श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1391–1400
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1391–1400
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व्याघ्रचर्माम्बरधरं शूलखट्वांगचर्मभिः ।
अक्षमालाडमरुककपालासिधनुः सह ॥१२
बिभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मितः ।
किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनिः ॥१३
नेत्रे उन्मील्य ददृशे सगणं सोमयाऽऽगतम् ।
रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं३ ननाम शिरसा मुनिः ॥१४
तस्मै४ सपर्यां व्यदधात् सगणाय सहोमया ।
स्वागतासनपाद्यार्घ्यगन्धस्रग्धूपदीपकैः ॥ १५
आह चात्मानुभावेन पूर्णकामस्य ते विभो ।
करवाम किमीशान येनेदं निर्वृतं जगत् ॥१६
नमः शिवाय शान्ताय ' सत्त्वाय प्रमृडाय च ।
रजोजुषेऽप्यघोराय नमस्तुभ्यं तमोजुषे ॥१७
शौनकजी! सर्वशक्तिमान् भगवान् कैलासपतिसे यह बात छिपी न रही कि मार्कण्डेय मुनि इस समय किस अवस्थामें हैं । इसलिये जैसे वायु अवकाशके स्थानमें अनायास ही प्रवेश कर जाती है, वैसे ही वे अपनी योगमायासे मार्कण्डेय मुनिके हृदयाकाशमें प्रवेश कर गये ॥१० ॥ मार्कण्डेय मुनिने देखा कि उनके हृदयमें तो भगवान् शंकरके दर्शन हो रहे हैं ।
शंकरजीके सिरपर बिजलीके समान चमकीली पीली -पीली जटाएँ शोभायमान हो रही हैं । तीन नेत्र हैं और दस भुजाएँ। लम्बा- तगड़ा शरीर उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी है ॥११ ॥ शरीरपर बाघम्बर धारण किये हुए हैं और हाथोंमें शूल, खट्वांग, ढाल, रुद्राक्ष-माला, डमरू, खप्पर, तलवार और धनुष लिये हैं ॥१२ ॥ मार्कण्डेय मुनि अपने हृदयमें
अकस्मात् भगवान् शंकरका यह रूप देखकर विस्मित हो गये । ' यह क्या है? कहाँसे आया? ’ इस प्रकारकी वृत्तियोंका उदय हो जानेसे उन्होंने अपनी समाधि खोल दी ॥१३ ॥ जब उन्होंने
आँखें खोलीं, तब देखा कि तीनों लोकोंके एकमात्र गुरु भगवान् शंकर श्रीपार्वतीजी तथा अपने गणोंके साथ पधारे हुए हैं । उन्होंने उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रणाम किया ॥१४ ॥
तदनन्तर मार्कण्डेय मुनिने स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, पुष्पमाला, धूप और दीप आदि उपचारोंसे भगवान् शंकर, भगवती पार्वती और उनके गणोंकी पूजा की ॥१५ ॥ इसके पश्चात्
मार्कण्डेय मुनि उनसे कहने लगे – ' सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् प्रभो! आप अपनी आत्मानुभूति और महिमासे ही पूर्णकाम हैं । आपकी शान्ति और सुखसे ही सारे जगत्में सुख- शान्तिका विस्तार हो रहा है, ऐसी अवस्थामें मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥१६ ॥ मैं
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आपके त्रिगुणातीत सदाशिव स्वरूपको और सत्त्वगुणसे युक्त शान्त- स्वरूपको नमस्कार करता हूँ। मैं आपके रजोगुणयुक्त सर्वप्रवर्तकस्वरूप एवं तमोगुणयुक्त अघोरस्वरूपको नमस्कार करता हूँ' ॥१७ ॥
सूत उवाच
एवं स्तुतः स भगवानादिदेवः सतां गतिः ।
परितुष्टः प्रसन्नात्मा प्रहसंस्तमभाषत ॥१८
श्रीभगवानुवाच
