श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 11–20

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 11–20

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प्राप्यन

यदि चरकमधीते तद् ध्रुवं सुश्रुतादि- प्रणिग दितगदानां नाममात्रेऽपि बाह्य: ।

अथ चरकविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः किमिव खलु करोतु व्याधितानां वराकः ॥

इस प्रकार मध्यकाल में वाग्भट के समय में ये दोनों सहिताए अपने अपने विषयों के प्रतिपादनार्थ श्रेष्ठ मानी जाती थीं । हजार वर्ष पूर्व के ' ज्वरसमुच्चय ' नामक ग्रन्थ में भी चरक तथा सुश्रुत के बहुत से वचन दिये हुए हैं । इसी प्रकार चतुर्थ शताब्दी के ' नावनीतक ' नामक पुस्तक में चरक तथा सुश्रुत का उल्लेख है । वाणभट्ट के हर्षचरित में पौनर्वसव ( पुन-र्वसु के पुत्र या शिष्य ) वैद्यकुमार के निर्देश से श्रात्रेय पुनर्वसु के सम्प्रदाय का उस समय भी प्रचार विदित होता है । जब से चरक तथा सुश्रुत संहिता का उद्भव हुआ है तभी से अपने विचारों को गुरुता एव गुणों की महिमा से भारत तथा उससे बाहर भी ये अत्यन्त प्रचलित रहे है तथा आज भी ये प्रन्थ वैद्यों के लिये सर्वस्त्र है । सप्तम, अष्टम तथा नवम शताब्दी में जब कि अरव तथा पारसीक ( पर्शिया ) देश अत्यन्त उन्नतावस्था में थे उस समय भारतीय चिकित्सा - विज्ञान के श्रादर की ही दृष्टि से चरक तथा मुश्रुत संहिताओं का अनुवाद हुआ था । श्रवो में अनूदित चरक ' सरक ' नाम से तथा सुश्रुत ' सनद ' नाम से प्रसिद्ध हैं | अबूसीना ( Abusina ), अबू रसी ( Aburasi ) तथा श्रवूसीराचि ( AbusIrabi ) नामक श्ररवी के चिकित्सा प्रन्यों के लेटिन भाषा के अनुवाद में भी स्थान २ पर चरक का नाम आता है | अल्बेरुनी ( Alberuni ) यात्री के पुस्तकालय में चरक का अनुवाद था ऐसा उसके अंग्रेजी अनुवाद से प्रतीत होता है । अल्मानसुर ( Almansur-ई. प. ७५३-७ ~ ४ ) ने बहुत से श्रायुर्वेदिक ग्रन्थों, चरक के सर्पचिकित्सा प्रकरण तथा सुश्रुत का अनुवाद किया था । रेजेस् ( Rhages ) नामक उसका वैद्य चरक का बहुत सन्मान करता था । सिरसीन नामक पाचात्य विद्वान् के पूर्वज भी भारतीय आयुर्वेद तथा चरक - सुश्रुत को जानते थे ऐसा पुरावृत्त के लेखकों से विदित होता है । अशोक राजा के पोते के समय बौद्धधर्म के साथ भारतीय आयुर्वेद भी सिंहल द्वीप में पहुंचा था । भारतीय आयुर्वेद विशेष कर बहुत सी टीकाओं से युक्त वाग्भट तिब्बत में अपना प्रकाश फैलाकर वहा से मंगोल तक पहुंच गया । भारत में विलुप्त बहुत सी वाग्भट की टीकाएं आज भी तिब्बत में अनूदित हुई मिलती हैं । इन दोनों संहिताओं में भी सुश्रुतसहिता श्रष्टाङ्ग की प्रतिपादक होने से विशेष उपयुक्त है । चरक वेचल कार्याचि-कित्सा के लिये प्रसिद्ध है ' चरकस्तु चिकित्सिते ' - स्वयं चरकाचार्य ने शल्य - शालाक्य में धन्वन्तरि सम्प्रदाय का महत्त्व स्वीकृत किया है ---' अत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ । पराधिकारे तु न विस्तरोक्तिः ॥ ' ( च. चि. प्र. २६ ) इस शल्यप्रधानतन्त्र काशिराज भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुतादि शिष्यों को उपदिष्ट किया तथा सुश्रुत ने सुश्रुत-संहिता बनाई यह बात इस संहिता में आये हुए श्लोकों से हो स्पष्ट है-' अथ खलु भगवन्तममरवरमृषिगणपरिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरि मौपवेनववैतरणौर-भ्रपीष्कलाबतकरवीर्यगोपुररक्षिवसुश्रुतप्रभृतय ऊचुः ' ( सु. सू ० अ ० १ )

अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुजामृत्युहरोऽमराणाम् ।

शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतः प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम् ॥

धन्वन्तरिं धर्मभृतां वरिष्ठममृतोद्भवम् ।

चरणावुपसंगृह्य सुश्रुतः परिपृच्छति ॥

( सु ० नि ० ० १ ) धन्वन्तरिः काशिपतिस्तपोधर्मभृतां वरः । सुश्रुतप्रभृतीच्छिष्याच्छशासाहतशासनः ॥ ( सु ० सू ० ० १ ) अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम् | ( सु ० क ० अ ० १ ) छिन्नशास्त्रार्थसन्देहं सूक्ष्मागाघागमोदधिम् विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति ॥ ॥ ( सु ० उ ० अ ० ६२ )

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प्राकथन धन्वन्तरिपरिचय - वेदों में वैद्याचार्य धन्वन्तरि का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है । ऋग्वेद में देवभिपग् श्रश्विनीकुमारों का ही वैद्यरूप में उल्लेख है । ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में दिवोदास नामक राजा का भी उल्लेख मिलता है । इस वैदिक दिवोदास का काशिराज होना तथा धन्वन्तरि के साथ कोई सम्बन्ध था ऐसा प्रमाणित नहीं होता है । महाभारत, विष्णुपुराण, भागवत एवं वायुपुराण आदि प्रन्थों में लिखे इतिवृत्त से विदित होता है कि पूर्वकाल में श्रनृत प्राप्ति के लिये देवता और असुरों के द्वारा समुद्र के मन्थन करने पर भगवान् यथा महाभारते ( म ० भा ० प्रा ० प ० ० १६ ) -यथा विष्णुपुराणे -भागवतपुराणे-अग्निपुराणे -धन्वन्तरिवंशक्रम ---धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत । श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति ॥

ततो धन्वन्तरिर्देवः श्वेताम्बरधरः स्वयम् ।

बिभ्रत् कमण्डलुं पूर्णंममृतस्य समुत्थितः ॥

अथोदधेर्मध्यमानात् काश्यपैरमृतार्थिभिः ।

उदतिष्ठन् महाराजपुरुषः परमाद्भुतः ॥

दीर्घपीवरदोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽरुणेक्षणः ।

श्यामलस्तरुणः स्रग्वी सर्वाभरणभूषितः ॥

पीतवासा महोरस्कः सुमृष्टमणिकुण्डलः ।

स्निग्धकुचितकेशाः सुभगः सिंहविक्रमः ॥

अमृतापूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूपितः ।

स वै भगवतः साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भवः ॥

धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेदद्दगिन्यभाक्

ततो धन्वन्तरिर्विष्णुरायुर्वेदप्रवर्तकः ।

श्वेतं कमण्डलुं पूर्णममृतेन समुत्थितः ॥

हरिवंश - वायुपुराण और ब्रह्माण्डपुराण में लिखा है नृप के द्वारा विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान् ने धन्वन्तरि के रूप काशस्य काशेयो राष्ट्रः पुत्रो दीर्घतपास्ततः

