श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 161–170
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 161–170
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१०८ सुश्रुतसहिता । अस्थि आदि से बने पदार्थों में शल्यत्व का अधिकार है उन में भी विशेषतया हिंसार्थं प्रयुक्त होने के कारण लोह के पदार्थों में शल्य शब्द प्रयुक्त होता है । लोहों में भी दुर्वारण होने से, सूक्ष्ममुख होने से तथा दूर से भी छोडने पर लक्ष्यवेधक होने से ' शल्य ' शब्द मे ' वाण ' का ही अधिक तर ग्रहण होता है ॥ ६ ॥
विमर्श ' — प्राचीनकाल में युद्ध के लिये बाणों का प्रयोग होता था तथा ये अत्यन्त तीचा मुखवाले और कठिन होते । थे एव दूर से ही वेग के साथ आकर कवचादि को छेदकर शरीर में प्रविष्ट हो के पीड़ा करते थे इस तरह अल्पशा । का उदय प्रथम इन त्रार्णो को निकालने लिये हुआ था । अतः सम्पूर्ण ' शवचिकित्सा ' का शल्यचिकित्सा या शल्यतन्त्र नाम पड़ा । स द्विविधः कर्णी, लक्ष्णश्च । प्रायेण विविधवृत्तपत्र पुष्पफलतुल्याकृतयो व्याख्याता व्यालमृगपत्चिवक्त्र सहशाश्च ॥ ७ ॥
यह बाण दो प्रकार का होता है । प्रथम वर्णक और द्वितीय कर्णरहित 1 । ये वाण प्रायः अनेक प्रकार के वृक्ष, पत्र, पुप्प और फलों के आकार के समान तथा हिंसक सर्प, मृग पक्षियों के मुख के समान आकृति वाले होते हैं ॥ ७ ॥
विमर्श - जिनके पीछे कुछ लगा हो अर्थात् चढिरा के समान कांटों वाले हों वे गी तथा जो विल्कुल सीधा हो वह होता है । कुछ पीपल के पत्ते के समान चौडी और चपटी नोक वाले, कुछ कनेर के पत्र के समान लम्बी तथा चपटी नोक वाले, कुछ मालतीकलिका के सदृश गोल नोक वाले, कुछ पुलायची के समान तिधारी नोक युक्त तथा कुछ सिंहसर्पादि के सुत्र के समान नोक वाले होते थे । सर्वशल्यानान्तु महतामणूनां वा पञ्चविधो गति विशेष ऊर्व्वमधोऽर्वाचीनस्तिर्य्यगृजुरिति ॥ ८ ॥
as ' या छोटे सर्व प्रकार के शल्यों की पांच प्रकार की गति होती है जैसे ऊपर, नीचे, विपर्यस्त, तिर्यक् और सरल ॥८ ॥
तानि वेगक्षयात् प्रतिघाताद्वा त्वगादिपु त्रगस्तु ववतिष्ठन्ते । धमनी स्रोतोऽस्थिविवरपेशीप्रभृतिषु वा शरीरप्रदेशेषु ॥ ९ ॥
वे शल्य वेगक्षय होने से, प्रतिघात से त्वचा आदि व्रण वस्तुओं में किंवा धमनी, स्रोतस, अस्थिविवर और मांसपेशी आदि शरीर के प्रदेशों में अवस्थित हो जाते हैं ॥ ९ ॥
तत्र शल्यलचणमुच्यमानमुपधारय । तत्त द्विवि-धं - सामान्यं वैशेपिकञ्च । श्यावं पिढकाऽऽचितं शोफ वेदनावन्तं मुहुर्मुहुः शोणितास्राविणं बुदबुदवदुन्नतं
मृदुमांसञ्च व्रणं जानीयात् सशल्योऽयमिति । सामान्य-मेतल्लचणमुक्तम् ॥ १० ॥
उन स्थानों में स्थित होने पर जो शल्य के लक्षण होते हैं उन्हें कहता हूं श्रवण करो । वह लक्षण दो प्रकार का है, एक मानान्य तथा दूसरा विशेष | यदि व्रण श्यामवर्ण का पिडकाओं से युक्त, शोफ और पीढा वाला, बार बार रक्तस्राव होता हो, चुलबुले उठते हों और मुलायम मांस हो ऐसे व्रण को शल्य.
युक्त समझना चाहिये । यह सामान्य लक्षण कहा है ॥ १० ॥
वैशेषिकन्तु -- लग्गते विवर्णः शोफो भवत्यायतः कठिनच | मांसगते शोफाभिवृद्धिः शल्यमार्गानुपसं-रोह: पीढनासहिष्णुता चोपपाकौ च । पेश्यन्तरस्थेऽ-प्येतदेव चोपशोफवर्जम् । सिरागते सिराऽऽध्मानं सिराशूलं सिराशोफ्ट्ा । स्नायुगते स्नायुजालोत्क्षेपणं
संरम्भश्चोत्रा रुक् च । स्रोतोगते स्रोतसां स्त्रकर्मगु-हानिः ॥ ११ ॥
विशेष लक्षणों में त्वचागन शल्य होने पर त्वचा का रङ्ग बदल जाता है तथा वहां विस्तृत और कठिन शोथ होता है । मासगत शल्य होने पर शोफ की अधिक वृद्धि, शल्य के मार्ग का रोपण नहीं होना, पीडन करने से असह्यता ( Tenderness ) तथा वहां चोप ( दाह ) और पाक होता है । पेशी में शल्य होने पर भी चोप तथा शोफ के दिना उक्त लक्षण ही होते हैं । सिरागत शक्य होने पर सिराओं का रक्तावरोध होना, फूलना, सिराओं में वेदना और सिराशोफ ( Phlebatis ) ये लक्षण होते हैं । स्नायुगन शल्य होने पर स्नायुओं का संकोच, तीच शोध और भयहर पीढ़ा ये लक्षण होते हैं । स्रोतोगत शल्य होने पर उनके कार्य का नाश यह लक्षण होता है ॥११ ॥
घमनोस्थे सफेनं रक्तमीरयन्ननिलः सशब्दो निर्ग-च्छत्यङ्गमर्दः पिपासा हल्लासश्च । अस्थिगते विविध-वेदनाप्रादुर्भावः शोफश्च । अस्थिविवरगतेऽस्थिपूर्ण-ताऽस्थितोद संहर्षो बलवांश्च । सन्धिगतेऽस्थिवचेष्टो-परमश्च कोष्ठगत आटोपानाही मूत्रपुरीषाहार दर्शनञ्च व्रणमुखात् । मर्मगते मर्मविद्धवच्चेष्टते । सूक्ष्मगतिषु शल्येष्वेतान्येव लक्षणान्यस्पष्टानि भवन्ति ॥ १२ ॥
धमनीगत शल्य होने पर फेनवाले रक्त को बाहर निकालता हुआ वायु शब्द करता हुआ निकलता है तथा अङ्गमर्द, पिपासा और जी मिचलाना ये लक्षण होते हैं । अस्थिगत शल्य होने पर अनेक प्रकार की पीढ़ाओं का होना तथा शोफ ये लक्षण होते हैं । अस्थिविवरगत शल्य होने पर उसका भर जाना, उसमें सूई चुभोने की सी पीड़ा होना तथा बलवान् संहर्ष ( संघट्टन या वैचेनी ) लक्षण होते है । सन्धिगत शल्य होने पर अस्थिगत शल्य के समान लक्षण होते हैं तथा उनको चेष्टाओं का नाश हो जाता है । कोष्ठगत शल्य होने पर आटोप ( गुड़गुड़ शब्द ), आफरा होता है तथा व्रण के मुख से मूत्र, मल और आहार आता है । ममंगत शल्य होने पर मर्मविद्ध के समान चेष्टा करता है । सूक्ष्मगति वाले शल्यों में भी ये ही लक्षण अस्पष्टरूप में उत्पन्न होते हैं ॥ महान्त्यल्पानि वा शुद्धदेहानामनुलोमसन्निविष्टानि रोहन्ति, विशेषतः कण्ठस्रोतः सिरात्वक्पेश्यस्थिविव-रेपु । दोषप्रकोपव्यायामाभिघाताजीर्णेभ्यः प्रचलितानि । पुनर्बाधन्ते ॥ १३ ॥
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श्रध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् । २०६ शुद्ध शरीर वाले मनुष्यों में रोमों के अनुकूल प्रविष्ट हुये छोटे या बड़े सर्व प्रकार के शल्य तथा विशेष कर कण्ठ, स्रोतस, सिरा, स्वक्, पेशी और अस्थिविवरगत शल्यों के व्रण रोहित हो ( भर ) जाते हैं किन्तु दोषों का प्रकोप व्यायाम, अभिघात और अजीर्ण से चलायमान होकर शरीर को फिर बाधा पहुंचाते हैं ॥ १३ ॥
तत्र, त्वक्प्रनष्टे स्निग्ध स्विन्नायां मृन्मापयत्रगोधू-मगोमयमृदितायां त्वचि यत्र संरम्भो वेदना वा भवति | तत्र शल्यं विजानीयात् । स्त्यानघृतमृञ्चन्दनकल्कैर्धा प्रदिग्धाचां शल्योष्मणाऽऽशु विसरति घृतमुपशुध्यति वा लेपो यत्र तत्र शल्यं विजानीयात् । मांसप्रनष्टे । स्नेहस्वेदादिभिः क्रियाविशेषैरविरुद्धैरातुरमुपपादयेत्, कर्शितस्य तु शिथिलीभूतमनववद्धं शुभ्यमाणं यत्र संरम्भं वेदनां वा जनयति तत्र शल्यं विजानीयात् । कोष्टास्थिसन्धिपेशीविवरेष्ववस्थितमेवमेव परीक्षेत, सिराधमनीस्रोतःस्नायुप्रनष्टे खण्डचक्र संयुक्ते याने व्याधितमारोप्याशु विषमेऽध्वनि यायाद् यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात् । अस्थिप्रनष्टे स्नेहस्वेदोपपन्नान्यस्थीनि बन्धनपीडनाभ्यां भृशमुपा चरेद्यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानी यात् । सन्धिप्रनष्टे स्नेहस्वेदोपपन्नान् सन्धीन् प्रसर-णाकुञ्चनवन्धनपीडनैर्भृशमुपाचरेत्,, यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात् । मर्मप्रनष्टे वन-न्यभावान्मर्मणामुक्तं परीक्षणं भवति ॥ १४ ॥
