श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 111–120
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 111–120
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सुश्रुतसंहिता । ५८ विमर्श - आंतों के अन्दर कुछ सूक्ष्म मल रहता है जो ऊर्ध्वमेषां क्षीणलक्षणं वक्ष्यामः- तत्र, वातक्षये शरीर को धारण करता है तथा राजयचमा में एवं दुर्वल रोगी मन्दचेष्टताऽल्पवाक्त्वमप्रहर्पो मूढसंज्ञता च । पित्तक्षये के उस मल की रक्षा करना बताया है । शुकायन्तं वल पुसा मन्दोष्मानिता निष्प्रभत्वं च । श्लेष्मक्षये रूक्षताऽन्त-मलाच जीवनम् । तस्माद्यत्नेन सरध्ये यक्ष्मिणो मलरेतमी ॥ दहि आमाशयेतरश्लेष्माशयशून्यता सन्धिशैथिल्यं
सर्वगतुक्षनार्तस्य दल नृत्य हि विट्वलन् । तृष्णा दौर्बल्यं प्रजागरणं च ॥ ११ ॥
रक्तलक्षणमार्त्तव गर्भकृञ्च, गभ गर्भलक्षणम्, स्तन्यं स्तनयोगपीनत्वजननं जीवनं चेति ॥ ६ ॥
शरीर के साधारण रक्त समान लक्षणों वाला ' आर्तव रक्त ' होता है तथा वह गर्भ की स्थिति करता है । गर्भ गर्म के लक्षणों को उत्पन्न करता है । स्तनों में होने वाला दुग्ध स्तनों की पुष्टता करता है तथा चालकों के लिये जीवन देता है ॥ ९ ॥
त्रिमर्श ' - गर्मकृध - प्राचीनों ने आर्तव के दो भेद माने हैं । एक ‘ > शुद्धानन ' है जो कि तीन, पाँच या क्वचित् सात दिन तक योनि मे निकलता रहता है वह शरीर तथा गर्भाशय की शुद्धि करना है । रजप्रसेकान्नारीणा मानि मानि विशुद्धयति । दूसरा नर्व शरीर दोषाच ॥ दूसरा ' शुद्धातत्र ' है जो कि स्त्री - पुरुष समागम के समय विसर्पित होता ( निकलता ) है । तथा गर्भाधान में भाग लेता है । घृतपिण्डो यथवान्निमाश्रित प्रवि-लीनते | विसर्पत्यार्त्तव नार्यास्तथा पुसा समागमे ॥ इसी धारणा | से इसे ' पुप ' तथा ' स्त्रीबीज ' कहा है । ' पुष्पवाले शुनिस्तस्मा-पानि व्रजेत् । सूक्ष्म केशप्रतीकाशा वीजरक्तवहा. सिरा । गर्भाशय पूरयन्ति मासाहीजाय कलने ॥ खीजननेन्द्रियों में गर्भाशय ( Uterus ) के दोनों ओर दो चीजग्रन्थियां या ग्रन्थियां ( Overies ) होती हैं जो कि दीर्घवन्धनों द्वारा गर्भाशय से बंधी है । गर्भाशय के ऊर्वभाग के दोनों पावों से दो डिम्बवह प्रणालिया या बीजवाहिनियां ( Fallopian tubes ) निकलती हैं जिनके आसिरी सिरे झालरदार होते है । इन दोनों डिम्बग्रन्थियों में ७२००० के लगभग ' डिम्ब ' होते है । प्रत्येक मासिकधर्म के समय एक चीज परिपक्क होकर निकलना है तथा डिम्बवाहिनी के झालरदार हिस्से में अटक कर वाहिनी में होता हुआ गर्भाशय में आता है । यदि इस समय इसका ' शुक्रकीट ' के साथ सम्मेलन हो जाय तो गर्भ रह जाता है । इस तरह आर्तव बीजोत्सर्ग करता है, गर्भाशय को शुद्ध करके उसकी क्ला को गर्भचिपकने योग्य बनाता है । यह निश्चित है कि इसी आर्जवकाल में गर्भ धारण होता है जिसका समन १६ दिन माना है । ऋतु स्वाभाविक स्त्रीणा
राननः षोडश स्मृता । गर्भनाजोग्नस्तु स एव समय स्मृत ॥
गर्म ” ञ्जनम्- “ नत्र सयॊगृगीतगर्भाया खिरानि श्रनो लानि. पिपासा दिन शुक्रशोणिननोरववन्ध फुरगज योने । उत्तरकार-एञ्जानि - स्तनको हुनुपना रोमराज्यमा । अक्षिमाणि चाप्यग्नाः सम्मी ” उन्नै विशेषत ॥ अन्यमनस्यनिगम्यादुद्विजनेऽ-शुभा । प्रसे सदन चापि गर्भिण्या रिमुच्यते ॥ तत्र विधिवत्परिरक्षणं कुर्वीत ॥ १० ॥
प्रहूनिस्य वातादि दोष, रमरक्तादि धातु तथा मल और इसके अनन्तर क्षीण वातादि दोपों के लक्षण कहते हैं-वान के क्षीण होने पर शरीर की चेष्टाओं का मन्द होना, बोलने की शक्ति अल्प हो जाना, मन की प्रसन्नता का अभाव तथा संज्ञा का अल्प होना ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । पित्त के क्षीण होने पर शरीर की गरमी और पाचकानि मन्द हो जाती है तथा शरीर प्रभा हीन हो जाता है । श्लेष्मा के क्षीण होने पर - सम्पूर्ण शरीर में रूक्षता, शरीर के भीतरी अह्नों में दाह तथा आमाशय के अतिरिक्त अन्य श्लेप्मा के आशयों में शून्यता प्रतीत होती है, एवं सन्धियों में शिथिलता, बार बार प्यास लगना, देह मे दौर्बल्य एव निद्रा का न आना ये लक्षण उत्पन्न होते है ॥ ११ ॥ 0
विमर्श -प्रभा - शरीर के तेज ( Lustre ) को ' प्रभा ' कहते है । ग्लेम्माशया - डर कण्ठशिर क्लोमपर्वाग्यामाशयोर स । मैदो प्राणञ्च जिहा च कफस्य सुतरानुरः ॥ क्षोणा जहति स्व लिङ्गम् ।
कर्मण. प्राकृताद्वानिर्वृद्धिर्वाऽपि विरोधिनाम् । ( चरक ) ।
तत्र स्वयोनिवर्धनान्येव प्रतीकारः ॥ १२ ॥
इन दोपों की क्षीणावस्था में इन दोपों की उत्पत्ति को करने वाले द्रव्यों का ही प्रयोग करना ही प्रतीकार या चिकित्सा है ॥ १२ ॥
विमर्श - वातव पुन शारीग समानगुणै समानगुणभूयि-छैर्वा वाय्वाहारविहारैरभ्यस्यमानर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, कर्मापि यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकर तत्तदासेव्यम् ' ( चरक ) । वानक्षये श्रीतरूक्षैर्नत्वन्यै कटुकादिभि । पित्तक्षयेऽपि कटुकैरुष्णैर्न लवणादिभि • ॥ क्षीरादिभि. स्निग्धशीते प्रतिकुर्यात् कफ्क्षये । अन्यश्च – वातक्षये कटुतिक्तकषाय-रूक्षलघुशीनानाम् । पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णतीक्ष्णानाम् । इलेष्मक्षने स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलाना द्रव्याणाम् । ( चरक ) । रसक्षये हृत्पीडाकम्पशून्यतास्तृष्णा च । शोणित-क्षये त्वक्पारुष्यमम्लशीतप्रार्थना सिराशैथिल्य च । मांसक्षये स्फिग्गण्डौष्टोपस्थोरुवक्षः कक्षापिण्डिकोदर • ग्रीवाशुष्कता रौक्ष्यतोदौ गात्राणां सदनं धमनीशैथिल्यं च । मेदःक्षये प्लीहाभिवृद्धिः सन्धिशून्यता रौक्ष्यं मेदुरमास प्रार्थना च । अस्थिक्षयेऽस्थिशूल दन्तनख-भङ्गो रौक्ष्यं च । मज्जक्षयेऽल्पशुक्रता पर्व भेदोऽस्थि-निस्तोदोऽस्थिशून्यता च । शुक्रक्षये मेढवृपणवेदनाऽ-शक्तिमैथुने चिराद्वा प्रसेकः प्रसेके चाल्परक्तशुक्र-दर्शनम् ॥ १३ ॥
रस के क्षीण होने पर - हृदय में पीड़ा, सर्वाङ्ग या हस्तपाद-कम्प, अर्को की शून्यता तथा प्यास ये लक्षण होते हैं । रक्त के | क्षीण होने पर त्वचा में कठोरता ( खुरदरापन ), अम्ल तथा स्तन्यादि उपधातुओं की यथाशास्त्रविधि से रक्षा करनी गाठे पढार्थों के खाने की इच्छा तथा सिराओं ( धमनियों ) चाहिये ॥ १० ॥ मैं शिथिलता ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । मास के क्षीण होने पर -
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श्रध्यायः १५ ] सूत्रस्थानम् । ५६ स्फिक् ( नितम्बप्रदेश ), कपोल, ओष्ठ, जननेन्द्रिय, ऊरु, ) वक्ष ' स्थल, कक्षा, पिण्डिका ( जांघ या पिण्डलियां ), उदर और ग्रीवा ये स्थान सूख जाते हैं तथा रूक्षता, सूई चुभोने की सी पीड़ा, शरीर में पीडा और धमनियों में शिथिलता ये लक्षण उत्पन्न होते है । मेदोवातु की क्षीगता में प्लीहा की वृद्धि, सन्धियों में शून्यता, रूक्षता और स्निग्ध मांस या मेदस्वी । प्राणियों के मांस खाने की इच्छा होती है । अस्थि धातु की क्षोणता में - अस्थियों में शूल, दन्त और नाखूनों का टूटना तथा । रूक्षता ये लक्षण पैदा होते है । मज्जा की क्षीगता में शुक्र कम होना, जोडों में भेदन सी पीडा, अस्थियों में सूई चुभोने की सी पीडा और अस्थिशून्यता ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । शुक्र के क्षोण होने पर - मेढ ( लिङ्ग ) तथा घृपण में वेदना, मैथुन करने में अशक्ति अथवा मैथुन करने पर भी देरी से वीर्य का निकलना और निकले हुये स्राव में कुछ रक्त तथा शुक्र का दिखाई देना ये लक्षण उत्पन्न होते है ॥ १३ ॥
