श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 711–720
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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तथाभूतं हतप्रायं दृष्ट्वा संकर्षणो विभुः ।
विमुच्य बद्धं करुणो भगवान् कृष्णमब्रवीत् ॥ ३६
असाध्विदं त्वया कृष्ण कृतमस्मज्जुगुप्सितम् ।
वपनं श्मश्रुकेशानां वैरूप्यं सुहृदो वधः ॥३७
मैवास्मान् साध्व्यसूयेथा भ्रातुर्वैरूप्यचिन्तया ।
सुखदुःखदो न चान्योऽस्ति यतः स्वकृतभुक्पुमान् ॥३८
बन्धुर्वधार्हदोषोऽपि न बन्धोर्वधमर्हति ।
त्याज्यः स्वेनैव दोषेण हतः किं हन्यते पुनः ॥३९
क्षत्रियाणामयं धर्मः प्रजापतिविनिर्मितः ।
भ्रातापि भ्रातरं हन्याद् येन घोरतरस्ततः ॥४०
राज्यस्य भूमेर्वित्तस्य स्त्रियो मानस्य तेजसः ।
मानिनोऽन्यस्य वा हेतोः श्रीमदान्धाः क्षिपन्ति हि ॥४१
तवेयं विषमा बुद्धिः सर्वभूतेषु दुर्हृदाम् ।
यन्मन्यसे सदाभद्रं सुहृदां भद्रमज्ञवत् ॥४२
आत्ममोहो नृणामेष कल्प्यते देवमायया ।
सुहृद् दुर्हृदुदासीन इति देहात्ममानिनाम् ॥४३
अब वे रुक्मिणीजीसे बोले– ' साध्वी! तुम्हारे भाई- बन्धु समस्त प्राणियोंके प्रति दुर्भाव रखते हैं । हमने उनके मंगलके लिये ही उनके प्रति दण्डविधान किया है । उसे तुम अज्ञानियोंकी भाँति अमंगल मान रही हो, यह तुम्हारी बुद्धिकी विषमता है ॥४२ ॥ देवि! जो
लोग भगवान्की मायासे मोहित होकर देहको ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हींको ऐसा आत्ममोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है ॥४३ ॥ समस्त
देहधारियोंकी आत्मा एक ही है और कार्य- कारणसे, मायासे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है । जल और घड़ा आदि उपाधियोंके भेदसे जैसे सूर्य, चन्द्रमा आदि प्रकाशयुक्त पदार्थ और आकाश भिन्न - भिन्न मालूम पड़ते हैं; परन्तु हैं एक ही, वैसे ही मूर्ख लोग शरीरके भेदसे आत्माका भेद मानते हैं ॥ ४४ ॥ यह शरीर आदि और अन्तवाला है । पञ्चभूत, पञ्चप्राण,
तन्मात्रा और त्रिगुण ही इसका स्वरूप है । आत्मामें उसके अज्ञानसे ही इसकी कल्पना हुई है और वह कल्पित शरीर ही, जो उसे ' मैं समझता है ', उसको जन्म- मृत्युके चक्करमें ले जाता है ॥४५ ॥ साध्वी! नेत्र और रूप दोनों ही सूर्यके द्वारा प्रकाशित होते हैं । सूर्य ही उनका
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कारण है । इसलिये सूर्यके साथ नेत्र और रूपका न तो कभी वियोग होता है और न संयोग । इसी प्रकार समस्त संसारकी सत्ता आत्मसत्ताके कारण जान पड़ती है, समस्त संसारका प्रकाशक आत्मा ही है । फिर आत्माके साथ दूसरे असत् पदार्थोंका संयोग या वियोग हो ही कैसे सकता है? ॥४६ ॥ जन्म लेना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और मरना ये सारे विकार
शरीरके ही होते हैं, आत्माके नहीं । जैसे कृष्णपक्षमें कलाओंका ही क्षय होता है, चन्द्रमाका नहीं, परन्तु अमावस्याके दिन व्यवहारमें लोग चन्द्रमाका ही क्षय हुआ कहते - सुनते हैं; वैसे ही जन्म- मृत्यु आदि सारे विकार शरीरके ही होते हैं, परन्तु लोग उसे भ्रमवश अपना - अपने आत्माका मान लेते हैं ॥ ४७ ॥ जैसे सोया हुआ पुरुष किसी पदार्थके न होनेपर भी स्वप्नमें