वरं वृणीष्व नः कामं वरदेशा वयं त्रयः ।
अमोघं दर्शनं येषां मर्त्यो यद् विन्दतेऽमृतम् ॥१९
ब्राह्मणाः साधवः शान्ता निःसंगा भूतवत्सलाः ।
एकान्तभक्ता अस्मासु निर्वैराः समदर्शिनः ॥२०
सलोका लोकपालास्तान् वन्दन्त्यर्चन्त्युपासते ।
अहं च भगवान् ब्रह्मा स्वयं च हरिरीश्वरः ॥२१
न ते मय्यच्युतेऽजे च भिदामण्वपि चक्षते ।
नात्मनश्च जनस्यापि तद् युष्मान् वयमीमहि ॥ २२
न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवाश्चेतनोज्झिताः ।
ते पुनन्त्युरुकालेन यूयं दर्शनमात्रतः ॥ २३
ब्राह्मणेभ्यो नमस्यामो येऽस्मद्रूपं त्रयीमयम् ।
बिभ्रत्यात्मसमाधानतपःस्वाध्यायसंयमैः ॥२४
श्रवणाद् दर्शनाद् वापि महापातकिनोऽपि वः ।
शुध्येरन्नन्त्यजाश्चापि किमु सम्भाषणादिभिः ॥२५
सूतजी कहते हैं— शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने संतोंके परम आश्रय देवाधिदेव भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बड़े प्रसन्नचित्तसे हँसते हुए कहने लगे ॥१८ ॥
भगवान् शंकरने कहा – मार्कण्डेयजी! ब्रह्मा, विष्णु तथा मैं -हम तीनों ही वरदाताओंके स्वामी हैं, हमलोगोंका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता । हमलोगोंसे ही मरणशील मनुष्य भी अमृतत्वकी प्राप्ति कर लेता है । इसलिये तुम्हारी जो इच्छा हो, वही वर मुझसे माँग
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लो ॥१९ ॥ ब्राह्मण स्वभावसे ही परोपकारी, शान्तचित्त एवं अनासक्त होते हैं । वे किसीके
साथ वैरभाव नहीं रखते और समदर्शी होनेपर भी प्राणियोंका कष्ट देखकर उसके निवारणके लिये पूरे हृदयसे जुट जाते हैं । उनकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह होती है कि वे हमारे अनन्य प्रेमी एवं भक्त होते हैं ॥२० ॥ सारे लोक और लोकपाल ऐसे ब्राह्मणोंकी वन्दना, पूजा और
उपासना किया करते हैं । केवल वे ही क्यों; मैं भगवान् ब्रह्मा तथा स्वयं साक्षात् ईश्वर विष्णु भी उनकी सेवामें संलग्न रहते हैं ॥ २१ ॥ ऐसे शान्त महापुरुष मुझमें, विष्णुभगवान्में,
ब्रह्मामें, अपनेमें और सब जीवोंमें अणुमात्र भी भेद नहीं देखते । सदा- सर्वदा, सर्वत्र और सर्वथा एकरस आत्माका ही दर्शन करते हैं । इसलिये हम तुम्हारे जैसे महात्माओंकी स्तुति और सेवा करते हैं ॥ २२ ॥ मार्कण्डेयजी! केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं होते तथा केवल
जड मूर्तियाँ ही देवता नहीं होतीं । सबसे बड़े तीर्थ और देवता तो तुम्हारे जैसे संत हैं; क्योंकि वे तीर्थ और देवता बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं, परन्तु तुमलोग दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हो ॥२३ ॥ हमलोग तो ब्राह्मणोंको ही नमस्कार करते हैं; क्योंकि वे चित्तकी एकाग्रता,
तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा हमारे वेदमय शरीरको धारण करते हैं ॥२४ ॥ मार्कण्डेयजी! बड़े -बड़े महापापी और अन्त्यज भी तुम्हारे - जैसे महापुरुषोंके
चरित्रश्रवण और दर्शनसे ही शुद्ध हो जाते हैं; फिर वे तुमलोगोंके सम्भाषण और सहवास आदिसे शुद्ध हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है ॥२५ ॥
