श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 571–580
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580
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विद्या और योगसे सम्पन्न तथा विषयोंमें अनासक्त आप ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया है और फिर उन सहस्र चरणोंवाले विराट् पुरुषने आपलोगोंकी रक्षाके लिये ही अपनी सहस्रों भुजाओंसे हम क्षत्रियोंको उत्पन्न किया है । इस प्रकार ब्राह्मण उनके हृदय और क्षत्रिय शरीर कहलाते हैं ॥२-३ ॥ अतः एक ही शरीरसे सम्बद्ध होनेके कारण अपनी - अपनी और एक-दूसरेकी रक्षा करनेवाले उन ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी वास्तवमें श्रीहरि ही रक्षा करते हैं जो समस्त कार्यकारणरूप होकर भी वास्तवमें निर्विकार हैं || ४ || आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसाके मिससे स्वयं ही प्रजापालनकी इच्छावाले राजाके धर्मोंका बड़े प्रेमसे निरूपण किया है || ५ || आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषोंको बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणोंकी मंगलमयी रज अपने सिरपर चढ़ा सका ॥६ ॥ मेरे भाग्योदयसे ही आपने मुझे राजधर्मोंकी
शिक्षा देकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है और मैंने भी शुभ प्रारब्धका उदय होनेसे ही आपकी पवित्र वाणी कान खोलकर सुनी है ॥७ ॥
मुने! इस कन्याके स्नेहवश मेरा चित्त बहुत चिन्ताग्रस्त हो रहा है; अतः मुझ दीनकी यह प्रार्थना आप कृपापूर्वक सुनें II II यह मेरी कन्या - जो प्रियव्रत और उत्तानपादकी बहिन है —अवस्था, शील और गुण आदिमें अपने योग्य पतिको पानेकी इच्छा रखती है ॥९ ॥
यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान् ।
अशृणोन्नारदादेषा त्यय्यासीत्कृतनिश्चया ॥१०
तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया ।
सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु ॥ ११
उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते ।
अपि निर्मुक्तसंगस्य कामरक्तस्य किं पुनः ॥१२
य उद्यतमनादृत्य कीनाशमभियाचते ।
क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्चावज्ञया हतः ॥१३
अहं त्वाशृणवं विद्वन् विवाहार्थं समुद्यतम् ।
अतस्त्वमुपकुर्वाणः प्रत्तां प्रतिगृहाण मे ॥१४
ऋषिरुवाच
बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा ।
आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधिः ॥ १५
कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः । क एव ते तनयां नाद्रियेत
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स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम् ॥१६ यां हर्म्यपृष्ठे क्वणदङ्घ्रिशोभां
विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम् ।
विश्वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना-द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेताः ॥ १७
