श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 171–180

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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राजा नाभिकी पत्नी मेरु देवीके गर्भसे ऋषभदेवके रूपमें भगवान्ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया । इस रूपमें उन्होंने परमहंसोंका वह मार्ग, जो सभी आश्रमियोंके लिये वन्दनीय है, दिखाया ॥१३ ॥ ऋषियोंकी प्रार्थनासे नवीं बार वे राजा पृथुके रूपमें अवतीर्ण हुए ।

शौनकादि ऋषियो! इस अवतारमें उन्होंने पृथ्वीसे समस्त ओषधियोंका दोहन किया था, इससे यह अवतार सबके लिये बड़ा ही कल्याणकारी हुआ ॥१४ ॥ चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें

जब सारी त्रिलोकी समुद्रमें डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्यके रूपमें दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौकापर बैठाकर अगले मन्वन्तरके अधिपति वैवस्वत मनुकी रक्षा की ॥१५ ॥ जिस समय देवता और दैत्य समुद्र - मन्थन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ

अवतार धारण करके कच्छपरूपसे भगवान्ने मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया ॥१६ ॥ बारहवीं बार धन्वन्तरिके रूपमें अमृत लेकर समुद्रसे प्रकट हुए और तेरहवीं

बार मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंको मोहित करते हुए देवताओंको अमृत पिलाया ॥१७ ॥

चौदहवें अवतारमें उन्होंने नरसिंहरूप धारण किया और अत्यन्त बलवान् दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी छाती अपने नखोंसे अनायास इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनानेवाला सींकको चीर डालता है ॥ १८ ॥ पंद्रहवीं बार वामनका रूप धारण करके भगवान्

दैत्यराज बलिके यज्ञमें गये । वे चाहते तो थे त्रिलोकीका राज्य, परन्तु माँगी उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी ॥१९ ॥ सोलहवें परशुराम अवतारमें जब उन्होंने देखा कि राजालोग ब्राह्मणोंके

द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया ॥२० ॥ इसके बाद सत्रहवें अवतारमें सत्यवतीके गर्भसे पराशरजीके द्वारा वे व्यासके

रूपमें अवतीर्ण हुए, उस समय लोगोंकी समझ और धारणाशक्ति कम देखकर आपने वेदरूप वृक्षकी कई शाखाएँ बना दीं || २१ || अठारहवीं बार देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेकी इच्छासे उन्होंने राजाके रूपमें रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत - सी लीलाएँ कीं ॥२२ ॥

एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।

रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥२३

ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।

बुद्धो नाम्नाजनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥२४

अथासौ युगसंध्यायां दस्युप्रायेषु राजसु ।

जनिता विष्णुयशसो नाम्ना कल्किर्जगत्पतिः ॥२५

अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः ।

यथाविदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥२६

ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः ।

कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयस्तथा ॥२७

एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।

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इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८

जन्म गुह्यं भगवतो य एतत्प्रयतो नरः ।

सायं प्रातर्गृणन् भक्त्या दुःखग्रामाद्विमुच्यते ॥ २ ९

एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।

मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥३०

यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।

एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥३१

उन्नीसवें और बीसवें अवतारोंमें उन्होंने यदुवंशमें बलराम और श्रीकृष्णके नामसे प्रकट होकर पृथ्वीका भार उतारा ॥ २३ ॥ उसके बाद कलियुग आ जानेपर मगधदेश ( बिहार ) -में

देवताओंके द्वेषी दैत्योंको मोहित करनेके लिये अजनके पुत्ररूपमें आपका बुद्धावतार होगा ॥२४ ॥ इसके भी बहुत पीछे जब कलियुगका अन्त समीप होगा और राजालोग प्रायः

लुटेरे हो जायँगे, तब जगत्के रक्षक भगवान् विष्णुयश नामक ब्राह्मणके घर कल्किरूपमें अवतीर्ण होंगे * ॥२५ ॥

शौनकादि ऋषियो! जैसे अगाध सरोवरसे हजारों छोटे - छोटे नाले निकलते हैं, वैसे ही सत्त्वनिधि भगवान् श्रीहरिके असंख्य अवतार हुआ करते हैं || २६ || ऋषि, मनु, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी महान् शक्तिशाली हैं, वे सब - के - सब भगवान्के ही अंश हैं ॥२७ ॥ ये सब अवतार तो भगवान्‌के अंशावतार अथवा कलावतार हैं, परंतु भगवान्