सूत उवाच
इति चन्द्रललामस्य धर्मगुह्योपबृंहितम् ।
वचोऽमृतायनमृषिर्नातृप्यत् कर्णयोः पिबन् ॥२६
स चिरं मायया विष्णोर्भ्रामितः कर्शितो भृशम् ।
शिववागमृतध्वस्तक्लेशपुंजस्तमब्रवीत् ॥२७
ऋषिरुवाच
अहो ईश्वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम् ।
यन्नमन्तीशितव्यानि स्तुवन्ति जगदीश्वराः ॥२८
धर्मं ग्राहयितुं प्रायः प्रवक्तारश्च देहिनाम् ।
आचरन्त्यनुमोदन्ते क्रियमाणं स्तुवन्ति च ॥२९
नैतावता भगवतः स्वमायामयवृत्तिभिः ।
न दुष्येतानुभावस्तैर्मायिनः कुहकं यथा ॥३०
सृष्ट्वेदं मनसा विश्वमात्मनानुप्रविश्य यः ।
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गुणैः कुर्वद्भिराभाति कर्तेव स्वप्नदृग् यथा ॥३१
तस्मै नमो भगवते त्रिगुणाय गुणात्मने ।
केवलायाद्वितीयाय गुरवे ब्रह्ममूर्तये ॥ ३२
कं वृणे नु परं भूमन् वरं त्वद् वरदर्शनात् ।
यद्दर्शनात् पूर्णकामः सत्यकामः पुमान् भवेत् ॥३३
सूतजी कहते हैं— शौनकादि ऋषियों! चन्द्रभूषण भगवान् शंकरकी एक- एक बात धर्मके गुप्ततम रहस्यसे परिपूर्ण थी । उसके एक-एक अक्षरमें अमृतका समुद्र भरा हुआ था । मार्कण्डेय मुनि अपने कानोंके द्वारा पूरी तन्मयताके साथ उसका पान करते रहे; परन्तु उन्हें तृप्ति न हुई ॥२६ ॥ वे चिरकालतक विष्णुभगवान्की मायासे भटक चुके थे और बहुत थके
हुए भी थे । भगवान् शिवकी कल्याणी वाणीका अमृतपान करनेसे उनके सारे क्लेश नष्ट हो गये । उन्होंने भगवान् शंकरसे इस प्रकार कहा ॥२७ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा— सचमुच सर्वशक्तिमान् भगवान्की यह लीला सभी प्राणियोंकी समझके परे है । भला, देखो तो सही - ये सारे जगत्के स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले मेरे - जैसे जीवोंकी वन्दना और स्तुति करते हैं || २८ || धर्मके प्रवचनकार प्रायः प्राणियोंको धर्मका रहस्य और स्वरूप समझानेके लिये उसका आचरण और अनुमोदन करते हैं तथा कोई धर्मका आचरण करता है तो उसकी प्रशंसा भी करते हैं || २ ९ || जैसे जादूगर अनेकों खेल दिखलाता है और उन खेलोंसे उसके प्रभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, वैसे ही आप अपनी स्वजनमोहिनी मायाकी वृत्तियोंको स्वीकार करके किसीकी वन्दना- स्तुति आदि करते हैं तो केवल इस कामके द्वारा आपकी महिमामें कोई त्रुटि नहीं आती ॥३० ॥ आपने
स्वप्नद्रष्टाके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है और इसमें स्वयं प्रवेश करके कर्ता न होनेपर भी कर्म करनेवाले गुणोंके द्वारा कर्ताके समान प्रतीत होते हैं ॥ ३१ ॥
भगवन्! आप त्रिगुणस्वरूप होनेपर भी उनके परे उनकी आत्माके रूपमें स्थित हैं । आप ही समस्त ज्ञानके मूल, केवल, अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥३२ ॥ अनन्त! आपके श्रेष्ठ दर्शनसे बढ़कर ऐसी और कौन - सी वस्तु है, जिसे मैं वरदानके
रूपमें माँगूँ? मनुष्य आपके दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसंकल्प हो जाता है ॥३३ ॥ आप