धन्वस्तु दीर्घतपसो विद्वान् धन्वन्तरिस्ततः ।

तपसोऽन्ते सुमहतो जातो वृद्धस्य धीमतः ॥

द्वितीय द्वापर में काशी के राजा धन्व नृप ने पुत्रकामना के लिये ब्रह्मदेव धन्वन्तरि का आविर्भाव हुआ ॥ कि काश के वंश में उत्पन्न धन्वनामक में उसके यहा जन्म लिया — । की तपश्चर्या की जिससे ब्रह्मा ने प्रसन होकर पुत्रप्राप्ति का वरदान दिया इस तरह काशिराज धन्व के यहा पुत्र हुआ जिसका नाम ' धन्वन्तरि ' रखा गया । धन्वन्तरि के केतुमान, केतुमान के भीमरथ तथा भीमरथ के दिवोदास हुआ । धन्वन्तरि समय - ( १ ) काश्यपसंहिता के शिष्योपक्रमणीय अध्याय में होम्य देवताओं का निर्देश करते हुए प्रजापति, इन्द्र, श्रश्विनीकुमार एवं धन्वन्तरि का भी स्वाहाकार के द्वारा प्रहण एवं सन्मान किया गया है तथा द्वित्रणीय अध्याय में ' परतन्त्रस्य समयम्, इस पद द्वारा शल्यतन्त्र का परतन्त्र के रूप में ग्रहण करने से भी उस समय धान्वन्तर सम्प्रदाय की विद्यमानता स्पष्ट है । आत्रेयसंहिता में भी ' इति धन्वन्तरि: ', ' इति धान्वन्तरं मतम् ', ' अत्र धान्वन्तरी-. याणामधिकारः क्रियाविधौ ' इत्यादि अनेक स्थलों पर धन्वन्तरि का सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है । सुश्रुत में आत्रेय तथा कश्यप का कहीं भी उल्लेख नहीं है । इस प्रकार मारीचि काश्यप तथा पुनर्वसु आत्रेय से धन्वन्तरि की प्राचीनता प्रकट होती है इसके अतिरिक्त काश्यपसहिता में केवल धन्वन्तरि का ही उल्लेख होने से तथा श्रात्रेयसंहिता में धन्वन्तरि के सम्प्रदा-यवालों का भी उल्लेख होने से धन्वन्तरि सम्प्रदाय के फैलने के वाद आत्रेय पुनर्वसु की उत्पत्ति प्रतीत होती है । धन्वन्तरि के पुनर्वसु श्रात्रेय से भी प्राचीन सिद्ध होने से उनके अनुयायी अभिवेश, मेढ इत्यादि से तो वह निश्चित ही प्राचीन हैं । मेड-

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प्राक्कथन ४ में आए हुये धान्वन्तर घृत आदि के उल्लेख से भी यही प्रकट होता है । पाचान्य ऐतिहासिकों ने सहिता तथा चरकसंहिता १००० वर्ष पूर्व का तथा सुश्रुत का समय ईसा से २००० वर्ष पूर्व का माना है अत एव महाभारत का समय ईसा से धन्वन्तरि का समय ईसा से २००० वर्ष पूर्व ही हो सकता है । धन्वन्तरि - शिष्यपरम्परा - जिस प्रकार भरद्वाज के श्रग्निवेश मेल, जतुकर्ण, पाराशर प्रभृति ६ शिष्य थे— अग्रिवेशश्च भेडश्च जतुकर्णः पराशर | हारीतः क्षारपाणिश्च ॥ उसी प्रकार भगवान् धन्वन्तरि पास अध्ययनार्थ औपघेनव, वैतरण औरत्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुररक्षित, सुश्रुत प्रभृति ( भोजादिक तथानिमि, काङ्कायन, गार्ग्य, गालव ) शिष्यों ने जाकर प्रश्न किया कि हे भगवन् संसार के प्राणी शारीरिक, मानस तथा श्रागन्तुक रोगों से व्याकुल हैं उनके कल्याण के लिये हम आपके पास आयुर्वेदोपदेश सुनने आये हैं- ' भगवन् शारीरमानसागन्तुव्याधिभिविविध-विक्रोशतश्च मानवानभिसमीक्ष्य मनसि नः पीडा भवति, ' वेदनाभिघातोपद्रुतान् सनाथानप्यनाथवद्विचेष्टमानान् श्रोतुमिच्छाम इहोपदिश्यमानम् ' तेषां सुखैषिणां रोगोपशमनार्थमात्मनश्च प्राणयात्रार्थं प्रजाहितहेतोरायुर्वेदं ऐसा सुन कर भगवान् धन्वन्तरि ने उनका स्वागत किया तथा उन्हें स्वागतं वः, सर्व एव अमीमांस्या अध्याप्याश्च भवन्तो वत्सा: ' ( सु ० इसके अनन्तर उन शिष्यों में प्रमुख मुश्रुत ने भगवान् धन्वन्तरि से रूप में सङ्कलित किया जिसे मुश्रुतसंहिता कहते हैं । सुश्रुत परिचय: - सुश्रुत सहिता के भिन्न भिन्न स्थानों में श्राये हुये निर्माता विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत है— ( १ ) विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति । ( मु ० सू ० ० १ ) पढाने का आश्वासन दिया- ' तानुवाच भगवान् सू ० ० १ ) आयुर्वेद का श्रवण कर उस ज्ञान को संहिता के प्रमाणों से विदित होता है कि सुश्रुतसंहिता का ( २ ) विश्वामित्रसुतं शिष्यमृपिं सुश्रुतमन्वशात् । ( सु ० उ ० तं ० [ अ ०६६ ) ( सु ० चि ० ० २ ) ( ३ ) चक्रदत्त की टीका में भी लिखा है कि- विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत ने शल्यप्रधान आयुर्वेदतन्त्र का निर्माण आरम्भ किया — ' अथ परमकारुणिको विश्वामित्रसुतः सुश्रुतः शल्यप्रधानमायुर्वेदतन्त्रं प्रणेतुमारब्धवान् ' | ( ४ ) महाभारत के श्रानुशासनिक पर्व के चतुर्थ अध्याय में विश्वामित्र के पुत्रों में मुश्रुत का नामोल्लेख है । ( ५ ) भावप्रकाश में लिखा है कि- विश्वामित्र प्रभृति महर्षियों ने ज्ञानदृष्टि से यह जान लिया कि काशिराज के रूप में यह साक्षान् भगवान् धन्वन्तरि हैं श्रत एव उनमें से विश्वामित्रजी ने अपने पुत्र सुश्रुत को कहा कि हे वत्स । तुम काशी में जाकर भगवान् धन्वन्तरि के पास आयुर्वेद विद्या का अध्ययन करो-अथ ज्ञानदृशा विश्वामित्रप्रभृतयोऽविदन् । अयं धन्वन्तरिः साक्षात् काशिराजोऽयमुच्यते ॥

विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्रं सुश्रुतमुक्तवान् ।

वत्स । वाराणसीं गच्छ त्वं विश्वेश्वरवल्लभाम् ॥

( ० प्र ० ) ( ६ ) डल्हण की व्याख्या में विश्वामित्र के नाम से उद्धृत वैद्यक के वचन भी मिलते हैं — तथा चोक्तं विश्वामित्रेण-' यावशूकस्य पानन्तु कुलत्थचारवारिभि ' सुश्रुत का उपनिषत्कालीन दिवोदास के शिष्यरूप में उल्लेख होने से तथा सुश्रुतसंहिता के चिकित्सा स्थान में कृष्ण का नामोल्लेख-महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि । तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै । ( सु ० चि ० श्र ० ३० 30 ) इम प्रकार होने से काश्यप तथा श्रात्रेय के समान गोत्रवाला विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत भी दिवोदास निषत्काल में तथा भगवान श्रीकृष्ण के उद्भव के पश्चात् हुआ प्रतीत होता है । विश्वामित्र भी कई की तरह उप-नानामन्त्रों के द्रष्टा तथा भगवान् राम को धनुर्विद्या का उपदेश हुए हैं, जैसे ऋग्वेद के प्रतीत होते है । करने वाले महर्षि विश्वामित्र अन्य ही प्राचीन व्यक्ति

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प्राकथन सुश्रुत समय - सुश्रुत का समय निश्चित करने के लिये कोई ठीक साधन नहीं है तथापि आधुनिक पुराणशास्त्रविदों का यह मत है कि - सुश्रुत का काल ख्रिस्तपूर्व एक हजार वर्ष से कम नही है । इस विषय में पाश्चात्य इतिहासवेत्ता भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं— ( १ ) हैस ( Hass ) नामक विद्वान ने सुश्रुतादि को बारहवीं शताब्दी का माना है । ( २ ) जोन्स विल्सन ( Jones Wilson ) ने ९ -१० शताब्दी का, अन्य विद्वानों ने इसे चतुर्थ - पञ्चम शताब्दी का माना है । ( ३ ) मैकडोनल नामक विद्वान् लिखता है कि मुश्रुत ई ० प ० चतुर्थ शताब्दी से पहले का प्रतीत नहीं होता है क्योंकि वेवर मैनुस्किप्ट के प्रकरण चरक तथा सुश्रुत के साथ वे चल भावों में ही समानता नहीं रखते अपितु उनमें शब्दों की भी समानता मिलती है । वेवर लिखता है कि भाषा तथा शैली में सुश्रुत की वराहमिहिर के लेखों से समानता है । हर्बर्ट गोवन ने तो यहां तक लिख दिया कि सुश्रुत नामक कोई व्यक्ति हुआ नहीं और यदि हुआ भी हो तो वह सोक्रेटीज के अतिरिक्त नही है । सुश्रुत ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व का है इसमें तिलमात्र भी सन्देह नही है क्योंकि लगभग दो सहस्र वर्ष प्राचीन दार्श-निक आर्य नागार्जुन का ' उपायहृदय ' नामक ग्रन्थ प्राप्त हुआ है उसके प्रारम्भ में अन्य तन्त्रों के प्रसङ्ग में— ' ओपघिविद्या षड्विधा - ओषघिनाम, ओपधिगुणः, ओषधिरसः, ओषधिवीर्य, सन्निपातो विपाकश्चेति भैषज्यधर्माः ' - इत्यादि द्वारा भैषज्य विद्या के प्रधान विपयों का उल्लेख कर वाद में शास्त्र का वर्णन करते हुए यथा ' सुवैद्यको भेषजकुशलो मैत्रचित्तेन शिक्षकः सुश्रुत: ' इत्यादि द्वारा भैषज्यविद्या के आचार्यरूप में सम्मान एवं गौरव के साथ सुश्रुत का नाम दिया है । इस प्रकार लगभग दो सहस्र वर्ष पूर्ववर्ती आर्य नागार्जुन द्वारा भी श्राचार्य के रूप में सुश्रुत का नाम दिया होना इसकी अर्वाचीनता के प्रतिवाद के लिये पर्याप्त प्रमाण है । खोटाङ्ग प्रदेश से प्राप्त भोजपत्र पर लिखे हुये ' नावनीतक ' नामक प्रन्थ की लिपि को देखकर इसे तृतीय या चतुर्थ शताब्दी का निश्चित किया है । इस ग्रन्थ में श्रात्रेय, पुनर्वसु तथा उसके अनुयायी क्षारपाणि, जातुकर्ण, पाराशर तथा मेड आदि एवं काश्यप, जीवक और सुश्रुत के नाम तथा उनके नाम से ओषधियों का उल्लेख मिलता है चरक तथा नागार्जुन का उसमें उल्लेख नहीं है अतः यह चरक एव नागार्जुन से प्राचीन है तथा नागार्जुन के समय से पूर्व का होने से इसमें आया हुआ तभी नागार्जुन से पूर्व का सिद्ध होता है । इस प्रकार सुश्रुत न केवल श्रार्य नागार्जुन तथा नावनीतक से ही प्राचीन है अपि तु महाभाष्यकार के ' तद्धितेष्त्र-चामादेः ' तथा ' इको गुणवृद्धी ' तथा ' शाकपार्थिवादीनामुपसंख्यानम् ' इस वार्तिक में ' कुतपवासाः सौश्रुतः कुतुपसौश्रुत: ' इस निर्देश से यह महाभाष्यकार तथा वार्तिककार से भी प्राचीन प्रतीत होता है । इतना ही नहीं पाणिनि द्वारा ' कार्तकौजपादयश्च ' इस सूत्र के गण में ' सौश्रुतपार्थिवाः ' में अपत्यसूचक प्रत्ययान्त सौश्रुत शब्द के दिया होने से न केवल स्रुश्रुत श्रपि तु उसके वंश वाले अथवा उसके शिष्य और सम्बन्धी भी पाणिनि से प्राचीन प्रतीत होते हैं । हार्नले नामक पाचात्य विद्वान् ने सुश्रुत को विक्रम संवत् के पूर्व छठी शताब्दी में होना माना है । कुछ अन्य विद्वानों ने लिखा है कि सुश्रुत का समय पूर्ण निश्चित न होने पर भी ई ० सम्वत् से ६०० वर्ष पूर्व है । कुछ अन्य विद्वान् कहते हैं कि सुश्रुत में सात प्रकार के कुष्ठ का वर्णन मिलता है । इस रोग का भारत तथा चीन देश के निवासियों ने २५०० वर्ष पूर्व ज्ञान प्राप्त किया था । इस प्रकार सुश्रुत लगभग ढाई हजार वर्ष प्राचीन प्रतीत होता है । सुश्रुतसंहिता का लैटिन भाषा में अनुवाद करने. वाले ह्यासलर नामक पाश्चान्य विद्वान् तथा श्रीयुत गिरीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय आदि ने भी ईसवी सन् से लगभग एक सहस्र वर्ष पूर्व सुश्रुत का समय निधित किया है । इस प्रकार भिन्न - भिन्न विद्वानों के दृष्टिकोण से विचार करने पर सुश्रुतसंहिता के पूर्व भाग ( सूत्र, निदान, शारीर, चिकित्सा, कल्प ) का समय कम से कम भी आज से २६०० वर्ष पूर्व प्रतीत होता है । वृद्धसुश्रुत विवाद- -आज जो सुश्रुतसंहिता उपलब्ध है वह यद्यपि सुश्रुत के नाम पर प्रसिद्ध है तथापि वह सुश्रुत-प्रणीत मूल मुश्रुतसंहिता नहीं है यह बात इस सुश्रुतसंहिता में प्राये हुए अनेक उद्धरणों से ही सिद्ध होती है-( १ ) ' नमो ब्रह्मप्रजापत्यश्विबलभिद्धन्वन्तरिसुश्रुतप्रभृतिभ्यः ' उपलब्ध संहिता मूल सुश्रुतप्रणीत होती तो अन्थारम्भ ' सुश्रुत को प्रणाम करने की कोई श्रावश्यकता न थी । ( २ ) मूल सुश्रुत तन्त्र के कई पाठ वृद्ध सुश्रुत के नाम से सर्वाङ्गसुन्दरी व्याख्या, मधुकोप व्याख्या, कुसुमावलि, निवन्धसंग्रह, तोडरानन्द, भावप्रकाश इत्यादि प्रन्थों में उद्धृत किये हैं जो उपलब्ध सुश्रुतसंहिता में नहीं मिलते हैं ।

