ॥ २

प्रवालं कारयेद्विद्वान् प्रवालेन द्रुमस्य तु ।

फलानि पद्मरागैश्च परितोऽस्य सुशोभयेत् ॥ ३

मूलं च नीलरत्नेन वज्रेण स्कन्धमुत्तमम् ।

वैडूर्येण द्रुमाग्रं च पुष्परागेण मस्तकम् ॥ ४

गोमेदकेन वै कन्दं सूर्यकान्तेन सुव्रत ।

चन्द्रकान्तेन वा वेदिं द्रुमस्य स्फटिकेन वा ॥ ५

वितस्तिमात्रमायामं वृक्षस्य परिकीर्तितम् ।

शाखाष्टकस्य मानं च विस्तारं चोर्ध्वतस्तथा ॥ ६

तन्मूले स्थापयेल्लिङ्गं लोकपालैः समावृतम् ।

पूर्वोक्तवेदिमध्ये तु मण्डले स्थाप्य पादपम् ॥ ७

पूजयेद्देवमीशानं लोकपालांश्च यत्नतः ।

पूर्ववज्जपहोमाद्यं तुलाभारवदाचरेत् ॥ ८

निवेदयेद्द्द्रुमं शम्भोर्योगिनां वाथ वा नृप ।

भस्माङ्गिभ्योऽथ वा राजा सार्वभौमो भविष्यति ॥ ९

सनत्कुमार बोले- अब मैं उत्तम कल्पवृक्षदानका वर्णन करूँगा । सौ निष्क सुवर्णसे सभी शाखाओंसे युक्त एक कल्पवृक्ष बनाकर उसकी समस्त शाखाओंमें मोतियोंकी माला लटकाकर दिव्य मरकत मणिसे अंकुरका अग्रभाग बनाये । विद्वान्‌को चाहिये कि प्रवाल ( मूँगे ) - से वृक्षका किसलय बनाये और उसमें चारों ओर पद्मराग मणियोंसे फल बनाये । नीलमणिसे उस वृक्षका मूल, हीरेसे सुन्दर स्कन्ध ( तना ), वैदूर्य मणिसे वृक्षका अग्रभाग और पुष्पराग ( पुखराज ) - से मस्तक बनाये । हे सुव्रत! गोमेदसे वृक्षका कन्द और सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त अथवा स्फटिक मणिसे वृक्षके चारों ओर वेदी बनाये ॥१-५ ॥ कल्पवृक्षकी ऊँचाई एक वितस्ति ( बारह अंगुल ) कही गयी है । उसकी आठ शाखाओंका विस्तार इतने ही प्रमाणवाला होना चाहिये । उस वृक्षके मूलमें लोकपालोंसहित शिवलिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये । मण्डलमें पूर्वोक्त वेदीके मध्यमें कल्पवृक्षको स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक भगवान् शिव तथा लोकपालोंकी पूजा करनी चाहिये । जप, होम आदि पूर्वकी भाँति तुलादानके समान ही करना चाहिये । हे राजन्! अन्तमें इस वृक्षको शिवजीको अर्पण कर देना चाहिये अथवा भस्मधारी योगियोंको दान कर देना चाहिये । इसे करनेवाला मनुष्य अगले जन्ममें सार्वभौम ( चक्रवर्ती ) | राजा होगा ॥६ – ९ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कल्पपादपदानविधिर्नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

अन्तर्गत उत्तरभागमें ' कल्पपादपदानविधि ' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ७२० चौंतीसवाँ अध्याय गणेशेशदानविधि सनत्कुमार उवाच

गणेशेशं प्रवक्ष्यामि दानं पूर्वोक्तमण्डपे ।

सम्पूज्य देवदेवेशं लोकपालसमावृतम् ॥ १ ।

विश्वेश्वरान् यथाशास्त्रं सर्वाभरणसंयुतान् ।

दशनिष्केण वै कृत्वा सम्पूज्य च विधानतः ॥ २

अष्टदिक्ष्वष्टकुण्डेषु पूर्ववद्धोममाचरेत् ।

पञ्चावरणमार्गेण पारम्पर्यक्रमेण च ॥३

सप्तविप्रान् समभ्यर्च्य कन्यामेकां तथोत्तरे ।

दापयेत्सर्वमन्त्राणि स्वैःस्वैर्मन्त्रैरनुक्रमात् ॥ ४

दत्त्वैवं सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५ ।

सनत्कुमार बोले- - अब मैं गणेशेशदानका वर्णन करूँगा । पूर्वमें बतायी गयी रीतिसे निर्मित किये गये मण्डपमें लोकपालोंसहित देवदेवेश्वर सदाशिवका पूजन करके दस निष्क सुवर्णसे आठों दिक्पालोंकी प्रतिमा बनाकर उन्हें यथाशास्त्र सभी आभरणोंसे विभूषित करके विधिपूर्वक उनका पूजनकर आठों दिशाओंमें आठ कुण्डोंमें पंचावरण मार्गसे तथा परम्पराक्रमसे पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये ॥ १-३ ॥ तत्पश्चात् सात विप्रोंकी तथा उत्तर दिशामें एक कन्याकी विधिपूर्वक पूजा करके अनुक्रमसे अपने-अपने देवतामन्त्रोंसे सभी देवप्रतिमाओंका दान कर देना चाहिये । इस प्रकार दान करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥४-५ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गणेशेशदानविधिनिरूपणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' गणेशेशदानविधिनिरूपण ' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

