श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 611–620
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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इसी प्रकार मुष्टिकने भी पहले बलरामजीको एक घूँसा मारा । इसपर बली बलरामजीने उसे बड़े जोरसे एक तमाचा जड़ दिया ॥२४ ॥ तमाचा लगनेसे वह काँप उठा और आँधीसे
उखड़े हुए वृक्षके समान अत्यन्त व्यथित और अन्तमें प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥२५ ॥ हे राजन्! इसके बाद योद्धाओंमें श्रेष्ठ भगवान् बलरामजीने अपने
सामने आते ही कूट नामक पहलवानको खेल- खेल में ही बायें हाथके घूँसेसे उपेक्षापूर्वक मार डाला ॥२६ ॥ उसी समय भगवान् श्रीकृष्णने पैरकी ठोकरसे शलका सिर धड़से अलग कर
दिया और तोशलको तिनकेकी तरह चीरकर दो टुकड़े कर दिया । इस प्रकार दोनों धराशायी हो गये ॥२७ ॥ जब चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल— ये पाँचों पहलवान मर चुके, तब
जो बच रहे थे, वे अपने प्राण बचानेके लिये स्वयं वहाँसे भाग खड़े हुए ॥२८ ॥ उनके भाग
जानेपर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने समवयस्क ग्वाल- बालोंको खींच - खींचकर उनके साथ भिड़ने और नाच- नाचकर भेरीध्वनिके साथ अपने नूपुरोंकी झनकारको मिलाकर मल्लक्रीडा – कुश्तीके खेल करने लगे ॥२९ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी इस अद्रभुत लीलाको देखकर सभी दर्शकोंको बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ' धन्य है, धन्य है ' – इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे । परन्तु कंसको इससे बड़ा दुःख हुआ । वह और भी चिढ़ गया ॥ ३० ॥ जब उसके
प्रधान पहलवान मार डाले गये और बचे हुए सब- के5-- ससब भाग गये, तब भोजराज कंसने अपने बाजे - गाजे बंद करा दिये और अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी— ॥३१ ॥ ‘ अरे,
वसुदेवके इन दुश्चरित्र लड़कोंको नगरसे बाहर निकाल दो । गोपोंका सारा धन छीन लो और दुर्बुद्धि नन्दको कैद कर लो ॥ ३२ ॥ वसुदेव भी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है । उसे शीघ्र मार डालो
और उग्रसेन मेरा पिता होनेपर भी अपने अनुयायियोंके साथ शत्रुओंसे मिला हुआ है ।
इसलिये उसे भी जीता मत छोड़ो ' ॥३३ ॥
एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोऽव्ययः ।
लघिम्नोत्यत्य तरसा मंचमुत्तुंगमारुहत् ॥३४
तमाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन आसनात् ।
मनस्वी सहसोत्थाय जगृहे सोऽसिचर्मणी ॥३५
तं खड्गपाणिं विचरन्तमाशु श्येनं यथा दक्षिणसव्यमम्बरे । समग्रही दुर्विषहोग्रतेजा यथोरगं तार्क्ष्यसुतः प्रसह्य ॥३६ प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीटं निपात्य रङ्गोपरि तुङ्गमञ्चात् । तस्योपरिष्टात् स्वयमब्जनाभः
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पपात विश्वाश्रय आत्मतन्त्रः ॥३७ तं सम्परेतं विचकर्ष भूमौ
हरिर्यथेभं जगतो विपश्यतः ।
हाहेति शब्दः सुमहांस्तदाभू- दुदीरितः सर्वजनैनरेन्द्र ॥३८
स नित्यदोद्विग्नधिया तमीश्वरं
पिबन् वदन् वा विचरन् स्वपन् श्वसन् ।
ददर्श चक्रायुधमग्रतो य- स्तदेव रूपं दुरवापमाप ॥३९
तस्यानुजा भ्रातरोऽष्टौ कंकन्यग्रोधकादयः ।
अभ्यधावन्नभिक्रुद्धा भ्रातुर्निर्वेशकारिणः ॥ ४०
तथातिरभसांस्तांस्तु संयत्तान् रोहिणीसुतः ।
अहन् परिघमुद्यम्य पशूनिव मृगाधिपः ॥ ४१