त्वचा में शल्य छिपा हुआ हो तो उसको तैल से स्निग्ध तथा स्वेदन से स्विन्न करके मिट्टी, उड़दी, जौ, गेहूं और गोवर इनमें से किसी एक के द्वारा रगडने पर त्वचा के उस स्थान में संरम्भ ( शोय या सुख या सुरसुराहट ) और पीड़ा प्रतीत हो तो वहां शल्य है ऐसा जानो । अथवा जमा हुआ घी, मिट्टी और चन्दन का लेप करने से यदि शल्य हो तो उसकी गरमी से शीघ्र ही वह घृत फैलता है तथा लेप सूख जाता है । नास में शल्य के छिप जाने पर स्नेहन, स्वेदन आदि नविरुद्ध विशेष क्रियाओं द्वारा रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये । दुबले पतले मनुष्य का ढीला, अपने स्थानसे मुक्त तथा चुमित किया हुआ शल्य जहां पर भी लालिमा, शोथ और पीड़ा उत्पन्न करता हो वहां ही उसे स्थित समझना चाहिये । कोष्ठ, अस्थिविवर, सन्धिविवर और पेशी विवर में प्रनष्ट शल्य की भी इसी प्रकार परीक्षा कर स्थान निश्चित करें । सिरा, धमनी, स्रोतस और स्नायुओं में शल्य गुप्त हो तो टूटे हुये पहिये की गाड़ी में रोगी को बिठा कर विषम ( टेढ़े मेढे ) मार्ग से चलाने से जहां पर संरम्भ ( सुख, शोथ ) और वेदना प्रतीत हो वहीं शल्य है ऐसा जानो । अन्थि के अन्दर दशल्य के गुप्त होने पर स्नेहन तथा स्वेदन से युक्त सन्धियों का बन्धन तथा पीढ़न से अत्यन्त उपचार करे तथा ऐसा करने से जहां संरम्भ और वेदना हो वहीं शक्य की स्थिति जानो । सन्धि में शहय के गुप्त होने पर प्रथम सन्धियों पर स्नेहन और स्वेदन करके फिर उन्हें प्रसारण, आकुञ्चन, वन्धन और पीड़न आदि क्रियाओं से उनका उपचार करना चाहिये । ऐसा करने से जहां भी संरम्भ तथा वेदना हो वहीं शक्य समझना चाहिये । मर्मस्थान में शल्य गुप्त होने पर सिरा, मांस आदि स्थानों से अतिरिक्त मर्म न होने के कारण उपर्युक्त सिरामांसादि स्थानगत शल्य परीक्षा विधियों से ही ममंगत शल्य के अस्तित्व का पता लगा लेना चाहिये ॥ १४ ॥
सामान्यलक्षणमपि च हस्तिस्कन्धाश्वपृष्ठपर्वतद्रुमा-रोहणधनुर्व्यायामद्रुतयाननियुद्धाध्वगमनलङ्घन्न प्रतरण-वनव्यायामै भौहार का सक्षवथुष्ठीवन हसनप्राणाया-मैर्वातमूत्रपुरीषशुकोत्सर्गैर्वा यत्र संरम्भो वेदना वा । भवति तत्र शल्यं विजानीयात् ॥ १५ ॥
गुप्त शव्य के सामान्य विज्ञानोपाय - जैसे हाथी के कन्धे पर बैठने से, घोडे की पीठ पर बैठने से तथा पहाड़ और पेडों पर चढ़ने से, धनुप के तानने, व्यायाम करने, शीघ्र चलने, बाहुयुद्ध, मार्ग में चलने, खड्डे को लांघने, नदी को तैरने, ऊचे कूदने और व्यायाम करने से तथा जमुहाई, ढकार, कास, छींक, ष्ठोवन, हसने और प्राणायाम करने से एवं वात, मूत्र और मल के उत्सर्ग करने से जहां पर सुख, शोध अथवा पीढ़ा होती हो वहाँ ही शल्य है ऐसा जानना चाहिये ॥ १५ ॥
विमर्श: -- तक्षेपेण प्रवनष्टशल्यलक्षणम् - सामान्येन मशल्यन्तु क्षोभिण्या क्रियया सरुक् । वृत्तं पृथु चतुष्कोणं त्रिपुट समासत । अदृश्यशल्यसंस्थानत्रणाकृत्या विभावयेत् ॥ ( वाग्भट )
भवन्ति चात्र-यस्मिस्तोदादयो देशे सुप्तता गुरुताऽपि च ।
घट्ट बहुशो यत्र यते तुद्यतेऽपि च ॥ १६ ॥
आतुरश्वापि यं देशमभीक्ष्णं परिरक्षति ।
संवाह्यमानो बहुशस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत् ॥ १७ ॥
शरीर के जिस अङ्ग प्रत्यङ्ग में सूई चुभोने की सी पीड़ा, सुप्तता, गुरुता प्रतीत हो तथा घर्पण करने से स्राव निकलता हो तथा अधिक पीड़ा प्रतीत हो तथा रोगी जिस स्थान की निरन्तर अधिक रक्षा करता हो एवं जहाँ वार वार संवाह्य मान अर्थात् दवाता हो वहीं शल्य समझना चाहिये ॥ १६-१७ ॥
अल्पाबाधमशूनञ्च ' नीरुजं निरुपद्रवम् ।
प्रसन्नं मृदुपर्य्यन्तं निराघट्टमनुन्नतम् ॥ १८ ॥
एषण्या सर्वतो दृष्ट्वा यथामार्गं चिकित्सकः ।
प्रसाराकुञ्चनान्नूनं निःशल्यमिति निर्दिशेत् ॥ १६ ॥
जहां पर पीड़ा कम हो, शोथ न हो, रुजा न हो, किसी प्रकार का उपद्रव न हो, देखने में रोगी अथवा वह स्थान प्रसन्न या निर्मल दीखता हो, जिसके पर्यन्त ( किनारे ) मुलायम हो, निश्चल हो, ऊंचा उठा हुआ प्रतीत न हो, ऐसे
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सुश्रुतसंहिता | ११० को उसके मार्ग के अनुसार एपणी ( Probe ) से भली. सप्तविंशतितमोऽध्यायः । व्रण भांति देखकर तथा उस भङ्ग का प्रसार और सोच करके अथातः शल्यापनयनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
भली प्रकार परीक्षा करके शल्य रहित है ऐसा निर्देश या यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
निदान करे ॥ १८-१९ ॥ बायप्रविष्टशल्य अव इसके अनन्तर शल्यापनयनीय अध्याय का वर्णन विमर्श: - भाजकल X - Ray के द्वारा | करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये
( Foreign body ) का पता लगा लेते हैं ।
तु शल्यमन्तश्च शीर्य्यते । कहा था ॥ १-२ ॥
अध्यात्मकं भज्यतेशार्ङ्गमा यसचेति निश्चयः ॥ २० ॥ शल्यं द्विविधम् - अवबद्धमनवबद्धच ॥ ३ ॥
प्रायो निर्भुज्यते दो तीन भागों में टूट शल्य के दो भेद होते हैं । एक अवदद्ध अर्थात् धातुओं में अस्थिरूप शल्य भीतर हो भीतर शृङ्ग और लौह का | ससक या गढ़ा हुआ तथा दूसरा धनववद्ध या शिथिल ॥ ३ ॥
जाता है तथा कणशः फूट जाता है तथा शल्य प्रायः टेढ़ा हो जाता है यह निश्चित है ॥ २० ॥
वार्त्तवैणवतार्णानि निहियन्ते तु नो यदि ।. पचन्ति रक्तं मांसञ्च क्षिप्रमेतानि देहिनाम् ॥ २१ ॥
वृक्ष, बांस और तृण के शल्य शरीर के भीतर घुसने पर यदि उन्हें न निकाला जाय तो वे शीघ्र ही रक्त और मांस को पका देते हैं ॥ २१ ॥
कानकं राजत ताम्र रैतिक नपुसीसकम् ।
चिरस्थानाद्विलीयन्ते पित्ततेजः प्रतापनात् ॥ २२ ॥
स्वभावशीता मृदवो ये चान्येऽपीदृशा मताः ।
द्रवीभूताः शरीरेऽस्मिन्नेत्वं यान्ति धातुभिः ॥२३ ॥
इसी तरह सुवर्ण, चांदी, ताम्बा, पित्तल, रांगा और सीसा इनके शल्य शरीर में अधिक समय तक पढ़े रह जांय तो वे शरीरस्थ पित्त के तेज से तप या गलकर वहीं विलीन हो जाते हैं । इसी प्रकार स्वभाव से जो सौम्य और मृदु अन्य भी कोई ऐसे ही शक्य हों और वे अधिक समय तक शरीर ही में । रह जांय तो वे भी पित्त की गरमी से पिघल कर शरीर की रसरक्तादि धातुओं के साथ एकस्वरूपता को प्राप्त हो जाते हैं 11
विषाणदन्तकेशास्थिवेणुदारूपलानि तु ।
शल्यानि न विशीर्यन्ते शरीरे मृन्मयानि च ॥ २४ ॥
सींग, दांत, केश, अस्थि, बांस, लकड़ी, पत्थर और मिट्टी के शक्ष्य शरीर में अधिक समय तक रहने पर भी द्रुत होकर नष्ट नहीं होते हैं ॥ २४ ॥
द्विविधं पञ्चगतिमन्त्रगादिव्रणवस्तुषु ।
विश्लिष्टं वेत्ति यः शल्यं स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ २५ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने प्रनष्टशल्यविज्ञा-यो नाम षड्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २६ ॥