पैंतीसवाँ अध्याय सुवर्णधेनुदानविधि सनत्कुमार उवाच

अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि हेमधेनुविधिक्रमम् ।

सर्वपापप्रशमनं ग्रहदुर्भिक्षनाशनम् ॥ १

उपसर्गप्रशमनं सर्वव्याधिनिवारणम् ।

निष्काणां च सहस्त्रेण सुवर्णेन तु कारयेत् ॥ २

तदर्थेनापि वा सम्यक् तदर्धार्धेन वा पुनः ।

शतेन वा प्रकर्तव्या सर्वरूपगुणान्विता ॥ ३

गोरूपं सुखुरं दिव्यं सर्वलक्षणसंयुतम् ।

खुराग्रे विन्यसेद्वजं शृङ्गे वै पद्मरागकम् ॥४

भ्रुवोर्मध्ये न्यसेद्दिव्यं मौक्तिकं मुनिसत्तमाः ।

वैडूर्येण स्तनाः कार्या लाङ्गूलं नीलतः शुभम् ॥ ५ ।

सनत्कुमार बोले- अब मैं आपसे हेमधेनुके दानकी विधिका वर्णन करूँगा; यह सभी पापोंका नाश करनेवाला, ग्रह तथा दुर्भिक्षका शमन करनेवाला, उपद्रवोंको शान्त करनेवाला और समस्त व्याधियों को दूर करनेवाला है ॥ ११२ ॥

हजार सुवर्णमुद्राओंसे एक गौ बनानी चाहिये; अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे अथवा एक सौ स्वर्णमुद्राओंसे सभी लक्षणों तथा गुणोंसे समन्वित धेनुका निर्माण कराना चाहिये । वह गोप्रतिमा सुन्दर खुरोंवाली, दिव्य तथा सभी लक्षणोंसे युक्त होनी चाहिये ॥ २-३१ / २ ॥ श्रेष्ठ मुनियो! खुरोंके अग्र भागमें हीरा तथा सींगोंमें पद्मराग लगाना चाहिये और दोनों भौंहोंके

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अध्याय ३६ ] ऐश्वर्यप्रद

दन्तस्थाने प्रकर्तव्यः पुष्परागः सुशोभनः ।

पशुवत्कारयित्वा तु वत्सं कुर्यात्सुशोभनम् ॥

सुवर्णदशनिष्केण सर्वरत्नसुशोभितम् ।

पूर्वोक्तवेदिकामध्ये मण्डलं परिकल्प्य तु ॥

तन्मध्ये सुरभिं स्थाप्य सवत्सां सर्वतत्त्ववित् ।

सवत्सां सुरभिं तत्र वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत् ॥

सम्पूजयेद्गां गायत्र्या सवत्सां सुरभिं पुनः ।

अथैकाग्निविधानेन होमं कुर्याद्यथाविधि ॥

समिदाज्यविधानेन पूर्ववच्छेषमाचरेत् ।

शिवपूजा प्रकर्तव्या लिङ्गं स्नाप्य घृतादिभिः ॥

गामालभ्य च गायत्र्या शिवायादापयेच्छुभाम् ।

दक्षिणा च प्रकर्तव्या त्रिंशन्निष्का महामते ॥

महालक्ष्मीदानविधि ७२१ मध्यमें दिव्य मोती लगाना चाहिये । वैदूर्य मणिसे ६ स्तनोंको तथा नीलरत्नसे शुभ पुच्छको भूषित करना चाहिये । दाँतोंमें परम सुन्दर पुष्पराज लगाना चाहिये । साथ ही दस निष्क सुवर्णसे गायकी भाँति एक सुन्दर ७ बछड़ा बनवाकर उसे सभी रत्नोंसे विभूषित करना चाहिये॥४–६९ / २ ॥ तत्पश्चात् सर्वतत्त्वविद् पुरुषको चाहिये कि पूर्वमें बतायी गयी विधिसे निर्मित वेदिकाके मध्य मण्डल ८ बनाकर उसके मध्यमें बछड़ेसहित धेनुको रखकर बछड़ेसहित उस गौको दो वस्त्रोंसे वेष्टित कर दे और गायत्रीमन्त्रसे बछड़ेसहित उस सुरभि गौकी पूजा करे ॥ ७-८१ / २ ॥ ९ इसके बाद अग्निविधानसे समिधा तथा घृतसे विधिपूर्वक होम करना चाहिये; शेष कार्य पूर्वकी भाँति करना चाहिये । तत्पश्चात् शिवलिङ्गको घृत १० आदिसे स्नान कराकर शिव पूजा करनी चाहिये । तदनन्तर गौका स्पर्श करके गायत्रीमन्त्रका उच्चारणकर उस मंगलमयी धेनुको शिवको अर्पण कर देना चाहिये । हे महामते! तीस निष्क सुवर्णकी दक्षिणा भी ११ | देनी चाहिये ॥ ९ –११ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हेमधेनुदानविधिनिरूपणं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' हेमधेनुदानविधिनिरूपण ' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

