श्रीगणेशाय नमः।

लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 761–770

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान्

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मोक्षार्थी पुरुषोत्तमः ।

भस्मस्नायी भवेन्नित्यं योगे पाशुपते रतः ॥ ३०

ध्येया यथाक्रमेणैव वैष्णवी च ततः परा ।

माहेश्वरी परा पश्चात्सैव ध्येया यथाक्रमम् ॥ ३१ ।

योगेश्वरस्य या निष्ठा सैषा संहृत्य वर्णिता ॥ ३२

सूत उवाच

एवं शिलादपुत्रेण नन्दिना कुलनन्दिना ।

योगः पाशुपतः प्रोक्तो भस्मनिष्ठेन धीमता ॥३३

सनत्कुमारो भगवान् व्यासायामिततेजसे ।

तस्मादहमपि श्रुत्वा नियोगात्सत्रिणामपि ॥ ३४

कृतकृत्योऽस्मि विप्रेभ्यो नमो यज्ञेभ्य एव च ।

नमः शिवाय शान्ताय व्यासाय मुनये नमः ॥ ३५

ग्रन्थैकादशसाहस्त्रं पुराणं लैङ्गमुत्तमम् ।

अष्टोत्तरशताध्यायमादिमांशमतः परम् ॥ ३६

षट्चत्वारिंशदध्यायं * धर्मकामार्थमोक्षदम् ।

अथ ते मुनयः सर्वे नैमिषेयाः समाहिताः ॥ ३७

प्रणेमुर्देवमीशानं प्रीतिकण्टकितत्वचः ।

शाखां पौराणिकीमेवं कृत्वैकादशिकां प्रभुः ॥ ३८

ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवानिदं वचनमब्रवीत् ।

लैङ्गमाद्यन्तमखिलं यः पठेच्छृणुयादपि ॥ ३ ९

द्विजेभ्यः श्रावयेद्वापि स याति परमां गतिम् ।

तपसा चैव यज्ञेन दानेनाध्ययनेन च ॥ ४०

या गतिस्तस्य विपुला शास्त्रविद्या च वैदिकी ।

कर्मणा चापि मिश्रेण केवलं विद्ययापि वा ॥ ४१

निवृत्तिश्चास्य विप्रस्य भवेद्भक्तिश्च शाश्वती ।

मयि नारायणे देवे श्रद्धा चास्तु महात्मनः ॥ ४२

महेश्वरके ध्यानकी विधि ७५ ९ निश्चितरूपसे श्रेष्ठ तथा ब्रह्ममयी है । अतः मोक्षकी कामना करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पूर्ण प्रयत्नसे भस्म-स्नान करके पाशुपतयोगमें नित्य संलग्न रहना चाहिये । सर्वप्रथम ब्राह्मी शक्तिका ध्यान करना चाहिये, इसके बाद परा वैष्णवी शक्तिका और तत्पश्चात् परा माहेश्वरी शक्तिका ध्यान करना चाहिये । इस प्रकार योगेश्वर शिवकी जो पराकाष्ठा है, उसका मैंने संक्षेपमें वर्णन कर दिया ॥ २ ९ - ३२ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार अपने कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले भस्मधारी शिलादपुत्र बुद्धिमान् नन्दीने सनत्कुमारसे पाशुपतयोगका वर्णन किया ॥ भगवान् सनत्कुमारने अमित तेजवाले व्यासजीको इसे बताया और उनसे सुनकर उनके आदेशसे मैंने यज्ञ-सत्रमें उपस्थित मुनियोंको बताया । मैं कृतकृत्य हूँ । विप्रोंको नमस्कार है, यज्ञोंको नमस्कार है, शान्त शिवको नमस्कार है और व्यासमुनिको नमस्कार है ॥ ३३-३५ ॥ यह उत्तम श्रीलिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंमें निबद्ध है । इसके प्रथम भागमें एक सौ आठ अध्याय हैं और उत्तर भागमें पचपन अध्याय हैं । यह पुराण धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष प्रदान करनेवाला है । तब प्रसन्नताके कारण रोमांचित नैमिषारण्यवासी उन सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर भगवान् ईशान ( शिव ) - को प्रणाम किया । पुराणोंकी ग्यारहवीं शाखाकी रचना | करके स्वयंभू तथा प्रभुतासम्पन्न भगवान् ब्रह्माने यह | वचन कहा था — ' जो मनुष्य इस सम्पूर्ण श्रीलिङ्गपुराणको आदिसे अन्ततक पढ़ता है, सुनता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है । तपस्यासे, यज्ञसे, दानसे, वेदाध्ययनसे, उत्तम कर्मसे, कर्म तथा ज्ञानके मिश्रित प्रभावसे अथवा केवल ज्ञानसे उसकी जो गति होती है, वह इस पुराणके पठन- श्रवणसे हो जाती है; उसे विपुल शास्त्रविद्या तथा वैदिकी विद्या प्राप्त हो जाती है; उस विप्रको शाश्वत शिवभक्ति मिल जाती है; | उसका मोक्ष हो जाता है और उस महात्माकी श्रद्धा ' अत्र षट् च नव च चत्वारिंशच्च षट्चत्वारिंशदिति मध्यमपदलोपिसमासो ज्ञेयः ।

पृष्ठ 762

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७६० वंशस्य चाक्षया विद्या चाप्रमादश्च सर्वतः । इत्याज्ञा ब्रह्मणस्तस्मात्तस्य सर्वं महात्मनः ऋषय प्रोचुः ऋषेः सूतस्य चास्माकमेतेषामपि चास्य च । श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग मुझमें, नारायणमें तथा शिवमें हो जाती है । उसके वंशमें ॥ ४३ अक्षय विद्या सुलभ रहती है और हर प्रकारसे अप्रमाद विद्यमान रहता है । ' यह ब्रह्माजीकी आज्ञा है, अतः यह सब उन्हीं महात्माकी कृपासे हुआ है ॥ ३६-४३ ॥ ऋषिगण बोले — हे रोमहर्षण! आप ऋषि सूतको, नारदस्य च या सिद्धिस्तीर्थयात्रारतस्य च ॥ ४४ हम मुनियोंको, तीर्थयात्रामें रत इन नारदको, जो महान् प्रीतिश्च विपुला यस्मादस्माकं रोमहर्षण ॥

