कापिलेयोपाख्यान : अज्ञान और मोह के चक्र से मुक्त होकर परमपद कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
आत्मज्ञान और भक्ति का मार्ग
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23–33 · पृष्ठ 562–668
9,561 शब्द · 48 मिनटका पाठ · 51 श्लोक
मैत्रेय ने विदुर से कहा
परमपद प्राप्ति के रहस्य को समझाने हेतु
मैत्रेय जी ने विदुर जी से कहा— हे विप्रवर! जब कर्दम ऋषि ने इस प्रकार निष्कपट भाव से भगवान् की स्तुति की, तब वे गरुड़जी के कन्धे पर विराजमान होकर प्रसन्न मुस्कान के साथ चञ्चल हो रहे थे। भगवान् उनकी स्तुति सुनकर अमृतमयी वाणी से कहने लगे— "प्रजापते! मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती; फिर जिनका चित्त निरन्तर एकान्तरूपसे मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम जैसे महात्माओं की उपासना का तो और भी अधिक फल होता है।"
जुष्टं बताद्याखिलसत्त्वराशेः सांसिध्यमक्ष्णोस्तव दर्शनान्नः ।
यद्दर्शनं जन्मभिरीड्य सद्भि-राशासते योगिनो रूढयोगाः ॥
भगवान् ने आगे कहा— "प्रसिद्ध यशस्वी सम्राट् स्वायम्भुव मनु ब्रह्मावर्त में रहकर सात समुद्र वाली सारी पृथ्वी का शासन करते हैं। वे परम धर्मज्ञ हैं और महारानी शतरूपा के साथ तुमसे मिलने के लिए परसों यहाँ आएँगे। उनकी एक कन्या, जो रूप-यौवन, शील और गुणों से सम्पन्न है, इस समय विवाह के योग्य है। हे प्रजापते! तुम सर्वथा उसके योग्य हो, इसलिए वे तुम्हीं को वह कन्या अर्पण करेंगे। वत्स! गत अनेकों वर्षों से तुम्हारा चित्त जैसी भार्या के लिए समाहित रहा है, अब शीघ्र ही वह राजकन्या तुम्हारी वैसी ही पत्नी होकर यथेष्ट सेवा करेगी। तुम मेरी आज्ञा का अच्छी तरह पालन करके शुद्धचित्त बनो, फिर अपने सब कर्मों का फल मुझे अर्पण कर मुझको ही प्राप्त हो जाओगे। जीवों पर दया करते हुए तुम आत्मज्ञान प्राप्त करोगे और फिर सबको अभय-दान दे अपने सहित सम्पूर्ण जगत् को मुझमें और मुझको अपने में स्थित देखोगे। मैं भी अपने अंश-कलारूप से तुम्हारे वीर्य द्वारा तुम्हारी पत्नी देवहूतिके गर्भ में अवतीर्ण होकर साङ्ख्यशास्त्र की रचना करूँगा।"
कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान् ।
मय्यात्मानं सह जगद् द्रक्ष्यस्यात्मनि चापि माम् ॥
इतना कहकर भगवान् कर्दमजी के देखते-देखते अपने लोक को सिधार गए। उस समय गरुड़जी के पक्षों से निकल रही सामकी आधारभूत ऋचाओं को वे सुनते जाते हुए चले गए। श्रीहरि के चले जाने पर भगवान् कर्दम उनके बताए हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए बिन्दु-सरोवर पर ही ठहरे रहे।
एकः स्वयं संजगतः सिसृक्षया-द्वितीययाऽऽत्मन्नधियोगमायया ।
सृजस्यदः पासि पुनर्ग्रसिष्यसे यथोर्णनाभिर्भगवन् स्वशक्तिभिः ॥
विदुर जी! उधर मनुजी भी महारानी शतरूपा के साथ सुवर्णजटित रथ पर सवार होकर, अपनी कन्या को भी उस पर बिठाकर पृथ्वी पर विचरते हुए, उसी दिन उस आश्रम पर पहुँचे जहाँ शान्तिपरायण महर्षि कर्दम रहते थे। वह बिन्दु-सरोवर बड़ा पवित्र था, जिसका जल अमृत के समान मधुर है। वह तीर्थ वृक्षों से घिरा हुआ था, जहाँ विभिन्न प्रकार के पक्षी और पशु विचरण करते थे। वहाँ झुण्ड के झुण्ड मतवाले पक्षी चहक रहे थे, भौंरे मँडरा रहे थे और उन्मत्त मयूर अपने पङ्ख फैलाकर नृत्य कर रहे थे। कोकिल कुहू-कुहू कर रहे थे। वह आश्रम कदम्ब, चम्पक, अशोक, करञ्ज, बकुल, असन, कुन्द, मन्दार, कुटज और आम के वृक्षों से अलङ्कृत था। जल में हंस, सारस और चकवा जैसे पक्षी मधुर स्वर में कलरव कर रहे थे। उस आश्रम के चारों ओर हरिन, सूअर, नीलगाय, हाथी, लङ्गूर, सिंह, वानर और कस्तूरी मृग भी निवास करते थे।
या त आत्मभृतं वीर्यं नवधा प्रसविष्यति ।
वीर्ये त्वदीये ऋषय आधास्यन्त्यञ्जसाऽऽत्मनः ॥
राजा मनु ने जब उस उत्तम तीर्थ में अपनी कन्या सहित पहुँचकर देखा, तो पाया कि मुनिवर कर्दम अग्निहोत्र से निवृत्त होकर बैठे हुए हैं। उग्र तपस्या के कारण वे शरीर से अत्यन्त तेजस्वी दिख रहे थे। उनके विशाल और मनोहर नेत्र थे, सिर पर जटाएँ सुशोभित थीं और कमर में चीर-वस्त्र था। वे निकट से देखने पर बिना सान पर चढ़ी हुई महामूल्य मणिके समान मलिन जान पड़ते थे। महाराज मनु को अपनी कुटी में आते देख उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उनका स्वागत किया। जब मनुजी पूजा ग्रहण कर आसन पर बैठ गए, तब कर्दम मुनि ने भगवान् की आज्ञा का स्मरण करते हुए मधुर वाणी में कहा—
यस्मिन् भगवतो नेत्रान्न्यपतन्नश्रुबिन्दवः ।
कृपया सम्परीतस्य प्रपन्नेऽर्पितया भृशम् ॥
"देव! आप भगवान् विष्णु की पालनशक्ति रूप हैं, इसलिए आपका घूमना-फिरना सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए ही होता है। आप साक्षात् विशुद्ध विष्णु स्वरूप हैं तथा विभिन्न कार्यों के लिए सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, धर्म और वरुण आदि रूप धारण करते हैं; आपको नमस्कार है। यदि आप ऐसा न करें तो चोर-डाकू वर्णाश्रम की मर्यादा को नष्ट कर देंगे और अधर्म फैल जाएगा। यदि आप संसार की ओर से निश्चिन्त हो जाएँ तो यह लोक दुराचारियों के पञ्जे में पड़कर नष्ट हो जाएगा।"
एवमाविष्कृताशेषगुणकर्मोदयो मुनिम् ।
सव्रीड इव तं सम्राडुपारतमुवाच ह ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! इस प्रकार जब कर्दमजीने मनुजीके सम्पूर्ण गुणों और कर्मोंकी श्रेष्ठताका वर्णन किया तो उन्होंने उन निवृत्तिपरायण मुनिसे कुछ सकुचाकर कहा ।
कर्दम मुनि ने आगे कहा— "वीरवर! मैं आपसे पूछता हूँ कि इस समय यहाँ आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है? मेरे लिए जो आज्ञा होगी, मैं उसे सहर्ष स्वीकार करूँगा।"
मनुरुवाच ब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया ।
छन्दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥
जब कर्दमजी ने मनुजी के गुणों का वर्णन किया, तो उन्होंने सकुचाते हुए कहा— "आपके दर्शन मात्र से ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गए। आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषों को बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणों की मङ्गलमयी रज अपने सिर पर चढ़ा सका। मुने! इस कन्या के स्नेहवश मेरा चित्त बहुत चिन्ताग्रस्त हो रहा है, अतः मेरी यह प्रार्थना सुनें— यह कन्या, जो प्रियव्रत और उत्तानपाद की बहन है, वह अवस्था और शील में अपने योग्य पति को पाने की इच्छा रखती है। जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाए, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुष को भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्त की तो बात ही क्या है! विद्वन्! मैंने सुना है आप विवाह के लिए उद्यत हैं। आपका ब्रह्मचर्य एक सीमा तक है, आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो नहीं हैं। इसलिए अब आप इस कन्या को स्वीकार कीजिये, मैं इसे आपको अर्पित करता हूँ।"
स वै देवर्षिवर्यस्तां मानवीं समनुव्रताम् ।
दैवाद्गरीयसः पत्युराशासानां महाशिषः ॥
कालेन भूयसा क्षामां कर्शितां व्रतचर्यया ।
प्रेमगद्गदया वाचा पीडितः कृपयाब्रवीत् ॥
द्वेष, लोभ, पाप और मदका त्यागकर बड़ी सावधानी और लगनके साथ सेवामें तत्पर रहकर विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम और मधुर भाषणादि गुणोंसे अपने परम तेजस्वी पतिदेवको सन्तुष्ट कर लिया ॥२-३ ॥ देवहूति समझती थी कि मेरे पतिदेव दैवसे भी बढ़कर हैं, इसलिये वह उनसे बड़ी - बड़ी आशाएँ रखकर उनकी सेवामें लगी रहती थी । इस प्रकार बहुत दिनोंतक अपना अनुवर्तन करनेवाली उस मनुपुत्रीको व्रतादिका पालन करनेसे दुर्बल हुई देख देवर्षिश्रेष्ठ कर्दमको दयावश कुछ खेद हुआ और उन्होंने उससे प्रेमगद्गद वाणीमें कहा ।
कर्दम मुनि ने कहा— "ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्या का अभी किसी के साथ वाग्दान नहीं हुआ है, इसलिए हम दोनों का सर्वश्रेष्ठ ब्राह्म विधि से विवाह होना उचित होगा। राजन्! वेदोक्त विवाह विधि में 'गृभ्णामि ते' इत्यादि मन्त्रों में बताया हुआ काम (सन्तानोत्पादन) आपकी इस कन्या के साथ हमारे सम्बन्ध से सफल होगा। भला, जो अपनी अङ्ग-कान्ति से आभूषणादि की शोभा को भी तिरस्कृत कर रही है, आपकी उस कन्या का कौन आदर नहीं करेगा? एक बार यह अपने महल की छत पर गेंद खेल रही थी; उसके नेत्र चञ्चल हो रहे थे और पैरों के पायजेब मधुर झनकार कर रहे थे। उसे देखकर विश्वावसु गन्धर्व मोहवश अपने विमान से गिर पड़ा था। श्रीलक्ष्मी जी की उपासना न करने के कारण उसे तो इसका दर्शन भी नहीं हो सकता। अतः मैं आपकी इस साध्वी कन्या को अवश्य स्वीकार करूँगा, किन्तु एक शर्त के साथ— जब तक इसकी सन्तान न हो जाएगी, तब तक मैं गृहस्थ धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा। उसके बाद भगवान् के बताये हुए सन्न्यास प्रधान हिंसारहित शम-दमादि धर्मों को ही अधिक महत्त्व दूँगा।"
यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान् ।
अशृणोन्नारदादेषा त्यय्यासीत्कृतनिश्चया ॥
राजा मनु ने अपनी सुयोग्य कन्या कर्दम ऋषि को प्रसन्नतापूर्वक दान कर दी। महारानी शतरूपा ने भी बड़े प्रेम से बेटी और दामाद को बहुत से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित पात्रादि दहेज में दिए। इस प्रकार सुयोग्य वर को अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गए। चलते समय पुत्री के वियोग को सह न पाने के कारण, वे उत्कण्ठावश विह्वल होकर उसे अपनी छाती से चिपटा लिया और 'बेटी! बेटी!' कहकर रोने लगे। उनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई और उन अश्रुओं ने देवहूति के सिर के सारे बाल भिगो दिए।
राजा मनु की राजधानी बर्हिष्मती नगरी थी, जो ब्रह्मावर्त की सीमा से बाहर थी। यह एक वैभवशाली नगरी थी, जहाँ पृथ्वी को रसातल से लाने के पश्चात श्रीवराह भगवान के शरीर से गिरे हुए रोम निरन्तर हरे-भरे कुश और कास बन गए थे। इन्हीं कुशों द्वारा मुनियों ने यज्ञ में विघ्न डालने वाले दैत्यों का तिरस्कार कर, यज्ञपुरुष श्रीवराह की आराधना की है। महाराज मनु ने भी भूमि रूपी निवास प्राप्त होने पर इसी स्थान में कुश और कास की चटाई बिछाकर श्रीयज्ञ भगवान की पूजा की थी।
