श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 121–130

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 121–130

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६८ सुश्रुतसहिता | संरम्भ ( शोथ ), दाह, पाक, राग और वेदना होती है अथवा फिर फट जाता है ॥ २० ॥

अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थमभ्यङ्गः । तद्यथा -गोधाप्रतुदविष्किरानूपौदकवसामज्जानौ पयः सपिस्तैलं | गौरसर्षपजं च यथालाभं सम्भृत्यार्कालर्कबलाऽतिब- । लाऽनन्ताऽपामार्गाश्वगन्धाविदारिगन्धाक्षीर शुक्लाजल-शूकमधुरवर्ग पयस्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात् ॥ २१ ॥

ra शुद्ध कर्णपाली की वृद्धि के लिये अभ्यङ्ग का प्रयोग लिखते हैं - जैसे गोधा, प्रतुद, विष्किर, भानूप तथा जलीय प्राणियों की वमा और मज्जा, दुग्ध, घृत, श्वेत सरसों का तैल यथालाभ ग्रहण कर आकडा, मदार, वला, अतिबला, सारिवा, अपामार्ग, असगन्ध, विदारीगन्ध ( शालपर्णी ), क्षीरविदारी, जलशूक – शैवाल, क्षीरकाकोली और मधुरादिगण की ओषधियों के कल्क के साथ पाक करना चाहिये । अथवा अर्कादि ओषधियों के कल्क को तिल - तैल के साथ पाककर सुरक्षित रख देना चाहिये ॥ २१ ॥

स्वेदितोन्मदितं कर्ण स्नेहेनैतेन योजयेत् ।

अथानुपद्रवः सम्यग् बलवांश्च विवर्द्धते ॥ २२ ॥

प्रथम स्वेदन कर्म करके पश्चात् इस तैल को कान पर

लगाकर मर्दन करें । इस तरह इस तैल के प्रयोग से विना ।

उपद्रव हुये ठीक तरह से कर्ण वलवान् होकर वढ़ता है ॥ २२ ॥ ।

यवाश्वगन्धायष्टयाह्वैस्तिलैश्चोद्वर्त्तनं हितम् ॥ २३ ॥

जौ, असगन्ध, मुलेठी और तिल इन्हें पानी के साथ । पत्थर पर महीन पीस कर कान पर उबटन करना हितकारी होता है ॥ २३ ॥

शतावर्यश्वगन्धाभ्यां पयस्यैरण्डजीवनैः ।

तैलं विपक्कं सक्षीरमभ्यङ्गात् पालिवर्द्धनम् ॥ २४ ॥

शतावर, असगन्ध, क्षीरकाकोली, एरण्ड के बीज ( छिलके रहित ) तथा जीवनीय गण की ओषधियां इनके कल्क तथा दुग्ध के साथ यथाविधि तिल - तैल का पाक कर उसका अभ्यङ्ग करने से पाली की वृद्धि होती है ॥ २४ ॥

तुर्णा न वर्द्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः ।

ते पासपाङ्गदेशे तु कुर्य्यात् प्रच्छानमेव तु ।

बाह्यच्छेदं न कुर्वीत व्यापदः स्युस्ततो ध्रुवः ॥ २५ ॥

जो कान उक्त प्रकार से स्वेदन, स्नेहन और उद्वर्तन तथा अभ्यन करने से भी नहीं बढ़ते हों उनके लिये अपाङ्ग प्रदेश में प्रच्छान करना चाहिये । कर्ण के वाह्यप्रदेश में प्रच्छान नहीं करना चाहिये क्योंकि वहां सिरादि मर्म होने से निश्चित ही अनेक व्यापदे ( आन्ध्य, दृष्टिनाश आदि ) उत्पन्न होती हैं २५

वद्धमात्रं तु यः कर्णं सहसैवाभिवर्द्धयेत् ।

श्रमकोशी समाध्मातः चिप्रमेव विमुच्यते ॥ २६ ॥

4 यदि कर्णपाली का सन्धान करने के बाद ही उसे सहसा थढ़ाने का प्रयत्न किया जाय तो पाली आम होने से शीघ्र ही शोथयुक्त होकर वहां से गिर जाती है ॥ २६ ॥

जातरोमा सुवर्त्मा च श्लिष्टसन्धिः समः स्थिरः ।

सुरूढोऽवेदनो यश्च तं कर्णं वर्धयेच्छनैः ॥ २७ ॥

जब कर्ण पर बाल उत्पन्न हो जाय तथा छिद्र अच्छा हो और सन्धि जुड़ गई हो एवं कर्णपाली समान तथा स्थिर हो गई हो तथा वहां के व्रण का भली भांति रोहण हो गया हो तथा पीढ़ा भी नहीं होती हो ऐसी अवस्था में धीरे धीरे उस कान का योग्य उपायों द्वारा वर्धन करना चाहिये ॥ २७ ॥

अमिताः कर्णेबन्धास्तु विज्ञेयाः कुशलैरिह ।

यो यथा सुविशिष्टः स्यात्त तथा विनियोजयेत् ॥ २८ ॥

कर्णपाली का सन्धान करने के लिये शास्त्र में अनेक बन्ध होते हैं अत एव जहां पर जो बन्ध ठीक तरह से प्रतीत हो वहां उस का प्रयोग करना चाहिये ॥ २८ ॥

कर्णपाल्यामयान्नृणां पुनर्वच्यामि सुश्रुत! ।

कर्णपाल्यां प्रकुपिता वातपित्तकफास्त्रयः ॥ २६ ॥

द्विधा वा scar संसृष्टाः कुर्वन्ति विविधा रुजः । विस्फोट: स्तव्धता शोफः पाल्यां दोपे तु वातिके ३०

दाहविस्फोटजननं शोफः पाकश्च पैत्तिके ।

कण्डूः सश्वयथुः स्तम्भो गुरुत्वञ्च कफात्मके ॥ ३१ ॥

सुश्रुत! अब मैं मनुष्यों के कर्णपाली में होने वाले रोगों को कहता हु । मिथ्या आहार - विहार से वात, पित्त और कफ ये कुपित हो कर पृथक् पृथक्, दो दो मिलकर या तीनों मिल कर कर्णपाली में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं जैसे कर्णपाली में वायु के कुपित होने पर विस्फोट, स्पर्शज्ञानाभाव और शोथ उत्पन्न होता है । पाली में पित्त कुपित होने पर दाह, विस्फोट का प्रादुर्भाव, शोथ और पाक उत्पन्न होता है । पाली में कफ के कुपित होने पर कण्डू, शोथ, कान की जकड़ाहट तथा भारीपन ये रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २ ९ -३१ ॥

यथादोपं च संशोध्य कुर्य्यात्तेषां चिकित्सितम् ।

स्वेदाभ्यङ्गपरीपेकैः प्रलेपासृग्विमोक्षणैः ॥ ३२ ॥

मृद्वीं क्रियां बृंहणीयैर्यथास्त्रं भोजनैस्तथा ।

य एवं वेत्ति दोषाणां चिकित्सां कर्त्तुमर्हति ॥ ३३ ॥

उक्त प्रकार के रोगों में दोपों के अनुसार प्रथम शोधन करके पश्चात् स्वेदन, अभ्यङ्ग, परीपेक, प्रलेप और रक्तमोक्षण से चिकित्सा करनी चाहिये । इसके अतिरिक्त अन्य मृदु क्रियाए तथा यथायोग्य वृहणीय भोजन का प्रयोग करें । इस प्रकार जो जानता है वही दोषों की चिकित्सा कर सकता है ॥३२-३३ ॥

अत ऊर्ध्वं नामलिङ्गैर्वक्ष्ये पाल्यामुपद्रवान् ।

उत्पाटकश्चोत्पुटकः श्यावः कण्डूयुतो भृशम् ॥ ३४ ॥

अवमन्थः सकण्डूको ग्रन्थिको जम्बुलस्तथा ।

स्रावी च दाहवांश्चैव शृण्वेषा क्रमशः क्रियाम् ॥ ३५ ॥

अव इसके अनन्तर कर्णपाली में उपद्रवरूप में होने वाले रोगों के नाम तथा उनके लक्षण कहते हैं । उत्पाटक, उत्पुटक और श्याव ये अत्यन्त कण्डुयुत होते हैं । अवमन्थ, सकण्डूक, ग्रन्थिक जम्बुल ,, स्रावी तथा दाहचान ये १० पाली के उपद्रव । है । इनकी यथाक्रम से चिकित्सा कहता हूं उसे सुनो ॥३४-३५ ॥

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श्रध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् । ६६

अपामार्गः सर्जरसः ' पाटलालकुचत्वचौ ।

उत्पाटके प्रलेपः स्यात्तैलमेभिश्च पाचयेत् ॥ ३६ ॥

उत्पाटक रोग में आंधी झाडा, राल, पाटला, बड़हल की त्वचा इन्हें सम प्रमाण में जल के साथ पीस कर प्रलेप करना चाहिये अथवा इन्हीं द्वन्यों के कल्क से तैल पका कर लगाना चाहिये ॥ ३६ ॥

शम्पाकशिश्रुपूतीकान् गोधामेदोऽथ तद्वसाम् ।

वाराहं गव्यमैणेयं पित्तं सर्पिश्च संसृजेत् ।

लेपमुत्पुटके दद्यात्तैलमेभिश्च साधितम् ॥ ३७ ॥

उत्पुटक रोग में अमलतास, सहजन, करञ्ज, गोह की चरवी और वसा तथा सूकर, गाय और हरिण इनका पित्त तथा घृत उचित प्रमाण में लेकर सबको महीन पीस कर लेप करना चाहिये । अथवा इन्हीं से यथाविधि बनाया हुआ तैल लगाना चाहिये ॥ ३७ ॥

गौरीं सुगन्धां सश्यामामनन्तां तण्डुलीयकम् ।

श्यावे प्रलेपनं दद्यात्तैलमेभिश्च साधितम् ॥ ३८ ॥

श्याव नामक रोग में हरिद्रा, सुगन्धवाला, अनन्तमूल और चौलाई की जड़ इन्हें पीस कर प्रलेप करें अथवा इनसे सिद्ध किया हुआ तैल लगावें ॥ ३८ ॥

