श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 341–350

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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है ॥८ ॥ भगवान् तो अकेले ही हैं । वे बहुत - से कर्म करनेके लिये पुरुषरूपसे प्रकृतिके

विभिन्न गुणोंको एक साथ ही धारण करते हैं अथवा अनेकों अवतार ग्रहण करके उन्हें क्रमशः धारण करते हैं ॥९ ॥ मुनिवर! आप वेद और ब्रह्मतत्त्व दोनोंके पूर्ण मर्मज्ञ हैं, इसलिये मेरे इस

सन्देहका निवारण कीजिये ॥१० ॥

सूतजी कहते हैं - जब राजा परीक्षितने भगवान्‌के गुणोंका वर्णन करनेके लिये उनसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब श्रीशुकदेवजीने भगवान् श्रीकृष्णका बार - बार स्मरण करके अपना प्रवचन प्रारम्भ किया ॥११ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- उन पुरुषोत्तम भगवान्‌के चरणकमलोंमें मेरे कोटि - कोटि प्रणाम हैं, जो संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करनेके लिये सत्त्व, रज तथा तमोगुणरूप तीन शक्तियोंको स्वीकार कर ब्रह्मा, विष्णु और शंकरका रूप धारण करते हैं; जो समस्त चर - अचर प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हैं, जिनका स्वरूप और उसकी उपलब्धिका मार्ग बुद्धिके विषय नहीं हैं; जो स्वयं अनन्त हैं तथा जिनकी महिमा भी अनन्त है ॥१२ ॥

भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसता-मसम्भवायाखिलसत्त्वमूर्तये । पुंसां पुनः पारमहंस्य आश्रमे व्यवस्थितानामनुमृग्यदाशुषे ॥ १३ नमो नमस्तेऽस्त्वृषभाय सात्वतां विदूरकाष्ठाय मुहुः कुयोगिनाम् । निरस्तसाम्यातिशयेन राधसा स्वधामनि ब्रह्मणि रंस्यते नमः ॥१४ यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम् । लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥१५ विचक्षणा यच्चरणोपसादनात्

सङ्ग व्युदस्योभयतोऽन्तरात्मनः ।

विन्दन्ति हि ब्रह्मगतिं गतक्लमा-स्तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥१६

तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः । क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥१७

पृष्ठ 342

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किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः । येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ १८ स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर-स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः । हम पुनः बार - बार उनके चरणोंमें नमस्कार करते हैं, जो सत्पुरुषोंका दुःख मिटाकर उन्हें अपने प्रेमका दान करते हैं, दुष्टोंकी सांसारिक बढ़ती रोककर उन्हें मुक्ति देते हैं तथा जो लोग परमहंस आश्रममें स्थित हैं, उन्हें उनकी भी अभीष्ट वस्तुका दान करते हैं । क्योंकि चर - अचर समस्त प्राणी उन्हींकी मूर्ति हैं, इसलिये किसीसे भी उनका पक्षपात नहीं है ॥१३ ॥ जो बड़े

ही भक्तवत्सल हैं और हठपूर्वक भक्तिहीन साधन करनेवाले लोग जिनकी छाया भी नहीं छू सकते; जिनके समान भी किसीका ऐश्वर्य नहीं है, फिर उससे अधिक तो हो ही कैसे सकता है तथा ऐसे ऐश्वर्यसे युक्त होकर जो निरन्तर ब्रह्मस्वरूप अपने धाममें विहार करते रहते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ ॥१४ ॥ जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन,

वन्दन, श्रवण और पूजन जीवोंके पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है, उन पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णको बार - बार नमस्कार है ॥ १५ ॥ विवेकी पुरुष जिनके चरणकमलोंकी शरण लेकर

अपने हृदयसे इस लोक और परलोककी आसक्ति निकाल डालते हैं और बिना किसी परिश्रमके ही ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेते हैं, उन मंगलमय कीर्तिवाले भगवान् श्रीकृष्णको अनेक बार नमस्कार है ॥ १६ ॥ बड़े - बड़े तपस्वी, दानी, यशस्वी, मनस्वी, सदाचारी और

