श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 51–60

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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दशांश ( अर्थात् १,८०० ) आहुति देनी चाहिये । खीरके अभाव में तिल, चावल, जौ, मेवा, शुद्ध घी और चीनीको मिलाकर हवनीय पदार्थ तैयार कर लेना चाहिये । इसमें सुगन्धित पदार्थ ( कपूर - काचरी, नागरमोथा, छड़छड़ीला, अगर- तगर, चन्दनचूर्ण आदि ) भी मिलाने चाहिये । पूर्वोक्त अठारह सौ आहुति गायत्री मन्त्र अथवा दशम स्कन्धके प्रति

श्लोकसे देनी चाहिये । हवनके अन्तमें दिक्पाल आदिके लिये बलि, क्षेत्रपाल - पूजन,

छायापात्र - दान, हवनका दशांश तर्पण एवं तर्पणका दशांश मार्जन करना चाहिये । फिर

आरतीके पश्चात् किसी नदी, सरोवर या कूपादिपर जाकर अवभृथस्नान ( यज्ञान्त - स्नान ) भी करना चाहिये । इसके लिये समूहके साथ शोभायात्रा निकालकर गाजे - बाजेके साथ कीर्तन करते हुए जाना चाहिये । यजमान श्रीमद्भागवतग्रन्थको अपने मस्तकपर रखकर उसकी शोभायात्रा निकाले, जिसमें वक्ता तथा सब श्रोता सम्मिलित हों । हरिकीर्तन होता चले । भागवत -ग्रन्थपर चँवर डुलते रहें । घड़ियाल, घण्टा, झाँझ, शंख आदि बाजे बजते रहें । जो पूर्ण हवन करनेमें असमर्थ हो, वह यथाशक्ति हवनीय पदार्थ दान करे । अन्तमें कम - से - कम बारह ब्राह्मणोंको मधुयुक्त खीरका भोजन कराना चाहिये । व्रतकी पूर्तिके लिये सुवर्ण दान और गोदान करना चाहिये । सिंहासनपर विराजित सुन्दर अक्षरोंमें लिखित श्रीमद्भागवतकी पूजा करके उसे दक्षिणासहित कथावाचक आचार्यको दान कर देना चाहिये । अन्तमें सब प्रकारकी त्रुटियोंकी पूर्तिके लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ कथावाचक आचार्यके द्वारा सुनना चाहिये । विरक्त श्रोताओंको ' गीता ' सुननी चाहिये । * संतानकी इच्छासे प्रयोग करना हो तो संकल्पके उद्देश्यमें इस प्रकार योजना कर लेनी चाहिये । ' अतीतानन्तजन्मसम्पादितदुष्कृतपरिपाकवशप्राप्तजन्माङ्गक्रूरग्रहसूचितपत्नीवन्ध्य सद्गुणसम्पन्नचिरञ्जीविस्वस्थसुन्दरसुपुत्रप्राप्तये च.... । ' यदि किसी मृत व्यक्तिकी सद्गतिके उद्देश्यसे भागवत सप्ताह करना हो तो संकल्पके उद्देश्यमें इस प्रकार योजना कर ले— ‘ स्वीयानन्तदुष्कृतपरिपाकवशान्नानाविधदुःखक्षेत्रयोनिनाम् पितॄणाम् अमुकामुकशर्मणाम् ( योनेः पितुः अमुकशर्मणः अन्यस्य वा कस्यचित् ) प्रेतत्वनिवृत्तिपूर्वकमुत्तमवैकुण्ठधामोपलब्धये । ' इसी प्रकार आवश्यकताके अनुसार अन्यान्य उद्देश्यकी भी योजना कर लेनी चाहिये । * मनुकर्दमसंवादपर्यन्तं प्रथमेऽहनि । भरताख्यानपर्यन्तं द्वितीयेऽहनि वाचयेत् ॥

पृष्ठ 52

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तृतीये दिवसे कुर्यात् सप्तमस्कन्धपूरणम् । कृष्णाविर्भावपर्यन्तं चतुर्थे दिवसे वदेत् ॥ रुक्मिण्युद्वाहपर्यन्तं पञ्चमेऽहनि शस्यते । श्रीहंसाख्यानपर्यन्तं षष्ठेऽहनि वदेत् सुधीः ॥ सप्तमे तु दिने कुर्यात् पूर्तिं भागवतस्य वै । एवं निर्विघ्नतासिद्धिर्विपर्यय इतोऽन्यथा ॥

