श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 701–710

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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पद्भ्यां विनिर्ययौ द्रष्टुं भवान्याः पादपल्लवम् ।

सा चानुध्यायती सम्यङ्मुकुन्दचरणाम्बुजम् ॥४०

यतवाङ्मातृभिः सार्धं सखीभिः परिवारिता ।

गुप्ता राजभटैः शूरैः सन्नद्धैरुद्यतायुधैः ।

मृदंगशंखपणवास्तूर्यभेर्यश्च जघ्निरे ॥४१

नानोपहारबलिभिर्वारमुख्याः सहस्रशः ।

स्रग्गन्धवस्त्राभरणैर्द्विजपत्न्यः स्वलंकृताः ॥४२

गायन्तश्च स्तुवन्तश्च गायका वाद्यवादकाः ।

परिवार्य वधूं जग्मुः सूतमागधवन्दिनः ॥४३

आसाद्य देवीसदनं धौतपादकराम्बुजा ।

उपस्पृश्य शुचिः शान्ता प्रविवेशाम्बिकान्तिकम् ॥४४

तां वै प्रवयसो बालां विधिज्ञा विप्रयोषितः ।

भवानीं वन्दयांचक्रुर्भवपत्नीं भवान्विताम् ॥४५

परीक्षित्! जिस समय प्रेम-परवश होकर पुरवासी- लोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी समय रुक्मिणीजी अन्तःपुरसे निकलकर देवीजीके मन्दिरके लिये चलीं । बहुत- से सैनिक उनकी रक्षामें नियुक्त थे || ३ ९ || वे प्रेममूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रके चरण -कमलोंका चिन्तन करती हुई भगवती भवानीके पाद- पल्लवोंका दर्शन करनेके लिये पैदल ही चलीं ॥४० ॥ वे

स्वयं मौन थीं और माताएँ तथा सखी- सहेलियाँ सब ओरसे उन्हें घेरे हुए थीं । शूरवीर राजसैनिक हाथोंमें अस्त्र- शस्त्र उठाये, कवच पहने उनकी रक्षा कर रहे थे । उस समय मृदंग, शंख, ढोल, तुरही और भेरी आदि बाजे बज रहे थे ॥४१ ॥

बहुत - सी ब्राह्मणपत्नियाँ पुष्पमाला, चन्दन आदि सुगन्ध- द्रव्य और गहने- कपड़ोंसे सज-धजकर साथ- साथ चल रही थीं और अनेकों प्रकारके उपहार तथा पूजन आदिकी सामग्री लेकर सहस्रों श्रेष्ठ वाराङ्गनाएँ भी साथ थीं ॥४२ ॥ गवैये गाते जाते थे, बाजेवाले बाजे बजाते

चलते थे और सूत, मागध तथा वंदीजन दुलहिनके चारों ओर जय -जयकार करते — विरद बखानते जा रहे थे ॥४३ ॥ देवीजीके मन्दिरमें पहुँचकर रुक्मिणीजीने अपने कमलके सदृश

सुकोमल हाथ - पैर धोये, आचमन किया; इसके बाद बाहर- भीतरसे पवित्र एवं शान्तभावसे युक्त होकर अम्बिकादेवीके मन्दिरमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥ बहुत- सी विधि-विधान जाननेवाली

बड़ी - बूढ़ी ब्राह्मणियाँ उनके साथ थीं । उन्होंने भगवान् शंकरकी अर्द्धांगिनी भवानीको और भगवान् शंकरजीको भी रुक्मिणीजीसे प्रणाम करवाया || ४५ || रुक्मिणीजीने भगवतीसे प्रार्थना की — ‘ अम्बिकामाता! आपकी गोदमें बैठे हुए आपके प्रिय पुत्र गणेशजीको तथा

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आपको मैं बार- बार नमस्कार करती हूँ । आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मेरी अभिलाषा पूर्ण हो । भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों' ॥ ४६ ॥ इसके बाद रुक्मिणीजीने जल, गन्ध, अक्षत,