जबसे इसने नारदजीके मुखसे आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणोंका वर्णन सुना है तभीसे यह आपको अपना पति बनानेका निश्चय कर चुकी है || १० || द्विजवर! मैं बड़ी श्रद्धासे आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये । यह गृहस्थोचित कार्योंके लिये सब प्रकार आपके योग्य है ॥ ११ ॥ जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाय, उसकी
अवहेलना करना विरक्त पुरुषको भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्तकी तो बात ही क्या है ॥१२ ॥ जो पुरुष स्वयं प्राप्त हुए भोगका निरादर कर फिर किसी कृपणके आगे हाथ
पसारता है उसका बहुत फैला हुआ यश भी नष्ट हो जाता है और दूसरोंके तिरस्कारसे मानभंग भी होता है ॥१३ ॥ विद्वन्! मैंने सुना है, आप विवाह करनेके लिये उद्यत हैं । आपका
ब्रह्मचर्य एक सीमातक है, आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो हैं नहीं । इसलिये अब आप इस कन्याको स्वीकार कीजिये, मैं इसे आपको अर्पित करता हूँ ॥१४ ॥
श्रीकर्दम मुनिने कहा- ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्याका अभी किसीके साथ वाग्दान नहीं हुआ है, इसलिये हम दोनोंका सर्वश्रेष्ठ ब्राह्म * विधिसे विवाह होना उचित ही होगा ॥१५ ॥ राजन्! वेदोक्त विवाह - विधिमें प्रसिद्ध जो ' गृभ्णामि ते ’ इत्यादि
मन्त्रोंमें बताया हुआ काम ( संतानोत्पादनरूप मनोरथ ) है, वह आपकी इस कन्याके साथ हमारा सम्बन्ध होनेसे सफल होगा । भला, जो अपनी अंगकान्तिसे आभूषणादिकी शोभाको भी तिरस्कृत कर रही है, आपकी उस कन्याका कौन आदर न करेगा? ॥१६ ॥
एक बार यह अपने महलकी छतपर गेंद खेल रही थी । गेंदके पीछे इधर - उधर दौड़नेके कारण इसके नेत्र चंचल हो रहे थे तथा पैरोंके पायजेब मधुर झनकार करते जाते थे । उस समय इसे देखकर विश्वावसु गन्धर्व मोहवश अचेत होकर अपने विमानसे गिर पड़ा था ॥१७ ॥
तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम-मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् । वत्सां मनोरुच्चपदः स्वसारं को नानुमन्येत बुधोऽभियाताम् ॥१८ अतो भजिष्ये ' समयेन साध्वीं यावत्तेजो बिभृयादात्मनो मे । अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान् शुक्लप्रोक्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान् ॥१९
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यतोऽभवद्विश्वमिदं विचित्रं संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते । प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं परं प्रमाणं भगवाननन्तः ॥२० मैत्रेय उवाच स उग्रधन्वन्नियदेवाबभाषे २ आसीच्च तूष्णीमरविन्दनाभम् । धियोपगृह्णन् स्मितशोभितेन मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्याः ॥२१
सोऽनु ज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम् ।
तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षितः ॥ २२
शतरूपा महाराज्ञी पारिबर्हान्महाधनान् ।
दम्पत्योः पर्यदात्प्रीत्या भूषावासः परिच्छदान् ॥२३
प्रत्तां ४ दुहितरं सम्राट् सदृक्षाय गतव्यथः ।
उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशयः ॥२४
अशक्नुवंस्तद्विरहं मुंचन् बाष्पकलां मुहुः ।
आसिंचदम्ब ' वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः ॥ २५