पृष्ठ 15

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६ प्राकथन ( ३ ) इस अध्याय के पहले सूत्र पर टीका लिखते हुए डल्हणाचार्य कहते है -' यत्र यत्र परोक्षे लिट्प्रयोगस्तत्र तत्रैव प्रतिसंस्कर्तृ सूत्रं ज्ञातव्यम् | प्रतिसंस्कर्ताऽपीह नागार्जुन एव ॥ ' ( ४ ) सुश्रुतसंहिता के प्रथम, तृतीय और चतुर्थ अध्याय में संहिता के वेवल एक सौ वीस लिखे हैं । उत्तरतन्त्र का उल्लेख स्वतन्त्र किया है ।

बीजं चिकित्सितस्यैतत् समासेन प्रकीर्तितम् ।

सविशमध्यायशतमस्य व्याख्या भविष्यति ॥

' तच्च सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेपु । तत्र सूत्रनिदानशारीरचिकित्सतकल्पेषु अर्थवशात् संविभज्य उत्तरे तन्त्रे शेपानर्थान् व्याख्यास्यामः इससे यह स्पष्ट है कि उत्तरतन्त्र को किसी ने बाद में इस संहिता में समाविष्ट किया है । ( ५ ) पञ्चम स्थान के अन्त में श्रायुर्वेद का महत्व वर्णन कर संहिता की समाप्ति के सूचक ( ६ ) उत्तरतन्त्र के प्रारम्भ में निमि नामक अन्य ऋषि का निर्देश किया है । वस्तुतः धन्वन्तरि के सिवाय अन्य किसी का भी निर्देश नहीं होना चाहिये । इससे यह ज्ञात होता है कि अध्याय और पांच स्थान

श्लोक मिलते हैं ।

सुश्रुतसंहिता में भगवान मूलसुश्रुत - जो शल्यप्रधान था की पूर्ति करने के लिये अन्य अङ्गयुक्त उत्तरतन्त्र किसी ने इसमें समाविष्ट कर दिया । काश्यपसंहिता का उपोद्घात वृद्ध सुश्रुत का होना अस्त्रीकृत करता है - सुश्रुतसंहिता में वृद्ध सुश्रुत का पूर्वाचार्यों में निर्देश न होने से, महाभारत के आदि में भी विश्वामित्र के पुत्र के रूप में केवल सुश्रुत का ही उल्लेख होने से, महाभाष्यकार, नावनीतक, नागार्जुन, वाग्भट तथा ज्वरसमुच्चय आदि में सुश्रुत नाम का ही निर्देश होने से, अरव आदि दूर देशों में भी इस सुश्रुत की संहिता का ही अनुवाद एवं प्रचार होने से, काम्बोडिया स्थित यशोवर्मा के शिलालेख में भी सुश्रुत का ही उल्लेख होने से, वृद्धसुश्रुत के नाम से मिलनेवाले वचनों में प्राचीन रचना एवं प्रौढता न दिखलाई देने से उसके वचनों के अनुसार वृद्धसुश्रुत का शल्याचार्य सिद्ध न होने से तथा टीकाकारों एवं अर्वाचीन लेखकों द्वारा कहीं - कहीं उद्धृत वृद्धसुश्रुत से कौन है, कव हुआ है, इसका कौन सा अन्य है, किम विभाग का यह आचार्य है इत्यादि सब विषयों के अज्ञात होने से पूर्वोद्दिष्ट दिवोदास के शिष्य, प्रसिद्ध एवं विश्रुत सुश्रुत को छोड़ कर अज्ञात वृद्ध सुश्रुत को शल्यतन्त्र का पूर्वाचार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त दृढ प्रमाण होने चाहिये इसके अतिरिक्त ' औपघेनवमौरभ्र सौश्रुतं पौष्कलावतम् । ' इस श्लोक में श्रपधेनवादिक के साथ जो ' सौश्रुतं ' करके स्वयं का नाम दिया है वह केवल सव तन्त्रों में अपनी प्रधानता दिखलाने के लिये ही है । यदि इस सौश्रुत शब्द को देखकर अन्य सुश्रुत को कल्पना की जाय तो उस न्याय से औपधेनव श्रादि श्राचार्यों के तन्त्र भी पृथक् रूप में मिलने चाहिये । अपने ग्रन्थ में अपना ही नाम उल्लेख करने की प्रथा कौटिलीय अर्थशास्त्र आदि प्राचीन प्रन्थों में भी मिलती है । प्रतिसंस्कर्तृत्व विचार - जिस तरह भरद्वाज के द्वारा उपदिष्ट ज्ञान को अग्निवेश ने सङ्कलित कर अग्निवेश संहिता बनायी और उसे चरक ने प्रतिसंस्कृत किया जो कि अभिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इस चरकोक्ति से प्रमाणित है, उस तरह का सुश्रुत में कोई उल्लेख नहीं है फिर भी ऐसा माना जाता है कि ' सुश्रुत का प्रतिसंस्कर्ता नागार्जुन माना गया है ' यह वात सुश्रुत की डल्हण टीका से भी विदित होती है - ' यत्र यत्र परोक्षे लिट् प्रयोगस्तत्र तत्रैव प्रतिसंस्कर्तृसूत्रं ज्ञातव्यम्, प्रतिसंस्कर्ताऽपीह नागार्जुन एव । ' श्रस्तु, नागार्जुन इसका प्रतिसंस्कर्ता हो चाहे न हो परन्तु यह तो सव विद्वान् स्वीकार करते हैं कि स्थान - स्थान पर अन्य विषयों के मिलने से सुश्रुतसंहिता का वर्तमान रूप प्रतिसंस्कृत ही है । भारतवर्ष में सिद्ध नागार्जुन, चौद्ध नरपति नागार्जुन और महायान - प्रतिष्ठापक नागार्जुन ऐसे अनेक नागार्जुन हो चुके हूँ । इनमें से महायान - प्रतिष्ठापक चौद्ध नागार्जुन ने सुश्रुतसंहिता का प्रतिसंस्करण किया ऐसा कुछ विद्वानों का मत है । यह नागार्जुन दो हजार वर्ष के पहले था इससे भी यह सिद्ध है कि आज की उपलब्ध सुश्रुतसंहिता कम से कम दो हजार वर्ष पुरानी है । सुश्रुतटीकाएँ -- प्राचीन काल मे लेकर श्रव तक सुश्रुतसंहिता की कई संस्कृत टीकाएँ, प्रान्तीय भाषाओं में तथा श्रग्रेजी में अनुवाद हुए हैं । संस्कृत - टीकाओं में इस समय डल्हणाचार्य विरचित समय सुश्रुत की निबन्धसङ्ग्रहव्याख्या