विमर्शः - शुक्रक्षये चरक — क्षयमपि चोपगच्छति तसि मैथुनमापद्यमानस्य न शुक्र प्रवर्तते अतिमात्रोपक्षीणरेतस्त्वात् । तथाऽस्य वायुर्व्यायच्छमानस्यैव धमनोरनुप्रविश्य गोणितवाहिनी-स्नाभ्य शोणित प्रच्यावयति । तच्छुकक्षयादस्य पुन शुक्रमार्गेण
शोणितं प्रवर्तते वातानुसृतलिङ्गम् । ( च ० नि ० ) ।
तत्रापि स्वयोनिवर्धनद्रव्योपयोगः प्रतीकारः ॥ १४ ॥
धातुओं का क्षय होने पर भी अपनी २ उत्पत्ति को बढाने चाले द्वन्यों का उपयोग करना ही प्रतीकार ( चिकित्सा ) है ॥१४ ॥
विमर्श: - तुक्षय में समानगुण तथा समानगुणभूयिष्ठ द्रव्योपयोग और धातुवृद्धिकर कर्म करना श्रेयस्कर है । मास मासेन, लोहित लोहितेनैव, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरु णास्थ्ना, मज्जा मज्या, शुक्र शुक्रेण । समानगुणभूयिष्ठोदाहरण यथा -शुक्रक्षये क्षोरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धसमाख्यानानाञ्चापरेषा द्रव्याणाम् । ( चरक ) । पुरीषतये हृदयपार्श्वपीडा सशब्दस्य च वायोरूर्ध्व-गमनं कुत्तौ सञ्चरणं च । मूत्रक्षये बस्तितोदोऽल्पमूत्रता च । अत्रापि स्वयोनिवर्धनद्रव्याणि प्रतीकार । स्वेदक्षये स्तब्धरोमकूपता त्वक्शोषः स्पर्शवैगुण्यं स्वेदनाशा I
।
तत्राभ्यङ्गः स्वेदोपयोगश्च ॥ १५ ॥
पुरीष ( मल ) के क्षय होने पर हृदय और पार्श्व में पीडा, शब्दयुक्त वायु की ऊपर की ओर गति तथा उदर से वायु का सञ्चार होता है । मूत्रक्षीगता में - वस्ति में सूई चुभोने की सी पीढा तथा मूत्र कम आता है | नल और मूत्रक्षय की अवस्था में भी स्वयोनिवर्धकद्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । स्वेदक्षय होने पर - रोमकूप स्तब्ध ( बन्द ) हो जाते है तथा त्वचा में शुष्कता, स्पर्शज्ञान में विकृति और स्वेदनाश हो जाता है । इस अवस्था में तैलों द्वारा शरीर में अभ्यग और स्वेदनकर्म करना चाहिये ॥ विमर्श -मूत्रक्षयेऽन्यलक्षगानि - मूत्रक्षये मूत्रकृच्छ्र मूत्रवेवर्ण्यमेव च । पिपासा बाधते चास्स मुसञ्च परिशुष्यति ॥ ( चरक ) । म क्षयलक्षणम् - मलानामतिसूक्ष्माणा दुर्लक्ष्य लक्षयेत् क्षयम् । स्त्रमला-यनसशोषतोदशून्यत्वलाघवै ॥ ( वाग्भट ) । पुरीषक्षये— कुल्मापमा-पकुष्माण्डाऽजमध्ययवशाद्र्धान्याम्लानान् । मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवा-रुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणोपक्लेदिनाम् । ( चरक ) । रोम-पता - त्वचा में तैलग्रन्थियां तथा स्वेदग्रन्थियां होती हैं । इनसे त्वचा पर चिकना पदार्थ निकला करता है जिससे त्वचा चिकनी, कोमल और चमकयुक्त रहती है । स्वेदक्षय में रोमकूपों के अवरुद्ध हो जाने से उक्त ग्रन्थियों का चिकना स्राव त्वचा पर नही पहुंचने से वह शुष्क हो जाती है । तथा च वाग्भट - स्वेदे रोमच्युति, स्तन्नरोमता, स्फुटन त्वच । स्वेट-क्षयचिकित्सा - अभ्यङ्गव्यायाममद्यस्वप्न निवातशरणस्वेदै । ( अ सं. ) । आर्त्तवक्षये यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनि-वेदना च । तत्र संशोधनमाग्नेयानां च द्रव्याणां विधि-वदुपयोगः | स्तन्यक्षये स्तनयोम्लनता स्तन्यासम्भवोऽ-पता वा । तत्र श्लेष्मवर्धनद्रव्योपयोगः । गर्भक्षये गर्भास्पन्दनमनुन्नतकुक्षिता च । तत्र प्राप्तबस्तिकालायाः तीर बस्तिप्रयोगो मेध्यान्नोपयोगचेति ॥ १६ ॥
स्त्री के आर्तव के क्षीण होने पर - उचित समय पर रजःस्राव नही होना तथा होने पर अल्पमात्रा में रज का निकलना तथा योनिवेदना ये लक्षण उत्पन्न होते है । आर्तव में-विरेचन और उत्तरवस्ति द्वारा संशोधन तथा तिल, उड़द, और सुरा आदि आग्नेय द्रव्यों का यथाविधि प्रयोग करना चाहिये । दुग्ध के क्षय होने पर - स्तनों में ढीलापन या झुर्रियों का पड़ना, दुग्ध का अभाव अथवा अल्प भाना आदि लक्षण होते है | सन्यक्षय रोग में कफवर्द्धक द्रव्यों जैसे अष्टवर्ग, विदारीकन्द, वाराहीकन्द, शतावर का प्रयोग करना चाहिये । गर्भ के क्षीण होने पर - गर्भ के स्पन्दन का अभाव तथा माता की कुक्षि ( उदर ) का उभार नहीं होना आदि लक्षण उत्पन्न होते है । ऐसी स्थिति में गर्भिगी के आठवां मास शुरू हो जाय तो क्षीरवस्ति का प्रयोग तथा मेध्य अन्न का सेवन करना चाहिये ॥ १६ ॥
विमर्शः --- आग्नेयद्रव्योपयोगो यथा --- नत्र मत्स्यकुलत्थान्कति-लमापसुराहिता । पाने मूत्रमुदश्विच्च दधि शुक्तञ्च भोजने ॥ स्तन्य-परिभाषा - रसप्रसादो मधुर पक्वाहारनिमित्तज कृत्स्नदेहात् सनौ प्राप्य स्तन्यमित्यभिवीयते ॥ गर्भासन्दनेन --र्भस्य स्पन्दनाभाव, ईषत्स्पन्दन चिरात्स्पन्दनचेति त्रयो भात्रा गृप्सन्ते । गर्भक्षयचि-कित्सा - मेध्यान्नोपयोग. - मेषाय यज्ञाय हित मेध्य तदेवान्न मेध्यान्न क्षीरसर्पिरयागादिकमित्येतत् ( हाराणचन्द्र. ), गर्भस्त्वामगर्भेणेति चरक । तथा पयसा रसानामामगर्भाणा च गर्भवृद्धिकर, आमगर्भ-रसेन चाश्नीयाद, तानेव च तत्र भृष्टान् भक्षयेत् । अत ऊर्ध्वमतिवृद्धानां दोपधातुमलानां लक्षणं वक्ष्यामः । वृद्धिः पुनरेषां स्त्रयोनिवर्धनात्युपसेव-नाद्भवति ॥ १७ ॥
अब इसके पश्चात् अतिवृद्ध वातादि दोप, रसरक्तादि धातु तथा विण्मूत्रादि मलों के लक्षण कहते है । इनकी वृद्धि | इनकी उत्पत्ति करने वाले द्रव्यों के अधिक सेवन करने से होती है ॥ १७ ॥
तत्र, वातवृद्धौ बाक्पारुष्य काय काय गानम्फु-रणमुष्णकामिता निद्रानाशोऽल्पबलस्य गाढचर्चरश्च च ।
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सुश्रवसहित 1 पित्तवृद्धौ पीतात्रभासता सन्तापः शीतकामित्वमल्प-निद्रता मूर्च्छा बलहानिरिन्द्रियदौर्बल्यं पीतविण्मूत्रने - | त्रत्वं च । श्लेष्मवृद्धौ शौक्ल्यं शैत्यं स्थैर्य्यं गौरवमवसाद-स्तन्द्रा निद्रा सन्ध्यस्थिविश्लेपश्च ॥ १८ ॥
इनमें से वायु की वृद्धि होने पर - वोलने में कर्कशता, शरीर की कृशता और कालापन तथा अह्नों में फडकन, उष्ण आहार और बिहार की इच्छा, निद्रानाश, वल की अल्पता तथा विष्ठा में गाढापन ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । पित्त की वृद्धि में-त्वचा का पीलापन या उस रोगी को सर्व दृश्यों में पीतिमा का भास होना, देह में सन्ताप, शीत आहार और विहार के सेवन की इच्छा, निद्रा का कम आना, कभी २ मूर्च्छा होना, शरीर के बल की हानि, इन्द्रियों की अर्थग्रहण में दुर्बलता तथा विष्ठा, मूत्र और नेत्रों में पीलापन ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । कफ की वृद्धि में समस्त शरीर अथवा नख और नेत्रपलकों में सफेढी ढीखना, शीतल शरीर रहना, देह मैं स्थिरता, भारीपन, शारीरिक और मानसिक अवसाद, ग्लानि, तन्द्रा, निद्रा, संधि और अस्थियों में शिथिलता ये लक्षण उत्पन्न होते हैं ॥ १८ ॥
विमर्श ' – ' निद्रा श्लेष्मतमोभवा ' निद्राहेतुस्तम, यदा तु मनति क्लान्ते कर्मात्मन क्लमान्त्रिता । विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानव ॥ अन्यच्च - इलेष्मावृतेषु स्रोतस्तु श्रमादुपरतेप च । इन्द्रियेष स्वकर्मभ्यो निद्रा विशति देहिनम् ॥ ( अ ० स ० ) । तन्द्रा लक्षणम् - इन्द्रियार्थेष्वसन्प्राप्तिर्गेरिव जृम्भण क्लभ । निद्रार्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रा विनिर्दिशेत् ॥ सोऽतिवृद्धो हृदयत्क्लेदं प्रसेकं चापादयति । रक्तं रक्ताङ्गाङ्क्षितां सिरापूर्णत्वं च । मांसं स्फिगण्डौष्ठो-पस्थोरुवाहुजङ्घासु वृद्धिं गुरुगात्रतां च । मेदः स्निग्धा-ङ्गतामुदरपार्श्ववृद्धिं कासश्वासादीन् दौर्गन्ध्यं च |
