श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 201–210
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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श्रीशुक उवाच
सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम ।
वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रतिः १ ॥१५
वासुदेवकथाप्रश्नः पुरुषांस्त्रीन् पुनाति हि ।
वक्तारं पृच्छकं श्रोतॄंस्तत्पादसलिलं यथा ॥१६
भूमिर्दृप्तनृपव्याजदैत्यानीकशतायुतैः ।
आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ ॥१७
सूतजी कहते हैं - शौनकजी! भगवान्के प्रेमियोंमें अग्रगण्य एवं सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने परीक्षित्का ऐसा समीचीन प्रश्न सुनकर (जो संतोंकी सभामें भगवान्की लीलाके वर्णनका हेतु हुआ करता है) उनका अभिनन्दन किया और भगवान् श्रीकृष्णकी उन लीलाओंका वर्णन प्रारम्भ किया, जो समस्त कलिमलोंको सदाके लिये धो डालती है ॥१४ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- भगवान्के लीला- रसके रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्णकी लीला-कथा श्रवण करनेमें तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है ॥ १५ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी
कथाके सम्बन्धमें प्रश्न करनेसे ही वक्ता, प्रश्नकर्ता और श्रोता तीनों ही पवित्र हो जाते हैं— जैसे गंगाजीका जल या भगवान् शालग्रामका चरणामृत सभीको पवित्र कर देता है ॥१६ ॥
परीक्षित्! उस समय लाखों दैत्योंके दलने घमंडी राजाओंका रूप धारण कर अपने भारी भारसे पृथ्वीको आक्रान्त कर रखा था । उससे त्राण पानेके लिये वह ब्रह्माजीकी शरणमें गयी ॥१७ ॥
गौर्भूत्वाश्रुमुखी खिन्ना क्रन्दन्ती करुणं विभोः ।
उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं स्वमवोचत ॥१८
ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह ।
जगाम सत्रिनयनस्तीरं क्षीरपयोनिधेः ॥ १ ९
तत्र गत्वा जगन्नाथं देवदेवं वृषाकपिम् ।
पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहितः ॥२०
गिरं समाधौ गगने समीरितां निशम्य वेधास्त्रिदशानुवाच ह । गां पौरुषीं मे शृणुतामराः पुन-
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र्विधीयतामाशु तथैव मा चिरम् ॥२१ पुरैव पुंसावधृतो धराज्वरो भवद्भिरंशैर्यदुषूपजन्यताम् । स यावदुर्व्या भरमीश्वरेश्वरः स्वकालशक्त्या क्षपयंश्चरेद् भुवि ॥२२
वसुदेवगृहे साक्षाद् भगवान् पुरुषः परः ।
जनिष्यते तत्प्रियार्थं सम्भवन्तु सुरस्त्रियः ॥२३
वासुदेवकलानन्तः सहस्रवदनः स्वराट् ।
अग्रतो भविता देवो हरेः प्रियचिकीर्षया ॥ २४
पृथ्वीने उस समय गौका रूप धारण कर रखा था । उसके नेत्रोंसे आँसू बह - बहकर मुँहपर आ रहे थे । उसका मन तो खिन्न था ही, शरीर भी बहुत कृश हो गया था। वह बड़े करुण स्वरसे रँभा रही थी। ब्रह्माजीके पास जाकर उसने उन्हें अपनी पूरी कष्ट- कहानी सुनायी ॥१८ ॥ ब्रह्माजीने बड़ी सहानुभूतिके साथ उसकी दुःख-गाथा सुनी । उसके बाद वे
भगवान् शंकर, स्वर्गके अन्यान्य प्रमुख देवता तथा गौके रूपमें आयी हुई पृथ्वीको अपने साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये ॥१९ ॥ भगवान् देवताओंके भी आराध्यदेव हैं । वे अपने
भक्तोंकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करते और उनके समस्त क्लेशोंको नष्ट कर देते हैं । वे ही जगत्के एकमात्र स्वामी हैं । क्षीरसागरके तटपर पहुँचकर ब्रह्मा आदि देवताओंने ' पुरुषसूक्त ' के द्वारा उन्हीं परम पुरुष सर्वान्तर्यामी प्रभुकी स्तुति की । स्तुति करते - करते ब्रह्माजी समाधिस्थ हो गये ॥२० ॥ उन्होंने समाधि- अवस्थामें आकाशवाणी सुनी। इसके बाद जगत्के
