श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 41–50
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50
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नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ शिवाय नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ चन्द्रमसे नमः, ॐ भौमाय नमः, ॐ बुधाय नमः, ॐ बृहस्पतये नमः, ॐ भार्गवाय नमः, ॐ शनैश्चराय नमः, ॐ राहवे नमः, ॐ केतवे नमः - इन नाम- मन्त्रोंसे पाद्य, अर्घ्य आदि सब उपचार समर्पण करके निम्नांकित मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे— ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च । गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ॥ - ' अनया पूजया ब्रह्मविष्णुशिवसहित सूर्यादिनवग्रहाः प्रीयन्तां न मम । ' यों कहकर पुष्पांजलि चढ़ाये । तत्पश्चात्‘ॐ भूर्भुवः स्वः भो गौर्यादिषोडशमातर इहागच्छत मम पूजां गृह्णीत ' इस प्रकार आवाहन करके नाम - मन्त्रोंद्वारा पाद्य- अर्घ्य आदि निवेदन करे - १ ॐ गौर्यै नमः । २ ॐ पद्मायै नमः । ३ ॐ शच्यै नमः । ४ ॐ मेधायै नमः । ५ ॐ सावित्र्यै नमः । ६ ॐ विजयायै नमः । ७ ॐ जयायै नमः । ८ ॐ देवसेनायै नमः । ९ ॐ स्वधायै नमः । १० ॐ स्वाहायै नमः । ११ ॐ मातृभ्यो नमः । १२ ॐ लोकमातृभ्यो नमः । १३ ॐ हृष्ट्यै नमः । १४ ॐ पुष्ट्यै नमः । १५ ॐ तुष्ट्यै नमः । १६ ॐ आत्मकुलदेवतायै नमः ॥ पूजनके पश्चात् प्रार्थना करे—
गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया ।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः ॥
हृष्टिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवता ।
इत्येता मातरः सर्वा वृद्धिं कुर्वन्तु मे सदा ॥
- ' अनया पूजया गौर्यादिषोडशमातरः प्रीयन्तां न मम । ' इस प्रकार समर्पणपूर्वक पुष्पांजलि निवेदन करे । तदनन्तर ‘ भो अश्वत्थामादिसप्तचिरजीविन इहागत्य मम पूजां गृह्णीत ' इस प्रकार आवाहन करके पूर्ववत् नाममन्त्रसे पूजा करे-१ ॐ अश्वत्थाम्ने नमः | २ ॐ बलये नमः | ३ ॐ व्यासाय नमः । ४ ॐ हनुमते नमः । ५ ॐ विभीषणाय नमः । ६ ॐ कृपाय नमः । ७ ॐ परशुरामाय नमः । पूजाके पश्चात् हाथमें फूल लेकर निम्नांकित रूपसे प्रार्थना करे—
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः ।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥
यजमानगृहे नित्यं सुखदाः सिद्धिदाः सदा ॥
- ' अनया पूजया अश्वत्थामादिसप्तचिरजीविनः प्रीयन्तां न मम । ' यह
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कहकर फूल चढ़ा दे । इसके अनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन - पूजन ( देवपूजापद्धतियोंके अनुसार ) करके मध्यमें ताम्रकलश स्थापित करे । उसकी संक्षिप्त विधि यह है— ' ॐ भूरसि ० ' इत्यादि मन्त्रसे भूमिकी प्रार्थना करके हाथसे ( कलशके नीचेकी ) भूमिका स्पर्श करे । उस समय ' ॐ मही द्यौः पृथ्वी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पितृतान्नौ वरीमभिः ॥ ' इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये । उसी भूमिपर कुंकुम आदिसे अष्टदल कमल बनाकर उसके ऊपर ' ॐ धान्यमसि० इत्यादि मन्त्रसे सप्तधान्य स्थापित करे । फिर उस सप्तधान्यपर कलश स्थापित करे; उस समय ‘ ॐ आजिघ्र कलश ० ' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये । इसके बाद ' ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि ० ' इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए कलशको शुद्ध जलसे भर दे । तत्पश्चात्‘ॐ स्थिरो भव ० ' इत्यादि मन्त्र पढ़कर कलशको ऐसा सुस्थिर कर दे, जिससे वह हिलने - डुलने या गिरने लायक न रह जाय । फिर उस कलशके पूर्व भागमें ' ॐ अग्निमीळे ० ' इत्यादि मन्त्रसे ऋग्वेदका, दक्षिण भागमें ' ॐ इषे त्वोर्जेत्वा ० ’ इत्यादि मन्त्रसे यजुर्वेदका, पश्चिम भागमें ' ॐ अग्न आयाहि वीतये ० ' इत्यादि मन्त्रसे सामवेदका तथा ‘ ॐ शन्नो देवी ० ' इत्यादि मन्त्रसे उत्तर भागमें अथर्ववेदका स्थापन करे । पाँच कलश हों तो पृथक् - पृथक् कलशोंपर वेदोंकी स्थापना करनी चाहिये । इसके अनन्तर आम, बड़, पीपल, पाकर और गूलरके पल्लवोंको कलशमें डाले और ‘ ॐ अश्वत्थे ० ' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे । फिर ' ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती ० ' इत्यादि मन्त्रसे कलशमें दूर्वादल छोड़े, ॐ पवित्रे स्थो ० ' इत्यादि मन्त्रसे कुशा, ‘ ॐ याः फलिनी ० ' इत्यादि मन्त्रसे पूगीफल, ' ॐ हिरण्यगर्भः ० ' इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणा, ‘ ॐ परिवाजपतिः ० ' से पंचरत्न, ' ॐ या ओषधीः ० ' इत्यादिसे सर्वौषधी, ' ॐ गन्धद्वारां ० ' इत्यादिसे गन्ध और ' ॐ अक्षन्नमीमदन्त ० ' इत्यादिसे अक्षतको कलशमें छोड़े । तदनन्तर ' ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च ० ' इत्यादिसे फूल छोड़े । ' ॐ धूरसि ० ’ इत्यादिसे धूपकी आहुति अग्निमें छोड़े । ' ॐ अग्निर्ज्योतिः ० ' इत्यादि मन्त्रसे अलग दीप जलाकर रख दे । उसके बाद कलशमें तीर्थोदक डाले और ' ॐ पञ्चनद्यः ० ’ इत्यादि मन्त्रको पढ़े । फिर ' ॐ उपह्वरे ० ' इत्यादि मन्त्रसे नदी - संगमका जल डाले । तत्पश्चात् ' ॐ समुद्राय त्वा ० ' इत्यादि मन्त्रसे समुद्रका जल कलशमें डाले । फिर ‘ ॐ स्योना पृथिवि ० ' इत्यादिसे सप्तमृत्तिका डालकर ' ॐ वसोः पवित्रमसि ० ' इत्यादि मन्त्रको पढ़ते हुए लाल वस्त्रसे कलशको आच्छादित करे । तदनन्तर — ॐ पूर्णादर्वि ० ’ इत्यादि मन्त्रसे एक पूर्णपात्र ( चावलसे भरा हुआ काँसी या ताँबेका पात्र ) कलशके ऊपर रखे । इसके बाद ' ॐ श्रीश्च ते ० ' इत्यादि मन्त्रसे उस पूर्णपात्रपर लाल कपड़ेमें लपेटा हुआ श्रीफल ( गरीका गोला या नारियल ) रखे । फिर हाथमें अक्षत ले ' ॐ मनो जूतिः ० ' इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए कलशपर अक्षत छोड़े और इस प्रकार कलशकी प्रतिष्ठा सम्पन्न करे । तदनन्तर ' सर्वे समुद्राः सरितः ० ' इत्यादि श्लोकोंका पाठ करते हुए कलशमें तीर्थोंका आवाहन करे । फिर गन्ध आदि उपचारोंसे तीर्थोंका पूजन र
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कलशकी प्रार्थना करे—
देवदानवसंवादे मथ्यमाने जलार्णवे ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम् ॥
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः ।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः ।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः ॥