अस्थ्यध्यस्थीन्यधिदन्तांश्च । मज्जा सर्वाङ्गनेत्रगौरवं च ।
शुक्रं शुक्राश्मरीमतिप्रादुर्भावं च ॥ १६ ॥
रस की अधिक वृद्धि होने से—- हृदय में उत्क्लेद ( मिच-लाहट ) तथा मुँह से लार का टपकना ये लक्षण होते हैं । अनि वृद्ध रक्त - शरीर के अह्न तथा नेत्रों में लालिमा और सिराओं में रक्त की अधिक पूर्ति करता है । अधिक वढा हुआ मास - नितम्ब, गण्ड ( कपोल ), ओष्ठ, मूत्रेन्द्रिय, ऊरुप्रदेश, बाहु और जङ्घाओ ( पिण्डलिकाओं ) में अधिक वृद्धि तथा शरीर में भारीपन पैदा करता है । अधिक बढी हुई मैदोधातु शरीर में अट्ठों की अधिक स्निग्धता, उदर और पसवादों की वृद्धि, कास, श्वास, शरीर में दुर्गन्धि ये लक्षण उत्पन्न करती है । अधिक वृद्ध अस्थि — चणकास्थियों तथा अधिदन्तों को उत्पन्न करती है । जतिवृद्ध मजा - शरीर के समस्त अङ्ग तथा र्मुहुः प्रवृत्ति बस्तितोदमाध्मानं च । स्वेदस्त्वचो दौर्ग-न्ध्यं कण्डूं च ॥ २० ॥।
अधिक बढी हुई विष्ठा --- पेट में आटोप ( अफारा ) तथा शूल उत्पन्न करती है । अधिक वढा हुआ मूत्र मूत्रवृद्धि ( ज्यादा मात्रा में मूत्र निकलना अथवा Hydrocele ), वार वार मूत्र की प्रवृत्ति, वस्ति में सूई चुभोने की सी पीढा और आध्मान इन लक्षणों को पेंढा करता है । अधिक मात्रा में वृद्ध स्वेद - त्वचा में दुर्गन्धि और खुजली उत्पन्न करता है ॥ २० ॥
विमर्श: - आटोपो गुटगुडागड आध्मानलक्षगम् — साटोप -मत्युग्ररुजमाध्मातसुन्दर भृशम् । आध्मानमिति त विद्याद्घोरं वात-निरोधनम् ॥ आध्मान को Tympanitis कहते हैं । आर्त्तवमगमर्दमतिप्रवृत्ति दौर्गन्ध्यं च | स्तन्यं स्तन-योरापीनत्वं मुहुर्मुहुः प्रवृत्ति तोद च । गर्भो जठराभि-वृद्धिं स्वेदं च ॥ २१ ॥
आर्तव के अधिक वढने पर - अङ्गों वेदना, रजःस्राव का अधिक होना और दौर्बल्य उत्पन्न होता है | अधिक वृद्ध दुग्ध - स्तनों में स्थूलता, वार २ दुग्ध की प्रवृत्ति तथा स्तनों मैं सूई चुभोने की सी पीढा को करता है । बढता हुआ उदर को बढाता है तथा पसीना पैदा करता है ॥ २१ ॥
तेपां यथास्वं संशोधन क्षपणं च क्षयादविरुद्धैः क्रियाविशेपैः प्रकुर्वीत ॥ २२ ॥
इन अधिक वढे हुये ढोप, धातु और मलों का क्षय से अविरुद्ध यथाविहित विशेष क्रियाओं द्वारा संशोधन तथा क्षपण ( हास या संशमन ) करना चाहिये ॥ २२ ॥
विमर्श. - दोषों की चिकित्सा चरक में भी ऐसे ही है 1 । ' वृद्धा क्षपयितव्या, क्षीणा वर्धयितव्या, सम्ग पालनीया ' क्षपण-वृद्धस्य तथा क्षपण कर्तव्य यथाऽन्यदोपस्य धातोर्वा वृद्धि क्षयो वा न भवति, ( चक्र ) | अविरुद्ध क्रिया - छिन्ना विश्वादिभिर्वायु पित्त
क्षौद्रफलत्रिकै । कफ गुडाकाद्यैव जयेद्दोपाविरोधिभिः ॥
पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वाद्वर्धयेद्धि परं परम् ।
तस्मादतिप्रवृद्धानां धातूनां ह्रासनं हितम् ॥ २३ ॥
पूर्व पूर्व धातु अधिक वढने से पर पर धातु को बढाती है ।
इसलिये अति प्रवृद्ध धातुओं का घटाना हितकारी होता है ॥२३ ॥
विमर्श - नाग्भटेऽपि - पूर्वा वृद्ध पर कुर्याद् वृद्ध क्षीणश्च तद्विधन् । क्षयेद् गृहयेच्चापि द्रोपधातुमलान् भिषक् । तावद्यावद-रोग स्यान्नरो रोगसमन्वित ॥ किन्तु उत्तर वृद्ध धातु अपने पूर्व की धातु को बढाती है । तेन परोऽपि वृद्ध पूर्व वर्धयति, तथा परोऽपि क्षीण पूर्व क्षपयति, तथा पूर्व. क्षीण पर क्षपयति । बललक्षणं बलक्षयलक्षणं चात ऊर्ध्वमुपदेयामः । विशेषकर नेत्रों में गुरुता उत्पन्न करती है । अधिक बढा तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत् हुना शुक्र - शुक्राश्मरी तथा वीर्य का अधिक पात करता है || १ ९ || खल्वोजस्तदेव वलमित्युच्यते, स्त्रशास्त्रसिद्धान्तात् ॥२४ ॥
विमर्श - मध्यस्थि - अधिकमस्थि अध्यस्थि । अस्थियों का स्वाभाविक आकार से मोटा होना इसे Hyper trophy अब इसके अनन्तर वललक्षण तथा बलक्षय लक्षण का कहते हैं । वर्णन करते है- रसादिक तथा शुक्रान्त धातुओं के उत्कृष्ट पुरीपमाटोपं सार भाग को ' ओज ' कहते है तथा अपने शास्त्र की परिभाषा -कुक्षौ शूलं च । मूत्रं मूत्रवृद्धि मुहु | नुसार उसी का दूसरा नाम ' वल ' है ॥ २४ ॥
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श्रध्यायः १५ ] सूत्रस्थानम् । ६१ विसर्ग - वस्तुतस्तु ओज और वल दोनों भिन्न हैं । आज । कारण है तथा वल कार्य है । ओज का रूप, रस और वर्ण होने से वह द्रव्य है किन्तु वल इसका कार्य है । केवल चिकित्सा की दृष्टि से कार्य और कारण में अभेद कर के दोनों को एक ही मान लिया है । तत्र वलेन स्थिरोपचितमांसता सर्वचेष्टास्त्रप्रति-घातः स्वरवर्णप्रसादो वाह्यानामाभ्यन्तराणां च करणा-नामात्मकार्यप्रतिपत्तिर्भवति || २५ || इस बल से मांसधातु स्थिर तथा पुष्ट होती है । मनुष्य । सर्व प्रकार के कार्यों को करने में समर्थ होता है तथा उसका । स्वर और वर्ण प्रसन्न ( निर्मल ) रहता है एवं बाह्य ( हस्तपा-ढादि ) तथा आभ्यन्तरिक मन, बुद्धि आदि कर्म और ज्ञाने-न्द्रियां अपने २ कार्य को करने में उत्तमरूप से प्रवृत्त होती हैं २५
भवन्ति चात्र-प्रोजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम् ।
विविक्तं मृदु मृत्स्नं च प्राणायतनमुत्तमम् ॥ २६ ॥
देहः सावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम् ।
तदभावाच्च शीर्यन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ॥ २७ ॥
ओज - सोमात्मक ( सौम्य ), स्निग्ध, शुक्ल, शीतवीर्य, स्थिर, प्रसरणशील, विविक्त अर्थात् श्रेष्ठ गुणयुक्त, कोमल, पिच्छिल और प्राणों का उत्तम आधार है । सनुष्यों का सर्व अवयवयुक्त शरीर इस भोज से व्याप्त रहता है । इस ओज का शरीर में अभाव हो जाने से मनुष्यों को देह विशीर्ण ( नष्ट ) हो जाती है ॥ २६–२७ ॥ त्रिमर्शः - वरके ओजवर्णन यथा - हृदि तिष्ठति यच्छुत्र रक्त मीपत् सपीनकन् । ओज शरीरे सख्यान तन्नागान्ना विनश्यति ॥ भ्रमरैः फलपुष्पेभ्यो यथा सम्रियते मधु । तद्वद्रोज शरीरेभ्यो गुणे सहियते नृणान् ॥ किसी ने ओज को उपधातु माना है — वेदो । दन्तास्तथा केशायनीजच सप्तमन् । इति धातुभवा ज्ञेया एते सप्तो-पधातवः । वाग्भट ने ओज को शुक्र का मल माना है— कफ पित्त मल खेषु प्रवेो नखरोन च । स्नेहोऽक्षित्वग्विनामोजो वातूना क्रमशो मयाः ॥ ओजका स्थान - सर्व मत से हृदय है । तथापि वह रक्त के साथ सारे शरीर में व्याप्त होकर रहता है । हृदयस्थमपि व्यापि तत्पर जीवितास्पदम् | कुछ आचार्यों ने आज के दो भेद किये हैं, पर और अपर । पर ओज - अष्टविन्द्वात्मक होता है तथा उसका स्थान हृदय है किन्तु अपरओज - अञ्जलि । परिमाणात्मक किचा अर्धाञ्जलिपरिमाणात्मक होता है तथा वह हृदयाश्रित धमनियों में रहता है । प्रागाश्रयस्योजसोऽष्टौ विन्दवो हृयाश्रना | अष्टविन्दुप्रमाण तदीपद्रक्त सनीनकन् ॥ अग्नि-सोमात्मकत्वेन द्विरूप वर्णित तत् ॥ चरके चक्रपाणि. - एतेन द्वि-विषमोजो दर्शनति, परमार । तत्राथलिपरिमाणमपर मलयप्रमाणन्तु परन् । सति हि परे चापरे चौजसि परस्येति विशेषण सार्थक भवति न त्वेकरूपे | अर्थादिपरिमितत्योजसो धमन्य एव हृन्याश्रिता स्थानम् । नथा प्रमेहेऽथलिपरिमितनेवाज. क्षीयते नाष्टविन्दुकन् । अस्य हि किञ्चित्क्षयेऽपि मरण भवति प्रमेहे लोज क्षये जीवत्येव तावत् । ओज अयलक्षगमपि अर्थाशयोज क्षय एव बोद्धव्यम् । ओज शब्दश्च यद्यपि रसेऽपि वर्तते, यदुक्त रसश्रजः सख्यात, इति, तथापि इह सर्व नातुमारमोजोऽभिधीयते । एतच्चौज उपधातुरूप केचिदाहु । वातुर्हि वारणपोषणयोगाद्भवति, ओजस्तु, देहधारकमपि न देहपोषकं तेन नाष्टमो धातुरोज । केचित्तु शुक्रविशेषमोज प्राहु, तच न मन. प्रीणाति । ओजसो दशगुणा - गुरु शीत मृदु इलक्ष्गं बहुल मधुर स्थिरम् । प्रसन्न पिच्छिलं स्निग्धमोजो दशगुण स्मृतम् ॥ पाश्चात्य विद्वानों ने स्वरूप और कार्य के अनुसार ओज को निम्न भिन्न २ रूप से माना है । न ० १ घृपणसार ( Internal secer • tion of the testicles ) नं ० २ बीजकोपसार ( Internal secretion of the overy ) नं ० ३ अष्टीलासार ( Prostatic secret1on ) नं ० 2 पीयूषग्रन्थिसार ( Pitutrine ) नं ० ५ जीवनीयद्द्रव्य ( Vitamins ) नं ०६ अल्ब्यूमीन ( Albumin ) नं ० ७ द्राक्षाश-करा Glycogen ). अभिघातात् क्षयात् कोपाच्छोका द्वयानाच्छ्रमात् क्षुधः ।