जो चिकित्सक कर्णी और इलक्ष्ण ऐसे द्विविध शस्य को जानता हो तथा ऊर्ध्वाधोभेद से उनकी पांच प्रकार की गति यों को जानता हो तथा स्वगादि व्रणवस्तुओं में उनकी विविध प्रकार की गुप्त या स्पष्ट स्थिति को जानता हो वही राजा का चिकित्सक बनने योग्य है ॥ २१ ॥
इत्यायुर्वेदतत्व सन्दी पिकाभाषायां सूत्रस्थाने प्रनष्टशल्यविज्ञा नयो नाम पविंशतितमोऽध्यायः ॥ २६ ॥
- umu तत्र समासेनानवबद्धशल्योद्धरणार्थं पञ्चदश हेतून वक्ष्यामः । तद्यथा - स्वभावः, पाचनं, भेदनं, दारणं, पीडनं, प्रमार्जनं, निर्मापनं, वमनं, विरेचनं, प्रक्षालनं, प्रतिमर्शः, प्रत्राहणम्, चूपणम्, अयरकान्तः, हर्पश्चेति ॥ ४ ॥
उनमें से अनववद्ध शल्य को निकालने के लिये सक्षेप से पन्द्रह उपाय बताते हैं जैसे स्वभाव, पाचन, भेदन, दारण, पीडन, प्रमार्जन ( वखादि से पोंछना ), नस्यादि से निर्मा पन, वमन, विरेचन, प्रक्षालन, प्रतिमर्श, प्रवाहण, आचूषण, अयस्कान्त तथा हर्ष ॥ ४ ॥
विमर्श. - Load stone ) से भाकर्षण कार्य होता है । तत्र, अश्रुतवथूद्गारका समूत्रपुरीपानिलैः ' स्वभाव-बलप्रवृत्तैर्नयनादिभ्यः पतति । मांसावगाढं शल्यम-विदह्यमानं पाचयित्वा प्रकोपात् तस्य पूयशोणितवेगाद् गौरवाद वा पतति । पक्कमभिद्यमानं भेदयेद्दारयेद् वा | भिन्नमनिरस्यमानं पीडनीयैः पीडयेत् पाणि-भिर्वा | अणून्यक्ष शल्यानि परिपेचना मापनैर्बाल-वखपाणिभिः प्रमार्जयेत् । आहारशेषश्लेष्महीनागु-शल्यानि श्वसनोत्कासनप्रधमनैर्निर्धमेत् । अन्नशल्यानि वमनाङ्गुलिप्रतिमर्शप्रभृतिभिः । विरेचनैः पक्काशय-गतानि । ब्रणदोषाशयगतानि प्रक्षालनैः । वातमूत्रपुरी-षगर्भसङ्गेषु प्रवाहणमुक्तम् । मारुतोदकसविषरुधिर-दुष्टस्तन्येवाचूषणमास्येन विषाणैर्वा । अनुलोममनव-बद्धमकर्णमनल्पव्रणमुखमयस्कान्तेन । हृद्यवस्थितमनेक-कारणोत्पन्नं शोकशल्यं हर्षेणेति ॥ ५ ॥
इनमें से आंसू बहाना, छींके लेना, डकारें आना, कासना | तथा मल, मूत्र और वायु का निकलना ऐसे इन स्वाभाविक | रूप से प्रवृत्त उपायों द्वारा नेत्रादि समस्त शरीर के स्थानों से शल्य बाहर आ गिरता है । मांस में गहरा स्थित शल्य यदि स्वयं न पकता हो तो उसे भोषधियों के लेपादि से पकाना चाहिये । पकने से वह पूय और रक्त के वेग के साथ अथवा स्वयं के भारीपन से बाहर निकल आता है । पकने पर भी यदि नहीं फूटता हो तो उसे शस्त्र द्वारा भेदन करना चाहिये अथवा उष्ण औषधियों के लेप से विदारण करना चाहिये । भिन्न होने पर भी जो शल्य या पूय बाहर नहीं भाता हो तो
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अध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् । १११ उसे पीड़नीय द्रव्यों के लेप से अथवा हस्त से दवा कर बाहर निकालना चाहिये । इन्द्रियों के सूचम शल्यों को परिषेचन, या लामापन से अथवा बाल, कपडा या हाथ से पोंछ कर निकाल देने चाहिये । भोजन के समय असावधानीवा बोलने या हंसने से नासा या श्वास मार्ग में गये हुये आहार को तथा खांसने पर भी पूरे रूप से न निकल कर बचे हुये । लेप्मा को तथा हीन ( छोटे ) और अणु ( अतिसूक्ष्म ) शयों को श्वसन मे जोर से खांसने से और प्रधमन द्वारा बाहर निकालना चाहिये । अन के शस्यों को चमन द्वारा या अगुलि को जीभ - तालु पर विस कर निकालना चाहिये । पक्वाशयगत शश्यों को विरेचन औषध देकर निकाल देना । चाहिये | व्रण तथा दोषों के आशयों ( स्थानों ) में प्रविष्ट शल्यों को प्रदालन द्वारा निकालना चाहिये । वात, मुत्र, मल और गर्भ के रुक जाने पर प्रवाहण द्वारा उहें बाहर निकाल देने चाहिये । वायु, पानी, विषयुक्त रक्त, दूषित दुग्ध को मुख अथवा विषाण ( सींग ) से लचुपग करके निकाले । अनुलोम, शिथिल, कर्णहीन ( रलधग ) तथा चौडे मुख के व्रण में स्थित हुये शल्य को अयस्कान्त द्वारा निकालना
चाहिये । अनेक कारणों मे उत्पन्न तथा हृदय में स्थित शोक ।
रूपी शल्य को हर्ष द्वारा दूर करना चाहिये ॥ ५ ॥
सर्वशल्यानान्तु महतामणूनां वा द्वावेवाहरणहेतू भत्रत्ः I । प्रतिलोमोऽनुलोमञ्च । तत्र प्रतिलोममर्वाचीनः । मानयेत्, अनुलेोमं पराचीनम् । उत्तुण्डितं हित्वा निर्घातयेच्छेदनीयमुखम् । छेद-नीयमुखान्यपि कुक्षित्रनः कक्षावदक्ष गपर्शुकान्तरपति-तानि च हस्तशक्यं यथामार्गेण हस्तेनैवापहर्त्तं प्रयतेत । हस्तेनापहर्त्ती मशक्यं त्रिशस्य शस्त्रेण यन्त्रेणापहरेत् ॥ बड़े या छोटे सभी प्रकार के शल्यों को निकालने के लिये दो ही उपाय होते हैं । एक प्रतिलोमविध तथा दूसरी अनुलो-नविधि । जो शल्य अर्वाचीन अर्थात् शरीर के अन्दर दूर तक नहीं गया हो उसे प्रतिलोम करके अर्थात् उसी प्रवेश मार्ग से निकाले तथा पराचीन ( शरीर में दूर तक प्रविष्ट ) शल्य को अनुलोम करके अर्थात् प्रवेशमार्ग से न निकाल कर दूसरी ओर नया मार्ग करके निकालना चाहिये । अथवा जिस दिशा से शरीर में दशल्य प्रविष्ट हुआ हो उसी दिशा में आगे बढ़ाकर निकालना चाहिये । उत्तण्डित अर्थात् दृश्यमान सुखवाले या टहत कण्टकाचित ( ऊचे कांटों से व्याष्ठ ) मुख वाले शल्य को निकालने के लिये दूसरी ओर छेदन करके हाथ से इधर उधर हिलाकर अनुलोम या प्रति लोम मार्गं से निकालना चाहिये । कुक्षि, वच, कक्षा, वंक्षण और पर्शुकान्तर ( Intercostal Space ) प्रदेश में फॅसे हुये वीधारामुख वाले शल्य को जो कि हाथ से निकल सके उन्हें उसी मार्ग से हाथ से हो प्रतिलोम निकालने का प्रयत्न करना चाहिये किन्तु जिनको हाथ से निकालना शक्य नहीं हो तो उस शल्य को प्रथम शस्त्र से काट कर पश्चात् यन्त्र से पकड़कर निकालना चाहिये ॥ ६ ॥
भवति चात्र-शीतलेन जलेनैनं मृर्च्छन्तमवसेचयेत् ।
संरक्षेदस्य मर्माणि मुहुराश्वासयेश्च तम् ॥ ७ ॥
शय निकालते समय मूच्छित होते हुये मनुष्य को शीतल जल मे सिक्षित करना चाहिये तथा हृद्य लोपधियों से इसके हृदय, मस्तिष्कादि मर्म स्थानों को रक्षा करे एवं बार बार उसे हर्षजनक बातों से आश्वासन देते रहना चाहिये ॥ ततः शल्यमुद्धृत्य निर्लोहितं व्रणं कृत्वा स्वेदाई-मन्निघृतप्रभृतिभिः संस्वेद्य विदा प्रदिा सर्पिर्मधुभ्यां बव्वाऽऽचारिकमुपदिशेत् ॥ ८ ॥
इसके अनन्तर हस्त था यन्त्र शक्य को निकाल कर व्रण के रक्त को पिचु - प्रोतादि से साफ कर स्वेदन के योग्य व्रण को अग्नि- घृतादि से स्वेदित कर अग्नि से जलाने योग्य को जलाकर फिर मधु और घृत का लेप कर पत्रन्धन करके व्रणिनोपासनांयोक्त आहार विहार का उपदेश करना चाहिये ॥८ ॥
विमर्शः - स्वधत्रणाः - श्रग्निकृत्या व्रणा ये तु तेष्वग्निमवचार-येत् । स्त्रैश्यैत् सपिण्डीभिः स्वेदकृन्यान् समन्ततः ॥ ( भोज ) ।
सिरास्नायुविलग्नं शलाकादिभिर्विमोच्चापनयेत् ।
स्वयथुप्रस्तवारङ्गे समबपीज्य श्वयथुं, दुर्बलबारङ्गं कुशा-दिभिर्वद्ध्वा ॥ ६ ॥
- सिरा और स्नायुओं में उलझे हुए शल्य को शलाका आदि से छुड़ाकर निकालना चाहिये । शोथ में फॅसे हुये वाण को शोथयुक्त स्थान को दबाकर निकालना चाहिये । दुर्बल बाण को कुशादि से बांधकर निकालना चाहिये ॥ ९ ॥
