श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1381–1390

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390

पृष्ठ 1381

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यत् सात्वताः पुरुषरूपमुशन्ति सत्त्वं लोको यतोऽभयमुतात्मसुखं न चान्यत् ॥४६ तस्मै नमो भगवते पुरुषाय भूम्ने विश्वाय विश्वगुरवे परदेवतायै । नारायणाय ऋषये च नरोत्तमाय हंसाय संयतगिरे निगमेश्वराय ॥४७ यं वै न वेद वितथाक्षपथैर्भ्रमद्धीः

सन्तं स्वखेष्वसुषु हृद्यपि दृक्पथेषु ।

तन्माययाऽऽवृतमतिः स उ एव साक्षा- दाद्यस्तवाखिलगुरोरुपसाद्य वेदम् ॥४८

यद्दर्शनं निगम आत्मरहःप्रकाशं मुह्यन्ति यत्र कवयोऽजपरा यतन्तः । तं सर्ववादविषयप्रतिरूपशीलं वन्दे महापुरुषमात्मनिगूढबोधम् ॥४९ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धेऽष्टमोऽध्यायः ॥८

पृष्ठ 1382

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अथ नवमोऽध्यायः मार्कण्डेयजीका माया दर्शन सूत उवाच

संस्तुतो भगवानित्थं मार्कण्डेयेन धीमता ।

नारायणो नरसखः प्रीत आह भृगूद्वहम् ॥१

श्रीभगवानुवाच

भो भो ब्रह्मर्षिवर्यासि सिद्ध आत्मसमाधिना ।

मयि भक्त्यानपायिन्या तपःस्वाध्यायसंयमैः ॥२

वयं ते परितुष्टाः स्म त्वद्बृहद्व्रतचर्यया ।

वरं प्रतीच्छ भद्रं ते वरदेशादभीप्सितम् ॥३

ऋषिरुवाच

जितं ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराच्युत ।

वरेणैतावतालं नो यद् भवान् समदृश्यत ॥४

सूतजी कहते हैं— जब ज्ञानसम्पन्न मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार स्तुति की, तब भगवान् नर- नारायणने प्रसन्न होकर मार्कण्डेयजीसे कहा ॥१ ॥

भगवान् नारायणने कहा – सम्मान्य ब्रह्मर्षि -शिरोमणि! तुम चित्तकी एकाग्रता, तपस्या, स्वाध्याय, संयम और मेरी अनन्य भक्तिसे सिद्ध हो गये हो ॥२ ॥ तुम्हारे इस आजीवन

ब्रह्मचर्य- व्रतकी निष्ठा देखकर हम तुमपर बहुत ही प्रसन्न हुए हैं । तुम्हारा कल्याण हो! मैं

समस्त वर देने - वालोंका स्वामी हूँ। इसलिये तुम अपना अभीष्ट वर मुझसे माँग लो ॥३ ॥

मार्कण्डेय मुनिने कहा – देवदेवेश! शरणागत- भयहारी अच्युत! आपकी जय हो! जय हो! हमारे लिये बस इतना ही वर पर्याप्त है कि आपने कृपा करके अपने मनोहर स्वरूपका दर्शन कराया ॥४ ॥ ब्रह्मा- शंकर आदि देवगण योग-साधनाके द्वारा एकाग्र हुए मनसे ही

आपके परम सुन्दर श्रीचरणकमलोंका दर्शन प्राप्त करके कृतार्थ हो गये हैं । आज उन्हीं आपने मेरे नेत्रोंके सामने प्रकट होकर मुझे धन्य बनाया है ॥५॥ पवित्रकीर्ति महानुभावोंके

शिरोमणि कमलनयन! फिर भी आपकी आज्ञाके अनुसार मैं आपसे वर माँगता हूँ । मैं आपकी वह माया देखना चाहता हूँ, जिससे मोहित होकर सभी लोक और लोकपाल अद्वितीय वस्तु ब्रह्ममें अनेकों प्रकारके भेद - विभेद देखने लगते हैं ॥ ६ ॥