सा सदास्तु विरूपाक्षप्रसादात्तु समन्ततः ।

एवमुक्तेषु विप्रेषु नारदो भगवानपि ॥

कराभ्यां सुशुभाग्राभ्यां सूतं पस्पर्शिवांस्त्वचि ।

स्वस्त्यस्तु सूत भद्रं ते महादेवे वृषध्वजे ॥

श्रद्धा तवास्तु चास्माकं नमस्तस्मै शिवाय च ॥

४५ | सिद्धि तथा भगवत्प्रीति प्राप्त हुई; वह विरूपाक्ष भगवान् शिवकी कृपासे चारों ओर विद्यमान रहे 1 । विप्रोंके ऐसा कहनेपर भगवान् नारदने भी अपने पवित्र हाथोंके ४६ अग्रभागसे सूतजीके शरीरका स्पर्श किया और इस प्रकार कहा— हे सूतजी! आपका मंगल हो, आपका कल्याण हो, वृषध्वज महादेवमें आपकी तथा हमलोगों की ४७ श्रद्धा रहे; उन भगवान् शिवको नमस्कार है- ' नमस्तस्मै ४८ | शिवाय च ' ॥ ४४–४८ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतयोगमार्गवर्णने लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें पाशुपतयोगमार्गवर्णनके प्रसंगमें ' लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णन ' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥

॥ सम्पूर्णमिदं श्रीलिङ्गमहापुराणम् ॥ ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण पूर्ण हुआ ॥

पृष्ठ 763

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॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण - परिशिष्ट [ वाराणसी - माहात्म्य] [ धर्मशास्त्रीय निबन्धग्रन्थोंकी परम्परामें पं ० लक्ष्मीधरभट्ट - विरचित ' कृत्यकल्पतरु अत्यधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है । इसके प्रणेता पं ० लक्ष्मीधर कान्यकुब्जनरेश ' अत्यन्त प्राचीन, बहुश्रुत तथा समय १२ वीं शताब्दी है । परवर्ती निबन्धकारोंने गोविन्दचन्द्रके महामन्त्री थे । पं ० लक्ष्मीधरका कृत्यकल्पतरुके वचनोंको अपने ग्रन्थोंमें सादर उपन्यस्त किया है । चतुर्वर्गचिन्तामणि - जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थके प्रणेता ' हेमाद्रि ' तो इस ग्रन्थ तथा पं ० लक्ष्मीधरके वैदुष्यसे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इन्हें ' भगवान् ' शब्दसे सम्बोधित किया है । ' कृत्यकल्पतरु ' धर्मशास्त्रीय कृत्योंके संग्रहका एक विशाल ग्रन्थ है । यह ब्रह्मचारिकाण्ड, गृहस्थकाण्ड, श्राद्धकाण्ड, दानकाण्ड, शुद्धिकाण्ड, व्यवहारकाण्ड, शान्तिकाण्ड, आचारकाण्ड तथा तीर्थविवेचनकाण्ड आदि कई काण्डोंमें विभक्त है । तत्तत् काण्डों में स्मृतियों तथा पुराणोंमें आये हुए धर्मशास्त्रीय विषयों जैसे - वर्णाश्रमधर्म, श्राद्ध, दान, प्रायश्चित्त, शान्ति, सदाचार तथा तीर्थविवेचन आदिका एक स्थानपर संग्रह हुआ है, इससे यह सौविध्य प्राप्त होता है कि एक ही स्थानपर विभिन्न स्मृतियों तथा पुराणादिमें उपन्यस्त तत्तद् विषयोंका संग्रह देखनेको मिल जाता है । कृत्यकल्पतरुका तीर्थविवेचनकाण्ड प्रमुख तीर्थोंके माहात्म्यका महत्त्वपूर्ण संग्रह है । इसमें मुख्यरूपसे वाराणसी, प्रयाग, गंगा, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, मथुरा, उज्जयिनी, बदरिकाश्रम, द्वारका, केदार तथा नैमिषारण्य आदि तीर्थोंके माहात्म्य तथा तीर्थयात्रा आदिकी विधि विस्तारसे दी गयी है । इसमें अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका तथा यहाँके गुह्यायतनों, लिङ्गों, वापी, कुण्डों तथा हदोंका जो वर्णन दिया गया है, वह विविध पुराणों आदिसे संग्रहीत है । विशेष बात यह है कि इस ग्रन्थमें लिङ्गपुराणके नामसे सोलह अध्यायोंमें लगभग दो हजार श्लोकोंमें वाराणसीका माहात्म्य उपलब्ध है, किंतु यह सामग्री वर्तमानमें उपलब्ध लिङ्गपुराणके संस्करणोंमें प्राप्त नहीं है । वर्तमानमें जो लिङ्गपुराण उपलब्ध होता है, वह पूर्वभाग तथा उत्तरभाग नामसे दो खण्डोंमें विभक्त है । इसके पूर्वभागके ९ २ वें अध्यायमें १ ९ ० श्लोकोंमें वाराणसी तथा यहाँके तीर्थोंका जो माहात्म्य आया है, वह पूर्वोक्त कृत्यकल्पतरुके संग्रहसे भिन्न है । कृत्यकल्पतरु १२ वीं शताब्दीका अत्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ है । उस समय लिङ्गपुराणका जो संस्करण उपलब्ध था, उसमेंसे ही ग्रन्थकारने सामग्री संगृहीत की होगी । लिङ्गपुराणकी श्लोकसंख्या स्वयं लिङ्गपुराणने तथा नारदादि पुराणोंने ग्यारह हजार बतायी है, परंतु वर्तमानमें लगभग आठ हजारके आस - पास श्लोक मिलते हैं । साथ ही लिङ्गपुराणके नामसे अरुणाचलमाहात्म्य, पंचाक्षरमाहात्म्य, रामसहस्त्रनाम तथा रुद्राक्षमाहात्म्य आदि प्रकरणोंका भी उल्लेख प्राप्त होता है, किंतु ये प्रकरण वर्तमान संस्करणोंमें अनुपलब्ध हैं । कालातिरेकसे वर्तमानमें पुराणोंके संस्करणोंमें कुछ परिवर्तन आ गया है । कई माहात्म्य तथा प्रकरण आदि ऐसे हैं, जो उन - उन पुराणोंके नामसे प्राप्त तो होते हैं, किंतु वर्तमानमें वे उस पुराणमें उपलब्ध नहीं होते । उदाहरणके लिये प्रसिद्ध सत्यनारायणकथाकी पुष्पिकामें ' इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे ' यह मिलता है, किंतु यह कथा वर्तमानमें प्राप्त रेवाखण्डमें प्राप्त नहीं होती । प्रसिद्ध माघमाहात्म्य वायुपुराणके नामसे मिलता है, किंतु वायुपुराणमें नहीं मिलता । ऐसे ही अध्यात्मरामायणको ब्रह्माण्डपुराणका अंश माना जाता है, किंतु वर्तमान ब्रह्माण्डपुराणके संस्करणमें वह प्राप्त नहीं होता । इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी समयमें पुराणादिका जो प्राचीन स्वरूप था, उसमें वह सब गुम्फित था । यही बात लिङ्गपुराणके वाराणसी - माहात्म्यके विषयमें भी है । उद्धृत वाराणसी - माहात्म्य अत्यन्त महत्त्वका है, इसके अध्ययनसे प्राचीन समय इस कृत्यकल्पतरुमें स्वरूपके विषयमें महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है । काशीखण्ड वाराणसीके लिङ्गायतनों एवं तीर्थोके वास्तविक उपलब्ध होती है, उससे भी विशिष्ट सामग्री इस प्राचीन लिङ्गमहापुराणमें आदिमें जो वाराणसीके विषयमें सामग्री