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प्राभ्यन ७ तथा श्रीचक्रपाणिदत्त विरचित सूत्रस्थान मात्र की भानुमती व्याख्या एवं श्रीगयदासाचार्य विरचित निदानस्थानमात्र को न्याय चन्द्रिकाख्यपञ्जिका व्याख्यायें उपलब्ध हैं । नवीन संस्कृत - टीकाओं में समग्र सुश्रुत पर श्रीहाराणचन्द्र द्वारा विरचित सुश्रुतार्थ-सन्दीपन भाष्य समुपलब्ध है । इनके सिवा भहार हरिचन्द्र, जेबट, गयदास, शिवदाससेन और हेमाद्रि की खण्डित व्याख्याएँ भी यत्र तत्र पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं किन्तु अन्य व्याख्याएँ उपलब्ध नहीं होती हैं । संहिताकाल और व्याख्या-काल के पीछे विक्रम की इस वोसवीं शताब्दी से संस्कृत भाषा के पठन - पाठन का दिन प्रतिदिन ह्रास होने से आर्षप्रन्थों के मूल अर्थ को तथा प्राचीन व्याख्याकारों के संस्कृत में स्पष्ट किये हुए भावों को भी ठीक - ठीक समझनेवाले वैद्यों को संख्या वैद्यसमाज में दिन प्रतिदिन घट रही है अतएव वर्तमान समय में अल्पसंस्कृतज्ञ तथा संस्कृतान-भिज्ञ वैद्यों एवं विद्यार्थियों के लिये भाषानुवाद करने की प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई । यह अत्यन्त दुख की बात है कि सुश्रुत के हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती जितनी भी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं कुछ को छोड़ कर अधिकतर ऐसे हो हैं जिनसे संस्कृतटीकाओं का गूढार्थ समझना तो दूर रहा अपितु मूलग्रन्थ का आशय भी ठीक - ठीक समझाना कठिन है । इसका कारण उन टीकाकारों का गुरुमुख से आयुर्वेद अध्ययन का अभाव, संस्कृतपाण्डित्य का अभाव या संस्कृतज्ञ हों तो श्राधुनिक चिकित्साविज्ञान में शून्यता आदि हो सकते हैं । हिन्दीटीका प्रकार - ( १ ) प्रथम प्रकार में ग्रन्थ मूल पद्य या गद्य का उल्लेख न कर दे वल उसका अनुवाद सरलभाषा में कर दिया जाता है जैसे अमृतसागर तथा भागवत का शुकसागर । यह पद्धति शास्त्राध्ययनशील व्यक्तियों के लिये कोई लाभदायक नहीं है । ( २ ) दूसरे प्रकार में प्रथम उस ग्रन्थ का मूलपाठ देकर उसके नीचे उसका सरल अर्थ दिया जाता है । यह प्रकार साधारण जनता तथा शास्त्रजिज्ञासु दोनों के लिये उपयोगी है क्योंकि पाठक के सम्मुख मूलपाठ रहने से मूलार्थ को यथार्थता स्वयं जान सकता है | ( ३ ) तृतीय प्रकार में मूल और उसके अर्थ के सिवाय मूल की टोकोपटीकाएँ तथा उनके भी सरल अनुवाद दिये हुये रहते हैं | जैसे माधवनिदान तथा उसकी मधुकोप टोका का अनुवाद है । साधारण जनता के लिये यह प्रकार विशेषोपयोगी न होकर शास्त्रचिन्तक लोगों के लिये विशेष लाभप्रद होते हैं क्योंकि टीकोपटीकाओं में मूल के सिवा भी प्रकरणानुसार शास्त्र पर पर्याप्त प्रकाश डाला हुआ रहता है । ( ४ ) चतुर्य प्रकार में मूलपाठ तथा उसके सरल भापानुवाद के अनन्तर टीकाकार स्वयं अपना वक्तत्य विमर्श के रूप में लिखता है जिसमें कठिन तथा गूढ शब्दों और भावों पर पर्याप्त प्रकाश डाला जाता है, मतमतान्तरों का वर्णन रहता है, समन्वय योग्य स्थलों का समन्वय किया जाता है । जहा यथार्थ में विरोध रहता है उसे निष्पक्ष प्रदर्शित किया जाता है । सूत्ररूप में कहे हुये प्राचीन विषयों को आधुनिक विज्ञान के द्वारा पूर्ण किया जाता है । उभयमत पुष्टि के लिये श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषन, इतिहास प्रभृति प्राच्य शास्त्र तथा उनकी टीकाएं एवं वर्तमान वैज्ञानिकों के प्रन्थ, लेख का यथोचित आधार लेकर विषय को सर्वाह्न पूर्ण समझाने की चेष्टा की जाती है । यह टीका प्रकार सर्व प्रकारों में श्रेष्ठ है क्योंकि पाठक के पास प्राच्य - प्रतीच्य उभय विज्ञान की सामग्री होने से वह उस विषय को पूर्ण हृदयङ्गम करने के साथ ही अपना मत भी बता सक्ता है । इस प्रकार की टीका मेरे गुरुवर्य श्री डाक्टर घाणेकरजी ने सुश्रुत के सूत्रनिदान एव शारीर स्थानों पर लिखी है तथा मैने भी इसी प्रकार का अवलम्वन लेकर श्रीमान् वावू श्रीजयकृष्णदासजी गुप्त के श्राग्रह से समग्र सुश्रुत पर ऐसी विशद टीका लिखने का प्रयास प्रारम्भ किया है जिससे गुरुवर्य के द्वारा अन्य विशिष्ट कार्य संलग्नतावश सूत्र, निदान और शारीर के पश्चात् के बचे हुए भागों का ऐसी टीका रूप में विशद विवेचन हो जाय जिसमे आयुर्वेद के विद्वानों और छात्रों का इस भाषाभाष्यरूपी टीका से विशेष मनोरञ्जन व शास्त्रचिन्तन हो सके । यद्यपि यह कार्य अत्यन्त कठिन है तथा मेरा प्रयास उसी प्रकार का है जैसा कि महाकवि कालिदास ने कहा है-क्क सूर्यप्रभवो वंशः क्वचाल्पविषया मतिः । तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् । तथापि द्वादश वर्ष तक काशी तथा काशी हिन्दूविश्वविद्यालय में रहकर व्याकरण, न्याय, साख्य, साहित्य, श्रायुर्वेद और ढाक्टरी का अनेक दिग्गज विद्वानों से अध्ययन करने के पश्चात् सन् १ ९ ४० से १ ९ ५३ तक इन्दौर, रामगढ़, गुरुकुल , जयपुर आदि स्थानों के प्रख्यात आयुर्वेदिक महाविद्यालयों में प्रिंसिपल के रूप में रह कर सैकड़ों छात्रों को श्रष्टाङ्ग कांगडी ) अध्ययन कराने से जो स्वल्प ज्ञानानुभव हुआ है उसके आधार से तथा अपने श्रायुर्वेद का तुलनात्मक ( Comparative

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I प्राक्कथन श्रनेक प्रख्यात आयुर्वेदिक विद्वान् गुरु और डाक्टरों के लिखित ग्रन्थरूपी मार्ग प्रदर्शन के आधार से इस महान् संहिता ग्रन्थ के विशद विवेचनात्माक भाषाभाष्यरूपी कार्य में सफल होने का प्रयास कर रहा हूं—

अथवा कृतवाग्द्वारे ग्रन्येऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः ।

समुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ॥

( रघुवंशः १ सर्ग ) इस टीका के लेखन में मुझे अपने प्रधान गुरुवर्य श्री सत्यनारायणजी शास्त्री तथा राजेश्वरदत्तजी शास्त्री के द्वारा प्रदत्त प्रोट आयुर्वेदिक ज्ञान से तथा गुरुवर्य श्री डा ० घाणेकरजी की सुश्रुत को श्रायुर्वेदरहस्यदीपिका टीका तथा गुरुवर्य श्री डा. मुकुन्दस्वरूप वर्माजी के सक्षिप्त शल्यविज्ञानका सहयोग प्राप्त हुआ है धन- मै उन पूज्य गुरुजनों का आभार मानता हृ । प्राकथन लेखन में भी पूज्यपाद गुरुवर्य यादवजी द्वारा सम्पादित निर्णयसागरी मुश्रुत के उपोद्घात से एवं नेपालराज -गुरु श्री पं ० हेमराजजी शर्मा द्वारा सम्पादित काश्यपसहिता के उपोद्घात से एव गुरुवर्य श्री कविराज प्रतापसिंहजी के यत्र तत्र गम्भीर विषयत्रिन्यासरूप प्रोत्साहन मे अत्यधिक सहायता प्राप्त हुई है अत एव मैं उक्त तीनों महानुभावों का हृदय से अभि नन्दन करता हूं । साथ ही भारतप्रख्यात वैद्यराज पं ० ख्यालोरामजी द्विवेदी तथा वैद्यराज पं ० कालूशङ्करजी चतुर्वेदी एवं आयुर्वेदहितैषी लाला हजारीलालजी मित्तल का मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूं क्यों कि इन्ही महानुभावों ने मुझे सर्व प्रथम सन् १ ९ ४० में चिकित्सा तथा अध्यापनरपी कार्यक्षेत्र में नियुक्त किया और आज भी ये मुझ पर पूर्ण वात्सल्यभाव रखते हुये अहर्निश मेरी समुन्नति के पोषक हैं । इस महता के समय में चौखम्बा संस्कृत सीरिज के अध्यक्ष श्रीमान् बाबू जयकृष्णदास जी गुप्त को भी विशेष धन्यवाद देता हूँ क्यों कि इन्होंने मुझ पर अपना कौटुम्बिक जनसदृश स्नेह रख कर इस टीका को लिखने का पुन. पुन प्रेरण करने के अतिरिक्त अपार धनराशि खर्च करके आयुर्वेद तथा आयुर्वेद के विद्वानों और छात्रों को सेवा करने के पवित्र अभिप्राय से इस ग्रन्थ का प्रकाशन किया है । इस ग्रन्थ की भूमिका के लेखक श्री डा ० प्राणजीवन जी मेहता का मै अत्यन्त कृतज्ञ हू कि जिन्होंने अपना अमूल्य समय प्रदान कर अपनी भूमिका द्वारा इस टीका को उपादेयता को प्रमाणित करने के साथ ही मेरे लेखन कार्य में प्रोत्साहन दिया है । इस प्रन्थ के अनेक स्थलों में मेरे प्रमाद से, किंवा यन्त्रदोष से तथा मेरे काशी से दूर रहने के कारण अशुद्धिया रह गई हैं उन्हें नोरक्षीरविवेको एवं उदार हृदय विद्वान् एवं पाठकवृन्द क्षमा कर सारग्रहण कर मुझे अनुगृहीत करेंगे— ' सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥ ' मानव तो हजारों अपराव का पात्र है- ' अपराघसहस्रभाजनम् ' उससे पर पद पर दोषोद्भव होना सहज है किन्तु सन्चन उन दोषों को श्रोर ध्यान न देकर समाधान - भावना से लेखक के उत्साह का वर्धन करते ही रहते हैं—

गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः । हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥

गुरुपूर्णिमा, सं ० २०१० विदुपामनुचर'-श्री रा. कु श्रायुर्वेद कालेज, इन्दौर अम्बिकादत्त शास्त्री

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विषय - सूची विषयाः पृष्ठाङ्काः प्रथम अध्याय वेदोत्पत्ति अध्याय का उपक्रम I avara आदि शिष्यों का आयुर्वेदाध्ययनार्थं धन्वन्तरि के समीप आगमन 5 औपचादि का धन्वन्तरि द्वारा स्वागत 91 आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपान कथन 97 आयुर्वेद के शल्यादि आठ अङ्ग II शनादि अष्टाङ्गों का सक्षेप से लक्षण " शल्य - शालाक्य - कायचिकित्मा-भूतविद्या -कौमारभृत्यलक्षण " अगदतन्त्रलक्षण ४ रसायनतन्त्र - वाजीकरणतन्त्रलक्षण " अष्टाङ्ग का उपसहार " शल्याद्गप्रधान आयुर्वेदोपदेश के लिये भगवान् धन्वन्तरि के आगे औपधेनवादि शिष्यों को प्रार्थना " सब की ओर से सुश्रुत को प्रनादि करने का अधिकार देना " सुश्रुत को आयुर्वेद का प्रयोजन बताना 99 आयुर्वेद की निरुक्ति प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा शल्यार्थ की अनुकूलता सिद्धि ५ शल्याङ्ग का प्राधान्य, प्रशंसा तथा निव्यता 29 आयुर्वेद की गुरुपरम्परा से प्राप्ति या अवतरणक्रम 19 भगवान् धन्वन्तरि का आत्म-परिचय देना " " आयुर्वेदिक पञ्चमहाभूतादि पुरुष की परिभाषा ६ संस्वेदनादि चतुर्विध भूतग्राम में पुरुष का प्राधान्य " " व्याधिपरिभाषा 39 व्याधियों के चतुर्विध भेद आगन्तुक - शारीरिक - मानसिक स्वाभाविक व्याधि 31 चतुर्विध व्याधियों के कारण, स्वरूप तथा द्विविध - अधिष्ठान 33 २० सूत्रस्थान । विषया ' पृष्ठाङ्काः व्याधियों के निग्रह में हेतु ६ संशोधन आदि में आहार की मुख्यता तथा स्थावर - जनम भेद से ओपधियों का विध्य वर्णन 19 स्थावर ओषधियों के चार भेद जगम ओषधियों के चार भेद 33 जरायुजादि चतुर्विध सृष्टि में गिने जाने वालों का निर्देश 33 ओषधियों के चिकित्सोपयोगी अङ्ग का निर्देश पार्थिव ओषधियां कालकृत प्रवात - निवातादि विशेषताएं तथा उनके समय प्रकोपादि में कारण I शारीरिक रोग - प्रशमन में उक्त चतुर्विध वर्ग की कारणता 99 आगन्तुक रोगाधिष्ठान 33 आगन्तुकरोग चिकित्सा सूत्र 31 पूर्व निर्दिष्ट व्याधि, पुरुष, औषध, क्रियाकाल का उपसंहार " प्रथमाध्यायोक्त सक्षिप्तार्थ को चिकित्सावीज सिद्ध करना 13 सुश्रुतान्तर्गत स्थान एव अध्यायों की संख्या - सूची 33 सुश्रुततन्त्राध्ययनफल 35 द्वितीय अव्याय शिष्योपनयनीय अध्याय का उपक्रम ८ पढाने योग्य शिष्य का लक्षण ९ आयुर्वेददीक्षाविधि 33 आयुर्वेदाध्ययन के अधिकारी शिप्य एवं गुरु का कर्तव्य 99 रोगी के लिये वैद्य का कर्तव्य १० आयुर्वेदाध्ययन में वर्जित समय 19 तृतीय अव्याय अध्ययनसम्प्रदानीय अध्याय का उपक्रम १० सूत्रादि प्रत्येक स्थानों की अध्याय - सख्या 22 सूत्रस्थानान्तर्गत अध्यायों के नाम 33 । विपयाः पृष्टाका. सूत्रस्थान की निरुकि II निदानस्थानान्तर्गत अध्यायों के नाम १६ निदानस्थान की निरुक्ति " शारीरस्थानान्तर्गत अध्यायों के नाम " शारीरस्थान - प्रयोजन " 1 चिकित्सास्थानान्तर्गत अध्यायों के नाम 29 चिकित्सास्थान की निरुक्ति 53 कल्पस्थानान्तर्गत अध्यायों के नाम १२ कल्पस्थान की निरुक्ति उपसंहार 33 उत्तरतन्त्र के प्रथम अध्याय के ' औपविक ' नामकरण में कारण " शालाक्यतन्त्रान्तर्गत अध्यायों के नाम 29 कौमारतन्त्रान्तर्गत अध्यायों के नाम " भूतविद्यान्तर्गत अध्यायों के नाम तन्त्रभूषण अध्यायों के नाम १३ उत्तरतन्त्र की निरुक्ति अष्टाङ्ग आयुर्वेद का संक्षेप से तन्त्रय मैं नियमन 99 आयुर्वेद का उपासक उभयज्ञ वैद्य राजा होता है 33 केवल शास्त्रज्ञ अथवा केवल कर्म -निष्णात भिकू का चिकित्सा कार्य में अनधिकार " उभयज्ञ अर्थात् शास्त्रज्ञ और कर्म निष्णात भिषक् की प्रशंसा 31 आयुर्वेद के अध्यापन और अध्ययन का प्रकार II अध्ययन समाप्त कर लेने पर शिष्य का कर्तव्य 29 R चतुर्थ अध्याय प्रभापणीय अध्याय का उपक्रम प्रभाषण का प्रयोजन I एक सौ वीस अध्यायों के वर्णन तथा श्रवण की आवश्यकता " अन्य शास्त्रों में वर्णित विषयों का उन्हीं के पण्डितों से श्रवण II बहुश्रुतप्रशंसा "