श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् ( अवतारी ) ही हैं । जब लोग दैत्योंके अत्याचारसे व्याकुल हो उठते हैं, तब युग - युगमें अनेक रूप धारण करके भगवान् उनकी रक्षा करते हैं ॥२८ ॥ भगवान्के

दिव्य जन्मोंकी यह कथा अत्यन्त गोपनीय - रहस्यमयी है; जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे नियमपूर्वक सायंकाल और प्रातःकाल प्रेमसे इसका पाठ करता है, वह सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥२९ ॥

प्राकृत स्वरूपरहित चिन्मय भगवान्‌का जो यह स्थूल जगदाकार रूप है, यह उनकी मायाके महत्तत्त्वादि गुणोंसे भगवान में ही कल्पित है ॥ ३० ॥ जैसे बादल वायुके आश्रय रहते

हैं और धूसरपना धूलमें होता है, परन्तु अल्पबुद्धि मनुष्य बादलोंका आकाशमें और धूसरपनेका वायुमें आरोप करते हैं - वैसे ही अविवेकी पुरुष सबके साक्षी आत्मामें स्थूल दृश्यरूप जगत्का आरोप करते हैं ॥ ३१ ॥ इस स्थूलरूपसे परे भगवान्का एक सूक्ष्म अव्यक्त

रूप है— जो न तो स्थूलकी तरह आकारादि गुणोंवाला है और न देखने, सुननेमें ही आ सकता है; वही सूक्ष्मशरीर है । आत्माका आरोप या प्रवेश होनेसे यही जीव कहलाता है और इसीका बार - बार जन्म होता है ॥३२ ॥

अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणव्यूहितम् ।

अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात्स जीवो यत्पुनर्भवः ॥ ३२

पृष्ठ 173

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यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।

अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥३३

यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।

सम्पन्न एवेति विदुर्महिम्नि स्वे महीयते ॥३४

एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च ।

वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥३५

स वा इदं विश्वममोघलीलः सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन् । भूतेषु चान्तर्हित आत्मतन्त्रः षाड्वर्गिकं जिघ्रति षड्गुणेशः ॥ ३६ न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातु-रवैति जन्तुः कुमनीष ऊतीः । नामानि रूपाणि मनोवचोभिः सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञः ॥३७ स वेद धातुः पदवीं परस्य दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः । योऽमायया संततयानुवृत्त्या भजेत तत्पादसरोजगन्धम् ॥३८ उपर्युक्त सूक्ष्म और स्थूलशरीर अविद्यासे ही आत्मामें आरोपित हैं । जिस अवस्थामें आत्मस्वरूपके ज्ञानसे यह आरोप दूर हो जाता है, उसी समय ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ॥३३ ॥ तत्त्वज्ञानी लोग जानते हैं कि जिस समय यह बुद्धिरूपा परमेश्वरकी माया निवृत्त

हो जाती है, उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपनी स्वरूप - महिमामें प्रतिष्ठित होता है ॥३४ ॥ वास्तवमें जिनके जन्म नहीं हैं और कर्म भी नहीं हैं, उन हृदयेश्वर भगवान्के

अप्राकृत जन्म और कर्मोंका तत्त्वज्ञानी लोग इसी प्रकार वर्णन करते हैं; क्योंकि उनके जन्म और कर्म वेदोंके अत्यन्त गोपनीय रहस्य हैं ॥३५ ॥

भगवान्की लीला अमोघ है । वे लीलासे ही इस संसारका सृजन, पालन और संहार करते हैं, किंतु इसमें आसक्त नहीं होते । प्राणियोंके अन्तःकरणमें छिपे रहकर ज्ञानेन्द्रिय और मनके नियन्ताके रूपमें उनके विषयोंको ग्रहण भी करते हैं, परंतु उनसे अलग रहते हैं, वे परम स्वतन्त्र हैं — ये विषय कभी उन्हें लिप्त नहीं कर सकते || ३६ || जैसे अनजान मनुष्य

पृष्ठ 174

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जादूगर अथवा नटके संकल्प और वचनोंसे की हुई करामातको नहीं समझ पाता, वैसे ही अपने संकल्प और वेदवाणीके द्वारा भगवान्‌के प्रकट किये हुए इन नाना नाम और रूपोंको तथा उनकी लीलाओंको कुबुद्धि जीव बहुत - सी तर्क -युक्तियोंके द्वारा नहीं पहचान सकता ॥३७ ॥ चक्रपाणि भगवान्‌की शक्ति और पराक्रम अनन्त है— उनकी कोई थाह नहीं