पाठां रसाञ्जनं क्षौद्रं तथा स्यादुष्णकालिकम् ।

दद्याल्लेपं सकण्डूके तैलमेभिश्च सावितम् ॥ ३६ ॥

सकण्डूक रोग में पाठा, रसोंत, शहद, उष्ण कांजी इनका लेप करना चाहिये एव इन्हीं से सिद्ध किया हुआ तैल लगाना चाहिये ॥ ३ ९ ॥ व्रणीभूतस्य देयं स्यादिदं तैलं विजानता ॥ ४० ॥

मधुकक्षीरकाकोलीजीवकाद्यैर्विपाचितम् ।

गोधावराहसर्पाणां वसाः स्युः कृत I हणे ॥ ४१ ॥

इस उपद्रव के साथ व्रण उत्पन्न हो जाय तो वच्य-माण तैल का प्रयोग करना चाहिये । मुलेठी, क्षीरकाकोली और जीवनीय गण की ओपधियों से पकाया हुआ तैल लगाना चाहिये और जहां पाली शुष्क हो रही हो तो गोधा, सुकर तथा सर्प की वसा के द्वारा उसकी बृंहण करना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥

प्रलेपनमिदं दद्यादव सिच्यावमन्थके ।

प्रपौण्डरीकं मधुकं समङ्गां धवमेव च ॥ ४२ ॥

अवमन्थक उपद्रव मे प्रथम अवसेचन ( प्रक्षालन ) करके कमल, मुलेठी, मजीठ या लज्जालु और धव इनका लेप अथवा इन्हीं से पकाया हुआ तैल लगाना चाहिये ॥ ४२ ॥

तैलमेभिश्च सम्पक्कं शृणु कण्डूमतः क्रियाम् ।

सहदेवा विश्वदेवा अजाक्षीरं ससैन्धवम् ॥ ४३ ॥

एतैरालेपनं दद्यात्तैलमेभिश्च साधितम् ॥ ४४ ॥

अव यहां से कहू की शान्ति के लिये चिकित्सा का वर्णन करते हैं, उसे हे सुश्रुत! तुम सुनो । सहदेवी, विश्वदेवा ( नाग-वला ), वकरी दुग्ध और सैन्धव लवण इन्हें पत्थर पर पीस-कर लेप लगाना चाहिये, अथवा इन्हीं से सिद्ध किया हुआ तैल लगाना चाहिये ॥ ४३–४४ ॥

ग्रन्थि के गुटिकां पूर्वं स्रावयेदवपाट्य तु ।

ततः सैन्धवचूर्णन्तु घृष्ट्वा लेपं प्रदापयेत् ॥ ४५ ॥

ग्रन्थिक उपद्रव में प्रथम शस्त्र से ग्रन्थि को चीर कर उसमें से रक्तादि को स्रवित कर देना चाहिये उसके अनन्तर सैन्धव लवण द्वारा घर्षण करके उसी का जलपिष्ट लेप लगा देना चाहिये ॥ ४५ ॥

लिखित्वा तत् स्रुतं घृष्ट्वा चूर्णैर्लोध्रस्य जम्बुले ।

क्षीरेण प्रतिसार्येन शुद्धं सरोपयेत्ततः ॥ ४६ ॥

जम्बुल उपद्रव में प्रथम लेखन कर्म से रक्तादि का स्त्रावण करके लोध के चूर्ण द्वारा घर्पण कर दुग्ध से प्रचालित करके यथाविधि शुद्ध होने पर रोपण क्रिया करनी चाहिये ॥ ४६ ॥

मधुपर्णी मधूकञ्च मधुकं मधुना सह ।

लेपः स्त्राविणि दातव्यस्तैलमेभिश्च साधितम् ॥ ४७ ॥

स्रावी उपद्रव में गिलोय, महुआ के फूल या छाल और मुलेठी इनको शहद के साथ पीस कर लेप लगाना चाहिये । अथवा इन्हीं द्रव्यों से सिद्ध किया हुआ तैल लगाना चाहिये ४७

पञ्चबल्कैः समधुकैः पिष्टैस्तैश्च घृतान्वितैः ।

जीवकाद्यैः ससर्पिष्कैर्दह्यमान प्रलेपयेत् ॥ ४८ ॥

पञ्चवल्कलों को मधु और घृत के साथ पीस कर अथवा जीवनीय गण की ओषधियों को घृत के साथ पीसकर दाहयुक्त प्रदेश पर लेप करने से वह शान्त हो जाता है ॥ ४८ ॥

विश्लेपितायास्त्वथ नासिकाया-वक्ष्यामि सन्धानविधिं यथावत् । नासाप्रमाणं पृथिवीरुहाणां पत्रं गृहीत्वा त्ववलम्बितस्य ॥ ४६ ॥

तेन प्रमाणेन हि गण्डपार्श्वा-दुत्कृत्य बद्ध त्वथ नासिकाग्रम् । विलिख्य चाशु प्रतिसन्दधीत तत् साधुबन्धैभिंपगप्रमत्तः ॥ ५० ॥

सुसंहितं सम्यगतो यथाव-नाडीद्वयेनाभिसमीक्ष्य वदुद्ध्या । प्रोन्नम्य चैनामवचूर्णयेत्तु पतङ्गयष्टीमधुकाञ्जनैश्च ॥ ५१ ॥

सञ्छाद्य सम्यक् पिचुना सितेन तैलेन सिञ्चेद सकृत्तिलानाम् । घृतञ्च पाय्यः स नरः सुजीर्णे स्निग्धो विरेच्यः स यथोपदेशम् ॥ ५२ ॥

रूढञ्च सन्धानमुपागतं स्यात् तदर्द्धशेषन्तु पुनर्निकृन्तेत् । हीनां पुनर्वर्द्धयितुं यतेत समाञ्च कुर्यादतिवृद्धमांसाम् ॥ ५३ ॥

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७० सुश्रुतसहिता । रोग के द्वारा या किसी शत्रु के द्वारा नासिका कट जाने पर उसको जोडने की विधि का यथावत् वर्णन करता हूं । छिन्न नासिका के बराबर किसी घृत का पत्ता ले कर उसके बराबर ही कपोल से कुछ सम्बन्ध रखते हुये चर्मयुक्त मांस काट कर बडे नाक के अग्रभाग का बिलेखन करके उस स्थान पर वह मांस लगा कर सूई से सीवन कर्म करके बन्धन लगा कर सावधानीपूर्वक शीघ्रता से जोड़ देवे । उसके पश्चात् नामा के रन्ध्रों में दो एरण्डनाल प्रवेश कर नासा को कुछ ऊंची उठा कर दोनों का जोड ठीक तथा स्वाभाविक नासिका की तरह देख कर बन्धन लगा देना चाहिये । पश्चात् उस पर लाल ' चन्दन, मुलेठी और रसोंत का महीन चूर्ण छिडकना चाहिये । फिर श्वेत पिचु ( रूई या वन्त्र ) से ढक कर तिलों के तैल से बार बार सेचन करते रहना चाहिये । पूर्वं भोजन के ठीक जीर्ण होने के बाद घृतपान कराना चाहिये । स्निग्ध होने पर युक्तिपूर्वक विरेचन र्क्स क्राना चाहिये । जब ठीक तरह से सन्धित नासा का रोहण हो जाय उस ढंगा में उसके कपोल सम्बन्धित हिस्से को काट देना चाहिये । यदि नामिका छोटी रह गई हो तो उसे पुन ' वढाने का प्रयत्न करना चाहिये और यदि मांस अधिक बट जाय तो उसे काट कर समान कर देना चाहिये ॥ ४ ९ ०३ ॥ विमर्श - वाग्भटे नासामन्यानवर्णनम् - अथ कुर्याद्वय स्थस्य

द्विन शुद्धस्य नासिकाम् । द्विन्द्यान्नासासम पत्र तत्तुल्यञ्च कपोलन ॥

त्वङ्नास नामिनासन्नेग्क्षन्तत्तनुना नयेत् । सोव्येद् गण्ड तन सूच्या सैर्विन्धा पिचुयुक्तना ॥ नान्गच्छेद्वै च लिखिने परिवर्त्योपरि त्वचन् ॥ कपल्बन्ध मन्ध्यात् नौन्चेन्नासाञ्च यवन ॥ नाडीनामुत्क्षिपेडन्त नुबोच्छ्ानप्रवृत्तये ॥ यदि नासा सद्यग्छिन्न हुई हो तो उस कटी नासा को ही ठीक तरह से उस स्थान पर रख कर सीवन कर देना चाहिये । निवेशित यथान्यास सद्यग्यिन्नेऽप्यय विधि । ( अ ० सं ० )

नाडीयोगं विनौष्टस्य नासासन्धानवद्विधिम् ।

च एवमेव जानीयात् स रात्रः कर्तुमर्हति ॥ ५४ ॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने कर्तव्यवबन्धविधिर्नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

-acusers कटे हुये ओष्ठ या जन्मजात विकृत ओष्ठ ( Hartip ) का सन्धान भी नासामन्धान के अनुसार करना चाहिये । भेद केवल इतना ही है कि इसमें एरण्डनाल का उपयोग नहीं होता है । इस प्रकार जो वैद्य नासा तथा ओष्ट के सन्धान को भली भांति जानता हो वह राजाओं की चिकित्सा करने में योग्य हो सकता है ॥ ५१ ॥