मन्त्रवेत्ता जबतक अपनी साधनाओंको तथा अपने - आपको उनके चरणोंमें समर्पित नहीं कर देते, तबतक उन्हें कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती । जिनके प्रति आत्मसमर्पणकी ऐसी महिमा है, उन कल्याणमयी कीर्तिवाले भगवान्‌को बार - बार नमस्कार है ॥ १७ ॥ किरात, हूण, आन्ध्र,

पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि नीच जातियाँ तथा दूसरे पापी जिनके शरणागत भक्तोंकी शरण ग्रहण करनेसे ही पवित्र हो जाते हैं, उन सर्वशक्तिमान् भगवान्को बार - बार नमस्कार है ॥१८ ॥ वे ही भगवान् ज्ञानियोंके आत्मा हैं, भक्तोंके स्वामी हैं,

कर्मकाण्डियोंके लिये वेदमूर्ति हैं, धार्मिकोंके लिये धर्ममूर्ति हैं और तपस्वियोंके लिये तपःस्वरूप हैं । ब्रह्मा, शंकर आदि बड़े - बड़े देवता भी अपने शुद्ध हृदयसे उनके स्वरूपका चिन्तन करते और आश्चर्यचकित होकर देखते रहते हैं । वे मुझपर अपने अनुग्रहकी-प्रसादकी वर्षा करें || १ ९ || जो समस्त सम्पत्तियोंकी स्वामिनी लक्ष्मीदेवीके पति हैं, समस्त यज्ञोंके भोक्ता एवं फलदाता हैं, प्रजाके रक्षक हैं, सबके अन्तर्यामी और समस्त लोकोंके पालनकर्ता हैं तथा पृथ्वीदेवीके स्वामी हैं, जिन्होंने यदुवंशमें प्रकट होकर अन्धक, वृष्णि एवं यदुवंशके लोगोंकी रक्षा की है तथा जो उन लोगोंके एकमात्र आश्रय रहे हैं — वे भक्तवत्सल, संतजनोंके सर्वस्व श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों || २० || विद्वान् पुरुष जिनके चरणकमलोंके चिन्तनरूप समाधिसे शुद्ध हुई बुद्धिके द्वारा आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं तथा उनके

पृष्ठ 343

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दर्शनके अनन्तर अपनी - अपनी मति और रुचिके अनुसार जिनके स्वरूपका वर्णन करते रहते हैं, वे प्रेम और मुक्तिके लुटानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥ २१ ॥ जिन्होंने सृष्टिके

समय ब्रह्माके हृदयमें पूर्वकल्पकी स्मृति जागरित करनेके लिये ज्ञानकी अधिष्ठात्री देवीको प्रेरित किया और वे अपने अंगोंके सहित वेदके रूपमें उनके मुखसे प्रकट हुईं, वे ज्ञानके मूलकारण भगवान् मुझपर कृपा करें, मेरे हृदयमें प्रकट हों ॥ २२ ॥ भगवान् ही

पंचमहाभूतोंसे इन शरीरोंका निर्माण करके इनमें जीवरूपसे शयन करते हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण और एक मन - इन सोलह कलाओंसे युक्त होकर इनके द्वारा सोलह विषयोंका भोग करते हैं । वे सर्वभूतमय भगवान् मेरी वाणीको अपने गुणोंसे अलंकृत कर दें ॥२३ ॥ संत पुरुष जिनके मुखकमलसे मकरन्दके समान झरती हुई ज्ञानमयी

सुधाका पान करते रहते हैं उन वासुदेवावतार सर्वज्ञ भगवान् व्यासके चरणोंमें मेरा बार - बार नमस्कार है ॥२४ ॥

गतव्यलीकैरजशङ्करादिभि-र्वितर्क्यलिङ्गो भगवान् प्रसीदताम् ॥१९ श्रियः पतिर्यज्ञपतिः प्रजापति-र्धियां पतिर्लोकपतिर्धरापतिः । पतिर्गतिश्चान्धकवृष्णिसात्वतां प्रसीदतां मे भगवान् सतां पतिः ॥२० यदङ्घ्यभिध्यानसमाधिधौतया ' धियानुपश्यन्ति हि तत्त्वमात्मनः । वदन्ति चैतत् कवयो यथारुचं स मे मुकुन्दो भगवान् प्रसीदताम् ॥२१ प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य ' सतीं स्मृतिं हृदि । स्वलक्षणा े प्रादुरभूत् किलास्यतः स मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम् ॥२२ भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभु-र्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः । भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥२३ नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय वेधसे ।