हृदयमभितो वर्त्तमानं शल्यं शीतजलादिभिरुद्वे-जितस्यापहरेद् यथामार्गम् | दुरुपहरमन्यतोऽपबाध्य-मानं पाटयिलोद्धरेत् ॥ १० ॥
हृदय के चारों ओर वर्तमान शल्य को शीतल जल से उद्वेजित पुरुष को आश्वासित कर जिस मार्ग से वह घुसा हो उसी मार्ग से निकालना चाहिये । यदि वह यथामार्ग से न निकल सके तो अन्य स्थान में थोडा छेदन कर के निकालना चाहिये ॥ १० ॥
अस्थिविवरप्रविष्टमस्थिविदष्टं वाऽवगृह्य पादाभ्यां यन्त्रेणापहरेदृशक्यमेवं वा बलवद्भिः सुपरिगृहीतस्य यन्त्रेण ग्राहयित्वा शल्यवारङ्गं प्रविभुज्य धनुर्गुणैर्वद्वैक-तव्चास्य पञ्चान्यामुपसंयतस्याश्वस्य वक्त्रकविके वध्नीयात् । अथैनं कशया ताडयेद्यथोन्नामयन् शिरो-वेगेन शल्यमुद्धरति । दृढां वां वृक्षशाखामवनम्य । तस्यां पूर्वद् वद्ध्वोद्धरेत् ॥ ११ ॥
अस्थि के छिद्र में प्रदिष्ट अथवा अस्थि में फँसे हुये शल्य को यन्त्र से पकढ कर तथा शल्ययुक्त स्थान के दोनों ओर पांव लगाकर खीचना चाहिये । अथवा इस प्रकार से यदि शल्य न निकल सके तो बलवान् मनुष्यों द्वारा रोगी को भली प्रकार नियन्त्रित करके उसके शल्य के बारह ( हत्ये ) को
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११२ यन्त्र के द्वारा पकड़ सुश्रुतसंहिता । बांध देवे तथा शल्य कर टेढा करके एक तरफ किये घोड़े के सुख के दूसरे भाग को पन्नानी से धनुर्गुण से पूर्वकोष्ठ चाहिये । अव घोडे में लगाम लगा कर बन्न में बद्ध सूत्रं च वामयेत् । वमतश्च वह गिर को झटके को कशा ( चाबुक ) से ताड़ित उसमें बांध देना नापहरेत् सहसा त्वाक्षिपेत्; शल्यैकदेशसक्तं ज्ञात्वा यदा पहले से ऊचा करता हुआ शस्य करे जिससे प्रणुदेद्वाऽन्तः मृदुना वा दन्तधावनकूर्चके शल्य वारह की तरह एक तरफ धनुष को निकाल लेढुं प्रयच्छेत्रिफला । क्षतकष्ठाय -नामित कर को घोड़े के बजाय वृक्ष की ढोरी से बन्धे हुये चूर्णं वा मधुशर्कराविमिश्रम् च मधुसर्पिपी देवें । इस शल्य का दूसरा किनारा की मजबूत शाखा को अटक अस्थि का टुकड़ा या अन्य || १५ || शल्य बाहर तरह छोड़ने पर वह शाखा इससे बांधकर छोड़ गुच्छी जाय तो उसे निकालने के कोई वस्तु कण्ठ में तिरछी निकल जावेगा ॥ ११ ॥ ऊंची उठेगी जिस से बांध ( केशोष्टुक = Probang लिये घोड़े के वालों की बनी
बांधने विमर्श - पञ्चाङ्ग - घोड़े के चारों चाहिये कर रोगी को गले तक द्रव ) एक तरफ मजवून ढोरा बद्धन्य को पञ्चाङ्गी बन्ध कहते हैं । सुम्रयतस्य पांव तथा मुल कस कर देना तथा उदर के पूरा भर जाने भोजन के साथ पिला देनी मुखसमाहिताना । कथ सुसयतस्य पञ्चाद्गया । पचानामहाना नृष्ठ शोधनं कृत्वा गुच्छी चाहिये वमन करने से शल्य पर रोगी को वमन करा कुछ टीकाकारों समाहार • पाहीन्यविशेष चतुणी पादाना खींचना में फसा जान कर उस ढोरे का एक प्रदेश उस वाट-साथ किया ने पनाहयानुपसंयतस्य. । ( अरुगदत्त ) अथवा चाहिये । ऐसा करने से को जोर से सहमा बाहर है । त्वक्पत्रङ्गुलुम है तथा पखाङ्गी ले सारयुद्ध का सम्बन्ध मनुष्य कर दन्तधावन की मुलायम कुर्ची शल्य बाहर आ जायगा । पञ्चाङ्गमिति संचितम् मूलं फलनेकस्य शाखिन । वृक्ष ग्रहण किया ढकेल निकालने या बाहर न निकल में उस गल्य को अटका ॥ एकत्र मिलितं चैतत् मलमार्ग देवे जिससे वह आमाशयादि सके तो भीतर की ओर ऋदेशोचुण्डितमष्टीलाऽश्ममुद्रराणामन्यतमस्य क्रिया से मल के साथ निकल में चला जा कर अन्त में हारेण विचाल्य यथामार्गमेव । देवे से कण्ठ में छत हो जाय तो जायगा । इस तरह को कुक्षि आदि अच्छेदनीय यन्त्रेण ॥ १२ ॥ प्र- | को देना अथवा चाहिये शहद और शर्करा के साथ दशहद और वृत चाटने को
शक्य को अष्टीला, पत्थर स्थान में प्रविष्ट ॥ १५ ॥ त्रिफला चूर्ण चटाने
प्रहार से शल्य को विचलित और मुहर इनमें से हुए उतुण्डिन | भस्मराशी उदकपूर्णाद्रमवाक्शिरसमत्रपीडयेद्धुनीयाद्वामयेद्वा से ही निकालना चाहिये कर यन्त्र से पकड़ किसी एक के वा निखनेदामुखात् यन्त्रेण विमृदितकर्णानि ॥ १२ ॥ कर प्रवेशमार्ग मनुष्य नदी, तालात्र, या कुए ॥ १६ ॥
चुण्डितानि कर्णत्रन्त्यनावाधकरदेशो पेट की टांगों को पकड़ में गिरने से पेट में पानी कर्णा पुरस्तादेव ॥ १३ ॥ करा पर दवावे, उसे इधर उधर कर लटका के शिर नीचा भरे हुये
न हो तो ढाल्य को जो कि पीढाकर रोगी देवे अथवा एक गढा खोदकर जोर से हिलावे अथवा कर के प्रविष्ट मार्ग प्रथम यन्त्र द्वारा उसके ( मर्म ) प्रदेश विमर्शः को सुख तक दवा कर रखे उस में राख भर वमन से ही निकालना चाहिये कर्ण को सकुचित में स्थित ' उदकपूर्णस्य --- पुनीयात् - धाक ॥ १६ ॥ के उस
जातु कण्ठासक्ते ॥ १३ ॥ करके जलमग्नमृच्छित चक्राद्यारोपगेनोदव पर लिटा के भी घुमाते
शलाकां तयाऽवगृह्य कण्ठे नाडीं प्रवेश्याभितप्ताञ्च गले की चिकित्सा निसार कार्य इति हैं । भूतामुद्धरेत् । अजातुपं शीताभिरद्भिः परिषिच्य अधोमुख के कपड़े हाथ से या में प्रथम उसके ( अरुगदत्त ) कया पूर्वकल्पनेत्येके जतुमधूच्छिष्टप्रलिप्तया स्थिरी | too लिटा के कृत्रिम चीर के हटा देवें फिर छाती और ॥ १४ ॥ शला- ) करना चाहिये श्वास - कर्म ( Artificial पृथ्वी पर
एक कण्ठ में लाख के शल्य पौछे, गरम कम्बल । साथ में सुख को respira उस नलिका ढाले तथा उसमें के फंम जाने पर प्रथम कण्ठ गरम बोतलें उसके आदि उस के पांव पर तथा वदन को से शल्य द्रुत होकर अग्नितप्त शलाका में हृदय तथा श्वास आस पास रखें । अमोनिया रखे । पानी को जल से उम नाली स्थित उसी में लग जायगा फिर प्रविष्ट कर nin Camphor केन्द्र की उत्तेजक ओषधियां गेस सुधावे । ठाचाशत्य को निकाल शलाका को सिञ्चित कर शीतल देवें । होश, Coramine आदि जैसे Strych शलाका के सिवाय अन्य वस्तु का लेना चाहिये । किन्तु जो शल्य स्थिरोभूत हुद्य पेय देवें में आने पर मद्य, चाय, काफी सूचिकाभरण रूप से आचायों द्वारा पूर्व विधि हो उसे लाख और मोम लाक्षा होकर मरने । प्रायः जलमझ की न्यूमोनिया आदि गरम और का मत है ॥ १२ के अनुसार ही निकाले से लिप्त भिरद्भिरान्मानकासश्वासपीनसेन्द्रियोपवात की सम्भावना रहती है, श्वास, कासादि, विमर्श: - - ॥ ऐसा कई रा मृत्युश्च । ' श्रन्यथा खुन्मार्गंगामि-वन वस्तु खा लेते प्राय छोटे बच्चे कभी तथा जलनिमग्न तत्र यथात्व कफे प्रतिकुर्याद वरादय. इलेप्मविका-phagus ) में फस हैं । वह वस्तु कण्ठ लाल ( के हुकड़े या वाले रोगों आदि प्राणावरोध ' ( अ ० स ० ) । धूमोपहत अस्थिशल्यमन्यद्य जाती है । अन्ननलिका = Oeso अन्य इस के लिये में कृत्रिम श्वासप्रक्रियाओं ( Asphyxia ), एडुकं तिर्यञ्चष्ठासक्तमवेच्य विधि ( शेफरविधि ( Sohafer's से बढ़ा लाभ होता करने है दृढैकसूत्रबद्धं द्रवभक्तोपहितं केशो ( Laborde's Silvester's method ) method ), विस्लेटर । पाययेदाकण्ठात् - सबसे उत्तम method ) काम में तथा लेवोर्डे की विधि की ;! पर लिटा देते और आसान है । रोगी आती हैं । प्रयमविधि हैं तथा वक्ष के निचले को अधोमुख कर हिस्से को एक भूमि तकिये