विदुरजी! राजा मनु ने अपने मन्वन्तर के इकहत्तर चतुर्युग भगवान वासुदेव के कथा-प्रसङ्ग में व्यतीत कर दिए। वे निरन्तर भगवान विष्णु की कथाओं का श्रवण, ध्यान और रचना करते रहे। जो पुरुष श्रीहरि के आश्रित रहता है, उसे शारीरिक, मानसिक या भौतिक दुःख किस प्रकार कष्ट पहुँचा सकते हैं? मनुजी समस्त प्राणियों के हित में लगे रहते थे और मुनियों के पूछने पर उन्होंने मानव वर्णों और आश्रमों के मङ्गलमय धर्मों का वर्णन किया, जो आज भी 'मनुसंहिता' के रूप में उपलब्ध है।
इस प्रकार राजा मनु के अद्भुत चरित्र के उपरान्त, अब उनकी कन्या देवहूति के प्रभाव को सुनिए। देवहूति ने द्वेष, लोभ, पाप और मद का त्याग कर, अत्यन्त सावधानी और लगन से अपने परम तेजस्वी पतिदेव की सेवा की। वह समझती थी कि मेरे पतिदेव दैव से भी बढ़कर हैं, इसलिए वह बड़ी-बड़ी आशाएँ रखकर उनकी सेवा में लगी रहती थी। बहुत दिनों तक तप और व्रतादि के पालन से दुर्बल हुई देवहूति को देख, दयालु कर्दम मुनि को खेद हुआ। उन्होंने प्रेमगद्गद वाणी में कहा— "तुम इन्हें भोग सकती हो। हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है।"
अपने पतिदेव को सम्पूर्ण योगमाया और विद्याओं में कुशल जानकर उस अबला की सारी चिन्ता मिट गई। उसका मुख मधुर मुस्कान से खिल उठा और वह विनयपूर्वक कहने लगी— "द्विजश्रेष्ठ! स्वामिन्! मैं जानती हूँ कि आप इन ऐश्वर्यों के अधिकारी हैं। किन्तु प्रभो! आपने विवाह के समय जो प्रतिज्ञा की थी कि गर्भाधान होने तक आप गृहस्थ सुख भोगेंगे, उसकी अब पूर्ति होनी चाहिए। श्रेष्ठ पति द्वारा सन्तान प्राप्त होना एक पतिव्रता स्त्री के लिए महान लाभ है। हम दोनों के समागम हेतु शास्त्रानुसार कर्तव्य का उपदेश दें और आवश्यक सामग्रियाँ जुटा दें, जिससे मिलन की इच्छा से दुर्बल हुआ मेरा यह शरीर आपके अङ्ग-सङ्ग के योग्य हो सके; क्योंकि आपकी बढ़ायी हुई कामवेदना से मैं पीडित हूँ। स्वामिन्! इस कार्य के लिए एक उपयुक्त भवन का भी विचार कीजिये।"
मैत्रेयजी कहते हैं— विदुरजी! कर्दम मुनि ने अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने के लिए उसी समय योग में स्थित होकर एक दिव्य विमान रचा। वह विमान सर्वत्र जा सकने वाला, अत्यन्त सुन्दर और रत्नों से युक्त था। उसमें दिव्य सामग्रियाँ रखी थीं और उसे रेशमी झण्डियों व पताकाओं से सजाया गया था। उन पर रङ्ग-बिरङ्गे पुष्पों की मालाएँ लटक रही थीं और भ्रमर गुञ्जार कर रहे थे। विमान के भीतर एक के ऊपर एक बने कमरों में अलग-अलग शय्या, पलङ्ग और आसन रखे थे। उसकी दीवारों में पन्ने का फर्श था और बैठने के लिए मूँगे की वेदियाँ बनी थीं। उसके द्वारों में हीरे के किवाड़ थे और इन्द्रनील मणियों के शिखरों पर सोने के कलश रखे थे।
उस विमान में जहाँ-तहाँ कृत्रिम हंस और कबूतर बनाए गए थे, जो इतने सजीव लगते थे कि वास्तविक पक्षी भी उन्हें अपना समझकर पास आकर अपनी बोली बोलते थे। वहाँ क्रीड़ास्थली, शयनगृह और आँगन भी थे। जब देवहूति ने इस भव्य घर को देखा, तो कर्दमजी ने कहा— "भीरु! तुम इस बिन्दु-सरोवर में स्नान करके विमान पर चढ़ जाओ; यह विष्णु भगवान का रचा हुआ तीर्थ है जो समस्त कामनाएँ पूर्ण करता है।"
उस समय देवहूति की दशा अत्यन्त दयनीय थी; वह मैली साड़ी पहने हुए थी, सिर के बाल चिपक गए थे और शरीर में मैल जम गया था। किन्तु सरोवर में गोता लगाते ही, उसने भीतर एक महल में एक हजार कन्याओं को देखा। उन कन्याओं ने सुगन्धित जल से देवहूति को स्नान कराया और उसे नवीन वस्त्र तथा बहुमूल्य आभूषण दिए। जब देवहूति ने अपने प्रिय पति का स्मरण किया, तो वह स्वयं को सहेलियों के सहित वहीं पाई जहाँ कर्दमजी विराजमान थे।
जब कर्दमजी ने देखा कि उनकी प्रिया का शरीर स्नान से अत्यन्त निर्मल और सुन्दर हो गया है, तो उन्होंने बड़े प्रेम से उसे विमान पर चढ़ाया। खिले हुए कुमुद के फूलों से श्रृङ्गार किए हुए वे दोनों विमान पर इस प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो आकाश में तारागण से घिरे चन्द्रदेव विराजमान हों। उस दिव्य विमान पर बैठकर उन्होंने अनेक देव-उद्यानों और मानस सरवरों में विहार किया। वह विमान वायु के समान सभी लोकों में विचर सकता था।
उस कामनासक्त विमान में रति-सुख का आनन्द लेते हुए देवहूति को पता ही नहीं चला कि कितने वर्ष बीत गए। कर्दमजी ने अपने स्वरूप के नौ विभाग किए और एकाग्रचित्त होकर अपनी पत्नी के गर्भ में वीर्य स्थापित किया। इससे देवहूति ने एक ही समय में नौ अत्यन्त सुन्दर कन्याओं को जन्म दिया।
जब देवहूति ने देखा कि उसके पति सन्न्यास लेकर वन जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो उसने अपने आँसुओं को रोककर, ऊपर से मुस्कुराते हुए और सिर नीचा करके, नख-मणियों से पृथ्वी को कुरेदते हुए अत्यन्त मधुर वाणी में कहा— "भगवन्! आपने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की; मैं आपकी शरणागत हूँ, अतः मुझे अभयदान दीजिये। इन कन्याओं के लिए योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वन चले जाने के बाद मेरे जन्म-मरण रूपी शोक को दूर करने के लिए भी कोई होना चाहिए। प्रभु! अब तक जो समय इन्द्रिय सुख में बीता, वह तो निरर्थक गया; क्योंकि मैं आपके परम प्रभाव को न जानकर आपसे अनुराग कर बैठी थी।"
निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनिः ।
दयालुः शालिनीमाहशुक्लाभिव्याहृतं स्मरन् ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— उत्तम गुणोंसे सुशोभित मनुकुमारी देवहूतिने जब ऐसी वैराग्ययुक्त बातें कहीं, तब कृपालु कर्दम मुनिको भगवान् विष्णुके कथनका स्मरण हो आया और उन्होंने उससे कहा ।
मैत्रेय जी कहते हैं— उत्तम गुणों से सुशोभित राजा मनु की पुत्री देवहूति ने जब वे वैराग्ययुक्त बातें कहीं, तब कृपालु कर्दम मुनि को भगवान विष्णु के कथन का स्मरण हो आया। उन्होंने अत्यन्त सौम्यता से अपनी प्रिया को ढाढस बँधाते हुए कहा— "दोषरहित राजकुमारी! तुम अपने विषय में इस प्रकार खेद न करो; तुम्हारे गर्भ में अविनाशी भगवान विष्णु शीघ्र ही पधारेंगे। प्रिये! तुमने अनेक प्रकार के व्रतों का पालन किया है, अतः तुम्हारा कल्याण होगा। अब तुम संयम, नियम, तप और दानादि करती हुई श्रद्धापूर्वक भगवान का भजन करो।"
ऋषिरुवाच मा खिदो राजपुत्रीत्थमात्मानं प्रत्यनिन्दिते ।
भगवांस्तेऽक्षरो गर्भमदूरात्सम्प्रपत्स्यते ॥
कर्दम जी ने कहा कि इस प्रकार आराधना करने पर श्रीहरि तुम्हारे गर्भ से अवतीर्ण होकर मेरा यश बढ़ाएंगे और ब्रह्मज्ञान का उपदेश करके तुम्हारे हृदय की अहङ्कारमयी ग्रन्थि का छेदन करेंगे। अतः भगवान जिस कार्य को करना चाहते थे, उसका उन्होंने विशुद्ध चित्त से अनुमोदन एवं आदर किया और अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कर्दम जी से कहा— "योगमाया से कपिल के रूप में अवतीर्ण हुए हैं।"
धृतव्रतासि ' भद्रं ते दमेन नियमेन च ।
तपोद्रविणदानैश्च श्रद्धया चेश्वरं भज ॥
ततपश्चात वे देवहूति से बोले— "राजकुमारी! सुनहरे बाल, कमल जैसे विशाल नेत्र और कमलाङ्कित चरण-कमलों वाले शिशु के रूप में कैटभासुर को मारने वाले साक्षात् श्रीहरि ने, ज्ञान-विज्ञान द्वारा कर्मों की वासनाओं का मूलोच्छेदन करने के लिये तेरे गर्भ में प्रवेश किया है। ये अविद्या जनित मोह की ग्रन्थियों को काटकर पृथ्वी में स्वच्छन्द विचरेंगे। ये सिद्धगणों के स्वामी और साङ्ख्याचार्यों के भी माननीय होंगे। लोक में तेरी कीर्तिका विस्तार करेंगे और 'कपिल' नाम से विख्यात होंगे।"
साहं भगवतो नूनं वंचिता मायया दृढम् ।
यत्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात् ॥
संसारमें जिस पुरुषके कर्मोंसे न तो धर्मका सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्न होता है और न भगवान्की सेवा ही सम्पन्न होती है वह पुरुष जीते ही मुर्देके समान है ॥५६ ॥ अवश्य ही मैं भगवान्की मायासे बहुत ठगी गयी, जो आप - जैसे मुक्तिदाता पतिदेवको पाकर भी मैंने संसार - बन्धनसे छूटनेकी इच्छा नहीं की ।
विदुर जी! जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी उन दोनों को इस प्रकार आश्वासन देकर, नारद और सनकादिकों को साथ लेकर हंस पर चढ़कर ब्रह्मलोक चले गये। ब्रह्माजी के चले जाने पर कर्दम जी ने उनकी आज्ञानुसार मरीचि आदि प्रजापतियों के साथ अपनी कन्याओं का विधिपूर्वक विवाह कर दिया। उन्होंने अपनी कला नाम की कन्या मरीचि को, अनसूया को अत्रिक को, श्रद्धा को अङ्गिरा को और हविर्भू को पुलस्त्य को समर्पित किया।
स त्वयाऽऽराधितः शुक्लो वितन्वन्मामकं यशः ।
छेत्ता ते हृदयग्रन्थिमौदर्यो ब्रह्मभावनः ॥
उन्होंने पुलह को उनके अनुरूप गति नाम की कन्या दी; क्रतु के साथ क्रिया नामक साध्वी का विवाह किया; भृगु जी को ख्याति और वसिष्ठ जी को अरुन्धती प्रदान की। अथर्वा ऋषि को शान्ति नाम की कन्या दी, जिससे यज्ञकर्म का विस्तार होता है। कर्दम जी ने उन विवाहित ऋषियों का उनकी पत्नियों के सहित खूब सत्कार किया। विदुर जी! इस प्रकार विवाह हो जाने पर वे सब ऋषि कर्दम जी की आज्ञा लेकर अति आनन्दपूर्वक अपने-अपने आश्रमों को चले गये।
अवादयंस्तदा व्योम्नि वादित्राणि घनाघनाः ।
गायन्ति तं स्म गन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सरसो मुदा ॥
एकान्त में वे उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके कहने लगे— "अहो! अपने पापकर्मों के कारण इस दुःखमय संसार में नाना प्रकार से पीडित होते हुए पुरुषों पर देवगण तो बहुत काल बीतने के बाद प्रसन्न होते हैं। किन्तु जिनके स्वरूप को योगीजन अनेकों जन्मों के साधन से सिद्ध हुई सुदृढ़ समाधि के द्वारा एकान्त में देखने का प्रयत्न करते हैं, अपने भक्तों की रक्षा करने वाले वे ही श्रीहरि हम विषयलोलुपों द्वारा होने वाली अपनी अवज्ञा का कुछ भी विचार न करके आज हमारे घर अवतीर्ण हुए हैं। जो मनुष्य सदृश रूप आपके भक्तों को प्रिय लगते हैं, वे भी आपको रुचिकर प्रतीत होते हैं। आपका पाद-पीठ तत्त्वज्ञान की इच्छा से विद्वानों द्वारा सर्वदा वन्दनीय है तथा आप ऐश्वर्य, वैराग्य, यश, ज्ञान, वीर्य और श्री—इन छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। मैं आपकी शरण में हूँ।"
पेतुः सुमनसो दिव्याः खेचरैरपवर्जिताः ।
प्रसेदुश्च दिशः सर्वा अम्भांसि च मनांसि च ॥