गृहीत्वाजादयो यस्य श्रीमत्पादाब्जदर्शनम् ।

पृष्ठ 1383

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मनसा योगपक्वेन स भवान् मेऽक्षगोचरः ॥५

अथाप्यम्बुजपत्राक्ष पुण्यश्लोकशिखामणे ।

द्रक्ष्ये मायां यया लोकः सपालो वेद सद्भिदाम् ॥ ६

सूत उवाच

इतीडितोऽर्चितः काममृषिणा भगवान् मुने ।

तथेति स स्मयन् प्रागाद् बदर्याश्रममीश्वरः ॥७

तमेव चिन्तयन्नर्थमृषिः स्वाश्रम एव सः ।

वसन्नग्न्यर्कसोमाम्बु भूवायुवियदात्मसु ॥८

ध्यायन् सर्वत्र च हरिं भावद्रव्यैरपूजयत् ।

क्वचित् पूजां विसस्मार प्रेमप्रसरसम्प्लुतः ॥९

तस्यैकदा भृगुश्रेष्ठ पुष्पभद्रातटे मुनेः ।

उपासीनस्य सन्ध्यायां ब्रह्मन् वायुरभून्महान् ॥१०

तं चण्डशब्दं समुदीरयन्तं बलाहका अन्वभवन् करालाः । अक्षस्थविष्ठा मुमुचुस्तड॒िद्भिः स्वनन्त उच्चैरभिवर्षधाराः ॥११ ततो व्यदृश्यन्त चतुःसमुद्राः

समन्ततः क्ष्मातलमाग्रसन्तः ।

समीरवेगोर्मिभिरुग्रनक्र- महाभयावर्तगभीरघोषाः ॥१२

सूतजी कहते हैं - शौनकजी! जब इस प्रकार मार्कण्डेय मुनिने भगवान् नर- नारायणकी इच्छानुसार स्तुति- पूजा कर ली एवं वरदान माँग लिया, तब उन्होंने मुसकराते हुए कहा

-' ठीक है, ऐसा ही होगा । ' इसके बाद वे अपने आश्रम बदरीवनको चले गये ॥७॥

मार्कण्डेय मुनि अपने आश्रमपर ही रहकर निरन्तर इस बातका चिन्तन करते रहते कि मुझे मायाके दर्शन कब होंगे । वे अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश एवं अन्तःकरणमें - और तो क्या, सर्वत्र भगवान्‌का ही दर्शन करते हुए मानसिक वस्तुओंसे उनका पूजन करते रहते । कभी- कभी तो उनके हृदयमें प्रेमकी ऐसी बाढ़ आ जाती कि वे उसके प्रवाहमें डूबने-उतराने लगते, उन्हें इस बातकी भी याद न रहती कि कब कहाँ किस प्रकार भगवान्की पूजा

पृष्ठ 1384

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करनी चाहिये? ॥८ - ९ ॥ शौनकजी! एक दिनकी बात है, सन्ध्याके समय पुष्पभद्रा नदीके तटपर मार्कण्डेय मुनि भगवान्की उपासनामें तन्मय हो रहे थे । ब्रह्मन्! उसी समय एकाएक बड़े जोरकी आँधी चलने लगी ॥१० ॥ उस समय आँधीके कारण बड़ी भयंकर आवाज होने लगी और बड़े

विकराल बादल आकाशमें मँडराने लगे । बिजली चमक चमककर कड़कने लगी और रथके धुरेके समान जलकी मोटी- मोटी धाराएँ पृथ्वीपर गिरने लगीं ॥ ११ ॥ यही नहीं, मार्कण्डेय

मुनिको ऐसा दिखायी पड़ा कि चारों ओरसे चारों समुद्र समूची पृथ्वीको निगलते हुए उमड़े आ रहे हैं । आँधीके वेगसे समुद्रमें बड़ी - बड़ी लहरें उठ रही हैं, बड़े भयंकर भँवर पड़ रहे हैं और भयंकर ध्वनि कान फाड़े डालती है । स्थान -स्थानपर बड़े - बड़े मगर उछल रहे हैं ॥१२ ॥ उस

