श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 101–110

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 101–110

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सुतसंहिता, 85 तथा औदरिक भाग ले सर्व शरीर के लिये करीब छोटी मोटी में ५५ लास होती है । इन लाल कणों से ही रक्त की लालिमा छत्तीस शाखाएं निकलती है । हृदय से ऊगा दश, अधोगा दश होती है तथा इन कणों को लालिमा इनके भीतर एक कण-और चतत्रश्च तिर्यग्गा ऐसा स्पष्ट सामञ्जस्य प्रत्यक्ष में नहीं होता । रञ्जक ( होमोग्लोबीन haemoglobin ) होता है जो ' ग्लोबीन ' है । अनुमाना गति यद्यपि धमनियों का स्पन्दन पाइ, नामक प्रोटीन तथा ' हीमार्गन ' नामक व्य का यौगिक ग्रीवा आदि स्थानों में प्रत्यक्ष डिसाई देने से रस भी रक्त से है । यह रनद्रव्य वायु से ' आक्सिजन ' ग्रहण कर रक्तको शुद्ध मिश्रित होकर या रक्त में परिणत होकर गतिगील प्रत्यक्ष | तथा रञ्जित करता है । अन्वेषण से पता चला है कि लालकर्णी है तथापि अनुमानप्रमाण भो उसकी गति का हटीकरण है ॥ की उत्पत्ति अस्थिनों की ' लोहितमा ' ( Red marron , ) शरीर के किसी भाग के क्षीण होने से रसर्गात का हीनयोग, शरीर को वृद्धि होने से सम्यग्योग और सम्पूर्ण शरीर से गा एक भाग में विकृति होने से गति का अयोग या मिथ्यायोग का अनुमान होता है । क्षिप्यमाण रत्रवैगुण्यास सन्नति यत्र ) स ' । तस्मिन विकार कुरुते रवे वर्षमिन तोयद ॥ आशया. -वाताय, पित्ताशय, उमाशय, रक्ताशय, आमासय, पक्का-शय, मूत्राय ये सात स्त्रीपुरूषों से समान किन्तु स्त्रीणामष्टमी | गर्भाशय. 1 सखल्वायो रसो यकृत प्लीहानी प्राप्य रागमुपैति ॥ ४ ॥

वह आहार के पाचन से बना हुआ जलतत्व की अधिकता । रखने वाला या जल के समान जीवन तर्पण रूप से शान्ति देने वाला रस ( Chyle ) प्रथम यकृत और प्लीहा में जाकर राग ( रक्त रूप ) को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

भवतश्चात्र ---रञ्जितास्तेजसा त्यापः शरीरस्थेन देहिनाम् ।

अव्यापन्नाः प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते ॥ ५ ॥

देहधारियों के शरीर में रहने वाले प्रसन्न ( विशुद्ध ) तेज ( रक्षक पित्त ) से रञ्जित ( रक्ता को प्राप्त हुये ) तथा अव्यापन्न ( अविकृत निर्मल ) जो आहारमसाटारय जलीय रस है वह ' रक्त ' कहा जाता है ॥ ५ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने रसना चकुप्लीहा में रञ्जकपित्त द्वारा रक्त बनना माना है । चरक का भी यही मत है - तेजो रसाना सर्वेषामनुजाना यदुच्यते । पितोप्मग स रागेण रसो रक्तन्वमृच्छनि । ( च चि. १५ ) | अष्टाहृदबकार इसी रक्षकपित्त को आमाशय में मानते है । जामाशयाश्रयदित रक्षक स्मरशनाव । ज्ञार रस का रञ्जकपित्त द्वारा रक्तरूप में परिणत होना हृदय से मानता है । रतन्तु हृदय याति ममाननारतंरित । रक्षित पाचि-तलव पितेायानि रक्ततान ॥ इल तरह आयुर्वेद के सभी आचार्य रञ्जक पित्त से ही रस का रक्त बनना मानते है । स्थान के विषय में मतभेद अवश्य है । शक्करी मन से रक्त में सूक्ष्म दर्शकयन्त्र द्वारा परीक्षा करने पर एक तरल तथा दूसरा बन भाग दिखाई देता है । तरल भाग को रक्त रस ( Plasma ) कहते है | इसका | हल्का पीला होता है तथा इसमें शरीर पोषक पदार्थ, आक्सिजन, कार्बन डायोक्साइड से होती है । यह रक्तमज्जा कशेरू, उर. फलक, पर्शुकाएं और कपाल की अस्थियों के सुपिरसंघात ( Spongy tissue ) में होती है । भूग और शिशु की नलकान्थियों के विचर ( Midulary cavity ) में भी रक्तमज्जा होती है । 1 स्था के पश्चात् इन विवरों में लोहिनमजा का स्थान पीतमजा ( Yellow marrow ) लेती है । रक्तकों की उत्पत्ति यकृप्लीहा में गर्भावस्था के मध्यकाल से जन्म होने के एक मास पूर्व तक हुआ करती है तत्पश्चात् यह कार्य रक्कमना में प्रारम्भ होता है । कुछ अन्वेषण से यह सिद्ध हो गया है कि यकृत् ष्ठोहा भी आवश्यकता पढने पर रक्तोत्पत्ति का कार्य करते है । प्लोटा से बाहर आने वाले रक्त में टीमोग्लोबिन का प्रमाण अधिक पाया जाता है ( The blood expelled from the spleen is specially rich in haemoglobin ) ( hand book of physiology ) आमाराय भी रक्तोत्पत्ति में भाग लेता है । असाध्य घातक पाण्डुरोग में यकृत् तथा आमाशय के लच्चों के प्रयोगों से अच्छा लाभ होता है । आयुर्वेद ने तो पहले से ही ऐसे रोगों में रक्त तथा यकृन्सेवन । की घोषणा कर रखी है । अनिनिश्रुतरक्तो वा क्षौद्रयुक्त पिवेदसृद् । । यकृद्वा भक्षयेदाजमाम पित्ततमाथुनम् ॥ पाश्चात्य विज्ञान अपने | अनुभव द्वारा अब आयुर्वेद के द्वारा रक्तोत्पत्ति के लिये बताये हुये यकृत, प्लीहा तथा आमागन इन स्थानों को महत्त्व देने लगा है । आयुर्वेद की वैज्ञानिकता अत्यन्त प्राचीन और | अकाव्य है ।

रसादेव त्रिया रक्तं रजः संज्ञं प्रवर्त्तते ।

। तद्वर्पाद् द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ॥ ६ ॥

रस से ही स्त्रियों से रज संज्ञक रक्त प्रवर्तित होता है । यह रज नामका रक्त ( रजोदर्शन ) बारह वर्ष की आयु के पश्चात् प्रगट होकर पच्चास वर्ष की आयु के आस - पास नष्ट ( वन्द्र ) हो जाता है ॥ ९ ॥

विमर्श - रसादेव यहा पर एन शब्द निश्चयात्मक है । जिस | तरह मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है तद्दत् कोई मज्जा से खियों में शुक्र की बजाय ' आर्तव ' उत्पन्न होता हो ऐसी शङ्का । न करे अत. ' रसादेव ' लिखा है । इसे रज, आर्तव और पुप्प कहते हैं । निश्चित समय में होने से आर्तव ( ऋनो भवमात्रम् ) होते है । वनभाग में तीन तरह के कण होते है, सनिजपदार्थ । ( १ ) टाल- है तथा । शुद्ध गर्भरूपी भावी फल का द्योतक होने से पुप्प कहा जाता रक्तकण ( Red blood corpuscles R. B. O. या Erythrocy • । त्वात् । अंग्रेजी रक्त में पुप्पसा भी ' आत्तर्व गर्भारयस्य ' को फलस्य पुप्प ( भविष्यतोऽभिव्यञ्जक-tes ) ( - ) श्वेत रक्तकण ( White blood corpuscles WY B. C. ) | प्रथा है । Menstruation, called also Flower ) कहने की ( ३ ) सूधन रक्तरुणिकाएं ( Platelets ) ललरक्तकण समस्त | monthly flow and flowers यह रक्तमय menses ताव, है period जो कि, रुधिर के ७ प्रतिशत होते है । गणना से प्रतिधन मिलीमीटर बी की युवावस्था के प्रारम्भ तथा गर्भाधान ( ३५ इञ्च ) में इनकी संख्या पुरुपों मे ६० लाख तथा खियों | है । यह प्रतिमास हुआ करता है किन्तु गर्भस्थिति होने, का दुग्धपाना-- सूचक

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श्रध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् । ४६ वस्था, रक्तगुल्म, रक्ताल्पता आदि स्थिति में बन्द हो जाता है । १२- ११ वर्ष की आयु से ४५-५० वर्ष की आयु तक होता है पश्चात् बन्द हो जाता है इसे रजोनिवृत्ति मेनोपाज ( Meno pause ) कहते हैं | शीत - प्रधान देशों में देर से होता है । चल-चित्र देखने वाली, गन्दे अश्लील उपन्यास पढ़ने वाली, तेज मिर्च - मसाले तथा अधिक गरिष्ट और उत्तेजक भोजन करने वाली, एवं अमीर घर की लड़कियों में रजोदर्शन जल्दी होता है । निर्वल और अस्वस्थ में ढेर से होता है । आर्तव दर्शन के समय से यौवन के अन्य लक्षण जैसे स्तनों, गर्भाशय, योनि का बढना, कामाद्रि पर बालों का उगना, नितम्ब प्रदेश का मोटा होना, चेहरे पर रौनक आना तथा हाव - भाव कटान, मन्द मुस-कान आदि उत्पन्न होते हैं । रजोनिवृत्ति के समय गर्भाशय, योनि, बीजप्रन्थियां तथा स्तन सिकुडने लगते हैं । दाढी और मूह के स्थान पर कुछ बालों का उगना, आवाज़ बदलना, शरीर का स्थूल या पतला होना, चेहरे पर कर्कशता आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं । वीजकोप का अन्तःस्त्राव बन्द हो कर थायराइड तथा अधिवृक्क का अन्तःस्राव अधिक मात्रा में रक्त में आने से तेज मिजाज, चिडचिडापन, बेचैन, रग्निचित्त तथा कभी कभी कोई स्त्री पागल सी हो जाती है । इसके अतिरिक्त शिरोभ्रम, गरीरकम्प, निद्रानाश, दिल में धड़कन, ऊर्ध्ववात ( हिक्का ) तथा मृगी आदि उत्पन्न होते देखे गये हैं । प्रतिमास नर्तन निकलने से पहले गर्भाशय की स्लैष्मिक कला में रक्त अधिक उपचित हो जाता है जिससे गर्भाशय कला - मोटी, मृदु और पिलपिली हो जाती है फिर उस कला में से रक्त बाहर निकल आता है । रक्त निकल जाने पर श्लैम्मिक कला सिकुड़ कर पूर्व दशा को प्राप्त होती है । आर्तवरक्त किञ्चित् ' काले रङ्ग का और धारीय होता है । उसमें श्लैष्मिक कला के टुकडे, गर्भा शय ग्रन्थियों का स्राव और खटिक के लवण आदि होते हैं । प्रतिमास स्त्राव तीन से ५ दिन तक और तीन या चार छटांक तक होता है । मासेनोपचितं काले वमनीम्या तढार्तवम् । ईपत्कृष्ण विगन्धब्च वायुर्योनिमुख नयेत् । ( सुश्रुत ) । मासान्निष्पिच्छटाहा