स्वयं तो पूर्ण हैं ही, अपने भक्तोंकी भी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं । इसलिये मैं आपका दर्शन प्राप्त कर लेनेपर भी एक वर और माँगता हूँ । वह यह कि भगवान्में, उनके शरणागत भक्तोंमें और आपमें मेरी अविचल भक्ति सदा - सर्वदा बनी रहे ॥३४ ॥
वरमेकं वृणेऽथापि पूर्णात् कामाभिवर्षणात् ।
भगवत्यच्युतां भक्तिं तत्परेषु तथा त्वयि ॥३४
सूत उवाच
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इत्यर्चितोऽभिष्टुतश्च मुनिना सूक्तया गिरा ।
तमाह भगवाञ्छर्वः शर्वया चाभिनन्दितः ॥३५
कामो महर्षे सर्वोऽयं भक्तिमांस्त्वमधोक्षजे ।
आकल्पान्ताद् यशः पुण्यमजरामरता तथा ॥३६
ज्ञानं त्रैकालिकं ब्रह्मन् विज्ञानं च विरक्तिमत् ।
ब्रह्मवर्चस्विनो भूयात् पुराणाचार्यतास्तु ते ॥३७
सूत उवाच
एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात्र्यक्ष ईश्वरः ।
देव्यै तत्कर्म कथयन्ननुभूतं पुरामुना ॥३८
सोऽप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तमः ।
विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गतः ॥३९
अनुवर्णितमेतत्ते मार्कण्डेयस्य धीमतः ।
अनुभूतं भगवतो मायावैभवमद्भुतम् ॥४०
एतत् केचिदविद्वांसो मायासंसृतिमात्मनः ।
अनाद्यावर्तितं नृणां कादाचित्कं प्रचक्षते ॥४१
सूतजी कहते हैं - शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने सुमधुर वाणीसे इस प्रकार भगवान् शंकरकी स्तुति और पूजा की, तब उन्होंने भगवती पार्वतीकी प्रसाद - प्रेरणासे यह बात कही ॥३५ ॥ महर्षे! तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण हों । इन्द्रियातीत परमात्मामें तुम्हारी अनन्य
भक्ति सदा- सर्वदा बनी रहे । कल्पपर्यन्त तुम्हारा पवित्र यश फैले और तुम अजर एवं अमर हो जाओ ॥३६ ॥ ब्रह्मन्! तुम्हारा ब्रह्मतेज तो सर्वदा अक्षुण्ण रहेगा ही । तुम्हें भूत, भविष्य और
वर्तमानके समस्त विशेष ज्ञानोंका एक अधिष्ठानरूप ज्ञान और वैराग्ययुक्त स्वरूपस्थितिकी प्राप्ति हो जाय । तुम्हें पुराणका आचार्यत्व भी प्राप्त हो ॥ ३७ ॥
सूतजी कहते हैं— शौनकजी! इस प्रकार त्रिलोचन भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिको वर देकर भगवती पार्वतीसे मार्कण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलयसम्बन्धी अनुभवोंका वर्णन करते हुए वहाँसे चले गये || ३८|| भृगुवंशशिरोमणि मार्कण्डेय मुनिको उनके महायोगका परम फल प्राप्त हो गया । वे भगवान्के अनन्यप्रेमी हो गये । अब भी वे भक्तिभावभरित हृदयसे पृथ्वीपर विचरण किया करते हैं ॥ ३ ९ ॥ परम ज्ञानसम्पन्न मार्कण्डेय मुनिने भगवान्की योगमायासे जिस अद्भुत लीलाका अनुभव किया था, वह मैंने आपलोगोंको सुना दिया ॥ ४० ॥ शौनकजी! यह जो मार्कण्डेयजीने अनेक कल्पोंका – सृष्टि-
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प्रलयोंका अनुभव किया, वह भगवान्की मायाका ही वैभव था, तात्कालिक था और उन्हींके लिये था, सर्वसाधारणके लिये नहीं । कोई-कोई इस मायाकी रचनाको न जानकर अनादि-कालसे बार- बार होनेवाले सृष्टि- प्रलय ही इसको भी बतलाते हैं । ( इसलिये आपको यह शंका नहीं करनी चाहिये कि इसी कल्पके हमारे पूर्वज मार्कण्डेयजीकी आयु इतनी लम्बी कैसे हो गयी? ) ॥४१ ॥