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पपुर्ज्ञानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम् ॥२४

एतदेवात्मभू राजन् नारदाय विपृच्छते ।

वेदगर्भोऽभ्यधात् साक्षात् यदाह हरिरात्मनः ॥२५

परीक्षित्! वेदगर्भ स्वयम्भू ब्रह्माने नारदके प्रश्न करनेपर यही बात कही थी, जिसका स्वयं भगवान् नारायणने उन्हें उपदेश किया था ( और वही मैं तुमसे कह रहा हूँ ) ॥२५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

१. प्रा ० पा ० – वितन्वतोऽजस्य । २. प्रा ० पा ० - विलक्षणा । ३. प्रा ० पा ० – सर्वं यदाह हरिरीश्वरः ।

पृष्ठ 345

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अथ पञ्चमोऽध्यायः सृष्टि - वर्णन नारद उवाच

देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज ।

तद् विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्त्वनिदर्शनम् ॥१

यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं प्रभो ।

यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्त्वं वद तत्त्वतः ॥२

सर्वं ह्येतद् भवान् वेद भूतभव्यभवत्प्रभुः करामलकवद् विश्वं विज्ञानावसितं तव ॥३

यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।

एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥४

आत्मन् भावयसे तानि न पराभावयन् स्वयम् ।

आत्मशक्तिमवष्टभ्य ऊर्णनाभिरिवाक्लमः ॥५

नाहं वेद परं ह्यस्मिन्नापरं न समं विभो ।

नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६

स भवानचरद् घोरं यत् तपः सुसमाहितः ।

तेन खेदयसे नस्त्वं पराशङ्कां प्रयच्छसि ॥७

एतन्मे पृच्छतः सर्वं सर्वज्ञ सकलेश्वर ।

विजानीहि यथैवेदमहं बुद्ध्येऽनुशासितः ॥ ८

नारदजीने पूछा — पिताजी! आप केवल मेरे ही नहीं, सबके पिता, समस्त देवताओंसे श्रेष्ठ एवं सृष्टिकर्ता हैं । आपको मेरा प्रणाम है । आप मुझे वह ज्ञान दीजिये, जिससे आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है || १ || पिताजी! इस संसारका क्या लक्षण है? इसका आधार क्या है? इसका निर्माण किसने किया है? इसका प्रलय किसमें होता है? यह किसके

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अधीन है? और वास्तवमें यह है क्या वस्तु? आप इसका तत्त्व बतलाइये ॥२ ॥ आप तो यह

सब कुछ जानते हैं; क्योंकि जो कुछ हुआ है, हो रहा है या होगा, उसके स्वामी आप ही हैं । यह सारा संसार हथेलीपर रखे हुए आँवलेके समान आपकी ज्ञान - दृष्टिके अन्तर्गत ही है ॥३ ॥ पिताजी! आपको यह ज्ञान कहाँसे मिला? आप किसके आधारपर ठहरे हुए हैं?

आपका स्वामी कौन है? और आपका स्वरूप क्या है? आप अकेले ही अपनी मायासे पंचभूतोंके द्वारा प्राणियोंकी सृष्टि कर लेते हैं, कितना अद्भुत है! ॥४ ॥ जैसे मकड़ी

अनायास ही अपने मुँहसे जाला निकालकर उसमें खेलने लगती है, वैसे ही आप अपनी शक्तिके आश्रयसे जीवोंको अपनेमें ही उत्पन्न करते हैं और फिर भी आपमें कोई विकार नहीं होता ॥५ ॥ जगत्में नाम, रूप और गुणोंसे जो कुछ जाना जाता है उसमें मैं ऐसी कोई सत्,

असत्, उत्तम, मध्यम या अधम वस्तु नहीं देखता जो आपके सिवा और किसीसे उत्पन्न हुई हो ॥६ ॥ इस प्रकार सबके ईश्वर होकर भी आपने एकाग्रचित्तसे घोर तपस्या की, इस बातसे

मुझे मोहके साथ - साथ बहुत बड़ी शंका भी हो रही है कि आपसे बड़ा भी कोई है क्या ॥७ ॥