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व्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् । ११३ पर रखते है । फिर एक मनुष्य उसकी पीठ पर सवार होकर जमीन पर घुटने टेक कर अपने दोनों हाथों को रोगी की पीठ की दोनों ओर की अन्तिम पमलियों पर रखता हुआ आगे को झुक कर अपने शरीर भार को अपने दोनों हाथों पर डालता हुआ रोगी की छाती को खूब दबाना है जिससे फेफडे संकुचित हो जाते हैं । फिर वह अपने शरीर को पीछे की ओर पूर्वस्थिति में लौटाता है जिससे छाती पर का दबाव हट जाने से फुप्फुस विकसित होते हैं जिससे हवा बाहर को जाती है तथा विस्तार होने पर बाहर से भीतर को आती है । यह क्रिया प्रनिमिनट बारह से पन्द्रह बार करनी चाहिये । निल्वेस्टर की विधि में रोगी को पीठ के बल लिटाते हैं तथा जिह्वा को ढोरे, संबंग या अन्य प्रकार से लागे की ओर खिची जाती है । दूसरा कार्यकर्ता उसके सिरहाने के पास जमीन पर घुटने टेक कर कुहनी से रोगी के दोनों बाहुओं को पकड कर धीरे धीरे रोगी के सिर के ऊपर की ओर ले जाता है तथा वहां दो सेकण्ड तक ठहरना है जिससे छाती चौड़ी होती है, फेफडे फैलते हैं तथा वायु बाहर से भीतर जाती है तत्पश्चात् बाहुओं को वहां से नीचा करके छाती के दोनों ओर रखकर अपने पूरे बल से दबाता है जिससे फेफडे संकुचित होकर भीतर गई वायु वापस बाहर आती है । इस क्रिया को १ मिनट में पन्द्रह वार करे । लवॉर्टे विभि — इसमें रोगी की जिह्वा को स्माल से पकड । कर १ मिनट में पन्द्रह बार आगे को खीची जाती है जिससे मस्तिष्क श्वसन केन्द्र ( Respiratory centre ) उत्तेजित होता है । इस विधि को स्वतंत्र या अन्य विधि के साथ कर सकते हैं । प्रासशल्ये तु कण्ठासक्ते निःशङ्कमनववुद्धं स्कन्धे मुष्टिनाऽभिहन्यात्: स्नेहं मद्यं पानीयं वा पाययेत् ॥ १७ ॥
ग्रासगल्य के कण्ठ में आसक्त होने पर निःशङ्क हो के सहसा लग के स्कन्ध पर मुष्टि प्रहार करे अथवा उसे स्नेह, मद्य या पानी पिलाना चाहिये ॥ १७ ॥
बाहुरज्जुलतापाशैः कण्ठपीडनाद्वायुः प्रकुपितः लेप्माणं कोपयित्वा स्रोतो निरुणद्धि लालास्स्रावं फेना-गमनं संज्ञानाशं चापादयति । तमभ्यन्य संस्वेद्य शिरो-विरेचनं तस्मै तीक्ष्णं दद्याद्रसन्न वातघ्नं विदद्ध्यादिति ॥ हस्त, रज्जु, लता अथवा ढोरी आदि की फांस से कण्ठ को दवाने से वायु कुपित होकर श्लेप्मा को कुपित करके श्वास स्रोत को रोक देती है जिससे मुख से लालास्राव, फेन का । आना और संज्ञानाश ( बेहोशी या मूर्च्छा उत्पन्न होती है । ऐसे रोगी को अभ्यङ्ग कराके स्वेदित कर तीचा शिरोविरेचन देवे तथा वातनाशक रस का पान कराना चाहिये ॥ १८ ॥
विमर्श - बाहुपात्र से कण्टपीडन को Throtthng, रज या लतापाश से जो कण्ठपीडन करते हैं उसे Strangulation । तया रज्जु या लता का पाा लगाकर मनुष्य स्वयं अपने को । टांग लेता है या दूसरे टांग देते हैं उसे Hanging कहते हैं । इन तीनों में बाहर से शुद्ध वायु भीतर नहीं जाती हैं तथा भीतर की अशुद्ध वायु बाहर नहीं निकलती है जिससे संज्ञा-नाशादि लक्षण उत्पन्न होते हैं । चिकित्सा -ाले की फांस १५ सु ० काटना, कृत्रिमश्वास तथा Oxygen सूंघने को देना चाहिये ।
भवन्ति चात्र-शल्या कृतिविशेपांच स्थानान्यावेक्ष्य बुद्धिमान् ।
तथा यन्त्रपृथक्त्वं च सम्यक शल्यमथाहरेत् ॥ १६ ॥
शल्य की आकृति के विशेष भेट, शल्य के स्थान तथा यन्त्रों के भेट इन सभी का बुद्धिमान् वैद्य ठीक तरह से विचार. करके शल्य का आहरण करे ॥ १ ९ ॥
कर्णवन्ति तु शल्यानि दुःखाहार्याणि यानि च ।
आद्दीत भिषक् तस्मात्तानि युक्त्या समाहितः ॥ २० ॥
जो शल्य कर्णी हों तथा जो कठिनता से निकालने योग्य हों उन्हें वैद्य युक्ति से सावधान होकर निकाले ॥ २० ॥
एतैरुपायैः शल्यं तु नैव निर्यात्यते यदि ।
मत्या निपुणया वैद्यो यन्त्रयोगैश्च निर्हरेत् ॥ २१ ॥
उपर्युक्त उपायों से शल्य नहीं निकल सके तो वैद्य अपनी निपुण बुद्धि तथा यन्त्रों के द्वारा जैसे भी हो वैसे निकाले ॥ विमर्गः - शल्याहरणविधि - दृश्यं सिंहमुखाद्यैस्तु गृढं कङ्कमुखा-दिभि । निईरेतु शन चल्न शास्त्रयुक्तिन्यपेक्षया ॥ ( सुश्रुत ) । अयाहरेत् करप्राप्य करेणवेनरत्पुनः । दृध्य सिंहाहिमकरवर्मिकर्कट-कानन. ॥ अदृश्यं व्रणसस्थानाद् ग्रहीतुं शक्यते यत । कङ्क्षमृगा-ढकुररशरारीवारसानने ॥ तदशाभ्यां त्वगादित्थं तालाभ्या सुपिरं रेत् । मुषिरस्थ तु नल्कै ' शेषं शेषे यथायथम् ॥ ( वाग्भट ) । अहार्य-शल्यं - नैवाहरेद्विशल्यध्न नष्टं वा निरुपद्रवन् । शल्यमुखावरुद्धो यावदन्तवयुत्तिष्ठति तावज्जीवति, उद्घृतमात्रे तु शल्ये मर्मस्थाना-थितो वायुर्निष्क्रामति, तस्मात् सशल्यो नीवति, उदूघृतशल्यो त्रियते । ( सुश्रुत ) ।
शोथपाकौ रुजश्चोप्रा · कुर्याच्छल्यमनिर्हृतम् ।
वैकल्यं मरणं चापि तस्माद् यत्नाद्विनिर्हरेत् ॥ २२ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शल्यापनयनीयो नाम सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥ २७ ॥
यदि शल्य कोन निकाला जाय तो वह उस स्थान में शोथ, पाक, तीव्र वेदनाएं, विकलता तथा मृत्यु तक कर देता है इस लिये यत्नपूर्वक उसको निकालना चाहिये किन्तु विशल्यघ्न और निरपद्रव नष्ट शल्य को नही निकाले ॥ २२ ॥
विमर्शः– वाग्भटोक्तकर्णशल्यानि - कीटे कर्णस्रोत प्रविष्टे तोदो गौरव भरभरायणञ्च भवति, सन्दमाने चाप्यधिक वेदना । तत्र सलवणेनाम्बुना मधुक्रयुक्तेन मद्येन वा सुखोष्णेन पूरणम् । तोयपूर्ण कर्ण हस्तेनोन्मथितेन तैलाम्बुना पूरयेत् । पाश्र्वावनतं वा कृत्वा हस्ते-नाहन्यान्नात्या वा चूपयेत् ॥ ( क्ष ० सं ० ) । इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थाने शल्यापनय-नीयो नाम सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥ २७ ॥
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११४ सुश्रुतसंहिता । अष्टाविंशतितमोऽध्यायः । अथातो विपरीताविपरीतव्रणविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ ।
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि ॥ २ ॥
अत्र इसके अनन्तर विपरीताविपरीत्रण विद्यानीय नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत: के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - शब्द, स्पर्ग, रूप तथा गन्ध जिन व्रणों का विकृत हो वे विपरीत तथा जिनका प्राकृत हो वे अविपरीत व्रण होते हैं उनका विचार यहां किया जाता है ।
फलानिजलवृष्टीनां पुष्पधूमाम्बुदा यथा ।
ख्यापयन्ति भविष्यत्त्वं तथा रिानि पञ्चताम् ॥ ३ ॥
भविष्य में होने वाले फल, अग्नि और जलवर्षा का ज्ञान जैसे पुप्प, धूम और मेघों द्वारा होता है उसी प्रकार अरिष्ट लक्षण भविष्य में होने वाली मृत्यु के सूचक हैं ॥ ३ ॥
