श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 151–160
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 151–160
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सुश्रुतसंहिता । ६५ विषजुष्टानां शोषिणां मधुमेहिनाम् | की हुई उचित चिकित्सा याप्य रोग से पीड़ित रोगी को कुष्ठिनां व्रणाः कृच्छ्रेण सिध्यन्ति येषां चापि ऋणे व्रणाः ॥ ७ ॥ ।
कुष्ठसे पीड़ित, विपों से व्याप्त, शोप रोगी और मधुमेह रोग वाले मनुष्यों के व्रण कृच्छ्रता से सिद्ध होते हैं तथा जिनके व्रण में ही व्रण उत्पन्न होते हैं वे भी कृच्छसाध्य होते हैं ॥ ७ ॥
/ विमर्शः - कुष्ठ में कुष्ट के ( Baonllus laprs ) जीवाणु स्वचा, मांस, रक्त और लसीका का तथा विप शरीर की स्थानिक ar की धातुओं का नाश करने से, शोप में रक्त मांसादि धातु के पूर्ण न बनने से तथा मधुमेह में ओज ( Sugar ) का नाश । होते रहने से ऋण शीघ्र नहीं भरते हैं अतः व्रणोपचार के साथ २ उन उन रोगों की चिकित्मा भी करते रहना अत्या. वश्यक है । फिरङ्ग ( Syphilis ) की मुख्य चिकित्सा करने से उसके चण शीघ्र भरते हैं । अवपाटिकानिरुद्धप्रकशसन्निरुद्धगुढ जठरग्रन्थितः तक्रिमयः प्रतिश्यायजाः कोष्ठजाश्च त्वग्दोपियां प्रमेहिणां वा ये परिक्षतेषु दृश्यन्ते । शर्करा सिकतामेदो वात-कुण्डलिकाऽष्ठीला दन्तशर्करोपकुशः कण्ठशालूकं निष्कोषणदूपिताश्च दन्तवेष्टा विसर्पास्थिक्षतोरः क्षत-व्रणप्रन्थिप्रभृतयश्च याप्याः ॥ ८ ॥
अचपाटिका, निरुद्वप्रकश, सन्निरुदगुद्, जटर के रोग, प्रन्थिक्षत, कृमि, प्रतिश्याय, कोष्ठगत कृमि, स्वग्रोग तथा प्रमेह से युक्त रोगियों के व्रणगत कृमि, शर्करामेह, सिकतामेह, वातकुण्डलिका, अष्ठीला, दन्तशर्करा, उपकुश, कण्ठशालक, दांतों को कुचरने से दूषित दन्तमांस, विसर्प से उत्पन्न अस्थिक्षत, उरःक्षत और व्रणग्रन्थि प्रभृति से उत्पन्न व्रण याप्य होते हैं ॥ ८ ॥
साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्याश्वासाध्यतां तथा ।
नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ॥ ६ ॥
जो मनुष्य अपने रोग या व्रण को चिकित्सा नहीं करते हैं उनके साध्य व्रण याप्य हो जाते हैं, याप्य व्रण असाध्य जाते हैं तथा असाध्य व्रण उस रोगी के प्राणों का नाश कर देते हैं ॥ ९ ॥
विमर्श: - एम्यस्तु सलु हेतुभ्यः किञ्चित्साध्यं न सिद्ध्यति । प्रप्योपकरणाभावाद्दौरात्म्याद्वैद्यदोपत || कर्मतश्च साध्यत्व कश्चि-द्रोगोऽतिवर्तते । सन्ति होवविधा रोगा साध्या दारुणसम्मता. ॥ ये इन्युरनुपक्रान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः ॥ ( चरक ) ।
थापनीयं विजानीयात् क्रिया धारयते तु यम् ।
क्रियायां तु निवृत्तायां सद्य एव विनश्यति ॥ १० ॥
प्राप्ता क्रिया धारयति याप्यव्याधितमातुरम् ।
प्रतियदिवागारं विष्कम्भः साधुयोजितः ॥ ११ ॥
या ( चिकित्सा ) जिस रोगी को उस रोग से अधिक पीड़ित न होने देती हो तथा धारित किये रहे किन्तु उस चिकित्सा के छोड़ देने पर रोगी शीघ्र मर जाता हो उस जिलाये ( धारण किये ) रखती है ॥ १०-११ ॥ विमर्श: - कुछ आयु के शेष रहने पर तथा जिसे कर्मफल भोगना हो उसे याप्य रोग होता है । शेषलायुषो याप्यमसाध्य पथ्यसेवया । लब्धात्पमुसमस्येन हेतुनाऽऽशु प्रवर्तकम् ॥ याति नाशेपता रोग. कर्मजो नियतायुप | प्रपतन्निव विष्कम्भयते-धातुरो द्विते ॥ ( अ ० सं ० ) । अत ऊदुर्ध्वमसाध्यान् वच्यामः- मांसपिण्डवदु-द्वताः प्रसेकिनोऽन्तः पूयवेदनावन्तोऽश्वापानवदुदुवृत्तौ-ष्टाः । केचित् कठिना गोशृङ्गत्रदुन्नतमृदुमांसप्ररोहाः । अपरे दुष्टरुधिरास्राविणस्तनुशीतपिच्छिलात्राविणो वा मध्योन्नताः । केचिदवसन्नशुविरपर्यन्ताः शणतूलवत् स्नायुजालवन्तो दुर्दर्शनाः । वसामेदोमज्जमस्तुलुङ्गस्रा-विणश्च दोपसमुत्थाः । पीतासितमूत्रपुरीपवातवाहिनश्च कोष्टस्थाः । त एवोभयतोभागत्रणमुखेषु पृयरक्तनिर्वा-हिणः । क्षीणमांसानाञ्च सर्वतोगतयश्चाणुमुखा मांसवुद्-बुदवन्तः सशब्दवातवाहिनश्च शिरः कण्ठस्थाः । ची-णमांसानाञ्च पूयरक्तनिर्वाहिणोऽरोचका विपाककासश्वा-सोपद्रवयुक्ताः । भिन्ने वा शिरःकपाले यत्र मस्तुलुङ्ग -दर्शनं त्रिदो पलिङ्ग प्रादुर्भावः कासश्वासौ वा यस्येति ॥१२ ॥
Vara इसके अनन्तर असाध्य व्रणों का वर्णन किया जाता है । मांस के पिण्ड के समान ऊँचे उठे हुये, अधिक पूय रक्का दि को बहाने वाले, जिनके भीतर पूय भरा हो तथा वेदना होती हो, घोड़ी के भगोष्ठ के समान जिनके ओष्ठ ( किनारे ) ऊँचे उठे हो, कुछ कठिन, गौ के शृङ्ग समान ऊपर उठे मृदु मांसांकुरों वाले, दुष्ट रक्त स्राव वाले अथवा पतला, शीतल और पिच्छायुक्त स्त्राव वाले, मध्य में ऊँचे उठे हुये, जिनके किनारे नीचे और भीतर से हों तथा कमलनाल छिद्र के समान सुषिर पर्यन्त वाले शण के तूल ( गुष्ठ ) के समान स्नायुजाल वाले, देखने में खराब तथा वातादि दोपों के कारण वसा, मेद, मज्जा और मस्तिष्क के समान गृगले या धूसर वर्ण के स्राव वाले, कोष्ठगत व्रण जिनसे पीला, काला नाव बहता हो अथवा मूत्र, मल और वायु का वहन होता हो एव मुस, गुदा तथा व्रण से पूय और रक्त का स्राव होता हो ऐसे व्रण तथा क्षीण मांस वाले मनुष्यों के चारों ओर शरीर में फैलने वाले व्रण तथा छोटे मुख वाले व्रण एव जिनमें से मांस के बुदबुदे ( अङ्कुर ) निकलते हों ऐसे व्रण एवं शब्द के साथ वायु निकलने वाले शिर और कण्ठ में उत्पन्न व्रण, इसी प्रकार क्षीणमांस वाले मनुष्यों के पूय और रक्त का स्त्राव करने वाले व्रण तथा अरुचि, भविपाक, कास और श्वाम से उपद्रुत व्रण तथा शिर और कपाल में चोट लगने पर जहां मस्तुलुङ्ग ( Brain ) का कुछ हिस्सा निकल आवे एवं त्रिदोषों का प्रकोप हो जाय अथवा कास और श्वास चलने लगे इस प्रकार के व्रण असाध्य होते हैं ॥ १२ ॥
रोग को या जानो । जिस प्रकार ठीक रूप से लगाया हुआ विमर्श: - घोड़े के गुदीष्ट + या घोड़ी के योनि के ओष्ठ के खम्भा गिरते हुये मकान को रोक देता है उसी प्रकार प्रारम्भ | समान ऊँचे उठे हुये ( Elevated edges ) त्रण सार्कोमा तथा
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श्रध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् । केन्सर में होते हैं । असाध्यत्रणा ' - नैव सिद्ध्यन्ति वीसपंज्वराती-सारकासिनाम् । पिपासूनामनिद्राणाम् ॥ ( वाग्भट ) ।
भवन्ति चात्र ---वसां मेदोऽथ मज्जानं मस्तुलुङ्गं च यः स्रवेत् ।
आगन्तुस्तु व्रणः सिध्येन्न सिध्येद्दोषसम्भवः ॥ १३ ॥ ।
जिस आगन्तुक व्रण से वसा, मेद, मज्जा और मस्तुलुङ्ग का स्राव भी होता है तो भी ठीक हो सकता है किन्तु भीतरी वातादि दोषों की दृष्टि से उत्पन्न व्रण से वसा, मेद आदि निकले हों तो वह ठीक नहीं हो सकता है ॥ १३ ॥
मर्मोहिते देशे सिरासन्ध्यस्थिवर्जिते ।
विकारो योऽनुपर्येति तदसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १४ ॥
शिरा, सन्धि एवं अस्थि से रहित स्थान में उत्पन्न व्रण
तथा मर्मरहित प्रदेश में उत्पन्न व्रण चिकित्सा करने पर भी ।
ठीक न हो तो उसे असाध्य समझना चाहिये ॥ १४ ॥
क्रमेणोपचयं प्राप्य धातूननुगतः शनैः ।
न शक्य उन्मूलयितुं वृद्धो वृक्ष इवामयः ॥ १५ ॥
