श्रीगणेशाय नमः।

लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 751–760

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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अध्याय ५१ ] भगवान् शिवकी संहारिका शक्तिके माहात्म्यमेंवृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा ७४ ९ तत्कपालं नखं क्षेत्रे गृहे वा नगरेऽपि वा । हे सुव्रतो! सूर्यग्रहण- चन्द्रग्रहण लगनेपर या शत्रुकी प्रेतस्थानेऽपि वा राष्ट्र मृतवस्त्रेण वेष्टयेत् ॥ ४३ आठवीं राशिमें इनके होनेपर इसी मन्त्रसे आदिसे नख शत्रोरष्टमराशौ वा परिविष्टे दिवाकरे । युक्त उस कपालको शववस्त्र के टुकड़ेमें लपेट ले और सोमे वा परिविष्टे तु मन्त्रेणानेन सुव्रताः ॥४४ उसे शत्रुके खेत, घर, श्मशानभूमि, नगर या देशमें गाड़

स्थाननाशो भवेत्तस्य शत्रोर्नाशश्च जायते ।

शत्रुं राज्ञः समालिख्य गमने समवस्थिते ॥

भूतले दर्पणप्रख्ये वितानोपरि शोभिते ।

चतुस्तोरणसंयुक्ते दर्भमालासमावृते ॥

वेदाध्ययनसम्पन्ने राष्ट्रे वृद्धिप्रकाशके ।

दक्षिणेन तु पादेन मूर्हिन सन्ताडयेत्स्वयम् ॥

एवं कृते नृपेन्द्रस्य शत्रुनाशो भविष्यति ।

स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य यः कुर्यादाभिचारिकम् ॥

स आत्मानं निहत्यैव स्वकुलं नाशयेत्कुधीः ।

तस्मात्स्वराष्ट्रगोप्तारं नृपतिं पालयेत्सदा ॥

मन्त्रौषधिक्रियाद्यैश्च सर्वयत्नेन सर्वदा ।

एतद्रहस्यं कथितं न देयं यस्य कस्यचित् ॥

दे । ऐसा करनेपर वह शत्रु अपने पदसे च्युत हो जायगा और उसका नाश हो जायगा । विजयके लिये गमनकाल ४५ उपस्थित होनेपर अपने राजाके शत्रुके चित्रको दर्पण– सदृश भूमिपर, जो वितानसे सुशोभित हो, चार तोरणोंसे ४६ | युक्त हो, कुशकी मालाओंसे सुशोभित हो और जहाँ राष्ट्रकी समृद्धिका सूचक वैदिक मन्त्रोच्चार हो रहा हो, लिख करके आचार्य अपने दाहिने पैरसे शत्रुके सिरपर ४७ प्रहार करे; ऐसा करनेपर अपने राजाके शत्रुका नाश हो जायगा । जो व्यक्ति अपने देशके राजाको उद्देश्य करके ४८ यह अभिचार - कर्म करता है, वह दुर्बुद्धि अपनेको नष्ट करके अपने कुलका नाश कर डालता है । अतः आचार्यको सदा मन्त्रों, औषधियों तथा अनुष्ठानोंके द्वारा सभी प्रयत्नोंसे ४ ९ अपने देशकी रक्षा करनेवाले राजाकी निरन्तर रक्षा करनी चाहिये । [ हे ऋषियो! ] मैंने जो यह रहस्य आपलोगों से ५० । कहा, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये ॥४३–५० ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽघोरमन्त्रसाधनशत्रुनाशविधानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' अघोरमन्त्रसाधनशत्रुनाशविधानवर्णन ' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥

इक्यावनवाँ अध्याय भगवान् शिवकी संहारिका शक्ति - वज्रेश्वरीविद्याके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा ऋषय ऊचुः निग्रहोऽघोररूपोऽयं कथितोऽस्माकमुत्तमम् वज्रवाहनिकां विद्यां वक्तुमर्हसि सत्तम ॥ सूत उवाच वज्रवाहनिका नाम सर्वशत्रुभयङ्करी अनया सेचयेद्वज्रं नृपाणां साधयेत्तथा वज्रं कृत्वा विधानेन तद्वज्रमभिषिच्य च अनया विद्यया तस्मिन् विन्यसेत्काञ्चनेन च ततश्चाक्षरलक्षं च जपेद्विद्वान् समाहितः वज्री दशांशं जुहुयाद्वज्रकुण्डे घृतादिभिः ऋषिगण बोले- हे सत्तम! आपने भयंकररूपवाले । इस उत्तम निग्रहके विषयमें हम लोगोंको बता दिया; १ अब वज्रवाहनिकाविद्याका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये ॥ १ ॥

। सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] वज्रवाहनिका नामक ॥ २ यह विद्या सभी शत्रुओंके लिये भयंकर है । इस । विद्यासे वज्रका सेचन करे और उसे राजाओंको ॥ ३ समर्पित करे । विधानपूर्वक वज्रका निर्माण करके और । इस विद्यासे वज्रको जलद्वारा सिंचित करके उस ॥ ४ । वज्रपर स्वर्णसे मन्त्र लिखना चाहिये । तत्पश्चात् विद्वान्को

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७५० तद्वज्रं गोपयेन्नित्यं दापयेन्नृपतेस्ततः तेन वज्रेण वै गच्छञ्छत्रूञ्जीयाद्रणाजिरे पुरा पितामहेनैव लब्धा विद्या प्रयत्नतः देवी शक्रोपकारार्थं साक्षाद्वज्रेश्वरी तथा पुरा त्वष्टा प्रजानाथो हतपुत्रः सुरेश्वरात् विद्यया हरत: सोममिन्द्रवैरेण सुव्रताः तस्मिन् यज्ञे यथाप्राप्तं विधिनोपकृतं हविः तदैच्छत महाबाहुर्विश्वरूपविमर्दनः मत्पुत्रमवधीः शक्र न दास्ये तव शोभनम् । भागं भागार्हता नैव विश्वरूपो हतस्त्वया