विमर्शः - रिष्टपरिभाषा - नियतमरणाख्यापक लिङ्गनरिष्टन् ' ( माधव ) । रोगिगो मरण यस्मादवश्यंभावि लाते । नलचणमरिष्ट स्याद्विष्टनापि तदुच्यते ॥ ( भावप्र ० ) । क्रियापथमतिक्रान्ता- केवल देहमाप्छ्नाः । चिह्न कुर्वन्ति यदोपात्तदरिष्ट निगद्यते ॥ क्षणेन हि प्रादुर्भवन्त्यरिष्टानि, अनिमित्तनश्चारिष्टप्रादुर्भावः । ( चरक ) । रूपेन्द्रियस्वरच्छाया प्रतिच्छाया क्रियादिषु । अन्येष्वपि च भावेषु प्राकृतेष्वनिमित्तत ॥ विकृतिर्या समासेन रिप्ट तदपि लक्षयेत् ॥ ( वाग्भट ) । प्रथम रिष्ट के दो भेद हैं । ( १ ) पुरुषमनाश्रित ( जितका म्वन्ध रोगी से न हो ) जैसे दूताधिकार, पथि चौत्पातिक, बातुरकुले भावावस्था । ( २ ) पुन्पसनय, या आतुराश्रयरिष्ट, अर्थात् जिनका सम्बन्ध रोगी के साथ होता हो । पुरुषाश्रित अरिष्ट के भी ढो भेद हैं । प्रथम स्थायिरिष्ट या रिष्ट, दूसरे अस्थायिरिष्ट या रिष्टाभास | ' केचित्तु तद् द्विधेत्याहु, स्थाय्यस्थाथिविमेदन ' ( वाग्भट ) । सायिरिष्ट से निश्चित मृत्यु होती है तथा इनका हेत्वादि निमित्त अव्यक्त, अज्ञात और अष्ट होता है अत इन्हें नियतारिष्ट या अनिमित्तारिष्ट भी कहते हैं । एप वारणाय -ब्राह्मणैतत् किलामले. । रसायनत-पोनप्यतत्परैर्वा निवार्यते ॥ ( सुश्रुत ) । काचिद् दैवयोगेन दृष्टरि टोऽपि जीवति । ( योगर ० ) । अस्थायिरिष्ट ज्ञातनिमित्त तथा दोप बाहुल्य से पैदा होते हैं । इनका शमन हो सकता है । टोपा णामपि बाहुल्याद्रिष्टाभास समुद्भवेत् । तद्दोषाणा शर्म शाम्येत् । ( अ ० सं ० ) ।
तानि सौक्ष्म्यात् प्रमादाद्वा तथैवाशु व्यतिक्रमात् ।
गृह्यन्ते नोद्गतान्यज्ञैर्मुमूर्णेर्न त्वसम्भवात् ॥ ४ ॥
/ मरने वाले पुरुष के शरीर में उत्पन्न हुये ये अरिष्ट सूक्ष्म होने से, देश के प्रमाद ( अज्ञान ) से तथा शीघ्र ही इनमें व्यतिक्रम ( उल्ट फेर ) हो जाने से या रिष्ट होते ही रोगी की मृत्यु हो जाने से अज्ञ वैद्यों द्वारा नहीं जाने जा सकते हैं । असम्भव या उत्पन्न नहीं होने से नहीं जाने जाते हैं यह वात नहीं है ॥ ४ ॥
विमर्श: - पूर्व श्लोकोक्त पुष्पफल के दृष्टान्त में कभी २ व्यभिचार हो सकता है किन्तु रिष्ट तथा मृत्यु में व्यभिचार कभी नहीं होता । अप्येवन्तु भवेत्पुष्प फ्लेनाननुबन्धि यत् । फल-लापि भवेत्किचिद्यस्य पुष्प न पूर्वजन् ॥ नत्वरिष्टस्य जातस्य नाशोऽ-स्ति मरणादृते । मरणञ्चापि तन्नास्ति यन्नारिष्टपुर सरम् ॥ ( चरक ) ।
ध्रुवन्तु मरणं रिष्टे ब्राह्मणैस्तत् किलामलैः ।
रसायनतपोजप्यतत्परैर्वा निवार्य्यते ॥ ५ ॥
~ रिष्ट के उत्पन्न होने पर मरण निश्चित है तथापि ऐसा कहा है कि रागद्वेपादि मानसदोपों से रहित ब्राह्मणों के द्वारा अथवा रसायन, तप और गायत्र्यादि जपने में परायण पुरुषों द्वारा यह मृत्यु निवारित हो सकती है ॥ ५ ॥
विमर्श: - किळाब्दोऽत्रागमार्थं सूचयति, एव प्रतिपादितमित्यर्थं ( ढल्हण ) । रसायनलक्षणम् -विध्वसि भेपज तद्रसायनम् । यद् दुष्कर यद् दुराप दुस्तरन् । तत्सर्वं तपसा साध्य तपो हि दुरतिक्रमन् ।
नक्षत्रपीडा बहुधा यथाकालं विपच्यते ।
तथैवारिष्टपाकं च ब्रुवते बहवो जनाः ॥ ६
किल आगमे यज्जरान्याधि-यद् दुर्गे यश्च ॥ जिस प्रकार विशिष्ट नक्षत्र पर स्थित हुये ग्रहों की पीडा विशिष्ट काल पर फलवती होती है उसी प्रकार का अरिष्ट का फल भी विशिष्ट समय में होता है ऐसा बहुत से लोग | कहते हैं ॥ ६ ॥
विमर्शः - नक्षत्रग्रवणलन् - होराया नवमे सूर्य सप्तमे च शनैश्वरः । एकादशे गुरु. शुको मासमेकं न जीवति ॥ अशुभै लग्न-समाप्ते षष्ठाष्टमे निशाकरः । शनैश्चरस्तु वन्युत्यो द्विमासे मृत्युमृच्छति ॥
असिद्धिमाप्नुयाल्लोके प्रतिकुर्वन् गतायुषः ।
अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिपक् ॥ ७ ॥
क्षीण आयु वाले रोगी को चिकित्सा करने वाला वैद्य | असिद्धि ( अपयश ) को प्राप्त होता है इसलिये कुशल चिकि-त्सक यत्नपूर्वक अरिष्टलक्षणों का ज्ञान करे ॥ ७ ॥
विमर्श: असिद्धि - अर्थविद्यायशोद्दानिमुपक्रोश मसग्रहम् । प्राप्नुयान्नियत वैद्यो योऽसाध्य समुपाचरेत् ॥ ( चरक ) ।
गन्धवर्णरसादीनां विशेषाणां स्वभावतः ।
वैकृतं यत् तदाचष्टे व्रणिनः पक्वलक्षणम् ॥ ८ ॥
गन्ध, वर्ण और रसाटिक जो इन्द्रियविषयक भाव है । उनके स्वभाव ( प्राकृतिक धर्म ) में जो विकृति उत्पन्न होती है वह व्रणी के पक्क ( मृत्यु ) होने के लक्षण को व्यक्त करती है ॥
कटुस्तीच्णश्च विस्रश्च गन्धस्तु पवनादिभिः ।
लोहगन्धिस्तु रक्तेन व्यामिश्रः सान्निपातिकः ॥ ६ ॥
वायु से कटुगन्ध, पित्त से तीचगगन्ध, कफ आमगन्ध, रक्त से लोहगन्ध और दोपों के सन्निपात से मिश्रित गन्ध आती है ॥ ९ ॥
लाजातसीतैलसमाः किञ्चिद्विस्राश्च गन्धतः ।
ज्ञेयाः प्रकृतिगन्धाः स्युरतोऽन्यद्गन्धवैकृतम् ॥ १० ॥
वातपित्त से लाजगन्ध, वातकफ से अलसी के तैल की सी
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श्रध्यायः २८-२६ ] सूत्रस्थानम् । ११५ गन्ध तथा पितफ से निलतल के समान गन्ध आती है । ये तीनों दृन्द्दज गन्धें कुछ आमगन्धी होनी हैं । ये दोषों की प्राकृतिक गन्धे हैं किन्तु इनसे विपरीत विकृत गन्ध समझनी चाहिये ॥ १० ॥
मद्यागुर्वाज्यसुमनःपद्मचन्दनचम्पकैः ।
सगन्धा दिव्यगन्बाश्च मुमृषूणां व्रणाः स्मृताः ॥ ११ ॥
मरणोन्मुख मनुष्यों के व्रणों से मद्य, अगुरू, घृत, चमेली के पुष्प, कमल, चन्दन, चम्पा इनके समान गन्ध तथा दिव्य गन्ध आती है ॥ ११ ॥
श्ववाजिमृपिकध्वाङ्गयूतिवल्लुरमत्कुणैः ।
सगन्वाः पङ्कगन्धाश्च भूमिगन्धाश्च गर्हिताः ॥ १२ ॥
कुत्ता, बोड़ा, चूहा, कौआ, पृनिमांग, शुष्क्मांस तथा । म इनके समान गन्ध वाले व्रण तथा कीचड के समान read a और भूमि के समान गन्ध वाले व्रण गर्हित ( निन्दित ) होते हैं ॥ १२ ॥
घ्यामकुङ्कुमकङ्कुष्टसवर्णाः पित्तकोपतः ।
न दह्यन्ते न चूँव्यन्ते भिषक् तान् परिवर्जयेत् ॥१३ ॥
पित्त के प्रकोप से उत्पन्न हुये व्रग कुछ काले तथा केगर और कंकुष्ट के समान वर्ग वाले होने पर भी ढाह और चोप उत्पन्न नहीं करते हों उनकी वैद्य चिकित्सा न करे ॥ १३ ॥
कण्डूमन्तः स्थिरः श्वेताः स्निग्धाः कफनिमित्ततः ।
दूयन्ते वाऽपि दह्यन्ते भिषक् तान् परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥
करू के बाप उत्पन्न हुये ब्रग कण्डूयुक्त, स्थिर, श्वेत और स्निग्ध होते हुये भी पीडा और दाह उत्पन्न करते हों उनकी वैद्य चिकित्सा न करे ॥ ५१ ॥
कृष्णास्तु चे तनुस्रात्रा वातजा मर्मतापिनः ।
स्वल्पामपि न कुर्वन्ति रुजं तान् परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
बान से उलन्न व्रग यदिकाले, पतले या अल्प स्राव वाले हों तथा मर्म प्रदेश पर होने पर भी थोड़ी सी भी पोड़ा न करते हाँ तो उनकी भी चिकित्सा न करे ॥ १५ ॥
च्वेडन्ति घुर्बुरायन्ते ज्वलन्तीव च ये त्रगाः ।
त्वम्मांसस्याश्च पवनं सशब्दं विसृजन्ति ये ॥ १६ ॥
शब्दविकृति का उदाहरण जिन व्रणों से खट खट और बुट बुट आदि ध्वनि निकलनी हो तथा जो दाह करते हों तथा
त्वचा और मांस में होते हुये भी शब्दयुक्त वायुको छोड़ते हो ।
उन्हें भी अचिकित्स्य जाने ॥ १६ ॥
