श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 131–140
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 131–140
पृष्ठ 131
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुश्रुतसंहिता | आघात से शरीर का कोई भाग चूर्णित हो जाय, विलोडित | कवलिका ( रुई या गाज का पेट या गद्दी ) रस कर मुलायम हो जाय, टूट जाय, सन्धिच्युत हो जाय, स्वस्थान से ध्युत | पट्ट ( Bandage ) से बांध देना चाहिये । विकेशिका ( वर्ति ) हो कर लटकने लगे, अथवा अस्थि, स्नायु और सिराए छिन्न | तथा औषध इन्हें अधिक चिकनी करके न लगावें क्योंकि हो जाय तो बन्धन बाधने से ठीक हो जाते है । बन्धन से अतिस्निग्ध वर्ति व्रण स्थान को क्लिन्न कर देती है तथा रुत्र व्रणी पुरुष ठीक तरह से सोता है, सुख चलता है, सुवर्ति या औषध उम व्रण को हानि पहुंचाती है किन्तु उचित पूर्व सढ़ा रह सकता है, बैठ सकता है तथा जो सुख से सो सकता है और बैठ सकता है उसका व्रण भी शीघ्र भर नाता है ॥ ३१-३२ ॥ अवन्ध्याः पित्तरक्ताभिघातविपनिमित्ता यदा च शोफदाहपाकरागतोदृवेदनाऽभिभूताः नाराग्निदग्धाः पाकात् प्रकुपितप्रशीर्णमांसाञ्च भवन्ति ॥ ३३ ॥
पित्त तथा रक्त की दृष्टि से और अभिघात और विष के कारण उत्पन्न व्रण तथा सुजन, जलन, पाक, लालिमा, सूई चुभोने की सी पीड़ा और वेदना से युक्त हो तथा चार एवं अग्नि द्वारा जलने से उत्पन्न व्रण तथा पाक से मांस मडकर झरता हो ऐसे व्रणों में बन्धन नहीं बांधना चाहिये ॥ ३३ ॥
कुष्टिनामग्निदग्धानां पिडका मधुमेहिनाम् ।
कणिकाचोन्दुरुचिपे विपजुष्टत्रणाश्च ये ॥ ३४ ॥
मांसपाके न बध्यन्ते गुदपाके च दारुणे ।
स्त्रबुद्धया चापि विभजेत् कृत्याकृत्यांश्च बुद्धिमान् ॥
कुटियों के व्रण, अग्निदग्ध व्रण, मधुमेही मनुष्यों की पिड़काओं के व्रण, चूहे के काटने से फैले हुए चिप के कारण उत्पन्न कर्णिकायुक्त व्रण, विषयुक्त व्रण, मांसपाक जन्य व्रण और गुढपाक जन्य च॒र्णों में बन्धन बाँधना निषिद्ध है । इसके अतिरिक्त बुद्धिमान वैद्य कहां बन्धन लगाना उचित है और कहां अनुचित है आदि कृत्याकृत्य का निर्णय अपनी बुद्धि से कर लेवे ॥ ३४-३५ ॥
देशं दोपञ्च विज्ञाय व्रणञ्च व्रणकोविदः ।
ऋतूंश्च परिसङ्ख्याय ततो बन्धान्निवेशयेत् ॥ ३६ ॥
व्रण के विषय को जानने वाला विद्वान् वैद्य देश, दोप, त्रण, ऋतु आदि का सम्यग् विचार करके फिर यथायोग्य बन्धन बांधे ॥ ३६ ॥
ऊर्ध्वं तिर्य्यगधस्ताच्च यन्त्रणा त्रिविधा मता ।
यथा च बध्यते बन्धस्तथा वच्याम्यशेषतः ॥ ३७ ॥
धनां कालिकां दत्त्वा मृदु चैवापि पट्टकम् ।
विकेशिकामधं च नातिस्निग्धं समाचरेत् ॥ ३८ ॥
प्रक्लेदयत्यतिस्निग्धा तथा रूक्षा क्षिणोति च ।
युक्तस्नेहा रोपयति दुर्न्यस्ता वर्त्म घर्पति ॥ ३ ९ ॥
विपम श्रणं कुर्य्यात् स्तम्भयेत् स्त्रावयेत्तथा ।
यथा व्रणं विदित्वा तु योगं वैद्यः प्रयोजयेत् ॥ ४० ॥
ऊपर, नीचे तथा देदी इस तरह बन्धग्रन्थि तीन तरह से लगाई जाती है । अब जिस तरह बन्धन बांधा जाता है उस विधि को सम्पूर्णरूप से कहते हैं - प्रथम व्रणस्थान में विकेशिका या वर्ति लगा के औषध कल्क लगावें फिर उस पर मोदी स्नेहयुक्त वर्ति व्रण को भरती है । यदि वर्ति को टीक रखी जाय तो वह व्रण के मार्ग का घर्षण करती है व्रण को विपम बनाती है, स्राव का निरोध कर देती है या स्त्राव को बढ़ा देती है इसलिये व्रण का उचित निरीक्षण करके योग्य उपचार करना चाहिये ॥ ३७-४० ॥
पित्तजे रक्तजे वाऽपि सकृदेव परिक्षिपेत् ।
असकृत् कफजे वाऽपि वातजे च विचक्षणः ॥। ४१ ॥
तलेन प्रतिपीड्याथ स्रावयेदनुलोमतः ।
सर्वाश्च बन्धान् गृढान्तान् सन्धींश्च विनिवेशयेत् ॥४२ ॥
पित्त तथा रक्त की दुष्टि मे उत्पन्न ऋण में एक बार ही दबाकर दोप ( यादि ) का स्राव करना चाहिये । कफजन्य तथा वातजन्य व्रण में वार २ दबा कर पृय निकालना चाहिये हस्ततल से व्रण को धीरे २ दबाकर अनुलोम रूप से पूयादि को निकालें तथा सर्व प्रकार के बन्धनों को इस तरह बांधे कि उसके सिरे तथा जोड बाहर से दिखाई न दें ॥ ४१-२२ ॥
श्रोष्टस्याप्येप सन्धाने यथोद्दिष्टो विधिः स्मृतः ।
युद्धोत्प्रेक्ष्याभियुक्तेन तथा चास्थिषु जानता ॥ ४३ ॥
उत्तिष्टतो निपणस्य शयन वाऽधिगच्छतः ।
गच्छतो विविधैर्यानैर्नास्य दुष्यति स व्रणः ॥ ४४ ॥।
ये च स्युर्माससंस्था वै त्वग्गताश्च तथा व्रगाः ।
सन्ध्यस्थकोष्टप्राप्ताश्च सिरास्नायुगतास्तथा ॥ ४५ ॥
तथाऽवगाढगम्भीराः सर्वतो विपमस्थिताः ।
नैते साधयितु शक्या ऋते बन्धाद्भवन्ति हि ॥ ४६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणालेपनबन्धवि-धिर्नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
ओष्ठ के सन्धान कर्म में तथा अस्थि के जोडने में भी विद्वान् वैद्य स्वबुद्धि से विचार कर उक्तविधि के अनुसार ही बन्धन बांधे । बन्धन से उठते बैठते, सोते, अनेक सवारियों पर बैठ कर चलते हुए पुरुष का व्रण दूषित नहीं होता है । जो व्रण मांसल स्थानों में होते हैं, त्वचा के अन्दर जो व्रण होते हैं तथा सन्धि, अस्थि और कोष्ट स्थानों में जो व्रण होते हैं एवं सिरा और स्नायुओं में होने वाले व्रण तथा जो गाई
और गम्भीर व्रण होते हैं एवं जो सर्वथा विपम व्रण होते हैं ।
वे बन्धन के बिना ठीक नहीं हो सकते है ॥ ४३-४६ ॥
इत्यायुर्वेदतत्त्वसंदीपिकाभापाया व्रणालेपनबन्धविधिर्नामा -धदशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
-40400
पृष्ठ 132
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् ।
• एकोनविंशोऽध्यायः ।
अथातो त्रणितोपासनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब यहां से त्रणितोपासनीय अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥ व्रणितस्य प्रथममेवागारमन्विच्छेत् । तच्चागारं प्रशस्तवास्त्वादिकं कार्य्यम् ॥ ३ ॥
व्रणी पुरुष के लिये सर्व प्रथम रहने के लिये मकान का प्रबन्ध करना चाहिये, तथा वह मकान श्रेष्ट भूमि में बनाना चाहिये ॥ ३ ॥
प्रशस्तवास्तुनि गृहे शुचावातपवर्जिते ।
नित्राते न च रोगाः स्युः शारीरागन्तुमानसाः ॥ ४ ॥
प्रशस्त भूमि में बनाये हुए मकान में जो कि पवित्र और सोधी मानेवाली धूप से वर्जित हो तथा वायु के झोकों से रहित हो तो उसमें रहने से शारीरिक आगन्तुक तथा मानसिक रोग नहीं होते हैं ॥ ४ ॥
