श्रीगणेशाय नमः।

नैमिषीयोपाख्यान : कम समझ वाले पुरुषों के लिए वेदों का विभाग क्यों किया गया?

धर्म का सुलभ प्रसार

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1–1 · पृष्ठ 135–180

4,225 शब्द · 22 मिनटका पाठ · 38 श्लोक

सूत ने शौनक से कहा

कलियुगी जीवों के परम कल्याण हेतु

शौनकादि ऋषियों ने नैमिषारण्य में अपने सहस्र वर्षों के यज्ञ के बीच सूत जी से पुराणों और धर्मशास्त्रों के ज्ञान के विषय में प्रश्न किया। सूत जी ने कलियुगी जीवों के परम कल्याण हेतु श्रीमद्भागवत कथा को ही एकमात्र साधन बताया।

हरिदासा ऊचुः श्रवणस्य विभेदेन फलभेदोऽत्र संस्थितः ।
श्रवणं तु कृतं सर्वैर्न तथा मननं कृतम् ।
फलभेदस्ततो जातो भजनादपि मानद ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 71पृष्ठ 135

सनकादि ऋषियों ने नारद जी को सप्ताह श्रवण की विधि और उसकी महिقة बताई। उन्होंने कहा कि यह विधि प्रायः लोगों की सहायता और धन से साध्य कही गई है। पहले तो यत्नपूर्वक ज्योतिषी को बुलाकर शुभ मुहूर्त पूछना चाहिए तथा जिस प्रकार विवाह के लिए धन का प्रबन्ध किया जाता है, उसी प्रकार धन की व्यवस्था करनी चाहिए। कथा आरम्भ करने हेतु भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण—ये छह महीने श्रोताओं के लिए मोक्ष प्राप्ति के कारण हैं। इन महीनों में भी भद्रा-व्यतीपात आदि कुयोगों को सर्वथा त्याग देना चाहिए और दूसरे उत्साही लोगों को अपना सहायक बना लेना चाहिए। फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरों में यह संवाद भेजना चाहिए कि यहाँ कथा होगी और सब लोगों को सपरिवार पधारना चाहिए। जो स्त्री और शूद्रादि भगवत्कथा एवं सङ्कीर्तन से दूर पड़ गए हैं, उन्हें भी सूचना हो जाए, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए।

सप्ताहयज्ञकी विधि कुमारा ऊचुः अथ ते सम्प्रवक्ष्यामः सप्ताहश्रवणे विधिम् ।
सहायैर्वसुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिः स्मृतः ॥

श्रीसनकादि कहते हैं - नारदजी! अब हम आपको सप्ताह श्रवणकी विधि बताते हैं । यह विधि प्रायः लोगोंकी सहायता और धनसे साध्य कही गयी है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 1पृष्ठ 139

विराक्त वैष्णवों और हरिकीर्तन के प्रेमियों के पास निमन्त्रण पत्र अवश्य भेजना चाहिए। इसमें लिखना चाहिए— "महानुभावों! यहाँ सात दिन तक सत्पुरुषों का बड़ा दुर्लभ समागम रहेगा और अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी। आप लोग भगद्रस के रसिक हैं, अतः श्रीभागवतामृत का पान करने के लिए प्रेमपूर्वक शीघ्र ही पधारने की कृपा करें। यदि आपको विशेष अवकाश न हो, तो भी एक दिन के लिए तो अवश्य ही कृपा करनी; क्योंकि यहाँ का तो एक क्षण भी अत्यन्त दुर्लभ है।" इस प्रकार विनयपूर्वक उन्हें निमन्त्रित करना चाहिए और आने वालों के लिए यथोचित निवास का प्रबन्ध करना चाहिए।

सप्तरात्रमुपोष्यैव प्रेतेन श्रवणं कृतम् ।
मननादि तथा तेन स्थिरचित्ते कृतं भृशम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 72पृष्ठ 136

वक्ता के रूप में ऐसे ब्राह्मण को चुनना चाहिए जो वेद-शास्त्र की स्पष्ट व्याख्या करने में समर्थ हों, दृष्टान्त देने में कुशल हों तथा विवेकी और निःस्पृह हों। वक्ता के पास उसकी सहायता के लिए एक ऐसा विद्वान भी होना चाहिए जो संशयों की निवृत्ति कर सके। कथा के प्रारम्भ से एक दिन पूर्व वक्ता को व्रत ग्रहण करने हेतु क्षौर करा लेना चाहिए। वह अरुणोदय के समय स्नान करके, नित्यकर्म समाप्त कर गणेश जी का पूजन करे और पितृगणों का तर्पण कर पूर्व पापों के प्रायश्चित्त के लिए एक मण्डल बनाकर उसमें श्रीहरि को स्थापित करे।

अयोध्यावासिनः पूर्वं यथा रामेण संगताः ।
तथा कृष्णेन ते नीता गोलोकं योगिदुर्लभम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 85पृष्ठ 137

वक्ता को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण को लक्ष्य करके मन्त्रोच्चारण के साथ षोडशोपचार विधि से पूजन करे और इस प्रकार प्रार्थना करे— "करुणानिधान! मैं संसारसागर में डूबा हुआ और बड़ा दीन हूँ। कर्मों के मोहरूपी ग्राह ने मुझे पकड़ रखा है। आप इस संसारसागर से मेरा उद्धार कीजिये।" इसके बाद वह श्रीमद्भागवत की भी उत्साह से पूजा करे और पुस्तक के आगे नारियल रखकर कहे— "श्रीमद्भागवत के रूप में आप साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र ही विराजमान हैं। नाथ! मैंने भवसागर से छुटकारा पाने के लिये आपकी शरण ली है। मेरा यह मनोरथ बिना किसी विघ्न-बाधा के पूरा करें। केशव! मैं आपका दास हूँ।"

दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छ्य यत्नतः ।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत् ॥

पहले तो यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जिस प्रकार धनका प्रबन्ध किया जाता है उस प्रकार ही धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिये ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 2पृष्ठ 139

वक्ता को चाहिए कि वह अपने कल्याण हेतु नियम ग्रहण करे और सात दिनों तक उसका पालन करे। कथा में विघ्न न हो, इसके लिए पाँच ब्राह्मणों द्वारा द्वादशाक्षर मन्त्र से जप कराया जाए। श्रोताओं को भी चाहिए कि वे लोक-धन-पुत्र की चिन्ता छोड़कर शुद्ध चित्त से केवल कथा में ध्यान लगाएं। कथा के समय मल-मूत्र वेग को रोकने हेतु अल्पाहार लेना उचित है; इसलिए श्रोता एक समय ही हविष्य अन्न ग्रहण करें। यदि शक्ति हो तो सातों दिन निराहार, दूध-घी या फलाहार पर रहकर कथा सुनें। जो उपवास से बाधित न हो, वही इसे करे।

सर्वथाऽऽगमनं कार्यं क्षणोऽत्रैव सुदुर्लभः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 10पृष्ठ 140

यह कथा धनहीन, क्षयरोगी, पापी, पुत्रहीन और मुमुक्षु भी सुन सकते हैं। जिस स्त्री की सन्तान नहीं रही या जिसका गर्भ गिर गया है, वह भी यत्नपूर्वक इसे सुने। ये सब यदि विधिवत् श्रवण करें तो इन्हें अक्षय फल प्राप्त होगा। यह दिव्य कथा करोड़ों यज्ञों के समान है। जब सप्ताहयज्ञ समाप्त हो जाए, तब श्रोताओं को भक्तिपूर्वक पुस्तक और वक्ता की पूजा करनी चाहिए। वक्ता उन्हें प्रसाद और तुलसी दे तथा सब लोग मृदङ्ग-झाँझ की ध्वनि के साथ सुन्दर कीर्तन करें।

लोकवित्तधनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च ।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 37पृष्ठ 142

जब धुन्धुकारी ये बातें कह रहा था, तभी वैकुण्ठवासी पार्षदों के सहित एक विमान उतरा; जिससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था। सब लोगों के सामने ही धुन्धुकारी उस विमान पर चढ़ गया। गोकर्ण ने उन पार्षदों को देखकर पूछा— "भगवान् के प्रिय पार्षदओ! यहाँ हमारे अनेकों शुद्धहृदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आप लोग एक साथ बहुत-से विमान क्यों नहीं लाये? हम देखते हैं कि यहाँ सभी ने समान रूप से कथा सुनी है, फिर फल में इस प्रकार का भेद क्यों हुआ, यह बताइये।"

प्रदक्षिणनमस्कारान् पूजान्ते स्तुतिमाचरेत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 26पृष्ठ 142

पार्षदों ने उत्तर दिया— "भोजन, अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल—इन सबका नाश हो जाता है। गुरुवचनों में विश्वास, दीनता का भाव, मन के दोषों पर विजय और कथा में चित्त की एकाग्रता यदि पालन किया जाए, तो श्रवण का यथार्थ फल मिलता है। यदि ये श्रोता फिर से श्रीमद्भागवत की कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठ की प्राप्ति होगी। और गोकर्ण जी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाम में ले जाएंगे।" यह कहकर वे सब पार्षद हरिकीर्तन करते हुए वैकुण्ठलोक को चले गए।

सप्ताहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्छृणु नारद ।
विष्णुदीक्षाविहीनानां नाधिकारः कथाश्रवे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 44पृष्ठ 144

कुत्ते और चाण्डाल पर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्ण जी की कृपा से विमानों पर चढ़ लिए गये और जहाँ योगि जन जाते हैं, उस भगवद्धाम में भेज दिए गये। इस प्रकार भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथा श्रवण से प्रसन्न होकर गोकर्ण जी को अपने ग्वालबालों के प्रिय गोलोकधाम में ले गए। पूर्वकाल में जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीराम के साथ साकेत धाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधाम ले गये। उस लोक में सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धों की भी कभी गति नहीं हो सकती, वहाँ वे श्रीमद्भागवत श्रवण करके चले गए।

उपोष्य सप्तरात्रं वै शक्तिश्चेच्छृणुयात्तदा ।
घृतपानं पयःपानं कृत्वा वै शृणुयात्सुखम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 41पृष्ठ 144

कथा के इस भाग में, जब श्रीमद्भागवत के श्रवण से ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की लहरें उठने लगीं और वे तीनों एकदम तरुण होकर जीव के चित्त को अपनी ओर खींचने लगे, तब कथा का वातावरण अत्यन्त दिव्य हो गया। समस्त प्राणियों ने नियमपूर्वक इस कथा को सुना और भगवान पुरुषोत्तम की स्तुति की।

श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि ।
स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 30पृष्ठ 142