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः ।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव ॥
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा ।
ब्रह्मणैर्निर्मितस्त्वं हि मन्त्रैरेवामृतोद्भवैः ॥
प्रार्थयामि च कुम्भ त्वां वाञ्छितार्थं ददस्व मे । पुरा हि सृष्टश्च पितामहेन महोत्सवानां प्रथमो वरिष्ठः । दूर्वाग्रसाश्वत्थसुपल्लवैर्युक् करोतु शान्तिं कलशः सुवासाः ॥ इस प्रार्थनाके अनन्तर कलशमें ' ॐ गणानां त्वा ० ' इत्यादिसे गणेशका तथा ‘ ॐ तत्त्वायामि ' इत्यादि मन्त्रसे वरुणदेवताका आवाहन करके इनका षोडशोपचारसे पूजन करे । पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा और पुष्पांजलि - ये ही षोडश उपचार कहे गये हैं । पूजनके पश्चात् ' अनया पूजया वरुणाद्यावाहितदेवताः प्रीयन्ताम् ' कहकर फूल छोड़ दे । तदनन्तर कलशके ऊपर लक्ष्मीनारायणप्रतिमाको संस्कार करके स्थापित करे । पुरुषसूक्तके षोडश मन्त्रोंसे षोडश उपचार चढ़ाकर पूजन करे । साथ ही शालग्रामजीकी भी पूजा करे । ( षोडशोपचार - पूजनविधि अन्यत्र इसीमें ‘ श्रीमद्भागवतकी पूजनविधि ' शीर्षक लेखमें दी गयी हैं ) पूजाके पश्चात् इस प्रकार
भगवान्से प्रार्थना करे-ब्रह्मसत्रं, करिष्यामि तवानुग्रहतो विभो ।
तन्निर्विघ्नं भवेद्देव रमानाथ क्षमस्व मे ॥
' अनया पूजया लक्ष्मीसहितो भगवन्नारायणः प्रीयतां न मम । ' यों कहकर पुष्पांजलि चढ़ाये । ऐसा ही सर्वत्र करे । इसके बाद ' ॐ नरनारायणाभ्यां नमः ' इस मन्त्रसे भगवान् नर - नारायणका
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आवाहन औरपूजन करके इस प्रकार प्रार्थना करे— यो मायया विरचितं निजमात्मनीदं खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय । एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान् सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः । दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ॥ - ' अनया पूजया भगवन्तौ नरनारायणौ प्रीयेतां न मम । ' तत्पश्चात् वक्ता और श्रोताओंके सब विकारोंको दूर करनेके लिये वायुदेवताका आवाहन एवं पूजन करे – ' ॐ वायवे सर्वकल्याणकर्त्रे नमः । ' इस मन्त्रसे पाद्य आदि निवेदन करके निम्नांकित रूपसे प्रार्थना करे—
करे-अन्तः प्रविश्य भूतानि यो विभर्त्यात्मकेतुभिः ।
अन्तर्यामीश्वरः साक्षात् पातु नो यद्वशे स्फुटम् ॥
-'अनया पूजया सर्वकल्याणकर्ता वायुः प्रीयतां न मम । ' वायुकी पूजाके पश्चात् गुरुका ' ॐ गुरवे नमः । ' इस मन्त्रसे पूजन करके प्रार्थना ब्रह्मस्थानसरोजमध्यविलसच्छीतांशुपीठस्थितं स्फूर्जत्सूर्यरुचिं वराभयकरं कर्पूरकुन्दोज्ज्वलम् । श्वेतस्रग्वसनानुलेपनयुतं विद्युद्रुचा कान्तया संश्लिष्टार्धतनुं प्रसन्नवदनं वन्दे गुरुं सादरम् ॥ —'अनया पूजया गुरुदेवः प्रीयतां न मम । ' तदनन्तर श्वेतपुष्प आदिसे ' ॐ सरस्वत्यै नमः । ' इस मन्त्रद्वारा सरस्वतीका पूर्ववत् पूजन करके प्रार्थना करे— या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ - ' अनया पूजया भगवती सरस्वती प्रीयतां न मम । ' सरस्वतीपूजनके पश्चात् ' ॐ शेषाय नमः ', ' ॐ सनत्कुमाराय नमः ', सांख्यायनाय नमः, ' ' ॐ पराशराय नमः ', ' ॐ बृहस्पतये नमः, ' ' ॐ मैत्रेयाय