कंस इस प्रकार बढ़ - बढ़कर बकवाद कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर फुर्तीसे वेगपूर्वक उछलकर लीलासे ही उसके ऊँचे मंचपर जा चढ़े || ३४ || जब मनस्वी कंसने देखा कि मेरे मृत्युरूप भगवान् श्रीकृष्ण सामने आ गये, तब वह सहसा अपने सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और हाथमें ढाल तथा तलवार उठा ली ॥ ३५ ॥ हाथमें तलवार लेकर वह चोट
करनेका अवसर ढूँढ़ता हुआ पैंतरा बदलने लगा । आकाशमें उड़ते हुए बाजके समान वह कभी दायीं ओर जाता तो कभी बायीं ओर । परन्तु भगवान्का प्रचण्ड तेज अत्यन्त दुस्सह है । जैसे गरुड़ साँपको पकड़ लेते हैं, वैसे ही भगवान्ने बलपूर्वक उसे पकड़ लिया ॥३६ ॥ इसी
समय कंसका मुकुट गिर गया और भगवान्ने उसके केश पकड़कर उसे भी उस ऊँचे मंचसे रंगभूमिमें गिरा दिया । फिर परम स्वतन्त्र और सारे विश्वके आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण उसके ऊपर स्वयं कूद पड़े ॥ ३७ ॥ उनके कूदते ही कंसकी मृत्यु हो गयी । सबके देखते- देखते
भगवान् श्रीकृष्ण कंसकी लाशको धरतीपर उसी प्रकार घसीटने लगे, जैसे सिंह हाथीको घसीटे । नरेन्द्र! उस समय सबके मुँहसे ' हाय! हाय! ' की बड़ी ऊँची आवाज सुनायी पड़ी ॥३८ ॥ कंस नित्य- निरन्तर बड़ी घबड़ाहटके साथ श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता रहता
था । वह खाते - पीते, सोते - चलते, बोलते और साँस लेते - सब समय अपने सामने चक्र हाथमें लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही देखता रहता था । इस नित्य चिन्तनके फलस्वरूप —वह चाहे द्वेषभावसे ही क्यों न किया गया हो - उसे भगवान्के उसी रूपकी प्राप्ति हुई, सारूप्य मुक्ति हुई, जिसकी प्राप्ति बड़े - बड़े तपस्वी योगियोंके लिये भी कठिन है ॥३९ ॥
कंसके कंक और न्यग्रोध आदि आठ छोटे भाई थे । वे अपने बड़े भाईका बदला लेनेके
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लिये क्रोधसे आगबबूले होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी ओर दौड़े ॥४० ॥ जब
भगवान् बलरामजीने देखा कि वे बड़े वेगसे युद्धके लिये तैयार होकर दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने परिघ उठाकर उन्हें वैसे ही मार डाला, जैसे सिंह पशुओंको मार डालता है ॥४१ ॥
नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्नि ब्रह्मेशाद्या विभूतयः ।
पुष्पैः किरन्तस्तं प्रीताः शशंसुर्ननृतुः स्त्रियः ॥ ४२
तेषां स्त्रियो महाराज सुहृन्मरणदुःखिताः ।
तत्राभीयुर्विनिघ्नन्त्यः शीर्षाण्यश्रुविलोचनाः ॥४३
शयानान् वीरशय्यायां पतीनालिङ्ग्य शोचतीः ।
विलेपुः सुस्वरं नार्यो विसृजन्त्यो मुहुः शुचः ॥ ४४
हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करुणानाथवत्सल ।
त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजाः ॥४५
त्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरुषर्षभ ।
न शोभते वयमिव निवृत्तोत्सवमंगला ॥४६
अनागसां त्वं भूतानां कृतवान् द्रोहमुल्बणम् ।
तेनेमां भो दशां नीतो भूतध्रुक् को लभेत शम् ॥४७
सर्वेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्ययः ।
गोप्ता च तदवध्यायी न क्वचित् सुखमेधते ॥ ४८
श्रीशुक उवाच
राजयोषित आश्वास्य भगवाँल्लोकभावनः ।
यामाहुर्लौकिकीं संस्थां हतानां समकारयत् ॥४९
मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात् ।
कृष्णरामौ ववन्दाते शिरसाऽऽस्पृश्य पादयोः ॥ ५०