निर्माणकर्ता ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा - ' देवताओ! मैंने भगवान्की वाणी सुनी है । तुमलोग भी उसे मेरे द्वारा अभी सुन लो और फिर वैसा ही करो । उसके पालनमें विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥२१ ॥ भगवान्को पृथ्वीके कष्टका पहलेसे ही पता है । वे ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं । अतः
अपनी कालशक्तिके द्वारा पृथ्वीका भार हरण करते हुए वे जबतक पृथ्वीपर लीला करें, तबतक तुम लोग भी अपने- अपने अंशोंके साथ यदुकुलमें जन्म लेकर उनकी लीलामें सहयोग दो ॥२२ ॥ वसुदेवजीके घर स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् प्रकट होंगे । उनकी और उनकी
प्रियतमा ( श्रीराधा ) की सेवाके लिये देवांगनाएँ जन्म ग्रहण करें ॥ २३ ॥
स्वयंप्रकाश भगवान् शेष भी, जो भगवान्की कला होनेके कारण अनन्त हैं ( अनन्तका अंश भी अनन्त ही होता है ) और जिनके सहस्र मुख हैं, भगवान् के प्रिय कार्य करनेके लिये उनसे पहले ही उनके बड़े भाईके रूपमें अवतार ग्रहण करेंगे || २४ || भगवान्की वह ऐश्वर्यशालिनी योगमाया भी, जिसने सारे जगत्को मोहित कर रखा है, उनकी आज्ञासे उनकी लीलाके कार्य सम्पन्न करनेके लिये अंशरूपसे अवतार ग्रहण करेगी' ॥ २५ ॥
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विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत् ।
आदिष्टा प्रभुणांशेन कार्यार्थे सम्भविष्यति ॥२५
श्रीशुक उवाच
इत्यादिश्यामरगणान् प्रजापतिपतिर्विभुः ।
आश्वास्य च महीं गीर्भिः स्वधाम परमं ययौ ॥२६
शूरसेनो यदुपतिर्मथुरामावसन् पुरीम् ।
माथुराञ्छूरसेनांश्च विषयान् बुभुजे पुरा ॥२७
राजधानी ततः साभूत् सर्वयादवभूभुजाम् ।
मथुरा भगवान् यत्र नित्यं संनिहितो हरिः ॥२८
तस्यां तु कर्हिचिच्छौरिर्वसुदेवः कृतोद्वहः ।
देवक्या सूर्यया सार्धं प्रयाणे रथमारुहत् ॥२९
उग्रसेनसुतः कंसः स्वसुः प्रियचिकीर्षया ।
रश्मीन् हयानां जग्राह रौक्मै रथशतैर्वृतः ॥ ३०
चतुःशतं पारिबर्हं गजानां हेममालिनाम् ।
अश्वानामयुतं सार्धं रथानां च त्रिषट्शतम् ॥३१
दासीनां सुकुमारीणां द्वे शते समलंकृते ।
दुहित्रे देवकः प्रादाद् याने दुहितृवत्सलः ॥ ३२
शंखतूर्यमृदंगाश्च नेदुर्दुन्दुभयः समम् ।
प्रयाणप्रक्रमे तावद् वरवध्वोः सुमंगलम् ॥३३
पथि प्रग्रहिणं कंसमाभाष्याहाशरीरवाक् ।
अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यां वहसेऽबुध ॥ ३४
इत्युक्तः स खलः पापो भोजानां कुलपांसनः ।
भगिनीं हन्तुमारब्धः खड्गपाणिः कचेऽग्रहीत् ॥ ३५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने देवताओंको इस प्रकार आज्ञा दी और पृथ्वीको समझा- बुझाकर ढाढ़स बँधाया । इसके बाद वे
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अपने परम धामको चले गये ॥ २६ ॥ प्राचीन कालमें यदुवंशी राजा थे शूरसेन । वे मथुरापुरीमें
रहकर माथुरमण्डल और शूरसेनमण्डलका राज्यशासन करते थे ॥ २७ ॥ उसी समयसे मथुरा
ही समस्त यदुवंशी नरपतियोंकी राजधानी हो गयी थी । भगवान् श्रीहरि सर्वदा वहाँ विराजमान रहते हैं ॥२८ ॥ एक बार मथुरामें शूरके पुत्र वसुदेवजी विवाह करके अपनी
नवविवाहिता पत्नी देवकीके साथ घर जानेके लिये रथपर सवार हुए ॥२९ ॥ उग्रसेनका
लड़का था कंस । उसने अपनी चचेरी बहिन देवकीको प्रसन्न करनेके लिये उसके रथके घोड़ोंकी रास पकड़ ली । वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोनेके बने हुए रथ चल रहे थे ॥३० ॥ देवकीके पिता थे देवक । अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा प्रेम था ।