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नमः, ’ ‘ ॐ उद्धवाय नमः ' – इन मन्त्रोंसे शेष आदिकी पूजा करके प्रार्थना करे—
शेषः सनत्कुमारश्च सांख्यायनपराशरौ ।
बृहस्पतिश्च मैत्रेय उद्धवश्चात्र कर्मणि ॥
प्रत्यूहवृन्दं सततं हरन्तां पूजिता मया । – ' अनया पूजया शेषसनत्कुमारसांख्यायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवाः प्रीयन्तां न मम । ' इसके बाद ' ॐ त्रय्यारुणये नमः ', ' ॐ कश्यपाय नमः, ' ' ॐ रामशिष्याय नमः, ’ ‘ ॐ अकृतव्रणाय नमः, ' ' ॐ वैशम्पायनाय नमः ' ' ॐ हारीताय नमः ' – इन मन्त्रोंसे त्रय्यारुणि आदि छः पौराणिकोंकी पूर्ववत् पूजा करके प्रार्थना करे-त्रय्यारुणिः कश्यपश्च रामशिष्योऽकृतव्रणः । वैशम्पायनहारीतौ षड् वै पौराणिका इमे ॥ सुखदाः सन्तु मे नित्यमनया पूजयार्चिताः । -'अनया पूजया त्रय्यारुणिप्रभृतयः षट् पौराणिकाः प्रीयन्तां न मम । ' तत्पश्चात् ‘ ॐ भगवते व्यासाय नमः ' इस मन्त्रसे भगवान् व्यासदेवकी स्थापना और पूजा करके इस प्रकार प्रार्थना करे—
नमस्तस्मै भगवते व्यासायामिततेजसे ।
पपुर्ज्ञानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम् ॥
- ' अनया पूजया भगवान् व्यासः प्रीयतां न मम । ' इसके बाद सप्ताहयज्ञके उपदेशक भगवान् सूर्यकी स्थापना करके प्रतिदिन उनकी भी पूजा करे । उनकी पूजाका मन्त्र — ॐ सूर्याय नमः ' है । पूजनके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये ।
लोकेश त्वं जगच्चक्षुः सत्कर्म तव भाषितम् ।
करोमि तच्च निर्विघ्नं पूर्णमस्तु त्वदर्चनात् ॥
- ' अनया पूजया सप्ताहयज्ञोपदेष्टा भगवान् सूर्यः प्रीयतां न मम । ' इसके बाद दशावतारोंकी तथा शुकदेवजीकी भी यथास्थान स्थापना करके पूजा करनी चाहिये । तदनन्तर नारदपीठ और पुस्तकपीठ दोनोंकी एक ही साथ पूजा करे । पहले उन दोनों पीठोंका जलसे अभिषेक करके उनपर चन्दनादिसे अष्टदल कमल बनावे । फिर ‘ ॐ आधारशक्तये नमः ', ' ॐ मूलप्रकृतये नमः ', ' ॐ क्षीरसमुद्राय नमः ’, ‘ ॐ श्वेतद्वीपाय नमः, ' ' ॐ कल्पवृक्षाय नमः, ॐ रत्नमण्डपाय नमः, ' ' ॐ रत्नसिंहासनाय नमः ' – इन मन्त्रोंसे दोनों पीठोंमें आधारशक्ति आदिकी भावना करके पूजा करे । फिर चारों दिशाओंमें पूर्वादिके क्रमसे ' ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, '
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-‘ ॐ वैराग्याय नमः, ’ ' ॐ ऐश्वर्याय नमः ' – इन मन्त्रोंद्वारा धर्मादिकी भावना एवं पूजा करे । फिर पीठोंके मध्यभागमें ' ॐ अनन्ताय नमः ' से अनन्तकी और ' ॐ महापद्माय नमः ' से महापद्मकी पूजा करे । फिर यह चिन्तन करे – उस महापद्मका कन्द ( मूलभाग ) आनन्दमय है । उसकी नाल संवित्स्वरूप है, उसके दल प्रकृतिमय हैं, उसके केसर विकृतिरूप हैं, उसके बीज पंचाशत् वर्णस्वरूप हैं - और उन्हींसे उस महापद्मकी कर्णिका ( गद्दी ) विभूषित है । उस कर्णिकामें अर्कमण्डल, सोममण्डल और वह्निमण्डलकी स्थिति है । वहीं प्रबोधात्मक सत्त्व, रज एवं तम भी विराजमान हैं । ऐसी भावनाके पश्चात् उन सबकी पंचोपचारसे पूजा करे । मन्त्र इस प्रकार हैं—— ॐ आनन्दमयकन्दाय नमः ', ' ॐ संविन्नालाय नमः, ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः, ' ' ॐ विकृतिमयकेसरेभ्यो नमः, ॐ पञ्चाशद्वर्णबीजभूषितायै कर्णिकायै नमः ', ‘ ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः, ' ' ॐ सं सोममण्डलाय नमः, ' ' ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ’ ' ॐ सं प्रबोधात्मने सत्त्वाय नमः, ' ' ॐ रं रजसे नमः, ' ॐ तं तमसे नमः ' । इन सबकी पूजाके पश्चात् कमलके सब ओर पूर्वादि आठों दिशाओंमें क्रमशः ‘ ॐ विमलायै नमः, ' ' ॐ उत्कर्षिण्यै नमः, ' ' ॐ ज्ञानायै नमः, ' ‘ ॐ क्रियाये नमः, ´ ‘ ॐ योगायै नमः, ' ' ॐ प्रह्वयैनमः ', ' ॐ सत्यायै नमः, ' ' ॐ ईशानायै नमः ' – इन मन्त्रोंद्वारा विमला आदि आठ शक्तियोंकी पूजा करे और कमलके मध्यभागमें ‘ ॐ अनुग्रहायै नमः ' से अनुग्रहा नामकी शक्तिकी पूजा करे । तदनन्तर ‘ ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय पद्मपीठात्मने नमः ' इस मन्त्रसे सम्पूर्ण पद्मपीठका पूजन करके उसपर सुन्दर वस्त्र डाल दे और उसीके ऊपर स्थापित करनेके लिये श्रीमद्भागवतकी पुस्तकको हाथमें लेकर ॐ ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवा सा पर्वता इमे । ध्रुवं विश्वमिदं जगत् ध्रुवो राजा विशामसि ’ इस मन्त्रको पढ़ते हुए उक्त पीठपर स्थापित करे । फिर ' ॐ मनो जूतिः ० ' इस मन्त्रसे पुस्तककी प्रतिष्ठा करके पुरुषसूक्तके षोडश मन्त्रोंद्वारा षोडशोपचार विधिसे पूजा करे । ( यह विधि पहले ' श्रीमद्भागवतकी पूजन - विधि ' शीर्षक लेखमें दी गयी है । ) तत्पश्चात् द्वितीय पीठको श्वेत वस्त्रसे आच्छादित करके उसपर देवर्षि नारदको स्थापित करे और ' ॐ सुरर्षिवरनारदाय नमः ' इस मन्त्रसे उनकी विधिवत् पूजा करके निम्नांकितरूपसे प्रार्थना करे—
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते ज्ञानवैराग्यशालिने ।
नारदाय सर्वलोकपूजिताय सुरर्षये ॥
- ' अनया पूजया देवर्षिनारदः प्रीयतां न मम । ' इस प्रकार पूजनके पश्चात् यजमान पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, वस्त्र, दक्षिणा, सुपारी तथा रक्षासूत्र हाथमें लेकर ॐ अद्यामुकगोत्रममुकप्रवरममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिर्वरणद्रव्यैः सर्वेष्टदश्रीमद्भागवतवक्तृत्वेन भवन्तमहं वृणे ' – इस प्रकार कहते हुए कथावाचक आचार्यका वरण करे । हाथमें ली हुई सब सामग्री उनको दे दे । वह सब लेकर कथावाचक व्यास ' वृतोऽस्मि ' यों कहें । इसके बाद पुनः उन्हीं सब
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सामग्रियोंको हाथमें लेकर जप और पाठ करनेवाले ब्राह्मणोंका वरण करे । इसके लिये संकल्पवाक्य इस प्रकार है - ' अद्याहममुकगोत्रानमुकप्रवरानमुकशर्मणो यथासंख्याकान् ब्राह्मणानेभिर्वरणद्रव्यैर्गाथाविघ्नापनोदार्थं गणेशगायत्रीवासुदेवमन्त्रजपकर्तृत्वेन गीताविष्णुसहस्रनामपाठकर्तृत्वेन च वो विभज्य वृणे । ' इस प्रकार संकल्प करके प्रत्येक ब्राह्मणको वरण - सामग्री अर्पित करे । सामग्री लेकर वे ब्राह्मण कहें ' वृताः स्मः ' । इसके बाद पहले कथावाचक आचार्यके हाथमें दिये हुए रक्षासूत्रको लेकर उन्हींके हाथमें बाँध दे । उस समय आचार्य निम्नांकित मन्त्रका पाठ करें—
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥
रक्षा बाँधनेके अनन्तर यजमान उनके ललाटमें कुंकुम ( रोली ) और अक्षतसे तिलक करे । इसी प्रकार जपकर्ता ब्राह्मणोंके हाथोंमें भी रक्षा बाँधकर तिलक करे । तदनन्तर पीले अक्षत लेकर यजमान चारों दिशाओंमें रक्षाके लिये बिखेरे । उस समय