उस समय आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। भगवान्के विभूतिस्वरूप ब्रह्मा, शंकर आदि देवता बड़े आनन्दसे पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे । अप्सराएँ नाचने लगीं ॥४२ ॥ महाराज! कंस और उसके भाइयोंकी स्त्रियाँ अपने आत्मीय स्वजनोंकी मृत्युसे
अत्यन्त दुःखित हुईं । वे अपने सिर पीटती हुई आँखोंमें आँसू भरे वहाँ आयीं ॥ ४३ ॥
वीरशय्यापर सोये हुए अपने पतियोंसे लिपटकर वे शोकग्रस्त हो गयीं और बार- बार आँसू
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बहाती हुई ऊँचे स्वरसे विलाप करने लगीं ॥ ४४ ॥ ' हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे
करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्युसे हम सबकी मृत्यु हो गयी । आज हमारे घर उजड़ गये । हमारी सन्तान अनाथ हो गयी ॥ ४५ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! इस पुरीके आप ही स्वामी थे ।
आपके विरहसे इसके उत्सव समाप्त हो गये और मंगलचिह्न उतर गये । यह हमारी ही भाँति विधवा होकर शोभाहीन हो गयी || ४६ || स्वामी! आपने निरपराध प्राणियोंके साथ घोर द्रोह किया था, अन्याय किया था; इसीसे आपकी यह गति हुई । सच है, जो जगत्के जीवोंसे द्रोह करता है, उनका अहित करता है, ऐसा कौन पुरुष शान्ति पा सकता है? ॥४७ ॥ ये भगवान्
श्रीकृष्ण जगत्के समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके आधार हैं । यही रक्षक भी हैं । जो इनका बुरा चाहता है, इनका तिरस्कार करता है; वह कभी सुखी नहीं हो सकता ॥४८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे संसारके जीवनदाता हैं । उन्होंने रानियोंको ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी, फिर लोक- रीतिके अनुसार मरनेवालोंका जैसा क्रिया - कर्म होता है, वह सब कराया ॥ ४९ ॥
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बल- रामजीने जेलमें जाकर अपने माता - पिताको बन्धनसे छुड़ाया और सिरसे स्पर्श करके उनके चरणोंकी वन्दना की ॥५० ॥
देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदीश्वरौ ।
कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङकितौ ॥ ५१
किंतु अपने पुत्रोंके प्रणाम करनेपर भी देवकी और वसुदेवने उन्हें जगदीश्वर समझकर अपने हृदयसे नहीं लगाया । उन्हें शंका हो गयी कि हम जगदीश्वरको पुत्र कैसे समझें ॥५१ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कंसवधो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४४ ॥
* स्त्रियाँ जहाँ बातें कर रही थीं, वहाँसे निकट ही वसुदेव-देवकी कैद थे, अतः वे उनकी बातें सुन सके ।
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अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्ण - बलरामका यज्ञोपवीत और गुरुकुलप्रवेश श्रीशुक उवाच
पितरावुपलब्धार्थी विदित्वा पुरुषोत्तमः ।
मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥१
उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः ।
प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम् ॥२
नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि ।
बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामभवन् क्वचित् ॥३
न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके ।
यां बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥४
सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः ।
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥५
यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च ।
वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि माता-पिताको मेरे ऐश्वर्यका, मेरे भगवद्भावका ज्ञान हो गया है, परंतु इन्हें ऐसा ज्ञान होना ठीक नहीं, ( इससे तो ये पुत्र - स्नेहका सुख नहीं पा सकेंगे - ) ऐसा सोचकर उन्होंने उनपर अपनी वह योगमाया फैला दी, जो उनके स्वजनोंको मुग्ध रखकर उनकी लीलामें सहायक होती है ॥ १ ॥
यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ अपने माँ-बापके पास जाकर आदरपूर्वक और विनयसे झुककर ' मेरी अम्मा! मेरे पिताजी! ' इन शब्दोंसे उन्हें प्रसन्न करते हुए कहने लगे— ॥२ ॥ ' पिताजी! माताजी! हम आपके पुत्र हैं और आप हमारे लिये सर्वदा
उत्कण्ठित रहे हैं, फिर भी आप हमारे बाल्य, पौगण्ड और किशोर- अवस्थाका सुख हमसे नहीं पा सके ॥३ ॥ दुर्दैववश हमलोगोंको आपके पास रहनेका सौभाग्य ही नहीं मिला ।
इसीसे बालकोंको माता- पिताके घरमें रहकर जो लाड़ - प्यारका सुख मिलता है, वह हमें भी नहीं मिल सका ॥४ ॥ पिता और माता ही इस शरीरको जन्म देते हैं और इसका लालन-पालन करते हैं । तब कहीं जाकर यह शरीर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षकी प्राप्तिका साधन
बनता है । यदि कोई मनुष्य सौ वर्षतक जीकर माता और पिताकी सेवा करता रहे, तब भी वह
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उनके उपकारसे उऋण नहीं हो सकता || ५ || जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ- बापकी शरीर और धनसे सेवा नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे उसके अपने शरीरका मांस खिलाते हैं ॥६ ॥ जो पुरुष समर्थ होकर भी बूढ़े माता- पिता, सती पत्नी, बालक, सन्तान,
गुरु, ब्राह्मण और शरणागतका भरण- पोषण नहीं करता — वह जीता हुआ भी मुर्देके समान ही है! ॥७ ॥ पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ ही बीत गये । क्योंकि कंसके भयसे सदा
उद्विग्नचित्त रहनेके कारण हम आपकी सेवा करनेमें असमर्थ रहे ॥८ ॥ मेरी माँ और मेरे
पिताजी! आप दोनों हमें क्षमा करें । हाय! दुष्ट कंसने आपको इतने इतने कष्ट दिये, परंतु हम परतन्त्र रहनेके कारण आपकी कोई सेवा - शुश्रूषा न कर सके ' ॥९ ॥
मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् ।
गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥७
तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः ।
मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८
तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः ।
अकुर्वतोव शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम् ॥९
श्रीशुक उवाच
इति मायामनुष्यस्य हरेर्विश्वात्मनो गिरा ।
मोहितावङ्कमारोप्य परिष्वज्यापतुर्मुदम् ॥ १०
सिंचन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ ।
न किंचिदूचतू राजन् बाष्पकण्ठौ विमोहितौ ॥११
एवमाश्वास्य पितरौ भगवान् देवकीसुतः ।
मातामहं तूग्रसेनं यदूनामकरोन्नृपम् ॥१२
आह चास्मान् महाराज प्रजाश्चाज्ञप्तुमर्हसि ।
ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने ॥१३
मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः ।
बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४
सर्वान् स्वाञ्ज्ञातिसंबन्धान् दिग्ध्यः कंसभयाकुलान् ।
यदुवृष्ण्यन्धकमधुदाशार्हकुकुरादिकान् ॥१५