विमर्श - इस अध्याय में कर्णपाली, नासा तथा योष्ठ के सन्धानों का वर्णन किया है । इसी के आधार से पाश्चात्य देशों मैं सन्धान कर्म ( Plastic surgery ) में प्रगति हुई है | The plastic surgery of the 19th Century was stimulated | by the example of Indian methods Dr Neubergers History of Medicine. भारतीय वैद्य अपनी निद्रा, दुराग्रह और अकर्मण्यता तथा आत्म्य को छोड़ कर शारीर शल्य, | शालाक्य और प्रसूति तन्त्र आदि प्रमुख विपयों का प्राच्य और नवीन ढोनों टन से गम्भीर अध्ययन कर शस्त्रकर्म करने में तत्परता दिखाते हुये अपने मस्तिष्क को गवेपणा ( Re - earch ) की ओर लगाव, जिसमे उनके संमान का रक्षण हो सकेगा । पाश्चात्य विज्ञान नित्य प्रति नई नई शोध कर रहा है किन्तु प्राचीन वैद्य अपने उसी दायरे में घूम रहा है । अष्ट

। आयुर्वेद की प्रत्येक शाखा की समुन्नति में लग जाना चाहिये ।

इत्यायुर्वेदतत्त्वसंढीपिकाभापायां कर्णव्यधबन्ध-विधिर्नाम घोडशोऽध्यायः ॥

MOC CH

सप्तदशोऽध्यायः ।

अथात श्रापपणीयमध्याय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अव यहां से ' आमपपणीय ' अध्याय का व्याख्यान करते है जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १–२ ॥ विमर्श - आन शब्द से आम और पच्यमान दोनों का ग्रहण होता है क्योंकि आगे चलकर आन विपच्यमानञ्च सम्यक् पक्वञ्च यो भिषक् । ऐसा वर्णन किया है । आम पच्यमानश्च पक्वश्च तेषामेपण विज्ञान विद्यते यस्मिन् स आमवैपगीनलन् । शोफसमुत्थाना ग्रन्थिविद्रध्यलजीप्रभृतयः प्रायेण व्याधयोऽभिहिता अनेकाकृतयः, तैर्विलक्षणः पृधुर्य-थितः समो विपमो वा त्वङ्मांसस्थायी दोपसङ्घातः शरीरैकदेशोत्थितः शोफ इत्युच्यते ॥ ३ ॥

ग्रन्थि, विधि, अल्जी प्रमृति अनेक स्वरूप की व्याधियां प्राय शोथयुक्त हुआ करती है किन्तु उनसे विलक्षण, फैला | हुआ, गांठदार, सम या विषम, त्वचा और मासादि धातु में होनेवाला वातादि दोषों का समूह जो शरीर के किसी एक देश में उत्पन्न होता है उसे श्रोफ कहते हैं ॥ ३ ॥

विमर्श -यहां जो शोफ वर्णित है वह हृदय, वृक्क और यकृत के रोगों में उपद्रव रूप से उत्पन्न सर्वाङ्गगोफ तथा अर्घाशोफ से भिन्न शोफ है । इस शोफ में केवल स्थानिक लक्षण जैसे सूजन, लालिमा, ताप और वेदना होती है किन्तु उन दो शोफों में इन्द्रिय विकृति लक्षण भी होते हैं । यह एकदेशोत्थित स्थानिक गोफ है इसे इन्फ्लेमेटरी आइडिमा ( Inflammatory oedema या Inflamation ) कहते हैं ॥ चरक में शोफ के तीन भेद होते हैं । आगन्तु हेतुस्त्रिविधो निजश्च सर्वार्धगात्रात्रयवाश्रितत्वात् । स पडुविधो वातपित्तकफशोणितसन्निपातागन्तु-निमित्तः । तस्य दोषरूपव्यञ्जनैर्लक्षणानि व्याख्या-स्वामः ॥ ४ ॥

वात, पित्त, कफ, रक्त तथा इनके सन्निपात और भाग-न्तुक इन छ कारणों से उत्पन्न होने की दृष्टि से वह ( शोफ ) ६ प्रकार का माना गया है । उस षड्विध शोफ के दोष और रूप को दर्शानेवाले लक्षणों को कहते हैं ॥ ४ ॥

विमर्श: --- यहां शोफ के ६ कारण बताये हैं । डाक्टरी में

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श्रध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् । ७१ बगशोफ के ये कारण हैं --विकारी जीवाणु, दवाव, सावात । मरोड़, सोच, अग्नि या तष्टपदार्थों से जन जाना, रासायनिक । पदार्थ नीत्र या शुद्ध अस्त्र ( Acids ), चार ( Alkali ), वान-स्पति तथा प्रागज विष और विद्युत्यत्राह । नरक में आग नुक्शोय के कहे कारणों में इनका समावेश हो सकता है । ' सुखनि खत्त्वागन्नीः नाननननाभिचाराद्यिाभिषङ्गाभिवान ववत्रन्त्रग्रीडनरज्जुदद्दनचन्नाद्यनिभूतोपसर्गादीनि ' । तत्र, वातशोफोऽरुणः कृष्णो वा परुषो मृरतव स्थितास्तदादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति । पित्तशो-फः पीतो मृदुः सरक्तो वा शीघ्रानुसार्योषाद्ययात्र वेद-नाविशेषा भवन्ति । तेष्मशोकः पाण्डुः शुक्लो वा कठिनः शीतः जिग्यो मन्दानुसारी कएड्वादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति । सर्ववर्णवदनः सन्निपातजः । पित्तयच्छोणितजोऽतिकृष्णच । पित्तरक्तलक्षग चागन्तु लोहितावमासा ॥ ५ ॥

इनमें से वातजन्यशीर कुछ लाल, काला, खुरदरा और मृदु होता है तथा उसमें सूई चुभाने की सी बेदना होती है जो कभी बढ़ती है तथा कभी बदती है । नित्तजन्यगोक पीले रङ्ग का, मुलायम, रक्तयुक्त तथा शीघ्र बढने वाला होता है । इसमें औपादिक ( ओप, चीष, दाह ) की सी बेदना होती है । कम्जोर पाडु वर्ग का या श्वेत, कठिन, शीत, स्निग्ध, धीरे धीरे बढ़ने वाला तथा कट्ट - गुरु- सुप्ति ऐसी वेदनाविशेषताओं वाला होता है 1 । समानजन्य शोफ में सर्व ( तीनों ) दोपों के कहे हुये वर्ग और बेदनाएं होती है । होमितवन्त्र शोर में पित्तजशोफ के समान लक्षण होते हैं किन्तु वह काला अधिक होता है । आगन्तुक ऑफ में पित्त और रक्त । जन्य शोफ के लग होते हैं तथा लोहितवर्ग का अवभास दिये होता है ॥ ५ ॥

विमर्श: - मन से गांध के निम्न लक्षण होते हैं । नं १ शोध आवान लगने से रक्ताविक्य होकर रक्त में में रक्त-रस निकल कर वहां की धातुओं में जमा हो जाता है जिससे स्थान आयुक्त हो जाता है । नं: लालिना ( Redress ) का भी सुन्य कारण प्रागवायु युक्त रक्तप्रवाह की अविकता है । नं ० ३ उष्णता ( Heat ) । यह भी रक्ताधिक्य के कारण ही होती है जिससे श्रीयुयुक्त स्थान अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक उष्ण प्रतीत होता है । नं ० ८ वेदना ( Pain } । गोय के स्थान में वमनीगत रक्तभार बढ जाने से तथा लम्रीका का सञ्चय अधिक होने से वानसूत्रों ( Nerves ) के अग्रभागों पर दबाव पड़कर क्षोभ होने से वेदना प्रतीत होती है I । नं ० ५ न्यर्थतामझना ( Tenderness ) । उस स्थान पर दत्रात्र पढ़ने से रोगी की बेदना या बेचैनी बढ़ जाती है । नं ० ६ युगानि ( Loss of function ) बेदना वृद्धि तथा स्यानिक खेलों में बाधा होने से वह स्थान स्वकर्मशून्य हो जाता है । स यदा बाह्याभ्यन्तरैः क्रियाविशेषैर्न सम्भावितः प्रशमयितुं क्रियाविपर्ययाद बहुत्वाद्वा दोषाणां तदा पाकाभिमुख भवति । तस्यामस्य पच्यमानस्य पक्कत्य च लक्षणनुच्यमानमुपधारय ॥ ६ ॥

जब वह गोफ विपरीत क्रियाओं से या दोपों की शक्ति अधिक होने से बाह्य ( आलेप, परिषेक, सेक, अभ्य, उप-नाह ) और आभ्यन्तर ( रक्तगोवनादि तथा हर छाय, रस, भस्मादि ) क्रियाविशेषताओं के करने से भी शान्त नहीं होता हो तब पकने लगता है । उसकी अम, पमान और पत्र अवस्थाओं के नग कहता हूं उन्हें धारण करो ॥ ६ ॥

विमर्श - अधिकतर शरीर में विकारी जीवाणुओं के प्रवेश से उत्पन्न होता है । ये जीवाणु प्रवेश - स्थान की सेठों को मार कर अपना खाद्य लेकर अपनी वृद्धि करते हैं तथा साथ में विषैले पदार्थ भी उत्पन्न करते हैं जो स्थानिक सेलों का नाग तथा रक्त के साथ मिलकर सर्वदेह में भ्रमण कर विषम-यता के लक्षण गट करते है । शरीर के सेल भी अन्य शरीर-रक्षक मेलों की सहायता से इनके साथ मुकाबला करते हैं । यदि विकारी जीवाणु निर्वल होते हैं तो वे हार जाते है तथा जोफ नष्ट हो जाते हैं और यदि शरीररक्षक सेल निर्बल होते हैं तो जीवाणु क्रियाप्रबल होकर रोग वृद्धि होती है । इसी को शोथ कहते हैं । औथ की नाभिकावस्था आमावस्या है । इसमें शरीर का वल और औपचवल हो तो गेग शान्त हो सकता है किन्तु जीवाणु या द्वीप प्रबल हों तया योग्य चिकित्सा का भी अभाव हो तब स्थानिक धातु नष्ट होकर पूय बनती है तथा वह प्रसारित होती है इसे पच्यमानावना कहते हैं । किन्तु पृयोत्पत्ति बन्द होकर गरीरधातु - नाम भी बन्द होकर तथा पूत्र के चारों और रोहण वातु ( Granulation tissue ) की दीवाल बनकर पूयप्रसार रुक कर वह एक स्थान में कैदी की भांति एकत्रित हो जाता है उसे पक्वावस्था या विद्रधि ( Abscess ) कहते हैं । तत्र, मन्दोमा वसवर्णना शीतशोफना स्थैर्य मन्दवेदनताऽल्पशोफना चामलक्षणमुद्दिष्टम् ॥ ७ ॥