विमर्श: - वास्तु शब्द का अर्थ गृह है । चरके वास्तुवर्णनम्-" पहृनास्थिशर्कराकपाले देशे प्रशस्तरूपरसगन्धाया भूमो गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमृत्तिकै सुत्रमृतिके वा ॥ वास्तुशास्त्रेऽपि-विल्वो निम्बश्च निर्गुण्डी पिण्डित सप्तपर्णक । सहकारश्च पदवृक्ष-रारूढा या समस्थला । निष्कपाला निरुपला कृमिवर मोकवर्जिता ॥ अस्थिवर्ज्या न सुपिरा तनुवालुकसंयुता । अङ्गारैर्वृक्षमूलेश्च स्थूलैश्चापि पृथग्विधैः ॥ पङ्कसङ्करकूषैश्च दारुमिलोंष्ट्रकैरपि । शर्कराभिरयुक्ता या ममाद्यैश्च तुरपि ॥ सा शुभा सर्ववर्णाना सर्वसम्पत्करी धरा । मनसश्चक्षुषो यत्र मन्तोपो जायते मुवि ॥ तस्या कामे गृह सर्वैरिति गर्गादिसम्मनम् ॥ जहाँ भूमि कंकरीली, वालुका या खड़िया -युक्त होनी चाहिये । उसके आस पास जल सचय न होता हो तथा वायु और सूर्यप्रकाश आने में बाधा न हो । मकान का द्वार पूर्व या उत्तर ( प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा ) हो कमरे ग्रीष्म में शीतल तथा शीत में उष्ण रह सकें, छत तथा दरवाजे पर्याप्त ऊंचे हों । प्रत्येक व्यक्ति के कमरे का नाप ७० से १०० वर्ग फुट होना चाहिये | ( अटहस्तायत चतुर्हस्तविस्तृतं धूमातपरनसामन-मिगमनीयमृतुमुखमतमस्क निवास प्रवातैकदेशमिति ), मकान में खिड़कियाँ तथा झरोखे हों । सूर्य की किरणों में तथा शुद्ध वायु में प्रबल रोग तथा उसके जीवाणुओं के नाशन की शक्ति है अतएव ये दोनों कमरे में आ सकें ऐसा प्रबन्ध हो । रोगी या स्वस्थ पर अधिक समय तक सूर्य की सीधी किरणें न पडे
इसका भी ध्यान रखना चाहिये ।
तस्मिन् शयनमसम्बाधं स्त्रास्तीर्ण मनोज्ञं प्राकूशि-रस्कं सशस्त्रं कुर्वीत ॥५ ॥
ऐसे मकान में सम्बाधा ( पीड़ा ) से रहित, उचित लम्बी चौढ तथा शुद्ध बस्त्र से आच्छादित, मन को प्रिय लगनेवाली, पूर्व में सिरहानेबाली तथा सिरहाने के नीचे चाकू, छुरी आदि शस्त्र रखे हों ऐसी शय्या विछानी चाहिये ॥ ५ ॥
विमर्श - ऊँची, नीची, कठोर, खटमलों से व्याप्त, कमजोर पावाली खाट नहीं होनी चाहिये । मच्छरदानी लगाना भी श्रेष्ठ है । स्वास्तीर्ण-- -साफ गद्दा, चद्दर, तकिया और कम्बल । या रजाई होनी चाहिये । रोगी के विछौने, ओढ़ने और पहनने के वस्त्रों को प्रतिदिन धूप में रखें तथा धोने योग्य को धोएँ एवं गुग्गुल सर्पपादि धूपन द्रव्यों से धूपित तथा सुवा सित करने चाहिये । " शयनास्तरणप्रावरणानि मृदुलघुशुचिसुग-न्धीनि स्यु । स्वेदमलजन्तुमन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः । असति सम्भवेऽनेकेषां तान्येव सुप्रक्षालितोपधानानि सुधूपि-तानि शुद्धशुष्का योगं गच्छेयुः । धूपनानि नर्वाससां शयना-स्तरणप्रावरणाना च यवसर्पपातसी हिदुगुग्गुलुवचाचोरकवय स्थागो-लोमीबटिलापलङ्कपाशोक रोहिणीसर्पपनिर्मोकानि घृतसम्प्रयुक्तानि स्यु । ( चरक ) ।
सुखचेष्टाप्रचारः स्यात् स्वास्तीर्णे शयने व्रणी ।
प्राच्यां दिशि स्थिता दे॒वास्तत्पूजार्थं च तच्छिरः ॥ ६ ॥
अच्छे आस्तीर्णवाली शय्या पर व्रणी शयन कर सुखपूर्वक शरीर की चेष्टाएँ ( करवट बदलना ) कर सकता है । पूर्वं दिशा में देवता निवास करते हैं इसलिये उनको पूजा ( सत्कार ) के लिये पूर्व दिशा में रोगी का सिर या सिरहाना रखते हैं ॥ ६ ॥
विमर्श: -- उत्तर दिशा में रोगी या स्वस्थ किसी का शिर
नहीं करना चाहिये । स्वगृहे प्राक्शिरा शेते श्वासुर्य दक्षिणशिरा " ।
तस्मिन् सुहृद्भिरनुकूलैः प्रियंवदैरुपास्यमानो यथे-ष्टमासीत ॥ ७ ॥
उक्त प्रकार से शुभलक्षणों वाले गृह में या शय्या पर रोगी | अपने अनुकूल तथा प्रिय वोलनेवाले मित्रों के साथ बातचीत करता हुआ स्वेच्छानुकूल यथेष्ट समय तक बैठे 1 या शयन करे ॥ ७ ॥
सुहृदो विक्षिपन्त्याशु कथाभिर्व्रणवेदनाः ।
श्राश्वासयन्तो बहुशस्त्वनुकूला. प्रियंवदाः ॥ ८ ॥
अनुकूल तथा प्रिय चोलनेवाले मित्र अनेक प्रकार से आश्वासन देते हुये तथा विविध ढङ्ग की कथाओं को सुना के रोगी की व्रण वेदना को शीघ्र ही दूर कर देते हैं ॥ ८ ॥
न च दिवानिद्रावशग: स्यात् ॥ ६ ॥
दिवास्वप्नाद् व्रणे कण्डूर्गात्राणां गौरवं तथा ।
श्वयथुर्वेदना रागः स्रावश्चैव भृशं भवेत् ॥ १० ॥
वणी मनुष्य दिन में निद्रा नहीं लेवे क्योंकि दिन में सोने | से व्रण स्थान में खुजली, भट्ठों में भारीपन, व्रण में सूजन, लालिमा तथा स्राव की अधिकता ये उपद्रव हो जाते हैं ॥९ -१० ॥ उत्थानसंवेशनपरिवर्त्तनचङ्क्रमणोश्चैर्भाषणाद्यास्वा-त्मचेष्टाष्त्रप्रमत्तो व्रणं संरक्षेत् ॥ ११ ॥
उठने बैठने, करवट बदलने, घूमने, जोर से बोलने आदि आत्मचेष्टाओं में साबधान रह कर व्रण की रक्षा करनी चाहिये ॥ ११ ॥
स्थानासनं चम्क्रमणं दिवास्वप्नं तथैव च ।
तो न निपेवेत शक्तिमानपि मानवः ॥ १२ ॥
पृष्ठ 133
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुश्रुतसंहिता । ६० खडे रहना, बैठना, घूमना, दिन में सोना, इन्हें शक्ति होने पर भी व्रणी सेवन न करे ॥ १२ ॥
उत्थानाद्यासनं स्थानं शय्या चातिनिपेविता ।
प्राप्नुयान्मारुतादङ्गे रुजस्तस्माद्विवर्जयेत् ॥ १३ ॥
अधिक उठने बैठने, खड़े रहने तथा शयन करने से वायु । कुपित हो जाती है जिससे भट्ठों में अनेक प्रकार की पीढ़ाऍ होती हैं इस कारण उत्थानादि को वर्जित कर देनी चाहिये ॥ १३ ॥
गम्यानाञ्च खीणां सन्दर्शनसम्भाषणसंस्पर्शनानि दूरतः परिहरेत् ॥ १४ ॥
मैथुन करने योग्य स्त्रियों को देखना, उनके साथ बातचीत करना, तथा उनका स्पर्श करना दूर से वजित कर देना चाहिये ॥ १४ ॥
स्त्रीदर्शनादिभिः शुक्रं कदाचिचलितं स्रवेत् ।
ग्राम्यधर्मकृतान् दोषान् सोऽसंसर्गेऽप्यवाप्नुयात् ॥ १ ॥
उक्त स्त्री - दर्शनादि भावों से कभी २ दुर्बल इन्द्रिय पुरुष का शुक्र चलित ( स्वस्थानच्युत ) हो जाता है जिससे स्त्री सम्भोग न करने पर भी ग्राम्यधर्म ( स्त्रीभोग ) से होनेवाले दोप ( वीर्यच्युति, वलहानि ) प्राप्त हो जाते हैं ॥ १५ ॥
विमर्श: - गग्या - स्वपत्त्री, वेश्या, दासी प्रभृति । नवधान्यमाषतिलकलायकुलत्थ निष्पावहरितकशा काम्ललवणकटुकगुडपिष्टविकृतिवल्लूर शुष्क शाकाजावि कानूपौद कमांसवसाशीतोदककृशरापायसदधिदुग्धतक्र-प्रभृतीन् परिहरेत् ॥ १६ ॥
नूतन धान्य, उड़द, तिल, मटर, कुलथी, चवले, हरित वर्ग के शाक, अग्ल, लवण, कटु रस प्रधान द्रव्य, गुड़ और पिष्ट ( आटे ) के वने मालपूर आदि गरिष्ठ पदार्थ, वल्लुर ( शुष्क मांस ), शुष्क शाक, बकरी, भेड़, आनूप देश तथा जल में रहनेवाले प्राणियों का मांस तथा वसा, उढा पानी, कृशरा ( खिचडी ), पायस ( खीर ), दही, दुग्ध, छाछ आदि को व्रणी वजित कर देवे ॥ १६ ॥
विमर्श: -- हरितकवर्ग शाकानि - कुठेर शिम्सुर ससुमुखासुरिभूस्तृ-णा । मूलक चुक्रिका चेति वर्ग हरितकं विदुः ॥
तक्रान्तो नवधान्यादिर्योऽयं वर्ग उदाहृतः ।
दोषसञ्जननो ह्येष विज्ञेयः पूयवर्धनः ॥ १७ ॥
नवधान्य से शुरू कर तक पर्यन्त जो वर्ग कहा गया है वह दोपजनक तथा पूयवर्द्धक है ॥ १७ ॥
मद्यपश्च मैरेयारिष्टासवशीधुसुराविकारान् परिहरेत् ॥ मद्यपान करनेवाला या अमद्यपी वणी मनुष्य मैरेय, अरिष्ट, आसव, सीधु, सुरा विकारों को वर्जित कर देवे ॥ १८॥
बिमर्शः - मेरेबपरिचयः - मैरेय धातकीपुष्पगुडधान्याम्लसाधितम् । सचातुर्जातका भाजीभकुष्ठोपणनागरम् ॥ अथवा प्रासवस्य सुराया-व इवोरेकत्र मानने । सन्वान तद्विजानीयान्मैरेयमुभयात्मकम् ॥ भासवारिष्टलक्षणम् - यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्ध मयं स आसव । अरिष्ट कार्यसिद्धः स्यात् । सीधुलक्षणम्- ज्ञेय शीतरसः सीधुर-पकमधुरद्रवै । सिद्ध ' पकरस ' सीधु सम्पम्मधुरद्रये ॥ सुरा • लक्षणम् --- परिपकान्नसन्धानममुत्पन्ना सर्ग जगु । कुछ आचार्य मधुर सौम्यगुणयुक्त द्राक्षारसादिजन्य मद्यसेवन का उपदेश करते हैं । सनेह मधुरप्राय नानितीच्णमकर्केशम् । तनु यत्मुखपे-यन्न माकेषु तदुत्तमम । यद्यपि मद्य उष्णप्रकृतिक होने से वित्त और रक्त को कुपित कर व्रण को शुद्धि तथा रोपण में बाधा पहुंचा सकते हैं किन्तु मधुर सौम्यगुणी मद्य हृदय का ताकत देने वाला तथा दीपन, पाचन, हर्पण और उत्साहवर्धक होने से भोजनोत्तर स्वल्प मात्रा में रोगी को देने से लाभ ही करता है ।