छत्तीसवाँ अध्याय ऐश्वर्यप्रद सनत्कुमार उवाच

लक्ष्मीदानं प्रवक्ष्यामि महदैश्वर्यवर्धनम् ।

पूर्वोक्तमण्डपे कार्यं वेदिकोपरिमण्डले ॥

श्रीदेवीमतुलां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि । सहस्त्रेण तदर्थेन तदर्धार्धेन वा पुनः

अष्टोत्तरशतेनापि सर्वलक्षणसंयुताम् ।

मण्डले विन्यसेल्लक्ष्मीं सर्वालङ्कारसंयुताम् ॥

महालक्ष्मीदानविधि सनत्कुमार बोले- अब मैं महान् ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मीदानका वर्णन करूँगा । पूर्वी १ भाँति बताये गये विधानसे निर्मित मण्डपमें बनायी गयी वेदीके ऊपर यह दानकर्म करना चाहिये । हजार स्वर्णमुद्राओं अथवा उसके आधे अथवा उसके आधे ॥ २ अथवा एक सौ आठ स्वर्णमुद्राओंसे विधिपूर्वक अनुपम तथा सभी लक्षणोंसे युक्त श्रीदेवीप्रतिमा बनाकर उन लक्ष्मीजीको सभी अलंकारोंसे विभूषित करके मण्डलमें ३ । स्थापित करना चाहिये ॥ १–३ ॥

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ७२२

तस्यास्तु दक्षिणे भागे स्थण्डिले विष्णुमर्चयेत् ।

अर्चयित्वा विधानेन श्रीसूक्तेन सुरेश्वरीम् ॥

अर्चयेद्विष्णुगायत्र्या विष्णुं विश्वगुरुं हरिम् ।

आराध्य विधिना देवीं पूर्ववद्धोममाचरेत् ॥

समिद्धत्वा विधानेन आज्याहुतिमथाचरेत् ।

पृथगष्टोत्तरशतं होमयेद्ब्राह्मणोत्तमैः ॥

आहूय यजमानं तु तस्याः पूर्वदिशि स्थले ।

तस्मै तां दर्शयेद्देवीं दण्डवत्प्रणमेत्क्षितौ ॥

प्रणम्य विष्णुं तत्रस्थं शिवं पूर्ववदर्चयेत् ।

तस्या विंशतिभागं तु दक्षिणा परिकीर्तिता ॥

तदर्धांशं तु दातव्यमितरेषां यथार्हतः ।

ततस्तु होमयेच्छम्भुं भक्तो योगी विशेषतः ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उनके दक्षिण भागमें स्थण्डिलके ऊपर श्रीविष्णुका ४ पूजन करना चाहिये । श्रीसूक्तसे विधानपूर्वक सुरेश्वरीकी पूजा करके विष्णुगायत्रीसे विश्वगुरु भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये । देवीकी विधिपूर्वक आराधना करके पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये । सर्वप्रथम ५ विधिपूर्वक समिधासे हवन करके बादमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको घृतकी पृथक् एक सौ आठ आहुति प्रदान करनी चाहिये ॥ ४-६ ॥ ६ तत्पश्चात् यजमानको बुलाकर उन देवीके पूर्वदिशाभागमें उसे बिठाकर उन देवीका दर्शन कराना चाहिये । वह यजमान भी पृथ्वीपर देवीको दण्डवत् प्रणाम करे । इसके बाद वहाँ प्रतिष्ठित विष्णुको प्रणाम ७ करके पूर्वकी भाँति शिवकी पूजा करनी चाहिये । आचार्यके लिये उस मूर्तिके बीसवें भागके तुल्य दक्षिणा बतायी गयी है । उसका आधा अर्थात् बीसवें भागका ८ आधा यथायोग्य अन्य [ शिवभक्तों ] - को दान करना चाहिये । तदनन्तर भक्त - योगी आचार्यको विशेष-रूपसे भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये होम कराना ९ | चाहिये ॥७ – ९ ॥ उत्तरभागे लक्ष्मीदानविधिनिरूपणं नाम षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' लक्ष्मीदानविधिनिरूपण ' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥

सैंतीसवाँ अध्याय तिलधेनुदानविधिनिरूपण सनत्कुमार उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि तिलधेनुविधिक्रमम् ।

पूर्वोक्तमण्डपे कुर्याच्छिवपूजां तु पश्चिमे ॥ १

तस्याग्रे मध्यतो भूमौ पद्ममालिख्य शोभनम् ।

वस्त्रैराच्छादितं पद्मं तन्मध्ये विन्यसेच्छुभम् ॥ २

तिलपुष्पं तु कृत्वाथ हेमपद्मं विनिक्षिपेत् ।

त्रिंशन्निष्केण कर्तव्यं तदर्धार्धेन वा पुनः ॥ ३ ।

सनत्कुमार बोले- अब मैं तिलधेनुदानके विधिक्रमका वर्णन करूँगा । पूर्वमें बताये गये नियमसे निर्मित मण्डपमें पश्चिम भागमें शिवपूजा करनी चाहिये । उसके आगे मध्यमें भूमिपर सुन्दर कमल बनाकर उसे वस्त्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये । उसके मध्यमें उत्तम तिलपुष्प स्थापित करना चाहिये । हेमपद्म ( सुवर्णकमल ) बनाकर उसे मध्यमें रख देना चाहिये । यह हेमपद्म तीस निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे अर्थात् पन्द्रह निष्क अथवा उसके भी आधे अर्थात्