भोक्ता, भोग्य और भोगरूप फलोंका अनुभव करता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग झूठमूठ संसार- चक्रका अनुभव करते हैं ॥४८ ॥ इसलिये साध्वी! अज्ञानके कारण होनेवाले इस
शोकको त्याग दो । यह शोक अन्तःकरणको मुरझा देता है, मोहित कर देता है । इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ ' ॥४९ ॥
एक एव परो ह्यात्मा सर्वेषामपि देहिनाम् ।
नानेव गृह्यते मूढैर्यथा ज्योतिर्यथा नभः ॥४४
देह आद्यन्तवानेष द्रव्यप्राणगुणात्मकः ।
आत्मन्यविद्यया क्लृप्तः संसारयति देहिनम् ॥४५
नात्मनोऽन्येन संयोगो वियोगश्चासतः सति ।
तद्धेतुत्वात्तत्प्रसिद्धेर्दृग्रूपाभ्यां यथा रवेः ॥४६
जन्मादयस्तु देहस्य विक्रिया नात्मनः क्वचित् ।
कलानामिव नैवेन्दोर्मृतिर्ह्यस्य कुहूरिव ॥४७
यथा शयान आत्मानं विषयान् फलमेव च ।
अनुभुङ्क्तेऽप्यसत्यर्थे तथाऽऽप्नोत्यबुधो भवम् ॥४८
तस्मादज्ञानजं शोकमात्मशोषविमोहनम् ।
तत्त्वज्ञानेन निर्हृत्य स्वस्था भव शुचिस्मिते ॥४९
श्रीशुक उवाच
एवं भगवता तन्वी रामेण प्रतिबोधिता ।
वैमनस्यं परित्यज्य मनो बुद्धया समादधे ॥५०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब बलरामजीने इस प्रकार समझाया, तब
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परमसुन्दरी रुक्मिणीजीने अपने मनका मैल मिटाकर विवेक- बुद्धिसे उसका समाधान किया ॥५० ॥ रुक्मीकी सेना और उसके तेजका नाश हो चुका था । केवल प्राण बच रहे थे ।
उसके चित्तकी सारी आशा- अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओंने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था । उसे अपने विरूप किये जानेकी कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी ॥५१ ॥ अतः उसने अपने रहनेके लिये भोजकट नामकी एक बहुत बड़ी नगरी बसायी ।
उसने पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि ' दुर्बुद्धि कृष्णको मारे बिना और अपनी छोटी बहिनको लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा । ' इसलिये क्रोध करके वह वहीं रहने लगा ॥५२ ॥
प्राणावशेष उत्सृष्टो द्विभिर्हतबलप्रभः ।
स्मरन् विरूपकरणं वितथात्ममनोरथः ॥५१
चक्रे भोजकटं नाम निवासाय महत् पुरम् ।
अहत्वा दुर्मतिं कृष्णमप्रत्यूह्य यवीयसीम् ।
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामीत्युक्त्वा तत्रावसद् रुषा ॥ ५२
भगवान् भीष्मकसुतामेवं निर्जित्य भूमिपान् ।
पुरमानीय विधिवदुपयेमे कुरूद्वह ॥५३
तदा महोत्सवो नॄणां यदुपुर्यां गृहे गृहे ।
अभूदनन्यभावानां कृष्णे यदुपतौ नृप ॥५४
नरा नार्यश्च मुदिताः प्रमृष्टमणिकुण्डलाः ।
पारिबर्हमुपाजहुर्वरयोश्चित्रवाससोः ॥५५
सा वृष्णिपुर्युत्तभितेन्द्रकेतुभि- विचित्रमाल्याम्बररत्नतोरणैः ।
बभौ प्रतिद्वार्युपक्लृप्तमंगलै- पूर्णकुम्भागुरुधूपदीपकैः ॥५६
सिक्तमार्गा मदच्युद्भिराहूतप्रेष्ठभूभुजाम् ।
गजैर्द्वास्सु परामृष्टरम्भापूगोपशोभिता ॥ ५७
कुरुसृजयकैकेयविदर्भयदुकुन्तयः ।
मिथो मुमुदिरे तस्मिन् सम्भ्रमात् परिधावताम् ॥५८
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परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सब राजाओंको जीत लिया और विदर्भराजकुमारी रुक्मिणीजीको द्वारकामें लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥५३ ॥ हे राजन्! उस समय द्वारकापुरीमें घर- घर बड़ा ही उत्सव मनाया जाने लगा ।