प्रोजः सङ्क्षीयते ह्येभ्यो धातुग्रहणनिःसृतम् ।
तेजः समीरितं तस्माद्विस्रंसयति देहिनः ॥ २८ ॥
चोट लगने से, ' धातुओं के क्षय से, क्रोध करने से तथा शोक, ध्यान ( चिन्तन ) और परिश्रम करने से तथा भूख के कारण ओज का क्षन होता है । इस तरह वायु से ( समीरित = चलायमान ) तेज ( ओज ) धातुग्रहण स्थान अर्थात् हृदय और धमनियों से निकल कर प्राणियों को अपने प्राकृतिक कार्यों से वञ्चित कर देता है ॥ २८ ॥
विमर्श: - यातवो गृह्णन्त एभिरिति धातुग्रहणानि वक्ष्यमाणानि स्रोतासि तेभ्यो निःसृतन् । तस्य विस्रंसो व्यापत् क्षय इति लिङ्गानि व्याप-न्नस्य भवन्ति । सन्धिविश्लेपो गात्राणां सदनं दोप-च्यवनं क्रियाऽसन्निरोधश्च विस्रसे । स्तव्धगुरुगात्रता
वातशोफो वर्णभेदो ग्लानिस्तन्द्रा निद्रा च व्यापन्ने ।
मूर्च्छा मांसक्षयो मोहः प्रलापो मरणमिति च क्षये ॥
व्यापन्न ( विकृत ) हुए ओज के विस्रंस, व्यापत् और तय ये लक्षण होते हैं । विस्रस में सन्धियों का विश्लेप ( Dislocation ), शरीर के अह्नों में पीड़ा, वातादि दोषों का अपने स्थानों से च्यवन ( भ्रष्ट ) होना तथा शारीरिक, मानसिक और वाचिक क्रियाओं का ठीक नही होना ये लक्षण होते है । ओज की व्यापत् में शरीर के अह्नों का निश्चल तथा भारी होना, वातिक शोथ, देह के वर्ण का बदलना, ग्लानि, निद्रा ये लक्षण होते हैं । ओज के क्षय में - मूर्च्छा मोह, प्रलाप और मरण तक हो सकता है ॥ २ ९ ॥ भवन्ति चात्र-यो दोषा बलस्योक्ता व्यापद्विस्रंसनायाः ।
विश्लेषसादौ गात्राणां दोषविस्रंसनं श्रमः ।
अप्राचुर्यं क्रियाणां च बलविस्रंसलक्षणम् ॥
व्यापद्, विस्रंस और क्षय ये वल ( ओज ) के तन्द्रा और , मांसक्षय, ३० ॥ तीन दोप कहे गये है । अङ्ग या सन्धियों का विश्लेप तथा उनमें पीड़ा, वातादि दोपों का स्थानभ्रष्ट होना, थकान तथा ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और मल, मूत्र, श्वास, रक्तसंवहन आदि कियाओं की प्रवृत्ति न होना ये बलविवस के लक्षण है ॥ ३० ॥
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६३ सुश्रुतसहिता ।
गुरुत्वं स्तब्धताऽङ्गेषु ग्लानिर्वर्णस्य भेदनम् ।
तन्द्रा निद्रा वातशोफो बलव्यापदि लक्षणम् ॥ ३१ ॥
अङ्गों में भारीपन, स्तब्धता तथा म्लानता, शरीर के वर्ण में भेद, तन्द्रा, निद्रा और वातिक शोफ ये वलक्षय के लक्षण हैं ।
मूर्च्छा मासक्षयो मोहः प्रलापोऽज्ञानमेव च ।
पूर्वोक्तानि च लिङ्गानि मरण च बलक्षये ॥ ३२ ॥
मूर्च्छा, मांसक्षय, मोह, प्रलाप, अज्ञान और पूर्वोक्त लक्षण तथा मरण ये वलक्षय के लक्षण है ॥ ३२ ॥
तंत्र विस्रंसे व्यापन्ने च क्रियाविशेपैरविरुद्धैर्बल-माप्याययेत् । इतरं तु मूढसज्ञ वर्जयेत् ॥ ३३ ॥
इनमें से विस्रम और व्यापद की अवस्थाओं में विशेष क्रियाओं से जो कि शरीर के बल, दोष और अग्नि के विपरीत नहीं रोगी वल को बढाना चाहिये । ओज क्षय के क्षीण सज्ञा वाले रोगी की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ ३३ ॥
विमर्शः – क्रियाविशेषै - जीवनीयोपधक्षीररसायास्तत्र भेपजम् ' । ( वाग्भट )
दोपधातुमलीणो वलक्षीणोऽपि वा नरः ।
स्त्रयोनिवर्धन यत्तदन्नपानं प्रकाङ्क्षति ॥ ३४ ॥
वातादि दोपों की क्षीणता, रसादि धातुओं की क्षीणता, चिण्मूत्रस्वेदादि मलों की क्षीणता तथा बल ( ओज ) की क्षीणता में रोगी अपनी अपनी उत्पत्ति को करने वाले अन्न और पान की आकाक्षा करता है ॥ ३४ ॥
विमर्श. - यवान् मुद्गान् हरेणूश्च रूक्षञ्च लघु भोजनम् । कपायकटुतिक्तञ्च वातक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥ तिलमापकुलत्थादिपि -। ष्टान्ननिकृतिं तथा । मस्तुशुक्ताम्लतक्राणि पित्तक्षीणस्तथा दधि ॥ मास माहिपवाराहमाज गुटगुरूणि च । श्लेप्मक्षीणोऽमिलपति क्षीर-स्वप्नदधीनि च ॥ इशुं मासरस मद्य मधुसर्पिर्गुडोटकम् | असृङ्मास यवागूञ्च रसक्षोगोऽभिकाङ्क्षति ॥ इत्यादि, शेपश्लोका टल्हण -टीकाया द्रष्टव्या ।
यद्यदाहारजातं तु क्षीणः प्रार्थयते नरः ।
तस्य तस्य स लाभे तु त तं क्षयमपोहति ॥ ३५ ॥
क्षीण मनुष्य जिस जिस आहार की आकांक्षा करे उस उस प्रकार के आहार समुदाय के प्राप्त हो जाने से उसी क्षय का नाश हो जाता है ॥ ३५ ॥
यस्य धातुक्षयाद्वायुः संज्ञां कर्म च नाशयेत् ।
प्रक्षीणं च वलं यस्य नासौ शक्यश्चिकित्सितुम् ॥ ३६ ॥
जिस रोगी के वातुक्षय होने से वायु कुपित होकर संज्ञा तथा शारीरिक क्रियाओं को नष्ट कर देती है और जिस रोगी
का शारीरिक, मानसिक तथा भात्मिक बल नष्ट हो गया हो ।
उसकी चिकित्सा करना शक्य नहीं है ॥ ३६ ॥
रसनिमित्तमेत्र स्थौल्य कार्थं च । तत्र श्लेष्मला -हार से विनोऽध्यशनशीलस्याव्यायामिनो दिवास्वप्नरत-स्य चाम एवान्नरसो मधुरतरश्च शरीरमनुक्रामन्नति स्नेहान्मेदो जनयति । तदतिस्थौल्यमापादयति । तम- । तिस्थूलं क्षुद्रश्वास पिपासाक्षुत्स्नप्नस्वेदगान दौर्गन्ध्यक्रथ-नगात्रसाद्गद्गटत्वानि चिप्रमेवाविशन्ति, सौकुमार्या-न्मेदसः सर्वक्रियास्त्रसमर्थः, कफमेदोनिरुद्धमार्गत्वा-चाल्पव्यवायो भवति, आवृतमार्गत्वादेव शेपा धातवो नाप्यायन्तेऽत्यर्थमतोऽल्पप्राणो भवति, प्रमेहपिडकाव्य-भगन्दरविद्रधिवातविकाराणामन्यतमं प्राप्य पञ्चत्वमु-पृयाति । सर्व एव चास्य रोगा बलवन्तो भवन्त्यावृतमा-र्गत्वात् स्रोतसाम्, अतस्तस्योत्पत्तिहेतुं परिहरेत् || ३७ || आहार रस के कारण ही मनुष्य में स्थूलता तथा कृशता उत्पन्न होती है । कफवर्द्धक आहार सेवन करने वाले, अध्यशन ( भोजन के ऊपर भोजन ) करने वाले, व्यायाम नहीं करने वाले तथा दिन मे शयन करने का स्वभाव वाले मनुष्य का ठीक तरह से नही पचा हुआ अधिक मधुर आमरस समग्र शरीर में भ्रमण करता हुआ अतिस्निग्ध होने से मेदो-धातु को उत्पन्न करता है तथा वह उत्पन्न मेटोधातु शरीर को अधिक स्थूल बना देती है । इस तरह अधिक स्थूल हुये | मनुष्य में क्षुद्रश्वास, पिपासा, तुधाधिक्य, निद्रा, स्वेट, शरीर में दुर्गन्धि, सहसा श्वास का रुक जाना, अह्नों की पीडा या थकान और गद्गद वाक् ( अव्यक्तवचन ) ये लक्षण उत्पन्न हो जाते है | मेढोधातु के सुकुमार होने से वह मनुष्य सर्वप्रकार की शारीरिक चेष्टाओं ( क्रियाओं ) में असमर्थ हो जाता है । कफ और मेदोधातु से शुक्रवह स्रोतसों के निरुद्ध हो जाने से स्त्री - सम्भोग करने में अधिक समर्थ नहीं होता है तथा अन्य रसादिवाहक स्रोतलों के मार्ग भी आघृत ( घिरे हुये ) हो जाने से शेष उत्तरोत्तर धातुएं अधिक पुष्ट नही होती हैं । जिससे वह रोगी अल्प जीवनशक्ति वाला हो जाता है । जीवन शक्ति व्याधिक्षमता ( Immunity ) के अल्प हो जाने से वह व्यक्ति प्रमेह, प्रमेहपिढका, ज्वर, भगन्दर, विद्वधि और वातविकार इन रोगों में से किसी एक रोग को प्राप्त कर मृत्यु को प्राप्त होता है । मेढ से रसादिवाहक स्रोतसों के मार्ग अवरुद्ध होने से प्राय सभी रोग बलवान् होते हैं इसलिये मेढोधातु को बढ़ाने वाले सभी आहार - विहार आदि कारणों को परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३७ ॥