इत्युक्त्वा चाश्रमं सर्वं मोहयामास मायया ।

ततो मायां विनिर्भिद्य विश्वरूपविमर्दनः ॥

प्रसह्य सोममपिबत्सगणैश्च शचीपतिः ।

ततस्तच्छेषमादाय क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ॥

इन्द्रस्य शत्रो वर्धस्व स्वाहेत्यग्नौ जुहाव ह ।

ततः कालाग्निसङ्काशो वर्तनाद्वृत्रसंज्ञितः ॥

प्रादुरासीत्सुरेशारिर्दुद्राव च वृषान्तकः ।

ततः किरीटी भगवान् परित्यज्य दिवं क्षणात् ॥

सहस्रनेत्रः सगणो दुद्राव भयविह्वलः ।

तदा तमाह स विभुर्हृष्टो ब्रह्मा च विश्वसृट् ॥

त्यक्त्वा वज्रं तमेतेन जहीत्यरिमरिन्दमः ।

सोऽपि सन्नह्य देवेन्द्रो देवैः सार्धं महाभुजः ॥

निहत्य चाप्रयत्नेन गतवान् विगतज्वरः ।

तस्माद्वज्रेश्वरीविद्या सर्वशत्रुभयङ्करी ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । । चाहिये कि दत्तचित्त होकर अक्षरोंकी संख्या बराबर ॥ ५ लाख संख्यामें जप करे । वज्रीको उस जपका दशांश घृत आदिसे वज्राकार कुण्डमें हवन करना चाहिये ॥ उस वज्रकी नित्य रक्षा करनी चाहिये और बादमें उसे ॥ ६ राजाको प्रदान कर देना चाहिये । उस वज्रसहित रणभूमिमें जानेवाला वह राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त । करता है ॥२-५ ॥ ॥ ७ पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माने इन्द्रपर उपकार करनेके लिये भगवान् महेश्वरसे इस साक्षात् देवी वज्रेश्वरीविद्याको । प्रयत्नपूर्वक प्राप्त किया था । हे सुव्रतो! विश्वरूपसे ॥ ८ प्राप्त विद्याके बलपर विश्वरूपविमर्दक महाबाहु इन्द्र उस यज्ञमें विधिपूर्वक दी हुई हवि ( सोमरस ) - को जब चाहने लगे, तब हतपुत्र प्रजापति त्वष्टाने इन्द्रसे ॥ ९ कहा - ' हे शक्र! तुमने मेरे पुत्रका वध किया है, अतः मैं तुम्हारा श्रेष्ठ भाग तुम्हें नहीं दूँगा । तुम अपना भाग प्राप्त करनेयोग्य नहीं हो; क्योंकि तुम्हारे द्वारा विश्वरूपका १० वध किया गया है ' – ऐसा कहकर त्वष्टाने अपनी मायासे सम्पूर्ण आश्रमको मोहित कर दिया । तब विश्व-रूपका वध करनेवाले शचीपति इन्द्रने उस मायाका ११ भेदन करके बलपूर्वक अपने गणोंके साथ सोमका पान कर लिया । तत्पश्चात् अवशिष्ट सोमको लेकर क्रोधाविष्ट प्रजापति त्वष्टाने ' इन्द्रस्य शत्रो वर्धस्व १२ स्वाहा ' - ऐसा कहकर अग्निमें उसे होम कर दिया । उसी क्षण हवनकुण्डसे कालाग्निसदृश असुर प्रकट १३ हुआ, जो अपने व्यवहारके कारण वृत्र संज्ञावाला हुआ । उस इन्द्रशत्रुने उन्हें दौड़ा लिया । तब किरीटधारी तथा हजार नेत्रोंवाले भगवान् इन्द्र स्वर्ग छोड़कर भयसे १४ व्याकुल हो अपने गणोंसहित भाग चले [ और वे ब्रह्माके पास गये ] ॥६–१३ / २ ॥ तब विश्वका सृजन करनेवाले प्रभु ब्रह्माने उनसे १५ कहा – हे शत्रुसंहारक! वज्र त्यागकर आप इस मन्त्र ( वज्रेश्वरीविद्या ) -के द्वारा उस शत्रुका वध कीजिये । तब शत्रुनाशक वे महाभुज देवेन्द्र भी सावधान होकर १६ | देवताओंके साथ बिना प्रयत्न ही उसे मारकर चिन्तामुक्त

पृष्ठ 753

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अध्याय ५२ ] वज्रेश्वरीविद्याकी

मदेहा राक्षसा नित्यं विजिता विद्ययैव तु ।

विद्यां सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रमोचनीम् ॥१७

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ फट् जहि हुं फट् छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा ।

विद्या वज्रेश्वरीत्येषा सर्वशत्रुभयङ्करी ।

अनया संहृतिः शम्भोर्विद्यया पुनिपुङ्गवाः ॥ १८ ॥

सिद्धिका विधान ७५१ । होकर वहाँसे चले गये ॥ १४-१५१ / २ ॥ अतः वज्रेश्वरीविद्या सब प्रकारके शत्रुओंके लिये भयंकर है । मन्देह नामक राक्षस इसी विद्याके द्वारा सदा पराजित हुए । सभी पापोंका नाश करनेवाली उस विद्याको मैं बता रहा हूँ – ' ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ फट् जहि हुं फट् छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा ' – यह वज्रेश्वरीविद्या है, जो सब प्रकारके शत्रुओंके लिये भयंकर है । हे मुनिश्रेष्ठो! इसी विद्याके द्वारा शिवजी [ विश्वका ] संहार | करते हैं॥१६–१८ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वज्रेश्वरीविद्यावर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' वज्रेश्वरीविद्यावर्णन ' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥

बावनवाँ अध्याय वज्रेश्वरीविद्याकी ऋषय ऊचुः

श्रुता वज्रेश्वरी विद्या ब्राह्मी शक्रोपकारिणी ।

अनया सर्वकार्याणि नृपाणामिति नः श्रुतम् ॥ १

विनियोगं वदस्वास्या विद्याया रोमहर्षण । सूत उवाच वश्यमाकर्षणं चैव विद्वेषणमतः परम् ॥ २

उच्चाटनं स्तम्भनं च मोहनं ताडनं तथा ।

उत्सादनं तथा छेदं मारणं प्रतिबन्धनम् ॥ ३

सेनास्तम्भनकादीनि सावित्र्या सर्वमाचरेत् ।

आगच्छ वरदे देवि भूम्यां पर्वतमूर्धनि ॥ ४

ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ।

उद्वास्यानेन मन्त्रेण गन्तव्यं नान्यथा द्विजाः ॥ ५

प्रतिकार्यं तथा बाह्यं कृत्वा वश्यादिकां क्रियाम् ।

उद्वास्य वह्निमाधाय पुनरन्यं यथाविधि ॥ ६

देवीमावाह्य च पुनर्जपेत्सम्पूजयेत्पुनः ।

होमं च विधिना वह्नौ पुनरेव समाचरेत् ॥ ७

सिद्धिका विधान ऋषिगण बोले- हे रोमहर्षण! हमलोगोंने इन्द्रका उपकार करनेवाली ब्रह्माकी वज्रेश्वरीविद्याका श्रवण किया । इसके द्वारा राजाओंके सब कार्य सिद्ध होते हैं— ऐसा हमने सुना है; अब आप इस विद्याके विनियोगका वर्णन करें ॥११ / २ ॥ सूतजी बोले- सावित्रीमन्त्र के द्वारा वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, उच्चाटन, स्तम्भन, मोहन, ताड़न, उत्सादन, छेदन, मारण, प्रतिबन्धन, सेनास्तम्भन आदि क्रियाएँ तथा अन्य सब कुछ करना चाहिये [ आवाहन-मन्त्र इस प्रकार है- ] ' आगच्छ वरदे देवि भूम्यां पर्वतमूर्धनि । ' [ विसर्जन - मन्त्र इस प्रकार है— ] ' ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् । ' हे द्विजो! शत्रुके प्रति समस्त बाह्य तथा वश्य आदि क्रियाएँ करके इस मन्त्रसे उद्वासन ( विसर्जन ) करके ही बाहर जाना चाहिये; इसके विपरीत नहीं करना चाहिये । देवीका विसर्जन करनेके अनन्तर पुनः विधिपूर्वक दूसरी अग्निकी स्थापना करके देवीका । आवाहनकर फिरसे जप तथा पूजन करना चाहिये ।

पृष्ठ 754

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७५२ सर्वकार्याणि विधिना साधयेद्विद्यया पुनः । जातीपुष्पैश्च वश्यार्थी जुहुयादयुतत्रयम् 666666666 ॥ घृतेन करवीरेण कुर्यादाकर्षणं द्विजाः । विद्वेषणं विशेषेण कुर्याल्लाङ्गलकस्य च तैलेनोच्चाटनं प्रोक्तं स्तम्भनं मधुना स्मृतम् । श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । इसके बाद अग्निमें विधिपूर्वक हवन करना चाहिये । ८ इस प्रकार इस विद्याके द्वारा सभी कार्य सिद्ध करना चाहिये ॥ २-७ -७१/२ ॥ शत्रुको वशमें करनेकी इच्छावालेको जाती पुष्पोंसे तीस हजार आहुति देनी चाहिये । हे द्विजो! घृत तथा ॥ ९ करवीर ( कनेर ) - के पुष्पके हवनसे आकर्षण-कृत्य करना चाहिये और विद्वेषणकर्मके लिये लांगलक पुष्पका हवन करना चाहिये । तैलके हवनसे उच्चाटन तथा मधुके हवनसे स्तम्भन बताया गया है । इसी तिलेन मोहनं प्रोक्तं ताडनं रुधिरेण च ॥१० प्रकार तिलके हवनसे मोहन तथा पशु - शोणितके हवनसे ताड़न बताया गया है । हे सुव्रतो! सरसोंके द्वारा हवनसे स्तम्भन, कुशके द्वारा हवनसे पाटन, रोहीके खरस्य च गजस्याथ उष्ट्रस्य च यथाक्रमम् । बीजके द्वारा हवनसे मारण - उच्चाटन, अहिपत्र स्तम्भनं सर्षपेणापि पाटनं च कुशेन च ॥ ११

मारणोच्चाटने चैव रोहीबीजेन सुव्रताः ।

बन्धनं त्वहिपत्रेण सेनास्तम्भमतः परम् ॥

कुनट्या नियतं विद्यात्पूजयेत्परमेश्वरीम् ।

घृतेन सर्वसिद्धिः स्यात्पयसा वा विशुद्धयते ॥

तिलेन रोगनाशश्च कमलेन धनं भवेत् ।

कान्तिर्मधूकपुष्पेण सावित्र्या ह्ययुतत्रयम् ॥

जयादिप्रभृतीन् सर्वान् स्विष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम् ।

एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो विनियोगोऽतिविस्तृतः ॥

जपेद्वा केवलां विद्यां सम्पूज्य च विधानतः ।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥

( नागवल्लीपत्र ) - के द्वारा बन्धन और कुनटी ( मनःशिला ) - के द्वारा हवनसे सेनास्तम्भन कृत्यकी सिद्धि जाननी चाहिये । इस प्रकार नियमपूर्वक परमेश्वरीका १२ पूजन करना चाहिये । [ अब सात्त्विक कामनाओंकी सिद्धि करनेवाले हवन- द्रव्योंको बताया जाता है— ] घृतके हवनसे सब प्रकारकी सिद्धि होती है और दुग्धके हवनसे साधक शुद्ध हो जाता है । तिलके १३ होमसे रोगका नाश हो जाता है, कमलपुष्पके हवनसे धन प्राप्त होता है और महुएके पुष्पके हवनसे कान्ति प्राप्त होती है । प्रत्येक हवनमें तीस हजार सावित्री - मन्त्रका उच्चारण होना चाहिये । जया, अभ्यातान १४ तथा राष्ट्रभृत् होम करके अन्तमें स्विष्टकृत् होम पूर्ववत् कहा गया है । [ हे ऋषियो! ] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अत्यन्त विस्तारवाले इस विनियोगका १५ वर्णन कर दिया । अथवा [ हवन न होनेकी स्थितिमें ] केवल विधिपूर्वक वज्रेश्वरीविद्याका पूजन करके उसका जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला समस्त सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना १६ | चाहिये ॥ ८–१६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वश्याकर्षणादिप्रयोगवर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' वश्याकर्षणादिप्रयोगवर्णन ' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 755

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अध्याय ५४ ] मृत्युहर त्रियम्बकमन्त्रका माहात्म्यतथा मन्त्रका व्याख्यान ७५३ तिरपनवाँ अध्याय मृत्युंजयहवन - विधान ऋषय ऊचुः

मृत्युञ्जयविधिं सूत ब्रह्मक्षत्रविशामपि ।

वक्तुमर्हसि चास्माकं सर्वज्ञोऽसि महामते ॥

सूत उवाच

मृत्युञ्जयविधिं वक्ष्ये बहुना किं द्विजोत्तमाः ।

रुद्राध्यायेन विधिना घृतेन नियुतं क्रमात् ॥

घृतेन तिनैव कमलेन प्रयत्नतः ।

दूर्वया घृतगोक्षीरमिश्रया मधुना तथा ॥

चरुणा सघृतेनैव केवलं पयसापि वा ।

जुहुयात्कालमृत्योर्वा प्रतीकारः प्रकीर्तितः ॥

ऋषिगण बोले- हे सूतजी! ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंके कल्याणके लिये आप हमलोगोंको १ मृत्युंजयविधि बतानेकी कृपा कीजिये; हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं ॥ १ ॥

सूतजी बोले- हे उत्तम द्विजो! मैं [ आपलोगोंको ] मृत्युंजय विधान बताऊँगा; बहुत कहनेसे क्या लाभ! २ | रुद्राध्यायके मन्त्रोंद्वारा घृतसे एक लाख बार क्रमशः हवन करे अथवा घृतमिश्रित तिलसे, कमल पुष्पसे, गायके घी तथा दूध मिश्रित दूर्वासे, मधुसे, घृतयुक्त चरुसे अथवा ३ केवल दुग्धसे ही प्रयत्नपूर्वक हवन करना चाहिये । इस | विधानको कालमृत्यु अथवा महामृत्युका प्रतीकार कहा ४ | गया है ॥ २–४ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे मृत्युञ्जयविधिवर्णनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ' मृत्युंजयविधिवर्णन ' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

चौवनवाँ अध्याय मृत्युहर त्रियम्बकमन्त्रका सूत उवाच

त्रियम्बकेण मन्त्रेण देवदेवं त्रियम्बकम् ।

पूजयेद्बाणलिङ्गे वा स्वयम्भूतेऽपि वा पुनः ॥

आयुर्वेदविदैर्वापि यथावदनुपूर्वशः ।

अष्टोत्तरसहस्रेण पुण्डरीकेण शङ्करम् ॥

कमलेन सहस्त्रेण तथा नीलोत्पलेन वा ।

सम्पूज्य पायसं दत्त्वा सघृतं चौदनं पुनः ॥

मुद्गान्नं मधुना युक्तं भक्ष्याणि सुरभीणि च ।

अग्नौ होमश्च विपुलो यथावदनुपूर्वशः ॥

पूर्वोक्तैरपि पुष्पैश्च चरुणा च विशेषतः ।

जपेद्वै नियुतं सम्यक् समाप्य च यथाक्रमम् ॥

ब्राह्मणानां सहस्त्रं च भोजयेद्वै सदक्षिणम् ।

गवां सहस्रं दत्त्वा तु हिरण्यमपि दापयेत् ॥

माहात्म्य तथा मन्त्रका व्याख्यान सूतजी बोले- बाणलिङ्गमें अथवा स्वयम्भूलिङ्गमें त्रियम्बकमन्त्र के द्वारा देवाधिदेव त्रियम्बककी पूजा १ चाहिये । आयुर्वेदके ज्ञाताओंको चाहिये कि पूर्वोक्त विधिसे एक हजार आठ श्वेत कमलोंसे अथवा एक २ हजार रक्तकमलोंसे अथवा एक हजार नील कमलोंसे शंकरजीका पूजन करके खीर, घृतयुक्त ओदन ( भात ), ३ मधुमिश्रित मुद्गान्न तथा अन्य सुगन्धित भक्ष्य - पदार्थ अर्पण करके पूर्व अध्यायमें कथित घृत आदि द्रव्योंके क्रमसे, पूर्वोक्त पुष्पोंसे और विशेषकर चरुसे यथाविधि ४ अग्निमें दस हजार हवन करना चाहिये और एक लाख जप करना चाहिये । सम्यक् प्रकारसे उचित क्रममें सम्पूर्ण ५ कार्य सम्पन्न करके हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये; हजार गायें ६ । प्रदान करके स्वर्ण भी देना चाहिये॥१–६ ॥

पृष्ठ 756

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७५४ एतद्वः कथितं सर्वं सरहस्यं समासतः । शिवेन देवदेवेन शर्वेणात्युग्रशूलिना