पृष्ठ 764

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ परिशिष्ट ७६२ मिलती है । अत: यह वर्णन बड़े महत्त्वका है । वहाँ वाराणसी - माहात्म्य - सम्बन्धी सामग्री कहीं स्फुट रूपमें तथा कहीं अध्यायोंमें उपनिबद्ध है, किंतु अध्यायोंमें श्लोकसंख्याका अंकन नहीं है । भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीके प्रधान संवादके रूपमें उपलब्ध वह सामग्री तीसरे अध्यायसे अठारहवें अध्यायतक वहाँ दी गयी है, किंतु सुविधाको दृष्टिसे तीसरे अध्यायको प्रथम अध्याय मानकर सम्पूर्ण सामग्री जिस रूपमें तथा जिस क्रममें कृत्यकल्पतरुमें उपलब्ध है, उसी रूपमें तथा उसी क्रममें श्लोक - संख्या अंकितकर मूल श्लोकोंसहित उसका हिन्दीभावानुवाद यहाँ दिया जा रहा है । इसे पढ़कर भगवद्भक्तों तथा श्रद्धालुजनोंमें भगवान् साम्बसदाशिवके प्रति विशेष श्रद्धा जाग्रत् होगी तथा आशा है कि सभी पाठक महानुभाव इससे लाभ उठायेंगे - सम्पादक ] पहला अध्याय अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका वर्णन ईश्वर उवाच

अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि उपायज्ञानसाधनम् ।

यानि तीर्थानि चोक्तानि व्योमतन्त्रे पुरा मया ॥ १

तेषामध्यधिकं तीर्थमविमुक्तं महामुने ।

सर्वतीर्थानि च मया तस्मिन् स्थाने प्रतिष्ठिताः ॥ २

न कदाचिन्मया मुक्तं स्थानं च सततं मुने ।

सर्वतीर्थमयं पुण्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत् ॥ ३

स्थानानां चैव सर्वेषामादिभूतं महेश्वरम् ।

यत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिसत्तम ॥ ४

अनेनैव शरीरेण प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम् ।

तत्र चैव तु सम्भूतो ज्ञानं प्राप्नोति मानवः ॥ ५

गच्छ वाराणसीं शीघ्रं यत्र देवः सनातनः ।

देवताभिः समस्ताभिस्तत्र देवः पिनाकधृक् ॥ ६

स्तूयते वरदो देवैर्ब्रह्मादिभिरभीक्ष्णशः ।

तत्रासिर्वरणा चैव निम्नगे सिद्धसेविते ॥ ७

बहुजन्माप्तपापानां दुष्टानां देहिनां भुवि ।

क्षालनं कुरुते देवि सा नदी यत्र जाह्नवी ॥ ८

या दृशा सर्वथा स्वर्गे सा नदीनां सरिद्वरा ।

या माता सर्वभूतानां सा गङ्गा यत्र निम्नगा ॥ ९

अविमुक्तं परं क्षेत्रं शङ्करस्य सदैव हि ।

तत्र स्थानं प्रसिद्धं च त्रैलोक्ये शूलपाणिनः ॥ १०

निम्नगाभ्यां पुरी सा च नाम्ना वाराणसी मुने ।

कृतस्नानेन देवेन ओङ्कारे संस्थितेन वा ।

तस्मिन् काले वरो दत्तो देवदेवेन शम्भुना ॥ ११

ईश्वर बोले – हे महामुने! अब मैं आपको ज्ञानप्राप्तिका अन्य साधन बताऊँगा । मैंने पूर्वमें व्योमतन्त्रमें जिन तीर्थोंका वर्णन किया था, उन सबसे बढ़कर अविमुक्त तीर्थ है । मैंने समस्त तीर्थोंको उस [ अविमुक्त ] स्थानमें स्थापित कर दिया है ॥ १-२ ॥ हेमुने! मैं यहाँ सतत स्थित रहता हूँ, मैंने कभी भी इस स्थानका त्याग नहीं किया; यह सभी तीर्थोंसे युक्त, पुण्यप्रद, गुह्यसे भी गुह्यतर तथा महान् है ॥ ३ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! महेश्वरका यह स्थान सभी स्थानोंके आदिमें प्रादुर्भूत हुआ, जहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और इसी शरीरसे उत्तम निर्वाण प्राप्त किया । वहाँपर उत्पन्न हुआ मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है ॥ ४-५ ॥ आप शीघ्र वाराणसी जाइये, जहाँ सनातन देव [ शिवजी ] समस्त देवताओंके साथ विद्यमान हैं । ब्रह्मा आदि देवता वर प्रदान करनेवाले पिनाकधारी शिवकी वहाँ निरन्तर स्तुति करते हैं । वहाँ सिद्धोंके द्वारा सेवित ' असि ' तथा ' वरणा ' [ नामक ] दो नदियाँ हैं॥६-७ ॥ हे देवि! वहाँ गंगा नदी पृथ्वीतलपर दुष्ट प्राणियोंके अनेक जन्मोंके अर्जित पापोंका क्षालन करती हैं । जो सदा स्वर्गमें दृष्टिगत होती हैं तथा जो सभी प्राणियों की माता हैं, वे नदियोंमें श्रेष्ठ गंगा नदी वहाँ विद्यमान हैं ॥ ८ - ९ ॥ वहाँ शंकरजीका सदैव परम अविमुक्तक्षेत्र है, वह शूलपाणि शिवजीका तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध निवास-स्थान है । हे मुने! दोनों [ वरणा तथा असि ] नदियोंसे युक्त होनेके कारण वह पुरी ' वाराणसी ' नामसे विख्यात । है । स्नान करनेके अनन्तर ओंकारमें संस्थित देवदेव

पृष्ठ 765

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अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित देवदेव उवाच