य एवमेतद् भृगुवर्य वर्णितं रथांगपाणेरनुभावभावितम् । संश्रावयेत् संशृणुयादु तावुभौ तयोर्न कर्माशयसंसृतिर्भवेत् ॥४२ भृगुवंशशिरोमणे! मैंने आपको यह जो मार्कण्डेय- चरित्र सुनाया है, वह भगवान् चक्रपाणिके प्रभाव और महिमासे भरपूर है । जो इसका श्रवण एवं कीर्तन करते हैं, वे दोनों ही कर्म- वासनाओंके कारण प्राप्त होनेवाले आवागमनके चक्करसे सर्वदाके लिये छूट जाते हैं ॥४२ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥१० ॥
१. त्र्यक्षमष्टभुजम् । २. तोमरैः । ३. विलोक्यैक० । ४. प्राचीन प्रतिमें ‘ तस्मै ……… सहोमया ’ इस श्लोकार्धके स्थानमें 'विमुच्यात्मसमाधानं तपसा नियमैर्यमैः ' ऐसा पाठ है । इसके सिवा वर्तमान प्रतिमें जो २५ वीं संख्याका ' श्रवणाद्दर्शना...किन्नु सम्भाषणादिभिः ' यह श्लोक है । इसको वहाँ न पढ़कर यहाँ ही ( ' विमुच्या यमैः ' इसके बाद) पढ़ा गया है । इसके पश्चात् ‘ स्वागतासन……….. ' इत्यादि श्लोकोंका पाठ है । ५. देवाय नित्याय प्रमृ० ।
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अथैकादशोऽध्यायः भगवान्के अंग, उपांग और आयुधोंका रहस्य तथा विभिन्न सूर्यगणोंका वर्णन शौनक उवाच
अथेममर्थं पृच्छामो भवन्तं बहुवित्तमम् ।
समस्ततन्त्रराद्धान्ते भवान् भागवततत्त्ववित् ॥१
तान्त्रिकाः परिचर्यायां केवलस्य श्रियः पतेः ।
अंगोपांगायुधाकल्पं कल्पयन्ति यथा च यैः ॥ २
तन्नो वर्णय भद्रं ते क्रियायोगं बुभुत्सताम् ।
येन क्रियानैपुणेन मर्त्यो यायादमर्त्यताम् ॥३
सूत उवाच
नमस्कृत्य गुरून् वक्ष्ये विभूतीर्वैष्णवीरपि ।
याः प्रोक्ता वेदतन्त्राभ्यामाचार्यैः पद्मजादिभिः ॥४
मायाद्यैर्नवभिस्तत्त्वैः स विकारमयो विराट् ।
निर्मितो दृश्यते यत्र सचित्के भुवनत्रयम् ॥५
एतद् वै पौरुषं रूपं भूः पादौ द्यौः शिरो नभः ।
नाभिः सूर्योऽक्षिणी नासे वायुः कर्णौ दिशः प्रभोः ॥६
शौनकजीने कहा – सूतजी! आप भगवान्के परमभक्त और बहुज्ञोंमें शिरोमणि हैं । हमलोग समस्त शास्त्रोंके सिद्धान्तके सम्बन्धमें आपसे एक विशेष प्रश्न पूछना चाहते हैं, क्योंकि आप उसके मर्मज्ञ हैं ॥ १ ॥ हमलोग क्रियायोगका यथावत् ज्ञान प्राप्त करना चाहते
हैं; क्योंकि उसका कुशलतापूर्वक ठीक- ठीक आचरण करनेसे मरणधर्मा पुरुष अमरत्व प्राप्त कर लेता है । अतः आप हमें यह बतलाइये कि पांचरात्रादि तन्त्रोंकी विधि जाननेवाले लोग केवल श्रीलक्ष्मीपति भगवान्की आराधना करते समय किन- किन तत्त्वोंसे उनके चरणादि अंग, गरुडादि उपांग, सुदर्शनादि आयुध और कौस्तुभादि आभूषणोंकी कल्पना करते हैं? भगवान् आपका कल्याण करें ॥२-३ ॥ सूतजीने कहा - शौनकजी! ब्रह्मादि आचार्योंने, वेदोंने और पांचरात्रादि तन्त्र- ग्रन्थोंने विष्णुभगवान्की जिन विभूतियोंका वर्णन किया है, मैं श्रीगुरुदेवके चरणोंमें नमस्कार करके आपलोगोंको वही सुनाता हूँ || ४ || भगवान्के जिस चेतनाधिष्ठित विराट् रूपमें यह त्रिलोकी