व्रणादिक कोई भी रोग क्रमशः उपचय को प्राप्त करता हुआ धीरे धीरे शरीर के गम्भीर धातुओं में फैलने लगता है तब वह बढ़े हुये वृक्ष की तरह सहसा नष्ट नहीं किया जा सकता है ॥ १५ ॥
स स्थिरत्वान्महत्त्वाच्च धात्वनुक्रमणेन च ।
निहन्त्यौषधवीर्याणि मन्त्रान् दुष्टग्रहो यथा ॥ १६ ॥
वह विकार स्थिर होने से, बढ़ जाने से तथा रक्त - मांस-मेद आदि गम्भीर धातुओं में प्रवेश करने से प्रयुक्त की हुई भोपधियों के प्रभाव को नष्ट कर देता है जैसे की शक्ति को नष्ट कर देता है ॥ १६ ॥
तो यो विपरीतः स्यात् सुखसाध्यः स अबद्धमूलः क्षुपको यद्वदुत्पाटने सुखः ॥ इस कारण श्लोकोक्क गुणों या लक्षणों से वाला रोग लुग्बसाध्य कहा जाता है जिस प्रकार उत्पन्न हुआ तुप ( छोटा पौधा ) जड़ के पृथ्वी दुष्टग्रह मन्त्रों
उच्यते ।
१७ ॥
विपरीत गुणों जमीन में तुरन्त में ज्यादा गई हुई न होने से उसे सुखपूर्वक उखाड़ा जा सकता है ॥ १७ ॥
विमर्शः -- सुससाध्यत्रणलक्षणम् - त्वमासन. सुखे देशे तरुण-स्यानुपद्रवः । धीमतोऽभिनवः काले सुखसाध्यः स्मृतो व्रण ॥ ( चरक ) । वृद्धरोगदुर्वारता - अणुर्हि प्रथम भूत्वा रोग पश्चाद्विवर्धते । स जात मूलो मुष्णाति वलमायु · सुदुर्मतेः ॥ यथा स्वल्पेन यत्नेन च्छिद्यते तरुणस्तरः । स एवातिप्रवृद्धस्तु च्छिद्यतेऽतिप्रयनत • ॥
त्रिभिर्दोपैरनाक्रान्तः श्यावौष्ठः पिडकी समः ।
श्रवेदन निरास्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ॥ १८ ॥
जो व्रण वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों से आक्रान्त न हो, जिसके ओष्ठ ( किनारे ) श्याब रह के हो, जिसमें छोटी छोटी पकाएं या मांसाकर दिखाई देते हों तथा जिसके सब भाग समान हों एवं वेदना तथा स्त्राव से रहित हो उसे शुद्ध कहते हैं ॥ १८ ॥
कपोतवर्णप्रतिमा यस्यान्ताः क्लेदवर्जिताः ।
स्थिराश्चिपिटिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ॥ १६ ॥
कबूतर के वर्ण के समान वर्णं वाला, तथा प्यादिस्राव से रहित, स्थिर और चिपिटिकाओं ( शुष्क सूक्ष्म श्वेत मृदु स्वचाओं ) से युक्त ये रोपित होते हुये व्रण के लक्षण हैं ॥ १ ९ ॥
रूढवर्त्मानमग्रन्थिमशूनमरुजं व्रणम् ।
त्वक्सवर्णं समतलं सम्यमूढं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥
जिसका मार्ग भर गया हो, जिसमें मांसादि की ग्रन्थियां न हों, चारों ओर जिसके सूजन न हो, पीड़ा से रहित, जिसको स्वचा अन्य स्वस्थ प्रान्त की स्वचा के समान वर्ण की हो गई हो और जिसका तलभाग भर कर वरावर हो गया हो उसे सम्यगुरूढ व्रण कहते है ॥ २० ॥
विमर्श: - आधुनिकों ने व्रण को तीन अवस्थाएं मानी हैं । प्रथमावस्था को दुष्टावस्था Stage of ulceration proper or extension कहते हैं । इसमें दोषों की प्रबलता, स्थानिक धातु नाश, दुर्गन्धयुक्त पूय - रक्तादि स्राव, व्रणोष्ठ मोटे तथा शोथ-युक्त, समग्र व्रण लाल सुर्ख तथा उसका तलभाग चिपका हुआ होता है । पूर्ति पूयातिदुष्टाक्लाव्युत्सङ्गी चिर स्थितिः । दुष्टो व्रणोऽ • । तिगन्धादिः शुद्धलिङ्गविपर्यय ॥ ( माधव ) । द्विनीयावस्था को शुद्धा • वस्था Stage of transition कहते हैं । इसमें दोषप्रावल्य, स्थानिक धातुविनाश तथा पुर्याादि स्त्रावनिर्गमन बन्द हो जाते हैं । व्रण गुलावी रङ्ग का स्वच्छ, स्वस्थ तथा तलभाग में छोटे छोटे मांस ( Granulations ) से युक्त दिखाई देता है । ' त्रिभिर्दोषैर नाक्रान्त. ' ये इसी के लक्षण हैं । अन्य लक्षण जैसे-जिह्यातलाभो मृदु. स्निग्ध इलक्ष्णो विगतवेदनः सुव्यवस्थितो निरा-स्रावश्चेति शुद्धी व्रण ' ( सुश्रुत ) । नातिरक्तो नातिपाण्डुर्नातिश्यावो न चातिरुक् । न चोत्सन्नो न चोत्सङ्गी शुद्धो रोप्य पर व्रणः ॥ ( चरक ) । तृतीयावस्था को रोहणावस्था Stage of repair कहते हैं इसका वर्णन कपोत वर्ण प्रतिमा आदि से किया गया है । इसमें रोहण धातु ( Granulation tissue ) अधिक वन । कर सारे तलभाग पर छा जाती है । व्रण का पृष्ठ प्रदेश मृदु, लाल तथा पीड़ा रहित होता है । स्पर्श से कुछ रक्त निकलता है । किनारे श्वेत, नील रक्तवर्ण व स्वस्थ होते हैं । व्रण की रूढा-वस्था में रोहणधातु का परिवर्तन तान्तव धातु ( Bibroocatrional tissue ) में हो जाता है जिससे एक पतला त्वचा का धर्म बन जाता है इसी को व्रणवस्तु ( Scar ) कहते हैं । व्रण-| परीक्षा में व्रण का तल ( Base ), पृष्ठ भाग ( Surface ), स्स्राव ( Discharge ), घणौष्ठ ( Edges घणान्त ( Margins ), धातु तथा व्रणस्थान इन सात का निरीक्षण करना अत्या-वश्यक है ।
दोषप्रकोपाद् व्यायामादभिघातादजीर्णतः ।
हर्षात् क्रोधाद्भयाद्वाऽपि व्रणो रूढोऽपि दीर्यते ॥ २१ ॥
इति सुश्रुतसहितायां सूत्रस्थाने कृत्याकृत्यविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
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१०० सुश्रुतसहिता । वात, पित्त, कफ दोषों के प्रकोप से, किसी प्रकार के परि
श्रम से, आघात से, अजीर्ण से, अधिक हर्प, क्रोध और भय ।
से रूढ या रोहित व्रण भी पुनः विदीर्ण हो जाता है ॥ २१ ॥
विमर्श: - लायुक्लेदात् सिराक्लेदाद् गाम्भीर्यात् कृमिमक्ष णात् । अस्थिभेदात्सशल्यत्वात्सविपत्वाच्च सर्पणात् ॥ नखकाष्ठप्रभे
दाच चर्मंलोमातिघट्टनात् । मिथ्यावन्धादतिस्नेह । दतिभे पज्यकर्पणात् ॥
अजीर्णादतिमुक्ताच्च विरुद्धासात्म्य भोजनात् । शोकाकोधाद्दिवास्व-प्नादयायामान्मैथुनाप्तथा ॥ ब्रणा न प्रशम यान्ति निष्क्रियत्वाच
देहिनाम् ॥ ( चरक ) । रूढेऽप्यनीर्णव्यायामव्यवायादीन् विवर्जयेत् ।
हृपं क्रोधं भयञ्चापि यावत्स्थैर्योपसम्भवात् ॥
इत्यायुर्वेदतवसन्दी पिकाभापायां सूत्रस्थाने कृत्याकृत्यविधि-र्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
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चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ।
अथातो व्याधिसमुद्देशीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर व्याधिसमुद्देशीय नामक अध्याय का
वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये ।
कहा था ॥ १-२ ॥