चे च मर्मत्त्वसम्भूता भवन्त्यत्यर्थवेदनाः ।
दह्यन्ते चान्तरत्यर्थं वहिः शीताश्च ये ब्रणाः ॥ १७ ॥
| सर्शविकृति का उदाहरण - जो व्रण मर्मस्थानों में न होने पर भी अधिक पीड़ा देते हों तथा भीतर से अत्यन्त गर्म और बाहर से शीतल मालूम होते हों तथा जो बाहर में अधिक दाह करते हों और भीतर से अत्यन्त शीतल हों उन्हें भी लसाव्य जाने ॥ १७ ॥
दह्यन्ते बहिरत्यर्थं भवन्त्यन्तश्च शीवलाः ।
शक्तिध्वजरथाः कुन्तवाजिवारणगोवृषाः ॥ १८ ॥
। येषु चाप्यवभासेरन् प्रासादाकृतयस्तथा ।
चूर्णावकीर्णा इव ये भान्ति ग न च चूर्णिताः ॥ १६ ॥
रूपविकृति का उदाहरण - जिन ऋणों में शक्ति ( आयुध ), ध्वजा, रथ, कुन्त ( भाला ), घोडा, हाथी, गाय, बैल इनके चित्र का भास होता हो तथा राजमहल की सी आकृति वाले त्रण तथा जो चूर्ण के न छिडकने पर भी चूर्ण से व्याप्त हुये के समान भासित होते हों वे भी असाध्य है ॥ १८-१९ ॥
प्राणमांसक्षयश्वासकासारोचकपीडिताः ।
प्रवृद्धपूरुधिरा णा येषां च मर्मसु ॥ २० ॥
जिन व्रणों में रोगी प्राणक्षय, मांसक्षय, श्वास, कास, अरो-चक्र आदि से पीडित हो तथा जिनसे पृय और रक्त अधिक निकलता हो तथा जो व्रण मर्मस्थानों पर स्थित हों वे भी असाध्य होते हैं ॥ २० ॥
क्रियाभिः सम्यगारख्या न सिध्यन्ति च ये व्रणाः ।
वर्जयेत्तान् भिषक् प्राज्ञः संरक्षन्नात्मनो यशः ॥ २१ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विपरीताविपरीतव्रण-विज्ञानीय नाम अष्टाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २८ || प्रारम्भ में ही योग्य चिकित्सा करने पर भी जो व्रण अच्छे नहीं होते हों उन्हें वैद्य अपने यदा की रक्षा करने के हेतु वर्जित करे ॥ २१ ॥
इत्यायुर्वेदतत्त्वत्सन्दीपिकाभापायां सूत्रस्थाने विपरीताविप-तव्रणविज्ञानीयो नामाष्टाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २८ ॥
एकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः । विपरीताविपरीतस्त्रप्रनिदर्शनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर विपरीताविपरीतस्वप्न निदर्शनीय नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १–२ ॥
दूतदर्शनसम्भाषा त्रेषाश्चेष्टितमेव च ।
ऋतं वेला तिथिश्चैव निमित्तं शकुनोऽनिलः ॥ ३ ॥
देशो वैद्यस्य वाग्देहमनसाश्च विचेष्टितम् ।
कथयन्त्यातुरगतं शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥ ४ ॥
दूत का दर्शन, सम्भाषण, वेष और चेष्टाएं तथा नक्षत्र, समय, तिथि, निमित्त, शकुन, वायु, वैद्य का स्थान तथा वाणी, देह और मन की चेष्टा ये सब विषय रोगी के शुभ या अशुभ
भाव को कहते हैं । ३-१ ॥
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सुश्रुतसंहिता | ११६
पाखण्डाश्रमवर्गानां सपक्षाः कर्मसिद्धये ।
त एव त्रिपरीताः स्युर्दूताः कर्मविपत्तये ॥ ५ ॥
पाखण्ड ( वेदवाह्य बौद्ध कापालिक ), ब्रह्मचर्यादि आश्रम, ब्राह्मणादिवर्ग, इनमें से जिस मन, आश्रम या वर्ण का लग । हो उसी मत, आश्रम या वर्ग का दूत चिकित्सा में सफलता-दायक होता और यदि रोगी के an area a था वर्ण से विपरीत मत, आश्रम और वर्ग वाले दूत हाँ तो चिकिल्पा में निनाजनक होते हैं ॥ ५ ॥
नपुंसकं न्त्री बहवो नैककार्या असूयका. ।
भोरयमानाः प्राप्ता वा स्युः परम्पराः ॥
वैद्य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गर्हिताः ॥ ६ ॥
नपुंसक, स्त्रीदूत, बहुत से दूत तथा अनेक दूत भिन्न भिन्न । कार्य से आये हॉ, परस्पर या रोगी में ईप्पी रखने वाले या निन्दा करने वाले, गढ़द्दे या उंट के रथ में बैठ कर आये हों जयवा एक के बाद एक करके गये हों या एक के पीछे एक पंक्ति बनाकर जो दूत वैद्य के समीप आये हों वे सब निन्दित है ।
पाशदण्डायुधधराः पाण्डुरेतरवाससः ।
नाजीर्गापक्रम लिनोस्तवाससः ॥ ७ ॥
न्यूनाधिकाङ्गा उद्विग्ना विकृता रौद्ररूपिण ' ।
रूक्षनिष्ठुरगढ़ाञ्चाप्यमाङ्गल्याभिधायिनः ॥ ८ ॥
पशुओं को बांधने की रज्जु, दण्ड, किसी प्रकार का अन्त्र डान्त्र धारण किये हुये एवं पाण्डु तथा काले, पीले, लाल चन्द्र पहिने हुये तया गीले घटे पुराने, उपसभ्य, केवल एक बन्नः मडिन और फटा पुराना बन्त्र पहने हुये तथा जिन के जग या पाङ्ग ( अङ्गुरनादि ) कम या अधिक हो, बढाये हुये, ओष्ट, नासाहि को होने से लाडे, लले, विना वाले एवं भयानक स्वरूप वाले दूत तथा सुन और निष्ठुर वाक्य बोलने वाले व्यवा समाङ्गलिक शब्द का उच्चारण करने वाले दूत निन्दिन होते है ॥ ७८ ॥
हिन्दन्तणानि स्पृशन्तो नासिकां स्तनम् ।
वखान्तानामिका केशनखरोमदशाखशः ॥ ६ ॥
स्रोतोऽवरोधहृदण्डमूर्वोरःकृक्षिपागयः ।
कपालोपलभस्मास्थितुपाङ्गारकरात्र ये ॥ १० ॥
विलिखन्तो महीं किञ्चिन्मुखन्तो लोष्टभेदिनः ।
तैलकर्दमदिग्वाङ्गा रक्त्रगनुलेपनाः ॥ ११ ॥
फलं पक्षमसारं वा गृहीत्वाऽन्यच्च तद्रिवम् ।
नखैर्नखान्तरं वाऽपि करेण चरणं तथा ॥ १२ ॥
उपानञ्चर्नहत्ता वा विकृतव्याधिपीडिताः ।
वामाचारा दन्तञ्च वासिनो विकृतेक्षगाः ॥ १३ ॥
चान्यां दिशं प्राखलयो विषमैकपदे स्थिताः ।
वैद्यं व उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गहिताः ॥ १४ ॥
दक्षिणाभिमुखं देशे त्वशुचौ वा हुताशनम् ।
स्वलयन्तं पचन्तं वा क्रूरकर्मणि चोद्यतम् ॥ १५ ॥
दृग को या काष्ट को तेड़ने वाले अपनी नासिका aer तनों को छूने वाले एवं वन्त्र का मिरा, अनामिका अड्गुली, गिर के बाल, नख, शरीर के बाल तथा दांतों को छूने वाले, कर्णादि छिद्र रूपी स्रोतलों का अवरोध करने वाले, स्कन्ध प्रदेश, हृदय, गण्डस्थल, कपोल, निर, छाती तथा कृति के ऊपर हाथ फेरने वाले तथा कपाल ( टिकरा ), पन्थर, भस्म, हड्डी, भूमा तथा अङ्गार इनमें से किसी एक वस्तु को हाथ में लिये हुये तथा नख, लकड़ी आदि से भूमि को खरोंचते हुये, अपने केशों को नोंचते हुये या हस्तस्थित वस्तु को गिराते हुये, मिट्टी के टेले को हाथों से फोड़ते हुये, तेल अथवा कीचड़ से अड़ों को लिप्त किये हुये, लाल माला पहने हुये तथा लाल चन्दन का तिलक किये हुये एवं पका हुआ फल, साररहित फल अथवा अन्य उसके समान छुद्र वस्तु हाथ में लिये हुये और नानूनों से नाम्बून तथा हो रहते हुये, हाथ में जूते या चमड़ा लिये हुये अथवा गलितकुष्ठ आादि विकृत रोगों से पीडित, विपरीत आचार वाले, रोते हुये, जोर से नास लेते हुये, फूले आदि मे विकृत नेत्र वाले, दक्षिण दिशा में हाथ जोड़े हुये, टेटे या एक पैर से मुडे हुये इस तरह दूत वैद्य के पास आते हैं वे भी निन्द्रत हैं ॥ ९ -६५ ॥ नग्नं भूमौ शयानं वा वेगोत्सर्गेषु गऽनुचिम् ।
प्रकीर्णकेशमभ्यक्तं स्त्रिन्नं विवमेव च ।
वैद्यं य उपसर्पन्ति दूताले चापि गर्हिता ॥ १६ ॥
वैद्य के दक्षिण दिशा में सुख किये होने पर, अपवित्र स्थान में अग्नि को जलाने हुये तथा पकाते हुये, पशुवधादि क्रूरकर्म में लगे हुये, नग्न तथा भूमि पर लेटे हुये, मलमूत्रादि के त्याग करने से अपवित्र हुये, शिरके बालों को फैलाये हुये, शरीर पर तैलादि से अभ्य करने पर स्वदित हुये तथा चिह्नल हुये ऐसे वैद्यके पास जो दूत आते हैं वे भी निन्दिन हैं ॥ वैद्यत्य पैत्र्ये देवैा कार्ये चोत्पातदर्शने ॥ १७ ॥