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दिखायी देती है, वह प्रकृति, सूत्रात्मा, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्रा —इन नौ तत्त्वोंके सहित ग्यारह इन्द्रिय तथा पंचभूत- इन सोलह विकारोंसे बना हुआ है ॥५ ॥ यह भगवान्का
ही पुरुषरूप है । पृथ्वी इसके चरण हैं, स्वर्ग मस्तक है, अन्तरिक्ष नाभि है, सूर्य नेत्र हैं, वायु नासिका है और दिशाएँ कान हैं ॥ ६ ॥
प्रजापतिः प्रजननमपानो मृत्युरीशितुः ।
तद्बाहवो लोकपाला मनश्चन्द्रो भ्रुवौ यमः ॥७
लज्जोत्तरोऽधरो लोभो दन्ता ज्योत्स्ना स्मयो भ्रमः ।
रोमाणि भूरुहा भूम्नो मेघाः पुरुषमूर्धजाः ॥ ८
यावानयं वै पुरुषो यावत्या संस्थया मितः ।
तावानसावपि महापुरुषो लोकसंस्थया ॥९
कौस्तुभव्यपदेशेन स्वात्मज्योतिर्बिभर्त्यजः ।
तत्प्रभा व्यापिनी साक्षात् श्रीवत्समुरसा विभुः ॥१०
स्वमायां वनमालाख्यां नानागुणमयीं दधत् ।
वासश्छन्दोमयं पीतं ब्रह्मसूत्रं त्रिवृत् स्वरम् ॥११
बिभर्ति सांख्यं योगं च देवो मकरकुण्डले ।
मौलिं पदं पारमेष्ठ्यं सर्वलोकाभयंकरम् ॥१२
अव्याकृतमनन्ताख्यमासनं यदधिष्ठितः ।
धर्मज्ञानादिभिर्युक्तं सत्त्वं पद्ममिहोच्यते ॥१३
ओजःसहोबलयुतं मुख्यतत्त्वं गदां दधत् ।
अपां तत्त्वं दरवरं तेजस्तत्त्वं सुदर्शनम् ॥१४
नभोनिभं नभस्तत्त्वमसिं चर्म तमोमयम् ।
कालरूपं धनुः शार्ङ्गं तथा कर्ममयेषुधिम् ॥१५
इन्द्रियाणि शरानाहुराकूतीरस्य स्यन्दनम् ।
तन्मात्राण्यस्याभिव्यक्तिं मुद्रयार्थक्रियात्मताम् ॥१६
प्रजापति लिंग है, मृत्यु गुदा है, लोकपालगण भुजाएँ हैं, चन्द्रमा मन है और यमराज भौंहें
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हैं ॥७ ॥ लज्जा ऊपरका होठ है, लोभ नीचेका होठ है, चन्द्रमाकी चाँदनी दन्तावली है, भ्रम
मुसकान है, वृक्ष रोम हैं और बादल ही विराट् पुरुषके सिरपर उगे हुए बाल हैं ॥ ८ ॥
शौनकजी! जिस प्रकार यह व्यष्टि पुरुष अपने परिमाणसे सात बित्तेका है उसी प्रकार वह समष्टि पुरुष भी इस लोकसंस्थितिके साथ अपने सात बित्तेका है ॥ ९ ॥
स्वयं भगवान् अजन्मा हैं । वे कौस्तुभमणिके बहाने जीव - चैतन्यरूप आत्मज्योतिको ही धारण करते हैं और उसकी सर्वव्यापिनी प्रभाको ही वक्षःस्थलपर श्रीवत्सरूपसे ॥१० ॥
वे अपनी सत्त्व, रज आदि गुणोंवाली मायाको वनमालाके रूपसे, छन्दको पीताम्बरके रूपसे तथा अ+ उ+म्– इन तीन मात्रावाले प्रणवको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करते हैं ॥११ ॥
देवाधिदेव भगवान् सांख्य और योगरूप मकराकृत कुण्डल तथा सब लोकोंको अभय करनेवाले ब्रह्मलोकको ही मुकुटके रूपमें धारण करते हैं ॥१२ ॥
मूलप्रकृति ही उनकी शेषशय्या है, जिसपर वे विराजमान रहते हैं और धर्म-ज्ञानादियुक्त सत्त्वगुण ही उनके नाभि- कमलके रूपमें वर्णित हुआ है ॥१३ ॥
वे मन, इन्द्रिय और शरीरसम्बन्धी शक्तियोंसे युक्त प्राण तत्त्वरूप कौमोदकी गदा, जलतत्त्वरूप पांचजन्य शंख और तेजस्तत्त्वरूप सुदर्शनचक्रको धारण करते हैं ॥१४ ॥
आकाशके समान निर्मल आकाशस्वरूप खड्ग, तमोमय अज्ञानरूप ढाल, कालरूप शार्ङ्गधनुष और कर्मका ही तरकस धारण किये हुए हैंहैं ॥१५ ॥