विमर्शः – समासकथनमुद्देश., व्याधीना रोगाणा समासेन सक्षे-पेणोद्देश कथन तदधिकृत्य कृतोऽध्यायः । द्विविधास्तु व्याधय - शस्त्रसाध्याः, स्नेहादिक्रिया -साध्याश्च । तत्र शस्त्रसाध्येपु स्नेहादिक्रिया न प्रतिपि -ध्यते । स्नेहादिक्रियासाध्येपु शस्त्रकर्म न क्रियते || ३ || / व्याधियां दो प्रकार की होती है । प्रथम शस्त्रसाध्य तथा द्वितीय स्नेहादिक्रियासाध्य । शस्त्रसाध्य रोगों में स्नेहादिचि किरा निषिद्ध नहीं है किन्तु स्नेहादि क्रिया से साध्य रोगों में शस्त्रकर्म नहीं किये जाते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श: - शरीरदोपप्रकोपे सल्लु शरीरमेवाश्रित्य प्रायशखिवि धमोषधमिच्छन्ति - अन्त परिमार्जन, वहि परिमार्जन, शस्त्रप्रणिधान चेति, शस्त्रप्रणिधान पुनश्छेदन भेदनव्यघनदारणलेसनोत्पाटनप्रच्छ नासीवनैपणचारजलोकसश्चेति, तत्रान्त परिमार्जन यदन्त शरीर मनुप्रविश्योपधमाहारनातव्याधीन् प्रमार्ष्टि, यत्पुनर्वहि स्पर्शमाश्रित्या • * यद्गस्वेदप्रदेद्दपरिपेको मर्दनाचेरामयान् प्रमाष्टि तद्वद्दि परिमार्ज-नम् । ( चरक ) । अस्मिन् पुनः शाखे सर्वतन्त्रसामान्यात् सर्वेषां व्याधीनां यथास्थूलमवरोधः क्रियते । प्रागभिहितम् -' तद्दुःखसंयोगा व्याधय ' इति । तच्च दुःखं त्रिविधम्-आध्यात्मिकम्, आधिभौतिक, आधिदैविकमिति J इस शल्यशास्त्र या सुश्रुतनन्त्र में सर्वतन्त्र समानता होने से त्मिकम् । पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष. । त्रिदोष तथा मान. सिक रज और तम से उत्पन्न पुरुष के रोग । आधिभौतिक-भूतेष्वधिकृत्य यत्प्रवर्त्तते तत् । मनुष्य, पशु, पक्षी सरीसृप आदि भूर्ती के कारण उत्पन्न रोग । आधिदैविक — देवेष्वधि-कृत्य प्रवर्तते तत् । देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षसादि के कारण उत्पन्न रोग । तत्तु सप्तविधे व्याधावुपनिपतति । ते पुनः सप्त-विधा व्याधयः । तद्यथा- यादिबलप्रवृत्ताः, जन्मबल-प्रवृत्ताः, दोपबलप्रवृत्ताः, सङ्घातवलप्रवृत्ताः, कालबल-प्रवृत्ताः, दैववलप्रवृत्ताः, स्वभावचलप्रवृत्ता इति ॥ ५ ॥
वह दुःख सात प्रकार के रोगों के रूप में प्रगट होता है । जैसे आदिबलप्रवृत्त, जन्मवलप्रवृत्त, दोपवलप्रवृत्त, सघातदलप्रवृत, कालरलप्रवृत्त, दैवदलप्रवृत्त तथा स्वभाववलप्रवृत्त ॥ ५ ॥
तत्रादिवलप्रवृत्ता ये शुक्रशोणितदोपान्ययाः कुष्टा • र्शःप्रभृतयः । तेऽपि द्विविधा: - मातृजाः पितृजाश्च । जन्मवलप्रवृत्ता ये मातुरपचारात् पङ्गुजात्यन्धवधिरमू-कमिन्मिनवामनप्रभृतयो जायन्ते । तेऽपि द्विविधाः-रसकृता दौहृदापचारकृताश्च | दोपबलप्रवृत्ता ये आत-कसमुत्पन्ना मिध्याहाराचारकृताश्च । तेऽपि द्विविधाः-आमाशयसमुत्थाः पक्काशयसमुत्थाच्च । पुनश्च द्विविधाः-शारीरा मानसाच । त एते आध्यात्मिकाः ॥ ६ ॥
उनमें से पिता के शुक्र तथा माता के आर्तव दोष से उत्पन्न होने वाले कुट, अर्श आदि रोग आदिवलप्रवृत्त कहे जाते हैं तथा उनके मातृज और पितृज ऐसे दो भेद होते हैं । गर्भ के समय माता के मिथ्या आहार - विहार के सेवन करने से उत्पन्न हुये पलु, जात्यन्ध, नधिर, मूक, मिन्मिन ( हकला ), वामन ( बौना ) आदि विकार जन्मनलप्रवृत्त कहे जाते हैं । वे भी रसकृत तथा दोहृदावमान जन्य ऐसे दो प्रकार के होते हैं । अन्य रोगों के उपद्रव रूप में तथा मिथ्या आहार - विहार के सेवन से जो रोग उत्पन्न होते हैं वे दोपवलप्रवृत्त कहलाते हैं । वे भी आमाशय से उत्पन्न तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने के कारण दो प्रकार के होते है । फिर और उनके शारीरिक तथा मानस ऐसे दो भेद होते हैं । इस तरह वर्णित ये आदिवलप्रवृत्त, जन्मनलप्रवृत्त और दोपवलप्रवृत्त रोग आध्यात्मिक हैं । अर्थात् आत्मा, मन, शरीर में वातादि शारीरिक दोष तथा रज, तम आदि मानस दोषों से उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥
/ चिमर्शः — प्रादिवलप्रवृत्त-- मानवोत्पत्ति के आदि कारण भूत शुक्रकीट ( Spermato 202 ) तथा स्त्रीबीज ( Ora ) ॥ की दृष्टि से उत्पन्न रोगों को Hereditary कहते हैं । मनुष्य-बीज हि प्रत्यंगवी भागसमुदायात्मक स्त्रसदृश प्रत्यङ्ग समुदायरूपपुरु-पजनकम् सब रोगों का स्थूलरूप से वर्णन किया जाता है । प्रथम ही । रोगरहित कुल के रोगरहित लडके - लडकियों का कह आये हैं कि उस पुरुष का दुःखों के साथ जो सयोग होता विवाह कम हो होने जाती से है आदिवलप्रवृत्त । इन रोगों रोग होने की सम्भावना बहुत है उसे व्याधि कहते हैं । वह दुःस तीन प्रकार का होता है । ने ' कुलज ' वाग्भट ने ' कुलोद्भव को ' याज्ञवश्य और ने ' सवारी ' चरक आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ॥ ४ ॥ ' सहज ' तथा भेल ने
' प्रकृतिप्रभाव ' नाम से लिखा है । कुट, अर्श, राजयक्ष्मा, मधु • विमर्गः -- आध्यात्मिकम् - आत्मन्यधि अध्यात्म तत्र भवमाध्या | मेह, श्विन और अपस्मार ये कुलज रोग हैं । विवाह में ये कुल
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श्रध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् । १०१ वर्जित हैं — दर्शन कुलपनि परिवर्तीत हीनकिन नि निन्द्वन्दो रोमशर्शसम् । शय्यामयान्यपस्नरिविष्ठिनि । ( मनु ) 1 [ वरी में चित्र, अपस्मार, मधुमेह, कॅन्सर, मेदोऽ-र्बुद, हीमोफा लिया ( रक्तपित्त मेद ), बबिरमूकता, वानरक, स्थिरता, छाजन ( Eegema ), श्वास, उन्माद, अपत न्त्रक ( Hysteri3 ), नदूरदृष्टि, मोतियाबिन्द, रक्तचाप ( H ). rh b'ood pressure ), स्थौल्य, क्या ओष्ठ, हा तालु, अनु. लियों की जुड़ावट, न्यूनता या अधिकना बादि रोग कुण माने गये हैं । किन्तु जीवाणुओं से उत्पन्न होने वाले रोग जसे कुष्ट, राजयक्ष्मा को कुल्ज नहीं मानते हैं अपितु कुष्टी तथा यमी माता या पिता के गाड सम्पर्क में रहने से उनमें उन । रोगों के उत्पन्न होने की अधिक सम्भावना रहती है । यदि । जन्म होते ही इन बच्चों को कुष्ठी या यक्ष्मी वातावरण से पृथक कर दिया जाय तो वे रोगग्रस्त नहीं हो सकते । इसी । प्रकार अर्श को भी डाक्टरी में कुरज नहीं माना है कुछ रोग । प्रत्येक पीढी को सन्तति में होते हैं जैसे मोतियाविन्द । कुछ एक दो पीढ़ी के बाद होते है जैसे वातरक्त, कुछ रोग केवल पुरुषों ने ही होते है तथा उनकी कन्या की पुरुषसन्तति में फिर दिखाई देते हैं किन्तु रोगी पुरुष के कन्या - पुत्र उस रोग । से पीड़ित नहीं होते हैं । इन रोगों को ( Sex - lim । ated ) कहते हैं जैसे हीमोकायलिया, कान्यता नादि । चरक ने ' कुलजरोग ' का कारण वीजभाग का उपतप्त होना माना है । यत्य यस्यावयवरून दीने वीजमा उपभो भनति तस्य तन्यावयवत्स विद्यतिरूप नावते ( शा ० अ ० ३ ) | बीज शब्द से शुक्रकीट तथा ओवा एवं बीजभाग से उनकी भीतरी सूक्ष्म नगप्रत्यन्नरचना । माननी चाहिये | जन्मलत - गर्भावकान्ति के समय में उत्पन्न रोग, इन्हें Congenital कहते हैं । इनके अस्वभाविक । वृद्दि तथा श्रपनर्गिक रोग ऐसे दो भेद होते हैं । अवामानिक वृद्धि को विकृताकार, व्यङ्ग ( Malformations or Developmental error ) कहते हैं । वियोनिविकृताकारा नायन्न विकृते मैः । ( वाग्भट ) । सर्पवृश्चिक्कू नाण्डविनाकृतयश्च ये । गमां-स्त्वेते त्रियाश्चैव शेया ' पापकृता मृशन् ॥ ( सुश्रुत ) । औपसर्गिक रोग - ये माता के उपमर्ग से उत्पन्न होते हैं जैसे फिरन, आन्त्रिक स्वर, मसूरिका आदि सङ्घातबलप्रवृत्ता च श्रागन्तवो दुर्बलस्य बलव-द्विग्रहात् । तेऽपि द्विविधाः - शत्रकृता व्यालङ्कृताश्च । एते आधिभौतिकाः ॥ ७ ॥
दुर्बल मनुष्य के बलवान् के साथ लड़ाई करते समय चोर लगने से जो आगन्तु विकार उत्पन्न होते हैं उन्हें सनानवट-प्रवृत्त गेग कहते हैं । शवों से उत्पन्न तथा व्याल ( सर्प, शेर ) आदि से उत्पन्न ऐसे इनके भी दो भेद होते हैं । ये आधिभौतिक व्याधियाँ हैं ॥ ७ ॥
विमर्शः - यागन्तुरोगाः- ये भूतविषवाय्त्रभिसम्प्रहारादिसम्भवाः । नृणामागन्तवो रोगा ' । ( घरक ) । कालबलप्रवृत्ता ये शीतोष्णत्रातवर्षाप्रभृतिनिमित्ताः । तेऽपि द्विविधाः - व्यापन्नर्तुकृता अव्यापन्नकृताश्च दैव । बलप्रवृत्ता ये देवद्रोहादभिशस्तका अथर्वणकृता उप-सर्गजाश्च । तेऽपि द्विविघाः - विद्युदशनिकृताः पिशाचा-| दिकृताश्च । पुनश्च द्विविधाः - संसर्गजा आकस्मिकाश्च । स्वभावबलप्रवृत्ताः क्षुत्पिपासाजरामृत्युनिद्राप्रभृतयः । तेऽपि द्विविधाः - कालकृता कालकृताश्च । तत्र परि