तिपञ्चरात्रानुबन्धि च । नैवातिवगुलात्यत्यमार्त्तव शुद्धमादिशेत् ॥

( चरक ) । - सूक्ष्मकेशप्रतीकाशा बीजरक्तवद्दा सिराः । गर्भाशय पूर यन्ति मासाद्वीजाय कल्पते ॥ मासिकधर्म के समय डिम्बग्रन्थि, डिम्वप्रणालियां और योनि अधिक रक्कमय हो जाती हैं । गर्भा शय का परिमाण भी कुछ बढ जाता है । आर्तव निकलने के दो चार दिन पहले से तथा जब तक निकलता रहता है उस समय बहुत सी स्त्रियों की मानसिक तथा शारीरिक स्थिति में भी परिवर्तन हो जाता है । आलस्य, अरुचि, कमर, कूल्हों और पेडुमें भारीपन हो जाता है । पीनप्रसन्नवदना प्रकृन्नात्ममुखद्वि-जाम् । नरकामा प्रियकथा स्रस्तकुक्ष्यक्षिमूर्द्धजान् । स्फुरद्भुजकुचश्रोणि

नाम्यूरुजघनत्किचान् । हर्षोत्सुक्यपराचापि विद्यादृतुमतीमिति ॥

( सुश्रुत । आर्त्तवन्नावकारण - रजःस्राव का घनिष्ठ सम्बन्ध वीज कोप ( Overy ) के साथ है । बीजकोष में दो रासायनिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं । एक ओइस्ट्रिन ( Oestrin ) और दूसरा प्रोजे-स्टिन ( Progestin ) है । ओइस्ट्रिन के प्रभाव से गर्भाशय की श्लैष्मिकता का नाश हो कर रजःस्राव होता है दूसरा प्रोजे स्टिन गर्भाशय की कला को गर्भग्रहण योग्य बनाता है तथा स्तन को भी परिपुष्ट करता है । जब गर्भ नही रहता तत्र ओह- । ७ सु ० स्ट्रिन अपना नाशक कार्य करके ' रज ' स्राव ' करता है । उसके । नाशकार्य के पश्चात् प्रोजेस्टिन रचनात्मक कार्य करता है । इस तरह परस्पर विरोधी ये दोनों द्रव्य प्रतिमास नियतसमय में

अपने २ प्रभाव द्वारा आर्तव चक्र जारी रखते हैं ।

आर्त्तवं शोणितं त्वाग्नेयमग्नीषोमीयत्वाद् गर्भस्य ॥ ७ ॥

यद्यपि रससे ही रज बनता है किन्तु वह अग्निगुण प्रधान होता है रस की सौम्यता उसमें नहीं रहती क्यों कि गर्भ अग्नि और सोम गुण प्रधान होता है ॥ ७ ॥

पाञ्चभौतिकं त्त्रपरे जीवरक्तमाहुराचार्य्याः ॥ ८ ॥

अन्य आचार्य जीवरक्त ( जीवनपोपक रक्त अथवा जीव = चेतनायुक्त रक्त ) को पञ्चमहाभूतों के संयोग से युक्त | मानते हैं ॥ ८ ॥

विस्रता द्रवता रागः स्पन्दनं लघुता तथा ।

भूम्यादीनां गुणा ह्येते दृश्यन्ते चात्र शोणिते ॥ ६ ॥

रक्त में विस्रता - ( आमगन्धिता ) - पृथिवी का गुण, द्रवता-जल का गुण, राग ( लालिमा ) - तेज का गुण, स्पन्दन चायु का गुण तथा लघुता - आकाश का गुण स्पष्ट दिखाई देता है अत एव रक्त पाञ्चभौतिक है ॥ ९ ॥

रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।

मेदोऽस्थि ततो मज्जा मन्त्रः शुक्रं तु जायते ॥ १० ॥

रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से शुक्र उत्पन्न होता है ॥ १० ॥

विमर्श - इस श्लोक में रस - रक्तादि धातुओं की उत्पत्ति का क्रम अथवा पोषण क्रम बताया गया है । धातुओं के पोषण के | लिये चीरदधिन्याय, केदारकुल्यान्याय तथा खले कपोतिका-न्याय ऐसे तीन वाद प्रचलित हैं । ( १ ) क्षीरधिन्याय के अनु-सार जैसे समग्र दुग्ध से दधि तथा वृद्धि से मक्खन, मक्खन से घृत और घृत से घृतमण्ड बनता है उसी प्रकार समग्र आहार रस से रक्त और रक्त से मांस आदि क्रम से उत्पन्न होते हैं । अतः इसे ' क्रम परिणाम पत्त ' भी कहते हैं । यह क्रम निम्न लोकानुसार है । स्थूलसूक्ष्ममले. सर्वे भिद्यन्तॆ धातवस्त्रिथा ' । अर्थात् प्रत्येक धातु के धात्वग्निद्वारा पाक होने पर स्थूल, सूक्ष्म और मल ऐसे ३ भाग हो जाते है । स्व • -स्थूल पर सूक्ष्मस्तन्मल याति तन्मल 1 स्वाग्निभि. पच्यमानेषु मलः घट्नु रसादिषु । न शुक्रे पच्यमानेऽपि हेमनीवाक्षये मल ॥ भोजन किये हुये अन्न का पाक होने पर मल रूप में विष्ठा और मूत्र तथा सार भाग रस होता है, इसे पोषक रस या काइल ( Chyle ) कहते है । इस रस का पाचन होने पर स्थूल भाग रस, सूक्ष्म भाग रक्त और मलभाग कफ उत्पन्न होता है । इस स्थूल रस को पोष्यरस या Plasma कहते हैं । इसी तरह रक्त का पाचन होने से स्थूल भाग रक्त, सूक्ष्म भाग मास तथा मलभाग पित्त बनता है । मांस का पाचन होने से स्थूल भाग मास, सूक्ष्मभाग मेढ तथा मलरूप में नासा, कर्ण और नेत्र के मल उत्पन्न होते हैं मेद का पाचन होने से स्थूल भाग भेद, सूक्ष्म भाग अस्थि तथा मल भाग स्वेट बनता है । अस्थि के पाचन से स्थूल भाग अस्थि, सूक्ष्म भाग

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ro सुश्रुतसहिता | मना और मल भाग केश, लोम तथा धमथु उत्पन्न होते हैं ॥ मजा के पाचन से स्थूल भाग मज्जा, सूक्ष्म भाग वीर्य तथा मल भाग छात्रों का कीट और चर्म का स्नेह बनता है । शुक्र के पाचन से स्थूल भाग शुक्र सूक्ष्म भाग ओज बनता है किन्तु मल भाग नहीं बनता है जैसे शुद्ध सोने को तपाने से मल नहीं । बनता । वाग्स्ट में धातुओं के मलों की उत्पत्ति में ओज को शुक्र का मल माना है । कप पि मल सेषु प्रखंडो नखरोम च । न्नेहोऽन्त्रिशिमोनो वानूना जशी मला ॥ ( २ ) केदारकुल्या- । न्याय का नत है कि जैसे जलकी नालियों से बगीचे या नहर । जल से खेतका समीपवर्ती भाग सीचा जाता है तत्पश्चात् नतृल वण्टरा गिरा । मासाहसात्वचः षट् च मेटस स्नायुसन्ध्य ॥ रस से स्तन्य तथा आर्त्तवरक्त, रक्त से कण्डरा तथा गिराएं, मांस मे वसा और छ त्वचाएं तथा मेद से स्नायु और सन्धियां ये उपधातुयें होती है । वानधातु ( Nervous tissue ) में मस्तिष्क ( Brain ), सुपुन्ना ( Spnal cord ) तथा दोनों से उत्पन्न बात सूत्र ( Nerves ) इसी धातु से बने है । पाश्चात्य लोग शरीर को अनेक प्रकार की मेलों से बना मानते हैं जैसे ईंटों से मकान | आयुर्वेद ने भी शरीर की बनावट सेट की जगह पर असंख्य परमाणु स्वरूप शरीर के अवयव माने है " शरीरा-व्यवास्तु परमाणु मेडेनापरिसस्येया भवन्त्यनिवहुत्वादतिसौक्ष्म्यान उसी जल मे दूरवर्ती भाग, वैसे ही आहार रस से प्रथम रक्तदतीन्द्रियत्वाच्च । च ० शा ० अ ० ७ । प्राचीन समय में ये परमाणु पोषित होता है पश्चात् मांस, मेद आदि । अर्थात् आहार रस प्रथम रक्त में जाता है और रक अपने समान भाग को रस से ग्रहण कर लेता है, पश्चात् वही इस मास में जाता है और मांस उससे अपने समान अंग को ग्रहण कर लेता है । ऐसे इस पत्र से आहार रस ही सर्व धातुओं का पोषण करता है । ( ३ ) ग्वले कपोनिनान्याह -का मत है कि जैसे खलिहान में कबूतर दूर या समीप के स्थानों से पहुचते हैं तद्दत् आहार रस भिन्न भिन्न स्रोतों के द्वारा धातुओं का पोषण शीघ्र या देरी से करता है । प्रथम पक्ष चरक सम्मत है श्रोतमा यथास्वेन धातु पुष्वनि गनुना । द्वितीय पक्ष सुश्रुन सम्मत है ' वत्रण एवं नाना भन्नानन्तः श्रोषयिता । तृतीय पत्र द्वितीय के समान ही है । अग्नदत्त ने सङ्गमुन्दरी टीका मे एक चौथा पक्ष माना है जो पक्ष कहलाता है । इनका और दादरी मन की धानुपोषण कल्पना मिलती जुलती है । जो भी हम अन्न । खाते हैं उसमें शरीर के ' धातुओं के पोषण के उपयोगी सर्व पदार्थ रहने हैं । अन्न का पाचकरसों द्वारा पाचन हो कर जो रस बनना है उसका क्षान्त्रस्य रसाङ्कुरी तथा सिरा द्वारा शोषण हो कर हृदय में पहुचता है तथा हृदय से उसके सङ्कुचित होने से एक साथ सुमन्त शरीर से महाधमनी की शाखा -मगाखाओ द्वारा पहुचता है तथा शरीर के व अह्न या धातुएं उस रस ( मिश्रित रस ) से अपने पोषण योग्य अंग का ग्रहण कर लेते हैं । संन में यही कल्पना वर्णित है । ' एवमन्नरस एव साक्षात सर्वातून केनचिदेव कालमेडेन पुष्णाति । न एनर्यातवी-वर्डनेन प्रनिग्धन्न इति । चरक भी यही मानता है " पुष्यन्ति शाहान्साहसरथिनासमेोऽस्थिमज्जशुक्रो जानि आयुर्वेद ने रम - रकादि सात धातुएं मानी हैं किन्तु पाश्चायों ने केवल चार ही धातु माने हैं । ( १ ) नासगत को मन्त्रड डिम्पू ( Mascular tussue ) कहते है । इसमें सङ्कोच और प्रसार करने का गुण है जिससे शरीर में गति होती है । ( २ ) आच्छादकनु ( Epitheliol tissue ) से शरीर की बाह्य-त्वचा मल्चा तथा आगयो के बाह्य और आन्तरिक आवरण बने हुये है । ( ३ ) संयोजक ( Connective tissue ) शरीर के विभिन्न अन का संयोग और बन्धन करती है इसके रक्त, दन्तकवच, अस्थि, तरगास्थि, लसीकाधातु ( Lympho id tissue ), मंद, स्थितिस्थापक धानु ( Elastic tissue ), वान्तव धानु ( Pibrous tissue ) ये उपनात हैं । रक और शुक्र को छोडकर आयुर्वेदिक धातुओं का हुमी में अन्तर्भाव होता है । आयुर्वेद में भी उपधातुएं मानी गई है । रसात लन्य तथा रच-स्वरूप शरीरावयव अतीन्द्रिय थे किन्तु वर्तमान विज्ञान ने ' सूक्ष्मदर्शकयन्त्र ' द्वारा इन्हें दृश्य कर दिया है । एक प्रकार के सेल के ममूह को जिसका कि विभिष्ट कार्य हो, धातु