समय बाहर- भीतर, चारों ओर जल ही जल दीखता था । ऐसा जान पड़ता था कि उस जलराशिमें पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग भी डूबा जा रहा है; ऊपरसे बड़े वेगसे आँधी चल रही है और बिजली चमक रही है, जिससे सम्पूर्ण जगत् संतप्त हो रहा है । जब मार्कण्डेय मुनिने देखा कि इस जल- प्रलयसे सारी पृथ्वी डूब गयी है, उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज- चारों प्रकारके प्राणी तथा स्वयं वे भी अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं, तब वे उदास हो गये और साथ ही अत्यन्त भयभीत भी ॥ १३ ॥ उनके सामने ही प्रलयसमुद्रमें भयंकर लहरें उठ रही थीं,

आँधीके वेगसे जलराशि उछल रही थी और प्रलयकालीन बादल बरस बरसकर समुद्रको और भी भरते जा रहे थे । उन्होंने देखा कि समुद्रने द्वीप, वर्ष और पर्वतोंके साथ सारी पृथ्वीको डुबा दिया ॥१४ ॥ पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, ज्योतिर्मण्डल (ग्रह, नक्षत्र एवं तारोंका समूह) और

दिशाओंके साथ तीनों लोक जलमें डूब गये । बस, उस समय एकमात्र महामुनि मार्कण्डेय ही बच रहे थे । उस समय वे पागल और अंधेके समान जटा फैलाकर यहाँसे वहाँ और वहाँसे यहाँ भाग - भागकर अपने प्राण बचानेकी चेष्टा कर रहे थे ॥ १५ ॥ वे भूख- प्याससे व्याकुल हो

रहे थे । किसी ओर बड़े - बड़े मगर तो किसी ओर बड़े - बड़े तिमिंगिल मच्छ उनपर टूट पड़ते । किसी ओरसे हवाका झोंका आता, तो किसी ओरसे लहरोंके थपेड़े उन्हें घायल कर देते । इस प्रकार इधर - उधर भटकते - भटकते वे अपार अज्ञानान्धकारमें पड़ गये - बेहोश हो गये और इतने थक गये कि उन्हें पृथ्वी और आकाशका भी ज्ञान न रहा || १६ || वे कभी बड़े भारी भँवरमें पड़ जाते, कभी तरल तरंगोंकी चोटसे चंचल हो उठते । जब कभी जल- जन्तु आपसमें एक- दूसरेपर आक्रमण करते, तब ये अचानक ही उनके शिकार बन जाते ॥१७ ॥ कहीं

शोकग्रस्त हो जाते तो कहीं मोहग्रस्त । कभी दुःख ही दुःखके निमित्त आते तो कभी तनिक सुख भी मिल जाता । कभी भयभीत होते, कभी मर जाते तो कभी तरह - तरहके रोग उन्हें सताने लगते ॥१८ ॥ इस प्रकार मार्कण्डेय मुनि विष्णुभगवान्‌की मायाके चक्करमें मोहित हो

रहे थे । उस प्रलयकालके समुद्रमें भटकते - भटकते उन्हें सैकड़ों- हजारों ही नहीं, लाखों- करोड़ों वर्ष बीत गये ॥१९ ॥

अन्तर्बहिश्चाद्भिरतिद्युभिः खरैः शतह्रदाभीरुपतापितं जगत् ।

पृष्ठ 1385

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चतुर्विधं वीक्ष्य सहात्मना मुनि- र्जलाप्लुतां क्ष्मां विमनाः समत्रसत् ॥१३ तस्यैवमुद्वीक्षत ऊर्मिभीषणः प्रभंजनाघूर्णितवार्महार्णवः । आपूर्यमाणो वरषद्भिरम्बुदैः क्ष्मामप्यधाद् द्वीपवर्षाद्रिभिः समम् ॥१४ सक्ष्मान्तरिक्षं सदिवं सभागणं

त्रैलोक्यमासीत् सह दिग्भिराप्लुतम् ।

स एक एवोर्वरितो महामुनि- र्बभ्राम विक्षिप्य जटा जडान्धवत् ॥१५

क्षुत्तृट्परीतो मकरैस्तिमिंगिले- रुपद्रुतो वीचिनभस्वता हतः । तमस्यपारे पतितो भ्रमन् दिशो न वेद खं गां च परिश्रमेषितः ॥१६