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सभाजितान् समाश्वास्य विदेशावासकर्शितान् ।
न्यवासयत् स्वगेहेषु वित्तैः संतर्प्य विश्वकृत् ॥१६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अपनी लीलासे मनुष्य बने हुए विश्वात्मा श्रीहरिकी इस वाणीसे मोहित हो देवकी- वसुदेवने उन्हें गोदमें उठा लिया और हृदयसे चिपकाकर परमानन्द प्राप्त किया ॥१० ॥ राजन्! वे स्नेह-पाशसे बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये और
आँसुओंकी धारासे उनका अभिषेक करने लगे । यहाँतक कि आँसुओंके कारण गला रुँध जानेसे वे कुछ बोल भी न सके ॥११ ॥
देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार अपने माता- पिताको सान्त्वना देकर अपने नाना उग्रसेनको यदुवंशियोंका राजा बना दिया ॥१२ ॥ और उनसे कहा — ‘ महाराज! हम
आपकी प्रजा हैं । आप हमलोगोंपर शासन कीजिये । राजा ययातिका शाप होनेके कारण यदुवंशी राजसिंहासनपर नहीं बैठ सकते; ( परंतु मेरी ऐसी ही इच्छा है, इसलिये आपको कोई दोष न होगा || १३ || जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े - बड़े देवता भी
सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे। ' दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है ॥१४ ॥
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे विश्वके विधाता हैं। उन्होंने, जो कंसके भयसे व्याकुल होकर इधर- उधर भाग गये थे, उन यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह और कुकुर आदि वंशोंमें उत्पन्न समस्त सजातीय सम्बन्धियोंको ढूँढ़- ढूँढ़कर बुलवाया । उन्हें घरसे बाहर रहनेमें बड़ा क्लेश उठाना पड़ा था । भगवान्ने उनका सत्कार किया, सान्त्वना दी और उन्हें खूब धन- सम्पत्ति देकर तृप्त किया तथा अपने- अपने घरोंमें बसा दिया ॥ १५-१६ ॥
कृष्णसंकर्षणभुजैर्गुप्ता लब्धमनोरथाः ।
गृहेषु रेमिरे सिद्धाः कृष्णरामगतज्वराः ॥१७
वीक्षन्तोऽहरहः प्रीता मुकुन्दवदनाम्बुजम् ।
नित्यं प्रमुदितं श्रीमत् सदयस्मितवीक्षणम् ॥१८
तत्र प्रवयसोऽप्यासन् युवानोऽतिबलौजसः ।
पिबन्तोऽक्षैर्मुकुन्दस्य मुखाम्बुजसुधां मुहुः ॥१९
अथ नन्दं समासाद्य भगवान् देवकीसुतः ।
संकर्षणश्च राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतुः ॥२०
पितर्युवाभ्यां स्निग्धाभ्यां पोषितौ लालितौ भृशम् ।
पित्रोरभ्यधिका प्रीतिरात्मजेष्वात्मनोऽपि हि ॥२१
स पिता सा च जननी यौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत् ।
शिशून् बन्धुभिरुत्सृष्टानकल्पैः पोषरक्षणे ॥२२
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यात यूयं व्रजं तात वयं च स्नेहदुःखितान् ।
ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम् ॥ २३
एवं सान्त्वय्य भगवान् नन्दं सव्रजमच्युतः ।
वासोऽलंकारकुप्याद्यैरर्हयामास सादरम् ॥२४
इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्वलः ।
पूरयन्नश्रुभिर्नेत्रे सह गोपैर्व्रजं ययौ ॥२५
अब सारे- के - सारे यदुवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीके बाहुबलसे सुरक्षित थे । उनकी कृपासे उन्हें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं थी, दुःख नहीं था । उनके सारे मनोरथ सफल हो गये थे । वे कृतार्थ हो गये थे । अब वे अपने - अपने घरोंमें आनन्दसे विहार करने लगे ॥१७ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका वदन आनन्दका सदन है । वह नित्य प्रफुल्लित, कभी न