( Tissue ) कहते हैं । इनके चार भेद ऊपर कह दिये हैं ।

तत्रैषां सर्वघातूनामन्नपानरसः प्रीणयिता ॥ ११ ॥

इन सर्व प्रकार को धातुओं को अन्न और पान से उत्पन्न रम तर्पित करता है ॥ ११ ॥

विमर्श - पाचन से उत्पन्न आहाररस ( Chyle ) कहा जाता है तथा यह पोपक रस है । रक्त जब सूक्ष्म केशिकाओं में पहुंचता है तब केशिकाओं की अत्यन्त. सूक्ष्म दीवारों में से यह निकल जाता है इसे पोष्यरस या रक्तरस या ष्टाना ( Plasms ) कहते हैं | इससे अन्य रक्तादि धातुओं का पोषण होता है । तथा इस रक्तरस की क्षीणशक्ति को आहारजन्य रस पूर्ण करता है अत एत्र आहार रस ही मुख्यतया सर्व धातुओं का पोषक है ।

रसजं पुरुषं विद्यादसं रक्षेत्प्रयत्नतः ।

अन्नात्पानाच मतिमानाचाराच्चाप्यतन्द्रितः ॥ १२ ॥

पुरष को रस से ही उत्पन्न हुआ समझना चाहिये इस लिये मतिमान मनुष्य सावधान होकर अन्न, पान और आचार पालन से रस को रक्षा करे ॥ १२ ॥ I

तत्र ' रस ' गतौ धातुः, अहरहर्गच्छतीत्यतो रसः ॥ गत्यर्थक ' रस ' धातु से रस शव्द बना है । रात्रिन्दिव नो गतिशील हो उसे रस कहते है ॥ १३ ॥

स खलु त्रीणि त्रीणि कलासहस्राणि पञ्चदश च कला एकैकस्मिन् धाताषवतिष्ठते । एवं मासेन रसः शुकीभवति स्त्रीणां चार्त्तवम् ॥ १४ ॥

भवति चात्र--अष्टादशसहस्राणि सङ्ख्या ह्यस्मिन् समुचये 1, कलानां नवतिः प्रोक्ता स्वतन्त्रपरतन्त्रयोः ॥ १५ ॥

यह रस ३०१५ कला क एक धातु में ठहरता है । इस प्रकार एक महीने से रम पुरुषों में वीर्य तथा खियों में आव के रूप में परिणत होता है इस रस से शुक्र बनने के समुच्चय में इस तंत्र तथा अन्य तंत्रों के अनुसार १८० ९ ० कला समय लगता है ॥ ११–१५ ॥ विमर्श: --- मुश्रुत ने रस से शुक्र का निर्माण एक मास में

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श्रध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् । ५१ नाना है । भोजन का पाचन होकर आहार रस तथा आहार रन से धातु इस एक ही दिन में पैदा हो जाता है किन्तु फिर प्रत्येक धातु के लिये पांच पांच दिन लगते हैं । शरीर के भीतर के बाउ निर्माण की विधि नेत्रों से दृश्य नहीं होने से इस विजय में अनेक मतननान्तर प्रचलित हैं । किसी के मत से आहार रस द्वारा धानुनिर्माग एक दिन में, कुछ दिन में, कुछ ७ दिन में, कुछ आठ दिन में मानते हैं । केचिदाहरहो-रात्रात् षड्छाद्रपरं परं । नाचेन यानि शुक्रपानादिनि ॥ ( गग्डे ) । षट्रिम, केचिद्रत्रः केचित् सव च । इच्छति सुनः प्रायो र परिवर्तनम् ॥ ( चर ) । आहारोऽयननो यः न

इवो रमुकं नियच्छति । शोणितवं तृतीयेऽद्धि चतुर्थे नानामपि ॥

मेदत्वं पचने परं तन्नितने व्रजेत् । मज्जनां शुक्रतामेति दिवसे त्वष्टने नृगान् ॥ न्न्यादि पायान्यामादारान्यां नृप क्रुवम् । सप्तरात्रेण शुद्ध्यन्ति प्रदुन्यन्तिच मानवः ॥ ( नागद्वार:) । धुनिक रूप से इन वानुओं की उत्पत्ति का निश्चित समय बताना कठिन है किन्तु आवश्यकतानुसार प्रतिदिन इन धानुओं की उत्पत्ति होती रहती है । चरन का भी यही अभिप्राय है । संतच्या सौगतूनां परिवृत्तिस्तु चतु । अविशन्ता समुत्पत्ति-तू स्वति । आधुनिक तथा चरक मत ही प्रगत दिवाई देता है नया बाहार रेस शरीर में रक्त के साथ सर्वधाओं में प्रतिनग मौजूद रहता है और कार्य करते रहने में प्रत्येक धातु के सेल ग नष्ट होते रहते है तथा उन चीग हुये बानु मेलों की पूर्ति रस द्वारा अपने समानांग से प्रतिक्षण हुआ करती है | अतः १ दिन दिन ७ दिन या ८ दिन या मास भर का कथन कोई महत्व नहीं रखता । श्री नातंत्रम् — त्रियों में आर्त्तत्रन्नात्र एक मास से होता है किन्तु वह अत्र रक्त रस मे ही बनता है ऐसा पहले वह आये हैं । यह रजसंज्ञक रक्त एक मास में तैय्यार होना है ऐसा आधुनिकों का मन नहीं है किन्तु यह रजः स्तुति तथा क्षेत्ररी

से सोत्रा ( Ora ) का उत्सर्ग एक मास से होता है ।

स शब्दार्चिर्जलसन्तानवदणुना विशेषेणानुधाव-त्येवं शरीरं केवलम् ॥ १६ ॥

वह रस शब्दसन्तान की तरह तिर्यकू, अर्चि - ( अभि ) सन्तान ( पुञ्ज या समूह ) की तरह ऊर्ध्वगामी ( हविर्भुज-श्रोर्ध्वञ्चदनं प्रसिद्धम् ) तथा जलसन्तान की तरह अधोगामी ( निन्नदेशगमनं ) होकर समस्त शरीर में अनुधावन ( परिमन ) करता रहता है ॥ १६ ॥

विमर्शः - शब्द ( व्वनि ), उष्णता और जल जैसे चारों ओर फैलने की क्षमता रखते हैं तद्वत् रस भी सर्वदिशा में जा सकता है । पाश्चात्य शरीरकार्यविज्ञानानुसार यह कार्य । Pilteratio3. osmosis, Dialysis और Diffusion इन भौतिक विवियों द्वारा होता है । कुछ टीकाकार मचिःसन्तान से रस का धमनीगढ़ प्रवाह, शब्छन्नान से विरागन प्रवाह, और जब्सन्वान से स्त्रोतसंगत प्रवाह मानते हैं । रसपरिभ्रमण ( Blocd cerculation ) का पना ' हार्वे ' नामक वैज्ञानिक ने सन् १६२८ में लगाया था । रस या रक्त का स्थान हृदय है । तथा हृदय के सङ्कोच से रक्त बड़े वेग बृहद में प्रवेश कर उसकी विभिन्न शाखाओं द्वारा समन्त शरीर में फैलता । । है । धमनी से रक्त धमनिका तथा केशिकाओं ( Capillaries ) में जाता है तथा उनकी दीवारों से प्राणवायु व पोन्य रस । चूकर अङ्ग प्रत्यङ्ग पोषित होते हैं । फिर केशिकाओं के मिलने से निराएं बनती हैं जिनसे रक्त वापस हृदय की ओर आता है और अन्त में अधोगा महागिरा तथा ऊगा महाशिरा द्वारा नीचे तथा ऊपर गया हुआ रक्त वापस हृदय के दक्षिणालिन्द ( BA ) में आ जाता है । हृी रखो निःसरतितन एव च सन नः । विनिद्रयनिनदा लिग ॥ ( भेडसंहिता ) । हृदय के दक्षिण निलय से रक्त फेफड़ों में शुद्ध होने जाता | है तथा फेफड़ों से वापस सिराओं द्वारा हृदय के वामालिन्द में आकर वामनिल्य में होता हुआ वृहद्वमनी में जाकर समस्त शरीर में भ्रमण करना रहता है । एक बार के रक्तपरिभ्रमण में अनुमानतः १५ सेकण्ड लगते हैं । शरीर में चार प्रकार के । रक्त परिभ्रमण माने गये हैं । ( १ ) शारीरिक रक्तपरिभ्रमण | ( General blood Cerealation ) ( २ ) फॉन्फुसीय रक्तपरित्र-नग ( Palmonary blood cerculation ) ( ३ ) यकृत् रक्त-संवहन ( Portal cerculation ) ( 2 ) वृक्कीन रक्तसंवहन ( Renal cerculation ) । आयुर्वेद में रक्तशोधक वायु ( Oxygen ) को वायु माना है तथा उसका नाभि ने हत्कमलान्तर ( हन्कोष्ठों ) में जाना और वहां से कण्ठ द्वारा बाहर निक्ल कर विष्णुपदान ( Oxygen ) पान ( ग्रहण ) कर पुनः लौट के अविल देह को तृप्त करना तथा जटरानल को प्रदीप्त करना । माना है । नामित्य प्रावन सृष्ट्वा हृत्कनलान्तरम् । कण्ठाद्वहि विनिर्नानि पर्नु विष्णुनामृतम् ॥ पीला चाम्रपीयूषं पुनरायाति वेगतः । श्रीनयन् देहनखिलं जीवयन् जठरानलम् ॥ ( शाबर ) मैने इस श्लोक में प्रत्यक्ष दृष्ट शारीराधार से निम्न परिवर्तन | किया है । देहस्थो दूषितो वायुः स्पृष्ट्वा हल्कनलान्तम् । फुफ्फुसा-क्या हिर्यानि पातुं विष्णुम् ॥ आयुर्वेद ने फेफड़ों को | उदान वायु का आधार माना है । उदानवायोराभाग्ः फुक्कुल-प्रोच्यते बुधै । ( शाईवर ) । यह उदानवायु देह की दूषित कार्बन डायाक्साइड हो सकती है । इसके सिवाय प्राणवाहक दो स्त्रोतस माने हैं । ' प्रागवहे द्वे तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च वमन्य. ' इस वर्जन से प्राण ( Oxygen ) के वाहक दो स्रोतस् है । ये दो स्रोतस् दोनों नासारन्ध्र, या दोनों फेफडों में जाने को द्विधाविभक्त श्वासनलिका ( Trachea ), अथवा दोनों फेफड़े, कौन से लिये जांय? तो फेकडे ही ग्रहण करना अधिक प्रशस्त है क्योंकि इन दोनों का मूल हृदय अथवा हृदय से फेफड़ों में जानेवाली दोनों धमनियां ( Palmonary Arteries ) तथा कग्टनलिका से आनेवाली श्वासनलियां होती है | पं ० हरिप्रान्न जो प्रागवह दो स्रोतस् से दोनों फुफ्फुसीय धमनियों को लेते हैं किन्तु ये धमनियां तो हृदय से अशुद्ध रक्क फेफड़ों को लाती हैं अतः प्रागवाहक नहीं हैं इसलिये दोनों फेफडों से प्राण ( Oxygen ) युक्त रक्त को लेकर हृदय की ओर जानेवाली सिराओं का ग्रहण किया जाय तो अधिक युक्तिमत है न्योंकि ये हृदय से सम्वन्धित होने से इनका मूल हृदय भी हो सत्ता है तथा प्राणवाहक है हीं । कुछ टीकाकारों ने प्राण ( O ) के वाहक दोनों ( Bronchii ) को ग्रहण क्रिया है किन्तु इनका मूल हृदय होता नहीं अतः प्राणवाहक स्रोतस् दोनों फुफ्फुस अथवा दोनों फुफ्फुसों से जानेवाली सिराए ही अर्य