पृष्ठ 725

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अध्याय ३७ ] तिलधेनुदानविधिनिरूपण

पञ्चनिष्केण कर्तव्यं तदर्धार्धेन वा पुनः ।

तमाराध्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् ॥

पद्मस्योत्तरदिग्भागे विप्रानेकादश न्यसेत् ।

तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् ॥

आच्छादनोत्तरासङ्गं विप्रेभ्यो दापयेत्क्रमात् ।

उष्णीषं च प्रदातव्यं कुण्डले च विभूषिते ॥

हेमाङ्गुलीयकं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो विधानतः ।

एकं दश च वस्त्राणि तेषामग्रे प्रकीर्य च ॥

तेषु वस्त्रेषु निःक्षिप्य तिलाद्यानि पृथक्पृथक् ।

कांस्यपात्रं शतपलं विभिद्यैकादशांशकम् ॥

इक्षुदण्डं च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ।

गोशृङ्गे तु हिरण्येन द्विनिष्केण तु कारयेत् ॥

रजतेन तु कर्तव्याः खुरा निष्कद्वयेन तु ।

एवं पृथक्पृथक् दत्त्वा तत्तिलेषु विनिक्षिपेत् ॥

रुद्रैकादशमन्त्रैस्तु रुद्रेभ्यो दापयेत्तदा ।

पद्मस्य पूर्वदिग्भागे विप्रान् द्वादश पूजितान् ॥

एतेनैव तु मार्गेण तेषु श्रद्धासमन्वितः ।

द्वादशादित्यमन्त्रैश्च दापयेदेवमेव च ॥

पूर्ववद्दक्षिणे भागे विप्रान् षोडश संस्थितान् ।

मूर्ति विघ्नेशमन्त्रैश्च दापयेत्पूर्ववत्पुनः ॥

यजमानेन कर्तव्यं सर्वमेतद्यथाक्रमम् ।

केवलं रुद्रदानं वा आदित्येभ्योऽथ वा पुनः ॥

मूर्त्यादीनां च वा देयं यथाविभवविस्तरम् ।

पद्मं विन्यस्य राजासौ शेषं वा कारयेन्नृपः ॥

दक्षिणा च प्रदातव्या पञ्चनिष्केण भूषणम् ॥

७२३ 366 365 YE YE YE YE YE YE YE YE YE YE YE | साढ़े सात निष्क सुवर्णसे बनाना चाहिये, अथवा पाँच ४ निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे भागसे अथवा उसके भी आधे भागसे उस कमलका निर्माण करना ५ चाहिये । तत्पश्चात् उस हेमपद्मके विग्रहका ध्यान करके गन्ध, पुष्प आदिसे क्रमपूर्वक उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये ॥ १-४ ॥ ६ उस पद्मके उत्तर दिग्भागमें ग्यारह ब्राह्मणोंको | बैठाना चाहिये और क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे विधिपूर्वक ७ उनका पूजन करके उन विप्रोंको क्रमसे वस्त्र तथा उत्तरीय प्रदान करना चाहिये; उन्हें पगड़ी भी देनी चाहिये । तत्पश्चात् दो रत्नमय कुण्डल और सुवर्णकी ८ अँगूठी ब्राह्मणोंको विधानपूर्वक प्रदान करके उनके आगे ग्यारह वस्त्र फैलाकर उन वस्त्रोंपर अलग - अलग तिल आदि, सौ पलके बनाये हुए ग्यारह कांस्यपात्र ९और इक्षुदण्ड रखकर ब्राह्मणोंको प्रदान करना चाहिये ॥ ५–८१ / २ ॥ १० दो निष्क सुवर्णसे गायकी दो सींगें बनाये तथा दो निष्क परिमाणकी चाँदीसे उसके खुर बनाये और सबको पृथक् - पृथक् उन तिलोंपर रख । इसके बाद रुद्रके ११ ग्यारह मन्त्रोंसे ग्यारह रुद्रोंको तिलधेनु अर्पण कर दे । इसी प्रकार उस पद्मकी पूर्व दिशामें बारह विप्रोंकी पूजा करके १२ श्रद्धायुक्त होकर द्वादश आदित्यके मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु अर्पण करे । दक्षिण दिशामें स्थित सोलह विप्रोंकी पूजा करके पूर्वकी भाँति विघ्नेश- मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु प्रदान १३ करे । यह समस्त कार्य यजमानके द्वारा यथाक्रम सम्पन्न किया जाना चाहिये । रुद्रोंको अथवा आदित्योंको दानकर १४ अपने सामर्थ्यके अनुसार मूर्ति आदिकी दक्षिणा देनी चाहिये । इस प्रकार राजाको चाहिये कि पद्म - स्थापन करके शेष कार्य आचार्यद्वारा करवाये । अन्तमें पाँच निष्क सुवर्णका १५ भूषण अर्पण करके आचार्यको दक्षिणा प्रदान करनी १६ | चाहिये ॥ ९ –१६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलधेनुदानविधिनिरूपणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' तिलधेनुदानविधिनिरूपण ' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 726