वही इस समय यहाँ स्वयं आकर प्रार्थना कर रही है; ऐसी अवस्थामें कौन समझदार पुरुष इसे स्वीकार न करेगा? यह तो साक्षात् आप महाराज श्रीस्वायम्भुवमनुकी दुलारी कन्या और उत्तानपादकी प्यारी बहिन है; तथा यह रमणियोंमें रत्नके समान है । जिन लोगोंने कभी श्रीलक्ष्मीजीके चरणोंकी उपासना नहीं की है, उन्हें तो इसका दर्शन भी नहीं हो सकता ॥१८ ॥ अतः मैं आपकी इस साध्वी कन्याको अवश्य स्वीकार करूँगा, किन्तु एक
शर्तके साथ । जबतक इसके संतान न हो जायगी, तबतक मैं गृहस्थ धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा । उसके बाद भगवान्के बताये हुए संन्यासप्रधान हिंसारहित शम - दमादि धर्मोंको ही अधिक महत्त्व दूँगा ॥१९ ॥ जिनसे इस विचित्र जगत्की उत्पत्ति हुई है, जिनमें यह लीन हो
जाता है और जिनके आश्रयसे यह स्थित है— मुझे तो वे प्रजापतियोंके भी पति भगवान् श्रीअनन्त ही सबसे अधिक मान्य हैं ॥ २० ॥
मैत्रेयजी कहते हैं — प्रचण्ड धनुर्धर विदुर! कर्दमजी केवल इतना ही कह सके, फिर वे हृदयमें भगवान् कमलनाभका ध्यान करते हुए मौन हो गये । उस समय उनके मन्द हास्ययुक्त मुखकमलको देखकर देवहूतिका चित्त लुभा गया || २१ || मनुजीने देखा कि इस सम्बन्धमें
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महारानी शतरूपा और राजकुमारीकी स्पष्ट अनुमति है, अतः उन्होंने अनेक गुणोंसे सम्पन्न कर्दमजीको उन्हींके समान गुणवती कन्याका प्रसन्नता पूर्वक दान कर दिया ॥ २२ ॥ महारानी
शतरूपाने भी बेटी और दामादको बड़े प्रेमपूर्वक बहुत से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित पात्रादि दहेज में दिये || २३ || इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये । चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छाती से चिपटा लिया और ' बेटी! बेटी! ' कहकर रोने लगे । उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये ॥ २४-२५ ॥
आमन्त्रय तं मुनिवरमनुज्ञातः सहानुगः ।
प्रतस्थे रथमारुह्य सभार्यः स्वपुरं नृपः ॥२६
उभयोर्ऋषिकुल्यायाः सरस्वत्याः सुरोधसोः ।
ऋषीणामुपशान्तानां पश्यन्नाश्रमसम्पदः ॥२७
तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजाः पतिम् ।
गीतसंस्तुतिवादित्रैः प्रत्युदीयुः प्रहर्षिताः ॥ २८
बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता ।
न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्यांगं विधुन्वतः ॥२९
कुशाः काशास्त एवासन् शश्वद्धरितवर्चसः ।
ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे ॥३०
कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान्मनुः ।
अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम् ॥३१
बर्हिष्मतीं नाम विभुर्यां निर्विश्य समावसत् ।
तस्यां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम् ॥३२
सभार्यः सप्रजः कामान् बुभुजेऽन्याविरोधतः ।
संगीयमानसत्कीर्तिः सस्त्रीभिः सुरगायकैः ।
प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा शृण्वन् हरेः कथाः ॥३३
निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम् ।
यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम् ॥३४
अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः ।
शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥३५
स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम् ।
वासुदेवप्रसंगेन परिभूतगतित्रयः ॥३६
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फिर वे मुनिवर कर्दमसे पूछकर, उनकी आज्ञा ले रानीके सहित रथपर सवार हुए और अपने सेवकोंसहित ऋषिकुलसेवित सरस्वती नदीके दोनों तीरोंपर मुनियोंके आश्रमोंकी शोभा देखते हुए अपनी राजधानीमें चले आये ॥२६-२७ ॥ जब ब्रह्मावर्तकी प्रजाको यह समाचार मिला कि उसके स्वामी आ रहे हैं तब वह अत्यन्त आनन्दित होकर स्तुति, गीत एवं बाजे - गाजेके साथ अगवानी करनेके लिये ब्रह्मावर्तकी राजधानीसे बाहर आयी || २८ || सब प्रकारकी सम्पदाओंसे युक्त बर्हिष्मती नगरी मनुजीकी राजधानी थी, जहाँ पृथ्वीको रसातलसे ले आनेके पश्चात् शरीर कँपाते समय श्रीवराहभगवान्के रोम झड़कर गिरे थे ॥२९ ॥ वे रोम ही निरन्तर हरे - भरे रहनेवाले कुश और
कास हुए, जिनके द्वारा मुनियोंने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले दैत्योंका तिरस्कार कर भगवान् यज्ञपुरुषकी यज्ञोंद्वारा आराधना की है || ३० || महाराज मनुने भी श्रीवराहभगवान्से भूमिरूप निवासस्थान प्राप्त होनेपर इसी स्थानमें कुश और कासकी बर्हि ( चटाई ) बिछाकर श्रीयज्ञभगवान्की पूजा की थी ॥ ३१ ॥
जिस बर्हिष्मती पुरीमें मनुजी निवास करते थे, उसमें पहुँचकर उन्होंने अपने त्रितापनाशक भवनमें प्रवेश किया || ३२ || वहाँ अपनी भार्या और सन्ततिके सहित वे धर्म, अर्थ और मोक्षके अनुकूल भोगोंको भोगने लगे । प्रातः काल होनेपर गन्धर्वगण अपनी स्त्रियोंके सहित उनका गुणगान करते थे; किन्तु मनुजी उसमें आसक्त न होकर प्रेमपूर्ण हृदयसे श्रीहरिकी कथाएँ ही सुना करते थे ॥ ३३ ॥ वै इच्छानुसार भोगोंका निर्माण करनेमें
कुशल थे; किन्तु मननशील और भगवत्परायण होनेके कारण भोग उन्हें किंचित् भी विचलित नहीं कर पाते थे || ३४ || भगवान् विष्णुकी कथाओंका श्रवण, ध्यान, रचना और निरूपण करते रहनेके कारण उनके मन्वन्तरको व्यतीत करनेवाले क्षण कभी व्यर्थ नहीं जाते थे ॥३५ ॥ इस प्रकार अपनी जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं अथवा तीनों गुणोंको अभिभूत
करके उन्होंने भगवान् वासुदेवके कथाप्रसंगमें अपने मन्वन्तरके इकहत्तर चतुर्युग पूरे कर दिये || ३६ ||
शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषाः ।
भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥३७
यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्नानाविधाञ्छुभान् ।
नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा ॥३८
एतत्त आदिराजस्य मनोश्चरितमद्भुतम् ।
वर्णितं वर्णनीयस्य तदपत्योदयं शृणु ॥३९
व्यासनन्दन विदुरजी! जो पुरुष श्रीहरिके आश्रित रहता है उसे शारीरिक, मानसिक, दैविक, मानुषिक अथवा भौतिक दुःख किस प्रकार कष्ट पहुँचा सकते हैं ॥ ३७ ॥ मनुजी
निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे । मुनियोंके पूछनेपर उन्होंने मनुष्योंके तथा
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समस्त वर्ण और आश्रमोंके अनेक प्रकारके मंगलमय धर्मोंका भी वर्णन किया ( जो मनुसंहिताके रूपमें अब भी उपलब्ध है ) ॥ ३८ ॥