रक्षगकृताः कालकृताः । अपरिरक्षणकृता अकालकृताः ।
एते आधिदैविकाः । अत्र सर्वव्याभ्यवरोधः ॥ ८ ॥
जो रोग शीत, उष्ण, वायु, वर्षा आदि के कारण उत्पन्न होते हैं उन्हें कालबलप्रवृत्तरोग कहते हैं ' विकृत ऋतु ' से उत्पन्न । तथा ' भविकृत ऋतु ' से उत्पन्न ऐसे इनके भी दो भेद होते है । देवता, गुरु ब्राह्मण भादि के साथ अभिद्रोह करने से अथवा गुरों के अभिशाप से उत्पन्न किंवा अथर्ववेद प्रणीत अभि. चारिक मन्त्रों के प्रयोग से उत्पन्न अथवा रुग्ण पुरुष के साथ रहने से उत्पन्न संक्रामक ज्वर आदि देववलप्रवृत्त रोग कहलाते हैं | विद्युत् तथा इन्द्रवज्रपात से उत्पन्न तथा भूत, प्रेत, पिशा • चादि से उत्पन्न ऐसे इनके भी दो भेद होते है । सासगिक तथा आकस्मिक ऐसे इनके पुनः दो भेद किये गये हैं । क्षुधा, पिपासा, जरा, मृत्यु और निद्रा प्रभृति स्वभाववलप्रवृत्त रोग हैं । ये भी तथा अकालकृत भेद से दो प्रकार के है । इनमें से उचित आहार विहार द्वारा शरीर का रक्षण करते रहने पर भी जो उचित समय पर हो जाते हैं वे कालकृत तथा रक्षासाधनों के उपयोग न करने से अकाल रोग होते हैं उन्हें अकालकुन समझने । चाहिये । ये सब आधिदैविक रोग है । इनमें सब रोगों का | समावेश होता tu है ॥ ८ ॥
विमर्श: -- देववलप्रवृत्त रोगों में जीवाणुजन्य रोगों का बांगेकरजी ने समावेश माना है तथा इन्हें ( Parasitic ) कहते है । उपसर्ग ना. ज्वरादिरोगपीटितनन सम्पर्काद्भवन्ति । उपसर्गज-रोगोत्पत्चिदेतुः - प्रसादात्रसस्पर्शान्निश्वासात्सहभोजनात् । सद्द-शय्यासनाचापि वक्माल्यानुलेपनात् ॥ श्रपसर्गिकरोगाच सका-मन्ति नरान्नरन् ॥ उपसर्ग को ( Infection ) कहते हैं । संस-गंज का अर्थ अति समीप आने से या स्पर्श से होने वाले रोग इन्हें ( Contagions ) कहते है । आकस्मिक को ( Sporadie ) | कहते हैं । सर्वेपाञ्च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एवं मूलं, तल्लिङ्गत्वाद् दृष्टफलत्वादागमाच्च । यथा हि कृत्स्नविका-रजातं विश्वरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसि न व्यति-रिच्यन्ते । एवमेव कृत्स्न विकारजातं विश्वरूपेणावस्थि-तमव्यतिरिच्य वातपित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते । दोषघातुम-लसंसर्गादायतन विशेषान्निमित्ततश्चैषां विकल्पः । दोप-दूषितेष्वत्यर्थं धातुपु सज्ञा क्रियते - रसजोऽय, शोणित-जोऽय, सांसजोऽय, मेदोजोऽयम्, अस्थिजोऽयं, मज्ज-जोऽयं, शुक्रजोऽयं व्याधिरिति ॥ ६ ॥
सर्व प्रकार के रोगों की उत्पत्ति में वात, पित्त और कफ ही मूल कारण हैं क्योंकि उन रोगों में वात, पित्त और कफ के लक्षण मिलने से तथा उन लक्षणों के अनुसार वातादि दोपहर चिकित्सा करने पर रोगशान्तिरूपी फल दिखाई देने से एव शास्त्र का भी प्रमाण है कि वातादि हो सब रोगों के कारण हैं जिस प्रकार जगत के रूप में अवस्थित यह | समस्त महदादि २३ तेइस तत्वों से निर्मित विकारसमूह सत्व,
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सुश्रुतसंहिता । १०२ रज और तमोगुण से पृथक नहीं हैं उसी प्रकार विश्व में व्याप्त समस्त विकार जात ( रोगसमूह ) वात, पित्त और कफ के बिना उत्पन्न नहीं हो सकते हैं । दोषों, धातुओं और मलों के संयोग से स्थानभेद से तथा कारण के भेद से इन रोगों के अनेक विकल्प ( भेद ) होते हैं । वातादि दोषों से रम - रचादि धातुओं के अत्यन्त कुपित होने से रोगों के भिन्न २ नामकरण किये जाते हैं जैसे यह रसज रोग है । यह रक्तज रोग है, यह मांसजन्य रोग है, यह मेदोजन्य रोग है, यह मज्जाजन्य रोग है तथा यह शुक्रजन्य रोग है ॥ ९ ॥
विमर्शः - निमित्त से वाह्यकारण या निदान है । येनाहार-विहारेय रोगाणामुद्भवो भवेत् । चयो वृद्धिश्च दोषाणा निदानं हि दुच्यते । ( वनले ० ) । रोगभेदाः - स्वाररिसंख्येया मिद्यमाना भवन्ति हि । नाव समुत्थानस्यानसस्थाननानभिः ॥ रसजोऽयमिनि-रसादित्थेषु दोषेषु व्यापय सन्भवन्ति ये । तञ्जानित्युपचारेण वानाहुर्वृनदाहवत् ॥ तत्र, अन्नाश्रद्धारोचकाविपाकानमर्दन्यरहृल्लासतृप्ति-गौरवहृत्पाण्डुरोगमार्गोपरोधकार्यवैरस्याङ्ग सादाकालय-लिपलितदर्शनप्रभृतयो रसदोपना विकाराः ॥ १० ॥
रसदोष के कारण अन्न में द्वेष, भोजन में अरुचि, अजीर्ण, अङ्गमर्द, ज्वर, जी मचलाना, न खाने पर भी तृप्ति का भान, भारीपन, हृद्रोग, पाण्डुरोग, स्रोतोऽवरोध, दुबलापन, सुख की विरसता, थकावट, अकाल में चर्म में झुर्रियां पढना तथा बालों का खेत होना आदि रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ५० ॥
कुष्टविसर्पपिडकामशक्नीलिकातिलकालकन्यच्छव्य ङ्गेन्द्रलुमलीहविद्रधिगुल्मत्रातशोणिताशेऽर्बुदाङ्गमर्दासृग्द-ररक्तपित्तप्रभृतयो रक्तदोषजा गुदमुखमेढ्रपाकाञ्च ॥ ११ ॥
J र दुटि होने से कुष्ट, विसर्प, पिढ़का, मशक, नीलिका, तिलकालक, चच्छ, ग्रह, इन्द्रलुप्त, प्लीहावृद्धि, विधि, रक्त गुल्म, वातरक, नर्श, अर्बुद, अमई, रक्तप्रदर, रक्तपित्त, आदि रोग तथा गुदपाक, मुखपाक और लिङ्गपाक रोग टम्पन्न होते है ॥ ११ ॥
अधिमांसार्बुदार्शोऽधिजिह्वोपजिह्वोपकुशगलशुरिङ-काऽलजीमाससङ्घातौष्टप्रकोपगलगण्डगण्डमालाप्रभृतयो मांसदोपजाः ॥ १२ ॥
/ मास की दृष्टि होने से लघिमांस, अर्बुद, अर्श, अधिनिहा, टपजिह्वा, उपकृश, गलशुण्डिका, अलजी मांससघात, नो. प्रकोप, गलगण्ड, गण्डमाला आदि विकार उत्पन्न होते हैं ॥१२ ॥
श्रन्थिवृद्धिगलगण्डार्बुदमेदोजौष्टप्रकोपमधुमेहाति-स्यौल्यातित्वेदप्रभृतयो मेदोदोपजाः ॥ १३ ॥
मेदोषातु को दृष्टि से ग्रन्यि, मेदोवृद्धि, गलगण्ड, अर्बुद,
मेदोजन्य ओष्ठप्रकोप, मधुमेह, अतिस्थौल्य, अतिस्वेद आदि ।
रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥
अस्थि के प्रन्दर दोष प्रकुपित होने मे सध्यस्थि ( Osteoma ), अधिदन्त ( Odantoma ), अस्थियों में सूचीभेट सी पोढा, अस्थिशूल तथा कुनख आदि विकार उत्पन्न होते हैं ॥ ११ ॥
तमोदर्शनमूर्च्छाभ्रमपर्वम्थूलमूलारुर्जन्मनेत्राभिस्य-न्दप्रभृतयो मनदोपजाः ॥ १५ ॥
मज्जधातु की दृष्टि होने ने आंांसों के सामने अन्धेरा आना, मृर्च्छा, भ्रम, पत्रों में स्थूलता तथा घणों का होना, नेत्रामि • स्यन्द इत्यादि रोग प्रगट होते हैं ॥ १५ ॥
विमर्शः - पर्व स्थूलसूकानानरूपा जन्म । अथा स्यूलमूलाना
पर्वजाना च दर्शनन् । ( घरक ) ।
क्लैब्याप्रहर्पशुक्राश्मरीशुक्रदोपादयश्च तहोपजाः ॥
शुक्र को दुष्टि होने से क्लैन ( Sterility ), अर्पण ( ग्लानशिरनता या दिनदथिल्य ( Impotence ), शुक्राश्मरी, शुक्रमेह तथा अन्य शुक्र के दोष आदि उत्पन्न होते हैं ॥ १६ ॥
त्वग्दोषाः सङ्गोऽतिप्रवृत्तिरचया प्रवृत्तिर्वा मला-यतनदोषाः ॥१७ ॥
जब दोप मलों के आयतन ( अवकाश ) में उत्पन्न होते है तब त्वचा के विकार, मल - मूत्रादिकों का सह, अधिक उत्सर्ग और न्यूनाधिक उत्सर्ग आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं ॥ १७ ॥