ये स्मरिष्यन्ति तत्स्थानमविमुक्तं सदा नराः ।

निर्द्धतसर्वपापास्ते भविष्यन्ति गणोपमाः ॥

आगमिष्यन्ति ये द्रष्टुं ये जना योजनेन तु ।

ब्रह्महत्यां मोक्ष्यन्ति भविष्यन्ति ममानुगाः ॥

विदित्वा भङ्गुरं लोकं येऽस्मिन्वत्स्यन्ति मे पुरे ।

अन्तकालेऽपि वत्स्यन्ति तेषां भवति मोक्षदम् ॥

मोक्षः सुदुर्लभो यस्मात् संसारश्चातिभीषणः ।

अश्मना चरणौ भित्त्वा वाराणस्यां वसेन्नरः ॥

सर्वावस्थोऽपि यो मर्त्यो वाराणस्यां वसेत्सदा ।

स यां गतिमवाप्नोति पुण्यदानैर्न सा गतिः ॥

दुर्लभा तपसा सा च मर्त्यानां मुनिसत्तम ।

तत्र विप्र व्रज शीघ्रं मनस्स्थैर्यं यदीच्छसि ॥

मनसः स्थैर्यहेतुत्वं शृणुष्व गदतो मम ।

दक्षिणं चोत्तरं चैव तस्मिन् स्थाने स्थितं सदा ॥

विषुवं चैव मध्यस्थं देवानामपि दुर्लभम् ।

कलौ युगे तु मर्त्यानां स्थानं मोक्षावहेतुकम् ॥

भक्तिमाराधनेनैव स्नानपूजनतर्पणैः ।

चातुर्वर्ण्यविभागस्य शरीरं वैश्वरं पदम् ॥

पिङ्गला नाम या नाडी आग्नेयी सा प्रकीर्तिता ।

शुष्का सरिच्च सा ज्ञेया लोलार्को यत्र तिष्ठति ॥

इडानाम्नी च या नाडी सा सौम्या सम्प्रकीर्तिता ।

वरणा नाम सा ज्ञेया केशवो यत्र संस्थितः ॥

आभ्यां मध्ये तु या नाडी सुषुम्ना च प्रकीर्तिता ।

मत्स्योदरी च सा ज्ञेया विषुवं तत्प्रकीर्तितम् ॥

लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६३ भगवान् शम्भुने उस समय इस प्रकार वर प्रदान किया था ॥ १०-११ ॥ १२ | देवदेव बोले — जो मनुष्य उस अविमुक्त स्थानका | सदा स्मरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जायँगे और मेरे गणोंके तुल्य हो जायँगे ॥१२ ॥

१३ | जो लोग मेरा दर्शन करनेके लिये [ यहाँ ] आयेंगे, | वे एक योजन दूर रहनेपर ही ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जायेंगे और मेरे अनुचर बन जायेंगे ॥१३ ॥

१४ संसारको विनाशशील जानकर जो लोग मेरे इस पुरमें निवास करेंगे अथवा मृत्युके समय ही [ यहाँ ] निवास करेंगे, उनके लिये यह मोक्षप्रद होगा ॥ १४ ॥

१५ चूँकि मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है और संसार अति भयंकर है, अतः पत्थरसे [ अपने ] दोनों पैरोंको भंग करके मनुष्यको वाराणसीमें निवास करना चाहिये ॥ १५ ॥

किसी भी अवस्थावाला जो मनुष्य सदा वाराणसीमें १६ | निवास करता है, वह जो गति प्राप्त करता है, वह गति पुण्य तथा दानोंसे भी सम्भव नहीं है । हे मुनिश्रेष्ठ! वह [ गति ] मनुष्योंके लिये तपस्यासे भी परम दुर्लभ है ॥ १६१ / २ ॥ १७ अतः हे विप्र! यदि आप मनकी स्थिरता [ शान्ति ] चाहते हैं, तो शीघ्र ही वहाँ जाइये; [ वहाँ जानेसे ] मनकी स्थिरताका कारण सुनिये; मैं बता रहा हूँ ॥ १७ ९ / २ ॥ १८ उस पुरमें दक्षिण तथा उत्तर स्थान स्थित हैं; उसके मध्यमें विषुवक्षेत्र स्थित है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है । कलियुगमें तो यह स्थान मनुष्योंके लिये १ ९ मोक्षका साधनस्वरूप है; आराधना, स्नान, पूजन तथा तर्पणके द्वारा यहाँ [ शिवकी ] भक्ति करनी चाहिये । चारों वर्णोंमेंसे कोई भी व्यक्ति यहाँ इस ईश्वरपदको २० प्राप्त कर लेता है ॥ १८–२० ॥ पिंगला नामक जो नाडी है, वह आग्नेयी कही गयी है; उसे शुष्क सरित् ( नदी ) जानना चाहिये, जहाँ २१ । लोलार्क कुण्ड स्थित है ॥२१ ॥

इडा नामक जो नाडी है, वह सौम्य कही गयी है; उसे वरणा नामवाली जानना चाहिये, जहाँ केशव २२ । विराजमान । इन दोनों [ पिंगला, इडा ] - के मध्यमें जो नाडी है, वह सुषुम्ना कही गयी है; उसे मत्स्योदरी नामवाली जानना चाहिये, उसे विषुव कहा गया २३ | है ॥ २२-२३ ॥

पृष्ठ 766

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ परिशिष्ट ७६४ 3636363636363636 96 96 95 396 36 46 35 36 36 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6! श्रुत्वा कलियुगं घोरमल्पायुषमधार्मिकम् सिद्धक्षेत्रं न सेवन्ते जायन्ते च म्रियन्ति च लिङ्गरूपधरास्तीर्थे दृगिचण्डेश्वरादयः अविमुक्ते स्थिताः सर्वे शुद्ध्यन्ते पापकर्मिणः

अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः ।

अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परं पदम् ॥

अन्तकाले मनुष्याणां भिद्यमानेषु मर्मसु ।

वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते ॥

sa स्थारुद्रा भक्तानां प्रीतिदायकाः ।

कर्णजापं प्रयच्छन्ति दृगिचण्डेश्वरादयः ॥

अविमुक्तं महत्क्षेत्रं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम् ।

सर्वपापक्षयकरं साक्षाच्छिवपुरं महत् ॥

श्मशानं परमं विद्धि क्षेत्राणां परमं तथा ।

पाप्मानमुत्सृजत्याशु प्रविष्टस्तत्र वै पुमान् ॥

वाराणस्यां तु यः कश्चित् प्रविष्टो ब्रह्मघातकः ।

तिष्ठते क्षेत्रबाह्ये तु निर्गते गृह्यते पुनः ॥

लिङ्गरूपधरा मूर्ता: सप्तकोट्यस्तु सर्वतः ।

अविमुक्ते स्थिता रुद्रा भक्तानां सिद्धिदायकाः ॥

कृत्तिवाससमारभ्य क्रोशं क्रोशं चतुर्दिशम् ।

योजनं तत्र तत्क्षेत्रं गणै रुद्रैश्च संवृतम् ॥

तस्य मध्ये यदा लिङ्गं भूमिं भित्त्वा समुत्थितम् ।

मध्यमेश्वरनामाख्यं ख्यातं सर्वसुरासुरैः ॥

अस्मादारभ्य लिङ्गात्तु क्रोशं क्रोशं चतुर्ष्वपि ।

योजनं विद्धि तत्क्षेत्रं मृत्युकाले ऽमृतप्रदम् ॥

एवं क्षेत्रस्य संन्यासः पुराणे परिकीर्तितः ।

अस्मात्तु परतो देवि विहारो नैव विद्यते ॥

। कलियुगको भयंकर, अल्पायु तथा अधार्मिक ॥ २४ समझकर भी जो लोग इस सिद्धक्षेत्रका सेवन नहीं करते हैं, वे ही बार - बार जन्म लेते हैं और मृत्युको प्राप्त होते । हैं । लिङ्गरूपधारी दृगिचण्डेश्वर आदि इस अविमुक्त ॥ २५ तीर्थमें स्थित रहते हैं; पापकर्म करनेवाले सभी लोग यहाँ शुद्ध हो जाते हैं ॥ २४-२५ ॥ अविमुक्त परम क्षेत्र है; [ इस ] अविमुक्तक्षेत्रमें परा २६ गति प्राप्त होती है, अविमुक्तक्षेत्रमें परा सिद्धि मिलती है और २७ प्रेरित आदि २८ तारक अविमुक्तक्षेत्रमें परमपद प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

मृत्युके समय मर्मोंके भेदे जानेपर वायुके द्वारा किये गये मनुष्योंको स्मृति नहीं रह जाती है ॥ २७ ॥

भक्तोंको प्रीति प्रदान करनेवाले जो दृगिचण्डेश्वर रुद्र अविमुक्तमें स्थित हैं, वे [ भक्तोंके ] कानमें मन्त्र प्रदान करते हैं ॥ २८ ॥

अविमुक्तक्षेत्र महान्, पुण्य करनेवालोंके द्वारा सेवित, सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा साक्षात् २ ९ शिवका महान् पुर है । श्मशानको परम क्षेत्र जानिये; यह सभी क्षेत्रोंमें महान् है । वहाँ प्रविष्ट हुआ मनुष्य शीघ्र ही पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ९ -३० ॥ ३० जो कोई भी ब्रह्मघाती वाराणसीमें प्रवेश करता है, तो उसी समय उसकी ब्रह्महत्या क्षेत्रके बाहर ही रह जाती है और पुनः उस व्यक्तिके इस क्षेत्रसे बाहर चले ३१ जानेपर वह ब्रह्महत्या उसे पुनः घेर लेती है ॥३१ ॥

लिङ्गरूप धारण किये हुए मूर्तिमान् सात करोड़ ३२ रुद्र अविमुक्तक्षेत्रमें सभी ओर स्थित हैं; वे भक्तोंको सिद्धि देनेवाले हैं ॥ ३२ ॥

कृत्तिवाससे आरम्भ करके कोस - कोसकी दूरीपर ३३ चारों दिशाओंमें योजन- परिमाणमें वह क्षेत्र गणों तथा रुद्रोंसे घिरा हुआ है । उसके मध्यमें भूमिका भेदन | करके जो लिङ्ग प्रकट हुआ है, उसे सभी देवता तथा ३४ असुर मध्यमेश्वर नामवाला कहते हैं॥३३-३४ ॥ इस लिङ्गसे आरम्भ करके चारों दिशाओंमें कोस - कोसकी दूरीपर योजनभर उस [ अविमुक्त ] ३५ क्षेत्रको जानिये; वह क्षेत्र मृत्युकालमें अमरता प्रदान करनेवाला है । इस प्रकार पुराणमें इस क्षेत्रका माहात्म्य बताया गया हे देवि! इस क्षेत्रसे बढ़कर [ कोई भी ] ३६ । आनन्दका स्थान नहीं है ॥ ३५-३६ ॥

पृष्ठ 767

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अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका देव्युवाच

वाराणस्य तु किं गुह्यं स्थानं किं च तव प्रियम् ।

किं रहस्यं च लिङ्गानां के ह्रदास्तत्र विश्रुताः ॥ ३७

कृपाः कानि कुण्डानि लिङ्गानां स्थापकाश्च के ।

कस्मिन् स्थाने कृतं कर्म ज्ञाननिष्ठं प्रजायते ।

एतदाचक्ष्व मे सर्वं यदनुग्रहभागहम् ॥ ३८

देवदेव उवाच

रुचिरं स्थानमासाद्य अविमुक्तं तु मे गृहम् ।

न कदाचिन्मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम् ॥ ३ ९

अनेनैव प्रकारेण अविमुक्तं तु कथ्यते ।

अविशब्देन पापं तु कथ्यते वेदवादिभिः ।

तेन पापेन तत् क्षेत्रं वर्जितं वरवर्णिनि ॥ ४०

सिद्धाः पाशुपताः श्रेष्ठास्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।

उपासते च मां नित्यं तस्मिन् स्थाने स्थिताः सदा ॥ ४१ ।

पूर्वोत्तरे दिग्विभागे तस्मिन् क्षेत्रे तु सुन्दरि ।

सुरासुरैः स्तुतश्चाहं तत्र स्थाने यशस्विनि ॥ ४२

दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु स्तुतोऽहं विविधैः स्तवैः ।