मद्यमम्ल तथा रूक्षं तीच्णमुष्णं च वीर्यतः ।
आशुकारि च तत् पीतं क्षिप्रं व्यापादयेद् व्रणम् ॥११ ॥
मध -- अम्लरस वाला, रूक्षप्रकृतिक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, और शीघ्र ही रस - रकादि वाहक स्रोतसों में प्रवेशनशील होने से उसका पान करने से शीघ्र व्रण को व्यापादित कर देता है | ॥ १ ९ ॥ वातातपरजोधूमावश्याया तिसेवनातिभोजनानिष्ट-| भोजनश्रवणदर्शनेयमर्पभयक्रोधशोकध्यानरात्रिजाग-रणविपमा शनशयनोपवासवाग्व्यायामस्थानच ड़क्रमण-शीतवातविरुद्धाध्यशनाजीर्णमक्षिकाद्याबाधाः परिहरेत् ॥ वायु, धूप, धूली, धुआं, ओस, इनका अधिक सेवन, अति भोजन, अनिष्ट भोजन, अनिष्ट शब्द का श्रवण और वस्तु का दर्शन, ईर्ष्या, क्रोध, भय, शोक, चिन्ता, रात्रि जागरण, विषम भोजन, विषम शयन, उपवास, जोर से बोलना, सीधा खड़ा रहना, घूमना, शीत और बात का सेवन, विरुद्ध भोजन, अध्यशन, अजीर्णं तथा मक्षिका, मच्छर आदि बाधाओं का परिहरण कर देना चाहिये ॥ २० ॥
विमर्श: स्तोकमकाले वा विज्ञेय विपमाशनम् । भुक्तस्यो -परि भोजनमध्यशन तथा ॥ महिकावर्जन हेतु - मक्षिका व्रणमागत्य
निक्षिपन्ति यदा कृमीम् । श्वयथुर्भचिते तेस्तु जायते भृशदारुण. ॥
तीव्रा रुना विचित्रच रक्तस्त्रावश्च जायते ॥
व्रणिनः सम्प्रतप्तस्य कारणैरेवमादिभिः ।
क्षीणशोणितमांसस्य भुक्तं सम्यक् न जीर्यति ॥ २१ ॥
अजीर्णात् पवनादीनां विभ्रमो बलवान् भवेत् ।
ततः शोफरुजात्रावदाहपाकानवाप्नुयात् ॥ २२ ॥
उक्त प्रकार के तथा अन्य इसी प्रकार के कारणों से सन्तप्त | हुये तथा क्षीण शोणित - मांस वाले व्रणी का खाया हुआ भोजन ठीक तरह से पचता नहीं है । इस तरह अजीर्ण होने से वात, पित्त आदि दोषों का विभ्रम ( स्थानान्तर गमन या दुष्टि ) बलवान हो जाता है जिससे व्रण स्थान में सूजन, । पीढ़ा, स्त्राव, दाह और पाक उत्पन्न होते हैं ॥ २१-२२ ॥ सदा नीचनखरोम्णा शुचिना शुकुवाससा शान्ति-मङ्गल देवताब्राह्मणगुरुपरेण भवितव्यमिति । तत् कस्य हेतोः? हिंसाविहाराणि हि महावीर्याणि रक्षांसि पशु-पतिकुवेरकुमारानुचराणि मांसशोणितप्रियत्वात् क्षतज-
पृष्ठ 134
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् । ८१ निमित्तं व्रणिनमुपसर्पन्ति सत्कारार्थं जिघांसूनि वा कदाचित् ॥ २३ ॥
सर्वदा नख और बाल छोटे रखने वाला, पवित्र, श्वेत वस्त्र पहने हुये, शान्ति पाठ, मङ्गल कर्म, देवता, ब्राह्मण और गुरु की सेवा में तत्पर ब्रगी को होना चाहिये । ऐसा क्यों रहना? हिंसार्थ विहार करनेवाले पराक्रमी राक्षस तथा रुद्र, कुबेर और कार्तिकेय के अनुचर मांस और रक्त के अभिलाषुक होने से रक्त के निमित्त व्रणी के पास अपना सरकार कराने को आते हैं अथवा कमी २ उस बगी को मारने की इच्छा से भी आते हैं ॥ २३ ॥
भवति चात्र --तेषां सत्कारकामानां प्रयतेतान्तरात्मना ।
धूपत्रल्युपहारांश्च भक्ष्यांश्चैवोपहारयेत् ॥ २४ ॥
सत्कार को चाहने वाले उन राक्षसों के लिये सच्चे अन्त ' करण से प्रयत्न करना चाहिये एवं ' उनके लिये धूप, बलि, उपहार तथा मिष्ठानादिक भक्ष्य पदार्थ चौरास्ते पर रखने चाहिये ॥ २४ ॥
विमर्श: - राचसा. क किमर्थञ्च नन्ति - अशुचि भिन्नमर्याद
चतं वा यदि वाऽश्चतन् । हिंत्युहिनाविहारार्थं सत्कारार्यमयापि वा ॥
राक्षस शब्द से यहां आठों प्रकार के ग्रहों का बोध होता है । देवास्तथा शत्रुगणाश्च तेषा गन्धर्वयदा- पितरो नुजङ्गा । रक्षातिया चापि पिशाचजातिरेषोऽष्टको देवगणो ग्रहास्य ॥ ते तु सन्तर्पिता श्रात्मवन्तं न हिंस्यः । तस्मात् सततमतन्द्रितो जनपरिवृतो नित्यं दीपोदकशस्त्रत्रग्दा-मपुष्पलाजाद्यलङ्कृते वेश्मनि सम्पन्मङ्गलमनोऽनुकूलाः कथाः शृण्वन्नासीत ॥ २५ ॥
उन देवग्रहों को बलि, उपहार आदि से संतृप्त कर देने से वे जितेन्द्रिय पुरुष को नहीं मारते हैं । इसलिये निरन्तर सावधान होकर कुटुम्बी अथवा आसपास के अनेक मनुष्यों के साथ सदा दीप, जल, शत्र, माला, रज्जु, पुष्प तथा धान की लाजा आदि पदार्थों से अलंकृत मकान में सम्पत् ( धन ),
मङ्गल ( गाजे बाजे ) नादि से प्रसन्न चित्त होकर धर्म कथाओं ।
को सुनता रहना चाहिये ॥ २२ ॥
सम्पदाद्यनुकूलाभिः कथामिः प्रीतमानसः ।
आशावान् व्याधिमोक्षाय क्षिप्रं सुखमवाप्नुयात् ॥ २६ ॥
सम्पत्ति के अनुकूल धर्म कथाओं से प्रसन्न मन होकर व्याधि के छुटकारे के लिये आशा रखते हुये प्रयत्न करने से जल्दी रोग मुक्त होकर नगी सुख प्राप्त करता है ॥ २६ ॥
ऋग्यजुःसामाथर्ववेदाभिहितैरपरैश्चाशीर्विधानैरुपा-ध्याया भिषजञ्च सन्ध्ययो रक्षां कुर्युः ॥ २७ ॥
उपाध्याय तथा वैद्य प्रातः तथा सायं दोनों सन्ध्या समयों में ऋग्यजुः, साम और अथर्व इन चारों वेदों में कहे हुये तथा अन्य शास्त्रोक्त आशीर्वचनों से रोगी की रक्षा करें ॥ २७ ॥
सर्षपारिष्टपत्राभ्यां सर्पिपा लवणेन च ।
द्विरह्नः कारयेद् धूपं दशरात्रमतन्द्रितः ॥ २८ ॥
११ सु ० सरसों, नीम के पत्ते, घृत और नमक इनके द्वारा दिन में दो बार दस दिन तक लगातार सावधानीपूर्वक धूनी देनी चाहिये ॥ २८ ॥
विमर्श: - धूपने विशेषः - ' न केवल व्रणं धूपयेत्, शयना-द्यपि व्रणदोर्गन्ध्यापगमार्थ, नीलनक्षिकादिपरिहारार्थञ्च ' ( डल हणः ) । व्रणे निम्ववचाद्यञ्च धूपनं सम्प्रशस्यते । ( शार्ङ्गघर ) । शिखिवहिं-वलाकात्थीनि सर्पपाश्चन्दनं च घृतयुक्तम् । घूमो गृहशननासन-वस्त्रादिषु शस्यते विपत् ॥ इस तरह प्राचीनों ने भी व्रण, व्रण बन्धन द्रव्य, शय्या, वस्त्र, मकान इन्हें विप तथा जीवाणु • रहित करने के लिये धूपन का प्रयोग लिख कर जीवाणुनाशक ( Antiseptic ) प्रयोगों का पथप्रदर्शन किया है । छत्रामतिच्छत्रां लाड्गू ( ङ्ग ) लीं जटिलां ब्रह्मचा-रिणी लक्ष्मी गुहामतिगुहां वचामतिविषां शतवीर्या सिद्धार्थांश्च शिरसा धारयेत् ॥ २६ ॥
छत्रा, अतिच्छन्ना, लाङ्गली, जटिला, ब्रह्मचारिणी, लक्ष्मी, गुहा, अतिगुहा, वचा, अतिविषा, शतवीर्या, सहस्रवीर्या और सिद्धार्थक इन्हें सिर पर धारण करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ विमर्श: -छत्रा और अतिच्छत्रा को ढल्हण दोनों प्रकार की द्रोणपुष्पी मानता है । सुश्रुत कहता है कि छत्रातिच्छत्रके विद्याद् रक्षोघ्ने कन्दसन्भवे । जरामृत्युनिवारिप्यो श्वेतकापोतिस-त्यिते ॥ अल्गदत्त छत्रा को शतपुष्पा तथा अतिच्छन्ना को विषा-| णिका मानता है । लागलो कपिकच्छुरिति ढल्हणः, विपलाङ्गलीति हाराणचन्द्रः । जटिला = नटामासी । ब्रह्मचारिणी = मुण्डतिकेति डल्हणः, ब्रह्मयष्टीति हाराणचन्द्रः, ब्राह्मीति अन्ये । लक्ष्मी = शमी, लक्ष्मणेत्यन्ये, विष्णुक्रान्तेत्यपरे, ऋद्धिरित्युदयचन्द्रः, तुलसीत्यन्ये, गुद्दाऽतिग्रहा - शालपर्णीपृग्निपण्यों । शतवीर्या - शतावरी, नीलदूर्वे-त्यन्ये, श्वेतदूर्वेति हाराणचन्द्रः । सहस्रवीर्या - श्वेतदूर्वेति डल्हणः, दूर्वेति हाराणचन्द्रः ।
व्यज्येत बालव्यजनैर्व्रण न च विघट्टयेत् ।