निम्नांकित मन्त्रों का पाठ भी करे-पूर्वे नारायणः पातु वारिजाक्षश्च दक्षिणे ।
पश्चिमे पातु गोविन्द उत्तरे मधुसूदनः ॥
ऐशान्यां वामनः पातु चाग्नेय्यां च जनार्दनः ।
नैरृत्यां पद्मनाभश्च वायव्यां माधवस्तथा ॥
ऊर्ध्वं गोवर्धनधरो ह्यधस्ताच्च त्रिविक्रमः ।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं तत्सर्वं रक्षतां हरिः ॥
इसके बाद वक्ता आचार्य यजमानके हाथमें—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
इस मन्त्रको पढ़कर रक्षा बाँधे और—
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।
तिलकं ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये ॥
- इस मन्त्रसे उसके ललाटमें तिलक कर दे । फिर यजमान व्यासासनकी चन्दन-पुष्प आदिसे पूजा करे । पूजनका मन्त्र इस प्रकार है- ' ॐ व्यासासनाय नमः ' । तदनन्तर कथावाचक आचार्य ब्राह्मणों और वृद्ध पुरुषोंकी आज्ञा लेकर विप्रवर्गको नमस्कार और गुरु - चरणोंका ध्यान करके व्यासासनपर बैठे । मन - ही - मन गणेश और नारदादिका स्मरण एवं पूजन करें । इसके बाद यजमान ' ॐ नमः पुराणपुरुषोत्तमाय ' इस मन्त्रसे पुनः पुस्तककी गन्ध, पुष्प, तुलसीदल एवं दक्षिणा आदिके द्वारा पूजा करे । फिर गन्ध, पुष्प आदिसे वक्ताका पूजन करते हुए निम्नांकित श्लोकका पाठ करे—
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जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः ।
यस्यास्यकमलगलितं वाड्मयममृतं जगत्पिबति ॥
तत्पश्चात् नीचे लिखे हुए श्लोकोंको पढ़कर प्रार्थना करे—
शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ॥
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे ।
कर्ममोहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात् ॥
इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् निम्नांकित श्लोक पढ़कर श्रीमद्भागवतपर पुष्प, चन्दन और नारियल आदि चढ़ाये—
श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि ।
स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे ॥
मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया ।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ॥
कथा - मण्डपमें वायुरूपधारी आतिवाहिक शरीरवाले जीवविशेषके लिये सात गाँठके एक बाँसको भी स्थापित कर देना चाहिये । तत्पश्चात् वक्ता भगवान्का स्मरण करके उस दिन श्रीमद्भागवतमाहात्म्यकी कथा सब श्रोताओंको सुनाये और दूसरे दिनसे प्रतिदिन देवपूजा, पुस्तक तथा व्यासकी पूजा एवं आरती हो जानेके पश्चात् वक्ता कथा प्रारम्भ करे । सन्ध्याको कथाकी समाप्ति होनेपर भी नित्यप्रति पुस्तक तथा वक्ताकी पूजा तथा आरती, प्रसाद एवं तुलसीदलका वितरण, भगवन्नामकीर्तन एवं शङ्खध्वनि करनी चाहिये । कथाके प्रारम्भमें और बीच-बीचमें भी जब कथाका विराम हो तो समयानुसार भगवन्नामकीर्तन करना चाहिये । वक्ताको चाहिये कि प्रतिदिन पाठ प्रारम्भ करनेसे पूर्व एक सौ आठ बार ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' इस द्वादशाक्षरमन्त्रका अथवा ' ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ' इस गोपालमन्त्रका जप करे । इसके बाद निम्नांकित वाक्य पढ़कर विनियोग