इस परम आनन्द की अवस्था में, देवर्षि नारदजी का हृदय भी प्रसन्नता से भर उठा। उनके पूरे शरीर में रोमाँच दौड़ गया और वे परमानन्द में डूब गए। अपने मनोरथ की सिद्धि पाकर, वे हाथ जोड़कर, प्रेम से गद्गद वाणी में सनकादि ऋषियों से कहने लगे— "मैं धन्य हूँ! आप लोगों ने मुझ पर करुणा करके मुझे बड़ा ही अनुगृहीत किया है। आज मुझे सर्वपापहारी भगवान श्रीहरि की ही प्राप्ति हो गई है।"

मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया ।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 31पृष्ठ 142

नारदजी ने आगे कहा— "हे तपोधनो! मैं श्रीमद्भागवत के श्रवण को ही समस्त धर्मों में श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि इसके श्रवण मात्र से गोलोक-विहारी श्रीकृष्ण की प्राप्ति हो जाती है।"

मायापिशाचीपरिमर्दितानाम् ।
संसारसिन्धौ परिपातितानां क्षेमाय वै भागवतं प्रगर्जति ॥

इसके पश्चात् नारदजीने भगवान् तथा उनके पार्षदोंके चरणोंको लक्ष्य करके प्रणाम किया और फिर शुकदेवजी आदि तपस्वियोंको भी नमस्कार किया । कथामृतका पान करनेसे सब लोगोंको बड़ा ही आनन्द हुआ, उनका सारा मोह नष्ट हो गया । फिर वे सब लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ९ ० ॥ उस समय शुकदेवजीने भक्तिको उसके पुत्रोंसहित अपने शास्त्रमें स्थापित कर दिया । इसीसे भागवतका सेवन करनेसे श्रीहरि वैष्णवोंके हृदयमें आ विराजते हैं ॥९ १ ॥ जो लोग दरिद्रताके दुःखज्वरकी ज्वालासे दग्ध हो रहे हैं, जिन्हें माया-पिशाचीने रौंद डाला है तथा जो संसारसमुद्रमें डूब रहे हैं, उनका कल्याण करनेके लिये श्रीमद्भागवत सिंहनाद कर रहा है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 92पृष्ठ 152

तभी, वैष्णव श्रेष्ठ नारदजी के ये वचन अभी गूँज ही रहे थे कि वहाँ घूमते-फिरते योगेश्वर श्रीशुकदेवजी आ गए। व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी, जिनकी आयु मात्र सोलह वर्ष थी, आत्मलाभ से पूर्ण और ज्ञानरूपी महासागर के संवर्धन हेतु चन्द्रमा के समान शीतल भाव से धीरे-धीरे श्रीमद्भागवत का पाठ कर रहे थे। उन्हें देखते ही सभा में उपस्थित सभी लोग झटपट खड़े हो गए और उन्हें एक ऊँचे आसन पर बैठाया। देवर्षि नारदजी ने भी उनका प्रेमपूर्वक पूजन किया।

शुकदेवजी ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा— "आप लोग मेरी निर्मल वाणी सुनिए।" उन्होंने आगे बताया— "यह भागवत पुराणों का तिलक और वैष्णवों का धन है। इसमें उन परमहंसों के प्राप्य विशुद्ध ज्ञान का वर्णन है, जो ज्ञान, वैराग्य और भक्ति सहित निवृत्तिमार्ग को प्रकाशित करता है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसके श्रवण, पठन और मनन में तत्पर रहता है, वह निश्चित ही मुक्त हो जाता है। यह रस स्वर्गलोक, सत्यलोक, कैलास और वैकुण्ठ में भी नहीं है; इसलिए भाग्यवान श्रोताओं! तुम इसका खूब पान करो, इसे कभी मत छोड़ना।"

भक्तिः सुताभ्यां सह रक्षिता सा शास्त्रे स्वकीयेऽपि तदा शुकेन ।
अतो हरिर्भागवतस्य सेवना-च्चित्तं समायाति हि वैष्णवानाम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 91पृष्ठ 151

शुकदेवजी की वाणी अभी चल ही रही थी कि उस सभा के बीचों-बीच प्रह्लाद, बलि, उद्धव और अर्जुन जैसे पार्षदों के साथ साक्षात् श्रीहरि प्रकट हो गए। भगवान को देखकर देवर्षि नारद ने उनकी यथोचित पूजा की। भगवान को प्रसन्न देखकर नारदजी ने उन्हें एक विशाल सिंहासन पर बैठा दिया।

तभी वहाँ एक अलौकिक कीर्तन आरम्भ हुआ। प्रह्लाद जी चञ्चलगति के कारण करताल बजाने लगे, उद्धवजी ने झाँझें उठा लीं, देवर्षि नारद वीणा की मधुर ध्वनि करने लगे और गान-विद्या में कुशल अर्जुन राग अलापने लगे। इन्द्र ने मृदङ्ग बजाना शुरू किया और सनकादि ऋषि बीच-बीच में जयघोष कर रहे थे। इन सबके आगे शुकदेवजी विभिन्न प्रकार की सरस अङ्गभङ्गियों के माध्यम से भाव प्रकट कर रहे थे। इस अद्भुत दृश्य में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नटों की तरह नाचने लगे।

शौनक उवाच

शुकेनोक्तं कदा राज्ञे गोकर्णेन कदा पुनः ।
सुरर्षये कदा ब्राह्मैश्छिन्धि मे संशयं त्विमम् ॥

शौनकजीने पूछा — सूतजी! शुकदेवजीने राजा परीक्षित्को, गोकर्णने धुन्धुकारीको और सनकादिने नारदजीको किस - किस समय यह ग्रन्थ सुनाया था - मेरा यह संशय दूर कीजिये!