कथितं मेरुशिखरे स्कन्दायामिततेजसे ।

स्कन्देन देवदेवेन ब्रह्मपुत्राय धीमते ॥

साक्षात्सनत्कुमारेण सर्वलोकहितैषिणा ।

पाराशर्याय कथितं पारम्पर्यक्रमागतम् ॥

शुके गते परंधाम दृष्ट्वा रुद्रं त्रियम्बकम् ।

गतशोको महाभागो व्यासः पर ऋषिः प्रभुः ॥

स्कन्दस्य सम्भवं श्रुत्वा स्थिताय च महात्मने ।

त्रियम्बकस्य माहात्म्यं मन्त्रस्य च विशेषतः ॥

कथितं बहुधा तस्मै कृष्णद्वैपायनाय वै ।

तत्सर्वं कथयिष्यामि प्रसादादेव तस्य वै ॥

देवं सम्पूज्य विधिना जपेन्मन्त्रं त्रियम्बकम् ।

मुच्यते सर्वपापैश्च सप्तजन्मकृतैरपि ॥

सङ्ग्रामे विजयं लब्ध्वा सौभाग्यमतुलं भवेत् ।

लक्षहोमेन राज्यार्थी राज्यं लब्ध्वा सुखी भवेत् ॥

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति नियुतेन न संशयः ।

धनार्थी प्रयुतेनैव जपेदेव न संशयः ॥

धनधान्यादिभिः सर्वैः सम्पूर्णः सर्वमङ्गलैः ।

क्रीडते पुत्रपौत्रैश्च मृतः स्वर्गे प्रजायते ॥

नानेन सदृशो मन्त्रो लोके वेदे च सुव्रताः ।

तस्मात्त्रियम्बकं देवं तेन नित्यं प्रपूजयेत् ॥

अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं भवेत् ।

त्रयाणामपि लोकानां गुणानामपि यः प्रभुः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सम्पूर्ण बातें संक्षेपमें ॥ ७ आप लोगोंको बता दीं । अत्यन्त उग्र शूल धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् शिवने मेरु शिखरपर अमित तेजवाले कार्तिकेयजीको इसे बताया था । तत्पश्चात् ८ देवोंके देव उन कार्तिकेयने बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारको बताया और पुनः उन लोकहितैषी सनत्कुमारने इसे पराशरपुत्र व्यासको बताया; इस ९ प्रकार परम्पराक्रमसे यह प्रकाशमें आया ॥७ – ९ ॥ त्रियम्बक रुद्रका दर्शन करके शुकदेवजीके मोक्षपद प्राप्त कर लेनेके अनन्तर महाभाग महर्षि भगवान् १० व्यासजी शोकको प्राप्त हुए । उस समय स्कन्दके प्रादुर्भावको सुनकर वहाँपर स्थित महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासजीको सनत्कुमारने त्रियम्बकमन्त्रके माहात्म्यको ११ बहुत प्रकारसे बताया था । मैं उन्हींकी कृपासे आप लोगोंको वह सब बताऊँगा ॥ १० - १२ ॥ महादेवकी सम्यक् पूजा करके विधिपूर्वक १२ त्रियम्बकमन्त्रका जप करना चाहिये । इसके प्रभावसे मनुष्य सात जन्मोंके किये गये सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; संग्राममें विजय प्राप्त करके वह अतुलनीय १३ सौभाग्य प्राप्त करता है । राज्यकी कामना करनेवाला व्यक्ति एक लाख हवनसे राज्य प्राप्त करके सुखी हो जाता । पुत्रकी इच्छावाला एक लाख होमसे पुत्र १४ प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है । धन चाहनेवालेको एक करोड़ त्रियम्बक - मन्त्रका जप करना चाहिये और १५ देव त्रियम्बककी सदा पूजा करनी चाहिये; उससे वह मनुष्य सभी प्रकारके मंगलोंसहित पुत्र - पौत्रोंके साथ सुखमय जीवन व्यतीत करता है और मृत्युके अनन्तर १६ स्वर्गमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है । हे सुव्रतो! इस त्रियम्बकमन्त्रके समान इस लोकमें तथा वेदमें कोई भी मन्त्र नहीं है । अतः इस मन्त्रसे १७ भगवान् त्रियम्बककी नित्य पूजा करनी चाहिये — ऐसा करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका आठ गुना फल होता है ॥ १३–१७१ / २ ॥ १८ [ त्रियम्बक शब्दकी व्याख्या इस प्रकार है- ]

पृष्ठ 757

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अध्याय ५४ ] मृत्युहर त्रियम्बकमन्त्रका माहात्म्य वेदानामपि देवानां ब्रह्मक्षत्रविशामपि । अकारोकारमकाराणां मात्राणामपि वाचकः तथा सोमस्य सूर्यस्य वह्नेरग्नित्रयस्य च । अम्बा उमा महादेवो ह्यम्बकस्तु त्रियम्बकः सुपुष्पितस्य वृक्षस्य यथा गन्धः सुशोभनः । वाति दूरात्तथा तस्य गन्धः शम्भोर्महात्मनः तस्मात्सुगन्धो भगवान् गन्धारयति शङ्करः । गान्धारश्च महादेवो देवानामपि लीलया सुगन्धस्तस्य लोकेऽस्मिन् वायुर्वाति नभस्तले तस्मात्सुगन्धिस्तं देवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥ यस्य रेतः पुरा शम्भोर्हरेर्योनौ प्रतिष्ठितम् । तस्य वीर्यादभूदण्डं हिरण्मयमजोद्भवम् चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ भूर्भुवः स्वर्महस्तपः । सत्यलोकमतिक्रम्य पुष्टिर्वीर्यस्य तस्य वै पञ्चभूतान्यहङ्कारो बुद्धिः प्रकृतिरेव च । पुष्टिर्बीजस्य तस्यैव तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः

तं पुष्टिवर्धनं देवं घृतेन पयसा तथा ।

मधुना यवगोधूममाषबिल्वफलेन च ॥

कुमुदार्कशमीपत्रगौरसर्षपशालिभिः हुत्वा लिङ्गे यथान्यायं भक्त्या देवं यजामहे ऋतेनानेन मां पाशाद्द्बन्धनात्कर्मयोगतः । मृत्योश्च बन्धनाच्चैव मुक्षीय भव तेजसा उर्वारुकाणां पक्वानां यथा कालादभूत्पुनः तथैव कालः सम्प्राप्तो मनुना तेन यत्नतः तथा मन्त्रका व्याख्यान ७५५ यह तीनों लोकों, तीनों गुणों, तीनों वेदों, तीनों ॥ १ ९ देवताओं, ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य – इन तीनों वर्णोंका स्वामी । यह अकार, उकार और मकार - इन तीन मात्राओंका वाचक है । चन्द्र, सूर्य तथा वह्नि - इन तीनों अग्नियोंकी ॥ २० अम्बा ( माता ) उमा हैं । महादेव इन सबके अम्बक ( पिता ) हैं, अत: यह त्रियम्बक मन्त्र है ॥ १८–२० ॥ जिस प्रकार पुष्पित वृक्षकी अत्यन्त सुन्दर गन्ध ॥ २१ बहुत दूरसे ही फैलती है, उसी प्रकार उन परमात्मा शिवकी गन्ध जगत्में सर्वत्र व्याप्त रहती है, अतः भगवान् शिव सुगन्ध हैं । वे महादेव शंकर अपनी ॥ २२ लीलासे देवताओंको भी सुगन्धित करते हैं । जब वायु आकाशमण्डलमें प्रवाहित होती है, तब उन । शिवकी सुगन्ध जगत्में फैलती है । अतः सुगन्धिमय २३ | होनेसे उन प्रभुको ' सुगन्धि ' तथा ‘ पुष्टिवर्धन ’ कहा जाता है | २१-२३ ॥ पूर्वकालमें जिन शम्भुका तेज ( वीर्य ) भगवान् ॥ २४ विष्णुकी योनि स्थापित हुआ, उनके उस तेजसे सुवर्णमय अण्ड निर्मित हुआ, जो ब्रह्माकी उत्पत्तिका कारण बना । उनके वीर्यका पोषण चन्द्रमा, सूर्य, सभी ॥२५ नक्षत्र, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, तप: लोक और सत्यलोकसे भी आगे बढ़कर हुआ; उन्हींके बीजसे पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति - ये सब ॥ २६। पुष्टिको प्राप्त हुए । अतः वे शिव पुष्टिवर्धन संज्ञावाले हैं ॥ २४-२६ ॥ घृत, दुग्ध, मधु, जौ, गेहूँ, उड़द, बेलका फल, २७ कुमुद, अर्क, शमीपत्र, श्वेत सरसों तथा शालिधानसे I विधिपूर्वक हवन करके हम शिवलिङ्गमें उन पुष्टिवर्धन ॥ २८ भगवान् शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं । हे भव! इस पूजनविधिके प्रभावसे हम कर्मजन्य पाशबन्धनसे और मृत्युबन्धनसे मुक्त हो जायँ । जैसे यथासमय ॥ २ ९ पके हुए ककड़ी - फल ( फूट ) -की उसके वृक्षसे मुक्ति हो जाती है, वैसे ही कालके उपस्थित होनेपर । उस मन्त्रके प्रभावसे काल - बन्धनसे हमारी मुक्ति हो ॥ ३० जाय ॥ २७-३० ॥

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७५६ एवं मन्त्रविधिं ज्ञात्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् । तस्य पाशक्षयोऽतीव योगिनो मृत्युनिग्रहः त्रियम्बकसमो नास्ति देवो वा घृणयान्वितः । प्रसादशीलः प्रीतश्च तथा मन्त्रोऽपि सुव्रताः

तस्मात्सर्वं परित्यज्य त्रियम्बकमुमापतिम् ।

त्रियम्बकेण मन्त्रेण पूजयेत्सुसमाहितः ॥

सर्वावस्थां गतो वापि मुक्तोऽयं सर्वपातकैः ।

शिवध्यानान्न सन्देहो यथा रुद्रस्तथा स्वयम् ॥

हत्वा भित्त्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा ।

शिवमेकं सकृत्स्मृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग इस प्रकार मन्त्रकी विधिको जानकर शिवलिङ्गकी ॥ ३१ पूजा करनी चाहिये । ऐसा करनेसे उस योगीके पाश ( बन्धन ) –का पूर्णरूपसे विनाश और उसके मृत्युका निग्रह हो जाता है । हे सुव्रतो! त्रियम्बकके समान कोई ॥ ३२ अन्य देवता दयालु नहीं हैं; वे सरलतासे प्रसन्न होनेवाले तथा प्रेममय हैं, उनका मन्त्र भी वैसा ही है । अतः सब कुछ छोड़कर दत्तचित्त होकर त्रियम्बकमन्त्रसे उमापति ३३ त्रियम्बककी पूजा करनी चाहिये । किसी भी दशाको प्राप्त मनुष्य शिवके ध्यानसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और ३४ । जैसे रुद्र हैं; वैसे ही स्वयं हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । प्राणियोंका छेदन - भेदन करके तथा अन्यायपूर्वक वस्तुओंका भोग करके भी मनुष्य एकमात्र शिवका केवल एक बार ३५ । ध्यान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३१–३५ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णनं नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘ सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णन ' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥

पचपनवाँ अध्याय योगमार्ग द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपत -योगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य ऋषय ऊचुः कथं त्रियम्बको देवो देवदेवो वृषध्वजः ध्येयः सर्वार्थसिद्ध्यर्थं योगमार्गेण सुव्रत पूर्वमेवापि निखिलं श्रुतं श्रुतिसमं पुनः । विस्तरेण च तत्सर्वं सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि सूत उवाच एवं पैतामहेनैव नन्दी दिनकरप्रभः । मेरुपृष्ठे पुरा पृष्टो मुनिसङ्घैः समावृतः