इनमें से शोध का स्थान कुछ गरम होना, उस स्थान की त्वचा की अन्य त्वचा में समानवर्णना, गोफ का गीतस्पर्श, । स्थिरता ( कठापन ), अर पीड़ा और अल्गोफता ये आम-शोक के लक्षण हैं ॥ ७ ॥

चिभिरिव निस्तुते दृश्यत इव पिपीलिकाभि-स्लाभित्र संसर्प्यत इव विद्यत इव शबेग भिद्यत इव शक्तिभिस्ताड्यत इव दण्डेन पीडयन इव पाणिना घट्यत इव चाङ्गुल्या, दह्यते पच्यत इव चाग्निक्षारा-भ्यान, ओषचोषपरीदाहा भवन्ति । वृश्चिकवि इव च स्थानासनशयनेषु न शान्तिमुपैति । श्राध्मातवन्ति-रिवाततञ्च शोफो भवति, त्वग्वैवस्वं शोफाभिवृद्धिर्व्व-दाहपिपासा भक्ताचिश्च पच्यमानलिङ्गम् ॥ ८ ॥

सूइयों के चुभोने की सी पीडा होना, चीटियों से काटा जाता हो, तथा चीटियां शरीर में चलती हुई सी प्रतीत होती हो, मन्त्र से काटा जाता हो, ' शक्ति शस्त्र ' में भेदन करने के समान, ढाडे या लकड़ी में पीटे जाने के मसान, हाथ में | दबाये जाने के समान, अद्भुलियों द्वारा मले जाने के समान,

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७२ अग्नि से जलाये जाने सुतसंहिता । जहां प्रतीत होता और चार से पकाये ( पास में रबी हो एवं ओप ( एक भाग जाने के समान और ओर ) जलन अग्नि के समान दाह ) में दाह ), चीप पत्थर की तरह घनता समान बर्ड प्रतीत होती हो तथा तथा परिदाह ( चारों चाहिये ॥ १० ॥ दिखाई दे तो संगय

हो, फूली रहने, बैठने और सोने बिच्छू के काटे हुए विमर्गः कफज नहीं करना वर्णभिन्नता हुई, मसक की तरह तना से भी शान्ति न मिलती के से तथा क्फ की शोध में पूय के गम्भीर भोजन में अरुचि शोफ में वृद्धि, ज्वर, ढाह हुआ गोथ हो, त्वचा लक्षण होने पर भी विशेषता मे त्वक्सवर्णता धातु स्थित होने ये सब पच्यमान, प्यास लगना में शोफ के अन्य वैद्य मोह को प्राप्त, शीतगोफतादि विमर्श - - च्यमानावस्था शो के लक्षण होते और पक्वावस्था शेष लक्षणों न हो अर्थात वहां दबाव वातसूत्रों पर में पूय बढ़ता हैं ॥८ ॥ रोगेषु जान लेनी चाहिये ( विदाहादि ) के पक

होती है | पाक्स्थान पढने मे उपर्युक्त विविध है और उसका गम्भीरगतित्वाद । ' यत्र तु कफजेप्यभिघातजेषु मिलने मे उष्णताजनक में विष रक्त द्वारा प्रकार की पीढाएं न तत्र मोहमुपेयात, प्रपाकप्रनियोगीन्येतानि वा कर ज्वर पैदा केन्द्रों ( Thermogenis मस्तिष्क में पहुचकर | हाराणचन्द्र ' | कफजे शेपलक्षणेनैव पक्व विजानीयादित्यर्थ लिङ्गानि दृश्यन्ते करता है । Canters ) उत्तेजित गीतनादि भवति गम्भीरे तथा शस्रजे ', इति वेदनोपशान्तिः वस्त्वक्परिपुटनं पाण्डुनाऽल्पशोफता मन, वस्ताविषोदकसवरण निम्नदर्शनमङ्गुल्याऽवपीडिते चलीप्रादुर्भा-न्ते थाऽवपीडित पूयस्य प्रत्युन्न-, मुहुर्मुहुस्तोदः, प्रपीडयत्येकमन्तम-पद्रव शान्तिर्भताभिकाङ्क्षा कण्डूरुन्नतता वेदना की पक्कलिङ्गम् व्याघेरु-| मोहमुपेयादिति, तत्रान्नादिना वाग्भट ने इसी शेषविद्राहादिपूर्वलक्षणे श्रृयाप्त प्रावो अवस्था को रक्तपाक यह सन्देह मुक्तताय । डाक्टरी मत श्वेतकण निश्चित दूर हो जाता त्रांग मीटर ( WB. C. ) की है । रक्त संख्या च गम्भीरे अन्न पाकाद्रिकावधारण पार्क एक जानीयादिति, न तत्र कहा है । रक्तपाक चक्रः । ' रक्त परीक्षा मिनि स्वाभाविकावस्था करने से के रक्त त्वचा पर शान्ति, देह में पाण्डुता ॥ ६ ॥ प्रयोत्पत्ति के समय में सात हजार से औसत प्रति घन

पर त्वचा झुर्रियां पटना और डगर, शोफ का कम संख्या बीस प्रतिवन सहस्रांश दस हजार होती है सह-मांग में गढा पढ़ना होना, अद्भुलि होना, हजार से पचास हजार मीटर रक्त में किन्तु का भर जाना, अलि तथा अद्भुलि के से दबाने तक अधिक इनकी ममक में भरे हुये से एक तरफ के हटाने पर पुन. श्रमं विपच्यमानं भवन्ति चात्र- हो जाती है । कोने पर प्रतीति पानी की तरह पूय भाग को दबानेपर जानीयात् च सम्यक् होना, कण्डू, गोफ होना, बार - बार सूई चुभोने सञ्चरण की दूस स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः पचञ्च यो भिषक्

उपद्रवों की शान्ति के उत्मेध ( उभार की सी पीडा जो वैद्य शोफ की ।

के लक्षण हैं तथा भोजन करने ) का कम होना अवस्थाओं को आम, विपच्यमान ॥ ५१ ॥

॥ ९ ॥ की इच्छा ये, शेप सब तस्करवृत्ति

अच्छी तरह जानता, और पक्व इन जाने त्रिमर्श –डबाने से उस पक्वशोष विमर्श होते हैं ॥ ११ ॥ है वही वैद्य कहलाता तीन

प्रतीत मे गढा तथा दबाव स्थान का पूय इधर चुराने से - ' तस्करवृत्ति ' से है कहते होती है इसे पिटिन हटने ही वापस आजाने उधर हट है - तात्पर्य है । ऐसे मूर्ख यहां धन और प्राण शोथ हैं । यह व्रामशो ऑन प्रदान ( Pitting से पुनरन्नतता वैद्य धराज 1 | नमस्तुभ्य वैद्यों के लिये दोनों के ( gold oedema का प्रधान on pressure प्राणान वनानि च यमराजसहोदर | एक सुभाषित मिलना है | दबाव ) या मेरसोडीमा लक्षण होता है ) वाताहते नास्ति ॥ | यमस्तु हरते प्राणान् ण्डान टेन्ड ( Pluctuation से पूयनञ्चरण की या श्लीपद जो धन तम्मात् रुजा न पाकः सूत्रवृद्धि ( हायहोली test ) कहते है तरह प्रतीति को में क्वचित कालान्तरेणाभ्युदितन्तु समस्ताः परिपाककाले पित्तादृते नास्ति में की जाती ), पूनविद्रधि । यह परीक्षा जलोदर पल- पचन्ति शोफांखय कफाच्च पूयः है ।, ग्रन्थि ( Cyst, पचत्यतः शोणितमेव पित्तं कृत्वा एवदोपाः कफजेषु तु रोगेषु ) आदि वायु पाको मतोऽपरेपां वशे वातकफ ॥ केषुचिदसमस्तं गम्भीरगतित्वादभिघातजेषु के विनाशोथ विदुषां प्रसह्य । मानो भिपग् पक्वलक्षणं दृष्ट्रा होती, पित्त के बिना में या कहीं भी द्वितीयः १३ शोफना मोहमुपैति पक्कमपकमिति वा है एवं के पात्र ( Fornation शरीर में पीडा स्थौल्यमल्परुजताऽश्मञ्च । यत्र हि त्यक्सवर्णता मन्य- गोवादि के पाक बिना पूय की उत्पत्ति of Pas ) नहीं नहीं मुपेयादिति ॥ १० घनता शीत हैं । कालान्तर के समय वातादि नहीं होती है इस होता कक के ॥, न तत्र मोह- को अपने वश मे बढ़ा हुआ तीनों ढोप शोथ को लिये धातुओं में द्वारा उत्पन्न हुने सम्बन्ध में में करके रक्त को पित्त स्ववल मे पकाते में पावस्था स्थित होने से अथवा रोगों में शोध विमर्श अन्य विद्वानों का मत पका देता है । और फ को भी अपक के सम्पूर्ण लक्षण चोट से उत्पन्न हुये गहरी दो मत - पूय कैसे बनता है ॥ १२-१३ ॥ यह पाक के होता है शोध मानकर त्रिग्ाई नहीं देने पर कई रोगों शोणितान्पूय प्रदर्शित किये हैं है, इस विषय स्थान अत एव ऐसी स्थिति वैद्य मोह ( श्रज्ञान पक शोध है इनि विशेषः । ' पूर्वदर्शने कफात् में आयुर्वेद ने में शीतलता और में जहां त्वचा ) को प्राप्त कि व्याणां चन्दनादीना ( मधुकोप ) पूय., अत्र दर्शने स्थूलना तथा वंदना में सवर्णता, शोफ पित्तना दग्धं रक्तं दग्धाना ताटपुस्तक में लिखा की अल्पता! श्रोणिनानारमासादिपाकोऽपि पूयमिहोच्यते श्वेतता यथा रक्त और ॥ श्रोणित । तद्वत् मासादि धातुओं उम्पन एवेति चक्र पचतीत्यनेन के पित्त द्वारा । इस तरह पकने से पाक कफ, होता है ।