विमर्श: - नवानाश्रित्य पिता दशोपनदूषणन् । दोषा नाना कुर्वन्वि सोत्सगांवनीव च ॥ इन्द्रियाणामप्रवृत्तिरयथाप्रवृत्तिर्वेन्द्रियायतनदोपाः, इत्येष समास उक्तः । विस्तरं निमित्तानि चैषां प्रति-रोगं वक्ष्यामः ॥ १८ ॥
जब दोप इन्द्रियों के आयतनों ( स्थानों ) में प्रविष्ट हो कर कुपित होते हैं तब वे इन्द्रियां अपने अपने अर्थ के ग्रहण करने में प्रवृत्त नहीं होती हैं अथवा विपम रूप से प्रवृत होती है | इस तरह धातुगत विकारों का यह सक्षिप्त वर्णन किया है । इनका विस्तार तथा कारण और चिकित्सा प्रत्येक रोग के साथ जागे उत्तरतन्त्र में कहेंगे ॥ १८ ॥
विमर्श: - इन्द्रियाणि समाश्रित्य प्रकुप्यन्ति यत्रा भटाः । उप-वादोपतानाभ्या योजयन्तीन्द्रियाणि ते । ( चरक ) ।
भवति चात्र-कुपितानां हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् ।
यत्र सङ्गः खवैगुण्याद्वयाधिस्तत्रोपजायते ॥ १६ ॥
शरीर में रसादि के साथ सञ्चरण करने वाले दोषों के प्रकुपित होकर परिधावन करते समय स्रोतसों को विगुणता से जहां उन दोषों का अवस्थान ( स्थिति ) हो जाता है वहां ही रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १ ९ ॥ विमर्शः – नयुनैद्दशब्दः सर्वप्रमेहे मधुमेहविशेष च वर्तते, यथा । दोषों विमर्शः - व्यान वायु की प्रेरणा से शरीर में रस तथा तृगशब्द. सर्वदृणे तृगविशेषे च वर्तते । ( चक्रपाणिदत्त ) । का परिभ्रमण होता है । व्यानेन रसधातुहिं विक्षेपोचित-श्रध्यस्थ्यधिदन्तास्थितोदशूलकुनखप्रभृतयोऽस्थि- कर्मना । युगपत् सर्वतोऽत्रं देहे विशिष्यते तदा ॥ क्षिप्यमाणः दोषजाः ॥ १४ ॥ स्ववैगुप्याट्र्स सब्जति यत्र स. । तस्मिन् विकारं कुरुते खे वर्षभिव
वोयद • ॥ दोषाणामपि चैवं स्यादेकदेशप्रकोपपन् । ( अ ० हृ ० ) ।
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श्रध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् । १०३ भूयोऽत्र जिज्ञास्यं, कि वातादीनां वरादीनान्न नित्यः संश्लेषः परिच्छेदो वा? इति । यदि नित्यः संश्लेषः स्यात्तर्हि नित्यातुराः सर्व एव प्राणिनः स्युः । अथाप्यन्यथा वातादीनां ज्वरादीनां चान्यत्र वर्त्तमाना -नामन्यत्र लिङ्गं न भवतीति कृत्वा यदुच्यते वातादयो रादीनां मूलानीति; तन्न ॥ २० ॥
इस विषय में यहां पर यह जानने की इच्छा है कि क्या वातादि दोष और ज्वरादि रोगों का नित्य सम्बन्ध है अथवा विश्लेष है | यदि कहा जाय कि इनका सम्बन्ध नित्य है तब सर्व प्राणी सदा ही रोगी वने रहने चाहिये । यदि इनका सदा विश्लेप ही रहता हो तो वातादि दोष तथा उचरादि रोग दोनों भिन्न २ स्थानों पर रहने से एक देश में उनके लक्षण नहींहो सकते क्योंकि अन्यत्र वर्तमान भावों के लक्षण अन्यन्त्र नहीं होते अतएव वातादिक दोष ज्वरादिक रोगों के कारण नहीं हैं ॥ २० ॥
विमर्शः — नित्यः सश्लेषः समवाय. सन्बन्धो यथा सूर्यातपयो, चन्द्रचन्द्रिकयोरिव । परिच्छेदो विश्लेष. पृथक्त्व वा यथा पटतन्तु-वाययोः, घटकुम्मयोः, स्वर्णस्वर्णकारयोरिवेति । अत्रोच्यते - दोपान् प्रत्याख्याय ज्वरादयो न भवन्ति । अथ च न नित्यः सम्बन्धः । यथा हि विद्युद्वाताशनवर्षाख्याकाशं प्रत्याख्याय न भवन्ति । सत्यप्याकाशे कदाचिन्न भवन्ति । अथ च निमित्त-तस्तत एवोत्पत्तिरिति । तरङ्गबुदबुदादयश्चोदकविशेषा एत्र । वातादीनां व्यरादीनाञ्च नाप्येवं संश्लेपो न परि-च्छेदः शाश्वतिकः । अथ च निमित्तत एवोत्पत्तिरिति ॥ उक्त प्रश्न का अब खण्डनार्थ उत्तर देते हैं कि दोषों को छोड़ कर ज्वरादि रोग नहीं होते हैं तथा इनका सम्बन्ध भी नित्य नहीं है जैसे कि बिजली, वायु, वज्र और वर्षा आकाश को छोड़ कर अन्यत्र नहीं होते है तथा आकाश के संदा विद्यमान रहने पर भी ये सदा नहीं रहते है किन्तु निमित्त होने पर ये आकाश में उत्पन्न हो जाते हैं । इसी तरह तरह और बुलबुले जैसे जल को छोड़ कर अन्यत्र उत्पन्न नहीं होते हैं किन्तु कारण होने पर जल में ही उत्पन्न हो जाते हैं । इसी प्रकार वातादि दोष तथा ज्वरादिक रोगों का नित्य सम्बन्ध भी नहीं है तथा नित्य पृथक्त्व भी नहीं है किन्तु मिथ्या आहार - विहारादि रूप निमित्त के होने से ही दूषित हुये वातादि दोषों से ज्वरादि रोगों की उत्पत्ति होती है ॥ २१ ॥
भवति चात्र-विकारपरिमाणञ्च सङ्ख्या चैषां पृथक् पृथक् ।
विस्तरेणोत्तरे तन्त्रे सर्वा बाधाश्च वक्ष्यते ॥ १२ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्याधिसमु-देशीयो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४ ॥
-विकारों का परिमाण ( पूर्णसंख्या ) तथा उनके भेदों की पृथक् पृथक् सख्या एवं उनके सर्व प्रकार के उपद्रव इनका सविस्तार वर्णन उत्तरतन्त्र में किया जायगा ॥ २२ ॥
इत्यायुर्वेदतवसन् दीपिकाभापायां व्याधिसमुद्देशीयो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २४ ॥
-पञ्चविंशतितमोऽध्यायः ।
अथातोऽष्टविधशस्त्रकर्मीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अव इसके अनन्तर अष्टविधशस्त्रकर्मीय नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के | लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्शः - सुश्रुत के मत से शस्त्रकर्म आठ, चरक के, मत से छपाटन न्यधन चैव छेदन लेखन तथा । प्रोन्दनं सीवनचैव पविध शस्त्रकर्म तत् । वाग्भट के मत से त्रयोदश - उत्पाट्यपाट्य-सीव्येप्यलेख्यप्रच्छन्नकुट्टनम् । छेद्य मेद्यं व्यधो मन्थो ग्रहो दाहश्च तत्क्रिया ॥
छेद्या भगन्दरा ग्रन्थिः श्लैष्मिकस्तिलकालकः ।
व्रणत्रर्त्मार्युदान्यर्शश्चर्मकीलोऽस्थिमांसगम् ॥ ३ ॥
शल्यं जतुमणिर्माससङ्घातो गलशुण्डिका ।
स्नायुमांससिराकोथो वल्मीक शतपोनकः ॥ ४ ॥
निम्न रोगों में छेदनकर्म ( Excision ) किया जाता है, जैसे-भगन्दर, श्लैष्मिक ग्रन्थि, तिलकालक, नाडीव्रण, अर्बुद, अर्श, चर्मकील, अस्थिशल्य, मांसशल्य, जतुमणि, मांससंघात, गलशुण्डिका, स्नायु, मांस और सिराओं के सड़े गले भाग, वल्मीक, शतपोनक ( एक प्रकार का भगन्दर ), अधुप, उप-दंश, मांसकन्दी और अधिमांस ॥ ३-४ ॥
श्रषश्चोपदेशाश्च मांसकन्द्यधिमांसकः ।
भेद्या विद्रधयोऽन्यत्र सर्वजाद् ग्रन्थयस्त्रयः ॥ ५ ॥
आदितो ये विसर्पाश्च वृद्धयः सविदारिकाः ।
प्रमेहपिडकाशोफस्तनरोगावमन्थकाः ॥ ६ ॥
कुम्भीकानुशयीनाड्यो वृन्दौ पुष्करिकाऽलजी ।
प्रायशः क्षुद्ररोगाश्च पुष्पुटौ तालुदन्तजौ ॥ ७ ॥
तुडिकेरी गिलायुश्च पूर्व ये च प्रपाकिणः ।
बस्तिस्तथाऽश्मरी हेतोर्मेदोजा ये च केचन ॥ ८ ॥
निम्नरोगों में भेदनकर्म ( Incision ) किया जाता है, जैसे-सान्निपातिक विधि के सिवाय अन्य सर्व विद्वधियां, वात, पित्त तथा कफ से उत्पन्न होने वाली तीनों प्रकार की ग्रन्थियां, वात, पित्त और कफ इन तीनों दोपों से उत्पन्न वीसर्प, सर्व प्रकार की वृद्धियां, विदारिका, प्रमेहपिडका, व्रणशोफ, स्तन-विद्रधि, अवसन्थक, कुम्भीका, अनुशयी, नादीत्रण, दोनों प्रकार के वृन्दरोग, पुष्करिका, अलजी, प्रायः सर्व प्रकार के दरोग, तालुपुप्पुट और दन्तपुप्पुर, तुण्डीकेरी, गिलायु, सुख के पकने वाले अन्य रोग, अश्मरी को निकालने के लिये बस्ति तथा अन्य मेदोजन्य रोग ॥ ५-८ ॥
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१०४ सुश्रुतसहिता!