विमर्श - अध्यानलक्षणम्- ' भुक्तस्योपरि भोजनमध्यशनम् ' किंवा - अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते । क्रवनलक्षणम्— श्वासरोधो हि योऽकस्मात् स क्राथ क्रयनच तत् । क्षुद्रश्वास-लक्षणम् - किञ्चिदारभमाणस्य यस्य श्वास प्रवर्तते । निपण्णस्यैति शान्तिञ्च स क्षुद्र इतिसति ॥ अतिस्वौत्यस्याष्टो दोपा - अतिस्थू-| लस्य तावदायुपो हासो जवोपरोधकृच्छ्रत्र्यवायता, दौर्बत्य, दौर्गन्ध्य स्वेदाबाध, क्षुदतिमात्र पिपासातियोगश्चेति भवन्त्यष्टी दोपा । उत्पन्ने तु शिलाजतुगुग्गुलुगोमूत्रत्रिफला लोहर-जोरसाञ्जनमधुयवमुद्द्रको रदूपकश्यामाकोद्दालकादीनां विरूक्षणच्छेदनीयानां द्रव्याणां विधिवदुपयोगो व्या-यामो लेखनवस्त्युपयोगश्चेति ॥ ३८ ॥
अतिस्थौल्य रोग के उत्पन्न हो जाने पर शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध गुग्गुलु, गोमूत्र, त्रिफलाचूर्ण, लौहभस्म, रसाञ्जन, शहद, यव, मूग, कोरदूषक ( कोदोधान ), श्यामाक, उद्दालक ( कुट्टू )
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श्रध्यायः १४ सूत्रस्थानम् । ६३ आदि वि याविधि सेवन करना चाहिये तं न का प्रयोग करना हितकर है । त्रिमर्ग. - रसानपा क्वाथसम क्षीर पाद पक्त्वा यत्रा धनन् । तत्रा रसाउन स्नान दो परम हितम् ॥ अन्यच्च -रसगर्भ रसाक्षनन् । ' उद्दारकान्न विरूक्षगीयानान् ' ( चरक ) । छेद-नलक्षगं चथा— डिल्प्टान् ककादिकान् दोषानुन्मूलयति यद्दलात् । छेउन तयथा द्वारा मरिचानि शिलाजतु ॥ ( शार्ङ्गधर ) | लेसन -बत्तिपरिचय ॰ — त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षौद्रक्षारसमन्विता । ऊपकादि-प्रतीवापा बस्तयो लेखना स्मृतः ॥ चरके स्थौलहरा सामान्यो-पाया - गुरुचापतर्पण श्रेष्ठ स्थूलाना कर्मन्त्रति । याननान्यन्नपानानि ब्लेम्ममेद्रोहराणि च ॥ रूक्ष बन्नाला रुक्षाण्युद्वर्तनानि च । प्रजागर न्यवायश्च व्यायाम चिन्तनानि च ॥ स्थौल्यमिच्छन् परित्यक्तु क्रमैगाभिप्रवर्धनेत् ॥ व्यानमनित्यो जोर्गाशी यवगोधूमभोजन । सन्त-कृपः स्थौल्य मुक्त्वा विमुच्यते ॥ तत्र पुनर्वातलाहारसेविनोऽतिव्यायामव्यवायाध्य-यनभयशोकध्यानरात्रिजागरणपिपासाक्षुत्कपायाल्पाश-नप्रभृतिभिरुपशोषितो रसधातुः शरीरमननुक्राम-न्नल्पत्वान्न प्रीणाति, तस्मादतिकार्य भवति, सोऽ-तिकृशः क्षुत्पिपासाशीतोष्णवातवर्षभारादानेष्वसहि-ष्णुर्वातरोगप्रायोऽल्पप्रागश्च क्रियासु भवति, श्वासका सशोपप्लीहोदराग्निसादगुल्मरक्तपित्तानामन्यतममा-साद्य मरणमुपयाति । सर्व एव चास्य रोगा बलवन्तो
भवन्त्यल्पप्राणत्वात् । अतस्तस्योत्पत्तिहेतुं परिहरेत् ॥ ३६ ॥
वातवर्द्धक द्रव्यों का भोजन करने वाले, व्यायाम, स्त्री-सम्भोग, अध्ययन, भय, चिन्ता, ध्यान, रात में जागना, प्यास, चुधा, कपायरस और थोड़ा भोजन इत्यादि कारणों से उपशोषित रस धातु शरीर में पूर्ण रूप से भ्रमण नही करती है तथा अल्पप्रमाण में होने से शरीर को पुष्ट नहीं करती है जिससे उस मनुष्य का शरीर अत्यन्त कृश हो जाता है । वह अत्यन्त कृश मनुष्य - तुन्ना, पिपामा, शीत, उष्ण, वायु, वर्षा और भारवहन में असमर्थ होकर वातरोगों से प्राय. पीडित तथा सर्व प्रकार के कार्यों में अल्पशक्ति वाला हो जाता है । इस प्रकार का मनुष्य - श्वास, कास, शोप, प्लीहा -वृद्धि, उदरवृद्धि, अग्निमान्ध, गुल्म, रक्तपित्त इनमें से किसी एक रोग को प्राप्त कर मर जाता है । उसकी प्राणशक्ति ( Immunity ) अल्प होने से सर्व प्रकार के रोग बलवान् होते हैं इसलिये शरीर को कृग करने वाले आहार - विहारादि कारणों का परित्याग कर देना चहिये ॥ ३ ९ ॥ उत्पन्ने तु पयस्याऽश्वगन्धाविदारिगन्धाशतावरी-बलाऽतिबलानागबलानां मधुराणामन्यासां चौषधीना मुपयोगः, क्षीरदधिघृतमां सशालिपष्टिकयवगोधूमानां च, दिवास्वप्नब्रह्मचर्यव्यायामबृंहणवस्त्युपयोगश्चेति ॥ कार्ग्य रोग उत्पन्न हो जाने पर - क्षीरकाकोली, अश्वगन्ध, विदारीकन्द, शतावर, खिरैटी, अतिवला, नागवला तथा अन्य । मधुर रस वाली ओपवियों का प्रयोग करना चाहिये । इनके । अतिरिक्त दुग्ध, दही, घी, मांस, शाली और सांठी चांगल, | जौ, गेहूं इनका सेवन तथा दिन में शयन, ब्रह्मचर्य, व्यायाम और वृंहण ( बलवर्द्धक ) वस्ति का उपयोग करना चाहिये ॥ ४० ॥
विमर्श: - चरक मे सद्य क्षीण तथा चिरक्षीण ऐसे कृश के दो भेड़ कर चिकित्सोपदेश किया है । तेपा सन्तर्पण तीं पुनरा-रयानमौषधम् । यत्तत्रात्वे समर्थं स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ॥ सद्य -क्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते । नर्ते सन्तर्पणाभ्यासाच्चिरक्षी-णस्तु पुष्यति ॥ देहाग्निदोषमै पज्य मात्राकालानुवर्तिना । कार्यमत्वर-माणेन भेषज चिरदुर्वले ॥ हिता मासरसास्तस्मे पयासि च घृतानि च । स्नानानि वस्तयोऽङ्गातर्पणास्तर्पणाश्च ये ॥ स्वप्नो हर्ष सुना शय्या मनसो निवृनि गम । नवान्नानि नव मद्य ग्राम्यानूपौढका रसा ॥ स्निग्धमुद्वर्तन स्नान गन्यमात्यनिषेवणम् । शुक्लवासो यथा-काल दोपाणामनसेचनम् ॥ रसायनाना वृष्याणा योगानामुपसेवनम् । हत्वाऽतिकामादन्ते नृणामुपचय परम् ॥ अचिन्तनाच्च कार्याणा ध्रुव सन्तर्पणेन च । स्वप्नप्रसङ्गाच्च नरो वराह हव पुष्यति ॥ वृहण-वस्ति — गृहणद्रव्यत क्वाथैम्नत्कल्कस्नेहसंन्धवे । युक्ताः खजप्रम-यिता वन्तयो वृहणा मता. ॥ यः पुनरुभयसाधारणान्यासेवेत तस्यान्नरसः शरी-रमनुक्रामन् समान् धातूनुपचिनोति, समधातुत्वान्म्-ध्यशरीरो भवति सर्वक्रियासु समर्थः क्षुत्पिपासाशीतो-वर्षातपसहो बलवांश्च । स सततमनुपालयितव्य-इति ॥ ४१ ॥
जो मनुष्य दोनों प्रकार के साधारण द्रव्य अर्थात् न अधिक रूक्ष ( वातवर्द्धक ) तथा न अधिक बृंहण ( कफ वर्द्धक ) द्रव्यों का सेवन करता हो उसका अन्नरस शरीर में परिभ्रमण करता हुआ समान मात्रा में धातुओं का वृद्विया पोपण करता है तथा समधातु होने से मध्य शरीर वाला तथा सर्व प्रकार की चेष्टाओं ( कार्यों ) को करने में समर्थ होता है एवं क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, वर्षा और धूप को सहन करने वाला तथा बलवान् होता है । ऐसे मध्यशरीरी मनुष्य का हितकारक आहार - विहार द्वारा सदा रक्षण करना चाहिये ॥ ४१ ॥
विमर्श - रक्षण चैव मध्यस्य कुर्वीत सतत भिषक् । ( सु ० ) । दिनचर्या निशाचर्यामृतुचर्या यथोदिताम् । आचरन् पुरुष. स्वस्थ. सदा तिष्ठति नान्यथा ॥
भवन्ति चात्र-अत्यन्तगर्हितावेतौ सदा स्थूलकृशौ नरौ ।
श्रेष्ठो मध्यशरीरस्तु कृशः स्थूलात्तु पूजितः ॥ ४२ ॥
अधिक स्थूल और अधिक कृश मनुष्य सदा अति गर्हित माने गये हैं किन्तु मध्यशरीर का मनुष्य श्रेष्ठ है । इन दोनों में भी स्थूल की अपेक्षा कृश मनुष्य अच्छा होता है ॥ ४२ ॥
विमर्श. - यद्यपि उक्त दोनों प्रकार के मनुष्य सदा रोग ग्रस्त होने से गर्हित माने गये हैं । सततव्याधितावेतावतिस्थूल-कृशौ नरौ । सतत चोपचर्यो हि कर्षणवृहणैरपि ॥ ( चरक ) । किन्तु कृश की अपेक्षा स्थूल निन्दित है क्योंकि इसकी चिकित्सा विरुद्वोपक्रम होने से कठिन है 1 । जैसे यदि लंघन का प्रयोग