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ७२४ अड़तीसवाँ अध्याय महादानोंमें परिगणित सनत्कुमार उवाच

गोसहस्त्रप्रदानं च वदामि शृणु सुव्रत ।

गवां सहस्रमादाय सवत्सं सगुणं शुभम् ॥ १

तास्त्वभ्यर्च्य यथाशास्त्रमष्टौ सम्यक्प्रयत्नतः ।

तासां शृङ्गाणि हेम्नाथ प्रतिनिष्केण बन्धयेत् ॥ २

खुरांश्च रजतेनैव बन्धयेत्कण्ठदेशतः ।

प्रतिनिष्केण कर्तव्यं कर्णे वज्रं च शोभनम् ॥ ३

शिवाय दद्याद्विप्रेभ्यो दक्षिणां च पृथक्पृथक् ।

दशनिष्कं तदर्थं वा तस्यार्धार्धमथापि वा ॥ ४

यथाविभवविस्तारं निष्कमात्रमथापि वा ।

वस्त्रयुग्मं च दातव्यं पृथग्विप्रेषु शोभनम् ॥ ५

गावश्चाराध्य यत्नेन दातव्याः सुमनोरमाः ।

एवं दत्त्वा विधानेन शिवमभ्यर्च्य शङ्करम् ॥ ६

जपेदग्रे यथान्यायं गवां स्तवमनुत्तमम् ।

गावो ममाग्रतो नित्यं गावो नः पृष्ठतस्तथा ॥ ७

हृदये मे सदा गावो गवां मध्ये वसाम्यहम् ।

इति कृत्वा द्विजाग्र्येभ्यो दत्त्वा गत्वा प्रदक्षिणम् ॥ ८

तद्रोमवर्षसंख्यानि स्वर्गलोके महीयते ॥ ९

गोसहस्त्रदानकी विधि सनत्कुमार बोले - हे सुव्रत! अब मैं गोसहस्रदानकी विधि बताता हूँ; इसे सुनिये । उत्तम लक्षणोंसे युक्त, मंगलमयी तथा बछड़ोंसहित एक हजार गायें लाकर उनकी पूजा करके उनमें से आठ गायोंकी शास्त्रविधि प्रयत्नपूर्वक सम्यक् पूजा करे । तत्पश्चात् उनकी सींगोंमें एक निष्क सुवर्ण बाँध दे और खुरोंमें भी एक - एक निष्क सुवर्ण बाँध दे । उनके कण्ठमें एक निष्क सुवर्णका | कण्ठाभूषण पहनाये तथा कानोंको सुन्दर हीरेसे अलंकृत | करे ॥ १–३ ॥ तत्पश्चात् इन्हें शिवको अर्पण कर दे । ब्राह्मणोंको पृथक् - पृथक् दस निष्क अथवा उसका आधा अथवा उसके आधेका आधा अथवा एक निष्क सुवर्ण अपने सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये और प्रत्येक ब्राह्मणको एक जोड़ा सुन्दर वस्त्र प्रदान करना चाहिये । दत्तचित्त होकर आराधना करके उन्हें उत्तम गौएँ प्रदान । करनी चाहिये॥४-५१ / २ ॥ इस प्रकार विधानपूर्वक दान करके कल्याणकारी भगवान् शिवका अर्चनकर गौओंके आगे इस उत्तम स्तवनका सम्यक् प्रकारसे पाठ करना चाहिये – ' गावो ममाग्रतो नित्यं गावो नः पृष्ठतस्तथा । हृदये मे सदा गावो गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥ ' अर्थात् गायें नित्य मेरे आगे रहें, गायें हमारे पीछेकी ओर रहें, गायें सदा मेरे हृदयमें रहें और मैं गायोंके मध्य निवास करूँ - ऐसा पाठ करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गायें प्रदानकर उनकी प्रदक्षिणा करे । इस प्रकारसे दान करनेवाला मनुष्य उन गायोंके शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर । वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ६ - ९ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गोसहस्त्रप्रदानं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘ गोसहस्रप्रदान ' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 727

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अध्याय ३ ९ ] हिरण्याश्वदानविधि ७२५ उनतालीसवाँअध्याय हिरण्याश्वदानविधि सनत्कुमार उवाच