न तुदेन्न च कण्डूयेच्छयानः परिपालयेत् ॥ ३० ॥
गाय, घोड़े आदि की पूंछ से बनी चॅवरी से व्रण पर पंखा ( हवा ) करना चाहिये । व्रण को दबाना, दुखाना और खुजाना नहीं चाहिये किन्तु शय्या पर सोते हुए उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ३० ॥
अनेन विधिना युक्तमादावेव निशाचराः ।
वनं केशरिणाऽऽक्रान्तं वर्जयन्ति मृगा इव ॥ ३१ ॥
उक्त प्रकार से रहने वाले व्रणी मनुष्य को निशाचर प्रथम ही त्याग देते हैं या आक्रमित नहीं करते हैं जैसे सिंह से व्याप्त वन को अन्य मृग छोड़ देते हैं ॥ ३१ ॥
जीर्णशाल्योदनं स्निग्धमल्पमुष्ण द्रवोत्तरम् ।
भुञ्जानो जाङ्गलैर्मासैः शीघ्रं व्रणमपोहति ॥ ३२ ॥
पुराने सांठी चांवलों का भात जो घृत से स्निग्ध हो, एवं उष्ण तथा द्रव और अल्पमात्रा में लेकर जगली पशु. | पक्षियों के मांसरस के साथ सेवन करने से शीघ्र ही व्रण नष्ट हो जाता है ॥ ३२ ॥
। तण्डुलीयकजीवन्तीसुनिषण्णकवास्तुकैः
पृष्ठ 135
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८२ सुश्रुतसंहिता ।
वालमूलकवार्त्ताकपटोलैः कारवेल्लकैः ॥
सदाडिमैः सामलकैर्धृतभृष्टैः ससैन्धवैः ।
श्रन्यैरेवंगुणैर्वाऽपि मुद्रादीनां रसेन वा ॥
शक्तून् विलेप कुल्मापं जलञ्चापि शृतं चौलाई, जीवन्ती, चौपतिया, बथुआ, वैगन, परवल, करेला इन शाकों को घृत में लवण, अनारदाने का चूर्ण और आंवलों का सेवन करना चाहिए | अथवा और भी इनके ३३ ॥ पिवेत् ॥३४ ॥
कोमल मूली, भूनकर सैन्धव रस मिला कर समान गुणवाले | अन्य पदार्थ तथा मूंग आदि के स्वरस के साथ चावल सेवन करें तथा सत्तू, विलेपी, कुल्माप इन्हें भी तजल पीना चाहिये ॥ ३३-३४ ॥ दिवा न निद्रावशगो निवातगृहगोचरः a णी वैद्यवशे तिष्ठन् शीघ्रं व्रणमपोहति दिन में निद्रा नहीं लेवे तथा झोंके को मकान में रहकर णी वैध के कथन का पालन शीघ्र ही व्रण से आराम प्राप्त करता है ॥ ३५ ॥
प्रयुक्त करें एवं
।
॥ ३५ ॥
वायु से रहित करता रहने से
श्वयथुरायासात् स च रागश्च जागरात् ।
तौ च रुक् च दिवास्वापात् ताश्च मृत्युश्च मैथुनात् ॥
the area करने से व्रण में सूजन उत्पन्न होती है तथा जागरण करने से सूजन और लालिमा उत्पन्न होती है । दिन में शयन करने से सूजन, लालिमा तथा वेदना ये उत्पन्न होते हैं । स्त्रीसम्भोग करने से सूजन, लालिमा, वेदना और मृत्यु होती है ॥ ३६ ॥
एवंवृत्तसमाचारो व्रणी सम्पद्यते सुखी ।
आयुश्च दीर्घमानोति धन्वन्तरिवचो यथा ॥ ३७ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने प्रणितोपासनीयो नामै कोनविंशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
ww उपर्युक्त प्रकार से आहार तथा विहार का सेवन करने से सुख को प्राप्त करता है तथा वह दीर्घायु का लाभ करता है ऐसा धन्वन्तरि भगवान् का वचन है ॥ ३७ ॥
प्रत्यायुर्वेदतत्त्वसदीपिकामामाया व्रणितोपासनीयो नामैकोनविंशोऽध्याय ॥ १ ९ ॥ -WA
विशतितमोऽध्यायः ।
अथातो हिताहितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
यहां से ' हिताहित ' का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था१-२ यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमित्यनेन हेतुना न किञ्चिद्रव्यमेकान्तेन हितमहितं वा अस्तीति केचि-दाचार्या ब्रुत्रते । तत्तु न सम्यक् । इह खलु यस्माद् द्रव्याणि स्वभावतः संयोगतश्चैकान्तहितान्येकान्ताहि तानि हिताहितानि च भवन्ति ॥ ३ ॥
जो औषध या पदार्थ किंवा आहार - विहार वायु के लिये पथ्यकारी है वह पित्त के लिये अपथ्यकारी होता है । इस विचार की दृष्टि या कारण से कोई भी द्रव्य सब समय और सब अवस्थाओं में पूर्णरूप से या निश्चयरूप से हितकारी या अहितकारी नहीं हो सकता है ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं । यह इनका विचार ठीक नहीं है क्योंकि धन्यन्तरि के मतानुसार सुश्रुततन्त्र में सम्पूर्ण द्रव्य अपनी प्रकृति से किना अपने संयोग से निरन्तर हितकारी, निरन्तर अहितकारी और अवस्थानुसार हित और अहित उभयार्थकारी होते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श: - स्वभावत -तत्र प्रकृतिरुच्यते । स्वभावोय ', म पुनरा-हारोपयद्रव्याणां स्वाभाविको गुर्वादिगुणयोग । तद्यथा – स्वभावा-वो मुद्रास्तथा लावपिज्जला ' | स्वभावाद गुरवो मापा वराहो महिपस्तथा ॥ ( चरकः ) । सयोग शब्द वे संयोग, संस्कार, राशि, देश, काल का ग्रहण करना चाहिये । सयोगो द्वयोर्थ-हुन वा द्रव्याणां संहतीभाव, स विशेषमात्मने । य पुनर्नकशो द्रव्याण्यारभन्ते, तथथा मधुसर्पिपोर्मधु मत्स्यपयसाय सयोग । ( चरकः ) । तत्र, एकान्तहितानि जातिसात्म्यात् सलिलघृत-दुग्धोदनप्रभृतीनि । एकान्ताहितानि तु दहनपचनमा-रणादिपु प्रवृत्तान्यग्निक्षारविपादीनि । संयोगादपराणि विपतुल्यानि भवन्ति । हिताहितानि तु यद्वायोः पथ्यं तत्पित्तस्यापथ्यमिति ॥ ४ ॥
उनमें से जल, घृत, दुग्ध और चावलों का भात द्रव्य मनुष्य जाति की हित की दृष्टि से जन्म से ही हतकारी हैं । दहन, पचन और मारण आदि कार्यों में अग्नि, क्षार और विप क्रमशः प्रयुक्त द्रव्य एकान्त ( पूर्ण या निश्चय ) रूप से अहि तकर होते हैं । संयोग के कारण अच्छे द्रव्य भी त्रिपतुल्य हो जाने से एकान्तरूप से अहितकर हैं । एक ही समय में हित तथा अहित करने वाले द्रव्य जैसे जो द्रव्य वायु के लिये पथ्यकारी है वही द्रव्य उसी समय पित्त के लिये अपथ्यकारी | होता है ॥ ४ ॥
अतः सर्वप्राणिनामय माहारार्थ वर्ग उपदिश्यते । तद्यथा-रक्तशालिपष्टिककडुकमुकुन्दकपाण्डुकपीतकप्रमो-दककालकासनपुष्पककर्दम कशकुनाहृत सुगन्धककलम-नीवार कोद्रवोद्दालकश्यामाकगोधूमवेणुयवादयः । एण-हरिणकुरङ्गमृगमातृकाश्वदंष्ट्राकरा लककर पोतलाव तित्ति-रिकपिञ्जलवर्तीरवर्त्तिकादीनां मांसानि मुद्रवनमुद्रमकु-ष्ठकलायम सूरमङ्गल्यचणकहरेवाढ की सतीनाः । चिल्लि-वास्तुकसुनिषर गक जीवन्तीतण्डुलीयकमण्डूकपर्ण्यः । गव्यं घृतं सैन्धवदाडिमामलकमित्येष वर्गः सर्वप्राणिनां सामान्यतः पथ्यतमः ॥ ५ ॥
इस लिये सर्व प्राणियों के आहार के लिये वक्ष्यमाण वर्ग । का उपदेश करते हैं । जैसे - लाल चांचल, पष्टिक ( साठ दिन में पकने वाले ) चांवल, कगुक ( कांगुनी ), मुकुन्दक ( काले सांठी ), पाण्डुक ( पीले धान्य ), पीतक, प्रमोदक, कालक,
पृष्ठ 136
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् । ६३ असनक, पुष्पक, कर्दम, शकुनान, सुगन्धक, कलम, नीवार धान्य, कोव ( को ), उद्दालक ( वनकोदो ), श्यामा, गेहूं, वैन्यवादि धान्य विशेष तथा पुण ( कृष्ण हरिण ), मृगनानुका, खर्दष्ट्रा कराल ( कस्तू मृग ), कर, व्यूनर, बटेर, तीतर, कपिल, वर, वर्ना आदि प्राणियों का मन और मृग, वनभूग, मोठ, काय ( नर ), नर, नहयन ( पान्दु वर्ग की मसूर ), चना, रेणु, र, ती चिडी ( चैव का बथुआ ), वास्तुक ( साधारण युग ), सुदिषष्णर ( चौपतिया ), जीवन्ती, डुलीयक ( चौटाई ) और सदूपये आर्के तथा गौ का घी, सैन्धव बग, अनारदाने और सत्रले आदि पायों वाला वर्ग नागियों के लिए सामान्यतया अधिक पत्रकारक है ॥ ७ ॥