वे आगे बोले— "भगवन्! आप परब्रह्म हैं; सारी शक्तियाँ आपके अधीन हैं; प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, काल, त्रिविध अहङ्कार, समस्त लोक एवं लोकपालों के रूप में आप ही प्रकट हैं; तथा आप सर्वज्ञ परमात्मा ही इस सारे प्रपञ्च को चेतन शक्ति के द्वारा अपने में लीन कर लेते हैं। अतः इन सबसे परे भी आप ही हैं। मैं आप भगवान कपिल की शरण लेता हूँ।"
एष मानवि ते गर्भं प्रविष्टः कैटभार्दनः ।
अविद्यासंशयग्रन्थिं छित्त्वा गां विचरिष्यति ॥
"प्रभो! आपकी कृपा से मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया हूँ और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं। अब मैं सन्न्यास-मार्ग को ग्रहण कर आपका चिन्तन करते हुए शोकरहित होकर विचरूँगा। आप समस्त प्रजाओं के स्वामी हैं, अतएव इसके लिये मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ।"
स्वीयं वाक्यमृतं कर्तुमवतीर्णोऽसि मे गृहे ।
चिकीर्षुर्भगवान् ज्ञानं भक्तानां मानवर्धनः ॥
तब श्रीभगवान ने कहा— "मुने! वैदिक और लौकिक सभी कर्मों में संसार के लिये मेरा यह कथन ही प्रमाण है। इसलिये मैंने तुमसे जो कहा था कि 'मैं तुम्हारे यहाँ जन्म लूँगा', उसे सत्य करने के लिये ही मैंने यह अवतार लिया है। इस लोक में मेरा यह जन्म लिङ्ग-शरीर से मुक्त होने की इच्छा रखने वाले मुनियों के लिये आत्मदर्शन में उपयोगी प्रकृति आदि तत्त्वों का विवेचन करने के लिये हुआ है। आत्मज्ञान का यह सूक्ष्म मार्ग बहुत समय से लुप्त हो गया है। इसे फिर से प्रवर्तित करने के लिये ही मैंने यह शरीर ग्रहण किया है—ऐसा जानो। मुने! मैं आज्ञा देता हूँ, तुम इच्छानुसार जाओ और अपने सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए दुर्जय मृत्यु को जीतकर मोक्षपद प्राप्त करने के लिये मेरा भजन करो। मैं स्वयम्प्रकाश और सम्पूर्ण जीवों के अन्तःकरण में रहने वाला परमात्मा ही हूँ। अतः जब तुम विशुद्ध बुद्धि से मेरे साक्षात्कार कर लोगे, तब सब प्रकार के शोकों से छूटकर निर्भय पद प्राप्त कर लोगे। माता देवहूति को भी मैं सम्पूर्ण कर्मों से छुड़ाने वाला आत्मज्ञान प्रदान करूँगा जिससे वह इस संसाररूप भय से पार हो जायेगी।"
गच्छकामं मयाऽऽपृष्टो मयि संन्यस्तकर्मणा ।
जित्वा सुदुर्जयं मृत्युममृतत्वाय मां भज ॥
यह कहकर उन्होंने परिक्रमा की और प्रसन्नतापूर्वक वन को चले गये। वहाँ अहिंसामय सन्न्यास-धर्म का पालन करते हुए वे एकमात्र श्रीभगवान की शरण में हो गये तथा अग्नि और आश्रम का त्याग करके निःसङ्ग भाव से पृथ्वी पर विचरने लगे। जो कार्यकारण से अतीत है, सत्त्वादि गुणों का प्रकाशक है, निर्गुण है और अनन्य भक्ति से ही प्रत्यक्ष होता है—उस परब्रह्म में उन्होंने अपना मन लगा दिया। वे अहङ्कार, ममता और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से छूटकर समदर्शी हो गये और सबमें अपने आत्मा को ही देखने लगे। उनकी बुद्धि अन्तर्मुख एवं शान्त हो गयी। उस समय धीर कर्दमजी शान्त लहरों वाले समुद्र के समान जान पड़ने लगे।
परम भक्ति भाव द्वारा सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ श्रीवासुदेव में चित्त स्थिर होने से वे सारे बन्धनों से मुक्त हो गये। सम्पूर्ण भूतों में उन्होंने अपने आत्मा श्रीभगवान को और सम्पूर्ण भूतों को आत्मस्वरूप श्रीहरि में स्थित देखने लगा। इस प्रकार इच्छा और द्वेष से रहित, सर्वत्र समबुद्धि और भगवद्भक्ति से सम्पन्न होकर कर्दम जी ने भगवान का परम पद प्राप्त कर लिया।
इच्छाद्वेषविहीनेन सर्वत्र समचेतसा ।
भगवद्भक्तियुक्तेन प्राप्ता भागवती गतिः ॥
शौनक जी ने पूछा— "सूत जी! तत्त्वों की सङ्ख्या करने वाले भगवान कपिल साक्षात् अजन्मा नारायण होकर भी लोगों को आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिये अपनी माया से उत्पन्न हुए थे। मैंने भगवान के बहुत-से चरित्र सुने हैं, तथापि इन योगिप्रवर पुरुषश्रेष्ठ कपिल जी की कीर्तिका को सुनते-सुनते मेरी इन्द्रियाँ तृप्त नहीं होतीं। सर्वथा स्वतन्त्र श्रीहरि अपनी योगमाया द्वारा भक्तों की इच्छा के अनुसार शरीर धारण करके जो-जो लीलाएँ करते हैं, वे सभी कीर्तन करने योग्य हैं; अतः आप मुझे वे सभी सुनाइये, मुझे उन्हें सुनने में बड़ी श्रद्धा है।"
सूत जी कहते हैं— "मुने! आपकी ही भाँति जब विदुर ने भी यह आत्मज्ञान विषयक प्रश्न किया था, तब श्रीव्यास जी के सखा भगवान मैत्रेय जी प्रसन्न होकर इस प्रकार कहने लगे।"
मैत्रेय जी ने कहा— "विदुर जी! पिता के वन में चले जाने पर भगवान कपिल जी माता का प्रिय करने की इच्छा से उस बिन्दुसर तीर्थ में रहने लगे। एक दिन तत्त्वसमूह के पारदर्शी भगवान कपिल कर्म-कलाप से विरत होकर आसन पर विराजमान थे। उस समय ब्रह्माजी के वचनों का स्मरण करके देवहूति ने उनसे कहा—"भूमन्! प्रभो! इन दुष्ट इन्द्रियों की विषय-लालसा से मैं बहुत ऊब गयी हूँ और इनकी इच्छा पूरी करते रहने से ही घोर अज्ञानान्धकार में पड़ी हुई हूँ। अब आपकी कृपा से मेरी जन्म-परम्परा समाप्त हो चुकी है, इसी से इस दुस्तर अज्ञानान्धकार से पार लगाने के लिये सुन्दर नेत्र रूप आप प्राप्त हुए हैं। देव! इन देह-गेह आदि में जो मैं-मेरेपन का दुराग्रह होता है, वह भी आपका ही कराया हुआ है; अतः अब आप मेरे इस महामोह को दूर कीजिये। आप अपने भक्तों के संसाररूप वृक्ष के लिये कुठार के समान हैं; मैं प्रकृति और पुरुष का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से आप शरणागत-वत्सल की शरण में आयी हूँ। आप भागवत धर्म जानने वालों में सबसे श्रेष्ठ हैं, मैं आपको प्रणाम करती हूँ।"
तं त्वा गताहं शरणं शरण्यं स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम् ।
जिज्ञासयांह प्रकृतेः पूरुषस्य नमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम् ॥
आप अपने भक्तोंके संसाररूप वृक्षके लिये कुठारके समान हैं; मैं प्रकृति और पुरुषका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे आप शरणागतवत्सलकी शरणमें आयी हूँ । आप भागवतधर्म जाननेवालोंमें सबसे श्रेष्ट हैं, मैं आपको प्रणाम करती हूँ ।
मैत्रेय जी कहते हैं— इस प्रकार माता देवहूति की अभिलाषा परम पवित्र थी, जिसे सुनकर आत्मज्ञ सत्पुरुषों की गति कपिल जी उसकी मन ही मन प्रशंसा करने लगे और फिर मृदु मुस्कान से सुशोभित मुखारविन्द से इस प्रकार कहने लगे।
भगवान कपिल ने कहा— "माता! यह मेरा निश्चय है कि अध्यात्मयोग ही मनुष्यों के आत्यन्तिक कल्याण का मुख्य साधन है, जहाँ दुःख और सुख की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। साध्वि! सब अङ्गों से सम्पन्न उस योग का मैंने पहले नारदादि ऋषियों के सामने वर्णन किया था, वही अब मैं आपको सुनाता हूँ।"
जब जीव ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से युक्त हृदय से आत्मा को प्रकृति से परे देखता है—जो एकमात्र, अद्वितीय, भेदरहित, स्वयम्प्रकाश, सूक्ष्म और अखण्ड है—तब वह सुख-दुःख से मुक्त होकर सम अवस्था में आ जाता है। उस समय वह प्रकृतिको शक्तिहीन अनुभव करता है। योगियों के लिए भगवत्प्राप्ति हेतु श्रीहरि की भक्ति के समान कोई दूसरा मङ्गलमय मार्ग नहीं है। विवेकी जन तो केवल सङ्ग या आसक्ति को ही आत्मा का बन्धन मानते हैं, किन्तु वही सङ्ग जब सन्तों और महापुरुषों के प्रति हो जाती है, तो वह मोक्ष का खुला द्वार बन जाती है। कानों को प्रिय लगने वाली इन कथाओं का सेवन करने से मोक्षमार्ग में श्रद्धा, प्रेम और भक्ति का क्रमशः विकास होता है।
जब मनुष्य अपनी सृष्टि आदि लीलाओं के चिन्तन से प्राप्त वैराग्य के पश्चात, सावधानीपूर्वक योग के भक्तिप्रधान सरल उपायों द्वारा स्वयं को समाहित करता है, तब वह प्रकृतिक गुणों से उत्पन्न विषयों का त्याग कर, ज्ञान और सुदृढ़ भक्ति के माध्यम से मुझ अपने अन्तरात्मा को इस देह में ही प्राप्त कर लेता है।
असेवयायं प्रकृतेर्गुणानां ज्ञानेन वैराग्यविजृम्भितेन ।
योगेनमय्यर्पितया च भक्त्या मां प्रत्यगात्मानमिहावरुन्धे ॥
इस प्रकार उपदेश देते हुए, देवहूति ने पूछा—"हे भगवन्! आपकी समुचित भक्तिका स्वरूप क्या है? और मेरी जैसी अबलाओं के लिये कैसी भक्ति ठीक है, जिससे मैं सहज में ही आपके निर्वाणपद को प्राप्त कर सकूँ? हे निर्वाणस्वरूप प्रभो! जिसका लक्ष्य को बेधने वाले बाण के समान है और जिसके द्वारा तत्त्वज्ञान होता है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है और उसके कितने अङ्ग हैं? हे प्रभो! आप मुझे यह सब इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपा से मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषय को सुगमतासे समझ सकूँ।"
श्रीमैत्रेय जी कहते हैं—विदुरजी! जब उन्होंने अपनी माता का ऐसा अभिप्राय सुना, तो कपिलजी के हृदय में स्नेह उमड़ आया। उन्होंने प्रकृति आदि तत्त्वों का निरूपण करने वाले 'साङ्ख्य' शास्त्र के साथ-साथ भक्ति-विस्तार और योग का भी उपदेश दिया।
भगवान् ने कहा—"माता! जिसका चित्त एकमात्र मुझमें लग गया है, ऐसे मनुष्य की इन्द्रियों की जो श्रीहरि के प्रति स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वही मेरी अहैतुकी भक्ति है। यह मुक्ति से भी बढ़कर है; क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाए हुए अन्न को पचाता है, उसी प्रकार यह भक्ति कर्मसंस्कारों के भण्डार रूप लिङ्गशरीर को तत्काल भस्म कर देती है। वे साधुजन मेरे अनुपम रूपों की झाँकी करते हैं और उनके साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते हैं, जिसके लिये बड़े-बड़े तपस्वी लालायित रहते हैं। मेरे उन मनोहर रूपों की माधुरी में उनका मन और इन्द्रियाँ फँस जाती हैं और उन्हें परमपद की प्राप्ति करा देती है।
अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।
जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥
श्रीभगवान्ने कहा – माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान्में ही लग गया है, ऐसे मनुष्यकी वेदविहित कर्मोंमें लगी हुई तथा विषयोंका ज्ञान करानेवाली ( कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय — दोनों प्रकारकी ) इन्द्रियोंकी जो सत्त्वमूर्ति श्रीहरिके प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान्की अहैतुकी भक्ति है । यह मुक्तिसे भी बढ़कर है; क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाये हुए अन्नको पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारोंके भण्डाररूप लिंगशरीरको तत्काल भस्म कर देती है ।