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५२ सुश्रुतसंहिता 1 करना अधिक प्रशस्त है । इस तरह आयुर्वेद ने रक्तशुद्धि के साथ फुफ्फुस का सम्बन्ध स्थापित किया है हालां कि स्पष्ट । निर्देश नहीं है । वाजीकरण्चस्त्त्रोषधयः स्त्रवलगुणोत्कर्षाद्विरेचनव दुपयुक्ताः शुक्रं शीघ्रं विरेचयन्ति ॥ १७ ॥

वाजीकरण ओषधियां अपने प्रभाव से विरेचक औषधियों की तरह शुक्र का शीघ्र विरेचन करती हैं ॥ १७ ॥

विमर्शः- प्रथम कह आये हैं कि १ मास में शुक्र बनता है । अतः उसका यह अपवाद हैं कि कुछ ओषधियां पादलेप, स्पर्श नादि प्रभाव से तथा कुछ दुग्ध, घृत आदि स्वगुणोत्कर्ष से एवं सापादि स्वचल तथा स्वगुणोत्कर्ष दोनों कारणों से शीघ्र ही आहार रस से शुक्र का शुक्राशय में विरेचन ( प्रादुर्भाव ) करती हैं । प्राय- करोत्यहोरात्रात् कर्मान्यदपि । स्थनम् । ( वाग्भट ) किनिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम् । द्रव्य । गुणैन पाकेन प्रभावेग च किञ्चन ॥ रतेन बीर्येण गुणैश्च कर्म द्रव्य विपाकेन च यद्विदव्यात् । उद्योऽन्यथा तत्कुरुते प्रभावादर्थेनोरतत्तत्र न गोचरोऽस्ति ॥ ( अ ० सं ० ) । यथा हि पुष्पमुकुलस्थो गन्धो न शक्यमिहास्तीति वक्तुमथो नैवा ( नैव चा ) स्तीति; श्रथवाऽ ( च ) स्ति, सतां भावानामभिव्यक्तिरिति कृ ( ना ) त्वा, केवलं सौदम्यान्ना-भिव्यज्यते; स एव पुष्पे त्रिवृतपत्रकेशरे कालान्तरेणा- | भिव्यक्ति गच्छति एवं बालानामपि वयः परिणामाच्छु ।

क्रप्रादुर्भावो भवति, रोमराज्यादयञ्च विशेषा नारीणाम् ।

रजसि चोपचीयमाने शनैः शनैः स्तनगर्भाशययोन्य-भिवृद्धिर्भवति ॥ १८ ॥

जैसे पुष्पों के मुकुल ( कलिका ) में स्थित ' गन्ध है या नहीं '? ऐसा नहीं कहा जा सक्ता । अथवा ' है ' ऐसा कह सकते हैं क्योंकि ' पूर्व से विद्यमान भावों ( पदार्थों ) की ही अभि व्यक्ति ( आविर्भाव ) होती हैं ऐसा सिद्धान्त है । केवल सूक्ष्म होने के कारण कच्ची कली में गन्ध व्यक्त नहीं होती है किन्तु कुछ समय बीतने पर जब कलिका के पंखुड़ी, पराग विकसित होते हैं तब वही गन्ध प्रकट हो जाती है । इसी प्रकार बालकों में भी अवस्था ( आयु ) के बडने पर शुक्र का प्रादुर्भाव होता है तथा रोमराजी ( ढाढी, मूङ, गुह्याहों बाल ) उत्पन्न होती है एव स्त्रियों में गुह्याङ्गों पर रोमराजी होने के साथ २ रन के धीरे धीरे सञ्चित होने से स्तन, गर्भाशय ( Uterus ) ) और योनि ( Vagina ) की वृद्धि होती है ॥ १८ ॥

विमर्श - स्त्री और पुरुष दोनों जब यौवनावस्था में प्रवेश करते हैं तब उनके शुक्र और रज के उत्पादक अट्ठों में एक विशेष प्रकार का स्त्राव उत्पन्न होता है जिसे अन्नाव ( Internal secretion ) कहते हैं । यह चात्र रक्त में मिलकर शरीर के विविधाङ्गों में जाता रहता है जिससे वे अङ्ग प्रबल तथा पुष्ट होते हैं पुरषों में युवावस्था जाने पर स्वर बदल जाता है तथा स्त्रियों की मानसिक दशा में परिवर्तन होकर लना, हाव,

भावादि लक्षण प्रगट होते हैं ।

स एवान्नरसो वृद्धानां जरापरिपक्वशरीरत्वाद-प्रीणनो भवति ॥ १ ९ ॥

वही अन्न का रस वृद्ध पुरषों में बुढापे के कारण शरीर के परिपक्व होने से पुष्टिकारक नहीं होता है ॥ १ ९ ॥ विमर्श - किसी भी उत्पन्न वस्तु की स्थिति रहने की मर्यादा होती है । कोई भी वस्तु कार्य में आते रहने से पुरानी हो जाती है चाहे वह चैतन्य सृष्टि की हो अथवा जड सृष्टि की । इसी तरह शारीरिक या मानसिक कार्य करते रहने से तथा समय के बीतते रहने से शरीर के सेल या परमाणु कार्य करने में शिथिल होते है पाचन, रस का ग्रहण और मलों के उत्सर्ग ठीक रूप से नहीं होते हैं! वृद्धावस्था में शरीर की धमनियों में कठिनता उत्पन्न होकर धमनोदार्थ ( Arterio sclerosis ) हो जाता है जिससे रस सवार शरीर में पूर्ववत् न होने से अङ्ग पोषण रहित होकर मनुष्य को मृत्यु के निकट पहुंचाते हैं । मनुष्य की आयु धमनियों पर निर्भर करती है । ( A man is as old as his arteries त एते शरीरधारणाद्धातव इत्युच्यन्ते ॥ २० ॥

ये रसादि सात धातु शरीर को धारण करते हैं इसलिये इन्हें धातु कहा जाता है ॥ २० ॥

विमर्गः - डुवाय् - वारणपोपनयो ' अर्थात् धारण और पोषण अर्थ की ' दुधाञ् ' धातु से धातु शब्द सिद्ध होता है अत ' जो शरीर का धारण और पोषण करता हो उसकी धातुसंज्ञा | है | ये सात हैं तथा सिरा, स्नायु, त्वचा, बसा आदि सात उपधातु हैं । शिवदास ने लिखा है कि- धातुशब्दप्रवृत्तेर्वारण-पोषणनिमित्तत्वाद तेन ये शरीर धारयन्ति धातूश्च पुष्यन्ति रसा-ढल व मुख्या धातुशब्दवाच्या न सन्यादयः । ते हि शरीर धारयन्त्येव न तु निचित्पुनन्ति । क हि नोजेन - सिरात्नायुरन त-। न्यत्वचो गतिविवर्जिताः । वातुम्यवोपजायन्ते तत्मात उपघातवः ॥ ! उपधातुओं की धातुओं से ही उत्पत्ति होती है । जैसे- -रताव | तन्य तत्रो रकमलून कण्डरा सिरा. मांसाद्वता त्वच. षट् च । नेदस स्नायुसन्यय ॥ अस्म्नो दन्तालथा मन्य केला ओजश्च सप्तनात् । धातुभ्यश्चोपनायन्ते तत्नात उपधातत्र ॥ स्तन्यादिक शरीर का धारण अवश्य करते है किन्तु पोषण नहीं करते हैं । | अतएव इन्हें उपधातु माना है किन्तु रसादि शुक्रान्त सात । वस्तुओं से शरीर का धारण और पोषण दोनों होता है अतः ! बे नतु हैं । मांस और शुक्र को छोड़कर शेष पांच धातुएं | धारणार्थक दृष्टि से Connective tissue में अन्तर्भूत हो सकती हैं । शुक्र विशिष्ट अङ्गों का स्राव है अतः इसे डाक्टरीनत में धातु नही माना है । तेषां तयवृद्धी शोणितनिमित्ते तस्मात्तदधिकृत्य वक्ष्यामः । तत्र, फेनिलमरुणं कृष्ण परुपं तनु शीघ्रगमस्क-न्द्रिच वातेन दुष्टम् । नीलं पीतं हरितं श्यावं विस्रमनिष्टं पिपीलिकामक्षिकाणामस्कन्दि च पित्तदुष्टम् । गैरिकोदक-प्रतीकाशं स्निग्धं शीतलं वहलं पिच्छिलं चिरस्रावि मांसपेशीप्रमं च श्लेष्मदुष्टम् । सर्वलक्षणसंयुक्तं कालि-काभं विशेषतो दुर्गन्धि च सन्निपातदुष्टं पित्तवद्रक्ते-