विमर्श. --- वरकेऽपि पथ्यनमद्रव्याणा निर्देश. - बोहितशालय शुक्रयान्यानां पय्यतुमन्त्रे श्रेटद्धना । हाः श्रपान्यानां सैन्नवं लवणानां जीवन्तीशानं डाकानाम्, न मृगनासानां, लाव पर्दियान् । तथा ब्रह्मचर्य्यनिवातायनोष्णोदकन्नाननिशाम्य-शत्र्याचामाञ्चैकान्ततः पथ्यतमाः ॥ ६ ॥
ब्रह्मचर्य, वायुरहित स्थान में शयन, सुहाने गरम पानी में स्नान, रात्रि में वन तथा व्यायाम चे पूर्णरूप से अविक पय्यकारी हैं ॥ ॥ विमर्शगन स्न्र्ण कीर्तनं केलिः प्रेयं य साधान् । सगुोऽव्यवसाय किनानिर्वृतिरेव च ॥ दनन् - थुनम-टाई प्रवदन्ति मनीनिप -1 विपरीतं चयं सेवनीयं सदा दुवै ॥ धयं यद्मन्यत्तनुभ्यं लोकद्वयरसायनम् । अनुमान हे ब्रह्मचर्यमेका न्दुनिटम् । ( वाग्भट ) । गमिनिद्रा - स्वाभाविक होने से श्रेष्ट है । रास्ता या तां भूतग प्रवदन्ति निद्रान् । ( चरकः ) । रात्रिः स्वप्तार भूताना चेाने कामहः । ( मनु. ) । वामन तो नये । प्रहरवं शयानो ब्रद्म-सूयाय कल ॥ ( ० स्मृति ) । व्यायाम शरीरायासजनक कर्तव्यानाति । ( सु ० ) । श्रानो विधिवोऽङ्गाना व्यायाम संधिः । ( धनुर्वेदः ) ।
एकान्तहितान्येकान्ताहितानि च प्रागुपदिष्टानि ।
हिताहितानि तु ययोः पथ्यं तत्पित्तस्यापथ्यमिति ॥ ७ ॥।
कुछ द्रव्य एकान्त हितकारी होते हैं उसे पानी, कुछ द्रव्य एकान्त अहितकर होते हैं जैसे अग्नि, इन्हें पहले कह आये हैं । हित और अनिकारक व्रत्य तो वे हैं जैसे- जो द्र्ध्य् वायु के लिए पय्यकारक हैं वे ही पिन के लिये अपथ्यकारक है ॥ ॥ संयोगतत्वपराणि त्रिपतुल्यानि भवन्ति । तद्-यथा - चल्लीफत्तकवुककरीराम्लफललवणकुलत्थपिण्याक-दद्वितैलविरोहिपिष्टशुष्कशाकाजाविकर्मा समद्यजाम्बव-चिलिचिममत्स्यगोघाबराहांश्च नैकव्यमश्नीयात् पयसा ॥ कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो अन्य पदार्थों के माथ सयोग करने से विधनुत्र्य हो जाते हैं । जैसे दवली ( लता ) पर लगने चाले फल कुष्माण्ड आदि, कवक ( छत्रक ), बांस के अडर, निम्बादि अम्ल फङ, नमक, कुन्द्रर्धा, तिल को खली, दही, तेल, अङ्कुरित धान्य, पिष्टविकृतियां, सुखे शाक, बकरी और मेड़ का मांग, मद्य, जामुन के फल, चिचिम नामक मत्स्य, गोधा और शूकर का मांस इन पदार्थों में किसी को भी दुग्ध के साथ मिलाकर सेवन नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥
विमर्श:: - -जब दो पदार्थों के संयोग होने से भिन्न गुण • धर्म वाला एक तीसरा ही पदार्थ उत्पन्न हो जाय और वह शरीर पर अहित प्रभाव करे उसे सयोगविन्द ( Chemicaliy Incompatible ) कहते हैं । तुल्य मधु - वृतादि का परीक्षण कर देखना चाहिये ।
रोगं सात्म्यं च देशं च कालं देहं च बुद्धिमान् ।
अवेक्ष्याग्न्यादिकान् भावान् रोगवृत्तः प्रयोजयेत् ॥६ ॥
रोगवृति अर्थात् रोगी समूह या रोगी के ददरादिक रोग, अष्टविव ( जाव्यातुरौ पधान्नरसदेशक ) मारम्य, आनूपादिक देश, शीतोष्णवर्षरूपी काल, स्थूल - हरा - मध्य देह, अग्नि, प्रकृति, वय, बल सत्व आदि भावों को देख-कर बुद्धिमान वैद्य विचार करके हित या अहित द्रव्य का प्रयोग करें ॥ ९ ॥
विमर्श - विचार कर दिया विष अमृत तथा विना विचार कर दिया दुग्ध भी चिप हो सकता है । योगादपि विषं तीक्ष्ग-मुतमं मेषन भवेत् । मेपनं वापि दुर्युक्तं तोयं मन्पद्यते विषम् ॥ ( चरक )
अवस्थाऽन्तरबाहुल्याद्रोगादीनां व्यवस्थितम् ।
द्रव्यं नेच्छन्ति भिपज इच्छन्ति स्वम्थरक्षणे ॥ १० ॥
रोगादिकों की अनेक अवस्थाओं का आधिक्य होने मे बुद्धिमान् वैध किसी भी द्रव्य को एकान्तहित या एकान्त रूप से अहितकर नहीं समझते हैं किन्तु स्वस्थावस्था के रक्षण में हित या अहित का विचार करते हैं ॥ १० ॥
र्द्वयोरन्यतरादाने वदन्ति विपदुग्धयोः ।
दुग्धस्यैकान्तहिततां विषमेकान्ततोऽहितम् ॥ ११ ॥
एवं युक्तरसेवेषु द्रव्येषु सलिलादिषु ।
एकान्तहिततां विद्धि वत्स! सुश्रुत । नान्यथा ॥ १२ ॥
जिस तरह वैद्य स्वस्थ मनुष्य के लिये विष और दुग्ध इन दोनों में से एक को ग्रहण करना हो तो दुग्ध ही को एकान्त हितकारी तथा विष को एकान्त अहितकारी कहते हैं । हे वरस सुश्रुत! इसी तरहा दुग्ध की भांति प्रभावससिद्ध युक्तरस जलादिक द्रव्यों को एकान्त ( पूर्ण ) रूप से ि कारी जानो तथा विपरीत रसयुक्त विपादि में पूर्ण हितकारिता न जानो ॥ ११–१२ ॥ अतोऽन्यान्यपि संयोगादहितानि वच्यामः - नव-त्रिरूढधान्यैर्त्रसामधुपयोगुडमाषैर्वा ग्राम्यानूपौदकपि-शितादीनि नाभ्यवहरेत् । न पयोमधुभ्यां रोहिणीशाकं जातुकशाकं वाऽश्नीयात् । बलाकां वारुणीकुल्मापा-भ्याम् । काकमाचीं पिप्पलीमरिचाभ्यां नाडीभङ्गशा-ककुक्कुटदधीनि च नैकध्यम् | मधु चोष्णोदुकानुपानं पित्तेन चाममांसानि । सुराकृशरापायसांञ्च नैकध्यम् । सौवीरकेण सह तिलशप्कुलीम् | मत्स्यैः सहेक्षुत्रिका-
पृष्ठ 137
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४ सुतसहता । रान् । गुडेन काकमाचीं, मधुना मृलकं, गुडेन वाराहं । मधुना च सह विरुद्धम् । क्षीरेण मूलकमाम्रजाम्बवश्वा । विच्छूकरगोधाश्च | सर्वांश्च मत्स्यान् पयसा विशेषेण चिलिचिमम् । कदलीफलं तालफलेन पयसा दुघ्ना
तक्रेण चा । लकुचफलं पयसा दध्ना मापसूपेन वा । ।
प्राक् पयसः पयसोऽन्ते वा ॥ १३ ॥
इसके अनन्तर अन्य पदार्थ जो कि सयोग मे अहितकर होते हैं उनका वर्णन करते हैं । नवीन अङ्कुरितधान्य तथा वसा, शहद, दुग्ध, गुड़ और उड़द के साथ ग्राम्य, आनृप और जलीय प्राणियों का मांस नही ग्वाना चाहिये । दुग्ध और मधु के साथ रोहिणी शाक या जातुक नहीं खानी चाहिये । बलाका के मांग को मद्य तथा अर्द्धस्विन्न धान्य के साथ नहीं खाना चाहिये । मकोय को पीपल तथा काली मरिच के साथ नहीं खानी चाहिये । नाडी का शाक, सुरगा और दही को एक माय नहीं खाना चाहिये शहद को गरम पानी के साथ, कच्चे मास के साथ पित्त को तथा सुरा, स्त्रिचडी और पायस ( नीर ) को एक साथ नहीं मेवन करें । सौवीर ( कांनी ) के साथ तिल की पापडी नहीं सानी चाहिये । ऊ के बने गुड, शर्करा आदि को मान्य के साथ नहीं ग्नावें । गुड के साथ सोय, मधु के साथ भूली, गुड तथा शहद के साथ शूकर का मांस निषिद्ध है । इसी तरह दुग्व के साथ मूली, आम, जामुन, सरगोध, सुकर और गोधा मांस सेवन वजिन है । दुग्ध के साथ सर्व प्रकार की मह लियां वनित है किन्तु चिलत्रिम विशेष कर निषिद्ध है । ताल फल, दुग्ध, दही और छाछ के साथ कदलीफल नहीं साना चाहिये । दुग्ध, दही और टब्द की ढाल या यूप के साथ कुन्च ( बटद्दल ) का फल नहीं खाना चाहिये तथा दुग्ध पूर्व या पीछे भी लकुच फल नहीं खाना चाहिये ॥ १३ ॥