लेस्याश्चतस्रो रोहिण्यः किलासमुपजिहिका ।
मेदोजो दन्तवैदर्भी ग्रन्धिर्वर्माधिजिह्निका ॥
यशसि मण्डलं मांसकन्दी मांसोन्नतिस्तथा ॥ ६ ॥
निम्न रोगों में लग्न ( Scraping, Sexrification ) । करना चाहिये । जैसे बात, पित्त, कफ और रक्तजन्य रोहिणी । ( डीपीरिया ), किलाम, उपजिहिका, मेोजन्य तदर्भ, ग्रन्थिरोग, चर्मरोग, अधिजिह्निका ( Epiglattitis ), अर्दा, use कुष्ट, माकन्दी, मांस की वृद्धि आदि ॥ ९ ॥
वेव्याः सिरा बहुविधा मूत्रवृद्धिकोदरम् ।
एण्या नाड्य ' सगल्याश्च त्रणा उन्मार्गिणञ्च ये ॥ १० ॥
अनेक प्रकार की विकृत सिराएँ, मूत्रवृद्धि ( Hydrocele ) और जलोदर इन रोगों में वेधनकर्म ( Puncturing ) करना चाहिये तथा शल्ययुक्त नादिया और उन्मार्ग वर्गों का पण ( Probing ) करना चाहिये ॥ १० ॥
थाहाय्यः शर्करास्तिस्रो दन्तकमलोऽश्मरी ।
शल्यानि मूढगर्भाश्च वर्चश्च निचितं गुदे ॥ ११ ॥
तीनों प्रकार की अराए जैसे- दन्तशर्करा ( Tarter ), पाद शर्करा और मूत्र ( Gravel ), दांत और कान का मैल अश्मरी, सर्व प्रकार के दास्य ( Foreign body ), मूढगर्भ तथा गुदा में इक्ट्ठा हुआ मल हुन सबका आहरण ( Exctraction ) करना चाहिये ॥ ११ ॥
aro या विधयः पञ्च भवेयुः सर्वजाहते ।
कुष्टानि वायुः सरुजः शोफो यश्चैकदेशजः ॥ १२ ॥
पाल्यामयाः श्लीपदाति विपजुष्टन शोणितम् ।
अर्बुदानि विसर्पाश्च ग्रन्थयश्चादितस्तु ये ॥ १३ ॥
त्र्ययश्चोपदेशा. स्तनरोगा विदारिका ।
सुपिरो गलशाकं कण्टकाः कृमिदन्तकः ॥ १४ ॥
दन्तवेष्टः सोपकुशः शीताड़ो दन्तपुष्पुटः ।
पित्तासृकफजाचष्टयाः क्षुद्ररोगाश्च भूयशः ॥ १५ ॥
निम्न रोगों में विना o ण कर्म ( Drainage ) करना चाहिये, जैसे- साक्षिपातिक विधि को छोड़कर शेष पांचो विद्रधियां, कुष्ट, वेदनायुक्त वायु एक स्थान में उत्पन्न शोय, पाटी के रोग, स्टीपट, विप से दूषित रक्त, सर्व प्रकार के अर्बुद तथा विसर्प, प्रारम्भिक तीन प्रकार की ग्रन्थियां तथा तीन प्रकार के उपदंदा, स्तनरोग, विदारिका, सौपिर ( दन्तरोग ), शालूक, तालुकण्टक, कृमिदन्त, दन्तवेष्ट, टपकुश, शीताद, agrge, पित्तर तथा कफनन्य ओष्ठ रोग एवं अनेक प्रकार के इदरोग ॥ १२-१४ ॥ विमर्शः --- प्रायः एक प्रकार के रोग में कभी एक, कभी दो तथा कभी तीन प्रकार के कर्म मी करने पढते हैं । जैसे - अर्बुद में लेनन, भेदन, छेदन आदि अवस्थानुसार एक, दो या सभी
किये जा सकते हैं । कर्मणा कविदेकेन द्वाभ्यां कश्चित् त्रिमित्तया ।
विकारः साध्यते कश्चिच्चतुर्भिरपि कर्ममि ॥
सीव्या मेदःसमुत्थाच भिन्नाः सुलिखिता गढ़ा ।
raat ये चैत्र चलसन्धिव्यपाश्रिताः ॥ १६ ॥
मेदोजन्य रोग, जिनमें भेटन हो गया हो, जिनका सुले. न हो गया हो तथा चलमन्धि का आश्रय कर उत्पन्न होने वाले सद्योत्रण या केवल सयोजात व्रण जो कि धूटि, जीवाणु आदि से दूषित न हो तथा चलन्त्रि के आश्रित ग इनमें मीन ( Satarang, stitching ) करना चाहिये ॥१६ ॥
विमर्श: - अष्टामध्ये विशेष - ' सघ मयोत्रणान् सोव्येद वित्तानभिया राजान् मेोलान् चिवृतान् ग्रन्थीन् हस्त्रा " पाठिश्च कयो || विरोऽक्षिकूटनासीगण्डकी राहु श्रीराला मुक पादरादिषु ॥ गन्म १ प्रदेशेषु मासवचलेषु च । ' इति
न चाराग्निविषैर्जुष्टा न च मान्नवाहिनः ।
नान्तर्लोहितशल्याच तेषु सम्यग्विशोधनम् ॥ १७ ॥
चार अग्नि और चिप से व्याप्त तथा वायु जिनसे निक हत्ती हो, जिनके भीतर दूषित रक्त और शल्य शेष हो ऐसे a णों का मावन नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥
विमर्श: --- अनीत्या व्रणाः न तु व क्षणकक्षादावसमासचले व्रणान् । वायु निर्वाणि शय्यगर्भान् क्षारविषाग्निकान् ॥ ( वाग्भट ) । मानवादिनः-- B welchi तथा vibro septic नामक वायु-जनक जीवाणुओं के प्रवेश होने पर व्रण में वायु रत्पन्न होती
है तथा बाहर निकलती है ।
पांशुरोमनखादीनि चलमस्थि भवेच्च यत् ॥ १८ ॥
तानि यतोऽमृनि पाचयेयुर्भृशं त्रगम् ।
रुजश्च विविधाः कुर्युस्तस्मादेतान् विशोधयेत् ॥ १ ९ ॥
धूटि, बाल, नस आदि वस्तु तथा अस्थि के टूटे चलाय मान टुकडे इन्हें यदि व्रण से नहीं निकाले जांय तो ये व्रण को अधिक पका देते है तथा अनेक प्रकार को व्रण में वेदना ae पन्न करते हैं इसलिये इन्हें पूर्णरूप से निकाल कर ण का सम्यग् शोधन करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ विमर्श: - सीवन के पूर्व दूषित तथा छिन्न, मिन्न, मांस, अस्थिखण्ड तथा वाह्य प्रविष्ट धूटि आदि सत्रको निकाल व्रणशोध घोल से अच्छी प्रकार धोकर सोना चाहिये । सीन्येच्चलास्थिशुकाननृणरोमापनीय तु । प्रलम्बि मांस विच्छिन्न । निवेश्य स्वनिवेशने ॥ ( वाग्भट ) ।
ततो व्रणं समुन्नम्य स्थापयित्वा यथास्थितम् ।
सीव्येत् सूक्ष्मेण सूत्रेण वल्केनाश्मन्तकस्य वा ॥ २० ॥
शणजक्षौमसूत्राभ्याम्नाय्वा वालेन वा पुनः ।
मूर्वागुडूचीतानैर्वा सीव्येद्वेल्लितकं शनैः ॥ २१ ॥
सीव्येोफणिकां वाऽपि सीव्येद्वा तुन्नसेवनीम् ।
ऋजुग्रन्थिमथो वाऽपि यथायोगमथापि वा ॥ २२ ॥
फिर ऋण के किनारों को ऊंचा उठा कर दोनों किनारों को ठीक तरह से मिलाकर महीन सूत्र, अश्मन्तक की छाल के रेण, सन के सूत्र, होम सूत्र, स्नायुतान, घोड़े के बालू, मूर्वा और गिलोय के तन्तु इनमें से यथायोग्य किसी एक से afgar, गोफणिका, तुन्नसेवनी, ऋजुग्रन्थि अथवा जैसा रचित समनें उसी प्रकार से सोना चाहिये ॥ २०-२२ ॥ विमर्श: -- स्नायु - शणाकार उपधातुविशेषो येन धनूपि नान्ते ।
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श्रध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् । १०५ स्नायु Tendon है । बारी में सीवन के लिये कंगारु के स्नायु केट ( Cat gut ), Silk wormgut, घोडे के बाल, रेशम, सन, चांदी के तार तथा विशेष कर केट गट का अधिक प्रयोग होता है । प्रयोग के पूर्व इनका पूर्ण शोधन ( Sterlize stion ) होना अत्यावश्यक है । वेल्लिनकसीवन को Glover's continuous suture कह सकते हैं । तात्कालिक व्रण जो कि निर्दोष ( Aseptic ) हों वहां इस विधि से सोते हैं - त्रण के एक ओर से दूसरी ओर एक हो सूत्र से अविच्छिन्न टांके लगाये जाते हैं । अयान्तरन्तु कुटिलं सीव्यते बहुवेष्टनम् । यत्तद्वे लिकं नाम शालादौ युज्यते बुधैः ॥ गोफणिकासीवन को Blanket suture कह सकते हैं । अधिक विस्तृत व्रण को यन्द करने के लिये यह सीवन करते हैं । पाटितं योनिगुदो रन्तरं वा तथाविधम् । देशं स्थूत्वा यथायोगं पुनस्तच्छेदशङ्कया । नातिस्थूले नातिदक्ष्मै शलाके दे निपात्य च ॥ तदासक्तेन सूत्रेण संवेष्ट्य सेवनी कृता । नाम्ना गोफणिका प्रोक्ता दुष्करा मन्द-बुद्धिभिः । तुन्नसेवन सीवन को Halstead's subcuticularstich कह सकते हैं । इससे व्रणोष्ठ पूर्णरूप से मिल जाते हैं जिससे व्रणवस्तु ( Soar ) नहीं के बराबर हो जाती है । पृथक् पृथक् । तु संद्दिन्नं सीव्यते तुन्नसेवनी । सा योच्या पक्ष्मकोपादो । ऋजुग्रन्थि । को Interrupted suture कह सकते हैं । इसका उपयोग बाह्यत्वचा के सीवन में अधिक होता है । प्रत्येक टोका पृथक् पृथक्क होने से यदि व्रण में पूय पड़ जाय तो एक दो टांके तोड़ कर निकाले जा सकते हैं । पार्श्वत् पादन्तरं यावद् ऋतुसूचीं निपात्य च । संवेष्ट्याकृष्य सूत्रेण ग्रन्यिर्यः सन्धिदेनवे ॥ क्रियते स ऋजुनन्थिरोष्ठादिषु विधीयते ॥ ( हाराणचन्द्रः )