मध्याह्ने चार्द्धरात्रे वा सन्ध्ययोः कृत्तिकासु च ।
आर्द्राऽश्लेषामचामूलपूर्वासु भरणीषु च ॥ १८ ॥
चतुथ्यो वा नवम्यां या पठ्यां सन्धिदिनेषु च ।
वैद्यं च उपसर्पन्ति दूतात्ते चापि गर्हिताः ॥ १६ ॥
वैद्य के देवता के हवन या पितृकार्य ( श्राद्धादि ) में प्रवृत्त होने पर, पान, भूकम्पादि उत्पात के समय, मध्याह्न, अर्द्धरात्र, प्रभात और सायङ्काल की सन्धि वेला में तया कृत्तिका, आर्द्रा, अश्लेषा, मघा, मूल, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वापाटा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी इन नक्षत्रों में तथा चतुर्थी, नवमी, पष्टी एवं पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा आदि सन्वि दिनों में जो दूत वैद्य के पास आते हैं वे भी निन्दित हैं ॥ १७-१९ ॥
स्विन्नाभितप्ता मध्याह्ने चलनस्त्य समीपतः ।
गहिताः पितरोगेषु दूता वैद्यमुपागताः ॥ २० ॥
त एव कफरोगेषु कर्मसिद्धिकराः स्मृताः ।
एतेन शेषं व्याख्यातं बुदच्वा सविभजेत्तु तत् ॥ २१ ॥
रक्तपित्तातिसारेषु प्रमेहेषु तथैव च । प्रशस्तो जलरोधेषु दूतवैद्यसमागमः ।
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श्रध्यायः २ ९ ] सूत्रस्थानम् । ११७
विज्ञायैवं विभागं तु शेषं बुध्येत पण्डितः ॥ २२ ॥
अग्नि के समीप बैठने से पसीने से व्याप्त हुये, धूप से तस हुये दूत मध्याह्न के समय पित्तरोगियों की चिकित्सा के लिये वैद्य के पास आये हुये निन्दित हैं । किन्तु वे ही दूत कफ रोगियों की चिकित्सा के लिये वैद्य के समीप आये हो तो चिकित्सा में सिद्धि देते हैं । इस सिद्धान्त से अनुक्त विषयों को भी व्याख्यात समझ कर विभाग करना चाहिये । रक्तपित्त, अतिसार और प्रमेहों में जहां पानी का बांध हो ऐसे स्थान में वैद्य और दूत का समागम प्रशस्त है । पण्डित चिकित्सक इस तरह से अनुक्त बातों को भी समझ लेवे ॥ २०-२२ ॥ विमर्शः - एतेन शेषं व्याख्यातम् - तद्यथा - घृतोदकादिद्रवसमी पस्थमतिशीतस्तब्ध ' प्रत्युपसि श्लेष्मामयेऽशुभ । पित्तामये तु शुभ । ( भ ० सं ० ) । वातरोगे परुपरूक्षसिकतापापाणशर्करादिविशिष्टे देशे काले सायाह्ने दूतोऽशुभ । विपरीतस्तु शुभः । ( अरुणदत्त ) । तथा सेतुभ छर्दिमेहातिसारादिष्वशुभ सेतुबन्धे तु शुभ । दूतवै-यसमागमे चरकमतम् — विकारसामान्यगुणे देशे कालेऽथवा भिषक् । दूतमभ्यागतं दृष्ट्वा नातुर तमुपाचरेत् ॥ ( चरक ) ।
शुक्लवासाः शुचिगौर श्यामो वा प्रियदर्शनः ।
स्त्रस्यां जातौ स्वगोत्रो वा दूतः कार्य्यकरः स्मृतः ॥ २३ ॥
जो दूत श्वेत वस्त्र पहना हुआ, पवित्र, गौरवर्ण अथवा श्यामवर्ण, देखने में मनोहर तथा रोगी की निजी जाति और गोत्र का हो वह कार्य सिद्धि करने वाला होता है ॥ २३ ॥
गोयानेनागतस्तुष्टः पादाभ्यां शुभचेष्टितः ॥ २४ ॥
स्मृतिमान् विधिकालज्ञः स्वतन्त्रः प्रतिपत्तिमान् ।
अलङ्कृतो मङ्गलवान् दूतः कार्य्यकरः स्मृतः ॥ २५ ॥
वैल की सवारी से आया हुआ, प्रसन्नचित्त, पैदल चलकर आया हुआ, उत्तम चेष्टाओं वाला, स्मरणशक्ति युक्त, शास्त्रविधि और उचितानुचित समय को जानने वाला, स्वतन्त्र, प्रगल्भ बुद्धिवाला, उत्तम वस्त्र तथा आभूषणों से अलङ्कृत ऐसा मङ्गलकारी दूत चिकित्सारूपी कार्य को करने वाला होता है ।
स्वस्थं प्राङ्मुखमासीनं समे देशे शुचौ शुचिम् ।
उपसर्पति यो वैद्यं स च कार्य्यकरः स्मृतः ॥ २६ ॥
- समान तथा पवित्र देश में पूर्व की ओर मुख करके बैठे हुये स्वस्थ तथा पवित्र वैद्य के पास जो दूत जाता है वह कार्य सिद्ध करता है ॥ २६ ॥
मांसोदकुम्भातपत्रविप्रवारणगोवृषाः ।
शुक्लवर्णाश्च पूज्यन्ते प्रस्थाने दर्शनं गता ॥ २७ ॥
स्त्री पुत्रिणी सवत्सा गौर्वर्धमाना स्खलङ्कृता ।
कन्या मत्स्याः फलं ' चामं स्वस्तिकं मोदका दधि ॥ २८ ॥
हिरण्याक्षतपात्रं वा रत्नानि सुमनो नृपः ।
अप्रशान्तोऽनलो वाजी हंसश्चाषः शिखी तथा ॥ २६ ॥
ब्रह्मदुन्दुभिजीमूतशङ्खवेणुरथस्वनाः ।
सिंहगोवृषनादाश्च द्वेषितं गजबृंहितम् ॥ ३० ॥
शस्तं हंसरुतं नृणां कौशिकं चैव वामतः ।
प्रस्थाने यायिनः श्रेष्ठा वाचश्च हृदयङ्गमाः ॥ ३१ ॥
मांस, जलकुम्भ, छत्र, ब्राह्मण, हाथी, गौ, वृषभ तथा वर्ण के पुष्प, दही, चांवल, मोती आदि पदार्थ रोगी को देखने जाते समय रास्ते में मिलने पर शुभ है । पुत्रवती स्त्री, बछडे सहित गाय, यौवनावस्था में बढ़ती हुई तथा अलङ्कार युक्त कुमारिका एवं मछलियां, कच्चे फल, स्वस्तिक चिह्न, लड्डू, दही, सुवर्ण, अक्षत पूर्ण पात्र, रत्न, पुष्प, राजा, जलती हुई आग, घोडा, हंस, चापपक्षी तथा मयूर एवं ब्रह्म ( वेद ), नगाडा, मेघ, शंख, वेणु और रथ इनकी ध्वनि का होना, शेर, गाय, बैल इनका शब्द, घोडे की हिनहिनाहट, हाथी का चिंघाडना, हंस का बोलना, वामहस्त की ओर उल्लू का बोलना तथा अन्य भी हृदय को आनन्द देने वाली कोकिला, तोता, मैना आदि की वोलियां रोगी को देखने जाने वाले वैद्य के लिये शुभ हैं ॥
पत्रपुष्पफलोपेतान् सक्षीरान्नीरुजो द्रुमान् ।
आश्रिता वा नभोवेश्मध्वजतोरणवेदिकाः ॥ ३२ ॥
दिक्षु शान्तासु वक्तारो मधुरं पृष्ठतोऽनुगाः ।
वामा वा दक्षिणा वाऽपि शकुनाः कर्मसिद्धये ॥ ३३ ॥
पत्र, पुप्प और फलों से युक्त, दुग्ध वाले और नीरोग वृत्तों पर बैठे हुये अथवा आकाश में उडते हुये, किंवा मकान, पताका, तोरण और वेदिका इन पर स्थित हुये किंवा शान्त दिशाओं में मधुर वाणी बोलते हुये, पीछे से आने वाई अथवा दाहिनी तरफ से आने वाले शकुन ( सिद्धि करते है ॥ ३२-३३ ॥ शुकेशनिहतेऽपत्रे वल्लीनद्धे सकण्टके । वृक्षेऽथवाऽश्मभस्मास्थिवि पाङ्गारपांशुषु
चैत्यवल्मीकविषमस्थिता दीप्तखरस्वराः ।
पुरतो दिक्षु दीप्तासु वक्तारो नार्थसाधकाः ॥
शुष्क या विजली से जले होने से पत्तों से व पक्षी ) कार्य ॥ ३४ ॥
३५ ॥ रहित लता चढ़े हुये एवं कांटेदार वृक्ष पर अथवा पत्थर, भस्म, अस्थि, विष्ठा, तुप, कोयला, धूलि, चैत्य, वल्मीक और ऊचे - नीचे स्थान पर बैठे हुये तथा उग्र कर्कश शब्द करते हुये तथा तेज धूप से दिशाएं दीप्त हों उस समय वोलने वाली पक्षी कार्यसिद्धिकर नही होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ पुन्नामान: खगा वामाः स्त्रीसंज्ञा दक्षिणाः शुभाः ।
दक्षिणाद्वामगमनं प्रशस्तं श्वशृगालयोः ।
वामं नकुलचाषाणां नोभयं शशसर्पयोः ॥ ३६ ॥
भासकौशिकयोश्चैव न प्रशस्तं किलोभयम् ।
दर्शनं वा रुतं चापि न गोधाकृकलासयोः ॥ ३७ ॥
पुरुष जाति के पक्षी बाएं तथा स्त्री जाति के पक्षी दाएंशुभ-कारी होते हैं । कुत्ते और शृगाल ( सियार ) का arr ' होकर निकलना श्रेष्ठ है । नौले और चाप पक्षी का वाम की ओर जाना अधिक प्रशस्त है । खरगोश तथा सर्प का किसी भी ओर निकलना श्रेष्ठ नही है । भास पक्षी तथा उल्लू. का भी दक्षिण या वाम किसी भी ओर निकलना श्रेष्ठ नही है । गोधा तथा गिरगिट का रोगी के घर जाते समय दीखना या उनका बोलना शुभ नहीं है ॥ ३६-३७ ॥