करे— ॐ अस्य श्रीमद्भागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य नारदऋषिः बृहतीच्छन्दः श्रीकृष्णपरमात्मा देवता ब्रह्मबीजं भक्तिः शक्तिः ज्ञानवैराग्यकीलकं मम श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः । विनियोगके पश्चात् निम्नांकित रूपसे न्यास करे-ऋष्यादिन्यासः – नारदर्षये नम: शिरसि । बृहतीच्छन्दसे नमः मुखे । श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः हृदि । ब्रह्मबीजाय नमः गुह्ये । भक्तिशक्तये नमः पादयोः | ज्ञानवैराग्यकीलकाभ्यां नमः नाभौ श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्ध्यर्थकपाठविनियोगाय नमः सर्वांगे ।
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द्वादशाक्षरमन्त्रसे करन्यास और अंगन्यास करना चाहिये अथवा नीचे लिखे अनुसार उसका सम्पादन करना चाहिये— करन्यासः – ॐ क्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ क्लूं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ क्लैं अनामिकाभ्यां नमः । ॐ क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ क्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अङ्गन्यासः – ॐ क्लां हृदयाय नमः । ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा । ॐ क्लूं शिखायै वषट् । ॐ क्लैं कवचाय हुम् । ॐ क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ क्लः अस्त्राय फट् । इसके बाद निम्नांकित रूपसे ध्यान करे-कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुः करे कङ्कणम् । सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः ॥ अस्ति स्वस्तरुणीकराग्रविगलत्कल्पप्रसूनाप्लुतं वस्तु प्रस्तुतवेणुनादलहरीनिर्वाणनिर्व्याकुलम् । स्रस्तस्रस्तनिबद्धनीविविलसद्गोपीसहस्रावृतं हस्तन्यस्तनतापवर्गमखिलोदारं किशोराकृतिः ॥ इस प्रकार ध्यानके पश्चात् कथा प्रारम्भ करनी चाहिये । सूर्योदयसे आरम्भ करके प्रतिदिन साढ़े तीन प्रहरतक कथा बाँचनी चाहिये । मध्याह्नमें दो घड़ी कथा बंद रखनी चाहिये । प्रातःकालसे मध्याह्नतक मूलका पाठ होना चाहिये और मध्याह्नसे सन्ध्यातक उसका संक्षिप्त भावार्थ अपनी भाषामें कहना चाहिये । मध्याह्नमें विश्रामके समय तथा रात्रिके समय भगवन्नाम - कीर्तनकी व्यवस्था होनी चाहिये । श्रोताओंके स्थान - वक्ताके सामने श्रोताओंके बैठनेके लिये आगे - पीछे सात पंक्तियाँ बना लेनी चाहिये । पहली पंक्तिका नाम सत्यलोक है, इसमें साधु - संन्यासी, विरक्त, वैष्णव आदिको बैठाना चाहिये । दूसरी पंक्ति तपोलोक कहलाती है, इसमें वानप्रस्थ श्रोताओंको बैठाना चाहिये । तीसरी पंक्तिको जनलोक नाम दिया गया है, इसमें ब्रह्मचारी श्रोता बैठाये जाने चाहिये । चौथी पंक्ति महर्लोक कही गयी है, यह ब्राह्मण श्रोताओंका स्थान है । पाँचवीं पंक्तिको स्वर्लोक कहते हैं । इसमें क्षत्रिय श्रोताओंको बैठाना चाहिये । छठी पंक्तिका नाम भुवर्लोक है, जो वैश्य श्रोताओंका स्थान है । सातवीं पंक्ति भूर्लोक मानी गयी है, उसमें शूद्रजातीय श्रोताओंको बैठाना चाहिये । स्त्रियाँ वक्ताके वामभागकी भूमिपर कथा सुनें । ये स्थान उन लोगोंके लिये नियत किये गये हैं, जो प्रतिदिन नियमपूर्वक कथा सुनते हैं । जो श्रोता कथा प्रारम्भ होनेपर कुछ समयके लिये अनियमितरूपसे आते हैं, उनके लिये वक्ताके दक्षिण भागमें स्थान रहना