देशेऽल्पमांसे सन्धौ च सूची वृत्ताऽङ्गुलद्वयम् ।
आयता व्यङ्गुला यत्रा मांसले वाऽपि पूजिता ॥ २३ ॥
धनुर्वक्रा हिता मर्मफलकोशोदरोपरि ।
इत्येतास्त्रिविधाः सूचीस्तीक्ष्णायाः सुसमाहिताः ॥ २४ ॥
कारयेन्मालतीपुष्पवृन्ताग्रपरिमण्डलाः ॥ २५ ॥
कम मांसवाले अङ्ग में तथा सन्धियों के सीवन के लिये दो बहुत लम्बी तथा गोलमुख सूई चाहिये तथा अधिक मांस वाले अङ्ग में तीन अद्गुल लम्बी तथा तीन धारा वाली सूई श्रेष्ठ है । मर्मस्थान, वृषणकोष तथा उदर के सीवन कर्म के लिये धनुष के समान देदी सूई ठीक होती है । इस तरह मालती ( चमेली ) के पुष्प के वृन्त ( डण्ठल ) के अग्रभाग के समान मोटी, गोल तथा तोच्णाग्र वाली तीन तरह की सूइयां बनवानी चाहिये ॥ २३-२५ ॥ विमर्शः – वर्तमान में मीथी ( Straight ), वक्रमुख ( Half Carved ), तथा धनुर्वक्र ( Fully curved ) ये सूइयों के तीन भेद हैं ।
नातिदूरे निकृष्टे वा सूचीं कर्मणि पातयेत् ।
दूराद्वृजो व्रणोष्ठस्य सन्निकृष्टेऽवलुम्वनम् ॥ २६ ॥
व्रणौष्ठ के सीवन कर्म में सूई को न तो अधिक दूर तथा न अधिक समीप प्रयुक्त करना चाहिये अर्थात् टांके न अधिक दूर दूर और न अधिक पास पास में लगावें । दूर दूर लगाने १४ सु ० से तनाव के कारण पोढ़ा तथा अधिक समीप लगाने से व्रणोष्ठ के किनारे टूट सकते हैं ॥ २६ ॥
अथ क्षौमपिचुच्छन्नं सुस्यूतं प्रतिसारयेत् ।
प्रियङ्ग्यञ्जनयष्टयाह्वरोत्रचूर्णैः समन्ततः ॥ २७ ॥
शल्लकी फल चूर्णैर्वा क्षौमध्यामेन वा पुनः ।
ततो व्रणं यथायोगं वद्ध्वाऽऽचारिकमादिशेत् ॥ २८ ॥
यथोक्त विधि से अच्छी प्रकार सीधे हुये व्रण को सोम-वस्त्र तथा पिचु ( रुई के फोये ) से ढक कर प्रिय, सौवी • राञ्जन, मुलेठी, लोध इनके चूर्ण अथवा शल्लकी फल के चूर्ण किंवा अतमी के वस्त्र की राख का प्रतिसारण ( छिड़काव ) कर फिर बग को यथाशास्त्र नियमानुसार वांधकर त्रणितोपास • नोय अध्यायानुसार आचरण ( पथ्यापथ्य ) का आदेश करना चाहिये ॥ २७-२८ ॥
एतदृष्टविधं कर्म समासेन प्रकीर्तितम् ।
चिकित्सिते कात्स्नर्थेन विस्तरस्तस्य वच्यते ॥ २६ ॥
इस प्रकार यह अष्टविध शस्त्रकर्म संक्षेप से यहां कहा है उसका सम्पूर्ण विस्तार चिकित्सा स्थान के अध्यायों में किया जायगा ॥ २ ९ ॥
हीनातिरिक्तं तिर्यक् च गात्रच्छेदनमात्मनः ।
एताश्चतस्रोऽष्टविधे कर्मणि व्यापदः स्मृताः ॥ ३० ॥
उक्त अष्टविध शस्त्रकर्म में होन छेट, आवश्यकता से अधिक छेद, तिर्यक् छेद एवं असावधानी से अपने ही शरीर में छेद करना ये चार व्यापत्तियां होती हैं ॥ ३० अन्नानलो भाहितवाक्ययोग-भयप्रमोहैरपरैश्च भावैः । यदा प्रयुञ्जीत भिषक कुशखं तदा स शेषान् कुरुते विकारान् अज्ञान से, लोभ से, अहित वाक्य के योग मोह से तथा अन्य किन्हीं आशयों से जब वैद्य ॥ ॥ ३१ ॥
से, भय से, सर्जन कुशस्त्र! ( अनुचित शस्त्रकर्म ) का प्रयोग करे तब वह व्रण में अनेक शेष विकारों को उत्पन्न करता है अथवा व्रण में दुष्ट पूय-रहादि विकारों को शेष अर्थात् उपस्थित रखता है ॥ ३१ ॥
तं चारशला ग्निभिरौपघैश्च भूयोऽभियुञ्जानमयुक्तियुक्तम् । tataya व वैद्यं विवर्जयेदु विपाहितुल्यम् ॥ ३२ ॥
पुनः चार, शस्त्र अग्नि या अन्य लेपादि ओषधियों से अयुक्तिपूर्वक उस शेष विकार को नष्ट करने का प्रयत्न वाले वैद्य को भयङ्कर विषधारी सर्प के समान जान क जीवित रहने की इच्छा करने वाला मनुष्य दूर से ही त्याग देवे ॥ ३२ ॥
तदेव युक्तं त्वति मर्मसन्धीन् हिंस्यात् सिराः स्नायुमथास्थि चैत्र । मूर्खप्रयुक्तं पुरुषं क्षणेन प्राणैर्वियुञ्ज्यादथवा कथञ्चित् ॥ ३३ ॥
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१०६ सुश्रुतसहिता अज्ञ वैद्य के द्वारा आवश्यकता से अधिक लम्बा, गहरा, दादा तथा अस्थान में प्रयुक्त किया हुआ शस्त्र मर्मस्थान, सन्धियां, सिराए, स्नायु और अस्थिको काट देता है
अथवा कभी कभी क्षण भर ही में किसी प्रकार रोगी के प्राणों ।
को भी नष्ट कर देता है ॥ ३३ ॥
भ्रमः प्रलापः पतनं प्रमोहो विचेष्टनं संलयनोष्णते च । स्रस्ताङ्गता मूर्च्छनमूर्ध्ववात-स्तीत्रा रुजो वातकृताश्च तास्ताः मांसोदकाभं रुधिरञ्च गच्छेत् सर्वेन्द्रियार्थो पर मस्तथैव । दशार्द्धसख्येष्वपि हि क्षतेपु सामान्यतो मर्मसु लिङ्गमुक्तम् ॥ दश से आधे ( पांच ) मर्म स्थानों में तत से भ्रम, प्रलाप, शक्ति या देह का पात, प्रमोह ( ॥ ३४ ॥
३५ ॥ या वेध होने चित्त नाश ), हस्तपाद का पटकना या देह का उलट पलट करना, सलयन ( सुप्ति ), शरीर की उष्णता बढ़ना, अङ्ग तथा सन्धियों में शैथिल्य, वेहोशी, ऊर्ध्ववात या ऊर्ध्वश्वास होना, वात जन्य भिन्न भिन्न तीव्र वेदनाएँ, मांस के धोवन के समान रह के रक्त का निकलना तथा सर्व प्रकार के इन्द्रियार्थों । के ग्रहण शक्ति का विराम होना ये सामान्यतया लक्षण होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ सुरेन्द्रगोपप्रतिमं प्रभूतं
रक्तं स्रवेद्वै क्षततश्च वायुः ।
करोति रोगान् विविधान् यथोक्तां-रिछन्नासु भिन्नास्वथवा सिरासु ॥ ३६ ॥
सिराओं के छिन्न तथा भिन्न होने पर वीरबहूटी के समान लाल रन का रक घाव से अधिक मात्रा में निकलता है तथा वायु प्रकुपित होकर अधिमन्ध शिरो रोग आदि विविध विकारों को उत्पन्न करता है ॥ ३६ ॥
विमर्श: - धातुक्षयात् स्रुते रक्त मन्दः संजायतेऽनिल । पव नश्च पर कोप याति । रक्तादिस्रुतिजरोगा - तदतिप्रवृद्ध शिरोरोगा-मिताप मान्ध्यमाक्षेपादींश्च करोति ॥ कौब्ज्यं शरीरावयवावसादः क्रियास्त्रशक्तिस्तुमुला रुजश्च । चिराद् व्रणो रोहति यस्य चापि तं स्नायुविद्धं मनुज व्यवस्येत् ॥ ३७ ॥
कुबड़ा होना, शरीर के अवयवों में ग्लानि, शारीरिक क्रियाओं में अशक्ति, तोच वेदना तथा व्रण का देरी से रोहित होना ये स्नायुविद्ध के लक्षण हैं ॥ ३७ ॥
शोफातिवृद्धिस्तुमुला रुजश्च बलतयः पर्वसु भेदशोफौ । क्षतेषु सन्धिष्वचलाचलेषु स्यात् सन्धिकर्मों परतिश्च लिङ्गम् ॥ ६८ ॥
शोफ की अधिक वृद्धि, भयकर वेदनाएं, वल की क्षीणता, पर्वों ( जोड़ों ) में स्फोटन की पीड़ा और शोथ तथा सन्धियों के कार्य ( गति, चेष्टा, संकोच, विस्तार ) का उपरम ( अभाव ) होना ये सब अचल तथा चल सन्धियों के चत होने के लक्षण है ॥ ३८ ॥
विमर्श: -- सन्धिभेदा - शायासु इन्वो कट्यान्न चेष्टावन्तश्च सन्धयः । शेषास्तु सन्धयः सर्वे विधेया हि स्थिरा बुधे ॥ अस्थियों की सन्धियों को Joints or Artionlations कहते है । अधिक चेष्टाशील Diarthroses or Movable Joints, अक्षप. चेष्टा शील Amphiarthroses or mixed Articulations अचेष्ट, अचल या स्थिरसन्धियां Synarthroses or Immo • vable Joints कर्मो परतिः कर्मनाश ( Loss of function ) । घोरा रुजो यस्य निशादिनेपु