माता! जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकों में साथ जाने वाले वासनामय लिङ्गदेह तथा धन, पशु एवं गृह आदि सङ्ग्रहों को छोड़कर अनन्य भक्ति से मेरा ही भजन करते हैं, उन्हें मैं मृत्यु रूप संसारसागर से पार कर देता हूँ। मैं साक्षात् भगवान् हूँ, प्रकृति और पुरुष का भी प्रभु हूँ तथा समस्त प्राणियों का आत्मा हूँ; मेरे सिवा और किसी का आश्रय लेने से मृत्यु रूप महाभय से छुटकारा नहीं मिल सकता। मेरे भय से यह वायु चलती है, सूर्य तपता है, इन्द्र वर्षा करता है और अग्नि जलाती है; मृत्यु भी मेरे ही भय से अपने कार्य में प्रवृत्त होती है। योगीजन शान्ति प्राप्त करने के लिये मेरे निर्भय चरण कमलों का आश्रय लेते हैं। संसार में सबसे बड़ा कल्याण यही है कि मनुष्य का चित्त तीव्र भक्तियोग द्वारा मुझमें लगकर स्थिर हो जाए।"
भगवान ने आगे समझाया कि जब पुरुष स्वयं को प्रकृतिक गुणों द्वारा किए जाने वाले कर्मों का कर्ता मानने लगता है, तो उसे जन्म-मृत्यु के बन्धन और परतन्त्रता की प्राप्ति होती है। वह कार्यरूप शरीर, कारणरूप इन्द्रिय और कर्तारूप देवताओं में अपनेपन का आरोप कर लेता है।
देवहूति ने जिज्ञासावश पूछा—"हे पुरुषोत्तम! इस विश्व के स्थूल-सूक्ष्म कार्य जिनके स्वरूप हैं, उन प्रकृति और पुरुष के लक्षण भी आप मुझसे कहिये।"
भगवान् बोले—"मनुपुत्रि! जिनकी प्रेरणा से गुणों की साम्यावस्था में गति उत्पन्न होती है, वे पुरुष रूप भगवान् ही 'काल' कहे जाते हैं। जो अपनी माया द्वारा प्राणियों के भीतर जीवरूप और बाहर कालरूप से व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं।
अन्तः पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः ।
समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥
लोग कालको पुरुषसे भिन्न तत्त्व न मानकर पुरुषका प्रभाव अर्थात् ईश्वरकी संहारकारिणी शक्ति बताते हैं । जिससे मायाके कार्यरूप देहादिमें आत्मत्वका अभिमान करके अहंकारसे मोहित और अपनेको कर्ता माननेवाले जीवको निरन्तर भय लगा रहता है ॥ १६ ॥ मनुपुत्रि! जिनकी प्रेरणासे गुणोंकी साम्यावस्थारूप निर्विशेष प्रकृतिमें गति उत्पन्न होती है, वास्तवमें वे पुरुषरूप भगवान् ही ' काल ' कहे जाते हैं ॥१७ ॥ इस प्रकार जो अपनी मायाके द्वारा सब प्राणियोंके भीतर जीवरूपसे और बाहर कालरूपसे व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं ।
जब परमपुरुष परमात्मा ने जीवों के क्षोभ हेतु अपनी माया में चिच्छक्ति रूप वीर्य स्थापित किया, तब उससे तेजोमय महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। उस महत्तत्त्व ने प्रलयकालीन अन्धकार को अपने तेज से पी लिया। उसके विकृत होने पर क्रिया-शक्ति प्रधान 'अहङ्कार' उत्पन्न हुआ, जो तीन प्रकार का है—वैकारिक, तैजस और तामस। इसी से क्रमशः मन, इन्द्रियों और पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति हुई। इस अहङ्कार को पण्डितजन 'सङ्कर्षण' कहते हैं।
वैकारिक अहङ्कार के विकृत होने पर 'मन' हुआ, जिसके सङ्कल्प-विकलप से कामनाओं की उत्पत्ति होती है; यह 'अनिरुद्ध' कहलाता है। तैजस अहङ्कार से 'बुद्धि' उत्पन्न हुई, जो 'प्रद्युम्न' है। इन्द्रियाँ भी तैजस अहङ्कार का ही कार्य हैं। तामस अहङ्कार के विकृत होने पर 'शब्द तन्मात्र' उत्पन्न हुआ जिससे आकाश और श्रोत्रेन्द्रिय बनी। फिर शब्द तन्मात्र से 'स्पर्श तन्मात्र' हुआ जिससे वायु और त्वचा की इन्द्रिय उत्पन्न हुई। इसके पश्चात 'रूप तन्मात्र' से तेज और नेत्र की इन्द्रिय प्रस्फुटित हुई। अन्त में 'रस तन्मात्र' से जल और रसनेन्द्रिय उत्पन्न हुई। रस अपने शुद्ध स्वरूप में एक है, किन्तु भौतिक संयोगों से वह मीठा, खट्टा या नमकीन आदि अनेक प्रकार का हो जाता है। जल की वृत्तियाँ मिट्टी को पिण्डाकार बनाना, तृप्त करना और प्यास बुझाना हैं।"
पृथ्वी के कार्यरूप लक्षणों में वह मिट्टी की भाँति है, जो जल आदि कारणों के संयोग से विविध गन्ध और रूपों को धारण करती है। पृथ्वी के गुण—गन्ध, स्पर्श, रूप, रस और शब्द—विभिन्न इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं; जैसे श्रोत्रेन्द्रिय शब्द का, त्वगिन्द्रिय स्पर्श का, नेत्रेन्द्रिय रूप का, रसनेन्द्रिय रस का और घ्राणेन्द्रिय गन्ध का विषय है। जब महत्तत्व, अहङ्कार और पञ्चभूत—ये सात तत्व परस्पर मिल नहीं सके और पृथक्-पृथक् ही रह गए, तब जगत के आदिकारण श्रीनारायण ने काल, अदृष्ट और सत्त्वादि गुणों के साथ उनमें प्रवेश किया।
उस तेजोमय अण्ड से उठकर विराट पुरुष ने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकार के छिद्र किए। सबसे पहले उसमें मुख प्रकट हुआ, जिससे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और उसके बाद उसका अधिष्ठाता अग्नि आया। फिर नाक के छिद्र प्रकट हुए, जिनसे प्राण सहित घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई और उसका अधिष्ठाता वायु आया। तत्पश्चात् नेत्रगोलक प्रकट हुए, जिनसे चक्षु-इन्द्रिय आई और उसका अधिष्ठाता सूर्य हुआ। फिर कानों के छिद्र प्रकट हुए, जिनसे श्रोत्र इन्द्रिय और उसके अभिमानी दिग्देवता उत्पन्न हुए। इसके बाद उस विराट पुरुष की त्वचा उत्पन्न हुई, जिससे रोम, मूँछ, दाढ़ी तथा सिर के बाल प्रकट हुए और उनके बाद त्वचा की अभिमानी ओषधियाँ यानी अन्न उत्पन्न हुईं।
फिर लिङ्ग प्रकट हुआ, जिससे वीर्य आया और उसके बाद लिङ्ग का अभिमानी आपोदेव अर्थात जल उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात गुदा प्रकट हुई, जिससे अपानवायु और उसके बाद उसका अभिमानी मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ, जो लोकों को भयभीत करने वाला है। तदनन्तर हाथ प्रकट हुए, जिनसे बल प्राप्त हुआ और फिर हस्तेन्द्रिय का अभिमानी इन्द्र आया। फिर चरण प्रकट हुए, जिनसे गति आई और पादेन्द्रिय का अभिमानी विष्णुदेवता उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार जब विराट पुरुष की नाड़ियाँ प्रकट हुईं, तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ और उससे नदियाँ बनीं। फिर उसका उदर प्रकट हुआ, जिससे क्षुधा और पिपासा की अभिव्यक्ति हुई और उदर का अभिमानी समुद्रदेवता आया। तत्पश्चात् उसका हृदय प्रकट हुआ, जिससे मन का प्राकट्य हुआ। मन के बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ। फिर हृदय से ही बुद्धि प्रकट हुई और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ। तत्पश्चात् अहङ्कार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्रदेवता हुआ। इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ।
जब ये सारे देवता उत्पन्न हो गए, तब वे विराट पुरुष को उठाने के लिए क्रमशः अपने-अपने उत्पत्तिस्थानों में प्रविष्ट होने लगे। अग्नि वाणी के साथ मुख में प्रविष्ट हुई, परन्तु इससे विराट पुरुष नहीं उठा। वायु घ्राणेन्द्रिय के सहित नासा छिद्रों में प्रविष्ट हुई, फिर भी वह नहीं उठा। सूर्य नेत्रों के सहित चक्षु में आया, तब भी विराट पुरुष नहीं उठा। दिशाओं ने श्रवण इन्द्रियों के सहित कानों में प्रवेश किया, तो भी वह नहीं उठा। इन्द्र ने बल के साथ हाथों में प्रवेश किया, पर इससे भी विराट पुरुष नहीं उठा। विष्णु चरणों के सहित चरणों में प्रविष्ट हुए, पर फिर भी वह नहीं उठा। नदियाँ रुधिर के सहित नाड़ियों में आईं, तब भी वह नहीं उठा। समुद्र क्षुधा-पिपासा के सहित उदर में आया, फिर भी वह नहीं उठा। चन्द्रमा मन के सहित हृदय में आया, पर वह भी नहीं उठा। ब्रह्मा बुद्धि के सहित हृदय में प्रविष्ट हुए और रुद्र अहङ्कार के सहित उसी हृदय में आए, किन्तु विराट पुरुष फिर भी नहीं उठा।
यथा प्रसुप्तं पुरुषं प्राणेन्द्रियमनोधियः ।
प्रभवन्ति विना येन नोत्थापयितुमोजसा ॥
जिस प्रकार लोकमें प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि चित्तके अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञकी सहायताके बिना सोये हुए प्राणीको अपने बलसे नहीं उठा सकते, उसी प्रकार विराट् पुरुषको भी वे क्षेत्रज्ञ परमात्माके बिना नहीं उठा सके ।
जिस प्रकार लोक में प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि चित्त के अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञ की सहायता के बिना सोये हुए प्राणी को अपने बल से नहीं उठा सकते, उसी प्रकार विराट पुरुष को भी वे क्षेत्रज्ञ परमात्मा के बिना नहीं उठा सके। अतः भक्ति, वैराग्य और चित्त की एकाग्रता से प्रकट हुए ज्ञान के द्वारा उस अन्तरात्मस्वरूप क्षेत्रज्ञ को इस शरीर में स्थित जानकर उसका चिन्तन करना चाहिए।
श्रीभगवान कहते हैं— "माताजी! जिस तरह जल में प्रतिबिम्बित सूर्य के साथ जल की शीतलता और चञ्चलता आदि गुणों का सम्बन्ध नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृतिक के कार्य शरीर में स्थित रहने पर भी आत्मा वास्तव में उसके सुख-दुःखादि धर्मों से लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह स्वभाव से निर्विकार, अकर्ता और निर्गुण है। स्वरूप के अनुभव से प्राप्त हुए तत्त्वज्ञान के कारण मैं स्त्री-पुत्र आदि सम्बन्धियों के सहित इस देह को 'मैं' और 'मेरा' मानकर मिथ्या अभिनिवेश नहीं करता; मैं बुद्धिकी जाग्रदादि अवस्थाओं से भी अलग हो गया हूँ तथा परमात्मा के सिवा और कोई वस्तु नहीं देखता। वह आत्मदर्शी मुनि नेत्रों से सूर्य को देखने की भाँति अपने शुद्ध अन्तःकरण द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कर उस अद्वितीय ब्रह्मपद को प्राप्त हो जाता है, जो देहादि सम्पूर्ण उपाधियों से पृथक् है, अहङ्कारादि मिथ्या वस्तुओं में सत्यरूप से भासने वाला है, जगत्कारण भूता प्रकृतिका अधिष्ठान है, महदादि कार्य-वर्ग का प्रकाशक है और सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त है तथा सर्वथा अहङ्कारशून्य है।"
तमस्मिन् प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया ।
भक्त्या विरक्त्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत् ॥