पृष्ठ 53

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सप्ताह - कथाके प्रारम्भमें संग्रहणीय सामग्रीकी सूची पूजन - सामग्री गंगाजल, रोली ( कुंकुम ), मोली ( रक्षासूत्र ), चन्दन, शुद्ध केसर, कपूर, पुष्प, पुष्पमाला, तुलसीदल, बिल्वपत्र, दूर्वादल, धूप, शुद्ध अगरबत्ती, पंचामृत ( दूध SI, दही ऽ =, मधु दो पैसे भर, चीनी ऽ =, घी छटाँक भर ), दीप ( यथासम्भव शुद्ध, गोघृत और रूई ), पानका पत्ता पचास, सुपारी पचीस, यज्ञोपवीत पचीस, इलायची, लौंग, पेड़ा S II, मेवा ऽ ॥, गुड़ ऽ ।, चावल ऽ ।, गेहूँ ऽ ५, कुण्डे मिट्टीके दो गेहूँ बोनेके लिये, पीली सरसों, अबीर, गुलाल, ऋतुफल -केला - संतरा आदि, कपड़ा सफेद ५ गज, कपड़ा लाल ५ गज, कपड़ा पीला ५ गज, कपड़ा शुद्ध रेशमी १३ गज, सर्वतोभद्रकी रचनाके लिये हरा, लाल, काला, पीला और गुलाबी रंग, गोबर, नारियल दो या सात, शुद्ध इत्र, कुशा, सिन्दूर, रुपये - रेजगी - पैसे, आरतीका पात्र, घण्टा, घड़ियाल, शंख - झाँझ आदि, कोसा पचास, दियासलाई, चौकी एक सर्वतोभद्रके लिये, चौकी एक नारदजीके लिये, चौकी एक नवग्रह, षोडशमातृका और गणेशके लिये, चौकी एक व्यास, शुकदेव, सप्त - चिरजीवी तथा पौराणिकोंके लिये, पाटा एक शेष - सनत्कुमारादिके लिये । कलशस्थापनकी सामग्री कलश ताँबेका एक, ताँबे या काँसीका पात्र एक, कलश मिट्टीके पाँच, सप्तधान्य ( जौ, गेहूँ, धान, तिल, कँगनी, साँवा, चना ), पंचपल्लव ( आम, पीपल, पाकर, गूलर और बड़के पत्ते ) दूर्वा, कुशा, सुपारी, दक्षिणा, चन्दन, अक्षत, फूल, तीर्थोदक, समुद्रजल, सप्तमृत्तिका ( घुड़सालकी, हाथीशालाकी, दीमककी, नदी संगमकी, राजद्वारकी, गोशालाकी, तालाबकी ), सर्वौषधि ( कूट, जटामाशी, हल्दी गाँठ २, राभट, मुरा, शैलेभ, चन्दन, बचा, चम्पक और नागरमोथा — अभावमें केवल हल्दी ), नदीसंगमका जल, श्रीलक्ष्मी - नारायणकी प्रतिमा । कथामण्डपके लिये सामग्री चँदोवेका कपड़ा, चौकोर मण्डप, केलेके खम्भे चार, बाँसके खम्भे, मण्डपको चारों ओरसे माला, फूल और पत्तोंसे सजाना, चारों दिशाओंमें झंडी लगाना, वस्त्र और गोटे आदिसे सजाना, चौकी व्यासके लिये, गद्दी, मसनद, तकिये, कम्बल, चद्दर, पाँच झंडियाँ, पुस्तकका वेष्टन, पुस्तकके लिये चौकी, आमके पत्तोंके बंदनवार । गणेशजी, देवता, श्रीमद्भागवत और आचार्यकी पूजाके लिये प्रतिदिन चन्दन, पुष्प, पुष्पमाला, धूप, दीपादि सामग्री । वरणकी सामग्री वक्ताके लिये चादर, धोती, गमछा, आसन, दक्षिणा, तुलसीमाला, जलपात्र आदि, जप