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श्रध्यायः १७ ॥ सूत्रस्थानम् । ७३ टाक्री मन से दूध की उत्पत्ति अधिकनया रक्त से ही मानी है । पृय को ( Pas ) कहते हैं तथा पाकविधि को ( Sappuration ) कहते हैं । शोध का स्थान मानो रणक्षेत्र है । यहां पर शरीर के शत्रु और रजक दलों में युद्ध होता है । पाकविधि में निम्न पृयजनक ( Progenic ) जीवाणु भाग लेते हैं । कोकान जाति जैसे - स्ट्रेप्टो, स्टेफिलो, न्यूमो, मेनिगो, गोनो कोक्म, बेमील्स पायो सायनीयस, वे ० कोलाई, ये ० डायफोसिस, चै ० ट्युबरक्युलोसीस और एक्टिनो माय-सीस । इनके प्रवेश मे वहां प्रथम शोय, रक्तसनारावित्र्य और श्वेतक्णागमन वृद्धि होकर दोनों में युद्ध होता है । । प्रबल जीतते हैं, निर्वल हारते हैं । जीवाणु अधिकसंख्यक तथा सवल हो तो स्यानिक धातुसेल, स्वेतक्य तथा जीवाणु नष्ट होते हैं । इस तरह पूय इन्हीं मृत सेलों से बनता है । घ्य के तरल भाग में रकरम होता है और घन भाग में स्थानिक धातुओं के मृत सेल, मृत पूयजनक जीवाणु और मृत खेतका होते हैं । दे ० कोलाय से बना पूय मलावी, ० बना पूय नीला हरा होता है । यकृत् को विवि, डिम्बवाहिनी ( विवि / Pyosalpinx ) तथा रासायनिक द्रव्योत्पन्न शोध में पूय विना जीवाणु के होता है । तत्र, आमच्छेदे मांसमिरान्नाय्वस्थिसन्विव्यापा-दुनमतिमात्रं शोणितातिप्रवृत्तिर्वेदनाप्रादुर्भावोऽवदरण-मनेकोपद्रवदर्शनं चतविद्रधिर्वा भवति । स यड़ा भय-मोहाभ्यां पक्कमप्यपक्कमिति मन्यमानञ्चिरमुपेक्षते व्याविं वैद्यस्तदा गम्भीरानुगतो द्वारमलभमानः पूयः त्वमाश्रयमत्रदीर्योत्सङ्गं महान्तमवकाशं कृत्वा नार्डी जनयित्वा कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाव्यो वेति ॥ १४ ॥

आन शो के हेडन करने मे मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धियों का नाम, अधिक मात्रा में रक्त की प्रवृत्ति, बेदना का प्रादुर्भाव, मांसादि धातुओं का फटना, अनेक प्रकार के उपद्रवों का होना अथवा चतविधि उत्पन्न होती है । यदि वैद्य भन और मोह ( अज्ञान ) मे पक शोध को भी अपक समझना हुआ व्यावि ( शोफ ) की चिर काल तक उपेक्षा कर देता है तब गम्भीर धानुओं में गया हुआ पूय बाहर निकलने का द्वार न प्राप्त कर अपने आश्रयीभूत स्थान ' को विदीर्ण कर गहरा और बड़ा अवकाश करके नाड़ी ( Sinus ) उत्पन्न कर देता है जिसमे वह शोय कृच्छ्रसाध्य और असाध्य हो जाता है ॥ ११ ॥

भवन्ति चात्र-चरिछनत्त्याममज्ञानाद्यश्च पक्कमुपेक्षते ।

वपचाचित्र मन्तब्यौ तावनिश्चितकारिणौ ॥ १५ ॥

जो वैद्य आनाव में शोफ को चीरता है तथा जो पक्वा-वन्या में उपेक्षा कर देना है वे दोनों प्रकार के असमीच्यकारी वैद्यों को चाण्डाल के समान समझना चाहिये । जैसे चाण्डाल क्रिसी को भी मार देता है तद्दत् ये भी रोगी को मार देते हैं । प्राक शत्रकर्मगश्चेष्टं भोजयेदातुरं भिषक् ।. मद्यपं पाययेन्मद्यं तीक्ष्णं यो बेदनाऽसहः ॥ १६ ॥

१० सु ० न मूर्च्छत्यन्नसंयोगान्मत्तः शत्रं न बुध्यते । ' तस्मादवश्यं भोक्तव्यं रोगेपूक्तेषु कर्मणि ॥ १७ ॥

प्राणो ह्याभ्यन्तरो नृणां बाह्यप्राणगुणान्वितः ।

धारयत्यविरोवेन शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ १८ ॥

शस्त्रकर्म ( Operation ) करने के पहले रोगी को हितकर भोजन करना चाहिये तथा जो रोगी अन्त्रर्म में शन्त्र द्वारा होने वाली वेदना को सहन न कर सके तथा वह मद्यपा-न करने वाला हो तो तीक्ष्ग मद्य का पान कराना चाहिये | रोगी को अन्न विलाने मे मूर्च्छा प्राप्त नहीं होती है तथा मंदिरा द्वारा मत्त हो जाने से शस्त्रपातजन्य पीडा का बोध नहीं होता है, इसलिये जिन रोगों में भोजन कराना कहा | गया है उनमें शस्त्रकर्म के पूर्व अवश्य ही भोजन करा देना चाहिये । मनुष्यों का भीतरी प्राण ( शक्ति ) वाह्य प्राण ( अन्न ) के गुणों के साथ मिलकर इस पाञ्चभौतिक शरीर को निर्विरोध धारण करता है ॥ १६-१८ ॥ विमर्श - निन्न रोगों को छोड़ कर अन्य रोगों में शस्त्रकर्म के पूर्व भोजन कराना चाहिये । ' मुटगमोंड । र्शोभगन्दरमुखरोगे • ध्वभुवन कर्म कुर्वीन ' अन्न की प्राण संज्ञा है " नागो वा अन्नन् ” शरीरमन्नान् " जागः प्राणिना प्रा तथा देह पञ्चभूतों से । बना है और आहार भी पाञ्चभौतिक होने से देह धारक है । । पद्मभूतान्नके देहे खामीति । विपत्र पञ्चधा सम्यक् म्वान् गुणानभित्रधने ॥ इन्हीं कारणों से शर्म के पूर्व भोजन कराना श्रेष्ठ माना है इसके सिवाय भोजन करा देने से त्वचादि स्थानों की रक्तवाहिनियां सद्वृचित हो जाती हैं जिससे वां का रक्त पाचक रसों की उत्पत्ति के लिये पचन संस्थान ( Dig-| estive system ) की ओर अधिक मात्रा में जाता है जिससे शस्त्रकर्म करने के स्थान से रक्तन्नाव कम होता है । मान - से रोगी की वेदना तथा संज्ञा दोनों का हरण होता है जिससे शस्त्रकर्म में कुछ सहायता मिल सकती है किन्तु इस विषय में वर्तमान विज्ञान ने अत्यधिक उन्नति कर अनेक वेदनाहर ( Anodyne ) और संज्ञाहर ( Anaesthetic ) ओषधियों का आविष्कार किया है । क्लोरोफार्म से सार्वदेहिक संज्ञाहरण तथा कोकेन, नोवोकेन, प्रोकेन और ईथर से स्थानिक संज्ञाहरण करते है । इसमे चाहे जितना बडा शस्त्रकर्म किया जाय परन्तु रोगी को तिलमात्र भी बेदना नहीं होती है । भोजप्रबन्ध में संज्ञाहर चूर्ण से राजा को बेहोश कर शिर का शस्त्रकर्म करके मत्स्य निकाल कर सञ्जीवक चूर्णं के प्रयोग से सचेष्ट करने का वर्णन है । अल्पो महान् वा क्रियया विना यः समुच्छ्रितः पाकमुपैति शोफः । विशालमूलो विपमो विदग्धः सकृच्तां यात्यवगाढदोषः ॥ १६ ॥

उत्पन्न हुआ छोटा अथवा बड़ा शोफ आलेपनादि क्रिया के बिना बढ कर पाक को प्राप्त होता है । इस प्रकार का शोफ विशाल मूल, विषम और विदग्ध हो कर उसका दोष ( पूय ) अवगाढ ( गहरे ) स्थान में स्थित हो जाता है जिससे वह कृच्छ्रसाध्य हो जाता है ॥ १ ९

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सुश्रुतसंहिता । ७४

अष्टादशोऽध्यायः ।

आले पवित्रावणशोधनैस्तु । अथातो व्रणालेपनबन्धविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥

सम्यक् प्रयुक्तैर्य दि नोपशाम्येत् यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

पच्येत शीघ्र सममल्पमूलः पिडित पर चोन्नतः स्यात् ॥ २० अब इसके अनन्तर व्रण के आलेपन और बन्धन की विधि इनके ठीक तरह से | को बताने वाले अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भग आलेप, रक्तस्त्रावण और संशोधन न हो तो वह समान वान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत को कहा था ॥ १-२ ॥ प्रयुक्त करने पर भी यदि शोफ का शमन के रूप में आप आद्य उपक्रमः, एप सर्वशोफानां सामान्यः तथा अल्पमूल वाला शोफ पिण्डित या गोलाकार ऊपर को उठ कर शीघ्र ही पक जाता है ॥ २० ॥ प्रधानतमश्च तं च प्रतिरोगं वक्ष्यामः । ततो बन्धः

प्रधानं, तेन शुद्धिर्व्रणरोपणमस्थिसन्धिस्थैर्य च ॥ ३ ॥

कक्षं समासाद्य यथैव वह्नि आलेत सबसे आद्य ( प्रथम ) उपचार है । यह सर्वप्रकार वीरितः सन्दहति प्रसह्य । केशोफों में सामान्य है तथा अधिक प्रधान है । इसका तथैव पूयोऽप्यविनिःसृतो हि विवेचन प्रत्येक रोग के वर्णन के समय किया जायगा । आलेप मांसं सिराः स्नायु च खादतीह ॥ २१ ॥ के पश्चात् बन्ध की प्रधानता होती है । नन्धन से व्रण का शोधन,