हिरण्याश्वप्रदानं च वदामि विजयावहम् ।

अश्वमेधात्पुनः श्रेष्ठं वदामि शृणु सुव्रत ॥

अष्टोत्तरसहस्त्रेण अष्टोत्तरशतेन वा ।

कृत्वाश्वं लक्षणैर्युक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम् ॥

पञ्चकल्याणसम्पन्नं दिव्याकारं तु कारयेत् ।

सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वाङ्गैश्च समन्वितम् ॥

सर्वायुधसमोपेतमिन्द्रवाहनमुत्तमम् तन्मध्यदेशे संस्थाप्य तुरङ्गं स्वगुणान्वितम् ॥

उच्चैःश्रवसकं मत्वा भक्त्या चैव समर्चयेत् ।

तस्य पूर्वदिशाभागे ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥

सुरेन्द्रबुद्ध्या सम्पूज्य पञ्चनिष्कं प्रदापयेत् ।

स चाश्वः शिवभक्ताय दातव्यो विधिनैव तु ॥

सुवर्णाश्वं प्रदत्त्वा तु आचार्यमपि पूजयेत् । सनत्कुमार बोले- अब मैं विजयकी प्राप्ति करानेवाले हिरण्याश्वदानकी विधि बताता हूँ; हे सुव्रत! १ अश्वमेधयज्ञसे भी श्रेष्ठ इस दानका वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनें ॥१ ॥

एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ निष्क २ सुवर्णसे एक अश्वका निर्माण करके उसे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त अलंकारोंसे सुशोभित, पंच-कल्याणसम्पन्न ( श्वेतवर्णके चारों पाद तथा श्वेतवर्णके ३ मुखवाला ) और दिव्य आकृतिवाला बनाना चाहिये । साथ ही सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त, समस्त अंगोंवाला तथा सभी प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित एक उत्तम ४ इन्द्ररथ बनाकर उसके अग्रभागके मध्यस्थानमें सुन्दर गुणोंवाले उस अश्वको स्थापित करके उसे ' उच्चैःश्रवा ' अश्व मानकर भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी ५ चाहिये ॥ २–४१ / २ ॥ उसके पूर्व दिशा भागमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको आसीन करके उन्हें इन्द्र मानकर उनकी पूजाकर ६ पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे और वह सुवर्ण - अश्व विधिपूर्वक शिवभक्त विप्रको दे दे । अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्ण - अश्व प्रदान करके आचार्यकी पूजा करे यथाविभवविस्तारं पञ्चनिष्कमथापि वा ॥७ अथवा पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे । तत्पश्चात् दीनों, अन्धों, असहायों, बालकों, वृद्धों, दुर्बलों तथा रोगियों दीनान्धकृपणानाथबालवृद्धकृशातुरान् 1 और विशेषकर ब्राह्मणोंको अन्नदानके द्वारा सन्तुष्ट तोषयेदन्नदानेन ब्राह्मणांश्च विशेषतः ॥ ८ । करे ॥ ५-८ ॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस सुवर्ण - अश्वका दान एतद्यः कुरुते भक्त्या दानमश्वस्य मानवः । करता है, वह दीर्घकालतक इन्द्रतुल्य सुखोंका भोग ऐन्द्रान् भोगांश्चिरं भुक्त्वा रुचिरैश्वर्यवान् भवेत् ॥ ९ | करके महान् ऐश्वर्यशाली हो जाता है॥९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्याश्वदानं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' हिरण्याश्वदान ' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ९ ॥

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग ७२६ चालीसवाँ अध्याय कन्यादानविधि उवाच सनत्कुमार ' बोले- - अब मैं सभी दानोंमें अतिश्रेष्ठ सनत्कुमार कन्यादानं प्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम् । कन्यादानका वर्णन करूँगा । किसी कन्याके माता-कन्यां लक्षणसम्पन्नां सर्वदोषविवर्जिताम् ॥ १ पितासे बात चीत करके उन्हें अत्यधिक धन देकर समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सभी दोषोंसे रहित मातापित्रोस्तु संवादं कृत्वा दत्त्वा धनं महत् । उस कन्याको अपनी पुत्री बना ले । इसके बाद उसे आत्मीकृत्याथ संस्नाप्य वस्त्रं दत्त्वा शुभं नवम् ॥२ स्नान कराकर सुन्दर तथा नवीन वस्त्र प्रदान करके

भूषणैर्भूषयित्वाथ गन्धमाल्यैरथार्चयेत् ।

निमित्तानि समीक्ष्याथ गोत्रनक्षत्रकादिकान् ॥

उभयोश्चित्तमालोक्य उभौ सम्पूज्य यत्नतः ।

दातव्या श्रोत्रियायैव ब्राह्मणाय तपस्विने ॥

साक्षादधीतवेदाय विधिना ब्रह्मचारिणे ।

दासदासीधनाढ्यं च भूषणानि विशेषतः ॥

क्षेत्राणि च धनं धान्यं वासांसि च प्रदापयेत् ।

यावन्ति देहे रोमाणि कन्यायाः सन्ततौ पुनः ॥

तावद्वर्षसहस्राणि महीयते ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे आभूषणोंसे अलंकृतकर गन्ध, पुष्प आदिसे उसकी ३ पूजा करे ॥ १-२१ / २ ॥ तत्पश्चात् शकुन, गोत्र, नक्षत्र आदिका सम्यक् विचार करके कन्या तथा वरके अन्तःकरणकी अनुकूलता ४ देखकर उन दोनोंकी प्रयत्नपूर्वक विधिवत् पूजाकर उस श्रोत्रिय, तपस्वी, वेदपारंगत तथा ब्रह्मचारी ब्राह्मणको ५ विधानपूर्वक वह कन्या अर्पित कर दे । साथ ही दास, दासी, आभूषण, भूमि, धन, धान्य तथा वस्त्र भी प्रदान करे । इस दानको करनेवाला मनुष्य उस कन्याके तथा ६ उसकी संतानोंके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार ७ । वर्षोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ३७ ॥