कन्याको विदा करते समय उन्होंने उसे सोनेके हारोंसे अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर- सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दो सौ सुकुमारी दासियाँ दहेजमें दीं ॥३१-३२ ॥ विदाईके समय वर- वधूके मंगलके लिये एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं ॥ ३३ ॥ मार्गमें जिस समय घोड़ोंकी रास पकड़कर कंस रथ
हाँक रहा था, उस समय आकाशवाणीने उसे सम्बोधन करके कहा- ' अरे मूर्ख! जिसको तू रथमें बैठाकर लिये जा रहा है, उसकी आठवें गर्भकी सन्तान तुझे मार डालेगी ' ॥ ३४ ॥ कंस
बड़ा पापी था । उसकी दुष्टताकी सीमा नहीं थी । वह भोजवंशका कलंक ही था । आकाशवाणी सुनते ही उसने तलवार खींच ली और अपनी बहिनकी चोटी पकड़कर उसे मारनेके लिये तैयार हो गया ॥३५ ॥ वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप- कर्म करते - करते निर्लज्ज भी हो गया
था । उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शान्त करते हुए बोले— ॥३६ ॥
तं जुगुप्सितकर्माणं नृशंसं निरपत्रपम् ।
वसुदेवो महाभाग उवाच परिसान्त्वयन् ॥३६
वसुदेव उवाच
श्लाघनीयगुणः शूरैर्भवान् भोजयशस्करः ।
स कथं भगिनीं हन्यात् स्त्रियमुद्वाहपर्वणि ॥३७
मृत्युर्जन्मवतां वीर देहेन सह जायते ।
अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः ॥ ३८
देहे पंचत्वमापन्ने देही कर्मानुगोऽवशः ।
देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं त्यजते वपुः ॥३९
व्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति ।
यथा तृणजलूकैवं देही कर्मगतिं गतः ॥४०
स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं
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मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः । दृष्टश्रुताभ्यां मनसानुचिन्तयन् प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः ॥४१ यतो यतो धावति दैवचोदितं मनो विकारात्मकमाप पंचसु । गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ प्रपद्यमानः सह तेन जायते ॥४२ वसुदेवजीने कहा- राजकुमार! आप भोजवंशके होनहार वंशधर तथा अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं । बड़े - बड़े शूरवीर आपके गुणोंकी सराहना करते हैं । इधर यह एक तो स्त्री, दूसरे आपकी बहिन और तीसरे यह विवाहका शुभ अवसर! ऐसी स्थितिमें आप इसे कैसे मार सकते हैं? ॥३७ || वीरवर! जो जन्म लेते हैं, उनके शरीरके साथ ही मृत्यु भी उत्पन्न होती है । आज हो या सौ वर्षके बाद -जो प्राणी है, उसकी मृत्यु होगी ही ॥ ३८ ॥ जब
शरीरका अन्त हो जाता है, तब जीव अपने कर्मके अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले शरीरको छोड़ देता है । उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है ॥३९ ॥ जैसे चलते
समय मनुष्य एक पैर जमाकर ही दूसरा पैर उठाता है और जैसे जोंक किसी अगले तिनकेको पकड़ लेती है, तब पहलेके पकड़े हुए तिनकेको छोड़ती है - वैसे जीव भी अपने कर्मके अनुसार किसी शरीरको प्राप्त करनेके बाद ही इस शरीरको छोड़ता है ॥ ४० ॥ जैसे कोई
पुरुष जाग्रत्- अवस्थामें राजाके ऐश्वर्यको देखकर और इन्द्रादिके ऐश्वर्यको सुनकर उसकी अभिलाषा करने लगता है और उसका चिन्तन करते - करते उन्हीं बातोंमें घुल - मिलकर एक हो जाता है तथा स्वप्नमें अपनेको राजा या इन्द्रके रूपमें अनुभव करने लगता है, साथ ही अपने दरिद्रावस्थाके शरीरको भूल जाता है । कभी -कभी तो जाग्रत् अवस्थामें ही मन -ही- मन उन बातोंका चिन्तन करते - करते तन्मय हो जाता है और उसे स्थूल शरीरकी सुधि नहीं रहती । वैसे ही जीव कर्मकृत कामना और कामनाकृत कर्मके वश होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है और अपने पहले शरीरको भूल जाता है ॥ ४१ ॥ जीवका मन अनेक विकारोंका पुंज है ।