क्यों न हो, वहाँके सभी लोगोंका यदुपति श्रीकृष्णके प्रति अनन्य प्रेम जो था ॥५४ ॥ वहाँके
सभी नर- नारी मणियोंके चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे । उन्होंने आनन्दसे भरकर चित्र - विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिनको अनेकों भेंटकी सामग्रियाँ उपहारमें दीं ॥५५ ॥
उस समय द्वारकाकी अपूर्व शोभा हो रही थी । कहीं बड़ी - बड़ी पताकाएँ बहुत ऊँचेतक फहरा रही थीं । चित्र -विचित्र मालाएँ, वस्त्र और रत्नोंके तोरन बँधे हुए थे । द्वार- द्वारपर दूब, खील आदि मंगलकी वस्तुएँ सजायी हुई थीं। जलभरे कलश, अरगजा और धूपकी सुगन्ध तथा दीपावलीसे बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी || ५६ || मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे । उनके मतवाले हाथियोंके मदसे द्वारकाकी सड़क और गलियोंका छिड़काव हो गया था । प्रत्येक दरवाजेपर केलोंके खंभे और सुपारीके पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे ॥५७ ॥ उस उत्सवमें कुतूहलवश इधर - उधर दौड़ - धूप करते हुए बन्धु - वर्गों में कुरु, सृञ्जय,
कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति आदि वंशोंके लोग परस्पर आनन्द मना रहे थे ॥५८ ॥ जहाँ-तहाँ रुक्मिणी - हरणकी ही गाथा गायी जाने लगी । उसे सुनकर राजा और राजकन्याएँ अत्यन्त
विस्मित हो गयीं ॥ ५ ९ ॥ महाराज! भगवती लक्ष्मीजीको रुक्मिणीके रूपमें साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियोंको परम आनन्द हुआ ॥ ६० ॥
रुक्मिण्या हरपं श्रुत्वा गीयमानं ततस्ततः ।
राजानो राजकन्याश्च बभूवुर्भृशविस्मिताः ॥ ५ ९
द्वारकायामभूद् राजन् महामोदः पुरौकसाम् ।
रुक्मिण्या रमयोपेतं दृष्ट्वा कृष्णं श्रियः पतिम् ॥६०
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे रुक्मिण्युद्वाहे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५४ ॥
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अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः प्रद्युम्नका जन्म और शम्बरासुरका वध श्रीशुक उवाच
कामस्तु वासुदेवांशो दग्धः प्राग् रुद्रमन्युना ।
देहोपपत्तये भूयस्तमेव प्रत्यपद्यत ॥ १
स एव जातो वैदर्भ्यां कृष्णवीर्यसमुद्भवः ।
प्रद्युम्न इति विख्यातः सर्वतोऽनवमः पितुः ॥ २
तं शम्बरः कामरूपी हृत्वा तोकमनिर्दशम् ।
स विदित्वाऽऽत्मनः शत्रुं प्रास्योदन्वत्यगाद् गृहम् ॥३
तं निर्जगार बलवान् मीनः सोऽप्यपरैः सह ।
वृतो जालेन महता गृहीतो मत्स्यजीविभिः ॥४
तं शम्बराय कैवर्ता उपाजहुरुपायनम् ।
सूदा महानसं नीत्वावद्यन् स्वधितिनाद्भुतम् ॥५
दृष्ट्वा तदुदरे बालं मायावत्यै न्यवेदयन् ।
नारदोऽकथयत् सर्वं तस्याः शंकितचेतसः ।
बालस्य तत्त्वमुत्पत्तिं मत्स्योदरनिवेशनम् ॥६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कामदेव भगवान् वासुदेवके ही अंश हैं । वे पहले रुद्रभगवान्की क्रोधाग्निसे भस्म हो गये थे । अब फिर शरीर-प्राप्तिके लिये उन्होंने अपने अंशी भगवान् वासुदेवका ही आश्रय लिया ॥१ ॥ वे ही काम अबकी बार भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा
रुक्मिणीजीके गर्भसे उत्पन्न हुए और प्रद्युम्न नामसे जगत्में प्रसिद्ध हुए । सौन्दर्य, वीर्य, सौशील्य आदि सद्गुणोंमें भगवान् श्रीकृष्णसे वे किसी प्रकार कम न थे ॥२ ॥ बालक प्रद्युम्न
अभी दस दिनके भी न हुए थे कि कामरूपी शम्बरासुर वेष बदलकर सूतिकागृहसे उन्हें हर ले गया और समुद्रमें फेंककर अपने घर लौट गया । उसे मालूम हो गया था कि यह मेरा भावी शत्रु है ॥३ ॥ समुद्रमें बालक प्रद्युम्नको एक बड़ा भारी मच्छ निगल गया । तदनन्तर मछुओंने
अपने बहुत बड़े जालमें फँसाकर दूसरी मछलियोंके साथ उस मच्छको भी पकड़ लिया ॥४ ॥ और उन्होंने उसे ले जाकर शम्बरासुरको भेंटके रूपमें दे दिया । शम्बरासुरके
रसोइये उस अद्भुत मच्छको उठाकर रसोईघरमें ले आये और कुल्हाड़ियोंसे उसे काटने लगे ॥५ ॥ रसोइयोंने मत्स्यके पेटमें बालक देखकर उसे शम्बरासुरकी दासी मायावतीको
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समर्पित किया । उसके मनमें बड़ी शंका हुई । तब नारदजीने आकर बालकका कामदेव होना, श्रीकृष्णकी पत्नी रुक्मिणीके गर्भसे जन्म लेना, मच्छके पेटमें जाना सब कुछ कह सुनाया ॥६ ॥ परीक्षित्! वह मायावती कामदेवकी यशस्विनी पत्नी रति ही थी । जिस दिन
शंकरजीके क्रोधसे कामदेवका शरीर भस्म हो गया था, उसी दिनसे वह उसकी देहके पुनः उत्पन्न होनेकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥७ ॥ उसी रतिको शम्बरासुरने अपने यहाँ दाल- भात
बनानेके काममें नियुक्त कर रखा था । जब उसे मालूम हुआ कि इस शिशुके रूपमें मेरे पति कामदेव ही हैं, तब वह उसके प्रति बहुत प्रेम करने लगी || ८ || श्रीकृष्णकुमार भगवान् प्रद्युम्न बहुत थोड़े दिनोंमें जवान हो गये । उनका रूप लावण्य इतना अद्भुत था कि जो स्त्रियाँ उनकी ओर देखतीं, उनके मनमें शृंगार रसका उद्दीपन हो जाता ॥९ ॥
सा च कामस्य वै पत्नी रतिर्नाम यशस्विनी ।
पत्युर्निर्दग्धदेहस्य देहोत्पत्तिं प्रतीक्षती ॥७
निरूपिता शम्बरेण सा सूपौदनसाधने ।
कामदेवं शिशुं बुद्ध्वा चक्रे स्नेहं तदार्भके ॥८
नातिदीर्घेण कालेन स काष्र्णी रूढयौवनः ।
जनयामास नारीणां वीक्षन्तीनां च विभ्रमम् ॥९
सा तं पतिं पद्मदलायतेक्षणं प्रलम्बबाहुं नरलोकसुन्दरम् । सव्रीडहासोत्तभितभ्रुवेक्ष प्रीत्योपतस्थे रतिरंग सौरतैः ॥१०
तामाह भगवान् कार्ष्णिर्मातस्ते मतिरन्यथा ।
मातृभावमतिक्रम्य वर्तसे कामिनी यथा ॥११
रतिरुवाच
भवान् नारायणसुतः शम्बरेणाहृतो गृहात् ।
अहं तेऽधिकृता पत्नी रतिः कामो भवान् प्रभो ॥१२
एष त्वानिर्दशं सिन्धावक्षिपच्छम्बरोऽसुरः ।
मत्स्योऽग्रसीत्तदुदरादिह प्राप्तो भवान् प्रभो ॥ १३
तमिमं जहि दुर्धर्षं दुर्जयं शत्रुमात्मनः ।
मायाशतविदं त्वं च मायाभिर्मोहनादिभिः ॥१४
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कमलदलके समान कोमल एवं विशाल नेत्र, घुटनोंतक लंबी - लंबी बाँहें और मनुष्यलोकमें सबसे सुन्दर शरीर! रति सलज्ज हास्यके साथ भौंह मटका कर उनकी ओर देखती और प्रेमसे भरकर स्त्री- पुरुषसम्बन्धी भाव व्यक्त करती हुई उनकी सेवा- शुश्रूषामें लगी रहती ॥१० ॥ श्रीकृष्णनन्दन भगवान् प्रद्युम्नने उसके भावोंमें परिवर्तन देखकर कहा — ' देवि!