अतः भक्ति, वैराग्य और चित्तकी एकाग्रतासे प्रकट हुए ज्ञानके द्वारा उस अन्तरात्मस्वरूप क्षेत्रज्ञको इस शरीरमें स्थित जानकर उसका चिन्तन करना चाहिये ।
"जाग्रत अवस्था में यह आत्मा भूत-सूक्ष्मादि दृश्य वर्ग के द्रष्टारूप में स्पष्टतया अनुभव में आता है; किन्तु सुषुप्ति के समय अपने उपाधिभूत अहङ्कार का नाश होने से वह भ्रमवश अपने को ही नष्ट हुआ मान लेता है। जिस प्रकार धन का नाश हो जाने पर मनुष्य अपने को भी नष्ट हुआ मानकर अत्यत व्याकुल हो जाता है, उसी प्रकार वह भी अत्यन्त विवश होकर नष्टवत् हो जाता है।"
"माताजी! इन सब बातों का मनन करके विवेकी पुरुष अपने आत्मा का अनुभव कर लेता है, जो अहङ्कार के सहित सम्पूर्ण तत्त्वों का अधिष्ठान और प्रकाशक है। रहने वाले हैं, इसलिये प्रकृति तो पुरुष को कभी छोड़ ही नहीं सकती। जिस प्रकार गन्ध और पृथ्वी तथा रस और जल की पृथक्-पृथक् स्थिति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृति भी एक-दूसरे को छोड़कर नहीं रह सकते। अतः जिनके आश्रय से अकर्ता पुरुष को यह कर्मबन्धन प्राप्त हुआ है, उन प्रकृतिक के गुणों के रहते हुए उसे कैवल्यपद कैसे प्राप्त होगा? यदि तत्त्वों का विचार करने से कभी यह संसार-बन्धन का तीव्र भय निवृत्त भी हो जाए, तो भी उसके निमित्तभूत प्राकृत गुणों के अभाव न होने से वह भय फिर उपस्थित हो सकता है।"
"ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी प्रकार के भोगों से वैराग्य हो जाता है। मेरा वह धैर्यवान् भक्त मेरी ही महती कृपा से तत्त्वज्ञान प्राप्त करके आत्मानुभव द्वारा सारे संशयों से मुक्त हो जाता है और फिर लिङ्गदेह का नाश होने पर एकमात्र मेरे ही आश्रित अपने स्वरूपभूत कैवल्यसञ्ज्ञक मङ्गलमय पद को सहज में ही प्राप्त कर लेता है, जहाँ पहुँचने पर योगी फिर लौटकर नहीं आता।"
"माताजी! यदि योगी का चित्त योग-साधना से बढ़ी हुई मायामयी अणिमादि सिद्धियों में नहीं फँसता, जिनकी प्राप्ति योग के सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है, तो उसे मेरा वह अविनाशी परमपद प्राप्त होता है—जहाँ मृत्यु की कुछ भी दाल नहीं गलती।"
"आचरण का परित्याग करना, प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तुष्ट रहना, आत्मज्ञानियों के चरणों की पूजा करना, विषय-वासनाओं को बढ़ाने वाले कर्मों से दूर रहना, संसार-बन्धन से छुड़ाने वाले धर्मों में प्रेम करना, पवित्र और परिमित भोजन करना, निरन्तर एकान्त और निर्भय स्थान में रहना, मन, वाणी और शरीर से किसी जीव को न सताना, सत्य बोलना, चोरी न करना, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का सङ्ग्रह न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, तपस्या करना, बाहर-भीतर से पवित्र रहना, शास्त्रों का अध्ययन करना, भगवान की पूजा करना, वाणी का संयम करना, उत्तम आसनों का अभ्यास करके स्थिरतापूर्वक बैठना, धीरे-धीरे प्राणायाम द्वारा श्वास को जीतना, इन्द्रियों को मन के द्वारा विषयों से हटाकर अपने हृदय में ले जाना। मूलाधार आदि किसी एक केन्द्र में मन के सहित प्राणों को स्थिर करना, निरन्तर भगवान की लीलाओं का चिन्तन और चित्त को समाहित करना। इनसे तथा व्रत-दानादि दूसरे साधनों से भी सावधानी के साथ प्राणों को जीतकर बुद्धिकी द्वारा अपने कुमार्गगामी दुष्ट चित्त को धीरे-धीरे एकाग्र करे और परमात्मा के ध्यान में लगावे।"
अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः ।
ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम् ॥
आचरणका परित्याग करना, प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहना, आत्मज्ञानियोंके चरणोंकी पूजा करना, ॥२ ॥ विषय - वासनाओंको बढ़ानेवाले कर्मोंसे दूर रहना, संसारबन्धनसे छुड़ानेवाले धर्मोंमें प्रेम करना, पवित्र और परिमित भोजन करना, निरन्तर एकान्त और निर्भय स्थानमें रहना, || ३ || मन, वाणी और शरीरसे किसी जीवको न सताना, सत्य बोलना, चोरी न करना, आवश्यकतासे अधिक वस्तुओंका संग्रह न करना, ब्रह्मचर्यका पालन करना, तपस्या करना ( धर्मपालनके लिये कष्ट सहना ), बाहर - भीतरसे पवित्र रहना, शास्त्रोंका अध्ययन करना, भगवान्की पूजा करना, ।
मैत्रेय जी ने विदुर जी से कहा— हे कुरुश्रेष्ठ! जब मनुष्य का चित्त निर्मल और एकाग्र हो जाता है, तब उसे भगवान् के साकार स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। जिस प्रकार अग्नि और वायु से तपाया हुआ सोना अपने दोषों को त्याग देता है, उसी प्रकार योगी जब प्राणायाम द्वारा वात-पित्तादि के दोषों को जीत लेता है, धारणा से पापों को रोकता है, प्रत्याहार से विषयों के सम्बन्ध को काटता है और ध्यान से राग-द्वेष जैसे दुर्गुणों को दूर कर देता है, तब उसका मन शीघ्र ही शुद्ध हो जाता है।
जब चित्त पूरी तरह निर्मल हो जाए, तब योगी को नासिका के अग्रभाग में दृष्टि जमाकर भगवान् की मूर्ति का ध्यान करना चाहिए। उस समय भगवान् का मुखकमल आनन्द से प्रफुल्ल दिखता है, नेत्र कमलकोश के समान रता हुए हैं और उनका शरीर नीले कमल के दल जैसा श्याम वर्ण है। उनके हाथों में शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं। वह स्वरूप परम कीर्तनीय है, जो राजा बलि जैसे यशस्वियों के यश को भी बढ़ा देता है। योगी को चाहिए कि वह श्री नारायणदेव के सम्पूर्ण अङ्गों का ध्यान तब तक करे, जब तक उसका चित्त वहाँ से हटे नहीं। भगवान् की लीलाएँ बड़ी दर्शनीय हैं; अतः योगी अपनी रुचि के अनुसार खड़े होकर, चलते हुए, बैठे हुए या अन्तर्यामी रूप में उनके स्वरूप का विशुद्ध भाव से चिन्तन कर सकता है।
सञ्चिन्तयेद्भगवतश्चरणारविन्दं वज्राङ्कुशध्वजसरोरुहलाञ्छनाढ्यम् ।
उत्तुंगरक्तविलसन्नखचक्रवाल-ज्योत्स्नाभिराहतमहद्धृदयान्धकारम् ॥
भगवान्के चरणकमलोंका ध्यान करना चाहिये । वे वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमलके मंगलमय चिह्नोंसे युक्त हैं तथा अपने उभरे हुए लाल - लाल शोभामय नखचन्द्रमण्डलकी चन्द्रिकासे ध्यान करनेवालोंके हृदयके अज्ञानरूप घोर अन्धकारको दूर कर देते हैं ।
जब योगी यह देख ले कि उसका चित्त भगवत्-विग्रह में स्थित हो गया है, तब उसे एक-एक अङ्ग पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सर्वप्रथम भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करें, जो वज्र, अङ्कुश, ध्वजा और कमल के मङ्गलमय चिह्नों से युक्त हैं। उनके उभरे हुए लाल-लाल नखचन्द्रमण्डल की शोभा देखकर भक्त का हृदय अज्ञान के घोर अन्धकार से मुक्त हो जाता है। इन्हीं चरणों के धोवन से पवित्र गङ्गा जी प्रकट हुई थीं, जिनके जल को मस्तक पर धारण करने से स्वयं महादेव भी और अधिक मङ्गलमय हो गए। ये चरण पापरूप पर्वतों पर पड़े इन्द्र के वज्र के समान हैं; इनका चिरकाल तक चिन्तन करना चाहिए।
इसके पश्चात, भवभय को हरने वाले अजन्मा श्रीहरि की दोनों पिण्डलियों और घुटनों का ध्यान करें। उनकी जाँघें अलसी के फूल के समान नीलवर्ण और बल की निधि हैं, जिन पर गरुड़ जी विराजमान होते हैं। फिर भगवान् के उन नितम्बों का ध्यान करें जो पीताम्बर से ढके हुए हैं और सुवर्णमयी करधनी की लड़ियों द्वारा आलिङ्गन प्राप्त कर रहे हैं। सम्पूर्ण लोकों के आश्रय, भगवान् के उदर में स्थित उस नाभिसरोवर का ध्यान करें जिससे ब्रह्माजी का आधारभूत कमल प्रकट हुआ है। उसके बाद प्रभु के उन श्रेष्ठ मरकतमणि जैसे स्तनों का चिन्तन करें जो वक्षस्थल पर शुभ्र हारों की किरणों से गौरवर्ण जान पड़ते हैं।
भगवान् का वह वक्षस्थल महालक्ष्मी का निवास है और लोगों के मन एवं नेत्रों को आनन्द देने वाला है। इसके उपरान्त सम्पूर्ण लोकों के वन्दनीय भगवान् के गले का ध्यान करें, जो कौस्तुभ मणि को भी सुशोभित करने के लिए धारण किया गया है। उनकी चारों भुजाओं में पहने हुए कङ्कणादि आभूषण समुद्र-मन्थन के समय मन्दराचल की रगड़ से और भी उजले हो गए हैं। योगी को उनके हाथ में सुदर्शन चक्र के तेज और राजहंस के समान शङ्ख का ध्यान करना चाहिए। विपक्षी वीरों के रक्त से सनी कौमोदकी गदा, भौरों की गुञ्जन जैसी वनमाला और कण्ठ में सुशोभित कौस्तुभ मणि का चिन्तन करें।
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।
मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥
फिर विपक्षी वीरोंके रुधिरसे सनी हुई प्रभुकी प्यारी कौमोदकी गदाका, भौंरोंके शब्दसे गुंजायमान वनमालाका और उनके कण्ठमें सुशोभित सम्पूर्ण जीवोंके निर्मलतत्त्वरूप कौस्तुभमणिका ध्यान करे * ।
भक्तों पर कृपा करने हेतु साकार रूप धारण करने वाले श्रीहरि के मुखकमल का ध्यान अत्यन्त मनोहर है। उनकी सुधड़ नासिका और मकराकृत कुण्डलों से चमकते हुए स्वच्छ कपोल बड़े ही मनमोहक लगते हैं। उनके चेहरे की काली-काली घुँघराली अलकावली स्वयं कमलकोश का तिरस्कार करती प्रतीत होती है। उनके विशाल और चञ्चल नेत्र मछलियों के जोड़े की शोभा को मात देते हैं। योगी को चाहिए कि वह उन उन्नत भ्रूलताओं से सुशोभित मनोहर मुखारविन्द का आलस्यरहित होकर ध्यान करे। हृदय की गुहा में भगवान् की उन चितवनों का ध्यान करें, जो प्रेमभरी मुस्कान के साथ कृपा की वर्षा करती हैं और भक्तों के तीनों तापों को शान्त कर देती हैं।
भगवान् का वह हास्य युक्त स्वरूप घोर शोक को सुखा देता है। मुनियों के हित के लिए उन्होंने अपनी माया से अपने भ्रूमण्डल को बनाया है। योगी को चाहिए कि वह अत्यन्त प्रेम के साथ हृदय में विराजमान श्रीहरि की उस खिलखिलाती मुस्कान का ध्यान करे, जिसमें उनके कुन्दकली जैसे शुभ्र दान्त लालिमा युक्त हो रहे हैं। इस प्रकार तन्मय होकर केवल उन्हीं का ध्यान करे और किसी अन्य पदार्थ की इच्छा न रखे।
जब साधक इस अवस्था में पहुँचता है, तो उसका मन शान्त और ब्रह्माकार हो जाता है। वह गुणप्रवाह रूपी देह से मुक्त होकर एक अखण्ड परमात्मा को ही सर्वत्र देखता है। जिस प्रकार मदिरा के मद में डूबा पुरुष अपने वस्त्रों की सुध नहीं रखता, उसी प्रकार सिद्ध पुरुष भी अपने शरीर के बैठने या उठने के विषय में ज्ञान खो देते हैं, क्योंकि वे अपने परमानन्दमय स्वरूप में स्थित होते हैं। उनका शरीर तो केवल पूर्वजन्म के संस्कारों और प्रारब्ध के अधीन जीवित रहता है, किन्तु समाधि प्राप्त योगी उस शरीर को स्वप्न की तरह देखता है और उसमें अहन्ता-ममता नहीं करता।