सर्वास्ववस्थासु न शान्तिरस्ति ।
तृष्णाङ्गसादौ श्वयथुश्च रूक्ष-स्तमस्थिविद्धं मनुजं व्यवस्येत् ॥ ३ ९ ॥
जिस मनुष्य के रात और दिन में भयङ्कर पीढाएं होती हो, किसी भी अवस्था में रखने पर भी शान्ति न मिलती हो तथा प्यास, भट्ठों में पीडा, शोथ और रूक्षता रहती हो तो उसके अस्थि में विद्ध हुआ जानना चाहिये ॥ ३ ९ ॥ यथास्त्रमेतानि विभावयेयु-लिङ्गानि मर्मस्वभिताडिते । स्पर्श न जानाति विपाण्डुवर्णो यो मांसमर्मण्यभिताडितः स्यात् ॥ ४० ॥
सिरा, स्नायु, सन्धि और अस्थि इन मम में चोट लगने पर ये पूर्वोक्त लक्षण क्रमशः अपने अपने समझने चाहिये । मांसमर्म के ताहित होने पर स्पर्शज्ञान का अभाव, शरीर या वचा के वर्ण का विशेषतया पाण्डु हो जाना ये लक्षण | होते हैं ॥ ४० ॥
आत्मानमेवाथ जघन्यकारी शस्त्रेण यो हन्ति हि कर्म कुर्वन् । तमात्मवानात्महनं कुवैद्यं विवर्जयेदायुरभीप्समानः ॥ ४१ ॥
कुत्सित तथा हीन कर्म करने वाला वैद्य शस्त्रकर्म के समय असावधानी से अपने ही अङ्ग को काट देता है ऐसे आत्म-घाती कुवैद्य को आत्मा का हित और दीर्घायु की कामना. वाला मनुष्य छोड़ देवे ॥ ४१ ॥
तिर्यक्प्रणिहिते शस्त्रे दोषाः पूर्वमुदाहृताः । ' तस्मात् परिहरन् दोषान् कुर्याच्छस्त्रनिपातनम् ॥४२ ॥
श के तिरछा चलाने से जो दोष उत्पन्न होते हैं उन्हें अग्रोपहरणीय अध्याय में कह चुके हैं इसलिये दोषों का परि हार करते हुए शख का अवचारण ( प्रयोग ) करना चाहिये ॥
मातरं पितरं पुत्रान् बान्धवानपि चातुरः ।
श्रप्येतानभिशङ्केत वैद्ये विश्वासमेति च ॥ ४३ ॥
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श्रध्यायः २६ ] सूत्रस्थानंम् | I
विसृजत्यात्मनाऽऽत्मानं न चैनं परिशङ्कते ।
तस्मान् पुत्रत्रदेवैनं पालयेदातुरं भिषक् ॥ ४४ ॥
व्यावित पुरुष माता, पिता, पुत्र और बन्धुओं में भी मन होकर रहता है किन्तु वैद्य में पूर्ण विश्वास करता है तथा अपने शरीर को वैद्य के भरोसे छोड़ देता है, किसी भी प्रकार को शङ्का नहीं करता है इसलिये सच्चा वैद्य उस रोगी का अपने पुत्र के समान चिकित्सादि द्वारा रवण करे ॥ ३-४२ ॥
वर्मार्थो कीर्तिमत्ययं सतां ग्रहणमुत्तमम् ।
प्राप्नुयान् स्वर्गवासद्ध हितमारभ्य कर्मणा ॥ १५ ॥
इस तरह कारी ( दोषरहित ) कर्म ( चिकित्सा ) करने वाला वैद्य धर्म, दर्य, अधिक कोर्ति, सज्जनों में आदर अग और स्वर्गवास को प्राप्त करता है ॥ १५ ॥
कर्मगा कञ्चिदेकेन द्वाभ्यां कश्चित्त्रिमित्तया ।
विकारः साव्यते कश्चिचतुर्भिरपि कर्मभिः ॥ १६ ॥
इति मुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽष्टविवशत्रकर्मीयो नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
कोई रोग एक कर्म से, कोई दो कर्म से, कोई तीन कर्म से तथा कोई चार कर्म से ट्रोक होता है ॥ १६ ॥
विमर्शः शब्द से अष्ट चिकित्सार्थ दृष्टि से वमन, विरेचनादिक परिर्वन करें । स्नेह, स्वेद सम्ब ङ्गादि बहिःपरिमार्जन करें । रोगों को ठीक करने के लिये साथ साथ या जागे पीछे कई कर्म किये जा सकते हैं । इस्यायुर्वेदवच्चसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थानेऽष्टविव. मनो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
- JAN
fift पविंशतितमोऽध्यायः ।
श्रयातः प्रनष्टशल्यविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
ययोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर प्रनष्टत्यविद्वान नामक अभ्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - प्रनष्टास्यादि का तात्पर्य है कि जो शल्य बाहर से शरीर के भीतर मांसादि धातु में प्रविष्ट होकर प्रनष्ट ( दर्शित ) हो जाता है उसे कहां स्थित है ' नादि जानने । का प्रकार |
' शल ', ' वक्त ' आशुगमने धातुः । तस्य शल्यमिति ।
रूपम् । तद् द्विविधं - शारीरमागन्तुकञ्च ॥ ३ ॥
तथा ये दो धातु आनुगमन अर्थ में हैं उन से । " डे " इस लौणादिक सूत्र से यत् प्रत्यय करने पर शल्य यह रूप सिद्ध होता है । वह दो प्रकार का है । शारीरिक और कागन्तुक ॥ ३ ॥
: - ' ' शब्द के बाह्र तथा घर चलाका ये दो अर्थ होते हैं । " वा पुसि धनं शङ्कतां ”, यत्किचित्रात्राचकरं शरीरं तत्सर्वमेव प्रवदन्ति वनम् ' इस परिभाषा वल से शङ्क तथा । नरशलाकादि दोनों गृहीत होते हैं । वात्वर्थ ठर्थ- शुचत्याशु गच्छति वेगेनान्न शरीरमनुप्रवि-ग्रतीति शश्यन् । चव् हिंसार्या वातुन्नत्य शमनिति रूपम् । वळे त्रायां धातु वा शक्यमिति उपन् । सर्वशरीराचा धकरं शल्यं, तदिद्दोपविश्यत इत्यतः । शल्यशास्त्रम् ॥ ४ ॥
समस्त शरीर में जो बाघा या पोडा करता हो उसे कहते हैं । उसी दाल्य को निकालने के लिये यहां उपदेश दिया जाता है इसलिये इम को मशाल कहते हैं ॥ १ ॥
विमर्श: - शरीर ग्रहण से मन का ग्रहण स्वतः ही हो जाता है जैसा कि गोनम ने ' न्यायसूत्र ' में कहा है " चेष्टेन्द्रिया-र्थात्रयः शरीरन् ” जन्तःश्वास तथा अन्नपानादिक भी सन्तः प्रवेश होते हैं नतः ग्हें ' शल्य ' नहीं कहा जाय इस लिये ' वाघाकर ' शब्द दिया है । यदि अन्न भी अधिक मात्रा में या दूषित रूप में दिया जाय तो शरीर में बाधाकारी हो का । ' दशदय ' हो सकता है । इस तरह ' शल्य ' शब्द से शरशलाका, शङ्क ही नहीं अपितु यावन्मात्र भाव जो कि शरीर को पोढा पहुंचाबें समस्त ' शरन ' हो सकते हैं । जैसा कि प्रथमाधाय मैं कहा है- " शक्य नाम विधिवत् काष्ठपाषाणपशु टोहठोष्टा-स्थित्राडनखनूयान्नावान्तर्गशब्दोहरणार्थं यन्त्रशत्रन्नाराग्निप्रणिवा नत्रगविनिश्रयाय च ' । तत्र शारीरं रोमनखादि धातवोऽन्नमला दोषाश्च दुष्टाः । आगन्यपि शारीरशल्यव्यतिरेकेण यावन्तो भावा दुःखमुत्पादयन्ति ॥ ५ ॥
शारीरिक और वागन्तुक ऐसे शल्य के दो भेद किये गये हैं । उनमें दन्त, रोम, नल, श्मश्रु आदि तथा रसादि धातु, अन्न, मल तथा दूषित हुये वातादि दोष ये शारीरिक शल्य हैं एवं इन शारीरिक धरनों के अतिरिक्त संसार के यावन्मात्र पदार्थ जो कि दुःख उत्पन्न करे उन्हें भागन्तुक शल्य ( Foreign body ) कहते हैं ॥ ५ ॥
विमर्श: - शरीरमानवः पुनर्हिविदा -संग्रहेण मलभूता. प्रसाद-मृताथ । तन्न महमूनाले ये शरीरस्य वायकराः स्युलक्या — शरी-रन्तिद्वेषूपदेशः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः परिपकाश्च धातवः प्रकुपि • ताश्च वातपित्तश्लेग्नागः, ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे विन्डो भावाः शरीरस्योपवातायोपपद्यन्ते सर्वास्तान् मठान संचन । ( चरक ) । अधिकारो हि लोहवेणुवृनतृणशृङ्गास्थिमयेषु, तत्रापि विशेषतो लोहमयेष्वेव विशसनार्थी पपन्नत्वा-ल्लोहस्य, लोहानामपि दुर्वारत्वाद्गुमुखत्वाद् दूरप्रयो-जनकरत्वाञ्च शर एवाधिकृतः ॥ ६ ॥
स्वर्ण, रनव, ताम्र, लोहादि धातु तथा चांस, वृत्र, तृग,