धूप, वस्त्र, पुष्पमाला, हार, आभूषण, अनेकों प्रकारके नैवेद्य, भेंट और आरती आदि सामग्रियोंसे अम्बिकादेवीकी पूजा की ॥ ४७ ॥ तदनन्तर उक्त सामग्रियोंसे तथा नमक, पूआ,

पान, कण्ठसूत्र, फल और ईखसे सुहागिन ब्राह्मणियोंकी भी पूजा की ॥४८ ॥ तब

ब्राह्मणियोंने उन्हें प्रसाद देकर आशीर्वाद दिये और दुलहिनने ब्राह्मणियों और माता अम्बिकाको नमस्कार करके प्रसाद ग्रहण किया ॥ ४९ ॥ पूजा-अर्चाकी विधि समाप्त हो

जानेपर उन्होंने मौनव्रत तोड़ दिया और रत्नजटित अँगूठीसे जगमगाते हुए करकमलके द्वारा एक सहेलीका हाथ पकड़कर वे गिरिजामन्दिरसे बाहर निकलीं ॥ ५० ॥

नमस्ये त्वाम्बिकेऽभीक्ष्णं स्वसन्तानयुतां शिवाम् ।

भूयात् पतिर्मे भगवान् कृष्णस्तदनुमोदताम् ॥४६

अद्भिर्गन्धाक्षतैर्धूपैर्वासः स्रङ्माल्यभूषणैः ।

नानोपहारबलिभिः प्रदीपावलिभिः पृथक् ॥४७

विप्रस्त्रियः पतिमतीस्तथा तैःसमपूजयत् लवणापूपताम्बूलकण्ठसूत्रफलेक्षुभिः ॥४८

तस्यै स्त्रियस्ताः प्रददुः शेषां युयुजुराशिषः ।

ताभ्यो देव्यै नमश्चक्रे शेषां च जगृहे वधूः ॥४९

मुनिव्रतमथ त्यक्त्वा निश्चक्रामाम्बिकागृहात् ।

प्रगृह्य पाणिना भृत्यां रत्नमुद्रोपशोभिना ॥५०

तां देवमायामिव वीरमोहिनीं सुमध्यमां कुण्डलमण्डिताननाम् । श्यामां नितम्बार्पितरत्नमेखलां व्यञ्जत्स्तनीं कुन्तलशंकितेक्षणाम् ॥५१ शुचिस्मितां बिम्बफलाधरद्युति- शोणायमानद्विजकुन्दकुड्मलाम् । पदा चलन्तीं कलहंसगामिनीं शिंजत्कलानूपुरधामशोभिना । विलोक्य वीरा मुमुहुः समागता

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यशस्विनस्तत्कृतहृच्छयार्दिताः ॥ ५२ परीक्षित्! रुक्मिणीजी भगवान्‌की मायाके समान ही बड़े - बड़े धीर- वीरोंको भी मोहित कर लेनेवाली थीं । उनका कटिभाग बहुत ही सुन्दर और पतला था । मुखमण्डलपर कुण्डलोंकी शोभा जगमगा रही थी । वे किशोर और तरुण अवस्थाकी सन्धिमें स्थित थीं । नितम्बपर जड़ाऊ करधनी शोभायमान हो रही थी, वक्षःस्थल कुछ उभरे हुए थे और उनकी दृष्टि लटकती हुई अलकोंके कारण कुछ चंचल हो रही थी ॥ ५१ ॥

उनके होठोंपर मनोहर मुसकान थी । उनके दाँतोंकी पाँत थी तो कुन्दकलीके समान परम उज्ज्वल, परन्तु पके हुए कुँदरूके समान लाल- लाल होठोंकी चमकसे उसपर भी लालिमा आ गयी थी । उनके पाँवोंके पायजेब चमक रहे थे और उनमें लगे हुए छोटे - छोटे घुँघरू रुनझुन-रुनझुन कर रहे थे । वे अपने सुकुमार चरण- कमलोंसे पैदल ही राजहंसकी गतिसे चल रही थीं । उनकी वह अपूर्व छबि देखकर वहाँ आये हुए बड़े - बड़े यशस्वी वीर सब मोहित हो गये । कामदेवने ही भगवान्‌का कार्य सिद्ध करनेके लिये अपने बाणोंसे उनका हृदय जर्जर कर दिया ॥५२ ॥ रुक्मिणीजी इस प्रकार इस उत्सवयात्राके बहाने मन्द मन्द गतिसे चलकर