कुम्हलानेवाला कमल है । उसका सौन्दर्य अपार है । सदय हास और चितवन उसपर सदा नाचती रहती है । यदुवंशी दिन-प्रतिदिन उसका दर्शन करके आनन्दमग्न रहते ॥१८ ॥
मथुराके वृद्ध पुरुष भी युवकोंके समान अत्यन्त बलवान् और उत्साही हो गये थे; क्योंकि वे अपने नेत्रोंके दोनोंसे बारंबार भगवान्के मुखारविन्दका अमृतमय मकरन्द - रस पान करते रहते थे ॥१९ ॥
प्रिय परीक्षित्! अब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबाके पास आये और गले लगनेके बाद उनसे कहने लगे- || २० || ' पिताजी! आपने और माँ यशोदाने बड़े स्नेह और दुलारसे हमारा लालन- पालन किया है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता- पिता सन्तानपर अपने शरीरसे भी अधिक स्नेह करते हैं || २१ || जिन्हें पालन- पोषण न कर सकनेके कारण स्वजन सम्बन्धियोंने त्याग दिया है, उन बालकोंको जो लोग अपने पुत्रके समान लाड़ - प्यारसे पालते हैं, वे ही वास्तवमें उनके माँ- बाप हैं ॥२२ ॥ पिताजी! अब
आपलोग व्रजमें जाइये । इसमें सन्देह नहीं कि हमारे बिना वात्सल्य- स्नेहके कारण आपलोगोंको बहुत दुःख होगा । यहाँके सुहृद् - सम्बन्धियोंको सुखी करके हम आपलोगोंसे मिलनेके लिये आयेंगे ’ ॥२३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने नन्दबाबा और दूसरे व्रजवासियोंको इस
प्रकार समझा- बुझाकर बड़े आदरके साथ वस्त्र, आभूषण और अनेक धातुओंके बने बरतन आदि देकर उनका सत्कार किया || २४ || भगवान्की बात सुनकर नन्द बाबाने प्रेमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले लगा लिया और फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर गोपोंके साथ व्रजके लिये प्रस्थान किया ॥२५ ॥
अथ शूरसुतो राजन् पुत्रयोः समकारयत् ।
पुरोधसा ब्राह्मणैश्च यथावद् द्विजसंस्कृतिम् ॥२६
तेभ्योऽदाद् दक्षिणा गावो रुक्ममालाः स्वलंकृताः ।
स्वलंकृतेभ्यः संपूज्य सवत्साः क्षौममालिनीः ॥ २७
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याः कृष्णरामजन्मर्क्षे मनोदत्ता महामतिः ।
ताश्चाददादनुस्मृत्य कंसेनाधर्मतो हृताः ॥२८
ततश्च लब्धसंस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ ।
गर्गाद् यदुकुलाचार्याद् गायत्रं व्रतमास्थितौ ॥२९
प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्वरौ ।
नान्यसिद्धामलज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः ॥३०
अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः ।
काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवासिनम् ॥३१
यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम् ।
ग्राहयन्तावुपेतौ स्म भक्त्या देवमिवादृतौ ॥ ३२
तयोर्द्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः ।
प्रोवाच वेदानखिलान् सांगोपनिषदो गुरुः ॥ ३३
हे राजन्! इसके बाद वसुदेवजीने अपने पुरोहित गर्गाचार्य तथा दूसरे ब्राह्मणोंसे दोनों पुत्रोंका विधिपूर्वक द्विजाति-समुचित यज्ञोरवीत संस्कार करवाया || २६ ॥ उन्होंने विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें बहुत- सी दक्षिणा तथा बछड़ोंवाली गौएँ दीं । सभी गौएँ गलेमें सोनेकी माला पहने हुए थीं तथा और भी बहुतसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रोंकी मालाओंसे विभूषित थीं ॥ २७ ॥ महामति वसुदेवजीने भगवान्
श्रीकृष्ण और बलरामजीके जन्म नक्षत्रमें जितनी गौएँ मन - ही - मन संकल्प करके दी थीं, उन्हें पहले कंसने अन्यायसे छीन लिया था । अब उनका स्मरण करके उन्होंने ब्राह्मणोंको वे फिरसे दीं ॥२८ ॥ इस प्रकार यदुवंशके आचार्य गर्गजीसे संस्कार कराकर बलरामजी और भगवान्