क्वचिद् गतो महावर्ते तरलैस्ताडितः क्वचित् ।

यादोभिर्भक्ष्यते क्वापि स्वयमन्योन्यघातिभिः ॥१७

क्वचिच्छोकं क्वचिन्मोहं क्वचिद् दुःखं सुखं भयम् ।

क्वचिन्मृत्युमवाप्नोति व्याध्यादिभिरुतार्दितः ॥१८

अयुतायुतवर्षाणां सहस्राणि शतानि च ।

व्यतीयुर्भ्रमतस्तस्मिन् विष्णुमायावृतात्मनः ॥ १ ९

स कदाचिद् भ्रमंस्तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि द्विजः ।

न्यग्रोधपोतं ददृशे फलपल्लवशोभितम् ॥२०

प्रागुत्तरस्यां शाखायां तस्यापि ददृशे शिशुम् ।

शयानं पर्णपुटके ग्रसन्तं प्रभया तमः ॥२१

महामरकतश्यामं श्रीमद्वदनपंकजम् ।

कम्बुग्रीवं महोरस्कं सुनासं सुन्दरभ्रुवम् ॥२२

पृष्ठ 1386

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श्वासैजदलकाभातं कम्बुश्रीकर्णदाडिमम् ।

विद्रुमाधरभासेषच्छोणायितसुधास्मितम् ॥२३

पद्मगर्भारुणापांगं हृद्यहासावलोकनम् ।

श्वासैजद्बलिसंविग्ननिम्ननाभिदलोदरम् ॥२४

चार्वंगुलिभ्यां पाणिभ्यामुन्नीय चरणाम्बुजम् ।

मुखे निधाय विप्रेन्द्रो धयन्तं वीक्ष्य विस्मितः ॥२५

शौनकजी! मार्कण्डेय मुनि इसी प्रकार प्रलयके जलमें बहुत समयतक भटकते रहे । एक बार उन्होंने पृथ्वीके एक टीलेपर एक छोटा -सा बरगदका पेड़ देखा । उसमें हरे - हरे पत्ते और लाल- लाल फल शोभायमान हो रहे थे ॥२० ॥ बरगदके पेड़में ईशानकोणपर एक डाल थी,

उसमें एक पत्तोंका दोना- सा बन गया था । उसीपर एक बड़ा ही सुन्दर नन्हा सा शिशु लेट रहा था । उसके शरीरसे ऐसी उज्ज्वल छटा छिटक रही थी, जिससे आसपासका अँधेरा दूर हो रहा था ॥२१ ॥ वह शिशु मरकतमणिके समान साँवल-साँवला था । मुखकमलपर सारा सौन्दर्य

फूटा पड़ता था । गरदन शंखके समान उतार- चढ़ाववाली थी । छाती चौड़ी थी । तोतेकी चोंचके समान सुन्दर नासिका और भौंहें बड़ी मनोहर थीं ॥२२ ॥ काली काली घुँघराली अलकें

कपोलोंपर लटक रही थीं और श्वास लगनेसे कभी- कभी हिल भी जाती थीं । शंखके समान घुमावदार कानोंमें अनारके लाल-लाल फूल शोभायमान हो रहे थे। मूँगेके समान लाल- लाल होठोंकी कान्तिसे उनकी सुधामयी श्वेत मुसकान कुछ लालिमामिश्रित हो गयी थी ॥२३ ॥

नेत्रोंके कोने कमलके भीतरी भागके समान तनिक लाल-लाल थे । मुसकान और चितवन बरबस हृदयको पकड़ लेती थी । बड़ी गम्भीर नाभि थी । छोटी- सी तोंद पीपलके पत्तेके समान जान पड़ती और श्वास लेनेके समय उसपर पड़ी हुई बलें तथा नाभि भी हिल जाया करती थी ॥२४ ॥ नन्हें -नन्हें हाथोंमें बड़ी सुन्दर- सुन्दर अँगुलियाँ थीं । वह शिशु अपने दोनों