तुम तो मेरी माँके समान हो । तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी? मैं देखता हूँ कि तुम माताका भाव छोड़कर कामिनीके समान हाव- भाव दिखा रही हो ' ॥११ ॥
रतिने कहा — ' प्रभो! आप स्वयं भगवान् नारायणके पुत्र हैं । शम्बरासुर आपको सूतिकागृहसे चुरा लाया था । आप मेरे पति स्वयं कामदेव हैं और मैं आपकी सदाकी धर्म-पत्नी रति हूँ ॥१२ ॥ मेरे स्वामी! जब आप दस दिनके भी न थे, तब इस शम्बरासुरने आपको
हरकर समुद्रमें डाल दिया था । वहाँ एक मच्छ आपको निगल गया और उसीके पेटसे आप यहाँ मुझे प्राप्त हुए हैं ॥ १३ ॥ यह शम्बरासुर सैकड़ों प्रकारकी माया जानता है । इसको अपने
वशमें कर लेना या जीत लेना बहुत ही कठिन है। आप अपने इस शत्रुको मोहन आदि मायाओंके द्वारा नष्ट कर डालिये ॥१४ ॥ स्वामिन्! अपनी सन्तान आपके खो जानेसे
आपकी माता पुत्रस्नेहसे व्याकुल हो रही हैं, वे आतुर होकर अत्यन्त दीनतासे रात - दिन चिन्ता करती रहती हैं । उनकी ठीक वैसी ही दशा हो रही है, जैसी बच्चा खो जानेपर कुररी पक्षीकी अथवा बछड़ा खो जानेपर बेचारी गायकी होती है ' ॥ १५ ॥ मायावती रतिने इस प्रकार
कहकर परमशक्तिशाली प्रद्युम्नको महामाया नामकी विद्या सिखायी । यह विद्या ऐसी है, जो सब प्रकारकी मायाओंका नाश कर देती है || १६ || अब प्रद्युम्नजी शम्बरासुरके पास जाकर उसपर बड़े कटु- कटु आक्षेप करने लगे । वे चाहते थे कि यह किसी प्रकार झगड़ा कर बैठे । इतना ही नहीं, उन्होंने युद्धके लिये उसे स्पष्टरूपसे ललकारा ॥१७ ॥
परिशोचति ते माता कुररीव गतप्रजा ।
पुत्रस्नेहाकुलादीना विवत्सा गौरिवातुरा ॥१५
प्रभाष्यैवं ददौ विद्यां प्रद्युम्नाय महात्मने ।
मायावती महामायां सर्वमायाविनाशिनीम् ॥१६
स च शम्बरमभ्येत्य संयुगाय समाह्वयत् ।
अविषह्यैस्तमाक्षेपैः क्षिपन् संजनयन् कलिम् ॥ १७
सोऽधिक्षिप्तो दुर्वचोभिः पादाहत इवोरगः ।
निश्चक्राम गदापाणिरमर्षात्ताम्रलोचनः ॥१८
गदामाविध्य तरसा प्रद्युम्नाय महात्मने ।
प्रक्षिप्य व्यनदन्नादं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम् ॥१९
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तामापतन्तीं भगवान् प्रद्युम्नो गदया गदाम् ।
अपास्य शत्रवे क्रुद्धः प्राहिणोत् स्वगदां नृप ॥२०
स च मायां समाश्रित्य दैतेयीं मयदर्शिताम् ।
मुमुचेऽस्त्रमयं वर्षं कार्णौ वैहायसोऽसुरः ॥२१
बाध्यमानोऽस्त्रवर्षेण रौक्मिणेयो महारथः ।
सत्त्वात्मिकां महाविद्यां सर्वमायोपमर्दिनीम् ॥२२
ततो गौह्यकगान्धर्वपैशाचोरगराक्षसीः ।
प्रायुंक्त शतशो दैत्यः कार्ष्णिर्व्यधमयत् स ताः ॥२३
निशातमसिमुद्यम्य सकिरीटं सकुण्डलम् ।
शम्बरस्य शिरः कायात् ताम्रश्मश्र्वोजसाहरत् ॥२४
प्रद्युम्नजीके कटुवचनोंकी चोटसे शम्बरासुर तिलमिला उठा । मानो किसीने विषैले साँपको पैरसे ठोकर मार दी हो । उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं । वह हाथमें गदा लेकर बाहर निकल आया ॥१८ ॥ उसने अपनी गदा बड़े जोरसे आकाशमें घुमायी और इसके बाद