जिस प्रकार वायु से प्रेरित या प्रदीप्त अग्नि तृणसमूह को प्राप्त कर उसे वलात् जला देती है उसी तरह शरीर या शोफ-युक्त स्थान से पूय को न निकालने से वह वहां के मांस, सिरा और स्नायुओं को नष्ट कर देता है ॥ २१ ॥

आदौ विमानं कुर्याद् द्वितीयमवसेचनम् ।

तृतीयमुपनाहञ्च चतुर्थी पाटनक्रियाम् ॥ १८ ॥

पञ्चमं शोधनं कुर्य्यात् षष्ठं रोपणमिष्यते ।

एते क्रमा व्रणस्योक्ताः सप्तमं वैकृतापहम् ॥ १६ ॥ ।

इति श्री सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आमपकैषणीय-विधिर्नाम सप्तदशोऽध्यायः । सर्वप्रथम - विम्लापन, द्वितीय - पूयादि का अवसेचन, तृतीय-उपनाह, चतुर्थी - पाटन क्रिया, पञ्चम - शोधन, पष्ठ - रोपण और सप्तम - विकृतिहरण प्रयोग ये व्रणशोफ के सात उपक्रम हैं २२-२३ विमर्श. - यद्यपि सुश्रुत चिकित्सा स्थान प्रथम अध्याय में व्रण शोफ के साठ उपक्रम बताये है किन्तु उनमें जो प्रधान हैं उनका यहा सक्षेप में वर्णन किया गया है । विम्लापनविधि -रोपण और अस्थि तथा सन्धियों की स्थिरता होती है ॥ ३ ॥

तत्र प्रतिलोममा लिम् पेन्नानुलोमम् । प्रतिलोमे हि सम्यगौषधमवतिष्ठतेऽनुप्रविशति रोमकूपान् स्वेदवाहि-भिव सिरामुखैर्वीर्यं प्राप्नोति ॥ ४ ॥

हमेशा आप को प्रतिलोम अर्थात् वालों के रुख की विरुद्ध दिशा में लगाना चाहिये, अनुलोम नहीं लगाना चाहिये । प्रतिलोम भालेप लगाने से औषध अच्छी प्रकार वहां लगी रहती है, रोमकूपों में प्रवेश करती है एवं स्वेदवाहक स्रोतस तथा सिरामुखों द्वारा भीतर जाकर बलवान् होती है ॥ ४ ॥

न च शुष्यमाणमुपेक्षेत, अन्यत्र पीडयितव्यात् ।

शुष्को ह्यपार्थको रुक्करश्च ॥ ५ ॥

जहां पर व्रणशोफ में पीडनकार्य करना अभीष्ट हो उसको छोड़कर अन्य शोफ में प्रयुक्त आलेप को सूखने नहीं देना चाहिये क्योंकि शुष्क आलेप निरर्थक और पीडा करनेवाला होता है ॥ विमर्शः --- पीडनाशोफा - पूयगर्भानणुद्वारान् व्रणान् मर्मंग -| तानपि । यथोक्ते पीडनद्रव्ये. समन्तात् परिपीटयेत् ॥ शुष्यमाणमु-पेक्षेत प्रदेह पीडनम्प्रति । न चाभिमुखमालिम्पेत्तथा दोष प्रसिच्यते ॥ | आलेपभेदा. - स्नैहिको निर्वापण, प्रसादन, स्तम्भन, विलायन., पाचन, पीडन, शोधन, रोपण, सवर्णीकरणश्च । ( अ ० सं ० ) शुष्का-अभ्यज्य स्वेदयित्वा तु वेणुना वा शनै शने । निर्मर्दयेद् भिषक् लेपदोषा - शुष्क हि दाहोपारागश्यावत्वशूलानि वर्धयति ' ( सु ० उ ० ) ।, प्राज्ञस्तलेनाङ्गुष्ठकेन वा ॥ इनमें अपतर्पण से विम्लापनान्त ६ उप-क्रम समाविष्ट हो जाते हैं । अवसेचन- दोषों का निर्हरण, इसमें स त्रिविध: - प्रलेपः प्रदेहः, आलेपश्च । तेषाम-विस्रावण, स्नेहन, वमन और विरेचन ये चार समाविष्ट होते न्तरं - प्रलेपः शीतस्तनुरविशोपी विशोषी च; प्रदेहस्तूष्णः हैं । उपनाह को पोल्टिस ( Poultice ) कहते हैं, इसमें पाचन शीतो ना बहलोऽबहुर विशोषी च । मध्यमो ऽत्रालेपः ॥६ ॥

का समावेश है । पाटन क्रिया में छेदन से सीवन तक के नौ प्रलेप, प्रदेह और आप भेद से वह लेप तीन प्रकार का होता उपक्रमों का समावेश है । शोधन और रोपण में सन्धान से घणधूपन तक के तेरह उपक्रम तथा वैकृतापह में उत्सादन से रक्षाविधान तक के शेप २६ उपक्रम समाविष्ट होते हैं । इत्यायुर्वेदतत्त्वसंदीपिकाभापायामामपक्वैषणीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

है । उनमें भेद निम्न प्रकार से हैं । प्रलेप ठण्ढा, पतला तथा अपी. दयितन्य व्रण में नहीं सूखने वाला होता है । प्रदेह की भोषधियों को पानी के साथ पीसकर गरम करके बात और कफ प्रधान शो में प्रयुक्त करते हैं तथा पित्त और रक्त प्रधान में शीत

। तथा मोटा या पतला तथा अधिक न भूखनेवाला लेप करते हैं ।

आलेप प्रलेप और प्रदेह के मिले हुये लक्षणों वाला होता है ॥ ६ ॥

तत्र, रक्तपित्तप्रसादकृदालेपः । प्रदेहो वातश्लेष्म-

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श्रध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् । ७५ प्रशमनः सन्धानः शोधनो रोपणः शोफवेदनापहा, तस्योपयोगः क्षताक्षतेषु । यस्तु क्षतेषूपयुज्यते स भूयः कल्क इति संज्ञां लभते निरुद्धालेपनसंज्ञः तेनास्राव-सन्निरोधो मृदुता पूतिमांसापकर्षणमनन्तर्दोषता व्रण शुद्धिश्च भवति ॥ ७ ॥ १

इनमें आप रक्तपित्त प्रधान शोथ का शमन करता है । प्रदेह बात और श्लेष्म प्रधान शोथ का शामक, शोधक, रोपक तथा शोथ और वेदना को नष्ट करता है । उसका प्रयोग व्रणयुक्त शोथ तथा अन्रणयुक्त दोनों में होता है । जिसको क्षत ( घाव ) में प्रयुक्त करते हैं उसे प्रायः कल्क तथा निरुद्धालेपन भी कहते हैं । इससे स्त्राव का निरोध, स्थान का मृदु होना, सड़े गले • मांस का नाश होकर व्रण की भीतरी निर्दोषता ( पूयाभाव ) होकर शुद्धि होती है ॥ ७ ॥

विमर्शः - अष्टाङ्गसग्रहकार ने तो प्रलेपादिकों की परिभाषा सुश्रुत से विरुद्ध की है । " यस्तु शीतस्तनुर्मुहुर्मुहुश्च प्रयुज्यते स प्रदेहो रक्तपित्तत्वचा प्रसादकृत् । प्रलेपस्तूष्ण शीतो वा बहुलश्च तथा वातश्लेष्मप्रचमन ' ॥ ”

विदग्धेषु शोफेषु हितमालेपनं भवेत् ।

यथास्वं दोषशमनं दाहकण्डूरुजापहम् ॥ ८ ॥

त्वक्प्रसादनमेवाग्यं मांसरक्तप्रसादनम् ।

दाहप्रशमनं श्रेष्ठं तोदकण्डूविनाशनम् ॥ ६ ॥

मर्मदेशेषु ये रोगा गुह्येष्वपि तथा नृणाम् ।

संशोधनाय तेषां हि कुर्यादालेपनं भिषक् ॥ १० ॥

षड्भागं पैत्तिके स्नेह चतुर्भागन्तु वातिके ।

अष्टभागन्तु कफजे स्नेहमात्रां प्रदापयेत् ॥ ११ ॥

अविदग्ध शोफ की अवस्था में आलेपन हितकारक होता है तथा शोफों के भिन्न २ दोषों का शमन करता है एवं दाह, कण्डू और रुजा को नष्ट करता है । त्वचा को शुद्ध करने में प्रधान है । मांस और रक्त को भी शुद्ध करता है । दाह का शमन करता है इसके अतिरिक्त सूई चुभोने की सी पीड़ा और कण्डू को शान्त करता है । मनुष्यों के मर्म स्थानों पर तथा गुह्य स्थानों पर जो रोग होते हैं उनकी शुद्धि या शमन नहीं निकलने से विकार की वृद्धि या अन्य रोग की प्रवृत्ि न हो जाय अतः रात्रि में आप का निषेध है ॥ १३ ॥

विमर्श: -- आलेपस्य रात्री निषेध -तमसा पिहितो ह्यूष्मा । रोमकूपरनावृतै । लेपाद्विनैव निर्याति रात्रौ नालेपयेदत. ॥