पा सकता । वे सारे जगत्के निर्माता होनेपर भी उससे सर्वथा परे हैं । उनके स्वरूपको अथवा उनकी लीलाके रहस्यको वही जान सकता है, जो नित्य - निरन्तर निष्कपटभावसे उनके चरणकमलोंकी दिव्य गन्धका सेवन करता है - सेवाभावसे उनके चरणोंका चिन्तन करता रहता है ॥ ३८ ॥

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे । कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः ॥३९

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।

उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥४०

निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् ।

तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम् ॥४१

सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ।

स तु संश्रावयामास महाराजं परीक्षितम् ॥४२

प्रायोपविष्टं गंगायां परीतं परमर्षिभिः ।

कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह ॥४३

कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः ।

तत्र कीर्तयतो विप्रा विप्रर्षेर्भूरितेजसः ॥४४

अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहात् ।

सोऽहं वः श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामति ॥४५

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवनमें और विघ्न - बाधाओंसे भरे इस संसारमें समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म - मरणरूप संसारके

पृष्ठ 175

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भयंकर चक्रमें नहीं पड़ना होता ॥ ३ ९ ॥ भगवान् वेदव्यासने यह वेदोंके समान भगवच्चरित्रसे परिपूर्ण भागवत नामका पुराण बनाया है ॥४० ॥ उन्होंने इस श्लाघनीय, कल्याणकारी और महान् पुराणको लोगोंके परम

कल्याणके लिये अपने आत्मज्ञानिशिरोमणि पुत्रको ग्रहण कराया ॥ ४१ ॥ इसमें सारे वेद और

इतिहासोंका सार - सार संग्रह किया गया है । शुकदेवजीने राजा परीक्षित्‌को यह सुनाया ॥४२ ॥ उस समय वे परमर्षियोंसे घिरे हुए आमरण अनशनका व्रत लेकर गंगातटपर

बैठे हुए थे । भगवान् श्रीकृष्ण जब धर्म, ज्ञान आदिके साथ अपने परमधामको पधार गये, तब इस कलियुगमें जो लोग अज्ञानरूपी अन्धकारसे अंधे हो रहे हैं, उनके लिये यह पुराणरूपी सूर्य इस समय प्रकट हुआ है । शौनकादि ऋषियो! जब महातेजस्वी श्रीशुकदेवजी महाराज वहाँ इस पुराणकी कथा कह रहे थे, तब मैं भी वहाँ बैठा था । वहीं मैंने उनकी कृपापूर्ण अनुमतिसे इसका अध्ययन किया । मेरा जैसा अध्ययन है और मेरी बुद्धिने जितना जिस प्रकार इसको ग्रहण किया है, उसीके अनुसार इसे मैं आपलोगोंको सुनाऊँगा ॥४३-४५ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥३ ॥

* यहाँ बाईस अवतारोंकी गणना की गयी है, परन्तु भगवान्‌के चौबीस अवतार प्रसिद्ध हैं । कुछ विद्वान् चौबीसकी संख्या यों पूर्ण करते हैं - राम कृष्णके अतिरिक्त बीस अवतार तो उपर्युक्त हैं ही, शेष चार अवतार श्रीकृष्णके ही अंश हैं । स्वयं श्रीकृष्ण तो पूर्ण परमेश्वर हैं; वे अवतार नहीं, अवतारी हैं । अतः श्रीकृष्णको अवतारोंकी गणनामें नहीं गिनते । उनके चार अंश ये हैं — एक तो केशका अवतार, दूसरा सुतपा तथा पृश्निपर कृपा करनेवाला अवतार, तीसरा संकर्षण - बलराम और चौथा परब्रह्म । इस प्रकार इन चार अवतारोंसे विशिष्ट पाँचवें साक्षात् भगवान् वासुदेव हैं । दूसरे विद्वान् ऐसा मानते हैं कि बाईस अवतार तो उपर्युक्त हैं ही; इनके अतिरिक्त दो और हैं- हंस और हयग्रीव ।

पृष्ठ 176

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अथ चतुर्थोऽध्यायः महर्षि व्यासका असन्तोष व्यास उवाच