सोऽपि तस्मै कुमाराय ब्रह्मपुत्राय सुव्रताः ।

मिथः प्रोवाच भगवान् प्रणताय समाहितः ॥

नन्दिकेश्वर उवाच

एवं पुरा महादेवो भगवान्नीललोहितः ।

गिरिपुत्र्याम्बया देव्या भगवत्यैकशय्यया ॥

पृष्टः कैलासशिखरे हृष्टपुष्टतनूरुहः । ऋषिगण बोले - हे सुव्रत! सभी मनोरथोंकी । सिद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा तीन नेत्रोंवाले, देवोंके ॥ १ भी देव तथा वृषकी ध्वजावाले भगवान् शिवका ध्यान किस प्रकार करना चाहिये? पूर्वमें भी हम आपसे ॥ २ वेदतुल्य जो सम्पूर्ण प्रसंग विस्तारपूर्वक सुन चुके हैं, वह सब संक्षेपमें बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले- हे सुव्रतो! इसी प्रकार पूर्वकालमें ॥ ३ मेरुपर्वतके शिखरपर ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारने सूर्यके समान प्रभावाले तथा मुनियोंसे घिरे हुए नन्दीसे पूछा था । तब ४ भगवान् नन्दी भी उन विनम्र ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारसे समाहितचित्त होकर कहने लगे ॥ ३-४ ॥ नन्दिकेश्वर बोले — यही बात पूर्व समयमें ५ कैलास शिखरपर एक ही शय्यापर साथ - साथ विराजमान हिमालयपुत्री भगवती देवी पार्वतीने पुलकित रोमोंवाले

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अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् श्रीदेव्युवाच योगः कतिविधः प्रोक्तस्तत्कथं चैव कीदृशम् ॥ ६ ज्ञानं च मोक्षदं दिव्यं मुच्यन्ते येन जन्तवः । श्रीभगवानुवाच प्रथमो मन्त्रयोगश्च स्पर्शयोगो द्वितीयकः ॥ ७

भावयोगस्तृतीयः स्यादभावश्च चतुर्थकः ।

सर्वोत्तमो महायोगः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥ ८

ध्यानयुक्तो जपाभ्यासो मन्त्रयोगः प्रकीर्तितः ।

नाडीशुद्ध्यधिको यस्तु रेचकादिक्रमान्वितः ॥ ९

समस्तव्यस्तयोगेन जयो वायोः प्रकीर्तितः ।

बलस्थिरक्रियायुक्तो धारणाद्यैश्च शोभनैः ॥ १०

धारणात्रयसन्दीप्तो भेदत्रयविशोधकः ।

कुम्भकावस्थितोऽभ्यासः स्पर्शयोगः प्रकीर्तितः ॥ ११ ।

मन्त्रस्पर्शविनिर्मुक्तो महादेवं समाश्रितः ।

बहिरन्तर्विभागस्थस्फुरत्संहरणात्मकः ॥ १२

भावयोगः समाख्यातश्चित्तशुद्धिप्रदायकः ।

विलीनावयवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १३

शून्यं सर्वं निराभासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते ।

अभावयोगः सम्प्रोक्तश्चित्तनिर्वाणकारकः ॥ १४

नीरूपः केवलः शुद्धः स्वच्छन्दं च सुशोभनः ।

अनिर्देश्यः सदालोकः स्वयंवेद्यः समन्ततः ॥ १५

स्वभावो भासते यत्र महायोगः प्रकीर्तितः ।

नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वचित्तसमुत्थितः ॥ १६

निर्मलः केवलो ह्यात्मा महायोग इति स्मृतः ।

अणिमादिप्रदाः सर्वे सर्वे ज्ञानस्य दायकाः ॥ १७

उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यमेषु योगेष्वनुक्रमात् ।

अहं सङ्गविनिर्मुक्तो महाकाशोपमः परः ॥ १८

महेश्वरके ध्यानकी विधि ७५७ भगवान् नीललोहित महादेवसे पूछा था ॥५१ / २ ॥ श्रीदेवी बोलीं- योग कितने प्रकारका कहा गया है, उसका स्वरूप कैसा है तथा वह किस प्रकारका है? वह दिव्य तथा मोक्षदायक ज्ञान कैसा है, जिसके द्वारा प्राणी [ बन्धनसे ] मुक्त हो जाते हैं? ॥६१ / २ ॥ श्रीभगवान् बोले- पहला मन्त्रयोग है, दूसरा स्पर्शयोग है, तीसरा भावयोग है और चौथा अभाव-योग है; पाँचवाँ महायोग है, जो सर्वोत्तम कहा गया है ॥ ७-८ ॥ ध्यानसे युक्त जपका अभ्यास मन्त्रयोग कहा गया है । रेचक आदि प्राणायामके द्वारा नाड़ियोंका शुद्धीकरण समस्त - व्यस्त- योगसे प्राणका विजय कहा गया है । वाजीकरण क्रियासे युक्त [ वीर्यस्तम्भनरूप ] शोभन धारणादि अंगोंसे सम्पन्न, सात्त्विक आदि त्रिविध धारणासे प्रकाशित, विश्व - प्राज्ञ - तैजसरूप भेदत्रयका शोधक, कुम्भकमें स्थित ध्यानाभ्यास ही स्पर्शयोग कहा गया है । मन्त्र तथा स्पर्शयोगसे पृथक्, महादेवपर अवलम्बित, बाहर तथा भीतरकी दशाके स्फुरण तथा संहरणसे युक्त और चित्तको शुद्धि प्रदान करनेवाला योग भावयोग कहा गया है । चराचर सम्पूर्ण जगत् जिसमें विलीन है, जिसमें सम्पूर्ण स्वरूपका शून्य तथा आभासहीन रूपमें चिन्तन किया जाता है, चित्तका निर्वाण करनेवाले उस योगको अभावयोग कहा गया है । जो रूपहीन, अद्वितीय, निर्मल, स्वतन्त्र, अत्यन्त सुन्दर, अनिर्देश्य, सर्वदा प्रकाशमान, हर प्रकारसे स्वयं जाननेयोग्य है तथा जिसमें अपनी आत्माकी सत्ता भासित होती है, उसे महायोग कहा गया । आत्मा सदा प्रकाशित है, स्वयं ज्योतिर्मय है, सम्पूर्ण चित्तोंसे ऊपर उठा हुआ है, विशुद्ध है तथा अद्वितीय है — यह अनुभव होना महायोग कहा गया है॥९ –१६१ / २ ॥ ये सभी योग अणिमा आदि सिद्धियोंको देनेवाले तथा ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं । इन योगोंमें क्रमशः एकके बाद दूसरेमें पूर्वकी अपेक्षा वैशिष्ट्य । यह | महायोग अहंके संगसे रहित, महान् आकाशके तुल्य,