प्रदेहसाध्ये व्याधौ तु हितमालेपनं दिवा ।

पित्तरक्ताभिघातोत्थे सविषे च विशेषतः ॥ १४ ॥

न च पर्युषितं लेपं कदाचिदवचारयेत् ।

उपर्युपरि लेपं तु न कदाचित् प्रदापयेत् ॥ १५ ॥

ऊष्माणं वेदनां दाहं घनत्वाज्जनयेत् स हि ।

न च तेनैव लेपेन प्रदेहं दापयेत् पुन ' ॥

शुष्कभावात् स निर्वीर्यो युक्तोऽपि स्यादपार्थकः ॥१६ ॥

प्रदेह के द्वारा साध्य रोगों में तथा अधिकतया पित्त, रक्त | या रक्तपित्त, अभिघात और विषजन्य रोगों में दिन के लेप लगाना हितकारक होता है । पर्युषित अर्थात् पूर्व दिन पिसा हुआ लेप दूसरे दिन नहीं लगाना चाहिये । इसी तरह प्रथम आलेप को विना हटाये उसी पर दूसरा आलेप नहीं चढ़ाना चाहिये क्योंकि लेप पर लेप लगाने से लेप मोटा या घन हो जाता है जिससे उस स्थान में गरमी, वेदना और दाह को उत्पन्न करता है । प्रथम वार लगाने से बचे हुये लेप को कालान्तर में दूसरी बार नहीं लगाना चाहिये क्योंकि वह शुष्क होने से निर्वीर्य हो जाता है जिसे लगाने पर भी कोई कार्य सिद्धि नहीं होती है ॥ १४- १६ ॥ विमर्श: - डाक्टरी में स्थानिक शोफ के शमन के लिये ( Poste, Pigment or Paint, and Plaster ) का उपयोग होता है । इसके सियाय भीतर में पूर्यानिर्माण को रोकने के लिये सेप्टेनीलेम, सल्फाडायजिन, सल्फाट्राइड या सीवाझोल इनमें से किसी एक औषध की एक २ छोटे को तथा दो दो टिकिया बड़े को दिन में तीन बार पानी के साथ देते हैं । अत ऊर्ध्वं व्रणबन्धनद्रव्याण्युपदेदयामः । तद्यथा-क्षौमकार्पासाविकदुकूलकौशेयपत्रोर्णचीनपट्टचर्मान्तर्वल्क-लालावूशकललता विदुल रज्जुतूल फलसन्तानिका लौहा-नीति; तेषां व्याधिं कालं चावेक्ष्योपयोगः; प्रकरणतश्चै-॥ १७ ॥

करने के लिये आलेपन करना चाहिये । पित्तजन्य शोफ केषामादेशः अब यहाँ से व्रण के ' बन्धन ' द्रव्यों का उपदेश किया जाता आप में छठा भाग, वातिक में चतुर्थ भाग और कफजन्य शोथ आठवाँ भाग स्नेह का प्रयुक्त करना चाहिये ॥८–११ ॥ तस्य प्रमाणमार्द्रमाहिषचर्मोत्सेधमुपदिशन्ति ॥१२ ॥

उक्त आलेप की मोटाई भैंसे के गीले धर्म के बराबर होती है ॥ १२ ॥

विमर्श - चरके तु " त्रिभागाङ्गुष्ठमात्रः स्यात्प्रलेपः करक-पेषित ” ॥ न चालेपं रात्रौ प्रयुञ्जीत, मा भूच्छैत्यपिहितोष्म णस्तदनिर्गमाद् विकारप्रवृत्तिरिति ॥ १३ ॥

आलोप को रात्रि के समय नहीं लगाना चाहिये क्योंकि आलेप की शीतलता से रुकी हुई उस स्थान की उष्णता के । है, जैसे क्षौम ( शण से बना ), रुई, भेड़ की ऊन से बना हुआ, दुकूल ( पट्ट वस्त्र ), कोशाकार कृमि से बनाया रेशम, | पत्रोर्ण ( टसर ), चीन देश में बना हुआ पट्ट ( वस्त्र ), हरि णादि का चर्म, भूर्जपत्र, गूलर आदि वृक्षों की अन्तर्छाल, तुम्बी का टुकड़ा, लता ( वेलड़ी ), विदल ( बांस की खपची ), रस्सी, तूल फल, सन्तानिका ( मलाई ), स्वर्ण, रजत, तात्र, लोह आदि । व्याधि और काल का विचार करके इनका उप-योग करना चाहिये । इनका विशेष उल्लेख प्रकरणानुसार होगा ॥ १७ ॥

विमर्शः -- प्रकरणानुसार इनका उपयोग जैसे सर्पदंश में रज्जु - सा तु रज्ज्वादिभिर्वद्धा विपप्रतिकरी मता । अन्तर्वल्कलों का का कुशार्थं प्रयोग -- मधूकोदुम्बराश्वत्थपलाशककुमत्वच । वशसर्ज-

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III सुनतसहती | बवाना बुचार्थमुपसंहरेत् ॥ चपयोग - चनंगा गोफणावन्यः काय यो वा हितो भवेत् । तत्र कोशदामस्त्रस्तिकानुवेल्लित ( मु ) तोलीमण्डल-स्थगिकायमकखट्वाचीनविबन्धवितानगोफणाः पञ्चाङ्गी चेति चतुर्दश बन्धविशेषाः । तेषां नामभिरेवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ १८ ॥

कोश, दाम, स्वस्तिक, अनुवेलित, प्रतोली, मण्डल, स्यागिका, चमक, चट्वा, चीन, विवन्ध, वितान, गोफण और पञ्चाङ्गी ये चौदह बन्धविशेप हैं । प्रायः इनके नाम से ही इनका स्वरूप या रचना स्पष्ट है ॥ १८ ॥

विमर्श: - वाग्भट ने उत्सङ्ग नामक एक अधिक बंध माना है । । वन्ध को वेण्डेज ( Bandage ) कहते हैं । आज कल बन्धनों को संख्या इन पन्द्रह से भी अधिक है जिनका स्थानानुसार नाम रखा गया है । चतुर्दशानां दक्षगान -पूरविलपन्ननियने कोशराकृतिः । कोशकालय ' सविशेयो वैचैवेन्येन वर्जितान् ॥ दानावनिं चतुष्पादा दानाय स्वस्तिकं पुन । निसी पचायवेष्टय बध्यते ॥ अनुवेल्लित तद्विद्यान्नु छोटीगं । हनुं टिकारी जावद, बहुरन्यक ॥ मुतोटी-बन्धनात् उद्यान्नग्नन ऋणु । गोतुण्डिका चाटनी ता यि ॥ नाकारं विद्यान्नण्डटास्यके | मैप-जादिभिर्य न्यमित्रा पट्टन च ॥ बध्यने मण्डलाकारो यमत्रण-यौन्नु न. 1 वन्य यमकनामानं मिपतो वर्तयन्ति तन् ॥ खवा तु बहुपाडा न्याचिगमित्र हुमिना । चीनवन्ध विजानीयाश्चिरामिव-निर्वृतम् ॥ वन्यविदियो बन्ध सच पडूनन्यिकायुनः । ज्ञेयो दिनान्नदन्तु विज्ञानानाम्युन || पापा कोन्क्षेपकारिणां गो • विदुनामि कुर्यात् फलस्य पत्रिभि । पा गन्तु युन्पद बन्धनाय नमः ॥ तत्र कोशमनुष्टानुलिपर्वसु विदध्यात् । दाम सम्बा-as | सन्धिन्तनान्तरत कर्णेषु स्वस्तिकम् | अनुवेल्लितं तु शाखासु । श्रीवामेढ्योः प्रतोलीम् । वृत्ते-ने मण्डलम् । श्रष्टाङ्गुलिमेायेषु स्थगिकाम् । यम-लनगयोर्यमकम् । हनुशहूगण्डेषु खट्वाम् । अपाङ्गन्यो-चीनम् । पृष्टोदरोरःसु विबन्धम् । मूर्द्धनि वितानम् । चिवुकनासोष्ट्रांसवस्तिपु गोफगाम् । जत्रुण ऊ पञ्चा ङ्गीमिति । यो वा चस्मिन् शरीरप्रदेशे सुनिविष्टो भवति तं तस्मिन् विध्यात् ॥ १६ ॥

अष्ट और अत्रुटियों के पोरवों atra वांधना चाहिये । साध ( वग या एंटनयुक्त ) अङ्ग में दामबन्ध सन्धि, कूर्वक, नू, स्तनों के मध्य, हस्ततल, पादतल और कर्म में म्यनिबन्ध, शाखाओं में अनुवेस्टित, प्रीचा और में प्रनोडी, गोड अों में नग्ट, अनुष्ट, अगुलि और लिङ्ग मेढ़ इनके अग्र भागों पर स्युगिन्, पार्श्ववति दो व्रणों में यम-पन्थ, टोटो, कनपट्टी और कपोल पर वादन्य, अपाङ्गप्रदेश | में चीन्ग्न्थ, पीठ उदर और चक्षःस्थल पर विदन्यबन्ध, सिर पर चिवालय, टोटी की नोक, नामिका, होट, कन्व और यस्तिप्रदेश में गोफ्याल्न्य तथा जत्रु ( इसली ) के ऊपर पन्ना दोन बांधना चाहिये । अथवा चैद्य अपनी बुद्धि के अनुसार | जो वन्ध जिस बांधना चाहिये विमर्श -आघात, चोट, सन्धिविश्लेप ( वश्यक होता है नहीं आती है प्रदेश में उपयुक्त बंध सके उसे उसी प्रदेश में ॥ १ ९ ॥ धनकर्म को ( Bandaging ) कहते हैं । मोच, रक्तस्राव, अस्थिभङ्ग, ( Fracture ), Distocation ) आदि में बन्धन बांधना अत्या । बन्धन बांधने की विधि केवल पढ़ने से । पहले पुस्तमय पुरुषों ( Damy ) पर यह सीखते थे परन्तु अपने सहपाठियों पर प्रथम अभ्यास कर पश्चात् होस्पिटलों में आने वाले रोगियों पर बांधना चाहिये । आयुर्वेद के इन चौदह बन्धनों से पता चलता है कि पूर्व काल में उसका शल्यविभाग पर्याप्त उन्नत था । तल वस्ति कर्ण, अंस पर्व स्तन शिश्नाम स्थान,, बाहु, गण्ड छाती, भोष्ठ ऊपर शाखा,,, के भङ्गुली , कूर्चक , लिङ्ग , ऊरु , भगुलि , व्रण शत्रु अपाङ्ग उदर नासा , ,,, ज अङ्गुष्ठ सम्बाधाङ्ग सन्धि हस्तपाद ग्रीवा उदर अगुष्ठ संयुक्त छत्रु नेत्र पीठ शिर ठोखी बाहु नाम. B. ०मं Bandage Spion or Bandage Sheath Cross Spical Bandage T ' B. B. or,B. B. Bandage tailed tailed Bandge Sling Bandage Stump Four Eye Many Ouphelane Sling Arm बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध बन्ध नाम वन्ध कोशबन्ध १ दामबन्ध २ स्वस्तिक अनुवेलित मुत्तोली मण्डल ६ स्थगिका यमक 4 खट्चा ९ चीन विबन्ध वितान गोफणा पचड़ी उरसङ्ग यन्त्रणमूर्ध्वमधस्तिर्यक् ७ च || २० १० || ११ १२ १३ १४ १५ वन्धन की यन्त्रणा अर्थात् गांठ ऊपर, नीचे और तिरछी लगानी चाहिये ॥ २० ॥।