पिताजी! आप सर्वज्ञ और सर्वेश्वर हैं । जो कुछ मैं पूछ रहा हूँ, वह सब आप कृपा करके मुझे इस प्रकार समझाइये कि जिससे मैं आपके उपदेशको ठीक - ठीक समझ सकूँ ॥ ८ ॥

ब्रह्मोवाच

सम्यक् कारुणिकस्येदं वत्स ते विचिकित्सितम् ।

यदहं चोदितः सौम्य भगवद्वीर्यदर्शने ॥ ९

नानृतं तव तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः ।

अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १०

येन स्वरोचिषा विश्वं रोचितं रोचयाम्यहम् ।

यथार्कोऽग्निर्यथा सोमो यथर्क्षग्रहतारकाः ॥ ११

तस्मै नमो भगवते वासुदेवाय धीमहि ।

यन्मायया दुर्जयया मां ब्रुवन्ति जगद्गुरुम् ॥१२

विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।

विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३

द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।

वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः ॥१४

पृष्ठ 347

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नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।

नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥१५

नारायणपरो योगो नारायणपरं तपः ।

नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरा गतिः ॥१६

तस्यापि द्रष्टुरीशस्य कूटस्थस्याखिलात्मनः ।

सृज्यं सृजामि सृष्टोऽहमीक्षयैवाभिचोदितः ॥ १७

सत्त्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।

स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८

ब्रह्माजीने कहा- बेटा नारद! तुमने जीवोंके प्रति करुणाके भावसे भरकर यह बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है; क्योंकि इससे भगवान्‌के गुणोंका वर्णन करनेकी प्रेरणा मुझे प्राप्त हुई है ॥९ ॥ तुमने मेरे विषयमें जो कुछ कहा है, तुम्हारा वह कथन भी असत्य नहीं है; क्योंकि

जबतक मुझसे परेका तत्त्व- जो स्वयं भगवान् ही हैं - जान नहीं लिया जाता, तबतक मेरा ऐसा ही प्रभाव प्रतीत होता है ॥१० ॥ जैसे सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और तारे उन्हींके

प्रकाशसे प्रकाशित होकर जगत् में प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही मैं भी उन्हीं स्वयंप्रकाश भगवान्के चिन्मय प्रकाशसे प्रकाशित होकर संसारको प्रकाशित कर रहा हूँ ॥११ ॥ उन

भगवान् वासुदेवकी मैं वन्दना करता हूँ और ध्यान भी, जिनकी दुर्जय मायासे मोहित होकर लोग मुझे जगद्गुरु कहते हैं ॥ १२ ॥ यह माया तो उनकी आँखोंके सामने ठहरती ही नहीं,

झेंपकर दूरसे ही भाग जाती है । परन्तु संसारके अज्ञानीजन उसीसे मोहित होकर ' यह मैं हूँ, यह मेरा है ' इस प्रकार बकते रहते हैं ॥१३ ॥ भगवत्स्वरूप नारद! द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव

और जीव - वास्तवमें भगवान् से भिन्न दूसरी कोई भी वस्तु नहीं है || १४ ॥ वेद नारायणके परायण हैं । देवता भी नारायणके ही अंगोंमें कल्पित हुए हैं और समस्त यज्ञ भी नारायणकी प्रसन्नताके लिये ही हैं तथा उनसे जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, वे भी नारायणमें ही कल्पित हैं ॥१५ ॥ सब प्रकारके योग भी नारायणकी प्राप्तिके ही हेतु हैं । सारी तपस्याएँ नारायणकी

ओर ही ले जानेवाली हैं, ज्ञानके द्वारा भी नारायण ही जाने जाते हैं । समस्त साध्य और साधनोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है ॥१६ ॥ वे द्रष्टा होनेपर भी ईश्वर हैं, स्वामी हैं;

निर्विकार होनेपर भी सर्वस्वरूप हैं । उन्होंने ही मुझे बनाया है और उनकी दृष्टिसे ही प्रेरित होकर मैं उनके इच्छानुसार सृष्टि रचना करता हूँ ॥१७ ॥ भगवान् मायाके गुणोंसे रहित एवं