भगवान् श्रीकृष्णपर अपना राशि- राशि सौन्दर्य निछावर कर रही थीं । उन्हें देखकर और उनकी खुली मुसकान तथा लजीली चितवनपर अपना चित्त लुटाकर वे बड़े - बड़े नरपति एवं वीर इतने मोहित और बेहोश हो गये कि उनके हाथोंसे अस्त्र - शस्त्र छूटकर गिर पड़े और वे स्वयं भी रथ, हाथी तथा घोड़ोंसे धरतीपर आ गिरे ॥५३ ॥ इस प्रकार रुक्मिणीजी भगवान्

श्रीकृष्णके शुभागमनकी प्रतीक्षा करती हुई अपने कमलकी कलीके समान सुकुमार चरणोंको बहुत ही धीरे- धीरे आगे बढ़ा रही थीं । उन्होंने अपने बायें हाथकी अँगुलियोंसे मुखकी ओर लटकती हुई अलकें हटायीं और वहाँ आये हुए नरपतियोंकी ओर लजीली चितवनसे देखा । असी समय उन्हें श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन हुए || ५४ || राजकुमारी रुक्मिणीजी रथपर चढ़ना ही चाहती थीं कि भगवान् श्रीकृष्णने समस्त शत्रुओंके देखते -देखते उनकी भीड़मेंसे रुक्मिणीजीको उठा लिया और उन सैकड़ों राजाओंके सिरपर पाँव रखकर उन्हें अपने उस रथपर बैठा लिया, जिसकी ध्वजापर गरुड़का चिह्न लगा हुआ था ॥५५ ॥ इसके

बाद जैसे सिंह सियारोंके बीचमेंसे अपना भाग ले जाय, वैसे ही रुक्मिणीजीको लेकर भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी आदि यदुवंशियोंके साथ वहाँसे चल पड़े ॥ ५६ ॥ उस समय

जरासन्धके वशवर्ती अभिमानी राजाओंको अपना यह बड़ा भारी तिरस्कार और यश-कीर्तिका नाश सहन न हुआ । वे सब- के -सब चिढ़कर कहने लगे-' अहो, हमें धिक्कार है । आज हमलोग धनुष धारण करके खड़े ही रहे और ये ग्वाले, जैसे सिंहके भागको हरिन ले जाय उसी प्रकार हमारा सारा यश छीन ले गये ' ॥५७ ॥

यां वीक्ष्य ते नृपतयस्तदुदारहास- व्रीडावलोकहृतचेतस उज्झितास्त्राः । पेतुः क्षितौ गजरथाश्वगता विमूढा यात्राच्छलेन हरयेऽर्पयतीं स्वशोभाम् ॥५३

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सैवं शनैश्चलयती चलपद्मकोशौ प्राप्तिं तदा भगवतः प्रसमीक्षमाणा । उत्सार्य वामकरजैरलकानपाङ्गैः प्राप्तान् ह्रियैक्षत नृपान् ददृशेऽच्युतं सा ॥५४ तां राजकन्यां रथमारुरुक्षतीं जहार कृष्णो द्विषतां समीक्षताम् । रथं समारोप्य सुपर्णलक्षणं राजन्यचक्रं परिभूय माधवः ॥५५ ततो ययौ रामपुरोगमैः शनैः सृगालमध्यादिव भागहृद्धरिः ॥५६ तं मानिनः स्वाभिभवं यशःक्षयं परे जरासन्धवशा न सेहिरे । अहो धिगस्मान् यश आत्तधन्वनां गोपैर्हृतं केसरिणां मृगैरिव ॥५७ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे रुक्मिणीहरण् त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३ ॥