जगत्के सर्वप्रथम सम्राट् महाराज मनु वास्तवमें कीर्तनके योग्य थे । यह मैंने उनके अद्भुत चरित्रका वर्णन किया, अब उनकी कन्या देवहूतिका प्रभाव सुनो ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२ ॥
१. प्रा ० पा ० — ब्रह्मन्नुत्तमांगं प्र ० । * मनुस्मृतिमें आठ प्रकारके विवाहोंका उल्लेख पाया जाता है - ( १ ) ब्राह्म, ( २ ) दैव, ( ३ ) आर्ष, ( ४ ) प्राजापत्य, ( ५ ) आसुर, ( ६ ) गान्धर्व, ( ७ ) राक्षस और ( ८ ) पैशाच । इनके लक्षण वहीं तीसरे अध्यायमें देखने चाहिये । इनमें पहला सबसे श्रेष्ठ माना गया है । इसमें पिता योग्य वरको कन्याका दान करता है । १. प्रा ० पा ० – वरिष्ये । २. प्रा पा– धन्वन्नृप आबभा । ३. प्रा ० पा ० – पारिहार्यं महाधनम् । ४. प्रा ० पा ० – पिता । ५. प्रा ० पा ० - आसिंचन्निव चात्मेति नेत्रो ० ।
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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः कर्दम और देवहूतिका विहार मैत्रेय उवाच
पितृभ्यां प्रस्थिते साध्वी पतिमिंगितकोविदा ।
नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या भवानीव भवं प्रभुम् ॥१
विश्रम्भेणात्मशौचेन गौरवेण दमेन च ।
शुश्रूषया सौहृदेन वाचा मधुरया च भोः ॥२
विसृज्य कामं दम्भं च द्वेषं लोभमघं मदम् ।
अप्रमत्तोद्यता नित्यं तेजीयांसमतोषयत् ॥३
स वै देवर्षिवर्यस्तां मानवीं समनुव्रताम् ।
दैवाद्गरीयसः पत्युराशासानां महाशिषः ॥४
कालेन भूयसा क्षामां कर्शितां व्रतचर्यया ।
प्रेमगद्गदया वाचा पीडितः कृपयाब्रवीत् ॥ ५
श्रीमैत्रेयजीने कहा – विदुरजी! माता - पिताके चले जानेपर पतिके अभिप्रायको समझ लेनेमें कुशल साध्वी देवहूति कर्दमजीकी प्रतिदिन प्रेम - पूर्वक सेवा करने लगी, ठीक उसी तरह, जैसे श्रीपार्वतीजी भगवान् शंकरकी सेवा करती हैं ॥१ ॥ असने काम - वासना, दम्भ,
द्वेष, लोभ, पाप और मदका त्यागकर बड़ी सावधानी और लगनके साथ सेवामें तत्पर रहकर विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम और मधुर भाषणादि गुणोंसे अपने परम तेजस्वी पतिदेवको सन्तुष्ट कर लिया ॥२-३ ॥ देवहूति समझती थी कि मेरे पतिदेव दैवसे भी बढ़कर हैं, इसलिये वह उनसे बड़ी - बड़ी आशाएँ रखकर उनकी सेवामें लगी रहती थी । इस प्रकार बहुत दिनोंतक अपना अनुवर्तन करनेवाली उस मनुपुत्रीको व्रतादिका पालन करनेसे दुर्बल हुई देख देवर्षिश्रेष्ठ कर्दमको दयावश कुछ खेद हुआ और उन्होंने उससे प्रेमगद्गद वाणीमें कहा ॥४-५ ॥ कर्दम उवाच तुष्टोऽहमद्य तव मानवि मानदायाः शुश्रूषया परमया परया च भक्त्या । यो देहिनामयमतीव सुहृत्स्वदेहो नावेक्षितः समुचितः क्षपितुं मदर्थे ॥ ६
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ये मे स्वधर्मनिरतस्य तपःसमाधि-विद्यात्मयोगविजिता भगवत्प्रसादाः । तानेव ते मदनुसेवनयावरुद्धान् दृष्टिप्रपश्य वितराम्य भयानशोकान् ॥७ अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्विजृम्भ-विभ्रंशितार्थरचनाः किमुरुक्रमस्य । सिद्धासि भुङ्क्ष्व विभवान्निजधर्मदोहान् दिव्यान्नरैर्दुरधिगान्नृपविक्रियाभिः ॥८