जैसे अग्नि अलग-अलग आश्रयों में भिन्न दिखती है, वैसे ही एक ही आत्मा विभिन्न शरीरों में भिन्न भासती है। अतः भगवान् की इस माया को जीतकर अपने वास्तविक ब्रह्मरूप में स्थित होना चाहिए।
माता देवहूति के मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिल जी अत्यन्त प्रसन्न हुए और दया से द्रवीभूत होकर बोले— "माताजी! साधकों के भाव के अनुसार भक्तियोग अनेक प्रकार का होता है।"
कपिल मुनि ने आगे कहा— "जो क्रोधी और हृदय में हिंसा या दम्भ रखता है, वह मेरा तामस भक्त है। जो ऐश्वर्य और यश की कामना से पूजा करता है, वह राजस भक्त है। किन्तु जो पापों के क्षय और परमात्मा को अर्पण करने की बुद्धि से पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है। जो गुणों के श्रवण मात्र से अनन्य प्रेम रखता है, वह निर्गुण भक्त कहलाता है। ऐसे निष्काम भक्त मोक्ष की कामना भी नहीं करते, वे केवल मेरी सेवा में लीन रहते हैं।"
कपिल जी ने बताया कि हिंसारहित क्रियायोग, प्रतिमा का दर्शन, पूजन, वन्दना, प्राणियों में मेरा भाव, धैर्य, वैराग्य, दीनों पर दया और सत्पुरुषों के सङ्ग से साधक का चित्त शुद्ध होकर अनायास ही मुझमें लग जाता है।
"माताजी! मनुष्य अपने धर्म का अनुष्ठान करता रहे, किन्तु तब तक जब तक उसे अपने हृदय में और सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित परमात्मा का अनुभव न हो जाए। जो व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के बीच थोड़ा सा भी अन्तर करता है, मैं उसे मृत्यु रूपी महान भय उपस्थित करता हूँ।"
सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः ।
जनं जनेन जनयन्मारयन्मृत्युनान्तकम् ॥
कपिल मुनि के इन गम्भीर वचनों के बाद उन्होंने भक्ति का मार्ग विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा— "माताजी! समस्त प्राणियों के भीतर वह परमात्मा ही निवास करता है। अतः उन प्राणियों को ही दान, मान, मित्रता और समदृष्टि से पूजना चाहिए। जीव की श्रेणियाँ भी अलग-अलग हैं। पाषाणादि अचेतनों की अपेक्षा वृक्ष श्रेष्ठ हैं; वृक्षों से साँस लेने वाले प्राणी उत्तम हैं; मन वाले प्राणी उनसे भी श्रेष्ठ हैं; और इन्द्रियों की वृत्तियों से युक्त प्राणी सबसे श्रेष्ठ हैं। इन इन्द्रिय प्राणियों में भी, केवल स्पर्श का अनुभव करने वालों की अपेक्षा रस ग्रहण करने वाले मत्स्यादि उत्कृष्ट हैं; रसवेत्ताओं की अपेक्षा गन्ध ग्रहण करने वाले (भ्रमरादि) श्रेष्ठ हैं; और गन्ध ग्रहण करने वालों से शब्द ग्रहण करने वाले (सर्पादि) उत्तम हैं। उनसे भी श्रेष्ठ वे हैं जो धर्म का पालन करते हैं, और उनसे भी श्रेष्ठ वे हैं जो आसक्ति का त्याग कर निष्काम भाव से अपने धर्म का आचरण करते हैं।"
कपिल जी ने आगे कहा— "माताजी! जो लोग अपने सम्पूर्ण कर्म, उनके फल और अपने शरीर को भी मुझे ही अर्पण करके भेदभाव छोड़ देते हैं, वे अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। जो चित्त और कर्म मुझे समर्पित कर देते हैं, ऐसे अकर्त्ता और समदर्शी पुरुष से बढ़कर मुझे कोई अन्य प्राणी नहीं दिखता। अतः यह मानकर कि जीव रूपी अपने अंश से साक्षात् भगवान ही सबमें अनुगत हैं, इन समस्त प्राणियों को बड़े आदर के साथ मन से प्रणाम करना चाहिए।"
इस प्रकार कपिल जी ने भक्ति और योग का वर्णन किया। इसके उपरान्त उन्होंने 'काल' के बारे में बताया— "माताजी! परमात्मा परब्रह्म का अद्भुत प्रभाव सम्पन्न और जगत के वैचित्र्य का हेतु 'काल' नाम से विख्यात है। प्रकृति और पुरुष इसी के रूप हैं। यह काल सबका आश्रय है और समस्त प्राणियों में व्याप्त होकर उनका संहार भी करता है। ब्रह्मा आदि देवगण भी इसके अधीन हैं। इसका न कोई मित्र है, न शत्रु और न ही कोई सम्बन्धी। यह सर्वदा सजग रहता है और भोग रूपी प्रमाद में पड़े हुए प्राणियों पर आक्रमण कर उनका संहार कर देता है।"
कपिल जी ने काल के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा— "इसी काल के भय से वायु चलती है, सूर्य तपता है, इन्द्र वर्षा करते हैं और तारे चमकते हैं। इसी के डर से वनस्पतियाँ फल-फूल धारण करती हैं, नदियाँ बहती हैं और समुद्र अपनी मर्यादा में रहता है। इसी के भय से अग्नि प्रज्वलित होती है और पृथ्वी जल में नहीं डूबती। यह काल स्वयं अनादि है, किन्तु दूसरों का आदिकर्ता है। यह सम्पूर्ण जगत की रचना करता है और मृत्यु के द्वारा यमराज का भी अन्त कर देता है।"
कथा आगे बढ़ते हुए कपिल जी ने मनुष्य की दुर्दशा का चित्रण किया— "माताजी! जो पुरुष इन्द्रियों को न जीतकर केवल कुटुम्ब-पोषण में लगा रहता है, वह अत्यन्त कष्टकारी जीवन जीता है। वह धन सञ्चय करने के लिए हिंसा करता है और अन्ततः स्वयं अभाव में रहता है। वृद्धावस्था आने पर जब उसका शरीर रोगी हो जाता है और पुरुषार्थ कम हो जाता है, तब वही सन्तानें जिसका उसने पालन किया था, उसकी उपेक्षा करती हैं। वह कुत्ते की भाँति अपमानपूर्वक दिए हुए टुकड़े खाकर जीवन व्यतीत करता है।"
कुटुम्बभरणाकल्पो मन्दभाग्यो वृथोद्यमः १ I श्रिया विहीनः कृपणो ध्यायञ्छ्वसिति मूढधीः ॥
"मृत्यु का समय निकट आने पर," कपिल जी ने गम्भीर स्वर में कहा, "जब वायु के उत्क्रमण से उसकी पुतलियाँ चढ़ जाती हैं और श्वास-प्रश्वास की नलिकाएँ कफ से रुक जाती हैं, तब वह अपने शोकातुर बन्धु-बान्धवों से घिरा होता है। उस समय उसे लेने के लिए दो अत्यन्त भयङ्कर और रोषयुक्त नेत्रों वाले यमदूत आते हैं। उन्हें देखकर वह भय के कारण मल-मूत्र कर देता है। वे यमदूत उसे यातनादेह में डाल देते हैं और गले में रस्सी बाँधकर बलात् यमलोक की लम्बी यात्रा पर ले जाते हैं। मार्ग में उसे कुत्ते नोचते हैं और वह अपने पापों को याद करके व्याकुल हो उठता है।"
"वहाँ उसे धधकती लकड़ियों के बीच जलाया जाता है, कहीं उसे काटकर अपना ही मांस खिलाया जाता है। उसे हाथियों से चिरवाया जाता है या पहाड़ों से गिरा दिया जाता है। स्त्री या पुरुष, जो भी है, उसे इन यातनाओं को भोगना पड़ता है। कुछ लोग कहते हैं कि नरक इसी लोक में है क्योंकि ये यातनाएँ यहीं देखी जाती हैं। अनेक कष्ट भोगकर वह अपने किए हुए पापों का फल भोगता है और अन्ततः अन्धतामिस्र नरक में जाता है, जो कष्ट का चरम स्थान है। वहाँ से शुद्ध होकर ही वह पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेता है।"
कपिल जी ने गर्भ के भीतर की प्रक्रिया समझाते हुए कहा— "माताजी! जब जीव को मनुष्य शरीर मिलना होता है, तो वह पूर्वकर्मों के अनुसार स्त्री के उदर में प्रवेश करता है। वहाँ वह पहले एक रात्रि में कलल बनता है, पाँच रात्रि में बुबुद, दस दिन में बेर के समान कठिन और फिर मांस का रूप लेता है। एक महीने में सिर निकलता है, दो मास में हाथ-पाँव बनते हैं और तीन मास में नख, रोम तथा अन्य छिद्र उत्पन्न हो जाते हैं। चार मास में सातों धातुएँ पैदा हो जाती हैं और पाँचवें महीने में भूख-प्यास लगने लगती है। छठे मास में वह झिल्ली से लिपटकर कोख में घूमने लगता है।"
"उस समय माता के खाए हुए अन्न-जल से उसकी धातुएँ पुष्ट होती हैं, किन्तु वह सुकुमार जीव जघन्य मल-मूत्र के गढ़े में पड़ा रहता है। वहाँ के भूखे कीड़े जब उसके अङ्गों को नोचते हैं, तो वह क्लेश से अचेत हो जाता है। माता द्वारा खाए गए तीखे और उग्र पदार्थों का स्पर्श उसके शरीर में पीड़ा उत्पन्न करता है। वह जीव झिल्ली से लिपटा, आँतों से घिरा और सिर पेट की ओर किए हुए एक पिञ्जरे में बन्द पक्षी के समान पराधीन रहता है। इसी समय अदृष्ट की प्रेरणा से उसे स्मरणशक्ति प्राप्त होती है और अपने सैकड़ों जन्मों के कर्म याद आते हैं। तब वह बेचैन होकर दम तोड़ने लगता है। ऐसी अवस्था में उसे क्या शान्ति मिल सकती है?"
पतितो भुव्यसृङ्मूत्रे विष्ठाभूरिव चेष्टते ।
रोरूयति गते ज्ञाने विपरीतां गतिं गतः ॥
सप्तम मास के आरम्भ होते ही उस जीव के भीतर ज्ञान-शक्ति का उन्मेष होने लगता है; परन्तु प्रसूति-वायु के निरन्तर थपेड़ों से वह उदर में उत्पन्न हुए विष्ठा के कीड़ों के समान एक स्थान पर स्थिर नहीं रह पाता। इस घोर सङ्कट और अन्धकार में वह देहात्मदर्शी जीव अत्यन्त भयभीत होकर, दीन वाणी में करुण पुकार करता है। वह हाथ जोड़कर उस परमपुरुष की स्तुति करने लगता है जिसने उसे माता के गर्भ में डाला है।
नाथमान ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः ।
स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥
तब सप्तधातुमय स्थूलशरीरसे बँधा हुआ वह देहात्मदर्शी जीव अत्यन्त भयभीत होकर दीन वाणीसे कृपा - याचना करता हुआ, हाथ जोड़कर उस प्रभुकी स्तुति करता है, जिसने उसे माताके गर्भमें डाला है ।
नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम् ।
सोऽहं व्रजामि शरणं ह्यकुतोभयं मे येनेदृशी गतिरदर्श्यसतोऽनुरूपा ॥
यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्मा भूतेन्द्रियाशयमयीमवलम्ब्य मायाम् ।
आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोध-मातप्यमानहृदयेऽवसितं नमामि ॥
यः पञ्चभूतरचिते रहितः शरीरे-च्छन्नो यथेन्द्रियगुणार्थचिदात्मकोऽहम् ।
तेनाविकुण्ठमहिमानमृषिं तमेनं वन्दे परं प्रकृतिपूरुषयोः पुमांसम् ॥
यन्माययोरुगुणकर्मनिबन्धनेऽस्मिन् सांसारिके पथि चरंस्तदभिश्रमेण नष्टस्मृतिः पुनरयं प्रवृणीत लोकं युक्त्या कया महदनुग्रहमन्तरेण ॥
ज्ञानं यदेतददधात्कतमः स देव-स्त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः ।
तं जीवकर्मपदवीमनुवर्तमाना-स्तापत्रयोपशमनाय वयं भजे ॥
मुझे जो यह त्रैकालिक ज्ञान हुआ है, यह भी उनके सिवा और किसने दिया है; क्योंकि स्थावर - जंगम समस्त प्राणियोंमें एकमात्र वे ही तो अन्तर्यामीरूप अंशसे विद्यमान हैं । अतः जीवरूप कर्मजनित पदवीका अनुवर्तन करनेवाले हम अपने त्रिविध तापोंकी शान्तिके लिये उन्हींका भजन करते हैं ।
देह्यन्यदेहविवरे जठराग्निनासृग् विण्मूत्रकूपपतितो भृशतप्तदेहः ।
इच्छन्नितो विवसितुं गणयन् स्वमासान् निर्वास्यते कृपणधीर्भगवन् कदा नु ॥
भगवन्! यह देहधारी जीव दूसरी ( माताके ) देहके उदरके भीतर मल, मूत्र और रुधिरके कुएँ में गिरा हुआ है, उसकी जठराग्निसे इसका शरीर अत्यन्त सन्तप्त हो रहा है । उससे निकलनेकी इच्छा करता हुआ यह अपने महीने गिन रहा है । भगवन्! अब इस दीनको यहाँसे कब निकाला जायगा?