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७५८ सर्वावरणनिर्मुक्तो ह्यचिन्त्यः स्वरसेन तु ज्ञेयमेतत्समाख्यातमग्राह्यमपि दैवतैः प्रविलीनो महान् सम्यक् स्वयंवेद्यः स्वसाक्षिकः चकास्त्यानन्दवपुषा तेन ज्ञेयमिदं मतम् परीक्षिताय शिष्याय ब्राह्मणायाहिताग्नये धार्मिकायाकृतघ्नाय दातव्यं क्रमपूर्वकम् ॥

गुरुदैवतभक्ताय अन्यथा नैव दापयेत् ।

निन्दितो व्याधितोऽल्पायुस्तथा चैव प्रजायते ॥

दातुरप्येवमनघे तस्माज्ज्ञात्वैव दापयेत् ।

सर्वसङ्गविनिर्मुक्तो मद्भक्तो मत्परायणः ॥

साधको ज्ञानसंयुक्तः श्रौतस्मार्तविशारदः ।

गुरुभक्तश्च पुण्यात्मा योग्यो योगरतः सदा ॥

एवं देवि समाख्यातो योगमार्गः सनातनः ।

सर्ववेदागमाम्भोजमकरन्दः सुमध्यमे ॥

पीत्वा योगामृतं योगी मुच्यते ब्रह्मवित्तमः ।

एवं पाशुपतं योगं योगैश्वर्यमनुत्तमम् ॥

अत्याश्रममिदं ज्ञेयं मुक्तये केन लभ्यते ।

तस्मादिष्टैः समाचारैः शिवार्चनरतैः प्रिये ॥

इत्युक्त्वा भगवान् देवीमनुज्ञाप्य वृषध्वजः ।

शङ्कुकर्णं समासाद्य युयोजात्मानमात्मनि ॥

शैलादिरुवाच

तस्मात्त्वमपि योगीन्द्र योगाभ्यासरतो भव ।

स्वयम्भुव परा मूर्तिर्नूनं ब्रह्ममयी वरा ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग । । सर्वोत्कृष्ट, समस्त आवरणोंसे मुक्त और यथार्थतः ॥ १ ९ । अचिन्त्य है । उस ज्ञानको देवताओंके द्वारा भी अग्राह्य कहा गया है । यह परमात्मामें विलीन कर देनेवाला, । महान्, स्वयंवेद्य तथा स्वयं अपना साक्षी है और ॥ २० आनन्दपूर्ण शरीरसे प्रकाशित होनेवाला है । यह अहंकाररहित पुरुषके द्वारा ही जाननेयोग्य है । [ मेरे द्वारा उपदिष्ट ] । इस मत ( ज्ञान ) -को परीक्षा किये गये शिष्य, अग्निहोत्री २१ ब्राह्मण, धर्मपरायण, कृतज्ञ और गुरु - देवताके प्रति भक्ति रखनेवाले व्यक्तिको ही प्रदान करना चाहिये; अन्यको कभी नहीं देना चाहिये । अनधिकारी व्यक्ति २२ निन्दित, रोगसे पीड़ित तथा अल्प आयुवाला होता है और इसे प्रदान करनेवालेकी भी यही दशा होती है; अनघे! इसलिये पूर्णरूपसे परीक्षा करके ही इसे देना चाहिये । इसे प्राप्त करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण आसक्तियोंसे २३ रहित, मेरा भक्त, मेरे प्रति परायण, साधक, ज्ञानवान्, श्रुति - स्मृतिसम्बन्धी कर्मोंका ज्ञान रखनेवाला, गुरुमें भक्ति रखनेवाला, पुण्यात्मा, योग्यतासम्पन्न तथा सर्वदा २४ योगमें निरत रहनेवाला होता है ॥ १७–२४ ॥ हे देवि! हे सुमध्यमे! इस प्रकार यह योगमार्ग सनातन और समस्त वेद तथा आगमरूपी कमलका २५ मकरन्द कहा गया है । इस योगरूपी अमृतका पान करके ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ योगी [ भवबन्धनसे ] मुक्ति प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार यह पाशुपतयोग २६ समस्त योगोंका ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला तथा सर्वोत्कृष्ट है । इसे ब्रह्मचर्य आदि किसी आश्रमकी अपेक्षा न रखनेवाला जानना चाहिये । अतः हे प्रिये! यह सभी २७ प्राणियोंके हितकी कामना करनेवाले शिवपूजापरायण लोगोंको किसी अनिर्वचनीय सौभाग्यसे ही मुक्ति लिये प्राप्त होता है । ऐसा कहनेके पश्चात् वृषध्वज २८ | भगवान् शिव देवी पार्वतीसे आज्ञा लेकर और अपने गण शंकुकर्णको द्वारपर नियुक्त करके स्वयं समाधिमें लीन हो गये ॥ २५-२८ ॥ शैलादि बोले — अतएव हे योगीन्द्र! आप भी २ ९ । योगाभ्यासमें संलग्न हो जाइये । स्वयंभू शिवकी परामूर्ति