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अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः शिशुपालके साथी राजाओंकी और रुक्मीकी हार तथा श्रीकृष्ण-रुक्मिणी- विवाह श्रीशुक उवाच

इति सर्वे सुसंरब्धा वाहानारुह्य दंशिताः ।

स्वैः स्वैर्बलैः परिक्रान्ता अन्वीयुर्धृतकार्मुकाः ॥ १

तानापतत आलोक्य यादवानीकयूथपाः ।

तस्थुस्तत्संमुखा राजन्विस्फूर्ज्य स्वधनूंषि ते ॥ २

अश्वपृष्ठे गजस्कन्धे रथोपस्थे च कोविदाः ।

मुमुचुः शरवर्षाणि मेघा अद्रिष्वपो यथा ॥३

पत्युर्बलं शरासारैश्छन्नं वीक्ष्य सुमध्यमा ।

सव्रीडमैक्षत्तद्वक्त्रं भयविह्वललोचना ॥४

प्रहस्य भगवानाह मा स्म भैर्वामलोचने ।

विनंक्ष्यत्यधुनैवैतत् तावकैः शात्रवं बलम् ॥५

तेषां तद्विक्रमं वीरा गदसंकर्षणादयः ।

अमृष्यमाणा नाराचैर्जघ्नुर्हयगजान् रथान् ॥६

पेतुः शिरांसि रथिनामश्विनां गजिनां भुवि ।

सकुण्डलकिरीटानि सोष्णीषाणि च कोटिशः ॥७

हस्ताः सासिगदेष्वासाः करभा ऊरवोऽङ्घ्रयः ।

अश्वाश्वतरनागोष्ट्रखरमर्त्यशिरांसि च ॥८

हन्यमानबलानीका वृष्णिभिर्जयकांक्षिभिः ।

राजानो विमुखा जग्मुर्जरासन्धपुरःसराः ॥ ९

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार कह सुनकर सब - के - सब राजा क्रोधसे आगबबूला हो उठे और कवच पहनकर अपने - अपने वाहनोंपर सवार हो गये । अपनी - अपनी सेनाके साथ सब धनुष ले-लेकर भगवान् श्रीकृष्णके पीछे दौड़े ॥१ ॥ राजन्! जब

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यदुवंशियोंके सेनापतियोंने देखा कि शत्रुदल हमपर चढ़ा आ रहा है, तब उन्होंने भी अपने-अपने धनुषका टंकार किया और घूमकर उनके सामने डट गये || २ || जरासन्धकी सेनाके लोग कोई घोड़ेपर, कोई हाथीपर, तो कोई रथपर चढ़े हुए थे । वे सभी धनुर्वेदके बड़े मर्मज्ञ थे । वे यदुवंशियोंपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगे, मानो दल- के -दल बादल पहाड़ोंपर मूसलधार पानी बरसा रहे हों ॥३ ॥ परमसुन्दरी रुक्मिणीजीने देखा कि उनके पति

श्रीकृष्णकी सेना बाण- वर्षासे ढक गयी है । तब उन्होंने लज्जाके साथ भयभीत नेत्रोंसे भगवान् श्रीकृष्णके मुखकी ओर देखा ॥४ ॥ भगवान्ने हँसकर कहा- ' सुन्दरी! डरो मत ।

तुम्हारी सेना अभी तुम्हारे शत्रुओंकी सेनाको नष्ट किये डालती है ' || ५|| इधर गद और संकर्षण आदि यदुवंशी वीर अपने शत्रुओंका पराक्रम और अधिक न सह सके । वे अपने बाणोंसे शत्रुओंके हाथी, घोड़े तथा रथोंको छिन्न-भिन्न करने लगे ॥६ ॥ उनके बाणोंसे रथ,