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श्रध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् । ५३

नातिकृष्णं च द्विदोषलिङ्गं संसृष्टम् । जीवशोणित-मन्यत्र वक्ष्यामः ॥। २१ ॥

इन धातुओं की क्षीणता और वृद्धि रक्त के कारण होती । है इसलिये रक्त के विषय में कुछ वर्णन किया जाता है । झाग-द्वार, किञ्चिद्रक्तवर्ण, काला, रूखा, पतला, शीघ्र बहने वाला और न जमने वाला रक्त बात से दूषित होता है । नीला, पीला, । हरा, काला, ( आम ) गन्ध वाला तथा चींटियों और मक्खियों के लिये अप्रिय और नहीं जमने वाला पित्त से दूषित । होता है । गेस के पानी के समान तथा चिकना, ठंढा, गाढा, चिपचिपा, मन्दगति से बहने वाला और मांसपेशी के समान दिखाई देने वाला कफ से दूषित होता है । इन तीनों लक्षणों से युक्त तथा काञ्जी के समान एवं अधिक दुर्गन्धि वाला । सनिपात से दूषित होता है । रक्तदोष से दूषित रक्त ' पिचदुष्ट रक्त ' के लक्षणों वाला होता है किन्तु वह काला अधिक होता । है । दो दोषों के लक्षणों वाला रक्त द्विदोषदुष्ट होता है । जीव-शोणित का वर्णन अन्यत्र किया जायगा ॥ २१ ॥

विमर्शः - शरीर के भीतर बहता हुआ रक्त जमता नहीं है । किन्तु शरीर से बाहर निकलने के पश्चात् शीघ्र जम जाता है । जमने से धन और इव ऐसे दो भाग हो जाते हैं । रक्त जमने के लिये खटिक के लवण ( Calcium salts ), फाईबिन और श्रौम्बिन आवश्यक हैं । खटिक लवण रक्त में ही होता है । श्रोम्विन श्वेतकण तथा सूक्ष्मकणों के विनाश से उत्पन्न एक विशेष पदार्थ का खटिक लवण के साथ संयोग होने से उत्पन्न होता है । रक्त जमने में ये तीनों पढ़ार्थ कारण हैं । जीवशो-णित - ' शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसयोगाश्रय रक्त ' को कहते हैं ऐसा ढल्हण का मत है । अन्यच— यद्युष्णोदक प्रक्षालितमपि वस्त्र रक्ष-यति तज्जीवशोणितमवगन्तव्यम् । इन्द्रगोपकप्रतीकाशमसंहतमविवर्णं च प्रकृतिस्थं जानीयात् ॥ २२ ॥

इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) के समान लालवर्ण वाला, असंहत अर्थात् न बहुत पतला और न अधिक गाढा हो एवं विकृत वर्ण वाला न हो उसे शुद्ध रक्त समझना चाहिये ॥ २२ ॥

विमर्गः - चरकोक्त विशुद्धरक्तलक्षण-- तपनीयेन्द्रगोपाभ पद्मा-लक्तकसन्निभम् । गुञ्जाफलसवर्णञ्च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ डाक्टरी मत से धमनीगत रक्त शुद्ध माना जाता है तथा उसमें लालिमा का कारण लालरक्तकणस्थ ' हीमोग्लोबिन ' है । हीमो-ग्लोबिन आक्सिजन को ग्रहण करता है जिससे कण अत्यधिक लाल होकर रक्त की लालिमा बढा देते हैं । शुद्ध रक्त न अधिक पतला और न अधिक गाढा होता है । इसका गुरुत्व १०५५ होता है तथा यह अपारदर्शक, स्वाद में कुछ नमकीन, प्रति-क्रिया में क्षारीय तथा एक विशिष्ट गन्ध से युक्त होता है । शरीर में रक्त का कुछ प्रमाण शरीर के भार का अंश के लगभग होता है I । जैसे यदि किसी के शरीर का भार १ मन

बीस सेर हो तो रक्त ३ सेर के लगभग होगा ।

त्रिस्राव्याण्यन्यत्र वक्ष्यामः ॥ २३ ॥

विनान्य अर्थात् जिन रोगियों का अशुद्ध रक्त निकालना चाहिये उनका वर्णन अष्टविथशस्त्रकर्माध्याय में किया जायगा ॥ २३ ॥

अथाविस्राव्याः सर्वाङ्गशोफः, क्षीणस्य चाम्ल-भोजननिमित्तः पाण्डुरोग्यर्शसोदरिशोपिगर्भिणीनां च श्वयथवः ॥ २४ ॥

अव अवितान्य ( रक्त निकालने के अयोग्य ) रोगियों को कहते । जिसके सारे शरीर में शोफ हो, क्षीण पुरुष का अम्ल-पदार्थों के भोजन से उत्पन्न हुये शोथ तथा पाण्डुरोगी, अर्शो-रोगी, उदररोगी, शोपरोगी और गर्भिणी ियों के शोध में रक्त नहीं निकालना चाहिये ॥ २४ ॥

तत्र शस्त्रविस्रावणं द्विविधं प्रच्छानं सिराव्यधनंच ॥ अत्र द्वारा रक्त का मोक्षण दो तरह से किया जाता है 1 एक प्रच्छान विधि से तथा दूसरा सिरावेध विधि से ॥ २५ ॥

तत्र, ऋन्त्रसङ्कीर्ण सूक्ष्मं सममनवगाढमनुत्तानमाशु च शखं पातयेन्मर्मसिरास्नायुसन्धीनां चानुपघाति ॥ २६ ॥

इनमें प्रधान सीधा, असंकीर्ण ( एक दूसरेसे से मिला न हो ), वारीक, समान, अधिक गाढा नहीं, अधिक उत्तान भी नहीं हो, ऐसा करना चाहिए । मर्म, सिरा, स्नायु तथा सन्धियों का बचाव करते हुये शीघ्र शस्त्र द्वारा दूषित स्थान पर प्रच्छान करना ( चांचवे लगाना ) चाहिये ॥ २६ ॥

विमर्श: - वाग्भटे प्रच्छानविधि. गात्र वद्धोपरि दृढ रज्ज्वा पट्टेन वा समम् । स्नायुसन्ध्यस्थिमर्माणि त्यनन् प्रच्यानमाचरेत् ॥ अधोदेशप्रविसृतैः पदैरुपरिगामिभिः । न गाढघनतिर्यग्भिर्न पदे पदमाचरेत् ॥ तत्र, दुर्दिने दुर्विद्धे शीतवातयोरस्विन्ने भुक्तमात्रे स्कन्दत्वाच्छोणितं न स्रवत्यल्पं वा स्रवति ॥ २७ ॥

दुर्दिन अर्थात् मेघ वर्षा के कारण अन्धेरा होने पर ( मेघ-च्छन्नेऽह्नि दुर्दिनम् ), सिरा, सन्धि के वैद्यसर्जन के अनभ्यास- दोष से दुर्वेध होने पर, शीत और वायु के लगने से, स्वेदन कर्म के विना किये तथा तुरन्त भोजन करने के | बाद ही प्रच्छान करने पर रक्त स्कन्दित हो ( जम ) जाता | है अत एव उसका स्राव होता ही नहीं अथवा अल्प स्रवित होता है ॥ २७ ॥

मदमूर्द्धाश्रमार्त्तानां वातविरमूत्रसङ्गिनाम् ।

निद्राऽभिभूतभीतानां नृणां नासृक् प्रवत्तते ॥ २८ ॥

भांग, गांजा, अफीम आदि के द्वारा उत्पन्न मद, मूर्च्छा तथा श्रम से पीडित, अपान वायु, मल और मूत्र के अवरोध | वाले तथा निद्रा से व्याप्त और डरे हुये मनुष्यों का रक्त टीक । तरह से नहीं निकलता है ॥ २८ ॥

तद् दुष्टं शोणितमनिर्ह्रियमाणं कण्डूशोफरागदाह-। पाकवेदना जनयेत् ॥। २६ ॥

उक्त मनुष्यों का दूषित रक्त शरीर से नहीं निकलने पर देह में खुजली, शोफ, लालिमा, जलन, पाक और वेदना उत्पन्न करता है ॥ २ ९ ॥ श्रत्युष्णेऽतिस्विन्नेऽतिविद्धेऽज्ञैविस्रावितमतिप्रवर्त्त-ते । तदतिप्रवृत्तं शिरोऽभितापमान्ध्यमधिमन्थतिमिर-

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५४ सुतसंहिता प्रादुर्भावं धातुक्षयमाक्षेपकं पक्षाघातमेकाङ्गविकारं तृष्णादा हिक्कां कासं श्वासं पाण्डुरोगं मरणं चापादयति ॥ ३० ॥

अधिक उष्ण ऋतु या परिस्थिति में, अधिक स्वेदन करने पर, अधिक वेध होने पर तथा अज्ञों द्वारा विस्रावण करने पर रक्त अधिक मात्रा से निकलता है । इस प्रकार से हुआ यह रक्तस्त्राव का अतियोग शिर का रोग, अन्धता, अधिमन्य और तिमिर रोग उत्पन्न करता है तथा धातुक्षय, आक्षेपक, पक्षा-वात, एकाङ्गघात, तृष्णा, ढाह, हिवा, कास, श्वास, पाण्डुरोग तथा मृत्युजनक होता है ॥ ३० ॥

भवन्ति चात्र-तस्मान्न शीते नात्युष्णे नास्त्रिन्ने नावितापिते । यवागूं ं प्रतिपीतस्य शोणितं मोक्षयेद्भिषक् ॥ ३१ ॥

इसलिये न शीतकाल में, न अधिक गरमी के समय, न ज्यादा स्वेदन करा के और न अधिक तपा कर रक्तमोक्षण करे किन्तु प्रथम रोगी को थवागू पान करा कर पश्चात् रक्तमोक्षण करना चाहिये ॥ ३१ ॥

सम्यग्गत्वा यदा रक्तं स्वयमेवावतिष्ठते ।

शुद्धं तदा विजानीयात् सम्यग्वित्रावितं च तत् ॥ ३२ ॥ ।

शोणितमोक्षण से दूषित रक्त ठीक तरह से निकल कर स्वयमेव रक्तवहना बन्द हो जाय तब जाने कि अब शुद्ध रक्त है तथा सन्यन् विस्रावग हो गया है ॥ ३२ ॥

लाघवं वेदनाशान्तिर्व्याघैर्वगपरिक्षयः ।

सम्यग्विस्राविते लिङ्गं प्रसादो मनसस्तथा ॥ ३३ ॥

शरीर में या पीडित स्थान में हल्कापन की प्रतीति, पीढ़ा का शमन होना, रोग की तीव्रता का कम हो जाना तथा मन का प्रसन्न होना ये सम्यग् वित्तात्रण के लक्षण है ॥ ३३ ॥