येनेदृशीं गतिमसौ दशमास्य ईश संग्राहितः पुरुदयेन भवादृशेन ।
स्वेनैव ' तुष्यतु कृतेन स दीननाथः को नाम तत्प्रति विनाञ्जलिमस्य कुर्यात् ॥
स्वामिन्! आप बड़े दयालु हैं, आप जैसे उदार प्रभुने ही इस दस मासके जीवको ऐसा उत्कृष्ट ज्ञान दिया है । दीनबन्धो! इस अपने किये हुए उपकारसे ही आप प्रसन्न हों; क्योंकि आपको हाथ जोड़नेके सिवा आपके उस उपकारका बदला तो कोई दे भी क्या सकता है ।
पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवधिः शारीरके दमशरीर्यपरः स्वदेहे ।
यत्सृष्टयाऽऽसं तमहं पुरुषं पुराणं पश्ये बहिर्हृदि च चैत्यमिव ' प्रतीतम् ॥
प्रभो! संसारके ये पशु - पक्षी आदि अन्य जीव तो अपनी मूढ़ बुद्धिके अनुसार अपने शरीरमें होनेवाले सुख - दुःखादिका ही अनुभव करते हैं; किन्तु मैं तो आपकी कृपासे शम-दमादि साधनसम्पन्न शरीरसे युक्त हुआ हूँ, अतः आपकी दी हुई विवेकवती बुद्धिसे आप पुराणपुरुषको अपने शरीरके बाहर और भीतर अहंकारके आश्रयभूत आत्माकी भाँति प्रत्यक्ष अनुभव करता हूँ ।
सोऽहं वसन्नपि विभो बहुदुःखवासं गर्भान्न निर्जिगमिषे बहिरन्धकूपे ।
यत्रोपयातमुपसर्पति देवमाया मिथ्यामतिर्यदनु संसृतिचक्रमेतत् ॥
भगवन्! इस अत्यन्त दुःखसे भरे हुए गर्भाशयमें यद्यपि मैं बड़े कष्टसे रह रहा हूँ, तो भी इससे बाहर निकलकर संसारमय अन्धकूपमें गिरनेकी मुझे बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि उसमें जानेवाले जीवको आपकी माया घेर लेती है । जिसके कारण उसकी शरीरमें अहंबुद्धि हो जाती है और उसके परिणाममें उसे फिर इस संसारचक्रमें ही पड़ना होता है ।
तस्मादहं विगतविक्लव उद्धरिष्य आत्मानमाशु तमसः सुहृदाऽऽत्मनैव ।
भूयो यथा व्यसनमेतदनेकरन्ध्रं मा मे भविष्यदुपसादितविष्णुपादः ॥
अतः मैं व्याकुलताको छोड़कर हृदयमें श्रीविष्णुभगवान्के चरणोंको स्थापितकर अपनी बुद्धिकी सहायतासे ही अपनेको बहुत शीघ्र इस संसाररूप समुद्रके पार लगा दूँगा, जिससे मुझे अनेक प्रकारके दोषोंसे युक्त यह संसार- दुःख फिर न प्राप्त हो ।
एवं कृतमतिर्गर्भे दशमास्यः स्तुवन्नृषिः ।
सद्यः क्षिपत्यवाचीनं प्रसूत्यै सूतिमारुतः ॥
"शरीरादिके आवरणसे जिनकी महिमा कुण्ठित नहीं हुई है, उन प्रकृति और पुरुषके नियन्ता सर्वज्ञ परमपुरुषकी मैं वन्दना करता हूँ।"
वह जीव व्याकुल होकर सोचता है कि उसकी माया के कारण ही उसके स्वरूप की स्मृति नष्ट हो गई है, जिससे वह सत्त्व आदि गुणों और कर्मों के बन्धनों में फँसकर इस संसार मार्ग में अनेक कष्ट झेल रहा है। उसे ज्ञान का यह बोध केवल उसी की कृपा से हुआ है, क्योंकि समस्त प्राणियों में वही एकमात्र अन्तर्यामी रूप से विद्यमान है।
"जीवरूप कर्मजनित पदवीका अनुवर्तन करनेवाले हम अपने त्रिविध तापोंकी शान्तिके लिये उन्हींका भजन करते हैं।"
गर्भ के भीतर वह जीव अत्यन्त पीड़ा में है। वह सोचता है— "भगवन्! यह देहधारी जीव दूसरी माता के उदर में मल, मूत्र और रुधिर के कुएँ में गिरा हुआ है। जठराग्नि से इसका शरीर तप्त हो रहा है और यह अपने महीने गिन रहा है। भगवन्! अब इस दीन को यहाँ से कब निकाला जाएगा?"
वह अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहता है— "स्वामिन्! आप बड़े दयालु हैं। आपने इस दस मास के जीव को इतना उत्कृष्ट ज्ञान दिया है। हे दीनबन्धो! इस उपकार से ही आप प्रसन्न हों, क्योंकि आपके इस उपकार का बदला देने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है।"
वह जीव स्वयं को भाग्यशाली मानता है कि उसे विवेकवती बुद्धि प्राप्त हुई है, जिससे वह पुरुष को अपने भीतर और बाहर अहङ्कार के आश्रय में आत्मा की भाँति प्रत्यक्ष अनुभव कर पा रहा है। वह कहता है— "भगवन्! इस दुःख से भरे गर्भाशय में रहते हुए भी मेरी इच्छा संसार के उस अन्धकूप में गिरने की नहीं है, जहाँ आपकी माया मनुष्य को घेर लेती है और उसे फिर से इसी संसार-चक्र में धकेल देती है।"
वह व्याकुलता त्यागकर हृदय में श्रीविष्णु के चरणों को स्थापित करता है ताकि बुद्धि की सहायता से वह इस संसार-रूपी समुद्र को पार कर सके। जैसे ही वह विवेकपूर्ण होकर भगवान की स्तुति करता है, प्रसूति-वायु उसे तत्काल बाहर धकेलने लगती है। उस वेग से वह बालक अत्यन्त व्याकुल होकर, नीचे सिर करके बड़े कष्ट के साथ बाहर निकलता है। उस क्षण उसके श्वास की गति रुक जाती है और उसकी पूर्व स्मृति पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
तस्मान्न कार्यः सन्त्रासो न कार्पण्यं न सम्भ्रमः ।
बुद्ध्वा जीवगतिं धीरो मुक्तसङ्गश्चरेदिह ॥
सम्यग्दर्शनया बुद्ध्या योगवैराग्ययुक्तया ।
मायाविरचिते लोके चरेन्न्यस्य कलेवरम् ॥
नहीं रहती, तभी उनमें रहनेवाली चक्षु - इन्द्रिय भी रूप देखनेमें असमर्थ हो जाती है और जब नेत्र और उनमें रहनेवाली इन्द्रिय दोनों ही रूप देखनेमें असमर्थ हो जाते हैं, तभी इन दोनोंके साक्षी जीवमें भी वह योग्यता नहीं रहती ॥ ४६ ॥ अतः मुमुक्ष पुरुषको मरणादिसे भय, दीनता अथवा मोह नहीं होना चाहिये । उसे जीवके स्वरूपको जानकर धैर्यपूर्वक निःसंगभावसे विचरना चाहिये तथा इस मायामय संसारमें योग- वैराग्य - युक्त सम्यक् ज्ञानमयी बुद्धिसे शरीरको निक्षेप ( धरोहर ) - की भाँति रखकर उसके प्रति अनासक्त रहते हुए विचरण करना चाहिये ।
पृथ्वी पर माता के रुधिर और मूत्र के बीच पड़ा वह बालक विष्ठा के कीड़े के समान छटपटाता है। उसका गर्भवास का सारा ज्ञान मिट जाता है और वह अज्ञान की दशा में जोर-जोर से रोने लगता है। फिर उसे पालने के लिए ऐसे लोग मिलते हैं जो उसका अभिप्राय नहीं समझ पाते, और उसका पालन-पोषण उन्हीं द्वारा किया जाता है। जब उसे मैली-कुचैली खाट पर सुला दिया जाता है, जहाँ खटमल और स्वेदज जीव चिपके रहते हैं, तब वह कष्ट पाता है। कोमल त्वचा होने के कारण मच्छर और डाँस उसे काटते रहते हैं, और वह केवल रो सकता है। इस प्रक्रिया में उसके वे सभी सद्गुण—लज्जा, यश, क्षमा और संयम—नष्ट हो जाते हैं।
ऐसे अनिश्चित जीवन वाले देहात्मदर्शी असत्पुरुषों का सङ्ग कभी नहीं करना चाहिए। विशेषकर स्त्रियों का सङ्ग, क्योंकि यह मोह और बन्धन का सबसे बड़ा कारण है। स्वयं ब्रह्माजी भी अपनी पुत्री सरस्वती के रूप-लावण्य को देखकर मोहित हो गए थे और उसके पीछे मृग बनकर दौड़ने लगे थे। इस संसार में केवल ऋषि नारायण ही ऐसे हैं जिनकी बुद्धि स्त्रीरूपिणी माया से मोहित नहीं होती।
प्रजापतिः स्वां दुहितरं दृष्ट्वा तद्रूपधर्षितः ।
रोहिद्भूतां सोऽन्वधावदृक्षरूपी हतत्रपः ॥
लज्जा, यश, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम तथा ऐश्वर्य आदि सभी सद्गुण नष्ट हो जाते हैं । उन अत्यन्त शोचनीय, स्त्रियोंके क्रीडामृग ( खिलौना ), अशान्त, मूढ़ और देहात्मदर्शी असत्पुरुषोंका संग कभी नहीं करना चाहिये ॥ ३३-३४ ॥ क्योंकि इस जीवको किसी औरका संग करनेसे ऐसा मोह और बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्री और स्त्रियोंके संगियोंका संग करनेसे होता है ॥३५ ॥ एक बार अपनी पुत्री सरस्वतीको देखकर ब्रह्माजी भी उसके रूप - लावण्यसे मोहित हो गये थे और उसके मृगीरूप होकर भागनेपर उसके पीछे निर्लज्जतापूर्वक मृगरूप होकर दौड़ने लगे ।
"अहो! मेरी इस स्त्रीरूपिणी मायाका बल तो देखो, जो अपने भ्रुकुटि-विलासमात्रसे बड़े-बड़े दिग्विजयी वीरोंको पैरोंसे कुचल देती है।"
जो पुरुष योग के परम पद पर जाना चाहते हैं, उन्हें स्त्रियों का सङ्ग कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उनके लिए नरक का खुला द्वार है। यह माया तिनकों से ढके हुए कुएँ के समान है, जिसे मनुष्य अपनी मृत्यु समझ ले। पुत्र, पति और गृह भी विधाता द्वारा निर्धारित मृत्यु ही हैं।
जीव अपने लिङ्ग-शरीर के माध्यम से एक लोक से दूसरे लोक जाता है और अपने प्रारब्ध भोगता है। जब शरीर और इन्द्रियाँ कार्य करना बन्द कर देती हैं, तभी मृत्यु होती है। अतः मुमुक्षु को मृत्यु से भय या मोह नहीं करना चाहिए; उसे धैर्यपूर्वक, संसार में अनासक्त रहकर विचरण करना चाहिए।
कपिलदेवजी कहते हैं— "माताजी! जो पुरुष घर में रहकर सकाम भाव से गृहस्थ धर्म का पालन करते हैं और अर्थ-काम का उपभोग करते हैं, वे भगवद्धर्मों से विमुख हो जाते हैं। वे केवल देवताओं और पितरों की आराधना करते हैं और चन्द्रलोक जाकर सोमपान करते हैं, किन्तु पुण्य क्षीण होने पर पुनः इसी लोक में लौट आते हैं।"
अथ यो गृहमेधीयान्धर्मानेवावसन् गृहे ।
काममर्थं च धर्मान् स्वान् दोग्धि भूयः पिपर्ति स चापि भगवद्धर्मात्काममूढः पराङ्मुखः ।
यजते क्रतुभिर्देवान् पितॄंश्च श्रद्धयान्वितः ॥
तान् ॥
कपिलदेवजी कहते हैं— माताजी! जो पुरुष घरमें रहकर सकामभावसे गृहस्थके धर्मोंका पालन करता है और उनके फलस्वरूप अर्थ एवं कामका उपभोग करके फिर उन्हींका अनुष्ठान करता रहता है, वह तरह - तरहकी कामनाओंसे मोहित रहनेके कारण भगवद्धर्मोंसे विमुख हो जाता है और यज्ञोंद्वारा श्रद्धापूर्वक देवता तथा पितरोंकी ही आराधना करता है ।
जब प्रलयकाल में भगवान शेषशायी अवस्था में होते हैं, तब ये सभी सकाम गृहस्थी के लोक लीन हो जाते हैं। जो लोग इच्छावश प्रकृति के साथ एक होकर निर्विशेष परमात्मा में लीन हुए थे, वे भी देह त्यागकर ब्रह्माजी में प्रवेश करते हैं और फिर परम आनन्द स्वरूप परब्रह्म में लीन हो जाते हैं; किन्तु उनमें अहङ्कार शेष रहता है।
"माताजी! अब तुम भी अत्यन्त भक्तिभावसे उन श्रीहरिकी ही चरण-शरणमें जाओ; समस्त प्राणियोंका हृदयकमल ही उनका मन्दिर है।"
"पूजनीय माताजी! मैंने तुम्हें यह ब्रह्मसाक्षात्कार का साधनरूप ज्ञान सुनाया। इस संसार में जो कुछ भी है, वह उस एक ही परब्रह्म से उत्पन्न हुआ है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्तत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस—तीन प्रकार का अहङ्कार, पञ्चमहाभूत एवं ग्यारह इन्द्रियरूप बन गया और फिर वही स्वयम्प्रकाश इनके संयोग से जीव कहलाया; उसी प्रकार इस जीव-रूपी शरीर वाले ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति भी ब्रह्म से ही हुई है। किन्तु इसे ब्रह्मरूप वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तर के योगाभ्यास द्वारा एकाग्रचित्त और असङ्गबुद्धि हो गया हो।