अनन्त हैं । सृष्टि, स्थिति और प्रलयके लिये रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण – ये तीन गुण मायाके द्वारा उनमें स्वीकार किये गये हैं ॥ १८ ॥ ये ही तीनों गुण द्रव्य, ज्ञान और क्रियाका

आश्रय लेकर मायातीत नित्यमुक्त पुरुषको ही मायामें स्थित होनेपर कार्य, कारण और कर्तापनके अभिमानसे बाँध लेते हैं ॥ १ ९ ॥ नारद! इन्द्रियातीत भगवान् गुणोंके इन तीन

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आवरणोंसे अपने स्वरूपको भलीभाँति ढक लेते हैं, इसलिये लोग उनको नहीं उ सारे संसारके और मेरे भी एकमात्र स्वामी वे ही हैं ॥२० ॥

कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः ।

बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥१९

स एष भगवाँल्लिङ्गैस्त्रिभिरेभिरधोक्षजः ।

स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन् सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २०

कालं कर्म स्वभावं च मायेशो मायया स्वया ।

आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१

कालाद् गुणव्यतिकरः परिणामः स्वभावतः ।

कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥२२

महतस्तु विकुर्वाणाद्रजःसत्त्वोपबृंहितात् ।

तमःप्रधानस्त्वभवद् द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥२३

सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन् समभूत्त्रिधा ।

वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा ।

द्रव्यशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिरिति प्रभो ॥२४

तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः ।

तस्य मात्रा गुणः शब्दो लिङ्गं यद् द्रष्टृदृश्ययोः ॥२५

नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत् स्पर्शगुणोऽनिलः ।

परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥२६

वायोरपि विकुर्वाणात् कालकर्मस्वभावतः ।

उदपद्यत तेजो वै रूपवत् स्पर्शशब्दवत् ॥२७

तेजसस्तु विकुर्वाणादासीदम्भो रसात्मकम् ।

रूपवत् स्पर्शवच्चाम्भो घोषवच्च परान्वयात् ॥२८

विशेषस्तु विकुर्वाणादम्भसो गन्धवानभूत् ।

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परान्वयाद् रसस्पर्शशब्दरूपगुणान्वितः ॥ २ ९ मायापति भगवान्ने एकसे बहुत होनेकी इच्छा होनेपर अपनी मायासे अपने स्वरूपमें स्वयं प्राप्त काल, कर्म और स्वभावको स्वीकार कर लिया || २१ || भगवान्की शक्तिसे ही कालने तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया, स्वभावने उन्हें रूपान्तरित कर दिया और कर्मने महत्तत्त्वको जन्म दिया ॥ २२ ॥ रजोगुण और सत्त्वगुणकी वृद्धि होनेपर महत्तत्त्वका जो

विकार हुआ, उससे ज्ञान, क्रिया और द्रव्यरूप तमः प्रधान विकार हुआ ॥२३ ॥ वह अहंकार

कहलाया और विकारको प्राप्त होकर तीन प्रकारका हो गया । उसके भेद हैं— वैकारिक, तैजस और तामस । नारदजी! वे क्रमशः ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और द्रव्यशक्तिप्रधान हैं ॥२४ ॥ जब पंचमहाभूतोंके कारणरूप तामस अहंकारमें विकार हुआ, तब उससे

आकाशकी उत्पत्ति हुई । आकाशकी तन्मात्रा और गुण शब्द है । इस शब्दके द्वारा ही द्रष्टा और दृश्यका बोध होता है ॥२५ ॥ जब आकाशमें विकार हुआ, तब उससे वायुकी उत्पत्ति

हुई; उसका गुण स्पर्श है । अपने कारणका गुण आ जानेसे यह शब्दवाला भी है । इन्द्रियोंमें स्फूर्ति, शरीरमें जीवनीशक्ति, ओज और बल इसीके रूप हैं ॥ २६ ॥ काल, कर्म और

स्वभावसे वायुमें भी विकार हुआ । उससे तेजकी उत्पत्ति हुई । इसका प्रधान गुण रूप है । साथ ही इसके कारण आकाश और वायुके गुण शब्द एवं स्पर्श भी इसमें हैं ॥२७ ॥ तेजके