त्वग्दोषा ग्रन्थयः शोफा रोगाः शोणितजाश्च ये ।

रक्तमोक्षणशीलानां न भवन्ति कदाचन ॥ ३४ ॥

जो मनुष्य समय २ पर रक्तमोक्षण कराते रहते हैं उनके त्वग्दोष ( अष्टादश कुष्ठ, शीतपित्तोदर्द कोठादि ), अपची, कण्ठमाला, गलगण्ड आदि ग्रन्थियों के रोग, गोफरोग तथा दुष्टशोगितजन्य रोग कभी भी उत्पन्न नहीं होते हैं ॥ ३४ ॥

त्रिमर्श — गोणितज्न्यरोग– मुखाकोऽक्षिरागश्च पूतित्रागात्य गन्न्दिा । गुल्नोग्क्रुशदीतर्नरकपित्तप्रनील्का । विभी रक्तमेहश्व प्रदरो वातचोणितम् ॥ वैवनन्निनाशस्त्र पिपासा गुरुगात्रता । सन्नाञ्चातिदौर्बल्यनरुचि शिरतञ्च रुक् ॥ विदाहश्चन्निधानस्य तिकान्लोद्गिरणं क्लम् । क्रोषः प्रचुरता बुद्ध सन्मोहो लवणा-त्यता ॥ त्वे शरीरदौर्गन्ध्य मद कम्पः स्वरक्षयः । तन्द्रानिद्राति योगश्च तनसञ्चानिर्झनन् ॥ करुक्कोठपिडकाः कुष्ठचमंदला-टयः । चिकारा सर्वं एवँने विडेयाः शोणितात्रया ॥ भीनोप्य निग्वरूक्षाद्य रुपक्रान्ताश्च ये गदाः । सम्यक् साध्या न सिद्धयन्ति रक्तजास्तान् विभावयेत् ॥ ( चरक ) । अथ खल्वप्रवर्त्तमाने रक्ते एलाशीतशिवकुष्टतगर-पाठाभद्रदारुविसृगचित्रकत्रिकटुकागारधूमहरिद्रार्का कुरनक्तमालफलैर्यथालाभं त्रिभिश्चतुर्भिः समस्तैर्वा चूर्णीकृतैर्लवणतैलप्रगाढैर्ब्रणमुखमव घ र्पयेदेवं सम्यक् प्रवर्त्तते ॥ ३५ ॥

यदि प्रदान करने से रक्त प्रवर्तित न हो तो इलायची, कपूर, कूठ, तगर, पाठा, देवदार, विढग, चित्रक, त्रिकटु, रसोई घर का धुआं, हरिद्रा, आक के अङ्कुर और करन के फल इनमें से यथाप्राप्त तीन, चार अथवा समस्त ओपधियों का चूर्ण करके लवण और तैल मिलाकर उससे ब्रणमुख का घर्षण करें । ऐसा करने से रक्त ठीक तरह से प्रवर्तित होता है । अथातिप्रवृत्ते रोधमधुकप्रियङ्गुपत्तङ्गगैरिकसर्जर-सर्साञ्जनशाल्मली पुष्पशङ्खशुक्तिमाषयवगोधूमचूर्णैः शनैः शनैर्व्रणमुखमवचूर्याङ्गुल्यम्रेणावपीडयेत् साल-सर्जार्जुना रिमेदमेषशृद्गघवधन्वनत्वग्भिर्वा चूर्णिताभिः क्षौमेण वा ध्मापितेन समुद्रफेनलाक्षाचूर्णैर्वा यथोक्कर्त्रण-बन्धनद्रव्यैर्गाढं बध्नीयात् । शीताच्छादनभोजनागारैः शीतैः परिपेकप्रदे हैश्वो पाचरेत् | क्षारेणाग्निना वा दहेद्यथोक्तम् | व्यधनादनन्तरं वा तामेवातिप्रवृत्तां सिरां विध्येत् । काकोल्यादिकार्यं वा शर्करामधुरं पाययेत् । एग हरिणोरभ्रशशमहिपवराहाणां वा रुधिरं क्षीरयूप-रसैः सुस्निग्धैश्चाश्नीयात् । उपद्रवांश्च यथास्त्रमुपचरेत् ॥ जब रक्त अधिक निकलने लगे और बंद न होवे तव पठानीलोध, मुलेठी, प्रियडु, पतन, गेरु, राल, रसोंत, सेमल के फूल, शंख, सीप, उडट, जौ और गेहूँ इनका चूर्ण बनाकर उससे धीरे धीरे व्रण के सुख को घर्षित कर अडली के अग्र-भाग से दवा देना चाहिये । अथवा साल, राल, अर्जुन, इरिमेद, मेढासिङ्गी, धव और धामन इनकी छाल को पीस कर उससे ब्रणमुख पर नवघर्षण करना चाहिये । अथवा क्षौम ( रेशमी ) वस्त्र को जलाकर उसकी राख से अवचूर्णन करें । किंवा समुद्रफेन या लाक्षाचूर्ण से व्रणमुख पर वर्पण करें, | तत्पश्चात् चौम, कार्पास आदि व्रणबन्धन द्वयों से गाढा बन्धन बाँध देना चाहिये । फिर उस स्थान पर शीतल पदार्थ ( क्मलपत्र, गीला वस्त्र ) से आच्छादन, शीतल ( दुग्ध, चांवल, शर्करा ) भोजन और शीतल मकान में शयन तथा शीतल ओषधियों ( चन्दन, हीवेर, खस ) का लेप और उन्हीं के क्वाथ से सेचन करना चाहिये । इन उपचारों से भी रक्त-स्त्राव बंद न हो तो क्षार अथवा अग्नि से जलाना चाहिये । अथवा व्यध के अनन्तर उस सिरा का रक्त बंद न हो तो उसी वेधित सिरा का दूसरी जगह पुनर्वेधन करना चाहिये । अथवा | काकोल्यादिगण की ओषधियों के क्वाथ को शक्कर तथा शहद से मीठा बनाकर पिलाना चाहिये । अथवा एण ( कृष्ण ) हरिण या तात्र हरिण, मँढा, खरगोश, भैंसा और सूकर इनका ताजा रक्त पिलाना चाहिये । अथवा दुग्ध और मूंग के यूप के साथ स्निग्ध भोजन कराना चाहिये । अन्य जो भी उपद्रव हों उनकी यथाशास्त्र चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३६ ॥

विमर्श: - इस तरह आयुर्वेद में अतिप्रवृत्त रक्त के निरोध के लिये शीतप्रयोग, उष्णप्रयोग, दहन, रक्तरोधक ओषधियों

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श्रध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् । ५४ का प्रयोग, अवपीडन और बन्धन ये ६ स्थानिक उपाय बताये । हैं । इनके अतिरिक्त डाक्टरी पद्धति में रक्तस्रुति निवारण के लिये उस स्थान को ऊंचा उठाना जैसे हाथ - पांव के रक्तस्राव में, इसमे वहां रक्त प्रवाह कम होकर बन्द होता है । धमनी । संदेश ( Arterry forceps ) से सिरा या धमनी को पकड कर दबा के थोडी देर तक रसना । टांका लगाना या ( Ligature ) करना इसके लिये Cat gat 1 का प्रयोग होता । है । अन्त्र नेपादीना शुकान्त्र ' तात ' इति स्थात शस्त्रच्छेदानन्तर सूक्ष्मसिरादिबन्धनादिषु युज्यते । रक्त सान्तीमाकृभ्य सन्दशेन सिरा भिषक् । वद्धा स्नाय्वादिभिर्गाढं व्रण वसंग वेष्टयेत् ॥ काकोल्यादिक्वाथ - उक्त बाह्य रक्तरोधक उपाय बताकर अब आभ्यन्तरीय औषधप्रयोग बताते हैं- पित्तदोप में तीर, कफ-ढोप में यूप, वातदोप में मांसरस देना यह उल्हण मत है । कुछ लोग ' दीप्ताति में क्षीरभोजन, मध्यमाग्नि में यूत्र भोजन और मन्दाग्नि में मांसरस देना ' अर्थ करते है । रिणादिक-रुधिरपान -- आयुर्वेद का मन है कि समान द्रव्य से समान | द्वन्य की वृद्धि होती है । सर्वेषामेव हि भावाना सामान्य वृद्धि-कारणन् । एवमेव सर्वधातुगाना सामान्ययोगाद् वृद्धिर्विपर्ययाद् | छास. । तस्मान्नासनाप्पायते मःसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः, नथा लोहित लोहितेनैन, मेदो मेदसा, वना वमया, अस्थि तरणा स्य्ना, नज्जा मज्ा, शुक्र शुक्रेप, गर्भस्त्वामणि । ( चरक ) । पाश्चात्य विज्ञान ने महर्षि चरक के वचनों पर श्रद्धा कर अनेक । अन्वेषण करके भिन्न २ ग्रन्थियों का अन्तःस्राव तथा रक्त, मांसादि की अनेक क्षोपधियाँ ( इंजेक्शन ) निकाल कर असाध्य रोगों में आश्चर्यजनक समुन्नति को है किन्तु भारतीय चिकित्मक अहिंसा, आलस्य और अकर्मण्यता की गहरी नींद में सो रहे हैं जिससे देश का लाखों रुपया प्रतिवर्ष विदेशों को जा रहा है । अनेक पाश्चात्य औषधनिर्मापक कम्पनियों ने रक्तस्थ ' हीमोग्लोबीन ' के अनेक प्रयोग पीने के लिये बनाये हैं । एक मनुष्य के रक्त को दूसरे अल्प रक्त वाले मनुष्य के शरीर में सिरा द्वारा प्रवेश ( Blood transfusion ) भी करते है । घोड़े के रक्त की लसीका ( Serum ) मुस द्वारा अथवा इब्जेक्शन द्वारा रक्तस्राव रोकने में प्रयुक्त होती है रक्तस्राव में हृढयोत्तेजक ओषधियां ( कर्पूर, चन्द्रोदय, कस्तूरी, कोरा-मीन ) नही देनी चाहिये ।

भवन्ति चात्र-धातुक्षयात् स्रुते रक्ते मन्दः सज्जायतेऽनलः ।

पवनश्च परं कोपं याति तस्मात् प्रयत्नतः ॥ ३७ ॥

तं नातिशीतैर्लधुभिः स्निग्धैः शोणितवर्धनैः ।

ईपदम्लैरनम्लैर्वा भोजनैः समुपाचरेत् ॥ ३८ ॥

रक्त होने पर शरीर की अन्य मांस, मेदआदि धातुएं भी क्षीण हो जाती है जिससे उस मनुष्य की अग्नि मन्द हो जाती है तथा वात भी अत्यन्त कुपित हो जाता है इसलिये प्रयत्नपूर्वक उस मनुष्य को न अधिक ठण्डे तथा हलके, स्निग्ध, रक्तवर्द्धक और कुछ खट्टे अथवा अम्लरहित पदार्थों का भोजन कराना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ विमर्शः --- वाग्भट का भी ऐसा ही मत है । नात्युष्णशीत लघु दीपनीय रक्तेऽग्नीते हितमन्नपानम् । तदा शरीर नवस्थि-तागग्निर्विशेपादिति रक्षितत्र्यः ॥ रक्तवर्धक पदार्थो को ( Haematics या Haematinies कहते हैं । रक्तवृद्धि के लिये लौह के यौगिक जैसे- शिलाजत्वादि लौह, शतमूल्यादि लौह, नवा-यस लौह तथा लौहयुक्त साधपदार्थ जैसे टमाटर, आं मुख्या, पुनर्नवा शाक, आलू, बादाम, अण्डे आदि उत्तम होते है । सखिया ( Arsenio ) भी शोणितवर्धक है । इनके अतिरिक्त हीमोग्लोबिन सीरप, हीमोवीन सीरप, हीमो सीरप एव यकृत के प्रिपेरेशन हीपेटेक्स, लीवर इक्सट्रेक्ट आदि का प्रयोग उत्तम प्रमाणित हुआ है ।