विमर्श: - जहां पर व्रण हो उसके ऊपर, नीचे या तिरछी गांठ लगावें । उस पर गांठ लगाने से घण में बाधा होती है । वर्तमान में Eafety Pan का उपयोग होने से सुविधा हो गई है । aari कलिकां दत्त्वा चामहस्त परिक्षेपमृजुम-नाविद्धमसहूचितं मृदु पट्टं निवेश्य बध्नीयात् । न च नगस्योपरि कुर्य्याद् ग्रन्थिमाचाधकरं च ॥ २१ ॥

प्रथम स्थान पर मोटी कवलिका रख कर वामहस्त में लिये हुये पट्ट को दक्षिण हस्त से सीधा, मोढ़ के बिना एवं ठीक तरह से फैलाकर बांध देना चाहिये । व्रण के ऊपर पीडा

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श्रव्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् । ७७

या बाधा पहुंचाने वाली ग्रंथि नहीं लगानी चाहिये ॥ २१ ॥

न च विकेशिकोषवेऽतिस्निग्धेऽतिविषमे वा कुर्त्रीत | यस्मादवित्नेहात् क्लेदो, रौक्ष्याच्छेदो, दुर्ज्या -सादू ब्रगवर्त्मावघर्षणमिति ॥ २२ ॥

विकेशिका तथा औषध अधिक स्निग्ध, अधिक रूह और विषम नहीं होने चाहिये । क्योंकि इनके अतिस्निग्ध होने से कीचड़, रूत्र होने से व्रण फट जाता है तथा विषम रखने से अग के मार्ग में वर्ष होता है ॥ २२ ॥

विमर्श. — विकेशिन को बर्नि कहते हैं । बारीक खाली ( Gauze ) को जन्तुन्न द्रव्य के घोल में भिगो कर व्रण में रखते हैं । इसके रखने से व्रण की शुद्धि होती है, ऋण के पूत्र को यह वर्ति सोख लेती है तथा are a के किनारों को आपस में न मिलने देने से वे जुड़ते या धपकते नहीं हैं । आयुर्वेद भी इसका इतना ही महत्त्व मानता है । " स्वयं साशये व्रने विकेशिकां दद्यात् ' ( अ ० [ सं ० ) । सविनास सोनई सुगतिं पूयगमिंगम् । वयं विशेोधये स्थिता विकेशिका । ( वाग्भट ) । कवर्ति दोषाः नच विकेशिकामयं वाति-लिग्मरुचमतिल्यनविगाहमणं दुतं वा दद्यात् । अतिलय-त्वादपरिशुद्धिः, गाढद्वया संरन्भः, अदलच्णलाइ क्रंगवलपवर्षणम् । तत्र त्रगायतनविशेषाद्बन्धविशेषस्त्रिविधो भवति -गाढः समः, शिथिल इति ॥ २३ ॥

व्रण के आयतन ( स्थान, दोष, काल ) की विशेषता से बन्व की भी गाठ, सम और शिथिल ये तीन विशेषताएं होती हैं ॥ २३ ॥

पीडयन्नरुजो गाढः सोच्वासः शिथिलः स्मृतः ।

नैत्र गाढो न शिथिलः समो बन्धः प्रकीर्तितः ॥ २४ ॥

जो व दबाने से पीड़ा नहीं करे उसे गाव कहते हैं, तो बन्ध रोगी के सांस लेने से हिले उसको शिथिल कहते हैं और जो न गाटा हो तया न मिथिल हो उसे समबन्ध कहते हैं ॥ २१ ॥

तत्र, स्फिकुक्षिकचावङ्खगोरुशिर ' सु गाढः । शाखा-वदनकर्गकण्ठनेदमुष्कष्टपार्श्वोदरोरस्सु समः । अक्ष्णोः सन्विषु च शिथिल इति ॥ २५ ॥

स्थानानुसार बन्ध - वैशिष्टधु – नितम्ब, दुचि, कत्ता ( बाहु-मूल ); वंत्रण सन्धि, ऊरु और शिर इन स्थानों में गाढ बन्ब, हाय, पैर, सुख, कान, कण्ठ, लिङ्ग, वृषण, पीट, पार्श्व, उदर, छाती इन स्थानों में सनबन्ध तथा नेत्र और सन्धि स्थानों में शिथिलबन्ध बांधना चाहिये ॥ २४ ॥

तत्र पैत्तिकं गाढस्थाने समं बन्नीयात्, समस्थाने शिथिलं, शिथिलस्थाने नैत्रः एवं शोणितदुष्टं च । श्लैष्मिकं शिथिलस्थाने समं, समस्थाने गाढं, गाढस्याने गाढतरम्; एवं वातदुष्टं च ॥ २६ ॥

दोषानुसार दन्यवैशिष्टयपंचिक वर्गो में जहां गाय लगाना हो वहां वन्य वांधे, सनवन्ध लगाना हो वहां शिथि टबम्ब लगात्रे तथा जहां शिथिलदन्द बांधने का विधान हो उस स्थान को खुला ही रखना चाहिये । इसी प्रकार का नियम रक्त की दृष्टि से उत्पन्न व्रग में भी जानना चाहिये । कन से दूषित व्रणों में जहां शिथिवन्ध बांधने का नियम हो वहां सुनबन्ध, समस्थान में गाइबन्ध और गाढबन्ध बांधने की जगह अत्यन्त गाढवन्ध लगाना चाहिये । कफ के व्रण के अनु. सार ही वावदुष्ट व्रग में बन्धन बांधना चाहिये ॥ २६ ॥

तत्र पैत्तिकं शरदि ग्रीष्मे द्विरहो बन्नीयात् । रक्तोपद्रुतमप्येवम् । श्लैष्मिकं हेमन्तवसन्तयां यहाद्वा-तोपद्रुतमप्येवम् । एवमभ्यूझ बन्धविपर्य्ययं च कुर्यात् ॥ कालानुसार बन्धवैशिष्ट्य - पित्तदृष्टि से उत्पन्न व्रण को शरद तथा ग्रीष्म ऋतु में दिन में दो वार सुबह शाम बांधना चाहिये । इसी प्रकार रदुष्टि जन्य व्रग में भी दो वार बांधे । कफ को दृष्टि से उत्पन्न व्रण को हेमन्त तथा बसन्त ऋतु में वीसरे दिन खोल कर बांधना चाहिये । वायु से दूषित व्रण का भी इमी नियमानुसार वन्धन करना चाहिये । इस तरह स्थान, दोष और काल का विचार करके बन्धनविधि में र्यय करना चाहिये ॥ २७ ॥

तत्र समशिथिलस्थानेषु गाढं बद्धे विकेशिकौषध-नैरर्थक्यं शोफवेदनाप्रादुर्भावश्च, गाढसमस्थानेषु शिथिलं बद्धे विकेशिकोपधपतनं पट्टसञ्चाराद् व्रणव-मवघर्षणमिति । गाढशिथिलस्थानेषु समं बद्धे च गुणाभाव इति ॥ २८ ॥

यदि सम और शिथिल बन्धन बांधने की जगह गाढ बन्च बांधा जाय तो विकेशिका ( वर्ति ) तथा औषध निरर्थक हो जाती है तथा व्रण स्थान में शोफ और वेदना होती है | गाढ और समबन्ध के स्थान में यदि शिथिल बन्ध बांधा जाय तो | वर्ति तथा नौषध गिर जाती है तथा पट्ट के इधर उधर खिस-क्ते रहने से व्रण के म में वर्षण होता है । इसी तरह गाढ, शिथिल बन्ध के स्थानों में सम्बन्ध बांधने से कोई गुण नहीं होता है ॥ २८ ॥

अविपरीतबन्धे वेदनोपशान्तिरसृक्प्रसादो मार्दवं च ॥ यदि वन्धन अनुकूल बांधा जाय तो वेदना का शमन, रक की शुद्धि तथा व्रण स्थान में मृदुता उत्पन्न होती है ॥२ ९ ॥ अन्यमानो दंशमशकतृणकाष्टोपलपांशुशीतवाता-तपप्रभृतिभिर्विशेपैरभिहन्यते त्रगो विविधवेदूनोपद्रुतश्च दुष्टतामुपैत्यालेपनादीनि चास्य विशोषमुपयान्ति ॥ ३० ॥

यदि व्रण पर बन्धन नहीं बांधा जाय तो मक्षिका, मच्छर, घास, लकड़ी, पत्थर के कम, धूली, ठग्नक, वायु, धूप आदि से लग दूषित होता है तथा अनेक प्रकार की वेदनाओं से उपद्रुत होकर अधिक दूषित हो जाता है तथा उस पर लगाये हुए आलेपादिक जल्दी सूख जाते हैं ॥ ३० ॥

चूर्णितं मथितं भग्नं त्रिश्लिष्टमतिपातितम् ।

अस्थिस्नायुसिराच्छिन्नमाशु वन्वेन रोहति ॥ ३१ ॥

सुखमेवं त्रगी शेते सुखं गच्छति तिष्ठति ।

। सुखं शय्यासनस्थस्य क्षिप्रं संरोहति त्रगः ॥ ३२ ॥