विमर्श. – मधु का सर्व उष्ण पदार्थों के साथ सेचन वर्जित है । इन्यान्नषूऽऽमुप्तार्श्वमथना विधान्वयात् । ( चरकः ) । उष्ण-मुष्णार्श्वमुणे च युक्त चोप्पं निहन्ति तव । ( वाग्भट ) | नानापुष्प-प्रकाणि रसमागम्क मधु । नत्यात्सो कुनायांश्च सवर जैविक-ट्र्यते ॥ ( हारीतः ) । सौवीरक्लनण वस्तु निष्तु पक्वे सौवीर सन्धितं भवेत् । ( शार्ङ्गघर. ) । चरके - दुग्धेन मह सकार-एमत्स्यसेवननिषेध – “ न नत्स्यान् पयसा सहान्यवदुमय होतन्म-धुर मधुरविपान महाभिष्यन्ति शीतोष्णाद्विरद्ववीन, विन्दवीर्यवा च्छोपिनप्रदूषणाय नहास्पिन्दित्वान्मार्गपरोधाय च विशेषेण चिचिन, स पुन. शकत्री सर्वनोगेहिवरानिहितप्रकार. प्रायो नमो चरनि । स हि नद्दामिध्यन्दित्वाद स्वलक्षणनमानेतान् शो-विजान् विधिश्च व्यावीनुपननयनि, आमविधनुदीरयनि च । ( चरकः ) अतः कर्म्मविरुद्धान् बच्यामः - कपोतान् सर्पपतै-लभृष्टान् नाद्यात् । कपिञ्जलमग्लावतित्तिरिगोधाचै-रण्डदार्थग्निसिद्ध्य एरण्डतैलसिद्धा वा नाद्यान् । कांस्य भाजने दशरात्रपर्युपितं सर्पिः, मधु चोष्णैरुष्णे वा, मत्त्वपरिपचने शृङ्गवेरपरिपचने वा सिद्धां काकमा चीम् | तिलककसिद्धमुपदिकाशाकम् | नारिकेलेन
वराहवसापरिभ्रष्टां वलाकाम् । भासमङ्गारशूल्यं नाश्नी-यादिति ॥ १४ ॥
अब इसके अनन्तर कर्मविरुद्ध द्रव्यों का वर्णन करते हैं-सरमों के तेल में भूने हुये कबूतरों को नहीं खाना चाहिये । कपिल्जल, मोर, लाव, तीतर और गोधा इनको एरण्ड की लकडियों की अग्नि में पका कर अथवा एरण्ड के तैल में पका कर नहीं खाने चाहिये । कांसे के बर्तन में दस रात तक रख्ना हुआ घी नहीं खाना चाहिये । उष्ण द्रव्यों के साथ तथा ग्रीष्म ऋतु में शहद सेवन नहीं करना चाहिये । म अथवा सोंठ पकाये पात्र में मकोय पका कर नहीं सानी चाहिये । तिलकल्क में सिद्ध किया हुआ पोई का शाक नहीं साना चाहिये । वराह की चर्बी भूनी हुई बलाका को नारिकेल के साथ तथा भास पक्षी को लोहे के कांटे में बींध कर अग्नि में पका के नहीं खाना चाहिये ॥ ११ ॥
अतो मानविरुद्धान् वक्ष्यामः - मध्यम्बुनी मघुस-पिंपी मानतस्तुल्ये नाश्नीयात् । न्नेहो मधुस्नेहा जल-स्नेही वा । विशेपादान्तरीक्षोदकानुपानौ ॥ १५ ॥
अब इसके बाद मानविरुद्ध द्रव्यों का वर्णन करते हैं-शहद और पानी तथा शहद और घी बराबर प्रमाण में सेवन नहीं करें । दो प्रकार के भिन्न २ स्नेहों को मिला के सेवन नहीं करें तथा शहद और स्नेह अथवा जल और स्नेह समप्रमाण में मिला कर नहीं खाने चाहिये । विशेषतया मधु और स्नेह के साथ आकाश जल का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
विमर्श - नेहपरिभाषा - सर्पिल वसा मना स्नेहो दृष्टइच-नुर्विध । ( चरक ) । अत उदूर्ध्वं रसद्वन्द्वानि रसतो बीर्यतो विपाकतश्च विरुद्धानि वच्याम — तत्र मधुराम्ला रसवीर्यविरुद्व मधुरलवणौ च । मधुरकटुकौ च सर्वतः । मधुरतिक्तौ रसविपाकाभ्यां मधुरकपाया चाम्ललवणौ रसतः । अम्लकटुकौ रसविपाकाभ्याम्, अम्लतिक्तावम्लकपायौ च सर्वतः । लवणकटुकी रसविपाकाभ्यां लवणतिक्ताँ लचणकपायौ च सर्वतः । कटुतिक्तौ रसवीर्याभ्यां कटु-कपायौ च, तिक्तकपायौ रसतः ॥ १६ ॥
अब इसके अनन्तर रस, वीर्य और विपाक में विरुद्ध दो । दो रसों का वर्णन करते हैं । जैसे मथुर और अम्ल तथा मधुर और लवण ये रस और वीर्य में विरुद्ध है तथा मधुर और कटु रस सब बातों में परस्पर विरुद्ध हैं । मधुर और तिक्त रस तथा मधुर और कषाय रस रस और विपाक में परस्पर विरुद्ध हैं । अम्ल और लवण रस ये दोनों केवल रस में वि हैं । अम्ल और कटुक रस रस और विपाक मे बिरुद हैं । { अम्ल और तिक तथा अम्ल और कपाय रस सर्व प्रकार से परस्पर बिरुद्ध हैं । लचण और कटु रस रस और विपाक में विरुद्ध हैं । aa ण और तिक रस तथा लवण और कषाय रस सर्व बातों मैं बिरुद्ध है । कटु और विक रस तथा कटु और कपाय रस रस और वीर्य में विरुद्ध हैं । तिक्त और कपाय रस रस बिरुद्र हैं ॥ १६ ॥
पृष्ठ 138
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् । ८५ तरतमयोगयुक्तांश्च भावानतिरूतानतिस्निग्धानत्यु-ष्णानतिशीतानित्येवमादीन् विवर्जयेत् ॥ १७ ॥
तर और तन योग से युद्ध भाव अर्थात् पदार्थ जसे अतिस्निग्ध, अतिरूत्र, क्षति प्ण और अति शीत नादि को वर्जित करना चाहिये ॥ १७ ॥
भवन्ति चात्र-विरुद्धान्येवमादीनि वीर्चतो यानि कानि च ।
तान्येकान्ता हितान्येव शेषं विद्याहिताहितम् ॥ १८ ॥
ठक्क प्रकार से जो भी पदार्थ या द्रव्य, वीर्य, गुण तथा रस से विरुद्ध हों वे सब पूर्वरूप मे अहितकारी हैं तथा शेष में से कुछ पदार्थ हितकारी तथा कुछ पदार्थं अहितकारी हैं ॥ १८ ॥
विमर्श -द्रव्य रस, वीर्य, गुण, पाक आदि में से किसी एक द्वारा मुख्यतया अपना २ कार्य करते हैं । किञ्चिद्रलेन कुरते कर्मवीर्ये चारन् । द्रव्यं गुगेन पाकेन प्रभावेण च किन ॥ चरकोको द्रव्याणां विरोधप्रकारो क्या - पत्निद्रि-होषनुस्त्रेश्व न निईरति वायतः । महारजानं तत्सर्वमहितानोप-पद्यद्धे ॥ यच्चापि देशकालाग्नित्रासाल्यानिलादिभिः । संत्कारतो | वीर्यतश्च कोष्ठावच्याक्रनैरपि ॥ परिहारोपचारान्यां पाकाद संयोगतोऽ- । पि च । बिन्द्धं तच्च न हितं हृन्तन्यदिविमिश्च यत् ॥ ( च तू ल.२६ )
व्याविमिन्द्रियदौर्बल्यं मरणं चाधिगच्छति ।
विरुद्धरसत्रीर्याणि भुलानोऽनात्मवान्नरः ॥ १६ ॥
तो मनुष्य अपनी आत्मा तथा शरीर के स्वास्थ्य का रक्षण नहीं करता हुआ रसनेन्द्रिय के स्वाद में लालायित होकर रस और वीर्य नादि से विरुद्ध पदार्थों का सेवन करता है वह रोग, इन्द्रियों को दुर्बलना और नन्त में मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १ ९ ॥ विमर्शः - विरुद्धान्नसेवनया रोग - पाठ्यान्त्र्यवीर्य दकोदराणा विस्मोडकोन्नदभगन्दराणान् । मूच्छांनदाहमानगडानयानां पाण्ड्वा-नयस्यानविरस्य चैव ॥ विलासकुन हणोगानां शोषानपिचवर पीनखानान् । सन्वानदोपस्य व नृत्यवन्तं प्रवदन्ति हेतु ॥ ( च.स्. न. २६ )
चत्किञ्चिद्दोषमुक्तेश्च भुक्तं कायान्न निर्हरेत् ।
रसादिष्वयथार्थ वा तद्विकाराय कल्पते ॥ २० ॥
tate f खाया हुआ विरुद्ध अन्नादि पदार्थ वातादि दोषों को प्रकृपित कर देता है । किन्तु उन दोषों को वमन । या विरेचन द्वारा बाहर नहीं निकालता है वह शरीर में विकार करता है, नयवा रस रक्तादि धातुनों में दृष्टि उत्पन्न कर रोग करता है ॥ ३० ॥
विमर्श -अन्यन्न यत्निहित से आहार तया विहार दोनों
का ग्रहण किया है । यत्तिद्विशेषमान्य न निर्हरति कायतः ।
गारनातमन्यद्वा तत्सर्वनहितं स्मृतम् ॥
विरद्धारानजान् रोगान् प्रतिहन्ति॒ि विरेचनम् ।
वमनं शमनं वाऽपि पूर्व या हिवसेवनम् ॥ २१ ॥
इस तरह विद्वाहार से उत्पन्न हुये रोगों को विरेचन, चमन और शमन नष्ट करते हैं । अथवा पूर्व ही से हितपदार्थों का सेवन करना भी रोगनाशक है ॥ २१ ॥