एवं ब्रुवाणमबलाखिलयोगमाया-विद्याविचक्षणमवेक्ष्य गताधिरासीत् ।
सम्प्रश्रयप्रणयविह्वलया गिरेषद्-व्रीडावलोकविलसद्धसिताननाऽऽह ॥ ९
देवहूतिरुवाच राद्धं बत े द्विजवृषैतदमोघयोग-मायाधिपे त्वयि विभो तदवैमि भर्तः । यस्तेऽभ्यधायि समयः सकृदंगसंगो भूयाद्गरीयसि गुणः प्रसवः ३ सतीनाम् ॥१० कर्दमजी बोले — मनुनन्दिनि! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है । मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ । सभी देहधारियोंको अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदरकी वस्तु होता है, किन्तु तुमने मेरी सेवाके आगे उसके क्षीण होनेकी भी कोई परवा नहीं की ॥६ ॥ अतः अपने धर्मका पालन करते रहनेसे मुझे तप, समाधि, उपासना और योगके
द्वारा जो भय और शोकसे रहित भगवत्प्रसाद - स्वरूप विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं, उनपर मेरी सेवाके प्रभावसे अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है । मैं तुम्हें दिव्य - दृष्टि प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तुम उन्हें देखो || ७ || अन्य जितने भी भोग हैं, वे तो भगवान् श्रीहरिके भ्रुकुटि -विलासमात्रसे नष्ट हो जाते हैं; अतः वे इनके आगे कुछ भी नहीं हैं । तुम मेरी सेवासे भी कृतार्थ हो गयी हो; अपने पातिव्रत धर्मका पालन करनेसे तुम्हें ये दिव्य भोग प्राप्त हो गये हैं, तुम इन्हें भोग सकती हो । हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है, इस प्रकार जो अभिमान आदि विकार हैं, उनके रहते हुए मनुष्योंको इन दिव्य भोगोंकी प्राप्ति होनी कठिन है || ८ || कर्दमजीके इस प्रकार कहनेसे अपने पतिदेवको सम्पूर्ण योगमाया और विद्याओंमें कुशल जानकर उस अबलाकी सारी चिन्ता जाती रही । उसका मुख किंचित् संकोचभरी चितवन और मधुर मुसकानसे खिल उठा और वह विनय एवं प्रेमसे गद्गद वाणीमें इस प्रकार
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कहने लगी ॥९ ॥
देवहूतिने कहा – द्विजश्रेष्ठ! स्वामिन्! मैं यह जानती हूँ कि कभी निष्फल न होनेवाली योगशक्ति और त्रिगुणात्मिका मायापर अधिकार रखनेवाले आपको ये सब ऐश्वर्य प्राप्त हैं । किन्तु प्रभो! आपने विवाहके समय जो प्रतिज्ञा की थी कि गर्भाधान होनेतक मैं तुम्हारे साथ गृहस्थ - सुखका उपभोग करूँगा, उसकी अब पूर्ति होनी चाहिये । क्योंकि श्रेष्ठ पतिके द्वारा सन्तान प्राप्त होना पतिव्रता स्त्रीके लिये महान् लाभ है ॥१० ॥
तत्रेतिकृत्यमुपशिक्ष यथोपदेशं येनैष मे कर्शितोऽतिरिरंसयाऽऽत्मा । सिद्धयेत ते कृतमनोभवधर्षिताया दीनस्तदीश भवनं सदृशं विचक्ष्व ॥११ मैत्रेय उवाच
प्रियायाः प्रियमन्विच्छन् कर्दमो योगमास्थितः ।
विमानं कामगं क्षत्तस्तर्ह्येवाविरचीकरत् ॥१२
सर्वकामदुघं दिव्यं सर्वरत्नसमन्वितम् ।
सर्वद्धर्युपचयोदर्क मणिस्तम्भैरुपस्कृतम् ॥१३
दिव्योपकरणोपेतं सर्वकालसुखावहम् ।
पट्टिकाभिः पताकाभिर्विचित्राभिरलंकृतम् ॥ १४
स्रग्भिर्विचित्रमाल्याभिर्मंजुशिंजत्षडङ्घ्रिभिः ।
दुकूल क्षौमकौशेयैर्नानावस्त्रैर्विराजितम् ॥१५
उपर्युपरि विन्यस्तनिलयेषु पृथक्पृथक् ।
क्षिप्तैः कशिपुभिः कान्तं पर्यङ्कव्यजनासनैः ॥१६
तत्र तत्र विनिक्षिप्तनानाशिल्पोपशोभितम् ।