इति ब्रुवाणं संस्तूय मुनीनां दीर्घसत्रिणाम् ।

वृद्धः कुलपतिः सूतं बहृचः शौनकोऽब्रवीत् ॥ १

व्यासजी कहते हैं - उस दीर्घकालीन सत्रमें सम्मिलित हुए मुनियोंमें विद्यावयोवृद्ध कुलपति ऋग्वेदी शौनकजीने सूतजीकी पूर्वोक्त बात सुनकर उनकी प्रशंसा की और कहा ॥१ ॥

शौनक उवाच

सूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर ।

कथां भागवतीं पुण्यां यदाह भगवाञ्छुकः ॥२

कस्मिन् युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना ।

कुतः सञ्चोदितः कृष्णः कृतवान् संहितां मुनिः ॥३

तस्य पुत्रो महायोगी समदृनिर्विकल्पकः ।

एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४

दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नं १ दैव्यो ह्रिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम् । तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः ॥५

कथमालक्षितः पौरैः सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलान् ।

उन्मत्तमूकजडवद्विचरन् गजसाह्वये ॥६

कथं वा पाण्डवेयस्य राजर्षेर्मुनिना सह ।

संवादः समभूत्तात यत्रैषा सात्वती श्रुतिः ॥७

स गोदोहनमात्रं हि गृहेषु गृहमेधिनाम् ।

अवेक्षते महाभागस्तीर्थीकुर्वंस्तदाश्रमम् ॥ ८

अभिमन्युसुतं सूत प्राहुर्भागवतोत्तमम् ।

तस्य जन्म महाश्चर्यं कर्माणि च गृणीहि नः ॥९

पृष्ठ 177

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स सम्राट् कस्य वा हेतोः पाण्डूनां मानवर्धनः ।

प्रायोपविष्टो गङ्गायामनादृत्याधिराश्रियम् ॥१०

शौनकजी बोले – सूतजी! आप वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं तथा बड़े भाग्यशाली हैं, जो कथा भगवान् श्रीशुकदेवजीने कही थी, वही भगवान्‌की पुण्यमयी कथा कृपा करके आप हमें सुनाइये ॥२ ॥

वह कथा किस युगमें किस स्थानपर और किस कारणसे हुई थी? मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायनने किसकी प्रेरणासे इस परमहंसोंकी संहिताका निर्माण किया था? ॥३ ॥

उनके पुत्र शुकदेवजी बड़े योगी, समदर्शी, भेदभावरहित, संसारनिद्रासे जगे एवं निरन्तर एकमात्र परमात्मामें ही स्थिर रहते हैं । वे छिपे रहनेके कारण मूढ़ - से प्रतीत होते हैं ॥४ ॥

व्यासजी जब संन्यासके लिये वनकी ओर जाते हुए अपने पुत्रका पीछा कर रहे थे, उस समय जलमें स्नान करनेवाली स्त्रियोंने नंगे शुकदेवको देखकर तो वस्त्र धारण नहीं किया, परंतु वस्त्र पहने हुए व्यासजीको देखकर लज्जासे कपड़े पहन लिये थे । इस आश्चर्यको देखकर जब व्यासजीने उन स्त्रियोंसे इसका कारण पूछा, तब उन्होंने उत्तर दिया कि ‘ आपकी दृष्टिमें तो अभी स्त्री - पुरुषका भेद बना हुआ है, परंतु आपके पुत्रकी शुद्ध दृष्टिमें यह भेद नहीं है ' ॥५ ॥

कुरुजांगल देशमें पहुँचकर हस्तिनापुरमें वे पागल, गूँगे तथा जडके समान विचरते होंगे । नगरवासियोंने उन्हें कैसे पहचाना? ॥६ ॥ पाण्डवनन्दन राजर्षि परीक्षित्का इन मौनी

शुकदेवजीके साथ संवाद कैसे हुआ, जिसमें यह भागवतसंहिता कही गयी? ॥७ ॥ महाभाग

श्रीशुकदेवजी तो गृहस्थोंके घरोंको तीर्थस्वरूप बना देनेके लिये उतनी ही देर उनके दरवाजेपर रहते हैं, जितनी देरमें एक गाय दुही जाती है || ८ || सूतजी! हमने सुना है कि अभिमन्युनन्दन परीक्षित् भगवान्के बड़े प्रेमी भक्त थे । उनके अत्यन्त आश्चर्यमय जन्म और कर्मोंका भी वर्णन कीजिये || ९ || वे तो पाण्डव - वंशके गौरव बढ़ानेवाले सम्राट् थे । वे भला, किस कारणसे साम्राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके गंगातटपर मृत्युपर्यन्त अनशनका व्रत लेकर बैठे थे? ॥१० ॥ शत्रुगण अपने भलेके लिये बहुत सा धन लाकर उनके चरण रखनेकी