उत्पन्नं मम लिङ्गं तु भित्त्वा भूमिं यशस्विनि ॥ ४३

तेषामनुग्रहार्थाय लोकानां भक्तिभावतः ।

वाराणस्यां महादेवि तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम् ॥ ४४

तं दृष्ट्वा मनुजो देवि पशुपाशैर्विमुच्यते ॥४५

कूपस्तत्रैव संल्लग्नो महादेवस्य चैव हि ।

तत्रोपस्पर्शनाद्देवि लभेद्वागीश्वरीं गतिम् ॥ ४६

तत्र वाराणसी देवी स्थिता विग्रहरूपिणी ।

मानवानां हितार्थाय स्थिता कूपस्य पश्चिमे ॥ ४७

वाराणसीं तु यो दृष्ट्वा भक्त्या चैव नमस्यति ।

तस्य तुष्टा च सा देवी वसतिं च प्रयच्छति ॥ ४८

महादेवस्य पूर्वेण गोप्रेक्षमिति विश्रुतम् ।

तेन दृष्टेन सुश्रोणि पूर्वोक्तं फलमाप्नुयात् ॥ ४ ९

वर्णन ७६५ देवी बोलीं —- वाराणसीमें कौन - सा गुह्य स्थान है, | कौन - सा स्थान आपको प्रिय है, लिङ्गोंका क्या रहस्य है, वहाँ कौन - से प्रसिद्ध सरोवर हैं, कौन - कौन कूप हैं, कौन - कौन कुण्ड हैं, लिङ्गोंके स्थापक कौन हैं और किस स्थानमें किया गया कर्म ज्ञानमें निष्ठा उत्पन्न करनेवाला होता है? यदि मैं अनुग्रहकी भागिनी होऊँ, तो मुझे यह सब बतायें॥३७–३८ ॥ देवदेव बोले — मैंने इस सुन्दर अविमुक्तक्षेत्रको प्राप्तकर इसे अपना गृह ( निवासस्थान ) बनाया । मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया, इसलिये इसे अविमुक्त कहा गया है । वेदवादियोंके द्वारा ‘ अवि ’ शब्दसे पापको कहा जाता है । हे वरवर्णिनि! वह क्षेत्र उस पापसे रहित है; इस प्रकारसे यह अविमुक्त कहा जाता है ॥३ ९ -४० ॥ सिद्धजन तथा श्रेष्ठ पाशुपत भक्त मेरे प्रति निष्ठावान् तथा परायण होकर उस स्थानमें रहकर नित्य मेरी उपासना करते हैं ॥४१ ॥

हे सुन्दरि! उस क्षेत्रमें पूर्वोत्तर दिशामें देवताओं तथा असुरोंके द्वारा मेरी स्तुति की गयी थी । हे यशस्विनि! उस स्थानमें दिव्य हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे मेरी स्तुति की गयी थी; तब हे यशस्विनि! उन सभीके भक्तिभावसे प्रसन्न होकर | उनपर अनुग्रह करने हेतु भूमिका भेदन करके मेरा लिङ्ग प्रकट हुआ और हे महादेवि! वाराणसीमें उस स्थानपर । मैं स्थित हो गया । हे देवि! उस लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४२ - ४५ ॥ हे देवि! वहींपर महादेवके समीप एक कूप है; वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वागीश्वरी गति ( सारस्वतलोक ) प्राप्त करता ॥ ४६ ॥

वहाँपर कूपके पश्चिमभागमें मनुष्योंके कल्याणके लिये विग्रहरूप धारणकर देवी वाराणसी विराजमान हैं ॥ ४७ ॥

[ देवी ] वाराणसीका दर्शन करके जो मनुष्य उन्हें नमस्कार करता है, उसके ऊपर प्रसन्न भक्तिपूर्वक होकर वे देवी उसे काशीवास प्रदान करती हैं ॥ ४८ ॥

हे सुश्रोणि! महादेवके पूर्वमें गोप्रेक्ष नामक स्थान प्रसिद्ध है, जिसके दर्शनसे मनुष्य पूर्वोक्त फल प्राप्त

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ परिशिष्ट ७६६ ईश्वर उवाच गोप्रेक्षस्योत्तरेणाथ अनसूयाख्यलिङ्गकम् तं दृष्ट्वा मानवो देवि गतिं च लभते पराम् ॥ पश्चान्मुखं च तल्लिङ्गमनसूयाप्रतिष्ठितम् । अनसूयेश्वरस्याग्रे गणेश्वरमिति स्मृतम् तेन दृष्टेन लभते गणेशस्य सलोकताम् । गणेश्वरात् पश्चिमेन हिरण्यकशिपुः पुरा

स्थापयामास मे लिङ्गं कूपस्यैव समीपतः ।

तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं सिद्धेश्वरं स्मृतम् ॥

दर्शनादेव मे लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ।

अन्यदायतनं भद्रे शृणुष्व गदतो मम ॥

वृषभेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति ।

पूर्वामुखं महेशानि गोप्रेक्षस्य तु नैर्ऋते ।

तेन दृष्टेन सुश्रोणि अभीष्टं फलमाप्नुयात् ॥

गोप्रेक्षस्य दक्षिणतः स्थापितं लिङ्गमुत्तमम् ।

दधीचेश्वरनामानं सर्वकामफलप्रदम् ॥

दधीचेश्वरसामीप्ये दक्षिणे वरवर्णिनि ।

अत्रिणा स्थापितं लिङ्गं दैवमार्तिहरं शुभम् ॥

अत्रीश्वराद्दक्षिणतः सूर्यखण्डमुखेऽपि च ।

मधुकैटभाभ्यां सुश्रोणि लिङ्गसंस्थापनं कृतम् ॥

तत्र पश्चान्मुखो देवि विसमन्थाः प्रपठ्यते ।

पूर्वामुखं कैटभस्य लिङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥

गोप्रेक्षकस्य पूर्वेण लिङ्गं वै बालकेश्वरम् ।

बालकेश्वरसामीप्ये विज्वरेश्वरसंज्ञितम् ॥

तेन दृष्टेन सुश्रोणि ज्वरो नश्यति तत्क्षणात् ।

विज्वरेश्वरपूर्वेण वेदेश्वरमिति श्रुतम् ॥

ईशानाभिमुखं लिङ्गं कोणे तस्य मुखानि वै ।

तेन दृष्टेन सुश्रोणि चतुर्वेदो भवेद्विजः ॥

करता है अर्थात् भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४ ९ ॥

ईश्वर बोले — हे देवि! गोप्रेक्षके उत्तरमें अनसूया । नामक लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य परा गतिको ५० प्राप्त करता है । पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग [ देवी ] अनसूयाके द्वारा स्थापित किया गया है ॥ ५०१ ॥