श्रीकृष्ण द्विजत्वको प्राप्त हुए । उनका ब्रह्मचर्यव्रत अखण्ड तो था ही, अब उन्होंने गायत्रीपूर्वक अध्ययन करनेके लिये उसे नियमतः स्वीकार किया ॥ २ ९ ॥ श्रीकृष्ण और बलराम जगत्के एकमात्र स्वामी हैं । सर्वज्ञ हैं । सभी विद्याएँ उन्हींसे निकली हैं । उनका निर्मल ज्ञान स्वतःसिद्ध है । फिर भी उन्होंने मनुष्यकी- सी लीला करके उसे छिपा रखा था ॥३० ॥
अब वे दोनों गुरुकुलमें निवास करनेकी इच्छासे काश्यपगोत्री सान्दीपनि मुनिके पास गये, जो अवन्तीपुर ( उज्जैन ) में रहते थे || ३१ || वे दोनों भाई विधिपूर्वक गुरुजीके पास रहने लगे । उस समय वे बड़े ही सुसंयत, अपनी चेष्टाओंको सर्वथा नियमित रखे हुए थे । गुरुजी तो उनका आदर करते ही थे, भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी भी गुरुकी उत्तम सेवा कैसे करनी चाहिये, इसका आदर्श लोगोंके सामने रखते हुए बड़ी भक्तिसे इष्टदेवके समान उनकी सेवा करने लगे ॥३२ ॥ गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी शुद्धभावसे युक्त सेवासे बहुत प्रसन्न हुए ।
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उन्होंने दोनों भाइयोंको छहों अंग और उपनिषदोंके सहित सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा दी || ३३ ॥ इनके सिवा मन्त्र और देवताओंके ज्ञानके साथ धनुर्वेद, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, मीमांसा आदि, वेदोंका तात्पर्य बतलानेवाले शास्त्र, तर्कविद्या ( न्यायशास्त्र ) आदिकी भी शिक्षा दी । साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध और आश्रय - इन छः भेदोंसे युक्त राजनीतिका भी अध्ययन कराया ॥३४ ॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम सारी विद्याओंके प्रवर्तक
हैं । इस समय केवल श्रेष्ठ मनुष्यका- सा व्यवहार करते हुए ही वे अध्ययन कर रहे थे । उन्होंने गुरुजीके केवल एक बार कहनेमात्रसे सारी विद्याएँ सीख लीं ॥ ३५ ॥ केवल चौंसठ दिन-रातमें ही संयमीशिरोमणि दोनों भाइयोंने चौंसठों कलाओंका * ज्ञान प्राप्त कर लिया । इस
प्रकार अध्ययन समाप्त होनेपर उन्होंने सान्दीपनि मुनिसे प्रार्थना की कि ‘ आपकी जो इच्छा हो, गुरु-दक्षिणा माँग लें ' ॥ ३६ ॥ महाराज! सान्दीपनि मुनिने उनकी अद्भुत महिमा और
अलौकिक बुद्धिका अनुभव कर लिया था । इसलिये उन्होंने अपनी पत्नीसे सलाह करके यह गुरुदक्षिणा माँगी कि ‘ प्रभासक्षेत्रमें हमारा बालक समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे तुमलोग ला दो ' || ३७ ||
सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपथांस्तथा ।
तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्विधाम् ॥३४
सर्वं नरवरश्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ ।
सकृन्निगदमात्रेण तौ संजगृहतुर्नृप ॥३५
अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या संयत्तौ तावतीः कलाः ।
गुरुदक्षिणयाऽऽचार्यं छन्दयामासतुर्नृप ॥३६
द्विजस्तयोस्तं महिमानमद्भुतं संलक्ष्य राजन्नतिमानुषीं मतिम् । सम्मन्त्र्य पत्न्या स महार्णवे मृतं बालं प्रभासे वरयाम्बभूव ह ॥३७ तथेत्यथारुह्य महारथौ रथं प्रभासमासाद्य दुरन्तविक्रमौ । वेलामुपव्रज्य निषीदतुः क्षणं सिन्धुर्विदित्वार्हणमाहरत्तयोः ॥ ३८
तमाह भगवानाशु गुरुपुत्रः प्रदीयताम् ।
योऽसाविह त्वया ग्रस्तो बालको महतोर्मिणा ॥३९