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सुश्रुतसंहिता | ६४ बढ़ जाती है । कुशल वैद्य मनुष्य को अप्रसन्नेन्द्रिय ढंग कर दोष, करें तो मेद शान्त होगा परन्तु वात और अग्नि धातु और मलों की असमानता को अनुमान से जान लेव || २६ || और यदि वृहण का उपयोग करें तो वात तथा अग्नि शान्त तु बुद्धिमान् । किन्तु मेदोधातु वढ़ जायगी । स्वोत्यकार्ये वर काश्यं स्वस्थस्य रक्षणं कुर्यादस्वस्थम्य होंगे हि तौ । यद्युभी व्याधिरागच्छेत् स्थूलमे नातिपीडयेत् । क्षपयेद् गृहयेच्चापि दोषधातुमलान् भिपक | समोपकरणी ( चरक ) । कार्थमेव वर स्थौल्यान्नहि स्थूलस्य भेषजम् । वृर्ण तावद्यावदरोगः म्यादेतत्साम्यस्य लक्षणम् ॥ ४७ ॥
लट्सनं नालमतिमेदोऽग्निवातजित् ॥ मधुर स्निग्धसौहित्यैर्यत्सौख्येन बुद्विमान चिकित्सक नम्ध पुरुष की हिताहार - विहारादि च नश्यति । कशिमा स्वविमाऽत्यन्त विपरीतनिपेणे. ॥ ( अ ० सं ० ) | द्वारा रक्षा करे तथा अस्वस्थ ( रोगी ) हुये मनुष्य दोप दोपः प्रकुपितो धातून् क्षपयत्यात्मतेजसा । धातु और मल यदि बढ़ गये हो तो उन्हें घटाने तथा घट इद्धः स्त्रतेजसा वह्निरुखागतमिवोदकम् ॥ ४३ ॥ गये हों तो उन्हें टित करे । इस कर्पण किया को
- विहारादि से कुपित दोप अपनी शक्ति से मनुष्य के रोगरहित होने तक करते रहना चाहिये । दोषी के रसरक्तादि मिथ्या आहार धातुओं को नाश कर देता है जैसे कि इन्धनादि से साम्य का लक्षण वच्यमाण श्लोकोक्त है ॥ ४७ ॥
बढ़ी हुई चूल्हे की अग्नि अपने तेज से उखा ( स्थाली ) के समदोपः समाग्निश्च समधानुमलक्रियः । को नष्ट कर देती है ॥ ४३ ॥ प्रसन्नात्मेन्द्रियमना ' सरथ इत्यभिवीयते ॥ १८ ॥
वैलक्षण्याच्छरीराणामस्थायित्वात् तथैव च | इति श्री सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने दोषधातुमलऩयत्र-दोपधातुमलानां तु परिमाणं न विद्यते ॥ ४४ ॥
प्रत्येक मनुष्य के शरीर की हर एक बातों में भिन्नता होने से एवं अस्थायी होने से वातादि दोप, रसादि धातु और विण्मूत्रादि मलों का निश्चित परिमाण ( तौल ) नहीं हो सकता है ॥ ४४ ॥
विमर्श: - वातादि प्रकृति, रक्तादिसार, संहनन, ऊंचाई, मोटाई, वय और भारादिसहन में प्रत्येक मनुष्यों के प्रमाण मैं वैलक्षण्य होता है । चरक ने यद्यपि शरीर के दोषधातुओं का प्रमाण लिखा है किन्तु वह प्रायिक है, उसमें घट - बढ़ होती । रहती है । दशोदकस्याञ्जलय, नवाअलय पूर्वस्याहारपरिणाम-धातो, अष्टो शोणितस्य, सप्त पुरीपस्य, पट् इलेप्मण, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसाया, द्वौ मेन्स, एको मज्जाया, मस्ति-कस्यार्धाञ्जलि, शुक्रस्य तावदेव प्रमाण, तानदेव इलैष्मिकस्योजस-इति । ( च ० शा ० अ ० ७ ) । तत्पर प्रमाणमभिशेयम् । तच्च वृद्धिहासयोगितर्क्यमेव । ते सर्वे एव धातवो मलाख्या प्रसादा-ख्याश्च रसमलाभ्या पुण्यन्त स्वमानमनुवर्तन्ते यथावय शरीरम् । ( च ० सू ० अ ० २८ ) ।
एषां समत्वं यच्चापि भिपग्भिरवधार्यते ।
न तत् स्वास्थ्यादृते शक्य वक्तुमन्येन हेतुना ॥ ४५ ॥
वैद्यों के द्वारा दोप, धातु और मलों की समता का जो वर्णन किया जाता है उसका स्वास्थ्य के सिवाय अन्य किसी हेतु से दिखाया जाना या कहा जाना अशक्य है ॥ ४५ ॥
विमर्श ' — जिस तरह पाश्चात्यों ने स्वस्थ पुरुष के शरीर का तापक्रम, नाडी की गति, श्वाससंख्या, रक्त का भार ( Blood pressur ), मूत्र की क्षारीयता, आपेक्षिक गुरुत्व द्विवितानीयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
-mminum वात, पित्त और कफ उन टोपों की समता, पचमहाभूतों की पांच, सप्तधातुओं की सात और तेरहवी जाटर इन अग्नियों का समान रहना तथा रमरक्तादि धातुओं और विण्मूत्र-स्वेदाडिमलों की पोपग, धारण तथा निर्गमनादि क्रियाओं का समान होना एवं आत्मा, इन्द्रिय और मन की प्रसन्नता ये बातें जिनसे विद्यमान हो उसे कहा जाता है ॥ ४८ ॥
इत्यायुर्वेदतच्चप्रढीपिकाभापाया दोषधातुमलक्षयवृद्धि विज्ञानीयो नाम पञ्चदशोऽध्याय ॥ १५ ॥
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पोडशोऽध्यायः ।
अथातः कर्णव्यधवन्धविविमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
अथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' कर्णव्यधबन्धविधि ' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १–२ ॥ रक्षाभूपणनिमित्तं बालस्य कणों विध्येते । तौ पष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त्त-नक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचन् धात्र्य कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् आदि निश्चित लिखकर स्वस्थ के पहचान का निश्चित स्टैण्डर्ड भिषग् वामहस्तेनाकृष्य कर्ण दैवकृते छिद्रे आदित्यक-कायम किया है तद्वत् वैद्यकशास्त्र में स्वास्थ्यलक्षणों के सिवाय | रावभासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेन ऋजु विध्येत् । आरोग्यता या स्वस्थता का दर्शक अन्य नापतौल वाट - वटखरे प्रतनुकं सूच्या, बहलमारया, पूर्व दक्षिणं कुमारस्य, नहीं हैं । रोगस्तु दोप I पम्य दोपसाम्यमरोगता । विकारो धातु- | वाम कुमार्याः । ततः पिचुत्रत्तिं प्रवेशयेत् ॥ ३ ॥
वैपम्य साम्य प्रकृतिरुच्यते । सुसाना कारण सम । दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्षयेत् । रक्षा और भूषण के लिये चालक के कानों का बेधन करना अप्रसन्नेन्द्रियं चाहिये | छठे या सातवें मास में, शुक्लपक्ष की उत्तम तिथि, वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिपक् ॥ ४६ ॥ करण, मुहूर्त्त और नक्षत्र में मङ्गलाचरण तथा स्वस्तिवाचन
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श्रध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् । ६५ करके धाय की गोद में या बालक की देखभाल करने वाले मनुष्य की गोद में बच्चे को बिठाकर वालकोचित खिलौनों से आकृष्ट ( प्रलोभित ) कर तुतली बोली में सान्त्वना देते हुये वैद्य अपने वामहस्त से उस बच्चे के कान को खींचकर दैवकृत छिद्र के सूर्य किरणों द्वारा दिखाई देने पर धीरे धीरे दक्षिण हस्त से उस दैवकृत छिद्र में सीधा वेधन करना चाहिये । यदि कर्ण पतला हो तो सूई से तथा मोटा हो तो आरा से वेधन करना चाहिये । वच्चे के प्रथम दक्षिण कर्ण में तथा बच्ची के प्रथम वामकर्ण में वेधन करें उसके अनन्तर कर्णछिद्र में रुई की बत्ती या ढोरा लगा देना चाहिये ॥ ३ ॥
विमर्शः – कर्णव्यधप्रयोजनम् — कर्णव्यधे कृते वालो न ग्रहै-- रभिभूयते । भूष्यते नु मुख यस्मात्कार्यस्तत् कर्णयोर्न्यधः ॥ यद्यपि कर्णव्यधेन व्रणिनि वाले रक्षोभय भवति तथापि तदल्पकाल प्रतिकर्तव्यञ्च तेन चिरकालरक्षार्थं तदल्प व्यजत एव । चक्र । कर्णन्यधकालः — इसमें अनेक मत हैं । १ - पट्सप्ताष्टममासेषु नीरजस्य शुभेऽहनि । ( अ ० सं ० ) । २ - मासि पष्ठे सप्तमे वाऽप्यष्टमे मासि सत्वरे । कर्णवेध प्रशसन्ति पुष्टया श्रीविवृद्धये ॥ ( धर्मशा ० ) । ३- नाय जन्मकालादूर्ध्वं किन्तु सवत्सरादेर्भाद्रपदाद्य पष्ठो मासो माथ सप्तम ' फाल्गुनस्तनोर्मध्ये एकस्मिन्निति ( ढल्हणः ) । ४– “ कर्णौ हिमागमे विध्येत् ” ( वाग्भटः ) । प्रायः शीतकाल में प्राणियों का वल उत्तम होता है तथा व्रण में पाक होने का भय भी बहुत कम रहता है तथा व्रणरोपण शीघ्र होता है । इसी दृष्टि से आयुर्वेद ने भी शिशिर या हिम का समय ही प्रशस्त माना है । कुमारधरलक्षणम् — अभियुक्तः सदाचारो
नातिस्थूलो न लोलुप ं । कुमारधार. कर्तव्यस्तत्राद्यो बालचित्तवित् ॥