देवि! निर्गुणब्रह्म विषयक ज्ञानयोग और मेरे प्रति किया हुआ भक्तियोग—इन दोनों का फल एक ही है। उसे ही भगवान् कहते हैं। जिस प्रकार रूप, रस एवं गन्ध आदि अनेक गुणों का आश्रयभूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा विभिन्न रूपों से अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्र के विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही भगवान् की अनेक प्रकार से अनुभूति होती है। नाना प्रकार के कर्मकलाप, यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन, मन और इन्द्रियों के संयम, विविध अङ्गों वाले योग, भक्तियोग, निवृत्ति और प्रवृत्ति रूप सकाम और निष्काम दोनों प्रकार के धर्म, आत्मतत्त्व का ज्ञान और दृढ़ वैराग्य—इन सभी साधनों से सगुण-निर्गुण रूप स्वयम्प्रकाश भगवान् को ही प्राप्त किया जाता है।
माताजी! सात्त्विक, राजस, तामस और निर्गुण भेद से चार प्रकार के भक्तियोग का और जो प्राणियों के जन्मादि विकारों का हेतु है तथा जिसकी गति जानी नहीं जाती, उस काल का स्वरूप मैं तुमसे कह चुका हूँ। देवि! अविद्या जनित कर्म के कारण जीव की अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जाने पर वह अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकता। मैंने तुम्हें जो ज्ञानोपदेश दिया है—उसे दुष्ट, दुर्विनीत, घमण्डी, दुराचारी और धर्मध्वजी पुरुषों को नहीं सुनाना चाहिए। जो विषयलोलुप, गृहासक्त हो, मेरा भक्त न हो अथवा मेरे भक्तों से द्वेष करने वाला हो, उसे भी इसका उपदेश कभी न करना। परन्तु जो अत्यन्त श्रद्धालु, भक्त, विनयी, दूसरों के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाला, सब प्राणियों से मित्रता रखने वाला, गुरुसेवा में तत्पर, बाह्य विषयों में अनासक्त, शान्तचित्त, मत्सरशून्य और पवित्र चित्त हो तथा मुझे परम प्रियतम मानने वाला हो, उसे इसका अवश्य उपदेश करना। मा! जो पुरुष मुझमें चित्त लगाकर इसका श्रद्धापूर्वक एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह मेरे परमपद को प्राप्त होगा।"
य इदं शृणुयादम्ब श्रद्धया पुरुषः सकृत् ।
यो वाभिधत्ते मच्चित्तः स ह्येति पदवीं च मे ॥
जो अत्यन्त श्रद्धालु, भक्त, विनयी, दूसरोंके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाला, सब प्राणियोंसे मित्रता रखनेवाला, गुरुसेवामें तत्पर, बाह्य विषयोंमें अनासक्त, शान्तचित्त, मत्सरशून्य और पवित्रचित्त हो तथा मुझे परम प्रियतम माननेवाला हो, उसे इसका अवश्य उपदेश करे ॥४१-४२ ॥ मा! जो पुरुष मुझमें चित्त लगाकर इसका श्रद्धापूर्वक एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह मेरे परमपदको प्राप्त होगा ।
मैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! श्रीकपिल भगवान् के ये वचन सुनकर कर्दमजी की प्रिय पत्नी माता देवहूति के मोह का पर्दा फट गया। वे तत्त्वप्रतिपादक साक्षात् साङ्ख्यशास्त्र के ज्ञान की आधारभूमि भगवान् श्रीकपिलजी को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं।
एवं निशम्य कपिलस्य वचो जनित्री सा कर्दमस्य दयिता किल देवहूतिः ।
विस्रस्तमोहपटला तमभिप्रणम्य तुष्टाव तत्त्वविषयाङ्कितसिद्धिभूमिम् ॥
मैत्रेयजी कहते हैं - विदुरजी! श्रीकपिल भगवान् के ये वचन सुनकर कर्दमजीकी प्रिय पत्नी माता देवहूतिके मोहका पर्दा फट गया और वे तत्त्वप्रतिपादक सांख्यशास्त्रके ज्ञानकी आधारभूमि भगवान् श्रीकपिलजीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं ।
"आप निष्क्रिय, सत्यसङ्कल्प, सम्पूर्ण जीवों के प्रभु तथा सहस्रों अचिन्त्य शक्तियों से सम्पन्न हैं। अपनी शक्ति को गुण-प्रवाह रूप से ब्रह्मादि अनन्त मूर्तियों में विभक्त करके, उनके द्वारा आप स्वयं ही विश्व की रचना आदि करते हैं। नाथ! यह कैसी विचित्र बात है कि जिनके उदर में प्रलयकाल आने पर यह सारा प्रपञ्च लीन हो जाता है और जो कल्पान्त में मायामय बालक का रूप धारण कर अपने चरण का अँगूठा चूसते हुए अकेले ही वटवृक्ष के पत्ते पर शयन करते हैं, उन्हीं आपको मैंने गर्भ में धारण किया है! इसमें तो कहना ही क्या है।
अहो! वह चाण्डाल भी इसी से सर्वश्रेष्ठ है कि उसकी जिह्वा के अग्रभाग में आपका नाम विराजमान है। जो श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचार का पालन और वेदाध्ययन—सब कुछ कर लिया है। कपिलदेवजी! आप साक्षात् परब्रह्म हैं, आप ही परम पुरुष हैं। वृत्तियों के प्रवाह को अन्तर्मुख करके अन्तःकरण में आपका ही चिन्तन किया जाता है। आप अपने तेज से माया के कार्य गुण-प्रवाह को शान्त कर देते हैं तथा आपके ही उदर में सम्पूर्ण वेद तत्त्व निहित है। ऐसे साक्षात् विष्णु स्वरूप आपको मैं प्रणाम करती हूँ।"
मैत्रेयजी कहते हैं—माता के इस प्रकार स्तुति करने पर मातृवत्सल परमपुरुष भगवान् कपिलदेवजी ने उनसे गम्भीर वाणी में कहा: "माताजी! मैंने तुम्हें जो यह सुगम मार्ग बताया है, इसका अवलम्बन करने से तुम शीघ्र ही परमपद प्राप्त कर लोगी। तुम मेरे इस मत में विश्वास करो, ब्रह्मवादी लोगों ने इसका सेवन किया है; इसके द्वारा तुम मेरे जन्म-मरणरहित स्वरूप को प्राप्त कर लोगी। जो लोग मेरे इस मत को नहीं जानते, वे जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ते हैं।"
मैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार अपने श्रेष्ठ आत्मज्ञान का उपदेश कर श्रीकपिलदेवजी अपनी ब्रह्मवादिनी जननी की अनुमति लेकर वहाँ से चले गये। तब देवहूतिजी भी सरस्वती के मुकुट सदृश अपने आश्रम में, अपने पुत्र के उपदेश किये हुए योगसाधन के द्वारा योगाभ्यास करती हुई समाधि में स्थित हो गयीं।
त्रिकाल स्नान करने से उनकी घुँघराली अलकें भूरी-भूरी जटाओं में परिणत हो गयीं तथा चीर-वस्त्रों से ढका हुआ शरीर उग्र तपस्या के कारण दुर्बल हो गया। उन्होंने प्रजापति कर्दम के तप और योग बल से प्राप्त अनुपम गार्हस्थ्य सुख को, जिसके लिये देवता भी तरसते थे, त्याग दिया। क्रीड़ा के लिये प्रवेश करने पर उसके (देवहूति के) गन्धर्वगण गुणगान किया करते थे और जिसे पाने के लिये इन्द्राणियाँ भी लालायित रहती थीं—उस गृहोद्यान की भी ममता उन्होंने त्याग दी। किन्तु पुत्र वियोग से व्याकुल होने के कारण अवश्य उनका मुख कुछ उदास हो गया।
"वनं प्रव्रजिते पत्यावपत्यविरहातुरा..." अर्थात् पति और पुत्र के विरह में व्याकुल होकर, वे अपने ऐश्वर्यशाली घर से उपरत हो गयीं। वत्स विदुर! अपने पुत्र कपिलदेव रूपी भगवान् हरिका ही चिन्तन करते-करते वे कुछ ही दिनों में ऐसे ऐश्वर्य सम्पन्न घर से भी उपरत हो गयीं।
फिर वे, कपिलदेवजी ने भगवान् के जिस ध्यान करने योग्य प्रसन्न वदनारविन्द युक्त स्वरूप का वर्णन किया था, उसके एक-एक अवयव का तथा उस समग्र रूप का भी चिन्तन करती हुई ध्यान में तत्पर हो गयीं। भगवद्भक्ति के प्रवाह, प्रबल वैराग्य और यथोचित कर्मानुष्ठान से उत्पन्न हुए ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाले ज्ञान द्वारा चित्त शुद्ध हो जाने पर वे उस सर्वव्यापक आत्मा के ध्यान में मग्न हो गयीं, जो अपने स्वरूप के प्रकाश से माया जनित आवरण को दूर कर देता है।
उनके शरीर का पोषण भी दूसरों द्वारा ही होता था, किन्तु किसी प्रकार का मानसिक क्लेश न होने के कारण वह दुर्बल नहीं हुआ; उसका तेज और भी निखर गया और वह मैल के कारण धूमयुक्त अग्निके समान सुशोभित होने लगा। उनके बाल बिथुर गये थे और वस्त्र भी गिर गया था; तथापि निरन्तर श्रीभगवान् में ही चित्त लगा रहने के कारण उन्हें अपने तपोयोगमय शरीर की भी सुधि नहीं थी, केवल प्रारब्ध ही उसकी रक्षा करता था।
विदुरजी! इस प्रकार देवहूतिजी ने कपिलदेवजी के बताये हुए मार्ग द्वारा थोड़े ही समय में नित्यमुक्त परमात्मस्वरूप श्रीभगवान् को प्राप्त कर लिया। साधु स्वभाव विदुरजी! योगसाधन के द्वारा उनके शरीर के सारे दैहिक मल दूर हो गये थे। वह एक नदी के रूप में परिणत हो गया, जो सिद्धगण से सेवित और सब प्रकार की सिद्धि देने वाली है।
तस्यास्तद्योगविधुतमार्त्यं मर्त्यमभूत्सरित् ।
स्रोतसां प्रवरा सौम्य सिद्धिदा सिद्धसेविता ॥
साधुस्वभाव विदुरजी! योगसाधनके द्वारा उनके शरीरके सारे दैहिक मल दूर हो गये थे । वह एक नदीके रूपमें परिणत हो गया, जो सिद्धगणसे सेवित और सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाली है ।
महायोगी भगवान् कपिलजी भी माता की आज्ञा लेकर पिता के आश्रम से ईशान कोण की ओर चले गये। वहाँ स्वयं समुद्र ने उनका पूजन करके उन्हें स्थान दिया। वे तीनों लोकों को शान्ति प्रदान करने के लिये योगमार्ग का अवलम्बन कर समाधि में स्थित हो गये हैं। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मुनि और अप्सरागण उनकी स्तुति करते हैं तथा साङ्ख्याचार्यगण भी उनका सब प्रकार स्तवन करते रहते हैं।
निष्पाप विदुरजी! तुम्हारे पूछने से मैंने तुम्हें यह भगवान् कपिल और देवहूति का परम पवित्र संवाद सुनाया है। यह कपिलदेवजी का मत अध्यात्मयोग का गूढ़ रहस्य है। जो पुरुष इसका श्रवण या वर्णन करता है, वह भगवान् गरुड़ध्वज की भक्ति से युक्त होकर शीघ्र ही श्रीहरि के चरणारविन्दों को प्राप्त करता है।"
य इदमनुशृणोति योऽभिधत्ते कपिलमुनेर्मतमात्मयोगगुह्यम् ।
भगवति कृतधीः सुपर्णकेता-वुपलभते भगवत्पदारविन्दम् ॥
In English
The Marriage of Kardama Muni and Devahuti
Lord Vishnu instructs the sage Kardama that he will be born as a son to Kardama and his wife Devahuti. King Manu visits Kardama's ashram to offer his daughter, Devahuti, in marriage. After the wedding, Devahuti requests that they have children so Kardama can fulfill his vow to return to ascetic life.
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