घोड़े और हाथियोंपर बैठे विपक्षी वीरोंके कुण्डल, किरीट और पगड़ियोंसे सुशोभित करोड़ों सिर, खड्ग, गदा और धनुषयुक्त हाथ, पहुँचे, जाँघें और पैर कट- कटकर पृथ्वीपर गिरने लगे । इसी प्रकार घोड़े, खच्चर, हाथी, ऊँट, गधे और मनुष्योंके सिर भी कट- कटकर रण - भूमिमें लोटने लगे ॥७-८ ॥ अन्तमें विजयकी सच्ची आकांक्षावाले यदुवंशियोंने शत्रुओंकी सेना तहस- नहस कर डाली । जरासन्ध आदि सभी राजा युद्धसे पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए ॥९ ॥

शिशुपालं समभ्येत्य हृतदारमिवातुरम् ।

नष्टत्विषं गतोत्साहं शुष्यद्वदनमब्रुवन् ॥१०

भो भोः पुरुषशार्दूल दौर्मनस्यमिदं त्यज ।

न प्रियाप्रिययो राजन् निष्ठा देहिषु दृश्यते ॥ ११

यथा दारुमयी योषिन्नृत्यते कुहकेच्छया ।

एवमीश्वरतन्त्रोऽयमीहते सुखदुःखयोः ॥१२

शौरेः सप्तदशाहं वै संयुगानि पराजितः ।

त्रयोविंशतिभिः सैन्यैर्जिग्य एकमहं परम् ॥१३

तथाप्यहं न शोचामि न प्रहृष्यामि कर्हिचित् ।

कालेन दैवयुक्तेन जानन् विद्रावितं जगत् ॥१४

अधुनापि वयं सर्वे वीरयूथपयूथपाः ।

पराजिताः फल्गुतन्त्रैर्यदुभिः कृष्णपालितैः ॥ १५

रिपवो जिग्युरधुना काल आत्मानुसारिणि ।

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तदा वयं विजेष्यामो यदा कालः प्रदक्षिणः ॥१६

एवं प्रबोधितो मित्रैश्चैद्योऽगात् सानुगः पुरम् ।

हतशेषाः पुनस्तेऽपि ययुः स्वं स्वं पुरं नृपाः ॥१७

रुक्मी तु राक्षसोद्वाहं कृष्णद्विडसहन् स्वसुः ।

पृष्ठतोऽन्वगमत् कृष्णमक्षौहिण्या वृतो बली ॥ १८

उधर शिशुपाल अपनी भावी पत्नीके छिन जानेके कारण मरणासन्न- सा हो रहा था । न तो उसके हृदयमें उत्साह रह गया था और न तो शरीरपर कान्ति । उसका मुँह सूख रहा था । उसके पास जाकर जरासन्ध कहने लगा- ॥१० ॥ ' शिशुपालजी! आप तो एक श्रेष्ठ पुरुष

हैं, यह उदासी छोड़ दीजिये । क्योंकि राजन्! कोई भी बात सर्वदा अपने मनके अनुकूल ही हो या प्रतिकूल, इस सम्बन्धमें कुछ स्थिरता किसी भी प्राणीके जीवनमें नहीं देखी जाती ॥११ ॥

जैसे कठपुतली बाजीगरकी इच्छाके अनुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवदिच्छाके अधीन रहकर सुख और दुःखके सम्बन्धमें यथाशक्ति चेष्टा करता रहता है ॥१२ ॥ देखिये,

श्रीकृष्णने मुझे तेईस- तेईस अक्षौहिणी सेनाओंके साथ सत्रह बार हरा दिया, मैंने केवल एक बार — अठारहवीं बार उनपर विजय प्राप्त की ॥ १३ ॥ फिर भी इस बातको लेकर मैं न तो

कभी शोक करता हूँ और न तो कभी हर्ष; क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रारब्धके अनुसार काल भगवान् ही इस चराचर जगत्को झकझोरते रहते हैं ॥१४ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि हमलोग

बड़े - बड़े वीर सेनापतियोंके भी नायक हैं । फिर भी, इस समय श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित यदुवंशियोंकी थोड़ी - सी सेनाने हमें हरा दिया है ॥ १५॥ इस बार हमारे शत्रुओंकी ही जीत