कन्यादानविधिर्नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' कन्यादानविधि ' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥

इकतालीसवाँ अध्याय हिरण्यवृषमहादानविधि सनत्कुमार उवाच

हिरण्यवृषदानं च कथयामि समासतः ।

वृषरूपं हिरण्येन सहस्त्रेणाथ कारयेत् ॥

तदर्धार्धेन वा धीमांस्तदर्धार्धेन वा पुनः ।

अष्टोत्तरशतेनापि वृषभं धर्मरूपिणम् ॥

कारयेत्पुण्ड्रमर्धचन्द्रकलाकृतिम् ।

स्फटिकेन तु कर्त्तव्यं खुरं तु रजतेन वै ॥

ग्रीवां तु पद्मरागेण ककुद्गोमेदकेन च ।

ग्रीवायां घाण्टवलयं रत्नचित्रं तु कारयेत् ॥

सनत्कुमार बोले- अब मैं हिरण्यवृषके दानका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ । एक हजार सुवर्णमुद्रासे वृषभकी १ एक प्रतिमा बनानी चाहिये अथवा बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उसके आधेके आधे भागसे अथवा उसके २ भी आधेके आधे भागसे अथवा एक सौ आठ सुवर्णमुद्रासे धर्मरूपी वृषभका निर्माण करे ॥ १-२ ॥ ३ उसके ललाटपर स्फटिकमणिका अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र सुशोभित करे । उसका खुर चाँदीसे, ग्रीवा ४ । पद्मरागमणिसे और ककुद् गोमेदसे बनाये । तदनन्तर

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अध्याय ४२ ] सुवर्णगजदानविधि

वृषाङ्कं कारयेत्तत्र किङ्किणीवलयावृतम् ।

पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले ॥

वृषेन्द्रं स्थापयेत्तत्र पश्चिमामुखमग्रतः ।

ईश्वरं पूजयेद्भक्त्या वृषारूढं वृषध्वजम् ॥

वृषेन्द्रं पूज्य गायत्र्या नमस्कृत्य समाहितः ।

तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि ।

तन्नो वृष: प्रचोदयात् ॥

मन्त्रेणानेन सम्पूज्य वृषं धर्मविवृद्धये ।

होमयेच्च घृतान्नाद्यैर्यथाविभवविस्तरम् ॥

वृषभ: पूज्य दातव्यो ब्राह्मणेभ्यः शिवाय वा ।

दक्षिणा चैव दातव्या यथावित्तानुसारतः ॥

एतद्यः कुरुते भक्त्या वृषदानमनुत्तमम् ।

शिवस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे ७२७ उसकी ग्रीवामें रत्नजटित घण्टियोंकी माला पहनाये । ५ इसके बाद छोटी - छोटी घण्टियोंकी मालासे आवृत करके शिवकी एक मूर्ति बनाये । तत्पश्चात् पूर्वमें कही गयी रीतिसे स्थान तथा कालमें वेदिकाके ऊपर ६ मण्डलमें उस वृषेन्द्रको पश्चिमाभिमुख करके स्थापित | करे ॥ ३–५१ / २ ॥ तदनन्तर उस वृषभपर आरूढ़ उन वृषध्वज शिवजीकी भक्तिपूर्वक पूजा करे । पुनः नमस्कार करके ७ समाहितचित्त होकर वृषगायत्रीमन्त्रसे वृषेन्द्रकी पूजा करे । ‘ तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि । तन्नो वृषः प्रचोदयात्'– इस मन्त्रसे वृषभकी विधिपूर्वक ८ पूजा करके धर्मकी अभिवृद्धिके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार घृत - अन्न आदिसे हवन करे । इस प्रकार सम्यक् पूजन करके उस वृषभको शिवजीको अथवा ९ ब्राह्मणोंको अर्पित कर दे । अपने धन - सामर्थ्यके अनुसार उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये । जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अत्युत्तम वृषदानको करता है, वह शिवका अनुचर १० । होकर उन्हींके साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥६–१० ॥ सुवर्णवृषदानं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' सुवर्णवृषदान ' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥

बयालीसवाँ अध्याय सुवर्णगजदानविधि सनत्कुमार उवाच गजदानं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः द्विजाय वा शिवायाथ दातव्यः पूज्य पूर्ववत् ॥ गजं सुलक्षणोपेतं हैमं वा राजतं तु वा सहस्त्रनिष्कमात्रेण तदर्थेनापि कारयेत् ॥ तदर्धार्धेन वा कुर्यात्सर्वलक्षणभूषितम् पूर्वोक्तदेशकाले च देवाय विनिवेदयेत् अष्टम्यां वा प्रदातव्यं शिवाय परमेष्ठिने ब्राह्मणाय दरिद्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये सनत्कुमार बोले— अब मैं क्रमके अनुसार । सुवर्णगजदानका यथावत् वर्णन करूँगा । पूर्वकी भाँति १ उसका विधिवत् पूजन करके उसे शिवजीको अथवा ब्राह्मणको अर्पित कर देना चाहिये ॥ १ ॥

। शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुवर्ण अथवा चाँदीका गज २ एक हजार निष्क परिमाणसे अथवा उसके आधे अर्थात् पाँच सौ निष्कसे बनवाना चाहिये; अथवा उसके । आधेके भी आधे परिमाणसे सभी लक्षणोंसे युक्त गजका ॥ ३ निर्माण कराना चाहिये और पूर्वोक्त देश तथा कालमें । उसे महादेवको अर्पित करना चाहिये । [ पूर्वोक्त देशकालके ॥४ । अभावमें ] उसे परमेष्ठी शिवको अष्टमी तिथिमें अर्पण

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[ उत्तरभाग ७२८ श्रीलिङ्गमहापुराण

शिवमुद्दिश्य दातव्यं शिवं सम्पूज्य पूर्ववत् ।

एतद्यः कुरुते दानं शिवभक्तिसमाहितम् ॥ ५

स्थित्वा स्वर्गे चिरं कालं राजा गजपतिर्भवेत् ॥ ६

| करना चाहिये अथवा शिवको उद्देश्य करके किसी धनहीन श्रोत्रिय अग्निहोत्री ब्राह्मणको इसे प्रदान करना चाहिये; पूर्वकी भाँति भगवान् शिवका सम्यक् पूजन करके इसे प्रदान करना चाहिये । जो मनुष्य शिवभक्तिसे | युक्त होकर इस गजदानको करता है, वह स्वर्ग में दीर्घकालतक निवास करके [ अगले जन्ममें ] गजपति । ( सार्वभौम ) राजा होता है ॥२-६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गजदानविधानवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' गजदानविधानवर्णन ' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥

तैंतालीसवाँ अध्याय लोकपालाष्टकमहादानविधि सनत्कुमार उवाच

लोकपालाष्टकं दिव्यं साक्षात्परमदुर्लभम् ।

सर्वसम्पत्रं गुह्यं परचक्रविनाशनम् ॥ १

स्वदेशरक्षणं दिव्यं गजवाजिविवर्धनम् ।

पुत्रवृद्धिकरं पुण्यं गोब्राह्मणहितावहम् ॥ २

पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले ।

मध्ये शिवं समभ्यर्च्य यथान्यायं यथाक्रमम् ॥ ३

दिग्विदिक्षु प्रकर्तव्यं स्थण्डिलं वालुकामयम् ।

अष्टौ विप्रान् समभ्यर्च्य वेदवेदाङ्गपारगान् ॥४

जितेन्द्रियान् कुलोद्भूतान् सर्वलक्षणसंयुतान् ।

शिवाभिमुखमासीनानाहतेष्वम्बरेषु च ॥५

वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैर्लोकपालकमन्त्रकैः गन्धपुष्पैः सुधूपैश्च ब्राह्मणानर्चयेत्क्रमात् ॥ ६

पूर्वतो होमयेदग्नौ लोकपालकमन्त्रकैः ।

समिद्धृताभ्यां होतव्यमग्निकार्यं क्रमेण वा ॥ ७

एवं हुत्वा विधानेन आचार्यः शिववत्सलः ।

यजमानं समाहूय सर्वाभरणभूषितान् ॥ ८ ।

सनत्कुमार बोले- अब मैं लोकपालाष्टकदानका वर्णन करता हूँ; जो दिव्य, परम दुर्लभ, समस्त | सम्पदाओंको प्रदान करनेवाला, गोपनीय, शत्रुके राज्यका विनाश करनेवाला, अपने देशकी रक्षा करनेवाला, प्रशस्त, हाथी - घोड़े आदिकी वृद्धि करनेवाला, पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाला, पुण्यदायक तथा गो - ब्राह्मणका कल्याण करनेवाला है॥१-२ ॥ पूर्वोक्त देशकालमें वेदीके ऊपर मण्डलका निर्माण करके उसके मध्यमें शिवको स्थापित करके उनकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनेके अनन्तर आठों दिशाओंमें बालुकामय स्थण्डिल बनाना चाहिये । तत्पश्चात् उन आठों वेदियोंपर नवीन वस्त्रके आसनोंपर वेदवेदांगमें पारंगत, जितेन्द्रिय, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न आठ विप्रोंको शिवाभिमुख आसीन करके उनका पूजन करे । दिव्य वस्त्रों तथा आभूषणोंसे अलंकृत करके गन्ध, पुष्प एवं उत्तम धूप – इन उपचारोंसे लोकपाल - मन्त्रोंके द्वारा उन ब्राह्मणोंकी क्रमसे पूजा करनी चाहिये ॥३–६ ॥ तदनन्तर पूर्वकी भाँति अग्निमें होम करना चाहिये; लोकपालमन्त्रोंके द्वारा घृत तथा समिधासे क्रमपूर्वक अग्निकार्य ( हवन ) करना चाहिये । इस प्रकार विधानपूर्वक हवन करके शिवभक्त आचार्यको चाहिये कि यजमानको बुलाकर उसके द्वारा सभी आभरणोंसे भूषित विप्रोंकी