विमर्श: - आयुर्वेद ने चिकित्सा के दो प्रकार रक्त श्लोक से बताये हैं । आगत व्याधिचिकित्सा और अनागत व्याधिचि-किसा प्रयत्न में रोगोत्पत्ति होने पर वमन, विरेचन तथा रोगविरोधी द्रव्यों ( रस, भस्म, काष्टौपधि ) द्वारा रोग का प्रशमन करना । चरक ने भी यहीं माना है । एषाञ्च खलु परे-पात्र वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे भावा. प्रतीकारकरा मवन्ति, यथा वमन, विरेचनं, तद्विरोधिना द्रव्याणा संशमनार्थमु-प्रयोगस्तथाविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमभिसत्कार शरीरस्येति । वाग्भट ने भी ये ही दो भेद लिखे हैं ' शर्म वा तद्विरोधिमि, द्रव्यैन्नैरेव वा | पूर्व शरीरस्यामिसस्कृति ' । ' तथाविषै ' के लिये रसायनप्रयोग-रिति चक्रपाणिः, वैरोधिक कुपितदोषप्रतिपचमूने द्रव्येरिति - क्षरण दत्तः, नवलौहादिविरोधिरोगहरं पूर्वमेव सेवेत, तदुक्तं " न सज्जते हेमपात्रे विषं पद्मदलेऽन्वत ' इति ढल्हणः । शरीर में जीवाणु प्रवेश से उत्पन्न रोग की चिकित्सा को Curative treatment कहते हैं तथा Seram का उपयोग इसमें बहुत लाभ करता है । जैसे Bacillary dysentery, मस्तिष्कसुपुग्ना ज्वर ( Carebrospinal fever ), धनुः स्तम्भ ( Tetanus ), रोहिणी ( Diphtheria ) रोगों में सीरम से बहुत लाभ होता है । सीरम द्वारा जीवाणुविरोधी या विषविरोधी द्रव्य को रोगी के शरीर में प्रविष्ट कर प्रविष्ट हुये जीवाणु या उनके विष का शमन करते हैं । द्वितीय अनागत व्याधिचिकित्सा ( Prophylactic treatment ) के लिये मनुष्य को होने वाले रोग से बचने के लिये " पूर्व वा हितसेवनन् " का उपदेश देते हैं तथा चरन्तनुसार ऐसे द्रव्यों का सेवन करा देते हैं जिससे मनुष्य के शरीर में होने वाले रोगों के विरुद्ध टक्कर लेने के लिये सन्कार हो जाता है । ' व्याविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमपि सस्कार. शरीर-स्येति ' तुलसीपत्र, कालोमरिच आश्विन में सेवन करते रहने से मलेरिया ज्वर नहीं होता । रुद्राक्ष के दाने को बिस वर सात दिन तक छोटे बच्चों को देने से शीतला ( Small Pox ) रोग उत्पन्न नहीं होता । वर्तमान में वैक्सीन ( Vaccire ) के प्रयोग से बहुत लाभ हुआ है । जीवाणु या उनके विष को स्वस्थ शरीर में प्रविष्ट कर उनका शरीर में संस्कार करके शरीर को उन्हीं विरोधी द्रव्यों के लिये क्षम बनाया जाता है जिससे उन जीवाणुओं का भविष्य में शरीर पर आक्रमण होने पर भी रोगोत्पत्ति न हो । इस तरह वैक्सीन का प्रयोग ग | पेघ के लिये होता है । जैसे प्लेग, नान्त्रिक स्वर ( Typhoid ), विसूचिका ( Cholera ), अतिसार आदि को रोकने में बहुत लाभ हुआ है । यद्यपि आयुर्वेद में सीरम और वैक्सीन का प्रयोग नहीं है किन्तु इन दोनों मिद्धान्तों तद्वि-रोघी द्रयोपयोग द्वारा भागत व्याधिचिकित्मा सीरमप्रयोग तया पूर्वमपि सन्कार शरीरत्येनि द्वारा अनागत व्याधिचिकित्सा या वैक्सीन प्रयोग का उस स्पष्ट है । शमनलचणम्— न शोषयति यहोवान् समानोदीरयत्यपि । समीकरोति विपनान् तर संशमनमुच्यते ॥
साम्यतोऽल्पतया वाऽपि दीमाग्नेस्वरणस्य च ।
निग्वव्यायामवलिनां विन्द्धं वितथं भवेत् ॥ २२ ॥
पृष्ठ 139
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुश्रुतसंहिता । ६६ नित्याभ्यास से साम्य हुआ, अल्पमात्रा में सेवित, दीप्ताझि वाले का, युवा मनुष्य का अन्तः और वाह्य प्रयोग से शरीर स्निग्ध हो, व्यायाम करने वाले तथा बलवान् पुरुषों का किया हुआ विरुद्ध भोजन भी निष्फल ( रोगोत्पत्ति नहीं करने वाला ) हो जाता है ॥ २२ ॥
विमर्श: - सात्म्य नाम तद्यत् सातत्येनोपसेव्यमानमुपशेते । ( चरकः ) । दीप्ताझेः -- बलमारोग्यमायुश्च प्राणाश्चाश्नो प्रतिष्ठिता । ( चर ० ) । व्यायामप्रभावः- व्यायाम कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् । विदग्धमविदग्ध वा निर्दोषं परिपच्यते ॥
अथ वातगुणान् वक्ष्यामः--पूर्वः समधुरः स्निग्धो लवणश्चैव मारुतः ।
गुरुर्विदाहजननो रक्तपित्ताभिवर्द्धन. ॥ २३ ॥
तानां विपजुष्टानां व्रणिनः श्लेष्मलाश्च ये ।
पामेव विशेपेण सदा रोगविवर्द्धनः ॥ २४ ॥
वातलानां प्रशस्तश्च श्रान्तानां कफशोपिणाम् ।
पामेव विशेपेण व्रणक्लेदविवर्द्धनः ॥ २५ ॥
अब इसके अनन्तर वायु के गुणों को कहते हैं । पूर्व दिशा की वायु मधुर, स्निग्ध, लवण, गुरु, ढाहजनक तथा रक्तपित्तवर्धक है । तत ( व्रण ) से युक्त, विष से व्याप्त, व्रण से पीड़ित तथा श्लेष्म प्रकृति के मनुष्यों के लिये विशेष करके सदा रोगवर्धक है । वायु की प्रकृति वाले, थके हुये और जिनका कफ सूस गया हो उनके लिये पूर्व वायु प्रशस्त है किन्तु इन्हीं पुरुषों के यदि व्रण हो तो उसमें क्लेद को बढ़ाती है ॥ २३-२५ ॥
मधुरश्वाविदाही च कपायानुरसो लघुः ।
दक्षिणो मारुतः श्रेष्ठश्चक्षुष्यो बलवर्धन ॥
रक्तपित्तप्रशमनो न च वातप्रकोपणः ॥ २६ ॥
दक्षिण दिशा की वायु मधुर, चिदाह नहीं करनेवाली, कुछ कसैली, लघु, नेत्रों के लिये हितकारी, बलवर्धक, रक्तपित्त
रोग की शामक तथा वातरोगों को नहीं प्रकुपित करनेवाली है ।
विशदो रूक्षपरूपः खरः स्नेहवलापहः ॥ २७ ॥
पश्चिमो मारुतस्तीक्ष्णः कफमेदोविशोपणः ।
सद्यः प्राणक्षयकरः शोपणस्तु शरीरिणाम् ॥ २८ ॥
WIT US! उत्तर दिशा की हवा स्निग्ध, मुलायम, मधुर, कपाया रस, शीत तथा दोपों को प्रकुपित नहीं करने वाला है, इसी लिये प्रकृतिस्थ या स्वस्थ पुरुषों के शरीर में क्लेदकारक तथा बलवर्धक है । रसरक्तादि धातृ क्षीण, हाय और चिप से पीड़ित मनुष्यों के लिये विशेषकर लाभकारी है ॥ २ ९ –३० ॥ इत्यायुर्वेदतत्वसंदीपिकाभापायां हिताहितीयो नाम विशोऽध्यायः ॥ २० ॥
एकविंशतितमोऽध्यायः ।
अथातो व्रणप्रश्नमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' घण प्रश्न ' नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श: -- त्रणा व्रणकारणत्वाद् वातादिदोषास्तद्विषयक प्रश्नो यस्मिन् त व्रणप्रश्नम् । वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भवहेतवः । तैरेवा-| व्यापन्नैरधोमध्योर्ध्वसन्निविष्टे शरीरमिदं धार्यतेऽगार-मिव स्थूणा भिस्तिसृभिरतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके । त एव च व्यापन्नाः प्रलयहेतव । तदेभिरेव शोणितचतुर्थैः सम्भवस्थितिप्रलयेष्वप्यविरहितं शरीरं भवति ॥ ३ ॥
वात, पित्त और श्लेष्मा ये तीनों ही शरीर को उत्पत्ति के कारण हैं । इन्ही अकुपित तथा नीचे, मध्य और ऊपर यथाक्रम मे रहने वाले वात, पित्त और कफ से यह शरीर धारण किया जाता है जिस तरह तीन सम्भों से मकान धारण किया जाता है, इस लिये कई आचार्य इस शरीर को । त्रिस्थूण कहते हैं । मिथ्या आहार - विहारों से प्रकुपित हुये ये ही वातादि दोष शरीर के प्रलय ( विनाश ) में कारण होते हैं । वात, पित्त और कफ ये तीन तथा चौथा रक्त ये चारों शरीर की उत्पत्ति, स्थिति ( धारण या पोषण ) और प्रलय ( नाश ) में अविरहित ( वर्तमान ) रहते हैं या ये ही कारण है ॥ ३ ॥
विमर्शः - देहसम्भव में प्रधान रूप से यद्यपि शुद्ध शुक्र पश्चिम दिशा की हवा विशद, रूक्ष, परुप, खर, स्नेह और और आर्तव होते हैं तथापि उनमें भी वातादि चल का नाशक, तीच्ण, कफ और मेदोधातु का शोषक है एवं गर्भ का धारण, पोषण, अङ्ग - प्रत्यङ्ग विकाश आदि कार्य ही प्राण का नाशक और शरीर का शोषक है ॥। २७-२८, तुरन्त ॥ वातादि का है अतः इन्हे देहसम्भव में हेतु माना है । ' तत्र
उत्तरो मारुतः स्निग्धो मृदुर्मधुर एव च ।
कपायानुरस ' शीतो दोपाणां चाप्रकोपणः ॥ २६ ॥
तस्माच्च प्रकृतिस्थानां क्लेदनो बलवर्धन ।
क्षीणक्षर्यावपार्त्तानां विशेषेण तु पूजितः ॥ ३० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने हिताहितीयो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥।