चतुर्विधं यदेतद्धि रुधिरस्य निवारणम् ।

सन्धानं स्कन्दनं चैव पाचनं दहनं तथा ॥ ३ ९ ॥

व्रणं कपायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम् ।

तथा सम्पाचयेद्भस्म दाहः सङ्कोचयेत् सिराः ॥ ४० ॥

रुधिर के अतिस्राव को रोकने के लिये सन्धान, स्कन्दन, पाचन और दहन ये चार प्रकार के उपाय है । इनमें कपाय रम वाले द्रव्य - जैसे न्यग्रोध, उदुम्बर, लोध, हरीतकी ये पदार्थ व्रण का सन्धान ( जोड या मिलान ) कर रक्तस्राव को रोकते है । हिम ( शीतल ) पदार्थ - रक्त को स्कन्दित ( जमाते या गाढ़ा ) करते है । रेशम आदि की भस्म - पाचन करती है । दाहकर्म - सिराओं का सोचन कर रक्तस्राव चन्द करना है ॥ ३ ९ -४० ॥

स्कन्दमाने रुधिरे सन्धानानि प्रयोजयेत् ।

सन्धाने भ्रश्यमाने तु पाचनैः समुपाचरेत् ॥ ४१ ॥।

कल्पैरेतैस्त्रिभिर्वैद्यः प्रयतेत यथाविधिः ।

असिद्धिमत्सु चैतेषु दाहः परम इष्यते ॥ ४२ ॥

शीतोपचार से रक्त का स्कन्दन नहीं होने पर कपायरस -प्रधान द्रव्यों द्वारा सन्धान क्रिया करनी चाहिये । सन्धान-क्रिया से लाभ न होने पर भस्म द्वारा पाचन क्रिया करनी चाहिये । वैद्य को चाहिये कि प्रथम वह इन तीन विधियों से ही रक्तस्राव को रोकने का प्रयत्न करे । यदि इन विधियों से सिद्धि प्राप्त न हो तब दाहक्रिया द्वारा रक्तस्राव चन्द करना चाहिये ॥ ४१–४२ ॥ विमर्शः -- सिरा या धमनी से रक्तस्राव होता हो तो तप्त-द्वारा दाह करे किन्तु समस्त व्रण से अर्थात् तद्गत केशिकाओं से स्राव होता हो तो १३० से १६० फैरन हीट उष्णता वाले जल से प्रक्षालित करने सेर कस्राव बन्द हो जाता है । प्रथम प्रकृति स्वय रक्तस्राव रोकने का कार्य करती है । जिससे प्रथम रक्त बाहर आते ही गाढ़ा होने लगता है तथा थोडी देर में थक्का बन कर वाहिनी के मुख को बन्द कर देता है । दूसरा उपाय वाहिनियों की दीवाल संकुचित मुख छोट जाने से रक्त जमने में सहायता होती है । इन दो प्राकृतिक । उपायों से लाभ न होने पर चिकित्सा करते हैं । कपायरस रक्त और व्रणस्रावगत अल्ब्यूमीन आदि प्रोटीनों को जमाकर । रक्तस्राव वन्द करता है । शीत प्रयोग से रक्तवाहिनियों की दीवा संकुचित करके तथा दाह अल्ब्यूमिन आदि प्रोटीनों | को जमाकर तथा वाहिनियों को सङ्कुचित कर रक्तस्राव वन्द करता है ।

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सुश्रुतसंहिता | ५६

शेषदोषे यतो रक्तेन व्याधिरतिवर्त्तते ।

सावशेषे ततः स्थेय न तु कुर्य्यादतिक्रमम् ॥ ४३ ॥

रक्त के अन्दर कुछ दोष शेष रहने पर भी व्याधि अधिक नहीं बढती है अत एव रक्त में कुछ दोष शेष रहने पर रक्तस्राव । करना बन्द कर देना चाहिये परन्तु रक्त का अतियोग करना उचित नहीं है ॥ ४३ ॥

विमर्श: - शरीर से रक्तस्रुति कराने में रोगी के बल, दोष और शुद्ध रक्त का ध्यान रखना चाहिये । वलदोपप्रमाणाद्वा । विशुद्धया रुधिरस्य वा । रुधिर सावयेरजन्तोराशय प्रसमीक्ष्य वा । शरीर से ज्यादा से ज्यादा रक्त एक प्रस्थ निकालने का प्रमाण है । पर प्रमाणमिच्छन्ति प्रस्थ शोणितमोक्षणे । वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे ॥ सार्द्धत्रयोदशपल प्रस्थमाहुर्मनीषिण ॥ ( सुश्रुत ) । डाक्टरी मत से भी ज्यादा से ज्यादा ६०० सी. सी. ( प्राय: ५५ तोले ) रक्त निकाल सकते है । अतिरक्तस्त्राव से भयङ्कर रोग । तथा मृत्यु तक हो सकती है । अतिसुतौ हि मृत्यु स्याद् दारुणा वा चलामया । ( वाग्भट ) रक्त सशेषदोषन्तु कुर्यादपि विचक्षण । न चार्तिप्रस्तुत कुर्याच्छेप सशमनैर्जयेत् ॥ ( सु ० शा ० ) । हरेच्यङ्गादि- । भिः शेष प्रसादमथवा नयेत् । शीतपचार पितास्त्र क्रियाशुद्धिविशी-घणे ' । दुष्ट रक्तमनुद्रिक्तमेवमेव प्रसादयेत् ॥ ( अ ० हृ ० ) ।

देहस्य रुधिरं मूलं रुधिरेणैव धार्यते ।

तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीव इति स्थितिः ॥ ४४ ॥

शरीर का रक्त ही प्रधान पोषक है तथा रक्त ही से शरीर धारित होता है, इस लिये यत्नपूर्वक रक्त को रक्षा करनी चाहिये क्योंकि वास्तव मे रक्त ही जीव है ऐसी सब शास्त्रों की स्थिति ( राय ) है ॥ ४४ ॥

स्रुतरक्तत्य सेकाद्यैः शीतैः प्रकुपितेऽनिले ।

शोकं सतोद कोष्णेन सर्पिषा परिषेचयेत् ॥ ४५ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शोणितवर्णनीयो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

रक्तस्त्राव के पश्चात् उसे रोकने के लिये शीतल सेक आदि किये जाते हैं, उनसे यदि वायु कुपित होकर सुई चुभोने की सी पीडा के साथ २ शोथ हो जाय तो मन्दोष्ण घृत से परि पेचन करना चाहिये ॥ ४५ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाव्याख्यायां शोणितवर्णनीयो-नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

CAR पञ्चदशोऽध्यायः । दोषधातुमलक्षयवृद्धिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब यहां से दोप, धातु, मल इनके क्षय और वृद्धि के विशिष्ट ज्ञान कराने वाले अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ दोषधातुमलमूलं हि शरीरं, तस्मादेतेपां लक्षण-मुच्यमानमुपधारय ॥ ३ ॥

दोप, धातु तथा मल ही शरीर के मूल कारण है अत एव इनके लक्षण यहां कहता हूँ तुम उन्हें सुन कर धारण करो ॥३ ॥

विमर्श: -दोष शब्द से वात, पित्त और कफ इनका ग्रहण होता है । ये मिथ्या आहार - विहार के सेवन करने से कुपित होकर शरीर को दूपित करते है अतः इनकी ' ढोप ' संज्ञा है तथा समप्रमाण में रह कर शरीर को धारण करते है अतः इनकी ' धातु ' संज्ञा भी है । वायुः पित्त कफश्चेति त्रयो दोषा ' समासत ' । शरीरदूषणाद्दोषा धातवो देहधारणात् ॥ धातु -जो शरीर का धारण तथा पोपण करते हों उन्हें ' धातु ' कहते है । ' धातुशब्दप्रवृत्तेर्धा-रणपोषणनिमित्तत्वात्तेन ये शरीर धारयन्ति धातूश्च पुष्णन्ति रसा-दयस्त एव मुख्यतया धातुशब्दवाच्या । रसासृङ्मासमेदोऽस्थि मज्जाशुकाणि धातव सप्त दूप्या, मला. - मूत्रशकृत्स्वेदादयोऽपि च ॥ ( वाग्भट ) । “ मलिनीकरणान्मला. ” मूत्र, विष्ठा और स्वेद ये शरीर से नहीं निकलने पर मलिन ( रुग्ण ) कर देते हैं अतः इन्हें ' मल ' कहते है । आयुर्वेद तथा वेदान्तादि शास्त्रों में मनुष्य शरीर की तुलना वृक्ष के साथ करते हैं । जैसे वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय में मूल ( जब ) प्रधान होती है । तद्वत् शरीर की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में दोप, धातु और मल ये तीनों मूलभूत हैं । ऊर्ध्वमूलमध शाखमृपय पुरुष विदु । मूलप्रहारिणस्तस्माद रोगान् शीघ्रतर जयेत् ॥ ( वाग्भट ) तत्र, प्रस्पन्दनोद्वहनपूरण विवेकधारणलक्षणो वायुः पवधा प्रविभक्तः शरीरं धारयति ॥ ४ ॥

उन में प्रस्पन्दन, उद्वहन, पूरण, विवेचन और धारण इन पांच कार्यों को करने वाला वायु पांच प्रकार से विभक्त होकर शरीर को धारण करता है ॥ ४ ॥

विमर्श - वायु के पांच भेद है । व्यानोदानप्राणसमानापाना पञ्च भेदा. । प्रस्पन्दन - शरीर का चलना चलना ' व्यानकर्म ', उदहन - श्वास, प्रश्वास, भाषण आदि ज्ञानेन्द्रियाथों का धारण ' उदान कर्म ', पूरण उदर को आहार से भरना ' प्राणवायुकर्म ', विवेक - रस, मूत्र और मलों को विभक्त करना ' समानवायुकर्म ', धारण - वीर्य, मल, मूत्रादिक का अवेगावस्था में धारण तथा वैगावस्था में उत्सर्ग करना ' अपानवायु का कार्य ' है । विशिष्ट-वर्णन ' निदानस्थान प्रथमाध्याय ' में देखना चाहिये । हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले । उदान कण्ठदेशस्थो व्यान सर्वशरीरग ॥ रागपतितेजोमे धोष्मकृत्पित्तं पञ्चधा प्रविभक्त ' अग्निकर्मणाऽनुग्रहं करोति ॥ ५ ॥