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 93पृष्ठ 152

ऐसा अलौकिक कीर्तन देखकर भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले— "मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तन से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे भक्तिभाव ने इस समय मुझे अपने वश में कर लिया है। अतः तुम लोग मुझसे वर माँगो।"

सूत उवाच

आकृष्णनिर्गमात्रिंशद्वर्षाधिकगते कलौ ।
नवमीतो नभस्ये च कथारम्भं शुकोऽकरोत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 94पृष्ठ 152

भगवान के ये वचन सुनकर सभी भक्त प्रेम से भर गए और कहने लगे— "हे भगवन! हमारी बस यही अभिलाषा है कि भविष्य में भी जहाँ कहीं भी सप्ताह-कथा हो, वहाँ आप इन पार्षदों के सहित अवश्य पधारें। हमारा यह मनोरथ पूर्ण कर दीजिए।" भगवान ने 'तथास्तु' कहा और अन्तर्धान हो गए।

सूत उवाच

परीक्षिच्छ्रवणान्ते च कलौ वर्षशतद्वये ।
शुद्धे शुचौ नवम्यां च धेनुजोऽकथयत्कथाम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 95पृष्ठ 152

इसके पश्चात नारदजी ने भगवान और उनके पार्षदों के चरणों को लक्ष्य करके प्रणाम किया और शुकदेवजी आदि तपस्वियों को भी नमस्कार किया। इस कथामृत के पान से सभी का मोह नष्ट हो गया और वे अपने स्थानों को चले गए। इस प्रकार शुकदेवजी ने भक्ति को उसके पुत्रों सहित अपने शास्त्र में स्थापित कर दिया; जिससे भागवत का सेवन करने मात्र से श्रीहरि वैष्णवों के हृदय में आ विराजते हैं।

सूत उवाच

तस्मादपि कलौ प्राप्ते त्रिंशद्वर्षगते सति ।
ऊचुरूर्जे सिते पक्षे नवम्यां ब्रह्मणः सुताः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 96पृष्ठ 152

सूतजी कहते हैं— "शौनकजी! उन ऋषियों ने पूछा था कि शुकदेवजी ने यह कथा किन्हें सुनाई थी? तो सुनिए— भगवान श्रीकृष्ण के स्वधामगमन के बाद, कलियुग के तीस वर्ष बीत जाने पर भाद्रपद मास की शुक्ला नवमी को शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को यह कथा सुनाई थी। उसके दो सौ वर्ष बीत जाने पर, आषाढ़ मास की शुक्ला नवमी को गोकर्णजी ने यह कथा सुनाई। और फिर तीस वर्ष बाद, कार्तिक शुक्ला नवमी से सनकादि ऋषियों ने इसे सुनाया।"

स्वपुरुषमपि वीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले ।
परिहर भगवत्कथासु मत्तान् प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम् ॥

अपने दूतको हाथमें पाश लिये देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं — ‘ देखो, जो भगवान्की कथा - वार्तामें मत्त हो रहे हों, उनसे दूर रहना; मैं औरोंको ही दण्ड देनेकी शक्ति रखता हूँ, वैष्णवोंको नहीं '

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 99पृष्ठ 153

सूतजी आगे कहते हैं— "हे निष्पाप शौनकजी! मैंने आपको सब बता दिया है। इस कलियुग में भागवत की कथा भवरोग की रामबाण औषधि है। सन्तजन! आप लोग इस कथामृत का पान करें, क्योंकि यह श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय और सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है। लोक में अन्य कल्याणकारी साधनों और तीर्थों के सेवन से क्या होगा?"

जब यमराज के दूत किसी भक्त के पास जाते हैं, तो वे डरकर कहते हैं— "देखो, जो भगवान की कथा-वार्ता में मत्त हो रहे हों, उनसे दूर रहना; मैं औरों को ही दण्ड देने की शक्ति रखता हूँ, वैष्णवों को नहीं।"

इस असार संसार में विषयरूप विष से व्याकुल बुद्धि वाले पुरुषों! अपने कल्याण के लिए इस शुक-कथा रूपी अनुपम सुधा का पान करो। निन्दित कथाओं में व्यर्थ मत भटकिए; क्योंकि यह कथा कान में पड़ते ही मुक्ति दिला देती है, इसके साक्षी राजा परीक्षित हैं। जो इस कथा का श्रवण करता है, वह वैकुण्ठ का स्वामी बन जाता है।

शौनकजी! मैंने अनेक शास्त्रों को देखकर यह परम गोप्य रहस्य आपको सुनाया है। संसार में इस शुक-शास्त्र से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है; अतः आप परमानन्द की प्राप्ति के लिए इस द्वादश स्कन्धरूप रस का पान करें। जो पुरुष नियमपूर्वक भक्तिभाव से इसका श्रवण करता है और शुद्ध अन्तःकरण से दूसरों को सुनाता है, उनके लिए त्रिलोकी में कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता।

यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है। श्रीशुकदेव रूपी तोते के मुख से जुड़ जाने के कारण यह परमानन्दमयी सुधा से परिपूर्ण हो गया है। इस फल में छिलका या गुठली जैसा कोई त्याज्य अंश नहीं है; यह केवल मूर्तिमान रस है। जब तक शरीर में चेतना रहे, तब तक इस दिव्य भगवद्रस का निरन्तर पान करते रहें। यह पृथ्वी पर ही सुलभ है।

शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियों के ये प्रश्न सुनकर, रोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूतजी को बड़ा ही आनन्द हुआ। उन्होंने ऋषियों के इस मङ्गलमय प्रश्न का अभिनन्दन करते हुए कहना आरम्भ किया—

व्यास उवाच

इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहर्षणिः ।
प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥

श्रीव्यासजी कहते हैं— शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियोंके ये प्रश्न सुनकर रोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाको बड़ा ही आनन्द हुआ । उन्होंने ऋषियोंके इस मंगलमय प्रश्नका अभिनन्दन करके कहना आरम्भ किया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 1पृष्ठ 161

"हे ऋषियों! जिस समय श्रीशुकदेवजी का यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था, उन्हें अकेले ही सन्न्यास लेने के उद्देश्य से जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरह से कातर होकर पुकारने लगे थे— 'बेटा! बेटा!' उस समय तन्मय होने के कारण श्रीशुकदेवजी की ओर से वृक्षों ने उत्तर दिया था। ऐसे सबके हृदय में विराजमान श्रीशुकदेव मुनि को मैं नमस्कार करता हूँ।"

स्तुति सूत उवाच

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥

सूतजीने कहा — जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक - वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे - ' बेटा! बेटा! ' उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया । ऐसे सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 2पृष्ठ 161

सूतजी ने आगे कहा, "यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय और रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूप का अनुभव कराने वाला और समस्त वेदों का सार है। संसार में फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकार से पार जाना चाहते हैं, उनके लिये यह आध्यात्मिक तत्त्वों को प्रकाशित करने वाला एक अद्वितीय दीपक है। वास्तव में उन्हीं पर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियों के आचार्य श्रीशुकदेवजी ने इसका वर्णन किया है; मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ।"

सूत उवाच

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् ।
संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥

यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय - रहस्यात्मक पुराण है । यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है । संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करानेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है । वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े - बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है । मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 3पृष्ठ 161

"मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ— भगवान् के अवतार नर-नारायण, ऋषियों, सरस्वती देवी और श्रीव्यासदेवजी को नमस्कार करके, तब संसार और अन्तःकरण के समस्त विकारों पर विजय प्राप्त करने वाले इस श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ करना चाहिए। मोक्ष की सार्थकता अर्थ प्राप्ति में नहीं है; अर्थ केवल धर्म के लिये है। भोग-विलास का फल इन्द्रियों को तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन केवल जीवन निर्वाह है। जीवन का फल भी तत्त्वजिज्ञासा है; बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है।"

सूत उवाच

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान्‌के अवतार नर - नारायण ऋषियोंको, सरस्वती देवीको और श्रीव्यासदेवजीको नमस्कार करके तब संसार और अन्तःकरणके समस्त विकारोंपर विजय प्राप्त करानेवाले इस श्रीमद्भागवतमहापुराणका पाठ करना चाहिये ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 4पृष्ठ 161

"तत्त्ववेत्ता लोग ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्द स्वरूप ज्ञान को ही तत्त्व कहते हैं। उसी को कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान् के नाम से पुकारते हैं। श्रद्धालु मुनिजन भागवत श्रवण से प्राप्त ज्ञान और वैराग्ययुक्त भक्ति से अपने हृदय में उस परमतत्त्वरूप परमात्मा का अनुभव करते हैं। हे शौनकादि ऋषियों! यही कारण है कि मनुष्य अपने-अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार जो धर्म का अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसी में है कि भगवान् प्रसन्न हों। इसलिए एकाग्र मन से भक्तवत्सल भगवान् का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिए।"

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 6पृष्ठ 162

"कर्मों की गाँठ बड़ी कड़ी होती है, किन्तु विचारवान् पुरुष भगवान् के चिन्तन की तलवार से उस गाँठ को काट डालते हैं। तब भला, ऐसा कौन मनुष्य होगा जो भगवान् की लीला-कथामें प्रेम से न सुने? जब भगवान् की प्रेममयी भक्ति से संसार की समस्त आसक्तियाँ मिट जाती हैं और हृदय आनन्द से भर जाता है, तब भगवान् के तत्त्व का अनुभव अपने आप हो जाता है। हृदय में आत्मस्वरूप भगवान् का साक्षात्कार होते ही हृदय की ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्म-बन्धन क्षीण हो जाता है। इसी से बुद्धिमान लोग नित्य-निरन्तर बड़े आनन्द से भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्म-प्रसाद की प्राप्ति होती है।"

तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।
पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 12पृष्ठ 163

"संसार के समस्त कर्मों की परिसमाप्ति श्रीकृष्ण में ही है। ज्ञान से ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण की ही प्राप्ति होती है। तपस्या श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये ही की जाती है और धर्मों का अनुष्ठान भी उन्हीं के लिये होता है। सब गतियाँ श्रीकृष्ण में ही समा जाती हैं। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके गुणों से अतीत हैं, फिर भी अपनी गुणमयी माया से— जो प्रपञ्च की दृष्टि से है किन्तु तत्त्व की दृष्टि से नहीं— उन्होंने ही सृष्टि के आदि में इस संसार की रचना की थी।"