विकारसे जलकी उत्पत्ति हुई । इसका गुण है रस; कारण तत्त्वोंके गुण शब्द, स्पर्श और रूप भी इसमें हैं ॥२८ ॥ जलके विकारसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई, इसका गुण है गन्ध । कारणके गुण

कार्यमें आते हैं — इस न्यायसे शब्द, स्पर्श, रूप और रस – ये चारों गुण भी इसमें विद्यमान हैं ॥२९ ॥

वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।

दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३०

तैजसात् तु विकुर्वाणादिन्द्रियाणि दशाभवन् ।

ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिर्बुद्धिः प्राणश्च तैजसौ ।

श्रोत्रं त्वग्घ्राणदृग्जिह्वावाग्दोर्मेद्राङ्घ्रिपायवः ॥ ३१

यदैतेऽसङ्गता भावा भूतेन्द्रियमनोगुणाः ।

यदायतननिर्माणे न शेकुर्ब्रह्मवित्तम ॥३२

तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः ।

सदसत्त्वमुपादाय चोभयं ससृजुर्ह्यदः ॥३३

वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।

पृष्ठ 350

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कालकर्मस्वभावस्थो जीवोऽजीवमजीवयत् ॥ ३४

स एव पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।

सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५

यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।

कट्यादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥३६

पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः ।

ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रोऽभ्यजायत ॥३७

भूर्लोकः कल्पितः पद्भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभितः ।

हृदा स्वर्लोक उरसा महर्लोको महात्मनः ॥ ३८

ग्रीवायां जनलोकश्च तपोलोकः स्तनद्वयात् ।

मूर्धभिः सत्यलोकस्तु ब्रह्मलोकः सनातनः ॥३९

वैकारिक अहंकारसे मनकी और इन्द्रियोंके दस अधिष्ठातृ देवताओंकी भी उत्पत्ति हुई । उनके नाम हैं - दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति ॥३० ॥ तैजस अहंकारके विकारसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और घ्राण – ये पाँच

ज्ञानेन्द्रियाँ एवं वाक्, हस्त, पाद, गुदा और जननेन्द्रिय - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं । साथ ही ज्ञानशक्तिरूप बुद्धि और क्रियाशक्तिरूप प्राण भी तैजस अहंकारसे ही उत्पन्न हुए ॥३१ ॥

श्रेष्ठ ब्रह्मवित्! जिस समय ये पंचभूत, इन्द्रिय, मन और सत्त्व आदि तीनों गुण परस्पर संगठित नहीं थे तब अपने रहनेके लिये भोगोंके साधनरूप शरीरकी रचना नहीं कर सके ॥३२ ॥ जब भगवान्ने इन्हें अपनी शक्तिसे प्रेरित किया तब वे तत्त्व परस्पर एक - दूसरेके

साथ मिल गये और उन्होंने आपसमें कार्य - व स्वीकार करके व्यष्टि - समष्टिरूप पिण्ड -कारणभाव और ब्रह्माण्ड दोनोंकी रचना की || ३३ || वह ब्रह्माण्डरूप अंडा एक सहस्र वर्षतक निर्जीवरूपसे जलमें पड़ा रहा; फिर काल, कर्म और स्वभावको स्वीकार करनेवाले भगवान्ने उसे जीवित कर दिया ॥ ३४ ॥ उस अंडेको फोड़कर उसमेंसे वही विराट् पुरुष निकला,

जिसकी जंघा, चरण, भुजाएँ, नेत्र, मुख और सिर सहस्रोंकी संख्या में हैं ॥ ३५ ॥ विद्वान् पुरुष

( उपासनाके लिये ) उसीके अंगोंमें समस्त लोक और उनमें रहनेवाली वस्तुओंकी कल्पना करते हैं । उसकी कमरसे नीचेके अंगोंमें सातों पातालकी और उसके पेड़ूसे ऊपरके अंगोंमें सातों स्वर्गकी कल्पना की जाती है || ३६ || ब्राह्मण इस विराट् पुरुषका मुख है, भुजाएँ क्षत्रिय हैं, जाँघोंसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए हैं ॥ ३७ ॥ पैंरोंसे लेकर कटिपर्यन्त सातों

पाताल तथा भूलोककी कल्पना की गयी है; नाभिमें भुवर्लोककी, हृदयमें स्वर्लोककी और