॥ ५१ अनसूयेश्वर - लिङ्गके आगे गणेश्वर [ लिङ्ग ] बताया गया है, उसके दर्शनसे मनुष्य गणेशजीका सालोक्य प्राप्त करता है ॥५११ / २ ॥ ॥ ५२ हिरण्यकशिपुने पूर्वकालमें गणेश्वरके पश्चिममें कूपके पासमें ही मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी । हे देवि! उसीके पश्चिममें सिद्धेश्वरलिङ्ग बताया गया है; दर्शन-५३ मात्रसे मेरा वह लिङ्ग सर्वसिद्धि प्रदान करनेवाला | है ॥ ५२-५३१ / २ ॥ ५४ हे भद्रे! अन्य आयतन ( लिङ्ग ) - के विषयमें सुनिये; मैं बता रहा हूँ । हे महेशानि! वहींपर वृषभेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, जो पूर्वकी ओर मुखवाला है तथा गोप्रेक्षके नैर्ऋत ( दक्षिण - पश्चिम ) - में स्थित है । है ५५ सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है ॥ ५४-५५ ॥ गोप्रेक्षके दक्षिणमें सभी कामनाओंका फल प्रदान ५६ करनेवाला दधीचेश्वर नामक उत्तम लिङ्ग स्थापित है ॥ ५६ ॥

५७ हे वरवर्णिनि! दधीचेश्वरलिङ्गके समीपमें दक्षिण दिशामें [ मुनि ] अत्रिके द्वारा शिवजीका लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह दैविक कष्टको दूर करनेवाला तथा ५८ मंगलकारक है ॥५७ ॥

हे सुश्रोणि! अत्रीश्वरके दक्षिणमें सूर्यखण्डमुखमें भी मधु तथा कैटभके द्वारा लिङ्गकी स्थापना की गयी है । ५ ९ हे देवि! वहाँपर मधुके द्वारा स्थापित लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला कहा जाता है और कैटभके द्वारा स्थापित त्रिलोक-प्रसिद्ध लिङ्ग पूर्वकी ओर मुखवाला है ॥ ५८-५९ ॥ ६० गोप्रेक्षके पूर्वमें बालकेश्वरलिङ्ग है । बालकेश्वरके समीपमें विज्वरेश्वर नामक लिङ्ग है; हे सुश्रोणि! उसके ६१ दर्शनसे ज्वर तत्काल नष्ट हो जाता है ॥ ६० ९ / २ ॥ । विज्वरेश्वरके पूर्वमें वेदेश्वर लिङ्ग है - ऐसा कहा गया है; वह लिङ्ग ईशानकी ओर मुखवाला है, उसके ६२ । कोणमें [ अनेक ] मुख हैं । हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे

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अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित

वेदेश्वरस्योत्तरतः स्वयं तिष्ठति केशवः ।

क्षेत्रस्य कारणं चास्य क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते ॥ ६३।

तेन दृष्टेन सुश्रोणि सर्वं दृष्टं चराचरम् ।

तत्समीपे तु सुश्रोणि लिङ्गं मे सङ्गमेश्वरम् ।

तेन दृष्टेन सुश्रोणि शिष्टैः सह समागमः ॥ ६४

सङ्गमेशस्य पूर्वेण लिङ्गं चैव चतुर्मुखम् ।

ब्रह्मणा स्थापितं भद्रे प्रयागमिति कीर्त्यते ॥ ६५

तेन दृष्टेन लभते ब्रह्मणः पदमुत्तमम् ।

तत्र सा शाङ्करी देवी ब्रह्मवृक्षेऽवतिष्ठते ॥ ६६

शान्तिं करोति सर्वेषां ये च तीर्थनिवासिनः ।

अतः परं तु संवेद्यं गङ्गावरणसङ्गमम् ॥६७

श्रवणद्वादशीयोगो बुधवारे यदा भवेत् ।

तदा तस्मिन्नरः स्नात्वा सन्निहत्या फलं लभेत् ॥ ६८

श्राद्धं कृत्वा तु यस्तत्र तस्मिन् काले यशस्विनि ।

तारयित्वा पितॄन् सर्वान् विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ६ ९

वरणायास्तटे पूर्वे कुम्भीश्वरमिति स्मृतम् ।

कुम्भीश्वरात्तु पूर्वेण कालेश्वरमिति स्मृतम् ॥ ७०

कालेश्वरस्योत्तरतो महातीर्थं वरानने ।

कपिलाहदनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः ॥ ७१

तस्मिन् ह्रदे तु यः स्नानं कुर्याद्भक्तिपरायणः ।

वृषध्वजं च वै दृष्ट्वा राजसूयफलं लभेत् ॥ ७२

नरकस्थास्ततो देवि पितरः सपितामहाः ।

पितृलोकं प्राप्नुवन्ति तस्मिन् श्राद्धे कृते तु वै ॥ ७३

गयायां चाष्टगुणितं पुण्यं प्रोक्तं महर्षिभिः ।

तस्मिन् श्राद्धे कृते भद्रे पितॄणामनृणो भवेत् ॥ ७४

पश्चिमे तु दिशाभागे महादेवस्य भामिनि ।

स्कन्देन स्थापितं लिङ्गं मम भक्त्या सुरेश्वरि ॥ ७५

तेन दृष्टेन गच्छन्ति स्कन्दस्यैव सलोकताम् ।

तत्र शाखैर्विशाखैश्च नैगमीयैश्च सुन्दरि ।

स्थापितानि च लिङ्गानि गणैः सर्वैर्बहूनि च ॥ ७६

लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६७ फ्र द्विज चारों वेदोंका ज्ञाता हो जाता है ॥ ६१-६२ ॥ वेदेश्वरके उत्तरमें स्वयं केशव विराजमान हैं; वे इस क्षेत्रके कारणभूत क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं । हे सुश्रोणि! उनके दर्शनसे समस्त चराचर [ जगत् ] दृष्टिगत हो जाता है ॥६३१ / २ ॥ हे सुश्रोणि! उनके समीपमें मेरा संगमेश्वरलिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे हे सुश्रोणि! सज्जनोंके साथ समागम होता है ॥६४ ॥