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विषयाः पृष्ठाङ्काः । गुरुमुख से आयुर्वेद का श्रवण कर अभ्यास करने वाले व्यक्ति ही वैद्य मंज्ञा के अधिकारी हो सकते हैं १ औषधेनवादितन्त्रों की अन्य समान तन्त्रों में प्रधानता का निर्देश " पञ्चम अध्याय अपहरणीय अध्याय का उपक्रम १५ त्रिविध चिकित्साकर्म 31 कर्म प्रधान होने से उसका प्रथम वर्णन १६ आठ प्रकार के शस्त्रकर्म 39 शस्त्रक्रिया के पूर्व समय करने योग्य सामग्री " " S aapoor में प्रशस्त व्रण के लक्षण १७ शस्त्रकर्म करने योग्य वैद्य के गुण " एक व्रण ( चीरे ) से प्यादि न निकलने पर अन्य व्रण करने एवं प्यगति तथा उत्सग को ढेकर वहां व्रण करने का विधान तिर्यक छेद करने के स्थान 11 पाणि, पाद, गुद, मेढ़ पर चन्द्र-मण्डलादि छेद 33 अन्यथा छेद करने पर दोप 33 मूढगर्भादि में विना खाये शस्त्रकर्म करने का उपदेश " 3 शस्त्रक्रिया के अनन्तर उपचार विधान,, धूपनद्रव्य और जल से रोगी का परिमार्जन 16 व्रण रोगी का रक्षा " सुरक्षित व्रणरोगी के स्वकर्तव्य तथा आगारप्रवेश १ ९ वणी के पट्टवन्धन तथा विमोचन के समय पर विचार 39 द्वितीय दिवसपट्टमोक्षण दोप 29 दोप- कालादि के अनुसार कपाय-आलेपन आदि का विचार सदोष व्रण के रोपण में दोष or को रोपण चिकित्मा का लसय तथा उसमें वर्जनीय वस्तु 59 ऋतु के अनुसार व्रण की पट्टी सोलने का नियम अतिपाती रोगों में उक्त नियम का निषेध शस्त्रनिपातजनितवेदना " " के शमन का उपाय " 2 विषय सूची विषयाः पृष्ठाङ्काः । * R /छठा अध्याय ऋतुचर्या अध्याय का उपक्रम कान को निरुक्ति 11 संवत्सरात्मक काल के गतिविशेष से निमेषाद्रि विभाग 19 | निमेपादि के लक्षण 33 ऋतुओं का विभाग 11 दक्षिण और उत्तर दो प्रकार का अयनविभाग " चन्द्र, सूर्य और वायु ही पाउन में कारण है $ 3 सरसर, युग और कालचक्र को परिभाषा २१ सशोधनाश्रय वर्षादि क्रम से ऋतु विभाग 11 चर्पादि ऋतुओं में पित्तादिके चय, प्रकोप तथा उनके रोग - भवन प्रकार 93 वर्षादि ऋतुओं में सचित तथा शर दादि में प्रकुपित दोपों के निर्ह-रण का उपाय 31 वातादि दोषों का स्वाभाविक सश-मन काल " एक दिन में पट ऋतुओं का होना तथा उनमें दोपचयादि अवस्था २२ अव्यापन्न ऋतुओं में ओषधियों का गुणशाली होना ऋतुओं को विकृति के कारण, चिकृत जल के उपभोग से रोगोरपत्ति " विकृत ऋतुओं में अधिकृत औषध. सेवनोपदेश " ऋतुविकृति के अतिरिक्त अन्य कारणों से भी रोग हो जाते हैं । " विकृत ऋतुकाल में स्थान परिव्या-गादि उपदेश 23 अविकृत ऋतुओं के लक्षण २३ हेमन्त शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृड्, वर्षा तथा शरद ऋतु के लक्षण वातादि दोपों के प्रकोप के कारण II किस ऋतु में किस दोष का निर्हरण करने का उपदेश 33 R / सातवां अध्याय ' ' यन्त्रविधि अध्याय का उपक्रम II यन्त्रोंकी सरया तथा सामान्य लक्षण ” यन्त्रोंके छ प्रकार तथा आवान्तर भेद " यन्त्र बनाने के द्रव्य " यन्त्र निर्माणविधि स्वस्तिकयन्त्रों के नाम, लक्षण और २५ कार्य 33 विषयाः पृष्ठाङ्काः सदशयन्त्रों के नाम लक्षण और कार्य २५ तालयन्त्रों के नाम, स्वरूप और कार्य " नादीयन्त्रों के नाम स्वरूप और कार्य " | शलाकयन्त्रों के नाम स्वरूप और कार्य २६ उपयन्त्रों के नाम, स्वरूप और कार्य " यन्त्रों के कार्य तथा दोष II प्रशस्तयन्त्रस्वरूप 22 दृश्य तथा गृढ शल्य निकालने वाले यन्त्र 13 यन्त्रों में कहनयन्त्र की प्रधानता " R अष्टम अध्याय शखावचारणीय अध्याय का उपक्रम II चौस प्रकार के श " शस्त्र पकड़ने का तरीका 19 शस्त्रादि का प्रमाण?? शस्त्रों की सम्पत् या गुण 11 शस्त्रों के दोष तथा धारा २ ९ आहरण और पुपणकर्म में धाराओं का भेद " } afe, दन्तश तथा एपणी का स्वरूप " शस्त्रों की त्रिविध पायना का निरूपण " पायित शस्त्रों का विभिन्न शखकम में प्रयोग 22 शस्त्र को तीक्ष्ण करने के लिये शिला तथा धारास्थापनार्थ शाल्मलिफलक 33 शस्त्रकर्म में प्रयुक्त करने योग्य शस्त्र 11 अनुशस्त्रों का वर्णन व उपयोग 31 शस्त्र बनाने योग्य धातु तथाकारीगर ३० शस्त्रग्रहणपरिचय की आवश्यक्ता " नवम अध्याय -योग्यासूत्रीय अध्याय का उपक्रम ३० योग्या करने की आवश्यकता " " धादिकमों का विभिन्न फला-दिकों पर अभ्यास " शस्त्रकर्म में अभ्यस्त वैद्य मोह को नहीं प्राप्त होता है ३१ शस्त्रकर्मकौशल - प्राप्ति में योग्या आवश्यक है R V दशम अध्याय विशिखानुप्रवेशनीय अध्याय का उपक्रम ३२ विशिखानुप्रवेश या चिकित्सा कर्म के योग्य वैद्य 33 दूत - शकुनादि का विचार कर रोगी के घर में जाना "