चौकीको नमस्कार करते थे । वे एक वीर युवक थे । उन्होंने उस दुस्त्यज लक्ष्मीको, अपने प्राणोंके साथ भला, क्यों त्याग देनेकी इच्छा की ॥११ ॥ जिन लोगोंका जीवन भगवान्के

आश्रित है, वे तो संसारके परम कल्याण, अभ्युदय और समृद्धिके लिये ही जीवन धारण करते हैं । उसमें उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता । उनका शरीर तो दूसरोंके हितके लिये था, उन्होंने विरक्त होकर उसका परित्याग क्यों किया ॥१२ ॥ वेदवाणीको छोड़कर अन्य

समस्त शास्त्रोंके आप पारदर्शी विद्वान् हैं । सूतजी! इसलिये इस समय जो कुछ हमने आपसे पूछा है, वह सब कृपा करके हमें कहिये ॥१३ ॥

नमन्ति यत्पादनिकेतमात्मनः शिवाय हानीय धनानि शत्रवः । कथं स वीरः श्रियमंग दुस्त्यजां युवैषतोत्स्रष्टुमहो सहासुभिः ॥११

पृष्ठ 178

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शिवाय लोकस्य भवाय भूतये य उत्तमश्लोकपरायणा जनाः । जीवन्ति नात्मार्थमसौ पराश्रयं मुमोच निर्विद्य कुतः कलेवरम् ॥१२

तत्सर्वं नः समाचक्ष्व पृष्टो यदिह किञ्चन ।

मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ॥१३

सूत उवाच

द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये ।

जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः ॥१४

स कदाचित्सरस्वत्या उपस्पृश्य जलं शुचिः ।

विविक्तदेश आसीन उदिते रविमण्डले ॥१५

परावरज्ञः स ऋषिः कालेनाव्यक्तरंहसा ।

युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥१६

भौतिकानां च भावानां शक्तिह्रासं च तत्कृतम् ।

अश्रद्दधानान्निःसत्त्वान्दुर्मेधान् ह्रसितायुषः ॥१७

दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुषा ।

सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ॥ १८

चातुर्होत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् ।

व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥१९

ऋग्यजुः सामाथर्वाख्या वेदाश्चत्वार उद्धृताः ।

इतिहासपुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते ॥२०

सूतजीने कहा - इस वर्तमान चतुर्युगीके तीसरे युग द्वापरमें महर्षि पराशरके द्वारा वसुकन्या सत्यवतीके गर्भसे भगवान्‌के कलावतार योगिराज व्यासजीका जन्म हुआ ॥१४ ॥

एक दिन वे सूर्योदयके समय सरस्वतीके पवित्र जलमें स्नानादि करके एकान्त पवित्र स्थानपर बैठेहुए थे ॥१५ ॥ महर्षि भूत और भविष्यको जानते थे । उनकी दृष्टि अचूक थी । उन्होंने

देखा कि जिसको लोग जान नहीं पाते, ऐसे समयके फेरसे प्रत्येक युगमें धर्मसंकरता और उसके प्रभावसे भौतिक वस्तुओंकी भी शक्तिका ह्रास होता रहता है । संसारके लोग श्रद्धाहीन और शक्तिरहित हो जाते हैं । उनकी बुद्धि कर्तव्यका ठीक - ठीक निर्णय नहीं कर पाती और आयु भी कम हो जाती है । लोगोंकी इस भाग्यहीनताको देखकर उन मुनीश्वरने अपनी दिव्यदृष्टिसे समस्त वर्णों और आश्रमोंका हित कैसे हो, इसपर विचार किया ॥१६-१८ ॥

पृष्ठ 179

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उन्होंने सोचा कि वेदोक्त चातुर्होत्र * कर्म लोगोंका हृदय शुद्ध करनेवाला है । इस दृष्टिसे यज्ञोंका विस्तार करनेके लिये उन्होंने एक ही वेदके चार विभाग कर दिये || १ ९ || व्यासजीके द्वारा ऋक्, यजुः, साम और अथर्व – इन चार वेदोंका उद्धार ( पृथक्करण ) हुआ । इतिहास और पुराणोंको पाँचवाँ वेद कहा जाता है ॥२० ॥