संगमेश्वरके पूर्वमें चारमुखवाला लिङ्ग है; हे भद्रे! ब्रह्माके द्वारा स्थापित किया गया वह प्रयाग नामसे पुकारा जाता है । उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम ब्रह्मलोक प्राप्त करता है । वहाँपर वे शांकरीदेवी ब्रह्मवृक्षमें विद्यमान हैं और जो लोग तीर्थमें निवास करनेवाले हैं, उन सबको वे शान्ति प्रदान करती हैं । इसके बाद गंगा तथा वरणा संगमको जानना चाहिये ॥ ६५–६७ ॥ जब बुधवार के दिन श्रवण- द्वादशीका योग उपस्थित हो, उस समय उसमें स्नान करके मनुष्य क्षेत्रसन्निधिका फल प्राप्त करता है । हे यशस्विनि! उस कालमें वहाँपर जो [ मनुष्य ] श्राद्ध करता है, वह समस्त पितरोंका उद्धार करके विष्णुलोक जाता है॥६८-६९ ॥ वरणाके पूर्व - तटपर कुम्भीश्वर [ लिङ्ग ] बताया गया है । कुम्भीश्वरके पूर्वमें कालेश्वर [ लिङ्ग ] कहा गया है । हे वरानने! कालेश्वरके उत्तरमें सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा कपिलाहद नामक महातीर्थ कहा गया है । जो [ मनुष्य ] उस हृद ( सरोवर ) - में भक्ति-परायण होकर स्नान करता और वृषध्वजका दर्शन करता है, वह राजसूय [ यज्ञ ] - का फल प्राप्त करता है ॥ ७०-७२ ॥ हे देवि! वहाँ श्राद्ध किये जानेपर नरकमें स्थित पितामहसहित सभी पितर पितृलोक प्राप्त करते हैं । महर्षियोंने वहाँ किये गये श्राद्धको गयामें किये गये श्राद्धसे आठ गुना पुण्यप्रद बताया है । हे भद्रे! वहाँ श्राद्ध करनेपर मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है ॥७३-७४ ॥ हे भामिनि! हे सुरेश्वरि! महादेवके पश्चिम दिशाभागमें स्कन्दने भक्तिपूर्वक मेरा लिङ्ग स्थापित किया है; उसके दर्शनसे लोग स्कन्दका सालोक्य प्राप्त । करते हैं । हे सुन्दरि! वहाँ शाख, विशाख तथा नैगमीय—

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ परिशिष्ट ७६८

स्कन्देश्वरस्योत्तरतो बलभद्रप्रतिष्ठितम् ।

तेन दृष्टेन देवेशि अनन्तफलमाप्नुयात् ॥

स्कन्देश्वराद्दक्षिणतो महालिङ्गं प्रतिष्ठितम् ।

पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं स्थापितं नन्दिना पुरा ॥

तं दृष्ट्वा मनुजो देवि नन्दिलोकमवाप्नुयात् ।

नन्दीश्वरात् पश्चिमतो लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम् ॥

स्वर्लीनसदृशं भद्रे नन्दिपित्रा प्रतिष्ठितम् ।

शिलाक्षेश्वरनामानं सुरसङ्घैः प्रपूजितम् ॥

अन्यत्तत्र तु विख्यातं हिरण्याक्षेश्वरं विभुम् ।

हिरण्याक्षेण दैत्येन स्थापितं मम भक्तितः ॥

हिरण्याख्यस्य सामीप्ये अन्यैर्देवैः सहस्रशः ।

स्थापितानि च लिङ्गानि भक्त्या चैव फलार्थिभिः ॥

अन्यद्वै देवदेवस्य स्थितं पश्चान्मुखं स्मृतम् ।

तत्र स्थाने वरारोहे हिरण्याक्षस्य दक्षिणे ॥

तेषां पश्चिमदिग्भागे अट्टहासं स्थितं शुभम् ।

मुखं लिङ्गं तु तद्देवि पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥

प्रसन्नवदने देवि सर्वपातकनाशकम् ।

तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऐशानं लोकमाप्नुयात् ॥

अट्टहाससमीपेन पश्चिमेन यशस्विनि ।

मित्रावरुणनामानौ पूर्वद्वारे व्यवस्थितौ ॥

मित्रावरुणलोकस्तु तयोः सन्दर्शनाद्भवेत् ।

अन्यत्तत्रैव विख्यातं वसिष्ठेशमिति स्थितम् ॥

स्थापितं तत्र तल्लिङ्गं याज्ञवल्क्येन वै पुरा ।

चतुर्मुखं च तल्लिङ्गं सर्वपापक्षयकरम् ॥

अन्यत्तत्रैव संलग्नं मैत्रेय्या स्थापितं शुभम् ।

तेन दृष्टेन लभते परं ज्ञानं सुदुर्लभम् ॥

इन सभी गणोंके द्वारा मेरे बहुत - से लिङ्ग स्थापित किये ७७ गये हैं ॥ ७५-७६ ॥ हे देवेशि! स्कन्देश्वरके उत्तरमें बलभद्रजीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है; उसके दर्शनसे मनुष्य ७८ अनन्त फल प्राप्त करता है । स्कन्देश्वरके दक्षिणमें महालिङ्ग विराजमान है; पूर्वकालमें नन्दीने पश्चिमकी ओर मुखवाले उस लिङ्गको स्थापित किया था । हे ७ ९ देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य नन्दीका लोक प्राप्त करता है॥७७-७८१ / २ ॥ नन्दीश्वरके पश्चिममें पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित ८० है । हे भद्रे! स्वर्लीनसदृश शिलाक्षेश्वर नामक वह लिङ्ग नन्दीके पिताके द्वारा स्थापित किया गया है, जो । देवसमुदायके द्वारा पूजित है ॥ ७ ९ -८० ॥ ८१ वहाँपर हिरण्याक्षदैत्यने मेरी भक्तिसे हिरण्याक्षेश्वर नामक अन्य प्रसिद्ध तथा सर्वव्यापी लिङ्गकी भी स्थापना की है । फलकी आकांक्षावाले अन्य देवताओंके ८२ द्वारा हिरण्याक्षेश्वरके समीपमें भक्तिपूर्वक हजारों लिङ्ग स्थापित किये गये हैं ॥ ८१-८२ ॥ हे वरारोहे! उस स्थानपर हिरण्याक्षके दक्षिणमें ८३ देवदेव [ शिव ] -का अन्य पश्चिममुखवाला लिङ्ग भी बताया गया है ॥ ८३ ॥

८४ उनके पश्चिम दिशाभागमें अट्टहास नामक शुभ लिङ्ग स्थित है । हे देवि! वह मुखलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए विराजमान है, हे प्रसन्न मुखवाली ८५ देवि! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है; हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है ॥ ८४-८५ ॥ ८६ हे यशस्विनि! अट्टहासके समीप पश्चिममें पूर्वद्वारपर | मित्रावरुण नामक दो लिङ्ग स्थित हैं; उन दोनोंके दर्शनसे मित्रावरुणलोक प्राप्त होता है । वहींपर वसिष्ठेश नामक ८७ अन्य प्रसिद्ध लिङ्ग भी विराजमान है ॥ ८६-८७ ॥ पूर्वकालमें [ महर्षि ] याज्ञवल्क्यने भी लिङ्गको स्थापित किया था; चार मुखोंवाला वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश ८८ । करनेवाला है ॥ ८८ ॥

वहीं पर समीपमें मैत्रेयीके द्वारा स्थापित अन्य शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे मनुष्य अति दुर्लभ परम ८ ९ । ज्ञान प्राप्त करता है ॥ ८ ९ ॥