प्रद्युम्नजीपर चला दी । गदा चलाते समय उसने इतना कर्कश सिंहनाद किया, मानो बिजली कड़क रही हो ॥ १ ९ ॥ परीक्षित्! भगवान् प्रद्युम्नने देखा कि उसकी गदा बड़े वेगसे मेरी ओर आ रही है । तब उन्होंने अपनी गदाके प्रहारसे उसकी गदा गिरा दी और क्रोधमें भरकर अपनी गदा उसपर चलायी ॥२० ॥ तब वह दैत्य मयासुरकी बतलायी हुई आसुरी मायाका आश्रय लेकर
आकाशमें चला गया और वहींसे प्रद्युम्नजीपर अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा करने लगा || २१ || महारथी प्रद्युम्नजीपर बहुत - सी अस्त्र - वर्षा करके जब वह उन्हें पीड़ित करने लगा तब उन्होंने समस्त मायाओंको शान्त करनेवाली सत्त्वमयी महाविद्याका प्रयोग किया || २२ || तदनन्तर शम्बरासुरने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसोंकी सैकड़ों मायाओंका प्रयोग किया; परन्तु श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नजीने अपनी महाविद्यासे उन सबका नाश कर दिया ॥२३ ॥
इसके बाद उन्होंने एक तीक्ष्ण तलवार उठायी और शम्बरासुरका किरीट एवं कुण्डलसे सुशोभित सिर, जो लाल- लाल दाढ़ी, मूँछोंसे बड़ा भयंकर लग रहा था, काटकर धड़से अलग कर दिया ॥२४ ॥ देवतालोग पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे और इसके बाद
मायावती रति, जो आकाशमें चलना जानती थी, अपने पति प्रद्युम्नजीको आकाशमार्गसे द्वारकापुरीमें ले गयी ॥२५ ॥
आकीर्यमाणो दिविजैः स्तुवद्भिः कुसुमोत्करैः ।
भार्ययाम्बरचारिण्या पुरं नीतो विहायसा ॥ २५
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अन्तःपुरवरं राजन् ललनाशतसंकुलम् विवेश पत्न्या गगनाद् विद्युतेव बलाहकः ॥ २६
तं दृष्ट्वा जलदश्यामं पीतकौशेयवाससम् ।
प्रलम्बबाहुं ताम्राक्षं सुस्मितं रुचिराननम् ॥२७
स्वलंकृतमुखाम्भोजं नीलवक्रालकालिभिः ।
कृष्णं मत्वा स्त्रियो ह्रीता निलिल्युस्तत्र तत्र ह ॥२८
अवधार्य शनैरीषद्वैलक्षण्येन योषितः ।
उपजग्मुः प्रमुदिताः सस्त्रीरत्नं सुविस्मिताः ॥ २ ९
अथ तत्रासितापांगी वैदर्भी वल्गुभाषिणी ।
अस्मरत् स्वसुतं नष्टं स्नेहस्नुतपयोधरा ॥३०
को न्वयं नरवैदूर्यः कस्य वा कमलेक्षणः ।
धृतः कया वा जठरे केयं लब्धा त्वनेन वा ॥३१
मम चाप्यात्मजो नष्टो नीतो यः सूतिकागृहात् ।
एतत्तुल्यवयोरूपो यदि जीवति कुत्रचित् ॥३२
कथं त्वनेन संप्राप्तं सारूप्यं शार्ङ्गधन्वनः ।
आकृत्यावयवैर्गत्या स्वरहासावलोकनैः ॥३३
परीक्षित्! आकाशमें अपनी गोरी पत्नीके साथ साँवले प्रद्युम्नजीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो बिजली और मेघका जोड़ा हो । इस प्रकार उन्होंने भगवान्के उस उत्तम अन्तःपुरमें प्रवेश किया जिसमें सैकड़ों श्रेष्ठ रमणियाँ निवास करती थीं ॥२६ ॥अन्तः-:-पुरकी नारियोंने