इन्द्रियोंको ही भगवान्के बाणोंके रूपमें कहा गया है । क्रियाशक्तियुक्त मन ही रथ है । तन्मात्राएँ रथके बाहरी भाग हैं और वर- अभय आदिकी मुद्राओंसे उनकी वरदान, अभयदान आदिके रूपमें क्रियाशीलता प्रकट होती है ॥१६ ॥
मण्डलं देवयजनं दीक्षा संस्कार आत्मनः ।
परिचर्या भगवत आत्मनो दुरितक्षयः ॥१७
भगवान् भगशब्दार्थं लीलाकमलमुद्वहन् ।
धर्मं यशश्च भगवांश्चामरव्यजनेऽभजत् ॥१८
आतपत्रं तु वैकुण्ठं द्विजा धामाकुतोभयम् ।
त्रिवृवेदः सुपर्णाख्यो यज्ञं वहति पूरुषम् ॥१९
अनपायिनी भगवती श्रीः साक्षादात्मनो हरेः ।
विष्वक्सेनस्तन्त्रमूर्तिर्विदितः पार्षदाधिपः ।
नन्दादयोऽष्टौ द्वाःस्थाश्च तेऽणिमाद्या हरेर्गुणाः ॥२०
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वासुदेवः संकर्षणः प्रद्युम्नः पुरुषः स्वयम् ।
अनिरुद्ध इति ब्रह्मन् मूर्तिव्यूहोऽभिधीयते ॥२१
स विश्वस्तैजसः प्राज्ञस्तुरीय इति वृत्तिभिः ।
अर्थेन्द्रियाशयज्ञानैर्भगवान् परिभाव्यते ॥२२
अंगोपांगायुधाकल्पैर्भगवांस्तच्चतुष्टयम् ।
बिभर्ति स्म चतुर्मूर्तिर्भगवान् हरिरीश्वरः ॥ २३
सूर्यमण्डल अथवा अग्निमण्डल ही भगवान्की पूजाका स्थान है, अन्तःकरणकी शुद्धि ही मन्त्रदीक्षा है और अपने समस्त पापोंको नष्ट कर देना ही भगवान्की पूजा है ॥१७ ॥
ब्राह्मणो! समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य- इन छः पदार्थोंका नाम ही लीला- कमल है, जिसे भगवान् अपने करकमलमें धारण करते हैं । धर्म और यशको क्रमशः चँवर एवं व्यजन ( पंखे ) के रूपसे तथा अपने निर्भय धाम वैकुण्ठको छत्ररूपसे धारण किये हुए हैं। तीनों वेदोंका ही नाम गरुड है । वे ही अन्तर्यामी परमात्माका वहन करते ॥१८-१९ ॥ आत्मस्वरूप भगवान्की उनसे कभी न बिछुड़नेवाली आत्मशक्तिका ही नाम लक्ष्मी है । भगवान्के पार्षदोंके नायक विश्वविश्रुत विष्वक्सेन पांचरात्रादि आगमरूप हैं । भगवान्के स्वाभाविक गुण अणिमा, महिमा आदि अष्टसिद्धियोंको ही नन्द-सुनन्दादि आठ द्वारपाल कहते हैं ॥२० ॥
शौनकजी! स्वयं भगवान् ही वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध –इन चार मूर्तियोंके रूपमें अवस्थित हैं; इसलिये उन्हींको चतुर्व्यूहके रूपमें कहा जाता है ॥२१ ॥
वे ही जाग्रत् - अवस्थाके अभिमानी ' विश्व ' बनकर शब्द, स्पर्श आदि बाह्य विषयोंको ग्रहण करते और वे ही स्वप्नावस्थाके अभिमानी ' तैजस' बनकर बाह्य विषयोंके बिना ही मन-ही- मन अनेक विषयोंको देखते और ग्रहण करते हैं । वे ही सुषुप्ति अवस्थाके अभिमानी ‘ प्राज्ञ ' बनकर विषय और मनके संस्कारोंसे युक्त अज्ञानसे ढक जाते हैं और वही सबके साक्षी ' तुरीय ' रहकर समस्त ज्ञानोंके अधिष्ठान रहते हैं ॥२२ ॥
इस प्रकार अंग, उपांग, आयुध और आभूषणोंसे युक्त तथा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध — इन चार मूर्तियोंके रूपमें प्रकट सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि ही क्रमशः विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीयरूपसे प्रकाशित होते हैं ॥२३ ॥
द्विजऋषभ स एष ब्रह्मयोनिः स्वयंदृक् स्वमहिमपरिपूर्णो मायया च स्वयैतत् । सृजति हरति पातीत्याख्ययानावृताक्षो विवृत इव निरुक्तस्तत्परैरात्मलभ्यः ॥२४