करकमलोंसे एक चरणकमलको मुखमें डालकर चूस रहा था । मार्कण्डेय मुनि यह दिव्य दृश्य देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये ॥ २५ ॥

तद्दर्शनाद् वीतपरिश्रमो मुदा प्रोत्फुल्लहृत्पद्मविलोचनाम्बुजः । प्रहृष्टरोमाद्भुतभावशंकितः प्रष्टुं पुरस्तं प्रससार बालकम् ॥२६ तावच्छिशोर्वै श्वसितेन भार्गवः सोऽन्तःशरीरं मशको यथाविशत् । तत्राप्यदो न्यस्तमचष्ट कृत्स्नशो यथा पुरामुह्यदतीव विस्मितः ॥२७

पृष्ठ 1387

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खं रोदसी भगणानद्रिसागरान् द्वीपान् सवर्षान् ककुभः सुरासुरान् । वनानि देशान् सरितः पुराकरान् खेटान् व्रजानाश्रमवर्णवृत्तयः ॥ २८ महान्ति भूतान्यथ भौतिकान्यसौ कालं च नानायुगकल्पकल्पनम् । यत् किंचिदन्यद् व्यवहारकारणं ददर्श विश्वं सदिवावभासितम् ॥ २ ९ हिमालयं पुष्पवहां च तां नदीं निजाश्रमं तत्र ऋषीनपश्यत् । विश्वं विपश्यञ्छ्वसिताच्छिशोर्वै बहिर्निरस्तो न्यपतल्लयाब्धौ ॥३० तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि प्ररूढं वटं च तत्पर्णपुटे शयानम् । तोकं च तत्प्रेमसुधास्मितेन निरीक्षितोऽपांगनिरीक्षणेन ॥ ३१ शौनकजी! उस दिव्य शिशुको देखते ही मार्कण्डेय मुनिकी सारी थकावट जाती रही । आनन्दसे उनके हृदय - कमल और नेत्रकमल खिल गये । शरीर पुलकित हो गया । उस नन्हें - से शिशुके इस अद्भुत भावको देखकर उनके मनमें तरह-तरहकी शंकाएँ — ' यह कौन है ' इत्यादि – आने लगीं और वे उस शिशुसे ये बातें पूछनेके लिये उसके सामने सरक गये ॥२६ ॥ अभी मार्कण्डेयजी पहुँच भी न पाये थे कि उस शिशुके श्वासके साथ उसके

शरीरके भीतर उसी प्रकार घुस गये, जैसे कोई मच्छर किसीके पेटमें चला जाय। उस शिशुके पेटमें जाकरउन्होंने सब-ब- की - सब वही सृष्टि देखी, जैसी प्रलयके पहले उन्होंने देखी थी । वे वह सब विचित्र दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गये। वे मोहवश कुछ सोच - विचार भी न सके ॥२७ ॥ उन्होंने उस शिशुके उदरमें आकाश, अन्तरिक्ष, ज्योतिर्मण्डल, पर्वत, समुद्र,

द्वीप, वर्ष, दिशाएँ, देवता, दैत्य, वन, देश, नदियाँ, नगर, खानें, किसानोंके गाँव, अहीरोंकी बस्तियाँ, आश्रम, वर्ण, उनके आचार- व्यवहार, पंचमहाभूत, भूतोंसे बने हुए प्राणियोंके शरीर तथा पदार्थ, अनेक युग और कल्पोंके भेदसे युक्त काल आदि सब कुछ देखा । केवल इतना ही नहीं जिन देशों, वस्तुओं और कालोंके द्वारा जगत्का व्यवहार सम्पन्न होता है, वह सब कुछ वहाँ विद्यमान था । कहाँतक कहें, यह सम्पूर्ण विश्व न होनेपर भी वहाँ सत्यके समान प्रतीत होते देखा ॥२८ - २ ९ ॥ हिमालय पर्वत, वही पुष्पभद्रा नदी, उसके तटपर अपना आश्रम और वहाँ रहनेवाले ऋषियोंको भी मार्कण्डेयजीने प्रत्यक्ष ही देखा । इस प्रकार सम्पूर्ण