देहान्तके समय वह अनेक जन्मोंके संचित और प्रारब्ध कर्मोंकी वासनाओंके अधीन होकर मायाके द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरोंमेंसे जिस किसी शरीरके चिन्तनमें तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि यह मैं हूँ, उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है ॥४२ ॥ जैसे सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीली वस्तुएँ जलसे भरे हुए घड़ोंमें या तेल आदि
तरल पदार्थोंमें प्रतिबिम्बित होती हैं और हवाके झोंकेसे उनके जल आदिके हिलने - डोलनेपर उनमें प्रतिबिम्बित वस्तुएँ भी चंचल जान पड़ती हैं - वैसे ही जीव अपने स्वरूपके अज्ञानद्वारा रचे हुए शरीरोंमें राग करके उन्हें अपना आप मान बैठता है और मोहवश उनके आने - जानेको अपना आना- जाना मानने लगता है ॥४३ ॥ इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे
किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये; क्योंकि जीव कर्मके अधीन हो गया है और जो किसीसे भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवनमें शत्रुसे और जीवनके बाद परलोकसे भयभीत होना ही
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पड़ेगा ॥४४ ॥ कंस! यह आपकी छोटी बहिन अभी बच्ची और बहुत दीन है । यह तो आपकी
कन्याके समान है । इसपर अभी - अभी इसका विवाह हुआ है, विवाहके मंगलचिह्न भी इसके शरीरपरसे नहीं उतरे हैं । ऐसी दशामें आप जैसे दीनवत्सल पुरुषको इस बेचारीका वध करना उचित नहीं है ॥४५ ॥
ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः समीरवेगानुगतं विभाव्यते । एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान् गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति ॥४३
तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः ।
आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४
एषा तवानुजा बाला कृपणा पुत्रिकोपमा ।
हन्तुं नार्हसि कल्याणीमिमां त्वं दीनवत्सलः ॥४५
श्रीशुक उवाच
एवं स सामभिर्भेदैर्बोध्यमानोऽपि दारुणः ।
न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुव्रतः ॥४६
निर्बन्धं तस्य तं ज्ञात्वा विचिन्त्यानकदुन्दुभिः ।
प्राप्तं कालं प्रतिव्योढुमिदं तत्रान्वपद्यत ॥४७
मृत्युर्बुद्धिमतापोह्यो यावदबुद्धिबलोदयम् ।
यद्यसौ न निवर्तेत नापराधोऽस्ति देहिनः ॥४८
प्रदाय मृत्यवे पुत्रान् मोचये कृपणामिमाम् ।
सुता मे यदि जायेरन् मृत्युर्वा न म्रियेत चेत् ॥४९
विपर्ययो वा किं न स्याद् गतिर्धातुर्दुरत्यया ।
उपस्थितो निवर्तेत निवृत्तः पुनरापतेत् ॥ ५०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार वसुदेवजीने प्रशंसा आदि सामनीति और भय आदि भेदनीतिसे कंसको बहुत समझाया । परन्तु वह क्रूर तो राक्षसोंका अनुयायी हो रहा था; इसलिये उसने अपने घोर संकल्पको नहीं छोड़ा ॥ ४६ ॥ वसुदेवजीने कंसका विकट हठ
देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिये । तब वे इस
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निश्चयपर पहुँचे ॥४७ ॥ ' बुद्धिमान् पुरुषको, जहाँतक उसकी बुद्धि और बल साथ दें, मृत्युको
टालनेका प्रयत्न करना चाहिये । प्रयत्न करनेपर भी वह न टल सके, तो फिर प्रयत्न करनेवालेका कोई दोष नहीं रहता ॥४८ ॥ इसलिये इस मृत्युरूप कंसको अपने पुत्र दे देनेकी
प्रतिज्ञा करके मैं इस दीन देवकीको बचा लूँ । यदि मेरे लड़के होंगे और तबतक यह कंस स्वयं नहीं मर जायगा, तब क्या होगा? ॥ ४९ ॥ सम्भव है, उलटा ही हो । मेरा लड़का ही इसे मार