तत्रर्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः ।

वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत ॥ २१

अथर्वाङ्गिगरसामासीत्सुमन्तुर्दारुणो मुनिः ।

इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥ २२

त एत ऋषयो वेदं स्वं स्वं व्यस्यन्ननेकधा ।

शिष्यैः प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनोऽभवन् ॥२३

त एव वेदा दुर्मेधैर्धार्यन्ते पुरुषैर्यथा ।

एवं चकार भगवान् व्यासः कृपणवत्सलः ॥२४

स्त्री शूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।

कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।

इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥२५

एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः ।

सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्धृदयं ततः ॥२६

नातिप्रसीदद्धृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।

वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं प्रोवाच धर्मवित् ॥२७

धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।

मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥२८

भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।

दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरप्युत ॥२९

तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभुः ।

असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्यसत्तमः ॥३०

किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।

प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥३१

उनमेंसे ऋग्वेदके पैल, सामगानके विद्वान् जैमिनि एवं यजुर्वेदके एकमात्र स्नातक वैशम्पायन हुए ॥२१ ॥ अथर्ववेदमें प्रवीण हुए दरुणनन्दन सुमन्तु मुनि । इतिहास और

पुराणोंके स्नातक मेरे पिता रोमहर्षण थे || २२ || इन पूर्वोक्त ऋषियोंने अपनी - अपनी शाखाको और भी अनेक भागोंमें विभक्त कर दिया । इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य और उनके

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शिष्योंद्वारा वेदोंकी बहुत - सी शाखाएँ बन गयीं || २३ || कम समझवाले पुरुषोंपर कृपा करके भगवान् वेदव्यासने इसलिये ऐसा विभाग कर दिया कि जिन लोगोंको स्मरणशक्ति नहीं है या कम है, वे भी वेदोंको धारण कर सकें ॥२४ ॥

स्त्री, शूद्र और पतित द्विजाति- तीनों ही वेद - श्रवणके अधिकारी नहीं हैं । इसलिये वे कल्याणकारी शास्त्रोक्त कर्मोंके आचरणमें भूल कर बैठते हैं । अब इसके द्वारा उनका भी कल्याण हो जाय, यह सोचकर महामुनि व्यासजीने बड़ी कृपा करके महाभारत इतिहासकी रचना की ॥२५ ॥ शौनकादि ऋषियो! यद्यपि व्यासजी इस प्रकार अपनी पूरी शक्तिसे सदा-सर्वदा प्राणियोंके कल्याणमें ही लगे रहे, तथापि उनके हृदयको सन्तोष नहीं हुआ || २६ ||

उनका मन कुछ खिन्न - सा हो गया । सरस्वती नदीके पवित्र तटपर एकान्तमें बैठकर धर्मवेत्ता व्यासजी मन - ही - मन विचार करते हुए इस प्रकार कहने लगे- || २७ || ' मैंने निष्कपटभावसे ब्रह्मचर्यादि व्रतोंका पालन करते हुए वेद, गुरुजन और अग्नियोंका सम्मान किया है और उनकी आज्ञाका पालन किया है ॥ २८ ॥ महाभारतकी रचनाके बहाने मैंने वेदके अर्थको

खोल दिया है — जिससे स्त्री, शूद्र आदि भी अपने - अपने धर्म - कर्मका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं ॥२९ ॥ यद्यपि मैं ब्रह्मतेजसे सम्पन्न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्णकाम - सा

जान पड़ता है || ३० || अवश्य ही अबतक मैंने भगवान्‌को प्राप्त करानेवाले धर्मोका प्रायः निरूपण नहीं किया है । वे ही धर्म परमहंसोंको प्रिय हैं और वे ही भगवान्‌को भी प्रिय हैं ( हो-न हो मेरी अपूर्णताका यही कारण है ) ' ॥३१ ॥

तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।

कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥३२

तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनिः ।

पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम् ॥३३

श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास इस प्रकार अपनेको अपूर्ण - सा मानकर जब खिन्न हो रहे थे, उसी समय पूर्वोक्त आश्रमपर देवर्षि नारदजी आ पहुँचे || ३२ || उन्हें आया देख व्यासजी तुरन्त खड़े हो गये । उन्होंने देवताओंके द्वारा सम्मानित देवर्षि नारदकी विधिपूर्वक पूजा की ॥३३ ॥

इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः १ ॥४ ॥

१. प्रा ० पा ० — मप्सु मग्नाः । * होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा - ये चार होता हैं । इनके द्वारा सम्पादित होनेवाले