महामरकतस्थल्या जुष्टं विद्रुमवेदिभिः ॥ १७
द्वाःसु े विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटवत् ।
शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिश्रितम् ॥ १८
चक्षुष्मत्पद्मरागाग्र्यैर्वज्रभित्तिषु निर्मितैः ।
जुष्टं विचित्रवैतानैर्महार्हेर्हेमतोरणैः ॥१९
हम दोनोंके समागमके लिये शास्त्र के अनुसार जो कर्तव्य हो, उसका आप उपदेश दीजिये और उबटन, गन्ध, भोजन आदि उपयोगी सामग्रियाँ भी जुटा दीजिये, जिससे
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मिलनकी इच्छासे अत्यन्त दीन, दुर्बल हुआ मेरा यह शरीर आपके अंग - संगके योग्य हो जाय; क्योंकि आपकी ही बढ़ायी हुई कामवेदनासे मैं पीडित हो रही हूँ । स्वामिन्! इस कार्यके लिये एक उपयुक्त भवन तैयार हो जाय, इसका भी विचार कीजिये ॥ ११ ॥
मैत्रेयजी कहते हैं - विदुरजी! कर्दम मुनिने अपनी प्रियाकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसी समय योगमें स्थित होकर एक विमान रचा, जो इच्छानुसार सर्वत्र जा सकता था ॥१२ ॥
यह विमान सब प्रकारके इच्छित भोग - सुख प्रदान करनेवाला, अत्यन्त सुन्दर, सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त, सब सम्पत्तियोंकी उत्तरोत्तर वृद्धिसे सम्पन्न तथा मणिमय खंभोंसे सुशोभित था ॥१३ ॥ वह सभी ऋतुओंमें सुखदायक था और उसमें जहाँ - तहाँ सब प्रकारकी दिव्य
सामग्रियाँ रखी हुई थीं तथा उसे चित्र - विचित्र रेशमी झंडियों और पताकाओंसे खूब सजाया गया था ॥१४ ॥ जिनपर भ्रमरगण मधुर गुंजार कर रहे थे, ऐसे रंग - बिरंगे पुष्पोंकी मालाओंसे
तथा अनेक प्रकारके सूती और रेशमी वस्त्रोंसे वह अत्यन्त शोभायमान हो रहा था ॥१५ ॥
एकके ऊपर एक बनाये हुए कमरोंमें अलग - अलग रखी हुई शय्या, पलंग, पंखे और आसनोंके कारण वह बड़ा सुन्दर जान पड़ता था ॥१६ ॥ जहाँ - तहाँ दीवारोंमें की हुई
शिल्परचनासे उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी । उसमें पन्नेका फर्श था और बैठनेके लिये मूँगेकी वेदियाँ बनायी गयी थीं ॥ १७ ॥ मूँगे की ही देहलियाँ थीं । उसके द्वारोंमें हीरेके किवाड़
तथा इन्द्रनील मणिके शिखरोंपर सोनेके कलश रखे हुए थे ॥ १८ ॥ उसकी हीरेकी
दीवारोंमें बढ़िया लाल जड़े हुए थे, जो ऐसे जान पड़ते थे मानो विमानकी आँखें हों तथा उसे रंग - बिरंगे चँदोवे और बहुमूल्य सुनहरी बन्दनवारोंसे सजाया गया था ॥१९ ॥
हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् ” ।
कृत्रिमान् मन्यमानैः २ स्वानधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २०
विहारस्थानविश्रामसंवेशप्रांगणाजिरैः ।
यथोपजोषं रचितैर्विस्मापनमिवात्मनः ॥२१
ईदृग्गृहं तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा ।
सर्वभूताशयाभिज्ञः प्रावोचत्कर्दमः ४ स्वयम् ॥२२
निमज्ज्यास्मिन् ह्रदे भीरु विमानमिदमारुह ।
इदं शुक्लकृतं तीर्थमाशिषां यापकं ५ नृणाम् ॥२३
सा तद्भर्तुः समादाय वचः कुवलयेक्षणा ।
सरजं बिभ्रती वासो वेणीभूतांश्च मूर्धजान् ॥ २४
अंगं च मलपङ्केन संछन्नं शबलस्तनम् ।
आविवेश सरस्वत्याः सरः शिवजलाशयम् ॥२५
सान्तःसरसि वेश्मस्थाः शतानि दश कन्यकाः ।
सर्वाः किशोरवयसो ददर्शोत्पलगन्धयः ॥ २६