हुई, क्योंकि काल उन्हींके अनुकूल था । जब काल हमारे दाहिने होगा, तब हम भी उन्हें जीत लेंगे' ॥१६ ॥ परीक्षित्! जब मित्रोंने इस प्रकार समझाया, तब चेदिराज शिशुपाल अपने

अनुयायियोंके साथ अपनी राजधानीको लौट गया और उसके मित्र राजा भी, जो मरनेसे बचे थे, अपने - अपने नगरोंको चले गये ॥१७ ॥

रुक्मिणीजीका बड़ा भाई रुक्मी भगवान् श्रीकृष्णसे बहुत द्वेष रखता था । उसको यह बात बिलकुल सहन न हुई कि मेरी बहिनको श्रीकृष्ण हर ले जायँ और राक्षसरीतिसे बलपूर्वक उसके साथ विवाह करें। रुक्मी बली तो था ही, उसने एक अक्षौहिणी सेना साथ ले ली और श्रीकृष्णका पीछा किया || १८ || महाबाहु रुक्मी क्रोधके मारे जल रहा था । उसने कवच पहनकर और धनुष धारण करके समस्त नरपतियोंके सामने यह प्रतिज्ञा की I ॥१९ ॥ ‘ मैं आपलोगोंके बीचमें यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्धमें श्रीकृष्णको न मार

सका और अपनी बहिन रुक्मिणीको न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा' ॥२० ॥ परीक्षित्! यह कहकर वह रथपर सवार हो गया और सारथिसे बोला

—' जहाँ कृष्ण हो वहाँ शीघ्र से शीघ्र मेरा रथ ले चलो । आज मेरा उसीके साथ युद्ध होगा ॥२१ ॥ आज मैं अपने तीखे बाणोंसे उस खोटी बुद्धिवाले ग्वालेके बल- वीर्यका घमंड

चूर- चूर कर दूँगा । देखो तो उसका साहस, वह हमारी बहिनको बलपूर्वक हर ले गया

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है ' ॥२२ ॥ परीक्षित्! रुक्मीकी बुद्धि बिगड़ गयी थी । वह भगवान्के तेज-प्रभावको बिलकुल

नहीं जानता था । इसीसे इस प्रकार बहक - बहककर बातें करता हुआ वह एक ही रथसे श्रीकृष्णके पास पहुँचकर ललकारने लगा -' खड़ा रह! खड़ा रह! ' ॥२३ ॥ उसने अपने

धनुषको बलपूर्वक खींचकर भगवान् श्रीकृष्णको तीन बाण मारे और कहा – ' एक क्षण मेरे सामने ठहर! यदुवंशियोंके कुलकलंक! जैसे कौआ होमकी सामग्री चुराकर उड़ जाय, वैसे ही तू मेरी बहिनको चुराकर कहाँ भागा जा रहा है? अरे मन्द! तू बड़ा मायावी और कपट - युद्धमें कुशल है । आज मैं तेरा सारा गर्व खर्व किये डालता हूँ ॥ २४-२५ ॥ देख! जबतक मेरे बाण तुझे धरतीपर सुला नहीं देते, उसके पहले ही इस बच्चीको छोड़कर भाग जा । ' रुक्मीकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराने लगे । उन्होंने उसका धनुष काट डाला और उसपर छ: बाण छोड़े ॥२६ ॥ साथ ही भगवान् श्रीकृष्णने आठ बाण उसके चार घोड़ोंपर और दो

सारथिपर छोड़े और तीन बाणोंसे उसके रथकी ध्वजाको काट डाला । तब रुक्मीने दूसरा धनुष उठाया और भगवान् श्रीकृष्णको पाँच बाण मारे ॥ २७ ॥ उन बाणोंके लगनेपर उन्होंने