पृष्ठ 1388

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विश्वको देखते- देखते ही वे उस दिव्य शिशुके श्वासके द्वारा ही बाहर आ गये और फिर प्रलयकालीन समुद्रमें गिर पड़े ॥३० ॥ अब फिर उन्होंने देखा कि समुद्रके बीचमें पृथ्वीके

टीलेपर वही बरगदका पेड़ ज्यों- का - त्यों विद्यमान है और उसके पत्तेके दोनेमें वही शिशु सोया हुआ है। उसके अधरोंपर प्रेमामृतसे परिपूर्ण मन्द मन्द मुसकान है और अपनी प्रेमपूर्ण चितवनसे वह मार्कण्डेयजीकी ओर देख रहा है ॥ ३१ ॥

अथ तं बालकं वीक्ष्य नेत्राभ्यां धिष्ठितं हृदि ।

अभ्ययादतिसंक्लिष्टः परिष्वक्तुमधोक्षजम् ॥३२

तावत् स भगवान् साक्षाद् योगाधीशो गुहाशयः ।

अन्तर्दध ऋषेः सद्यो यथेहानीशनिर्मिता ॥ ३३

तमन्वथ वटो ब्रह्मन् सलिलं लोकसम्प्लवः ।

तिरोधायि क्षणादस्य स्वाश्रमे पूर्ववत् स्थितः ॥ ३४

अब मार्कण्डेय मुनि इन्द्रियातीत भगवान्‌को जो शिशुके रूपमें क्रीडा कर रहे थे और नेत्रोंके मार्गसे पहले ही हृदयमें विराजमान हो चुके थे, आलिंगन करनेके लिये बड़े श्रम और कठिनाईसे आगे बढ़े ॥३२ ॥

परन्तु शौनकजी! भगवान् केवल योगियोंके ही नहीं, स्वयं योगके भी स्वामी और सबके हृदयमें छिपे रहनेवाले हैं । अभी मार्कण्डेय मुनि उनके पास पहुँच भी न पाये थे कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गये —ठीक वैसे ही, जैसे अभागे और असमर्थ पुरुषोंके परिश्रमका पता नहीं चलता कि वह फल दिये बिना ही क्या हो गया? ॥ ३३ ॥ शौनकजी! उस शिशुके अन्तर्धान

होते ही वह बरगदका वृक्ष तथा प्रलयकालीन दृश्य एवं जल भी तत्काल लीन हो गया और मार्कण्डेय मुनिने देखा कि मैं तो पहलेके समान ही अपने आश्रममें बैठा हुआ हूँ ॥ ३४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे मायादर्शनं नाम नवमोऽध्यायः ॥९ ॥

पृष्ठ 1389

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अथ दशमोऽध्यायः मार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान सूत उवाच

स एवमनुभूयेदं नारायणविनिर्मितम् ।

वैभवं योगमायायास्तमेव शरणं ययौ ॥१

मार्कण्डेय उवाच

प्रपन्नोऽस्म्यङ्घ्रिमूलं ते प्रपन्नाभयदं हरे ।

यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया ॥२

सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार नारायण - निर्मित योगमाया- वैभवका अनुभव किया । अब यह निश्चय करके कि इस मायासे मुक्त होनेके लिये मायापति भगवान्की शरण ही एकमात्र उपाय है, उन्हींकी शरणमें स्थित हो गये ॥१ ॥

मार्कण्डेयजीने मन - ही - मन कहा - प्रभो! आपकी माया वास्तवमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी सत्य ज्ञानके समान प्रकाशित होती है और बड़े - बड़े विद्वान् भी उसके खेलोंमें मोहित हो जाते हैं । आपके श्रीचरणकमल ही शरणागतोंको सब प्रकारसे अभयदान करते हैं । इसलिये मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है ॥२ ॥