( अ ० सं ० ) । कर्णवेधनस्थानम् - मध्यत कर्णपीठस्य किनिद-गण्डाशयम्प्रति । जरायुमात्रप्रच्छन्ने रविरश्म्यवभासिते ॥ विध्ये हैवकृते छिद्रे ( अ ० सं ० ) । कर्णपा मध्यभाग जो सूर्य की किरणों की तरफ करके देखने से अत्यन्त पतला और सिरादिवर्जित हो वह श्रेष्ठ है । पिचुवति - आजकल सुवर्णकार से कर्णवेधन कराके बच्चों के कान में उसी वक्त बङ्गादिमिश्र धातु की कडी पहना दी जाती है तथा नारियल का तैल दिन में दो चार कर्णछिद्र स्थान पर लगाते हैं । ' ततो वर्ति प्रवेश्य सम्य-ग्विद्धमामतैलेन परिषेचयेत् । ' शोणितबहुत्वेन वेदनया चान्यदेशविद्धमिति जानी-यात् । निरुपद्रवतया तद्देशविद्धमिति ॥ ४ ॥
यदि वेधन करने से रक्त का अधिक स्त्राव तथा पीड़ा हो तो अन्यदेशविद्ध समझना चाहिये और किसी तरह का उपद्रव न हो तो उस दैवकृतछिद्र में वेधन हुआ समझना चाहिये ॥ ४ ॥
विमर्श - सिरा और धमनी में वेधन से रक्तस्राव तथा वातसूत्र ( Nerve ) में वेधन होने से वेदना होती है अतः वेधन के समय उनका परिहार करें । तत्राज्ञेन यदृच्छया विद्धासु सिरासु कालिकामर्म रिका लोहितिकासूपद्रवा भवन्ति । तत्र, कालिकायां ज्वरो दाहः श्वयथुर्वेदना च भवति । मर्मरिकायां वेदना । न्वरो ग्रन्थयश्च । लोहितिकायां मन्यास्तम्भापतानक-६ सु ०
शिरोग्रहकर्णशूलानि भवन्ति । तेषु यथास्वं प्रतिकुर्वीत ॥
अज्ञ मनुष्य अपनी इच्छा से दैवकृत छिद्र का ध्यान न रखकर कालिका, मर्मरिका और लोहितिका सिराओं में जब बेधन करता है तब उपद्रव उत्पन्न होते हैं । कालिका में वेधन होने से ज्वर, दाह, शोथ और वेदना उत्पन्न होती है । मर्मरिका में वेधन होने से वेदना, ज्वर और ग्रन्थियां उत्पन्न होती हैं तथा लोहितिका में वेधन होने से मन्यास्तम्भ, अपतानक, शिरोग्रह और कर्णशूल उत्पन्न होता है । इनमें यथायोग्य चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५ ॥
विमर्श: - शरीर के किसी भी विभाग या स्थान में धमनी ( Artery ), सिरा ( Vein ) और बातसूत्र ( Nerve ) निश्चित होते हैं | यहां पर यद्यपि तीनों को सिरा कहा है किन्तु अशुद्ध रक्तवाहक वाहिनी CO: गैस के कारण नील या कृष्ण वर्ण की होती है अतः कालिका से सिरा तथा ओक्सिजन के कारण | लाल रक्त को वहन करनेवली धमनी होती है अतः लोहितिका से Artey और मर्मरिका से Nerve या वातसूत्र का ग्रहण । करना चाहिये । सिरा, धमनी वेधन से रक्तस्राव तथा वातसूत्र में वेधन होने से वेदना होती है । ज्वर, शोथ आदि उपद्रव वेधनकृत व्रण में विकारी जीवाणुओं के प्रविष्ट होने से उत्पन्न होते हैं । यदि स्थान की पूरी सफाई तथा वेधन करने की सूचिका का पूर्ण विशोधन और सिरा, धमनी, वातसूत्रों का बचा कर वेधन किया जाय तो ज्वर, शोथ, वेदनादि कोई भी उपद्रव नहीं हो सकते हैं । विष्टजिह्माप्रशस्तसूचीव्यधाद्गाढतरवर्त्तित्वादोपस-मुदायादप्रशस्तव्यधाद् वा यत्र संरम्भो वेदना वा भव-तितन वर्त्तिमुपहत्याशु मधुकैरण्डमूलमञ्जिष्ठायवतिलक-ल्कैर्मधुघृतप्रगाढैरालेपयेत् तावद्यावत् सुरू
सुरूढं चैनं पुनर्विध्येत् । विधानन्तु पूर्वोक्तमेव ॥ ६
धाररहित या खुरदरी तथा टेढी और अप्रशस्त धातु की बनी हुई सूची के द्वारा वेधन करने से या अधिक मोटी बत्ती के कान में रखने से किंवा दोषों के प्रकोप से अथवा ठीक तरह से वेधन न होने से जहां पर संरम्भ ( शोथ ) या वेदना उत्पन्न हो तो कर्णदत्तवर्ति को हटा कर शीघ्र ही मुलेठी, एरण्ड की जड़, मजीठ, यव और तिल इनके कल्क में शहद और घृत अधिक मात्रा में मिला कर रोहण होने तक प्रतिदिन आलेप करना चाहिये । रोहित हुये कर्ण का पुनः योग्य स्थान
पर वेधन करना चाहिये । वेधन करने की विधि पूर्ववत् ही है ॥६ ॥
तत्र सम्यग्विद्धमामतैलेन परिपेचयेत् त्र्यहालय-हाच वर्ति स्थूलतरां दद्यात् परिपेकं च तमेव ॥ ७ ॥
योग्य वेधन हो जाने पर तिल्ली के कच्चे तैल से ब्रणका परिसेचन करना चाहिये तथा तीन २ दिन के अन्तर से रुई की वर्तिका उत्तरोत्तर मोटी प्रविष्ट कर आमतैल से सेचन करते रहना चाहिये ॥ ७ ॥
अथ व्यपगतदोषोपद्रवे कर्णे वर्धनार्थं लघुवर्धनकं कुर्यात् ॥ ८ ॥
दोष और ज्वर -शोफादि उपद्रवों के शान्त होने पर कर्ण-
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६६ सुश्रुतसहिता | छिद्र को वढा करने के लिये छोटे छोटे वर्धनकों का उपयोग | पाली भीतर से लम्बी हो तथा दूसरी पाली अल्प हो तो चाहिये ॥ ८ ॥ कपादपनिक बन्धन उपयुक्त होता है । यदि कर्णपाली का
करना -कान के छिड़को धीरे धीरे बढ़ा करने के लिये बाहरी भाग दीर्घ और भीतर का अप ' तो अनेकपटसन्धिक नीम चिमर्श की मींकेँ उत्तरोत्तर बढा कर कान में पहनाते हैं इसे बन्धन श्रेष्ठ है । इम तरह कमान के ये हम भेट माध्य वर्धनक कहा है । ‘ अपामार्गनिन्त्रकार्पामादीना काष्ठानामन्यननस्य होते हैं । इनकी प्रायः अपने नाम से ही आकृतियां व्याख्यात अथवा नीमकादिवदिना वन्तुरपुष्पाकृतिं कुर्यात् ॥ ( उन्हणः ) समझनी चाहियें ॥ ११ ॥
त्रिमर्श - कर्णपाली के ऊपर तथा वर्णकुहर के दोनों तरफ एवं विवर्धितः कर्णश्छद्यते तु द्विधा नृणाम् । दोपतो वाऽभिघाताद्वा सन्वानं तस्य मे शृणु ॥ ९ ॥ जो कुछ २ उभार होते हैं उन्हें पुत्रिका, इंगम नया एण्टि ट्रेशन
से विवर्धित कर्ण दोपों के प्रकोप से ( Tragus and anti tragus ) कहते हैं । अथवा कभी आघात २ इस ( प्रकार चोट ) लगने से दो भागों में विभक्त होकर मङ्क्षिप्तादयः पञ्चासाध्याः । तत्र शुष्क शष्कुलिरु-फट जाता है अतः उसके सन्धान करने की विधि का | त्सन्नपालिरितराल्पपालिः सचितः । श्रनधिष्टान-श्रवण करो ॥ ९ ॥
तत्र समासेन पञ्चदशकर्णबन्धनाकृतयः । तद्यथा-नेमिसन्धानक उत्पलभेद्यको वल्लूरक आसनिमो गण्ड-कर्णं आहार्यो निर्वेधिमो व्यायोजिमः कपाटसन्धिकोऽ-र्द्धकपाटसन्धिकः सङ्क्षिप्तो हीनकर्गो वल्लीकर्णी चष्टि | कर्णः काष्टक इति ॥ १० ॥
इस कार्य के लिये कर्णसन्धान करने की संक्षेप से पन्द्रह विधियां होती हैं जैसे — नेमिसन्धानक, उत्पलमेद्यक, वसूरक, महिम, गण्डकर्ण, आहार्य, निर्वधिम, न्यायो । जिम, कपासन्धिक, अर्धकपाटसन्धिक, संक्षिप्त, हीनवर्ण, arata, ष्टिकर्ण और काकीटक ॥ १० ॥
तेपु, पृथुलायतसमोभयपार्लर्नमिसन्धानकः । वृत्तायतसमोभयपालिरुत्पलभेद्यकः । ह्रस्ववृत्तसमोभ-यपालिर्बल्लूरकः । अभ्यन्तरदीर्घेकपालिरासङ्गिमः । बाह्यदीर्घकपा लिर्गण्डकः । पालिरुभयतोऽप्याहा-. । पीठोपमपालिरुभयतः क्षीणपुत्रिकाथितो निर्दे-धिमः । स्थूलाणुसमविषमपालिर्व्यायोजिमः । अभ्य न्तरढ़ीर्यैकपालिरितराल्पपालिः कपाटसन्धिकः । बाह्य-दीर्घकपालिरितराल्पपालिरर्धकपाटसन्धिकः । तत्र दशैते कर्मबन्धविकल्पाः साध्याः । तेषां स्त्रनामभिरेवा-कृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ ११ ॥
इनमें यदि कर्णपालि के दोनों भाग मोटे फैले हुये हों तथा समान हों तो नेमिमन्थानक बन्ध का उपयोग करना चाहिये । जिसकी दोनों कर्णपालियां गोल, दीर्घ तथा समान होतो उत्पलभेद्यक चन्ध का उपयोग करें । छोटी, गोल और समान दोनों कर्णपालियां होने पर वल्लूरकबन्ध बांधना चाहिये । जिसकी भीतरी एक कर्णपाली दीर्घ हो तो वहां आसङ्गिम बन्ध बांधे । यदि बाहर की कर्णपाली दीर्घ हो तो गण्डकर्ण यन्ध बांधे । जब दोनों ओर वर्णपालियां न हों तो आहार्य बन्धन काम में लाना चाहिये । यदि दोनों कर्णपालियां मूल से ही छिन्न हों तो पुत्रिका के शेष भाग का आश्रय करके निर्वेधिम बन्धन बाधना चाहिये । यदि पालि का एक भाग स्थूल हो तथा दूसरा अणु ( सूक्ष्म ) हो, एवं एक समान और दूसरा विषम हो तो वहां न्यायोजिन बन्धन बांधना चाहिये । जहां एक पालिः पर्यन्तयोः चीणमांसो हीनकर्गः । तनुविपमाल्प-पालिर्वल्लीकर्णः । प्रथितमांसस्तव्धसिरा सन्ततसूक्ष्म-पालिर्यष्टिकर्गः । निर्माससङ्क्षिप्ताम्रान्पशोणितपालिः काकोष्टक इति । बद्वेष्वपि तु शोफदाहगगपाकपिडका-स्रावयुक्ता न सिद्धिमुपयान्ति ॥ १२ ॥