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विषयाः पृष्ठाङ्काः रोगविज्ञान के छः साधन ३२ श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, घ्राण, जिह्वा और प्रश्न द्वारा रोग विज्ञान प्रकार 33 अपरीक्षित रोगों में चिकित्सक किं-कर्तव्य विमूढ हो जाता है ३३ साध्य, याप्य और असाध्य रोगों में वैद्यकर्तव् " 3 कुछ रोगियों में साध्य रोग भी दुश्चिकित्स्य हो जाते हैं " वैद्य के लिये परस्त्री का सम्पर्क - निषेध ३४ ग्यारहवां अध्याय क्षारपाकविधि अध्याय का उपक्रम ३४ शस्त्रानुशस्त्रों में चार की प्रधानता " क्षारशब्द की निरुक्ति, क्षार के गुण और कर्म " के भेद प्रतिसारणीय क्षार के विषय ३५ पानीयतार के विषय क्षारचिकित्सा के अयोग्य रोगी 29 पानीयतार निर्माण विधि 33 प्रतिसारणीय क्षार के भेद तथा उसके निर्माण की विधि 23 मृदुहार तथा मध्यमक्षार ३६ पाक्यसंज्ञक तीक्ष्ण क्षार का निर्माण-प्रकार 39 व्याधि के वलावल को देख कर चार-प्रयोग करना चाहिये 33 मृदुतार में बलाधानार्थं चारोदक का प्रक्षेप क्षार के गुण S चार दोप क्षारप्रतिसारणविधि 23 चार से सम्यग्दग्ध के लक्षण ३७ चारदग्ध के न गिरने पर आप " " चार व्रण के रोपण का उपाय 99 चारदुग्धवेदना अम्ल से शान्त होती है, इसमें युक्ति " क्षार द्वारा सम्यकू, हीन और अतिदग्ध के लक्षण " " क्षारदग्धत्रणचिकित्सा द्विविधचार का प्रतिषेध विपय प्रदेश विशेष में क्षार का निषेध ३८ क्षार का अवस्था विशेष में निषेध " अल्पमति - प्रयुक्त और विज्ञ प्रयुक्त चार की विशेषता बारहवां अध्याय अग्निकर्मविधि अध्याय का उपक्रम ३८ क्षार से अग्नि की श्रेष्ठता " विषय सूची | विषयाः पृष्ठाङ्काः अग्निकर्म के साधन ३८ अग्निकर्म का काल और अपवाद " सर्व रोगों में पिच्छिलान्न खिला कर अग्निकर्म करें किन्तु अश्मर्यादि में भूखे पेट अग्निकर्म विधान ३ ९ एकीमत से द्विविध अग्निकर्म 23 त्वग्मांसादिदग्धलक्षण विभिन्न रोगों में विभिन्न स्थानों पर अनि कर्म का विधान " अग्निकर्म का विषय " अग्निकर्म का वलयादिस्वरूपवैशिष्ट्य " अग्निकर्म के पूर्व विचारणीय विषय 31 सम्यग्दग्ध पर मधुसर्पि प्रलेप अग्निकर्म के अयोग्य रोगी 99 इतरथादग्ध या स्नेहदग्धलक्षण ४० अग्निदग्ध के चार भेद " 3 दहन के सार्वदेहिक लक्षण और उनकी सम्प्राप्ति " " प्लुष्टदग्ध चिकित्सा ४१ दुर्दग्ध चिकित्सा " सम्यग्दग्धचिकित्सा 22 अतिदुग्ध चिकित्सा 19 सर्वदग्ध व्रणों के लिये रोपण घृत 39 स्नेहदग्ध की चिकित्सा 19 धूमोपहतलक्षण 93 धूमोपहत की चिकित्सा का क्रम ४२ उष्ण वातातपदग्ध शीतवर्षानिल-पीडित विद्युत्पातदग्ध की एवं इन्द्रवज्रदग्ध रोगी के उपचार 39 तेरहवां अध्याय L ' जलौकावचारणीय अध्याय का उपक्रम ४३ जलौका के योग्य रोगी 39 -वात - पित्त - श्लेष्मदुष्ट शोणित का क्रमत. शृङ्ग, जलौका, तुम्बी द्वारा रक्तमोक्षण 33 शृङ्गादि से रक्तमोक्षण करने की विधि 22 जलौका शब्द की निरुक्ति " } जलौकाओं का सख्या निर्देश 33 निर्वि 33 ४४ जलौकाओं के निवास क्षेत्र 39 क्षेत्रभेद से जलौकाओं का सविष निर्विषत्व 33 जलौकाओं का सुगन्धित सजल क्षेत्र निवास " जलौका- ग्रहणोपाय 39 जलौकाओं का सरक्षण तथा पोषण क्रम ४५ | ' विषयाः पृष्ठाङ्काः | व्याज्य जलौका ४५ जलौकावचारणविधि 99 जलौका द्वारा रक्तग्रहण का ज्ञान 39 जलौका द्वारा शुद्ध रक्त ग्रहण का ज्ञानोपाय " 3 रक्ततृप्त जलौकाओं में से रक्क निकालने का उपाय 39 सम्यग्वान्ता लक्षण " दुर्वाता लक्षण " " दुर्वान्ता के इन्द्रमद रोग " " जलौकावचारण के द्वारा रक्तमोक्षण के पश्चात् उपचार ४३ जलौकाज्ञान विषयक संग्रह श्लोक 99 चौदहवां अध्याय शोणितवर्णनीय अध्याय का उपक्रम २६ रस की परिभाषा, स्थान तथा परि-भ्रमण का प्रकार 99 रस से रक्त ' उत्पत्ति का स्थान च प्रकार ४८ रक्त की परिभाषा " " रस से ही रज. सज्ञक रक्त की उत्पत्ति 93 रक्त और आर्तव का स्वभावतः भेद ४ ९ भार्त्तव रक्त में आग्नेयत्व 37 जीवरक्त का पञ्चभूतात्मक कथन 99 रक्त में पृथिवी आदि पञ्चमहाभूतों की उपस्थिति या गुण 33 रस से रक्तादि - धातुओं की क्रम से उत्पत्ति का निर्देश 23 अन्नपानजन्य रस ही सर्वधातुओं का पोषक है ५० | पुरुष रसज है अतः रस की अन्नपा-नादि से रक्षा करें 39 रस की निरुक्ति तथा एक २ धातु में अवस्थान काल " " शरीर में तीन प्रकार से रस की गति ५१ वाजीकरण ओषधियों का शीघ्र शुक्र रेचकता गुण ३२ वालकों में शुक्र प्रतीति न होने युक्ति 99 वृद्धावस्था में अन्नरस के पोषक न होने में कारण 39 विकृत रक्त के दोषभेद से लक्षण शुद्ध रक्त का लक्षण ५३ विस्राव्य - रोगियों का अतिदेश से कथन 29 अविस्राज्य रोगी 33 शस्त्रविस्रावण के दो भेद " 3