पृष्ठ 54

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करनेवालोंके लिये भी यथासम्भव वस्त्र - द्रव्य आदि । पाठके लिये पुस्तक भागवत, रामायण, गीता, सहस्रनाम आदि । हवनके लिये सामग्री वेदीके लिये स्वच्छ बालू एक बोरा, सूखी आमकी लकड़ी दो मन, कुशकण्डिकाके लिये कुशा, दूर्वा, अग्नि लानेके लिये दो कांस्यपात्र, एक पूर्णपात्र पीतलका बड़ा - सा, यज्ञपात्र— प्रणीता, प्रोक्षणी, सुवा, स्रुक्, पूर्णाहुतिपात्र, चरुस्थाली, आज्यस्थाली ( काँसीका बड़ा - सा कटोरा ), हवनीय पदार्थ – मधुमिश्रित खीर, छायापात्र - दानके लिये काँसेकी छोटी एक कटोरी तथा उसके लिये घी । तिल १० सेर, चावल ५ सेर, जौ १३ सेर शुद्ध घी ४ सेर, शुद्ध चीनी १३ सेर, पंचमेवा २ सेर ( पिश्ता, बादाम, किशमिश अखरोट और काँजू ) – इन सबको मिलाकर हवनसामग्री बनायी जाती है । फिर इसमें सुगन्धित द्रव्य ( कपूरकाचरी, छड़छड़ीला, नागरमोथा, अगर-तगर, चन्दनचूर्ण आदि ) आवश्यकतानुसार मिला देने चाहिये । बलिके लिये पापड़, उड़द, दही, चावल, रूईकी बत्ती, दक्षिणा, क्षेत्रपाल - बलिके लिये हँड़िया, काजल, सिंदूर, दीपक, दक्षिणा आदि । पूर्णाहुतिके लिये नारियलका गोला इत्यादि, वितरणके लिये प्रसाद । ब्राह्मण-भोजनके लिये मधुमिश्रित खीर तथा अन्यान्य मधुर पकवान, पूरी - साग आदि । हवनकर्ता ब्राह्मणोंके लिये वरण और दक्षिणा आदि । कथा - समाप्तिके पश्चात् कथावाचकको भेंट देनेके लिये वस्त्र, आभूषण, नकद रुपये आदि ।

पृष्ठ 55

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वन्दनम्

सर्गस्थितिनिरोधार्थं कामाकाममयो हि यः ।

तं कामं कामकामघ्नं कामाभावाय कामये ॥

यत्कामिनीकेलिकलापकुण्ठितः कामोऽप्यकामा विमदो बभूव ह ।

तं मानिनीमानदमानदं सदा श्रीमोहनं मोहनमानतोऽस्म्यहम् ॥

यस्याङ्घ्रिपङ्कजपरागपरप्रभावाद् भूत्वा कृती कृतिमतां सृतिमाचरामि ।

तं सद्गुरुं सततसर्वसुखं सदग्रयं वन्दे सदा विमलबोधघनं विचित्रम् ॥

व्यासं व्यासकरं वन्दे मुनिं नारायणं स्वयम् ।

यतः प्राप्तकृपालोका लोका मुक्ताः कलेर्ग्रहात् ॥

यस्य तुण्डाच्च्युतश्चतो राजतेऽयं रसात्मकः ।

तमच्युतकथाकुञ्जे सुकूजन्तं शुकं भजे ॥

श्रीधरं श्रीधरं वन्दे श्रीधरैकपरायणम् ।

यस्यैव श्रीप्रसादेन श्रीधरेयं कृतिः कृता ॥

राधा भक्तिर्हरिर्ज्ञानं ताभ्यां या च समन्विता ।

तां श्रीभागवतीं गाथां वन्दे युगलरूपिणीम् ॥

पृष्ठ 56

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॥ श्रीहरिः ॥ श्रीमद्भागवतकी आरती

आरति अतिपावन पुरानकी ।

धर्म - भक्ति - विज्ञान - खानकी ॥ टेक ॥

महापुरान भागवत निरमल । शुक - मुख - विगलित निगम - कल्प - फल ।

परमानन्द - सुधा - रसमय कल ।

लीला - रति - रस रसनिधानकी ॥ आरति ० ॥

कलि - मल - मथनि त्रिताप - निवारिनि । जन्म - मृत्युमय भव - भय - हारिनि ।

सेवत सतत सकल सुख - कारिनि ।

सुमहौषधि हरि - चरित - गानकी ॥ आरति ० ॥

विषय - विलास - विमोह - विनाशिनि । विमल विराग विवेक विकाशिनि ।

भगवत् - तत्त्व - रहस्य - प्रकाशिनि ।

परम ज्योति परमात्म - ज्ञानकी ॥ आरति ० ॥

परमहंस - मुनि - मन उल्लासिनि । रसिक - हृदय रस - रास विलासिनि ।

भुक्ति मुक्ति रति प्रेम सुदासिनि ।

कथा अकिञ्चनप्रिय सुजानकी ॥आरति ० ॥

पृष्ठ 57

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पृष्ठ 58

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गीताप्रेस, गोरखपुर Commer

पृष्ठ 59

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भगवान् व्यासका पुराण - प्रवचन VyIsa discourses on PurIIas

पृष्ठ 60

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गीताप्रेस, गोरखपुर महाप्रयाणके समय भीष्मपर भगवान्की कृपा The departing BhiIma graced by the Lord B.K. Miles