सक्षिप्त, होनकर्ण, वलीकर्ण आदि शेष पांच बन्धन अमान होते हैं । इनमें बाघ पाली का शकुली भाग सूप गया हो तथा पाली का एक भाग नष्ट हो एवं दूसरा भाग भी अएप हो गया हो तब मन्त्रिप्त बन्ध का उपयोग करें । जहां पर पाली का अविष्ठान ही न हो तथा गण्ड के दोनों तरफ बाह्यभाग में माम क्षीण हो वहा हीनवर्ण बन्ध काम में लाना चाहिये । यदि पाली पतली, टेढी - मेढी और अल्प हो तब वही कर्ण बन्धन बाधना चाहिये । जहां पाली के मास में गांठें पढ गई हो, सिराए कुटिल या स्तब्ध हो गई हो और पाली छोटी हो वहा यष्टिक बन्धन कार्य में लाना चाहिये । यदि पाठी मांसरहित, संक्षिप्त अग्रभाग वाली तथा अल्प रक्त युक्त हो तो काकौष्टक बन्धन प्रयुक्त करें । इस तरह इन बन्धनों के करने पर भी शोथ, ढाह, लालिमा, पाक, पिडकाएं और प्यादि का, स्राव होने लग जाय तो सन्धान में कार्यसिद्धि प्राप्त नहीं होती है ॥ १२ ॥
विमर्श --- कर्णशष्कुली बाह्यकर्ण का भाग है जिसमें स्त्रियां बालियां पहनती हैं । प्राय. इसी को लोग ' कान ' कहते हैं । यह शुक्तिसदृश होता है इसे पिना या आरीकुला ( Pnna or Aaroule ) कहते हैं तथा यह तरुणास्थि ( कार्टिलेज ) का बना होने से कुछ कडा प्रतीत होता है । इसके नीचे का जो मुलायम लटकता हुआ भाग है जिसका वेधन कर बच्चों को सोने या चांदी की मोतीयुक्त या लाल्युक्त कढियां पहनाते हैं और स्त्रियां टोटिया, कर्णफूल या लोंग पहनती हैं इसे कर्णपाली या लोग ( Lobule of Ear ) कहते हैं ।
भवन्ति चात्र-यस्य पालिद्वयमपि कर्णस्य न भवेदिह ।
कर्णपीठं समे मध्ये तस्य विदुद्ध्वा विवर्धयेत् ॥ १३ ॥
जिस मनुष्य के कान में दोनों पाली न हों उसके कर्ण-पीठ के मध्य के समान स्थान में वेधन करके वर्धन करना चाहिये ॥ १३ ॥
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श्रध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् । I
बाह्यायामिह दीर्घायां सन्धिराभ्यन्तरो भवेत् ।
आभ्यन्तरायां दीर्घायां वाह्यसन्विरुदाहृतः ॥ १४ ॥
बाहर की कर्गपाली लम्बी हो तो भीतर की ओर सन्धान करना चाहिये एवं यदि भीतरी कर्णपाली लम्बी हो तो बाहर की ओर सम्मान करना चाहिये ॥ ११ ॥
एकैव तु भवेत् पालिः स्थूला पृथ्वी स्थिरा च या ।
तां द्विवा पाटयित्वा तु छित्त्वा चोपरि सन्धयेत् ॥ १५ ॥
यदि किसी मनुष्य की मोटी, चौड़ी और स्थिर एक ही पाली हो तो उसे बीच से चीरकर ऊपर की ओर जोड़ देना चाहिये ॥ १५ ॥
गण्डादुत्पाव्य मांसेन सानुबन्धेन जीवता ।
कर्गपालीमपालेस्तु कुर्यान्निर्लिस्य शाखवित् ॥ १६ ॥
यदि किसी मनुष्य के पाली न हो तो शास्त्रज्ञ वैद्य गण्ड-प्रदेश ( कपोल्स्यल ) से जीवित तथा कुछ सम्वन्ध रखे हुये | मांस को लेकर उसकी कर्णगली बनावे ॥ ६६ ॥
विमर्श - गण्डस्थान से मांस का कुछ सम्वन्ध रखने से उसका रक्तसञ्चार तथा स्पर्शादि अवस्था बनी रहेगी । यह काहार्य बन्व का सन्धान है । इसे ( Rexo plastic operstion ) कहते हैं । अतोऽन्यतमं वन्यं चिकीर्षुरोपहरणीयोक्तोपस-म्मृतसम्भारं विशेषतञ्चात्रोपहरेत्, सुरामएडं नीरमु-दुकं वान्यान्तं कपालचूर्णञ्चेति । ततोऽङ्गनां पुरुषं वा प्रथितकेशान्तं लघु सुक्तवन्तमाप्तैः सुपरिगृहीतं च कृत्वा बन्वमुपधार्य्यं छेद्य भेद्यलेख्यव्यवनैरुपपन्नैरुप-पाद्य कर्णशोणितमवेच्च दुष्टमदुष्टं वेति । तत्र वातदुष्टे वान्यान्लोष्णोदुकाभ्यां, पित्तदुष्टे शीतोदकपयोभ्यां, इले-ध्मदुष्टे सुरामण्डोष्णोदकाभ्यां प्रक्षाल्य कर्णौ, पुनरव-लिख्यानुन्नतमद्दीन मविषमञ्च कर्णसन्धि सन्निवेश्य, स्थितरक्तं सन्दध्यात् । ततो मधुघृतेनाभ्यज्य पिचुप्लो तयोरन्यतरेणात्रगुण्ठ्य सूत्रेणानवगाढमनतिशिथिलन । बदुग्वा कपालचूर्णेनावकीर्य्याचारिकमुपदिशेद् द्वित्रणी -चोकेन च विधानेनोपचरेत् ॥ १७ ॥
उपर्युक्त बन्धनों में से किसी एक बन्धन को करने की इच्छा वाला वैद्यसर्जन प्रथम ' अोपहरगीय ' अध्याय में वर्णित आवश्यक सामग्री का सञ्चय करे । विशेषतया सुरामण्ड, दुग्ध, जल, काञ्जी और टूटे - फूटे मिट्टी के बर्तन का महीन चूर्ण पास में रखें फिर न्त्री या पुरुष जो हो उसके गिर के बालों को ठीक तरह से पीछे की ओर बांध कर हल्का भोजन करा के हितैषी उपचारकों या उसके ब rga द्वारा प osar कर जो बन्धन लगाना हो उसका निश्चय करके छेदन, भेदन, लेखन और वैधन इनमें से तो उचित क्रिया हो उसे करके कान के रक को देखकर निर्णय करे कि यह रक्त दूषित है या अदूति । यदि वायु से दूषिवरक हो तो काङ्क्षी और गरम जल से, विच से दूषित रक हो तो दण्डे पानी तथा दुग्ध से तथा कम से दूषित हो तो सुरामण्ड और गरम जल से कानों को प्रचालित कर पश्चात् उस स्थान का लेखन कर्म करके कर्णसन्धि को न ऊँचे, न नीचे और न विषम रखकर रक्तनति के बन्द होने पर सन्धान कर देना चाहिये । फिर शहद और वृत लगाकर पिचु ( रई ) या प्रोत ( कपड़े ) से ढककर ढोरे से न अधिक गाढा तथा न अधिक शिथिल बांधकर कपाल का चूर्ण छिड़क कर आहार - विहार का उपदेश करना चाहिये तथा ' त्रिणीय अध्याय ' में कहे हुये विधान के अनुसार उपचार करना चाहिये ॥ १७ ॥
भवति चात्र-विघट्टनं दिवास्वप्नं व्यायाममतिभोजनम् ।
व्यत्रायमग्निसन्तापं वाक्श्रमञ्च विवर्जयेत् ॥ १८ ॥
कर्ण का किसी के साथ विवहन, दिन में शयन, व्यायाम, अतिभोजन, स्त्रीसम्भोग, अग्नि या सूर्य का ताप तथा अधिक भापग एवं अन्य प्रकार का परिश्रम ये सब वर्जित करना चाहिये ॥ १८ ॥
विमर्श: - किसी किसी पुस्तक में इस श्लोक के पश्चात् ' आमतलपरीषेक त्रिरात्रमवचारयेत् । तत्तैलेन सृष्ट त्र्यहाट-पनयेत् पिचुन ' | यह पाठाधिक्य है । न चाशुद्धरतमतिप्रवृत्तरक्तं क्षीणरक्तं वा सन्द-ध्यात् । स हि वातदुष्टे रक्ते रूढोऽपि परिपुटनवान् । पित्तदुष्टे दाहपाकरागवेदनावान् । श्लेष्मदुष्टे स्तब्धः कण्डूमान् । अतिप्रवृत्तर के श्यावशोफवान् । क्षीणोऽ-ल्पमांसो न वृद्धिमुपैति ॥ १६ ॥
बन्धन के समय यदि वर्णपाली से अशुद्ध रक्त निक्लता हो, या अधिक मात्रा में रक्त निकलता हो अथवा रक्त बहुत कम निकलता हो तो सन्धान नहीं करना चाहिये । क्योंकि वातदुष्ट रक्त में सन्धान करने से रोपित होने पर भी ‘ परिपोट ' रोग हो जाता है, पित्तदुष्ट रक्त में रूढ होने पर दाह, पाक, राग और वेदना ये उपद्रव होते हैं तथा कफ से दूषित रक्त में सन्धान करने से स्तब्धता तथा खुजली होती है । अधिक रक्त की प्रवृत्ति की अवस्था में सन्धान करने से वह स्थान काला या नीला तथा शोधयुक्त हो जाता है । रक्त की क्षीगा-वस्था में सन्धान करने से माँस कम रहने के कारण सन्धान करने पर भी उसकी वृद्धि नहीं होती है ॥ १ ९ ॥ विमर्श - रिपोटरोगलक्षगम् - सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टं सहसाऽ-भिप्रवर्तने । कर्गशोफो भवेद पाल्या सरुज. परिपोटवान् ॥ आमतैलेन त्रिरात्रं परिषेचयेत् । त्रिरात्राच पिचुं । परिवर्तयेत् । स यदा सुरूढो निरुपद्रवः सवर्णो भवति तद्वैनं शनैश्शनैरभिवर्द्धयेत् । अतोऽन्यथा संरम्भदाह्पा-करागवेदनावान्, पुनश्छिद्यते वा ॥ २० ॥
तिल्ली के कच्चे तेल द्वारा तीन दिन तक परिषेक करना चाहिये । प्रत्येक तीसरे दिन पिचु का परिवर्तन करना । चाहिये । इस तरह से जब वह ठीक तरह से रोपित हो जाय तथा कोई उपद्रव भी पैदा न हो एवं उस स्थान की त्वचा का रह जन्य त्वचा सदा हो नाय तब उसके छिद्र को | वर्धनकों द्वारा धीरे २ बढ़ाना चाहिये | इसके विपरीत करने से