- muu स्त्रीपुसयो सयोग तेज शरीराद्वायुरुदीरयति, तनस्तेजोऽनिलसनि-पाताच्छुक च्युत योनिमभिप्रपद्यते ससृज्यते चार्तवेन, ततोऽग्निपो-मसयोगात् ससृज्यमानो गर्भाशयमनुप्रपद्यते । शीतोष्मानिलैरभिप्र-पच्यमानानां महाभूताना सधातो घन सनायते । ( सुश्रुत ) । शुक्रशोणित गर्भाशयस्यमात्मप्रकृतिविकारसम्मूच्छित गर्भं इयुच्यते त चेतनावस्थित वायुर्विभजति, तेन एन पचति, आप क्लेदयन्ति, ( सुश्रुतः ) । दोषाणां शुक्रार्तव स्थितिः -शुक्रार्तवस्थैर्जन्मादो विषेणेव विपक्रिमे । तैश्च तिस्र प्रकृतयो हीनमध्योत्तमा पृथक् ॥ दोपस्था-नानि - ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधो मध्योर्ध्वसस्थिता । त्रिस्थूणम्-कर्ध्वमूलमध. शास त्रिस्थूण पञ्चदैवतम् । क्षेत्राधिष्ठित विद्वान् यो
पृष्ठ 140
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् । ८७ वै वेद स वेदवित् ॥ शोणितचतुर्थे - यद्यपि चरका दिकों ने वातादि तीनही दोष माने हैं तथा सुश्रुत ने भी वाताढि तीन दोप माने हैं किन्तु सुश्रुत ने जहां शल्य प्रकरण है वहां रक्त को भी दोष माना है क्योंकि वातादि दोष भी रक्त के साथ मिल कर ही सब स्थानों में जाते हैं अथवा रोगोत्पत्ति करते हैं । विना रक्त के इनके द्वारा वणस्थान को दुष्टि, शोथ, पूयभवन और रोहण नहीं हो सकते ।
भवति चात्र-नर्ते देहः कफादस्ति न पित्तान्न च मारुतात् ।
शोणितादपि वा नित्यं देह एतैस्तु धार्यते ॥ ४ ॥
कफ के विना देह नहीं है, पित्त के बिना देह नहीं है, वायु के बिना देह नहीं है अथवा रक्त के बिना भी देह नहीं है अत एव सदा इन चारों ही से देह का धारण होता है ॥४ ॥
विमर्श: - वायु. पित्तकफरचेति त्रयो दोषा. समासतः । विकृ ताऽविकृना देह धनन्ति ते वर्तयन्ति च ॥ तत्र ' वा ' गतिगन्धनयोरिति धातु ', ' तप ' सन्तापे, ‘ श्लिप ' आ लगने, एतेषां कृद्विहितैः प्रत्ययैर्वात पित्तं श्लेष्मेति च रूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥
इनमें वात शब्द ' वा गतिगन्धनयो ' धातु से एवं पित्त शब्द ' तप सन्तापे ' धातु से तथा श्लेग्मा शब्द ' रिलप आलिङ्गने धातुओं से कृदन्तविहित प्रत्ययों द्वारा सिद्ध होते हैं ॥ ५ ॥
विमर्शः - वात - गतिगन्धोपादानार्थस्य वा धातो. - असृग्दरा-दिग्भ्य इत्यादिसूत्रोत्पन्ने तप्रत्यये वात इति रूपम् । वा धातु का गति और गन्धन अर्थ है । गति से गमन, ज्ञान, प्राप्ति और मोक्ष ये चार अर्थ तथा गन्धन का सूचन अर्थ है । इस तरह बात शब्द के अर्थ में Nervous System के समस्त कार्य समाविष्ट हो जाते हैं । ' सर्वा हि चेष्टा वातेन ’ ‘ वायुस्तन्त्रयन्त्रघरः ( चरकः ) । ' नर्न ' को नाड़ी कहना उचित नहीं है क्योंकि ' नर्व ' ठोस होती हैं और ' नाढी ' शब्द नाली या पोली वस्तु के लिये है । ' सिरा ' या ' धमनी ' को नाडी कहना उचित है जमा कि श्रमरकोप में लिखा है ' नाडी तु घमनी शिरा ' ' नाडी परीक्षा ' से धमनी गत रक्त की परीक्षा
करते हैं न कि नर्व की ' करस्याङ्गुष्ठमूळे या धमनी जीवसाक्षिणी ।
तच्चेश्या सुख दुःख ज्ञेयं कायस्य पण्डिते ॥
अतः नाटी को वातसूत्र या ज्ञानतन्तु तथा नर्वस सिस्टम् को वात संस्थान कहना चाहिये । जिस तरह किसी मकान में लगे हुये तांवे के ठोस तारों में विद्युत्प्रवाह होता रहता है और वह तार दृश्य पर प्रवाह दृश्य नहीं किन्तु प्रकाश होने से या स्पर्श करने से शरीर में झटका लगने से विद्युत् शक्ति का ज्ञान होता है इसी तरह पावरहाउस से तारों में होनेवाले विद्युत्प्रवाह की भाति मस्तिष्क से वातसूत्रों में आज्ञा या संज्ञा का वहन बात द्वारा होता रहता है । वह वात दृश्य नहीं है ' रूपरहितत्वे स्पर्शवत्त्व वायोर्लक्षणम् ' किन्तु स्पर्श या शरीर की गति और कार्य से अनुमेय है । पित्तम्- सन्तापार्थस्य तप्धातो-रचि प्रत्यये तकारस्येन्वे वर्णंविपर्यये तस्य च ते कृते पितमिति रूपम् । आयुर्वेद में पित्त के पचन, दर्शन, रक्तरञ्जन और शरीर की उष्णता रखना ये मुख्य कार्य माने हैं । ' पित्तादेवोष्मण पक्तिर्न राणामुपजायते ' ( चरकः ) । श्लेष्मा -आलिङ्गनार्थस्य श्लिष् धातोर्मनिन् प्रत्यये गुणे च कृते श्लेष्मेति रूपम् । दोपस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः – तत्र समासेन वात श्रोणिगुदसंश्रय; तदुपर्यधो नाभेः पक्काशयः, । पक्कामाशयमध्य पित्तस्य, आमाशयः श्लेष्मणः ॥ ६ ॥
अब इसके अनन्तर वातादि दोपों के स्थानों का वर्णन करते हैं । उनमें सक्षेप से वायु श्रोणि और गुदा में रहता है । श्रोणि और गुदा के ऊपर किन्तु नाभि के नीचे पवाशय है । पक्वाशय और आमाशय के मध्य में पित्त का स्थान है । आमा-शय इलेष्मा का स्थान है ॥ ६ ॥
विमर्श: - यद्यपि वात, पित्त और कफ सारे शरीर में । व्याप्त होकर रहते हैं । ' सर्वशरीरचरा. खलु वातपित्तश्लेष्माण ' ( चरकः ) । तथापि जहां जहां ये विकृतरूप से, स्थूलरूप से, मलरूप से या क्रिया विशेष रूप से उपस्थित होते है वहां इनके स्थान माने गये हैं । वायु का प्रधान काम बाहर फेंकने का होने से ( प्रक्षेपसारकरः स प्रोक्तः ) पक्वाशय ( स्थूलान्त्र Large Intestine ) में रहता है । ' अत्रापि पकाशयो विशेषेण वातस्थानम् ' यहां वायु भन्न पाचन से बने हुये मल को गुदा की तरफ ढकेल कर बाहर फेंकने का काम करता है । बृहदन्त्र में ( Peristalsis ) की क्रिया होकर मल वाहर फेंका जाता । है । कटि भाग के वात सूत्रों द्वारा यह कार्य होता है । वित्तस्थान --- पक्वाशय और आमाशय के मध्य पित्त का स्थान है । महास्रोत के आमाशय ( Stomach ), ग्रहणी ( Duodenum ), क्षुदान्त्र ( Small Intestine ), बृहदन्त्र, और गुदा ऐमे विभाग हैं । इनमें ग्रहगी के अन्दर अग्न्याशय | ( Pancrese ) से अग्नि रस तथा यकृत् से पित्त ( Bile ) आता है तथा भान्त्ररस ( Sucous entericus ) इन तीनों पाचन का कार्य होता है । ग्रहणी को पित्तधरा नाम stor मानी है तथा स्थान पक्वाशय और आमाशय के मध्य माना है । षष्ठ - पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता । पक्कामाशयमध्यस्था ग्रहणी सा प्रकीर्तिता ॥ चरक ने वित्त का स्थान आमाशय लिखा है ' अत्रापि - आमाशयो विशेषेण पित्तस्थानम् ' तथा आमाशय को | नाभि और स्तनों के मध्य नाना है । नाभिस्तनान्तरं जन्तोरा-माशय इति स्मृतः । भशित खादितं लीढ पीतञ्चात्र विपच्यते ॥ किन्तु प्रत्यक्ष में यह बात विरुद्ध है आमांशय में आमाशयिक रस ( Gastric juice ) होता है । यदि हम पित्त को ( Bile ) मानें तो उसका बनने का स्थान यकृत् है तथा यकृत् में लगे हुये पित्ताशय ( Gallbledder ) में वह सचित रहता है जहां से समय समय पर एक नाली द्वारा ग्रहणी में पाचनार्थं आता रहता है । इस प्रत्यक्ष से सिद्ध है कि ( Bile ) ही यदि पित्त है तो उसका मुख्य निवास स्थान पित्ताशय है आमाशय नहीं । श्लेष्मस्थान - आमाशय माना है किन्तु चरक ने उरः ( वक्ष ) माना है । ' अत्राप्युरो विशेषेण श्लेष्मस्थानम् ' वाग्भट ने भी कफ का स्थान उर माना है । ' कफस्य सुतरामुरः । ' अतः परं पञ्चधा विभज्यते । तत्र वातस्य वात-। व्याधौ वक्ष्यामः । पित्तस्य यकृत्प्लीहानौ हृदयं दृष्टि: स्त्वक् पूर्वोक्तं च । श्लेष्मणस्तूर: शिरः कण्ठसन्धय इति पूर्वोक्तञ्च । एतानि खलु दोषाणां स्थानान्यव्यापन्नानाम् ॥