देखा कि प्रद्युम्नजीका शरीर वर्षाकालीन मेघके समान श्यामवर्ण है । रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए हैं । घुटनोंतक लंबी भुजाएँ हैं। रतनारे नेत्र हैं और सुन्दर मुखपर मन्द- मन्द मुसकानकी अनूठी ही छटा है । उनके मुखारविन्दपर घुँघराली और नीली अलकें इस प्रकार शोभायमान हो रही हैं, मानो भौंरें खेल रहे हों । वे सब उन्हें श्रीकृष्ण समझकर सकुचा गयीं और घरोंमें इधर- उधर लुक- छिप गयीं ॥ २७-२८ ॥ फिर धीरे- धीरे स्त्रियोंको यह मालूम हो गया कि ये श्रीकृष्ण नहीं हैं । क्योंकि उनकी अपेक्षा इनमें कुछ विलक्षणता अवश्य है । अब वे अत्यन्त आनन्द और विस्मयसे भरकर इस श्रेष्ठ दम्पतिके पास आ गयीं ॥२९ ॥ इसी समय
वहाँ रुक्मिणीजी आ पहुँचीं । परीक्षित्! उनके नेत्र कजरारे और वाणी अत्यन्त मधुर थी । इस नवीन दम्पतिको देखते ही उन्हें अपने खोये हुए पुत्रकी याद हो आयी । वात्सल्यस्नेहकी
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अधिकतासे उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा ॥ ३० ॥
रुक्मिणीजी सोचने लगीं- ' यह नररत्न कौन है? यह कमलनयन किसका पुत्र है? किस बड़भागिनीने इसे अपने गर्भमें धारण किया होगा? इसे यह कौन सौभाग्यवती पत्नी- रूपमें प्राप्त हुई है? ॥ ३१ ॥ मेरा भी एक नन्हा सा शिशु खो गया था । न जाने कौन उसे
सूतिकागृहसे उठा ले गया! यदि वह कहीं जीता- जागता होगा तो उसकी अवस्था तथा रूप भी इसीके समान हुआ होगा || ३२ || मैं तो इस बातसे हैरान हूँ कि इसे भगवान् श्यामसुन्दरकी - सी रूप-रेखा, अंगोंकी गठन, चाल- ढाल, मुसकान- चितवन और बोल -चाल कहाँसे प्राप्त हुई? ॥३३ ॥ हो- न -हो यह वही बालक है, जिसे मैंने अपने गर्भमें धारण किया
था; क्योंकि स्वभावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमड़ रहा है और मेरी बायीं बाँह भी फड़क रही है ' ॥३४ ॥
स एव वा भवेन्नूनं यो मे गर्भे धृतोऽर्भकः ।
अमुष्मिन् प्रीतिरधिका वामः स्फुरति मे भुजः ॥ ३४
एवं मीमांसमानायां वैदर्भ्यां देवकीसुतः ।
देवक्यानकदुन्दुभ्यामुत्तमश्लोक आगमत् ॥३५
विज्ञातार्थोऽपि भगवांस्तूष्णीमास जनार्दनः ।
नारदोऽकथयत् सर्वं शम्बराहरणादिकम् ॥३६
तच्छ्रुत्वा महदाश्चर्यं कृष्णान्तःपुरयोषितः ।
अभ्यनन्दन् बहूनब्दान् नष्टं मृतमिवागतम् ॥३७
देवकी वसुदेवश्च कृष्णरामौ तथा स्त्रियः ।
दम्पती तौ परिष्वज्य रुक्मिणी च ययुर्मुदम् ॥३८
नष्टं प्रद्युम्नमायातमाकर्ण्य द्वारकौकसः ।
अहो मृत इवायातो बालो दिष्ट्येति हाब्रुवन् ॥ ३ ९
यं वै मुहुः पितृसरूपनिजेशभावा- स्तन्मातरो यदभजन् रहरूढभावाः । चित्रं न तत् खलु रमास्पदबिम्बबिम्बे कामे स्मरेऽक्षिविषये किमुतान्यनार्यः ॥४० जिस समय रुक्मिणीजी इस प्रकार सोच- विचार कर रही थीं-निश्चय और सन्देहके झूलेमें झूल रही थीं, उसी समय पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अपने माता- पिता देवकी-वसुदेवजीके साथ वहाँ पधारे || ३५ || भगवान् श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे । परन्तु वे कुछ न