सूत उवाच

तमेवं निभृतात्मानं वृषेण दिवि पर्यटन् ।

रुद्राण्या भगवान् रुद्रो ददर्श स्वगणैर्वृतः ॥३

अथोमा तमृषिं वीक्ष्य गिरिशं समभाषत ।

पश्येमं भगवन् विप्रं निभृतात्मेन्द्रियाशयम् ॥४

निभृतोदझषव्रातं वातापाये यथार्णवम् ।

कुर्वस्य तपसः साक्षात् संसिद्धिं सिद्धिदो भवान् ॥५

श्रीभगवानुवाच

नैवेच्छत्याशिषः क्वापि ब्रह्मर्षिर्मोक्षमप्युत ।

भक्तिं परां भगवति लब्धवान् पुरुषेऽव्यये ॥६

अथापि संवदिष्यामो भवान्येतेन साधुना ।

अयं हि परमो लाभो नृणां साधुसमागमः ॥७

पृष्ठ 1390

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सूत उवाच

इत्युक्त्वा तमुपेयाय भगवान् स सतां गतिः ।

ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वदेहिनाम् ॥ ८

तयोरागमनं साक्षादीशयोर्जगदात्मनोः ।

न वेद रुद्धधीवृत्तिरात्मानं विश्वमेव च ॥९

सूतजी कहते हैं - मार्कण्डेयजी इस प्रकार शरणागतिकी भावनामें तन्मय हो रहे थे । उसी समय भगवान् शंकर भगवती पार्वतीजीके साथ नन्दीपर सवार होकर आकाशमार्गसे विचरण करते हुए उधर आ निकले और मार्कण्डेयजीको उसी अवस्थामें देखा । उनके साथ बहुत - से गण भी थे ॥३ ॥ जब भगवती पार्वतीने मार्कण्डेय मुनिको ध्यानकी अवस्थामें देखा,

तब उनका हृदय वात्सल्य- स्नेहसे उमड़ आया । उन्होंने शंकरजीसे कहा— ' भगवन्! तनिक इस ब्राह्मणकी ओर तो देखिये । जैसे तूफान शान्त हो जानेपर समुद्रकी लहरें और मछलियाँ शान्त हो जाती हैं और समुद्र धीर- गम्भीर हो जाता है, वैसे ही इस ब्राह्मणका शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण शान्त हो रहा है । समस्त सिद्धियोंके दाता आप ही हैं । इसलिये कृपा करके आप इस ब्राह्मणकी तपस्याका प्रत्यक्ष फल दीजिये ' ॥४-५ ॥ भगवान् शंकरने कहा- देवि! ये ब्रह्मर्षि लोक अथवा परलोककी कोई भी वस्तु नहीं चाहते । और तो क्या, इनके मनमें कभी मोक्षकी भी आकांक्षा नहीं होती । इसका कारण यह है कि घट- घटवासी अविनाशी भगवान्‌के चरणकमलोंमें इन्हें परम भक्ति प्राप्त हो चुकी है ॥६ ॥ प्रिये! यद्यपि इन्हें हमारी कोई आवश्यकता नहीं है, फिर भी मैं इनके साथ बातचीत

करूँगा; क्योंकि ये महात्मा पुरुष हैं । जीवमात्रके लिये सबसे बड़े लाभकी बात यही है कि संत पुरुषोंका समागम प्राप्त हो ॥७ ॥

सूतजी कहते हैं— शौनकजी! भगवान् शंकर समस्त विद्याओंके प्रवर्तक और सारे प्राणियोंके हृदयमें विराजमान अन्तर्यामी प्रभु हैं । जगत्के जितने भी संत हैं, उनके एकमात्र आश्रय और आदर्श भी वही हैं। भगवती पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिके पास गये ||८ || उस समय मार्कण्डेय मुनिकी समस्त मनोवृत्तियाँ भगवद्भावमें तन्मय थीं । उन्हें अपने शरीर और जगत्‌का बिलकुल पता न था । इसलिये उस समय वे यह भी न जान सके कि मेरे सामने सारे विश्वके आत्मा स्वयं भगवान् गौरी - शंकर पधारे हुए हैं ॥९ ॥

भगवांस्तदभिज्ञाय गिरीशो योगमायया ।

आविशत्तद्गुहाकाशं वायुश्छिद्रमिवेश्वरः ॥१०

आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिंगजटाधरम् ।

त्र्यक्षं' दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम् ॥११