उसका वह धनुष भी काट डाला । रुक्मीने इसके बाद एक और धनुष लिया, परन्तु हाथमें लेते - ही- लेते अविनाशी अच्युतने उसे भी काट डाला || २८ || इस प्रकार रुक्मीने परिघ, पट्टिश, शूल, ढाल, तलवार, शक्ति और तोमर-जितने अस्त्र- शस्त्र उठाये, उन सभीको भगवान्ने प्रहार करनेके पहले ही काट डाला ॥ २ ९ ॥ अब रुक्मी क्रोधवश हाथमें तलवार लेकर भगवान् श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे रथसे कूद पड़ा और इस प्रकार उनकी ओर झपटा, जैसे पतिंगा आगकी ओर लपकता है ॥ ३० ॥ जब भगवान्ने देखा कि रुक्मी मुझपर

चोट करना चाहता है, तब उन्होंने अपने बाणोंसे उसकी ढाल-तलवारको तिल- तिल करके काट दिया और उसको मार डालनेके लिये हाथमें तीखी तलवार निकाल ली ॥ ३१ ॥ जब

रुक्मिणीजीने देखा कि ये तो हमारे भाईको अब मार ही डालना चाहते हैं, तब वे भयसे विह्वल हो गयीं और अपने प्रियतम पति भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर गिरकर करुण- स्वरमें बोलीं- ॥३२ ॥ ‘ देवताओंके भी आराध्यदेव! जगत्पते! आप योगेश्वर हैं । आपके स्वरूप

और इच्छाओंको कोई जान नहीं सकता । आप परम बलवान् हैं, परन्तु कल्याणस्वरूप भी तो हैं । प्रभो! मेरे भैयाको मारना आपके योग्य काम नहीं है ' ॥ ३३ ॥

रुक्म्यमर्षी सुसंरब्धः शृण्वतां सर्वभूभुजाम् ।

प्रतिजज्ञे महाबाहुर्दंशितः सशरासनः ॥१९

अहत्वा समरे कृष्णमप्रत्यूह्य च रुक्मिणीम् ।

कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ २०

इत्युक्त्वा रथमारुह्य सारथिं प्राह सत्वरः ।

चोदयाश्वान् यतः कृष्णस्तस्य मे संयुगं भवेत् ॥२१

अद्याहं निशितैर्बाणैर्गोपालस्य सुदुर्मतेः ।

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नेष्ये वीर्यमदं येन स्वसा मे प्रसभं हृता ॥२२