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चाहिये | श्रोताओंके नियम — श्रोता प्रतिदिन एक बार हविष्यान्न भोजन करें । पतित, दुर्जन आदिका संग तो दूर रहा, उनसे वार्तालाप भी न करें । ब्रह्मचर्यपालन, भूमिशयन ( नीचे आसन बिछाकर या तख्तपर सोना ) सबके लिये अनिवार्य है । एकाग्रचित्त होकर कथा सुननी चाहिये । जितने दिन कथा सुनें – धन, स्त्री, पुत्र, घर एवं लौकिक लाभकी समस्त चिन्ताएँ त्याग दें । मल - मूत्रपर काबू रखनेके लिये हलका आहार सुखद होता है । यदि शक्ति हो तो सात दिनतक उपवास करके कथा सुनें । अन्यथा दूध पीकर सुखपूर्वक कथा सुनें । इससे भी काम न चले तो फलाहार या एक समय अन्न- भोजन करें । जिस तरह भी सुखपूर्वक कथा सुननेकी सुविधा हो, वैसे कर लें । प्रतिदिन कथा समाप्त होनेपर ही भोजन करना उचित है । दाल, शहद, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित अन्न तथा बासी अन्नका परित्याग करें । काम, क्रोध, मद, मान, ईर्ष्या, लोभ, दम्भ, मोह तथा द्वेषसे दूर रहें । वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गौ, व्रती, स्त्री, राजा तथा महापुरुषोंकी कभी भूलकर भी निन्दा न करें । रजस्वला, चाण्डाल, म्लेच्छ, पतित, व्रतहीन, ब्राह्मणद्रोही तथा वेद - बहिष्कृत मनुष्योंसे वार्तालाप न करें । मनमें सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय तथा उदारताको स्थान दें । श्रोताओंको वक्तासे ऊँचे आसनपर कभी नहीं बैठना चाहिये | कुछ विशेष बातें – प्रत्येक स्कन्धकी समाप्ति होनेपर चन्दन, पुष्प, नैवेद्य आदिसे पुस्तककी पूजा करके आरती उतारनी चाहिये । शुकदेवजीके आगमन तथा श्रीकृष्णके प्राकट्यका प्रसंग आनेपर भी आरती करनी चाहिये । बारहवें स्कन्धकी समाप्ति होनेपर पुस्तक और वक्ताका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये । वक्ता गृहस्थ हों तो, उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार उदारतापूर्वक वस्त्राभूषण तथा नकद रुपये भेंट देने चाहिये । मृदंग आदि बजाकर जोर - जोरसे कीर्तन करना चाहिये । जय - जयकार, नमस्कार और शंखनाद करने चाहिये । ब्राह्मणों और याचकोंको अन्न एवं धन देना चाहिये । वक्ताके हाथोंसे श्रोताओंको प्रसाद एवं तुलसीदल मिलने चाहिये । प्रतिदिन कथाके प्रारम्भ और अन्तमें आरती होनी आवश्यक है । ( श्रीमद्भागवतकी आरती इसमें अन्यत्र दी गयी है । ) कथाका विश्राम प्रतिदिन नियत स्थलपर ही करना चाहिये । प्रथम दिन मनु - कर्दम-संवादतक । दूसरे दिन भरत चरित्रतक । तीसरे दिन सातवें स्कन्धकी समाप्तितक । चौथे दिन श्रीकृष्णके प्राकट्यतक । पाँचवें दिन रुक्मिणी - विवाहतक और छठे दिन हंसोपाख्यानतककी कथा बाँचकर, सातवें दिन अवशिष्ट भागको पूर्ण कर देना चाहिये । * स्कन्धके आदि और अन्तिम श्लोकको कई बार उच्च स्वरसे पढ़ना चाहिये । कथा - समाप्तिके दूसरे दिन वहाँ स्थापित हुए सम्पूर्ण देवताओंका पूजन करके हवनकी वेदीपर पंचभूसंस्कार, अग्निस्थापन एवं कुशकण्डिका करे । फिर विधिपूर्वक वृत ब्राह्मणोंद्वारा हवन, तर्पण एवं मार्जन कराकर श्रीमद्भागवतकी शोभायात्रा निकाले और ब्राह्मण - भोजन कराये । मधु - मिश्रित खीर और तिल आदिसे भागवतके श्लोकोंका