राग, पक्ति, तेज, मेधा और उष्मा को करने वाला पित्त पांच प्रकार से विभक्त होकर अभि का कार्य कर के शरीर का । अनुग्रह ( उपकार ) करता है ॥ ५ ॥

विमर्शः -- रागकृत - रस को रक्त में परिवर्तित करने वाला ' रञ्जक पित्त ' है । " यस्तु यकृत्प्लीहो पित्त तस्मिन् रञ्जकोऽग्निरिति सज्ञा स रसस्य रागकृदुक्त " । आमाशयाश्रय पिप्त रक्षक रसरञ्जनात् । पक्तिकृत आहार को पचाने वाला ' पाचकपित्त ' है । पित्त पञ्चा-त्मक तत्र पक्वामाशयमध्यगम् । पचत्यन्न विभजते सारकिट्टौ पृथक् । पृथक् ॥ तत्रस्थमेव पित्ताना शेपाणामप्यनुग्रहम् । करोति वलदानेन

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श्रध्यायः १५ । सूत्रस्थानम् । ५७ पाचकं नाम तत्स्मृतम् ॥ तेज कृत् - ' तेजो दृष्टिरिति ख्यातम् ' • ' इसे ' आलोचक पित्त ' कहते हैं । मेधाकृत - बुद्धि को करने वाला या धारणाशक्ति को करने वाला ' वीर्धारणावती मेधा ' इसे ' साधक पित्त ' कहते है । ऊष्मकृर – शरीर को गरमी रखने वाला ' भ्राजक पित्त ' कहलाता है । बुद्धिमेवाभिधानाद्यै-रभिप्रेतार्थसाधनात् । सायक हृद्गत पित्त रूमालोचनत स्मृतम् ॥ दृक्स्थमालोचक त्वक्स्थं भ्राजक भाजनाच । वित्तस्थानानि --नाभिरामाशयः - स्वेदो लसीका रुधिर रस ॥ दृक् सर्शनञ्च पित्तस्य नाभित्र विशेषत | अभिकर्मगाइनुग्रह करोति - जैसे लौकिक अग्नि- दहन, पाचनादि कार्य करती है वैसे शरीरस्थ पित्त अग्नि । की तरह भीतर दहन पाचनादि कार्य करता है । विशेष वर्णन इसी स्थान के इक्कीसवे अध्याय में देखना चाहिये । सन्धिसंश्लेपणस्नेहनरोपणपूरणचलस्थैर्यकृच्छ् लेष्मा पञ्चधा प्रविभक्त उदककर्मणाऽनुग्रहं करोति ॥ ६ ॥

सन्धियों में संश्लेपण, शरीर में तथा भोज्यपदार्थों में स्नेहन, व्रणादि का रोपण, अक्षि का या शरीर का पूरण तथा बल और स्थिरता को करने वाला श्लेप्मा पांच प्रकार विभक्त होकर जल की तरह शरीर का अनुग्रह ( उपकार ) करता है ॥ ६ ॥

विमर्शः --- सन्धिसंश्लेपक श्लेप्मा को ' श्लेप्मक कफ ' कहते हैं । सन्धियों में एक प्रकार का द्रव होता है जिसे ' शायनो वियल फ्ल्यूड ' कहते हैं । जो कि सन्धि को चिकनी बनाये रखता है तथा उसकी गति में सुविधा उत्पन्न करता है । स्नेहाभ्यक्ते यथा ह्यचे चक्र साधु प्रवर्त्तते । सन्धय साधु वर्तन्ते सरिष्टा लेप्मणा तथा ॥ स्नेहनकारक कफ को ' क्लेदक ' कहते हैं, शेप को ' रोपक, ' ' तर्पक ' और ' अवलम्बक ' कहते हैं । स्नेहो वन्ध स्थिरत्वञ्च गौरवं वृपता वलन् । क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्माविकारजन् ॥ ( चरक ) । श्लेष्मा तु पञ्चधोर स्थ. सन्निकृष्य स्त्रवीर्यत । हृदयस्यान्ननीर्याच्च तत्स्य एवान्बुकर्मणा ॥ कफधाम्नाश्च शेषाणा यत्करोत्यवलम्वनम् । श्रतोऽवलम्बक श्लेष्मा यस्त्वामाशय सस्थित । क्लेद्रक सोऽन्नसघातक्लेदनाद् रसवोधनात् । वोधको रसनास्थायी गिर.सम्थोऽक्षितर्पणात् ॥ तर्पक सन्निसश्लेपात् श्लेष्मक सन्धिसु स्थित ' । इलेष्मस्थानानि – उर कण्ठशिर क्लोम -पर्वाण्यामाशयो रस । मेढो प्राण जिह्वा च कफस्य सुतरामुरः ॥ यद्यपि वात, पित्त और कफ ये एक एक ही हैं किन्तु स्थान तथा कार्यभेद से इनके भेट किये गये है । ' ते चैते दोषाः प्रत्येक पञ्चभि प्रकारैभिद्यन्ते | विशिष्टस्थानाश्रयेण क्रियाभेदात् यथैकोऽ-पि देवदन्तो या या क्रिया करोति तदनुरूपमेवानेक पाचकलावकादि-नाम लभते ( इन्दु ' ) । रसस्तुष्टिं प्रीणनं रक्तपुष्टिं च करोति, रक्त वर्ण-प्रसादं मांसपुष्टिं जीवयति च, मांसं शरीरपुष्टिं मेदसा, मेदः स्नेहस्वेदौ दृढत्वं पुष्टिमस्थनां च अस्थीनि देह-धारणं मज्जः पुष्टिं च, मज्जा प्रीतिं स्नेहं बलं शुक्रपुष्टिं पूरणमस्नां च करोति शुक्रं धैर्य्यं च्यवन प्रीतिं देहबलं हर्पं बीजार्थं च ॥ ७ ॥

आहारप्रसादजन्य ' रस ' - शरीर को प्रसन्न तथा तर्पित करता है एवं रक्त को पुष्ट करता है । ' रक्त ' - शरीर वर्ण का सु ० प्रसादन, मांसधातु का पोपण और जीवनदान करता है । ' मांस ' - शरीर एवं मेदोधातु की पुष्टि करता है । ' मेद ' - शरीर में स्नेहन, स्वेद और दृढता उत्पन्न करता है तथा अस्थि का पोपक है | ' अस्थियां ' - देह को धारण करती हैं तथा मजा की पुष्टि करती हैं । ' मज्जा ' - शरीर में प्रसन्नता, स्निग्धता, वल, शुक्र की पुष्टि और अस्थियों का पूरण करती है । ' शुक्र'-शरीर में धीरता अथवा वीर्यच्युति, प्रसन्नता, चल और प्रहर्ष तथा गर्भोत्पत्ति में वीज का कार्य करता है ॥ ७ ॥

विमर्श: - प्रथम धातु उत्तर धातु का पोषण करती है यह यहां दिखाया है । अस्थिया - जैसे मकान बनाने के पूर्व लोहे, लकढी आदि का ढांचा खडा कर उसके सहारे मिट्टी या ईंटे जोड़कर मकान खड़ा करते है उसी प्रकार अस्थियां देह को धारण करती हैं | अभ्यन्तरगते. सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहा. । अस्थि-सारैस्तथा देहा त्रियन्ते देहिना तथा ॥ शुक्रं स्फटिकाभ द्रव स्निग्ध मधुर मधुगन्धि च । शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभ तथा ॥ ( सुश्रुत ) । यह दुधिया रह्न का, गाढा, लसदार, क्षारीय प्रतिक्रिया वाला द्रव है जो शुक्राशय ( Vesicula seminales ) अष्टीलाग्रन्थि ( Prostate ), शिश्नमूलग्रन्थियां ( Cowpers glands ), शुक्रप्रणाली या वाहिनी ( Vas deferens ), लिटर की प्रन्थियां तथा शुक्रग्रन्थियों के रसों के मिश्रण का नाम । ' शुक्र ' ( Semen ) है । वीजार्थ च - शुक्र की ' सूक्ष्मदर्शकयन्त्र ' द्वारा परीक्षा करने पर उसमें इधर उधर दौड़ते हुये असंख्य जीव दिखाई देते हैं । इन्हीं के ऊपर गर्भ का धारण निर्भर करता है । शुक्र इन्हीं वीजभागों को पुष्ट करता है । इनकी उत्पत्ति अण्डग्रन्थियों ( Testes ) में होती है । इन्हें ' शुक्राणु ' या ' स्पर्मेटोझोआ ' ( Spermatozoa ) कहते है । एक बार के मैथुन में निकले शुक्र में इनकी संख्या २० करोड़ से भी अधिक होती है । प्रत्येक शुक्राणु के तीन अवयव होते हैं । १ मुण्ड, २ मध्य, ३ पूंछ । झुण्ड - मोटा और अण्डाकार होता है । पूछ- नोकीली होती है । इनकी लम्बाई १००० से ५०० इच तक होती है । सवल शुक्राणु तेजी से दौड़ते है । किन्तु निर्वल शुक्राणु सुस्ती से । जो शुक्राणु प्रबल होता है । वही । स्त्री बीज ( Ora ) से मिलकर गर्भधारण कराता है । शेष शुक्राणु इस दौड़ में नष्ट हो जाते हैं । जब शुक्र में शुक्राणु न हो तो उस रोग को ( Azo - sperma ) तथा दुर्बल हो तो ( Oligo spermia ) और निश्चल हो तो ( Neorospermia ) कहते हैं । आजकल के विज्ञान ने पुजीव ( शुक्राणु ) तथा स्त्रीवीज ( Ova ) को परस्पर टेस्ट्यूव में मिलाकर उचित पोषक पदार्थ देकर गर्भोत्पत्ति की है । सगर के ६०००० हजार सन्तानों का तुम्विका में महर्षियों के तपोवल प्रभाव से उत्पन्न होना प्रसिद्ध है । हमारे पूर्वजों के विज्ञान के संमुख वर्तमान विज्ञान नगण्य सा है किन्तु खेद है कि वह परम्परा यवन तथा विदेशी राजाओं के आक्रमण से नष्ट हो गई । पुरीषमुपस्तम्भं वाय्वग्निधारणं च । बस्तिपूरण-विक्लेदकृन्मूत्रम् । स्वेदः क्लेदत्वक्सौकुमार्यकृत् || ८ || पुरीप शरीर का उपस्तम्भ ( अवष्टम्भन ) तथा वायु और अग्नि को धारण करता है । मूत्र वस्ति ( Bladder ) को पूरण तथा शरीर में आर्द्रता करता है । स्वेद शरीर में क्लेद । तथा त्वचा को सुकुमार करता है ॥ ८ ॥