विकत्थमानः कुमतिरीश्वरस्याप्रमाणवित् ।

रथेनैकेन गोविन्दं तिष्ठ तिष्ठेत्यथाह्वयत् ॥२३

धनुर्विकृष्य सुदृढं जघ्ने कृष्णं त्रिभिः शरैः ।

आह चात्र क्षणं तिष्ठ यदूनां कुलपांसन ॥२४

कुत्र यासि स्वसारं मे मुषित्वा ध्वांक्षवद्धविः ।

हरिष्येऽद्य मदं मन्द मायिनः कूटयोधिनः ॥ २५

यावन्न मे हतो बाणैः शयीथा मुञ्च दारिकाम् ।

स्मय कृष्णो धनुश्छित्त्वा षड्भिर्विव्याध रुक्मिणम् ॥ २६

अष्टभिश्चतुरो वाहान् द्वाभ्यां सूतं ध्वजं त्रिभिः ।

स चान्यद् धनुरादाय कृष्णं विव्याध पञ्चभिः ॥२७

तैस्ताडितः शरौघैस्तु चिच्छेद धनुरच्युतः ।

पुनरन्यदुपादत्त तदप्यच्छिनदव्ययः ॥२८

परिघं पट्टिशं शूलं चर्मासी शक्तितोमरौ ।

यद् यदायुधमादत्त तत् सर्वं सोऽच्छिनद्धरिः ॥२९

ततो रथादवप्लुत्य खड्गपाणिर्जिघांसया ।

कृष्णमभ्यद्रवत् क्रुद्धः पतंग इव पावकम् ॥३०

तस्य चापततः खड्गं तिलशश्चर्म चेषुभिः ।

छित्त्वासिमाददे तिग्मं रुक्मिणं हन्तुमुद्यतः ॥३१

दृष्ट्वा भ्रातृवधोद्योगं रुक्मिणी भयविह्वला ।

पतित्वा पादयोर्भर्तुरुवाच करुणं सती ॥३२

योगेश्वराप्रमेयात्मन् देवदेव जगत्पते ।

हन्तुं नार्हसि कल्याण भ्रातरं मे महाभुज ॥३३

श्रीशुक उवाच

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तया परित्रासविकम्पितांगया शुचावशुष्यन्मुखरुद्धकण्ठया । कातर्यविस्रंसितहेममालया गृहीतपादः करुणो न्यवर्तत ॥३४ चैलेन बद्ध्वा तमसाधुकारिणं सश्मश्रुकेशं प्रवपन् व्यरूपयत् । तावन्ममर्दुः परसैन्यमद्भुतं यदुप्रवीरा नलिनीं यथा गजाः ॥३५ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - रुक्मिणीजीका एक-एक अंग भयके मारे थर- थर काँप रहा था । शोककी प्रबलतासे मुँह सूख गया था, गला रुँध गया था । आतुरतावश सोनेका हार गलेसे गिर पड़ा था और इसी अवस्थामें वे भगवान्के चरणकमल पकड़े हुए थीं । परमदयालु भगवान् उन्हें भयभीत देखकर करुणासे द्रवित हो गये । उन्होंने रुक्मीको मार डालनेका विचार छोड़ दिया ॥३४ ॥ फिर भी रुक्मी उनके अनिष्टकी चेष्टासे विमुख न हुआ । तब

भगवान् श्रीकृष्णने उसको उसीके दुपट्टेसे बाँध दिया और उसकी दाढ़ी-मूँछ तथा केश कई जगहसे मूँड़कर उसे कुरूप बना दिया। तबतक यदुवंशी वीरोंने शत्रुकी अद्भुत सेनाको -तहस- नहस कर डाला — ठीक वैसे ही, जैसे हाथी कमलवनको रौंद डालता है ॥३५ ॥ फिर वे

लोग उधरसे लौटकर श्रीकृष्णके पास आये तो देखा कि रुक्मी दुपट्टेसे बँधा हुआ अधमरी अवस्थामें पड़ा हुआ है । उसे देखकर सर्वशक्तिमान् भगवान् बलरामजीको बड़ी दया आयी और उन्होंने उसके बन्धन खोलकर उसे छोड़ दिया तथा श्रीकृष्णसे कहा- || ३६ || ' कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया । यह निन्दित कार्य हमलोगोंके योग्य नहीं है । अपने सम्बन्धीकी दाढ़ी - मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप कर देना, यह तो एक प्रकारका वध ही है ' ॥३७ ॥ इसके बाद

बलरामजीने रुक्मिणीको सम्बोधन करके कहा - ' साध्वी! तुम्हारे भाईका रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हमलोगोंसे बुरा न मानना; क्योंकि जीवको सुख-दुःख देनेवाला कोई दूसरा नहीं है । उसे तो अपने ही कर्मका फल भोगना पड़ता है ' ॥ ३८ ॥ अब श्रीकृष्णसे

बोले – ' कृष्ण! यदि अपना सगा सम्बन्धी वध करनेयोग्य अपराध करे तो भी अपने ही सम्बन्धियोंके द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है । उसे छोड़ देना चाहिये । वह तो अपने अपराधसे ही मर चुका है, मरे हुएको फिर क्या मारना? ' ॥ ३ ९ ॥ फिर रुक्मिणीजीसे बोले —‘साध्वी! ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाईको मार डालता है । इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है ' ॥ ४० ॥ इसके बाद श्रीकृष्णसे बोले

- ' भाई कृष्ण! यह ठीक है कि जो लोग धनके नशेमें अंधे हो रहे हैं और अभिमानी हैं, वे राज्य, पृथ्वी, पैसा, स्त्री, मान, तेज अथवा किसी और कारणसे अपने बन्धुओंका भी तिरस्कार कर दिया करते हैं ' ॥४१ ॥

कृष्णान्तिकमुपव्रज्य ददृशुस्तत्र रुक्मिणम् ।