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 21पृष्ठ 164

"वस्तुतः वह एक ही है, परन्तु जब वह अनेक प्रकार की लकड़ियों में प्रकट होती है, तब अनेक-सी मालूम पड़ती है। वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परन्तु प्राणियों की अनेकता से वे अनेक जैसे जान पड़ते हैं। भगवान् ही सूक्ष्म भूत-तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणों के विकारभूत भावों द्वारा नाना प्रकार की योनियों का निर्माण करते हैं और उनमें भिन्न-भिन्न जीवों के रूप में प्रवेश करके उन-उन योनियों के अनुरूप विषयों का उपभोग कराते हैं। वे ही सम्पूर्ण लोकों की रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियों में लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुण के द्वारा जीवों का पालन-पोषण करते हैं।"

भावयत्येष सत्त्वेन लोकान् वै लोकभावनः ।
लीलावतारानुरतो ' देवतिर्यङ्नरादिषु ॥

तो वस्तुतः एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकड़ियोंमें प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है । वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकतासे अनेक - जैसे जान पड़ते हैं || ३२ || भगवान् ही सूक्ष्म भूत - तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारकी योनियोंका निर्माण करते हैं और उनमें भिन्न - भिन्न जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन - उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते - कराते हैं ॥३३ ॥ वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु - पक्षी, मनुष्य आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा जीवोंका पालन - पोषण करते हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 34पृष्ठ 166

"सृष्टि के आदि में भगवान् ने लोकों के निर्माण की इच्छा की। इच्छा होते ही उन्होंने महत्तत्त्व आदि से निष्पन्न पुरुष रूप ग्रहण किया; जिसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत— ये सोलह कलाएँ थीं। उन्होंने कारण-जल में शयन करते हुए जब योगनिद्रा का विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवर से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान् के उस विराट रूप में ही समस्त लोकों की कल्पना की गई है; वह भगवान् का विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप है। योगी लोग दिव्य दृष्टि से भगवान् के उस रूप का दर्शन करते हैं। भगवान् का वह रूप हजारों पैर, जाँघें, भुजाएँ और मुखों के कारण अत्यन्त विलक्षण है; उसमें सहस्रों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं। वह हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से उल्लसित रहता है।"

सूत उवाच

जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः ।
सम्भूतं षोडशकलमादी लोकसिसृक्षया ॥

श्रीसूतजी कहते हैं — सृष्टिके आदिमें भगवान्ने लोकोंके निर्माणकी इच्छा की । इच्छा होते ही उन्होंने महत्तत्त्व आदिसे निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया । उसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत — ये सोलह कलाएँ थीं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 1पृष्ठ 168

"भगवान् का यही पुरुष रूप, जिसे नारायण कहते हैं, अनेक अवतारों का अक्षय कोष है— इसी से सारे अवतार प्रकट होते हैं। उन्हीं प्रभु ने पहले कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार— इन चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण करके अत्यन्त कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया। दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिये, समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान् ने ही रसातल में गयी हुई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर रूप ग्रहण किया।"

सूत उवाच

यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः ।
नाभिह्रदाम्बुजादासीद्ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ॥

उन्होंने कारण - जलमें शयन करते हुए जब योगनिद्राका विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवरमेंसे एक कमल प्रकट हुआ और उस कमलसे प्रजापतियोंके अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 2पृष्ठ 168

वर माँगने पर छठे अवतार में वे अत्रिकी सन्तान - दत्तात्रेय हुए। इस अवतार में उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदिको ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया। सातवीं बार रुचि प्रजापतिकी आकूति नामक पत्नी से यज्ञ के रूप में उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की; यह अवतार सबके लिये बड़ा ही कल्याणकारी हुआ। चाक्षुष मन्वन्तर के अन्त में जब सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्य के रूपमें दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौका पर बैठाकर अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की। जिस समय देवता और दैत्य समुद्र-मन्थन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण करके कच्छ रूप से भगवान् ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया। बारहवीं बार धन्वन्तरि के रूप में अमृत लेकर समुद्र से प्रकट हुए और तेरहवीं बार मोहिनी रूप धारण करके दैत्यों को मोहित करते हुए देवताओं को अमृत पिलाया। सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया।

अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रमः ।
दर्शयन् वर्त्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 13पृष्ठ 170

इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशरजी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुए। उस समय लोगों की समझ और धारणाशक्ति कम देखकर आपने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाएँ बना दीं। अठारहवीं बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से आपने राजा के रूप में रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत-सी लीलाएँ कीं। उन्नीसवें और बीसवें अवतारों में उन्होंने यदुवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के नाम से प्रकट होकर पृथ्वी का भार उतारा। उसके बाद कलियुग आ जाने पर मगध देश में देवताओं के द्वेषी दैत्यों को मोहित करने के लिये अजन के पुत्र रूप में आपका बुद्धावतार होगा। इसके भी बहुत पीछे जब कलियुग का अन्त समीप होगा और राजा लोग प्रायः लुटेरे हो जायेंगे, तब जगत् के रक्षक भगवान् विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में अवतीर्ण होंगे। प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी महान् शक्तिशाली हैं, वे सब भगवान् के ही अंश हैं। ये सब अवतार तो भगवान् के अंशावतार अथवा कलावतार हैं, परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् (अवतारी) ही हैं। जब लोग दैत्यों के अत्याचार से व्याकुल हो उठते हैं, तब युग-युग में अनेक रूप धारण करके भगवान् उनकी रक्षा करते हैं।

ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।
दुग्धेमामोषधीर्विप्रास्तेनायं स उशत्तमः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 14पृष्ठ 170

भगवान् के दिव्य जन्मों की यह कथा अत्यन्त गोपनीय और रहस्यमयी है; जो मनुष्य एकाग्रचित्त से नियमपूर्वक सायङ्काल और प्रातःकाल प्रेम से इसका पाठ करता है, वह सब दुःखों से छूट जाता है। माया के महत्तत्त्वादि गुणों से भगवान् में ही कल्पित है। जैसे बादल वायु के आश्रय रहते हैं और धूसरपना धूल में होता है, परन्तु अल्पबुद्धि मनुष्य बादलों का आकाश में और धूसरपने का वायु में आरोप करते हैं—वैसे ही अविवेकी पुरुष सबके साक्षी आत्मा में स्थूल दृश्यरूप जगत् का आरोप करते हैं। इस स्थूल रूप से परे भगवान् का एक सूक्ष्म अव्यक्त रूप है—जो न तो स्थूल की तरह आकारादि गुणों वाला है और न देखने, सुनने में ही आ सकता है; वही सूक्ष्म शरीर है। आत्मा का आरोप या प्रवेश होने से यही जीव कहलाता है और इसी का बार-बार जन्म होता है। उपर्युक्त सूक्ष्म और स्थूल शरीर अविद्या से ही आत्मा में आरोपित हैं। जिस अवस्थामें आत्मस्वरूप के ज्ञान से यह आरोप दूर हो जाता है, उसी समय ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। तत्त्वज्ञानी लोग जानते हैं कि जिस समय यह बुद्धिरूपा परमेश्वर की माया निवृत्त हो जाती है, उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपनी स्वरूप-महिमा में प्रतिष्ठित हो जाता है।

रूपं स जगृहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसम्प्लवे ।
नाव्यारोप्य महीमय्यामपाद्वैवस्वतं मनुम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 15पृष्ठ 170

वास्तव में जिनके जन्म नहीं हैं और कर्म भी नहीं हैं, उन हृदयेश्वर भगवान् के अप्राकृत जन्म और कर्मों का तत्त्वज्ञानी लोग इसी प्रकार वर्णन करते हैं; क्योंकि उनके जन्म और कर्म वेदों के अत्यन्त गोपनीय रहस्य हैं। अपने सङ्कल्प और वेदवाणी के द्वारा भगवान् के प्रकट किये हुए इन नाना नाम और रूपों को तथा उनकी लीलाओं को कुबुद्धि जीव बहुत-सी तर्क-युक्तियों द्वारा नहीं पहचान सकता। चक्रपाणि भगवान् की शक्ति और पराक्रम अनन्त है; उनकी कोई थाह नहीं पा सकता। वे सारे जगत् के निर्माता होने पर भी उससे सर्वथा परे हैं। उनके स्वरूप को अथवा उनकी लीला के रहस्य को वही जान सकता है, जो नित्य-निरन्तर निष्कपट भाव से उनके चरणकमलों की दिव्य गन्ध का सेवन करता है और सेवाभाव से उनके चरणों का चिन्तन करता रहता है।

एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च ।
वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥

उपर्युक्त सूक्ष्म और स्थूलशरीर अविद्यासे ही आत्मामें आरोपित हैं । जिस अवस्थामें आत्मस्वरूपके ज्ञानसे यह आरोप दूर हो जाता है, उसी समय ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ॥३३ ॥ तत्त्वज्ञानी लोग जानते हैं कि जिस समय यह बुद्धिरूपा परमेश्वरकी माया निवृत्त हो जाती है, उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपनी स्वरूप - महिमामें प्रतिष्ठित होता है ॥३४ ॥ वास्तवमें जिनके जन्म नहीं हैं और कर्म भी नहीं हैं, उन हृदयेश्वर भगवान्के अप्राकृत जन्म और कर्मोंका तत्त्वज्ञानी लोग इसी प्रकार वर्णन करते हैं; क्योंकि उनके जन्म और कर्म वेदोंके अत्यन्त गोपनीय रहस्य हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 35पृष्ठ 173

शौनकादि ऋषियों! आप लोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवन में और विघ्न-बाधाओं से भरे इस संसार में समस्त लोकों के स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण से वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरण रूप संसार के भयङ्कर चक्र में नहीं पड़ना होता।

इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 28पृष्ठ 172

जब महातेजस्वी श्रीशुकदेवजी महाराज वहाँ इस पुराण की कथा कह रहे थे, तब मैं भी वहाँ बैठा था। वहीं मैंने उनकी कृपापूर्ण अनुमति से इसका अध्ययन किया। मेरा जैसा अध्ययन है और मेरी बुद्धिने जितना जिस प्रकार इसको ग्रहण किया है, उसी के अनुसार इसे मैं आप लोगों को सुनाऊँगा।

व्यासजी कहते हैं—उस दीर्घकालीन सत्र में सम्मिलित हुए मुनियों में विद्यावयोवृद्ध कुलपति ऋग्वेदी शौनकजी ने सूतजी की पूर्वोक्त बात सुनकर उनकी प्रशंसा की और कहा—"सूतजी! आप वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं तथा बड़े भाग्यशाली हैं, जो कथा भगवान् श्रीशुकदेवजी ने कही थी, वही भगवान् की पुण्यमयी कथा कृपा करके आप हमें सुनाइये। वह कथा किस युग में, किस स्थान पर और किस कारण से हुई थी? मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन ने किसकी प्रेरणा से इस परमहंसों की संहिता का निर्माण किया था?"

निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 41पृष्ठ 174

उनके पुत्र शुकदेवजी बड़े योगी, समदर्शी, भेद-भावरहित, संसारनिद्रा से जगे एवं निरन्तर एकमात्र परमात्मा में ही स्थिर रहते हैं। वे छिपे रहने के कारण मूढ़ से प्रतीत होते हैं। व्यासजी जब सन्न्यास के लिये वन की ओर जाते हुए अपने पुत्र का पीछा कर रहे थे, उस समय जल में स्नान करने वाली स्त्रियों ने नङ्गे शुकदेव को देखकर तो वस्त्र धारण नहीं किया, परन्तु वस्त्र पहने हुए व्यासजी को देखकर लज्जा से कपड़े पहन लिये थे। इस आश्चर्य को देखकर जब व्यासजी ने उन स्त्रियों से इसका कारण पूछा, तब उन्होंने उत्तर दिया कि—"आपकी दृष्टि में तो अभी स्त्री-पुरुष का भेद बना हुआ है, परन्तु आपके पुत्र की शुद्ध दृष्टि में यह भेद नहीं है।"

वे एक वीर युवक थे। उन्होंने उस दुस्त्यज लक्ष्मी को, अपने प्राणों के साथ भला, क्यों त्याग देने की इच्छा की? जिन लोगों का जीवन भगवान् के आश्रित है, वे तो संसार के परम कल्याण, अभ्युदय और समृद्धि के लिये ही जीवन धारण करते हैं। उसमें उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता। उनका शरीर तो दूसरों के हित के लिये था, उन्होंने विरक्त होकर उसका परित्याग क्यों किया? वेदवाणी को छोड़कर अन्य समस्त शास्त्रों के आप पारदर्शी विद्वान् हैं। सूतजी! इसलिये इस समय जो कुछ हमने आपसे पूछा है, वह सब कृपा करके हमें कहिये।

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 40पृष्ठ 174

सूतजी ने कहा—इस वर्तमान चतुर्युगी के तीसरे युग द्वापर में महर्षि पराशर के द्वारा वसुकन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान् के कलावतार योगिराज व्यासजी का जन्म हुआ। एक दिन वे सूर्योदय के समय सरस्वती के पवित्र जल में स्नानादि करके एकान्त पवित्र स्थान पर बैठे हुए थे। महर्षि भूत और भविष्य को जानते थे। उनकी दृष्टि अचूक थी। उन्होंने देखा कि जिसको लोग जान नहीं पाते, ऐसे समय के फेर से प्रत्येक युग में धर्म सङ्करता और उसके प्रभाव से भौतिक वस्तुओं की भी शक्ति का ह्रास होता रहता है। संसार के लोग श्रद्धाहीन और शक्तिरहित हो जाते हैं। उनकी बुद्धि कर्तव्य का ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाती और आयु भी कम हो जाती है। लोगों की इस भाग्यहीनता को देखकर उन मुनीश्वर ने अपनी दिव्य दृष्टि से समस्त वर्णों और आश्रमों का हित कैसे हो, इस पर विचार किया।

कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः ।
तत्र कीर्तयतो विप्रा विप्रर्षेर्भूरितेजसः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 44पृष्ठ 174

इन पूर्वोक्त ऋषियों ने अपनी-अपनी शाखा को और भी अनेक भागों में विभक्त कर दिया। इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य और उनके शिष्यों द्वारा वेदों की बहुत-सी शाखाएँ बन गयीं। कम समझवाले पुरुषों पर कृपा करके भगवान् वेदव्यास ने इसलिये ऐसा विभाग कर दिया कि जिन लोगों को स्मरणशक्ति नहीं है या कम है, वे भी वेदों को धारण कर सकें।

व्यासजी मन-ही-मन विचार करते हुए इस प्रकार कहने लगे—"मैंने निष्कपट भाव से ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन करते हुए वेद, गुरुजन और अग्नियों का सम्मान किया है और उनकी आज्ञा का पालन किया है। महाभारत की रचना के बहाने मैंने वेद के अर्थ को खोल दिया है—जिससे स्त्री, शूद्र आदि भी अपने-अपने धर्म-कर्म का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। यद्यपि मैं ब्रह्मतेज से सम्पन्न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्ण सा जान पड़ता है। अवश्य ही अब तक मैंने भगवान् को प्राप्त कराने वाले धर्मों का प्रायः निरूपण नहीं किया है। वे ही धर्म परमहंसों को प्रिय हैं और वे ही भगवान् को भी प्रिय हैं।"

सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ।
स तु संश्रावयामास महाराजं परीक्षितम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 42पृष्ठ 174

श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास इस प्रकार अपने को अपूर्ण-सा मानकर जब खिन्न हो रहे थे, उसी समय पूर्वोक्त आश्रम पर देवर्षि नारदजी आ पहुँचे। उन्हें आया देख व्यासजी तुरन्त खड़े हो गये। उन्होंने देवताओं के द्वारा सम्मानित देवर्षि नारद की विधिपूर्वक पूजा की।

In English

The Glory of Shrimad Bhagavata Katha

Suta Ji explains the importance of listening to the Shrimad Bhagavata to achieve spiritual liberation. The text describes the rituals for a seven-day storytelling session, the divine kirtan performed by devotees like Narada and Shukadeva, and how various listeners reached higher realms through the hearing of the text.

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