डाले! क्योंकि विधाताके विधानका पार पाना बहुत कठिन है । मृत्यु सामने आकर भी टल जाती है और टली हुई भी लौट आती है ॥ ५० ॥ जिस समय वनमें आग लगती है, उस समय
कौन - सी लकड़ी जले और कौन- सी न जले, दूरकी जल जाय और पासकी बच रहे — इन सब बातोंमें अदृष्टके सिवा और कोई कारण नहीं होता । वैसे ही किस प्राणीका कौन- सा शरीर बना रहेगा और किस हेतुसे कौन- सा शरीर नष्ट हो जायगा— इस बातका पता लगा लेना बहुत ही कठिन है' ॥५१ ॥ अपनी बुद्धिके अनुसार ऐसा निश्चय करके वसुदेवजीने बहुत सम्मानके
साथ पापी कंसकी बड़ी प्रशंसा की ॥ ५२ ॥ परीक्षित्! कंस बड़ा क्रूर और निर्लज्ज था; अतः
ऐसा करते समय वसुदेवजीके मनमें बड़ी पीड़ा भी हो रही थी । फिर भी उन्होंने ऊपरसे अपने मुखकमलको प्रफुल्लित करके हँसते हुए कहा- ॥५३ ॥
अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो- दृष्टोऽन्यन्न निमित्तमस्ति । एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्यः शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥ ५१
एवं विमृश्य तं पापं यावदात्मनिदर्शनम् ।
पूजयामास वै शौरिर्बहुमानपुरःसरम् ॥५२
प्रसन्नवदनाम्भोजो नृशंसं निरपत्रपम् ।
मनसा दूयमानेन विहसन्निदमब्रवीत् ॥५३
वसुदेव उवाच
न ह्यस्यास्ते भयं सौम्य यद् वागाहाशरीरिणी ।
पुत्रान् समर्पयिष्येऽस्या यतस्ते भयमुत्थितम् ॥ ५४
श्रीशुक उवाच
स्वसुर्वधान्निववृते कंसस्तद्वाक्यसारवित् ।
वसुदेवोऽपि तं प्रीतः प्रशस्य प्राविशद् गृहम् ॥५५
अथ काल उपावृत्ते देवकी सर्वदेवता ।
पुत्रान् प्रसुषुवे चाष्टौ कन्यां चैवानुवत्सरम् ॥५६
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कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभिः ।
अर्पयामास कृच्छ्रेण सोऽनृतादतिविह्वलः ॥५७
किं दुःसहं नु साधूनां विदुषां किमपेक्षितम् ।
किमकार्यं कदर्याणां दुस्त्यजं किं धृतात्मनाम् ॥५८
वसुदेवजीने कहा – सौम्य! आपको देवकीसे तो कोई भय है नहीं, जैसा कि आकाशवाणीने कहा है । भय है पुत्रोंसे, सो इसके पुत्र मैं आपको लाकर सौंप दूँगा ॥५४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कंस जानता था कि वसुदेवजीके वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है । इसलिये उसने अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया । इससे वसुदेवजी बहुत प्रसन्न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये ॥ ५५ ॥ देवकी बड़ी सती -साध्वी थी । सारे देवता उसके शरीरमें
निवास करते थे । समय आनेपर देवकीके गर्भसे प्रतिवर्ष एक-एक करके आठ पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई ॥५६ ॥ पहले पुत्रका नाम था कीर्तिमान् । वसुदेवजीने उसे लाकर कंसको दे
दिया । ऐसा करते समय उन्हें कष्ट तो अवश्य हुआ, परन्तु उससे भी बड़ा कष्ट उन्हें इस बातका था कि कहीं मेरे वचन झूठे न हो जायँ ॥ ५७ ॥ परीक्षित्! सत्यसन्ध पुरुष बड़े - से-बड़ा कष्ट भी सह लेते हैं, ज्ञानियोंको किसी बातकी अपेक्षा नहीं होती, नीच पुरुष बुरे से बुरा
काम भी कर सकते हैं और जो जितेन्द्रिय हैं—– जिन्होंने भगवान्को हृदयमें धारण कर रखा है, वे सब कुछ त्याग सकते हैं ॥५८ ॥
दृष्ट्वा समत्वं तच्छौरेः सत्ये चैव व्यवस्थितिम् ।
कंसस्तुष्टमना राजन् प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥५९
प्रतियातु' कुमारोऽयं न ह्यस्मादस्ति मे भयम् ।
अष्टमाद् युवयोर्गर्भान्मृत्युर्मे विहितः किल ॥ ६०
तथेति सुतमादाय ययावानकदुन्दुभिः ।
नाभ्यनन्दत तद्वाक्यमसतोऽविजितात्मनः ॥६१
नन्दाद्या ये व्रजे गोपा याश्चामीषां च योषितः ।
वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रियः ॥६२
सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत ।
ज्ञातयो बन्धुसुहृदो ये च कंसमनुव्रताः ॥६३
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एतत् कंसाय भगवाञ्छशंसाभ्येत्य नारदः ।
भूमेर्भारायमाणानां दैत्यानां च वधोद्यमम् ॥६४
ऋषेर्विनिर्गमे कंसो यदून् मत्वा सुरानिति ।
देवक्या गर्भसम्भूतं विष्णुं च स्ववधं प्रति ॥६५
देवकीं वसुदेवं च निगृह्य निगडैर्गृहे ।
जातं जातमहन् पुत्रं तयोरजनशंकया ॥६६
मातरं पितरं भ्रातॄन् सर्वांश्च सुहृदस्तथा ।
घ्नन्ति ह्यसुतृपो लुब्धा राजानः प्रायशो भुवि ॥ ६७
जब कंसने देखा कि वसुदेवजीका अपने पुत्रके जीवन और मृत्युमें समान भाव है एवं वे सत्यमें पूर्ण निष्ठावान् भी हैं, तब वह बहुत प्रसन्न हुआ और उनसे हँसकर बोला ॥५९ ॥
वसुदेवजी! आप इस नन्हे से सुकुमार बालकको ले जाइये। इससे मुझे कोई भय नहीं है । क्योंकि आकाशवाणीने तो ऐसा कहा था कि देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्न सन्तानके द्वारा मेरी मृत्यु होगी ॥६० ॥ वसुदेवजीने कहा- ' ठीक है ' और उस बालकको लेकर वे लौट
आये । परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथमें नहीं है । वह किसी क्षण बदल सकता है । इसलिये उन्होंने उसकी बातपर विश्वास नहीं किया ॥ ६१ ॥
परीक्षित्! इधर भगवान् नारद कंसके पास आये और उससे बोले कि ‘ कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु बान्धव और सगे- सम्बन्धी — सब- के - सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं । ' उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘ दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है ' ॥६२-६४ ॥ जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं । इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी - बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो - जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया । उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो ॥६५-६६ ॥ परीक्षित्! पृथ्वीमें यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणोंका ही पोषण करनेवाले लोभी राजा अपने स्वार्थके लिये माता- पिता, भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट - मित्रोंकी भी हत्या कर डालते हैं ॥६७ ॥
आत्मानमिह संजातं जानन् प्राग् विष्णुना हतम् ।
महासुरं कालनेमिं यदुभिः स व्यरुध्यत ॥६८
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उग्रसेनं च पितरं यदुभोजान्धकाधिपम्' ।
स्वयं निगृह्य बुभुजे शूरसेनान् महाबलः ॥ ६ ९
कंस जानता था कि मैं पहले कालनेमि असुर था और विष्णुने मुझे मार डाला था । इससे उसने यदुवंशियोंसे घोर विरोध ठान लिया ॥ ६८ ॥ कंस बड़ा बलवान् था। उसने यदु, भोज
और अन्धक वंशके अधिनायक अपने पिता उग्रसेनको कैद कर लिया और शूरसेन - देशका राज्य वह स्वयं करने लगा ॥६९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे श्रीकृष्णावतारोपक्रमे प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
* समस्त देहधारियोंके अन्तःकरणमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित भगवान् उनके जीवनके कारण हैं तथा बाहर कालरूपसे स्थित हुए वे ही उनका नाश करते हैं । अतः जो आत्मज्ञानीजन अन्तर्दृष्टिद्वारा उन अन्तर्यामीकी उपासना करते हैं, वे मोक्षरूप अमरपद पाते हैं और जो विषयपरायण अज्ञानी पुरुष बाह्यदृष्टिसे विषयचिन्तनमें ही लगे रहते हैं, वे जन्म-मरणरूप मृत्युके भागी होते हैं । १. मतिः । १. समवोचत । २. ष्यति । ३. वन्त्वमरस्त्रियः । १. यवीयांस्तु । २. योः पुत्रान्मृ० । १. यदूनामन्धका० ।